सत्यमेव जयते gideonhistory.com
मौर्य काल

चन्द्रगुप्त मौर्य

   मौर्य राजवंश की स्थापना चन्द्रगुप्त मौर्य ने की। लगता है, वह साधारण कुल का था। ब्राह्मण परम्परा के अनुसार उसकी माता शूद्र जाति की मुरा नामक स्त्री थी जो नन्दों के रनवास में रहती थी। लेकिन एक पुरानी बौद्ध परम्परा के अनुसार ज्ञात होता है कि नेपाल की तराई से लगे गोरखपुर में मौर्य नामक एक क्षत्रिय कुल था। सम्भव है कि चन्द्रगुप्त इसी वंश का था। अपने शासन के अन्तिम दिनों में जो नन्दों की कमजोरी और बदनामी बढ़ती जा रही थी उसका फायदा उठाते हुए चन्द्रगुप्त ने कौटिल्य नाम से विदित चाणक्य की सहायता से नन्द राजवंश का तख्ता पलट दिया और मौर्यवंश का शासन कायम किया। चन्द्रगुप्त के शत्रुओं के विरूद्ध चाणक्य ने जो चालें चलीं उनकी विस्तृत कथा मुद्राराक्षस नामक नाटक में हैं जिसकी रचना विशाखदत्त ने नौवीं सदी में की। आधुनिक काल में इस विषय पर कई नाटक लिखे गए हैं।
   जस्टिन नामक एक यूनानी लेखक के अनुसार, चन्द्रगुप्त ने अपनी 600,000 की फौज से सारे भारत को रौंद दिया। यह बात सही भी हो सकती है और नहीं भी, लेकिन यह सही है कि चन्द्रगुप्त ने पश्चिमोत्तर भारत को सेल्यूकस की गुलामी से मुक्त किया, जो सिन्धु नदी के पश्चिम में राज करता था। इस यूनानी वाइसराय के साथ हुई लड़ाई में लगता है चन्द्रगुप्त विजयी रहा। अन्त में, दोनों के बीच समझौता हो गया, और चन्द्रगुप्त से 500 हाथी लेकर उसके बदले सेल्यूकस ने उसे पूर्वी अफगानिस्तान, बलूचिस्तान और सिन्धु के पश्चिम क्षेत्र को दे दिया। इस प्रकार चन्द्रगुप्त ने एक विशाल साम्राज्य स्थापित कर लिया, जिसमें पूरे बिहार तथा उड़ीसा और बंगाल के बड़े भागों के अतिरिक्त, पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भारत और दकन भी थे। फलतः मौर्यों का शासन, केवल तमिलनाडु को तथा पूर्वोत्तर भारत के कुछ भागों को छोड़ कर, सारे भारतीय उपमहाद्वीप पर छा गया। उत्तर-पश्चिम में तो मौर्यों का आधिपत्य कई ऐसे ही इलाकों पर था जो ब्रिटिश साम्राज्य में भी शामिल नहीं थे।

साम्राज्य का संगठन

  मौर्यों ने एक बड़ा ही विस्तृत प्रशासन-तन्त्र स्थापित किया। इसकी झलक हमें मेगास्थनीज के विवरण और कौटिल्य के अर्थषास्त्र में मिलती है। मेगास्थनीज यूनान का राजदूत था और उसे सेल्यूकस ने चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा था। वह मौर्य की राजधानी पाटलिपुत्र में रहता था और उसने न केवल पाटलिपुत्र के, अपितु सारे मौर्य साम्राज्य के शासन का विवरण लिख छोड़ा है। उसका यह विवरण पूरा-पूरा नहीं बच पाया, परन्तु उससे लिए गए उद्धरण कई परवर्ती यूनानी लेखकों की पुस्तकों में आए हैं। ये सारे टुकड़े इकट्ठा करके एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुए हैं। इस पुस्तक से मौर्यकाल के प्रशासन, समाज और अर्थव्यवस्था पर अच्छा प्रकाश पड़ता है।
   मेगास्थनीज के इस विवरण को कौटिल्य के अर्थशास्त्र से परिपूरित किया जा सकता है। यद्यपि अर्थशास्त्र को अन्तिम रूप मौर्य शासन के कई सदियों के बाद दिया गया फिर भी इसके कुछ खंडो में आई बातें यर्थाथ हैं और मौर्य प्रशासन एवं अर्थव्यवस्था के बारे में प्रमाणिक जानकारी देती हैं। इन दोनों स्रोतों के आधार पर हम चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रशासन-तन्त्र का खाका खींच सकते हैं।
   चन्द्रगुप्त मौर्य एक स्वच्छन्द शासक था और सारे अधिकार अपने ही हाथों में रखे हुए था। यदि अर्थशास्त्र की पंक्तियाँ विश्वसनीय हों, तो राजा ने एक उच्च आदर्श स्थापित किया। उसका कथन है कि प्रजा के सुख में ही उसका सुख है और प्रजा के दुख में ही उसका दुख। परन्तु हमें मालूम नहीं कि राजा ने इस आदर्श का पालन कहाँ तक किया। मेगास्थनीज के अनुसार, राजा की सहायता करने के लिए एक परिषद् गठित थी। बड़े-बड़े बुद्धिमान लोग इसके सदस्य थे। इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता है कि राजा इस परिषद् की सलाह मानने को बाध्य था, परन्तु ऊँचे अधिकारियों का चयन इस परिषद् के सदस्यों में से ही किया जाता था।
   साम्राज्य अनेक प्रान्तों में विभक्त था। हर एक प्रान्त एक-एक राजपुरूष के जिम्मे लगा रहता था। राजपुरूष राजवंश की किसी संतान को बनाया जाता था। प्रान्त भी छोटी-छोटी इकाइयों में विभक्त थे। ग्रामांचल और नगरांचल दोनों के प्रशासन की व्यवस्था थी। उत्खननों से पता चलता है कि बहुत सारे बड़े-बड़े नगर मौर्यकाल के हैं। पाटलिपुत्र, कौशाम्बी, उज्जयिनी और तक्षशिला चोटी के नगर थे। मौर्य राजधानी पाटलिपुत्र का प्रशासन छः समितियाँ करती थीं। हर समिति में पाँच-पाँच सदस्य होते थे। यह समितियाँ सफाई, विदेशियों की रक्षा, जन्म और मृत्यु का लेखा, बाटों और मापों का नियमन और इस तरह के अन्यान्य कार्य करती थीं। मौर्य काल के कई प्रकार के बाट बिहार में विभिन्न स्थानों में पाए गए हैं।
   इन सबों के अतिरिक्त, केन्द्रीय शासन में राज्य के कम से कम दो दर्जन विभाग थे जो कम से कम राजधानी के निकटवर्ती क्षेत्रों में सामाजिक और आर्थिक गतिविधि पर नियन्त्रण रखते थे। चन्द्रगुप्त के प्रशासन की सबसे बड़ी विशेषता है विशाल सेना रखना। प्लिनी नामक एक यूनानी लेखक के अनुसार चन्द्रगुप्त की सेना में 600,000 पैदल सिपाही, 30,000 घुड़सवार और 9,000 हाथी थे। एक दूसरे स्रोत में कहा गया है कि मौर्यों के पास 8,000 रथ थे। इन सबों के अलावा, लगता है कि मौर्यां के पास नौसेना भी थी। मेगास्थनीज के अनुसार सैनिक प्रशासन के लिए तीस अधिकारियों की एक परिषद् थी जो पाँच-पाँच सदस्यों की छह समितियों में विभक्त थी। लगता है कि पैदल, घोड़ा, हाथी, रथ, नाव और सवारी, सेना के इन छह अंगो में से हर एक का प्रबन्ध एक-एक समिति को सौंपा गया था। मौर्य-सेना नन्द-सेना से लगभग तिगुनी थी। ऐसा अवश्य ही राजक्षेत्र और आयस्रोतों में बहुत अधिक वृद्धि होने की बदौलत हुआ होगा।
   इतनी विशाल सेना पर होने वाले भारी खर्च की पूर्ति चन्द्रगुप्त मौर्य कैसे कर पाता था ? यदि हम कौटिल्य के अर्थशास्त्र को विश्वसनीय मानें तो लगता है कि साम्राज्य की सीमाओं के भीतर होने वाले लगभग सारे आर्थिक कार्यकलाप पर राजकीय नियन्त्रण था। राज्य ने खेतिहरों और शूद्र मजदूरों की सहायता से परती जमीन तोड़कर कृषि-क्षेत्र को बढ़ाया। इस तरह कृषि-क्षेत्र बढ़ने से राज्य को अच्छी खासी आय होने लगी, क्योंकि उस पर नए-नए बसाये गए किसानों से अच्छा राजस्व आने लगा। जान पड़ता है कि किसानों से वसूले गए कर उनकी उपज के चौथे हिस्से से छठे हिस्से तक होते थे। जिन किसानों को सिंचाई सुविधा दी जाती गई उनसे सिंचाई-कर वसूला जाता था। इसके अलावा, आपातकाल में किसानों को अधिक उपजाने के लिए बाध्य किया जाता था। नगरों में बिक्री के लिए जो माल लाए जाते थे उन पर प्रवेशद्वार पर ही चुंगी ले ली जाती थी। खान, मद्य की बिक्री, हथियारों का निर्माण आदि पर राज्य का एकाधिकार था। इन सबों से अवश्य ही राज्य-कोष समृद्ध होता था। इस प्रकार चन्द्रगुप्त ने एक सुसंगठित प्रशासन-तन्त्र कायम किया और उसे ठोस वित्तीय आधार प्रदान किया।

अशोक (273-232 ई. पू.)

   चन्द्रगुप्त के बाद बिन्दुसार गद्दी पर बैठा, जिसके शासन की महत्वपूर्ण बात है यूनानी राजाओं के साथ निरन्तर सम्बन्ध। उसका पुत्र अशोक मौर्य राजाओं में सबसे महान् हुआ। बौद्ध परम्परा के अनुसार, वह अपने आरम्भिक जीवन में परम क्रूर था और अपने 99 भाईयों के कत्ल करके राजगद्दी पर बैठा। लेकिन यह बात केवल किंवदन्ती पर आधारित है, इसलिए गलत भी हो सकती है। बौद्ध लेखकों ने अशोक का जो जीवन-चरित्र लिखा है वह कल्पनाओं से भरा है, इसलिए उसे गम्भीरतापूर्वक ग्रहण नहीं किया जा सकता है।

अशोक के राज्यादेश

   हम अशोक का इतिहास उसके अभिलेखो के आधार पर गढ़ सकते हैं। अशोक पहला भारतीय राजा हुआ जिसने अपने अभिलेखों के सहारे सीधे अपनी प्रजा को सम्बोधित किया। उसके अभिलेख भारत में प्राकृत भाषा के सबसे पुराने निदर्श प्रस्तुत करते हैं। ये अभिलेख शिलाओं पर, पत्थर के पालिशदार शीर्षयुक्त स्तम्भों पर, गुहाओं में और एक मामले में मिट्टी के कटोरे पर भी खुदे हुए हैं। ये न केवल भारतीय उपमहाद्वीप में ही अपितु अफगानिस्तान में भी पाए गए हैं। अब तक ये 45 स्थानों में कुल 181 पाठान्तरों में पाए गए हैं। इन अभिलेखों में राजा के आदेश सूचित किए गए हैं। प्राकृत में रचे ये अभिलेख साम्राज्य भर के अधिकांश भागों में ब्राह्मी लिपि में लिखित हैं। किंतु पश्चिमोत्तर भाग में ये खरोष्ठी और आरामाइक लिपियों में हैं और अफगानिस्तान में इनकी भाषा और लिपि आरामाइक और यूनानी दोनों है। अशोक के अभिलेख सामान्यतः प्राचीन राजमार्गों के किनारे स्थापित थे। इनसे अशोक के जीवनवृत, उसकी आन्तरिक और परराष्ट्रीय नीति, तथा उसके राज्य के विस्तार की जानकारी मिलती है।

कलिंग युद्ध का प्रभाव

   अशोक की गृह और विदेश नीति बौद्ध धर्म के आदर्श से प्रेरित है। राजगद्दी पर बैठने के बाद उसने केवल एक युद्ध किया, जो कलिंग युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है। उसके अपने कथन के अनुसार इस युद्ध में 100,000 लोग मारे गए, कई लाख बरबाद हुए और 150,000 बन्दी बनाए गए। ये आंकड़े अतिश्योक्तिपूर्ण हैं, क्योंकि अशोक के अभिलेखों में शतसहस्त्र शब्द का प्रयोग कहावती तौर पर किया गया है। जो भी हो, इससे प्रतीत होता है कि इस युद्ध में हुए भारी नर-संहार से अशोक का हृदय दहल गया। इस युद्ध के कारण ब्राह्मण पुरोहितों को और बौद्ध भिक्षुओं को भी बहुत कष्ट झेलने पड़े, जिससे अशोक को गहरी व्यथा और पश्चाताप हुआ। इसलिए उसने दूसरे राज्यों पर भौतिक विजय पाने की नीति छोड़ कर सांस्कृतिक विजय पाने की नीति अपनाई। दूसरे शब्दो में, भेरी-घोष के बदले धर्म-घोष होने लगा। हम अशोक के शब्दों में उसके 13वें मुख्य शिलालेख से एक उद्धरण दे रहे है -
   ‘राज्याभिषेक के आठ वर्ष बाद देवों के प्रिय प्रियदर्शी राजा ने कलिंग पर विजय प्राप्त की। युद्ध में एक लाख पचास हजार लोग उजड़ गए, एक लाख मारे गए और उसके कई गुने नष्ट हुए। उसके बाद अब देवों का प्रिय अशोक निष्ठापूर्वक धर्म का पालन, धर्म की कामना और धर्म का उपदेश करने लगा। उसके बाद कलिंगविजयी देवों का प्रिय अशोक पश्चाताप करने लगा क्योंकि जब किसी देश को जीता जाता है तब वहाँ लोगों की हत्या, मृत्यु और पलायन होते हैं। ऐसा वध देवों के प्रिय को बड़ा दुखद और गम्भीर लगा। देवों के प्रिय को इससे भी अधिक दुःख इसलिये है कि वहाँ जो कोई रहते हैं - चाहे वे ब्राह्मण, श्रमण या अन्य सम्प्रदायों के हों या ऐसे गृहस्थ हो जो गुरूजनों के आज्ञाकारी और अपने मित्रों, परिचितों, साथियों, सम्बन्धियों, दासों और चाकरों के प्रति अच्छा व्यवहार करते हैं और निष्ठावान् हैं - वे सभी हिंसा, हत्या और अपने प्रियजनों के विछोह के दुःख को झेलते हैं।.... उस समय कलिंग को जीतने में जितने लोग मारे गए, मरे और उजड़े उसका सौवाँ या हजारवाँ भाग भी देवों के प्रिय के लिए भारी व्यथाकारी होगा।.... देवताओं का प्रिय धर्मविजय को ही श्रेष्ठ विजय समझता है।....‘
   अब अशोक ने कबायली समुदायों और सीमावर्ती राज्यों को अपने आदर्शात्मक विचारों से प्रभावित किया। कलिंग के स्वतन्त्र राज्यों के प्रजाजनों से कहा गया कि वे राजा को पिता के तुल्य समझकर उसकी आज्ञाओं का पालन करें और उस पर विश्वास करें। अपने अधिकारियों को उसने निर्देश दिया कि वे उसके इस विचार का प्रचार उसकी सारी प्रजा में करें। इसी प्रकार कबायली लोगों से भी कहा गया कि वे भी धम्म के मार्ग पर चलें।
   अब से अशोक यह मानने लगा कि पराए राज्यों को सैनिक विजय के उपयुक्त क्षेत्र समझना अनुचित है। वह उन्हें आदर्श विचारों से जीतने का प्रयास करने लगा। पराए देशों में भी उसने मनुष्यों और पशुओं के कल्याण के लिए कदम उठाए। उन दिनों की स्थिति को देखते हुए यह एक सर्वथा नई चीज थी। उसने पश्चिम एशिया और यूनानी राज्यों में अपने शान्तिदूत भेजे। ये सभी बातें अशोक के अपने ही अभिलेखों के आधार पर कही जा सकती हैं। यदि बौद्ध परम्परा को विश्वसनीय मानें, तो अशोक ने श्रीलंका और मध्य एशिया में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने धर्मप्रचारक भेजे। एक प्रबुद्ध शासक के रूप में अशोक ने प्रचार के द्वारा अपने राजनैतिक प्रभाव का क्षेत्र बढ़ाया।
   यह सोचना गलत होगा कि कलिंग युद्ध ने अशोक को नितान्त शान्तिवादी बना दिया। उसने हर हालत में ‘शान्ति के लिए शान्ति‘ की नीति नहीं ग्रहण की। प्रत्युत, वह अपने साम्राज्य को सुदृढ़ करने की व्यवहारिक नीति पर चला। उसने विजय के बाद कलिंग को अपने कब्जे में रखा और अपेन साम्राज्य में मिला लिया। इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं है कि उसने चन्द्रगुप्त मौर्य के समय से चली आ रही महती सेना को विघटित कर दिया। वह कबायली लोगों से बारबार कहता रहा कि वे धर्म का मार्ग धरें और साथ ही धमकी भी देता रहा कि यदि वे सामाजिक व्यवस्था और नैतिक नियम (धम्म) का उल्लंघन करेंगे तो बुरा परिणाम होगा। अपने साम्राज्य के भीतर उसने एक तरह के अधिकारियों की नियुक्ति की जो रज्जुक या लजुक कहलाते थे और इन्हें प्रजा को न केवल पुरूस्कार ही, दंड देने का भी अधिकार सौंपा गया था। धर्म के सहारे साम्राज्य को सुदृढ़ करने की अशोक की नीति फलवती हुई। कन्धार अभिलेख से मालूम होता है कि उसकी इस नीति की सफलता बहेलियों और मछुआरों पर भी हुई और उन्होंने जीव-हिंसा को त्याग कर और सम्भवतः स्थिरवासी होकर कृषक का जीवन अपना लिया।

आन्तरिक नीति और बौद्ध धर्म

  कलिंग युद्ध के परिणामस्वरूप अशोक बौद्ध हो गया। परम्परा बताती है कि वह बौद्ध भिक्षु हो गया। बौद्धों को अपार दान दिया और बौद्ध धर्म-स्थानों की यात्रा की। उसकी इस यात्रा का संकेत उसके अभिलेखों में आए धर्मयात्रा शब्द से भी मिलता है।
   पारम्परिक अनुश्रृति के अनुसार, अशोक ने बौद्धों का तीसरा सम्मेलन आयेजित किया, और धर्मप्रचारकों को केवल दक्षिण भारत ही नहीं, श्रीलंका, वर्मा आदि देशों में भी भेजा ताकि वहाँ के लोगों को बौद्ध धर्म में लाया जाए। ईसा-पूर्व दूसरी और पहली सदियों के ब्राह्मी अभिलेख श्रीलंका में मिले हैं।
   अशोक ने अपने बारे में बड़ा उच्च आदर्श रखा। यह आदर्श था राजा का पिता के तुल्य होना। उसने अपने अधिकारियों को बार-बार कहा कि राजा प्रजा को अपनी सन्तति समझता है, यह बात वे प्रजा को बता दें। अधिकारियों से उसने यह भी कहा कि राजा के प्रतिनिधि के नाते वे प्रजा की देखभाल किया करें। अशोक ने महिला सहित समाज के विभिन्न वर्गों के बीच धर्म का प्रचार करने के लिए धर्ममहामात्र बहाल किए। अपने साम्राज्य में न्याय-कार्य करने के लिए उसने रजुकों की भी नियुक्ति की।
   वह कर्मकांडों का, विशेषतः महिलाओं में प्रचलित अनुष्ठानों या रस्मों का विरोधी था। उसने कई तरह के पशु-पक्षिओं की हिंसा पर रोक लगा दी और उसकी राजधानी में तो प्राणी को मारना पूर्णतः निषिद्ध था। उसने ऐसे तड़क-भड़क वाले सामाजिक समारोहों पर भी रोक लगा दी जिनमें लोग रंगरेलियाँ मनाते थे।
   परन्तु अशोक का धर्म संकुचित नहीं था। इसे हम सम्प्रदाय वादी आस्तिकता नहीं कह सकते हैं। इस धर्म का व्यापक लक्ष्य था समाज को सुव्यवस्थित बनाए रखना। इसका उपदेश है कि लोग माता-पिता की आज्ञा मानें, ब्राह्मणों और बौद्ध भिक्षुओं का आदर करें तथा दासों और सेवकों के प्रति दया करें। ये उपदेश बौद्ध धर्म में भी पाए जाते हैं और ब्राह्मण धर्म में भी।
   अशोक ने लोगों को ‘जियो और जीने दो‘ का पाठ पढ़ाया। उसने जीवों के प्रति दया और बान्धवों के प्रति सद्व्यवहार की सीख दी। उसके उपदेशों का लक्ष्य था परिवार-प्रथा और तत्कालीन सामाजिक वर्गों की प्रथा की रक्षा करना। वह बताता था कि जो लोग भला आचरण करेंगे वे स्वर्ग जाएंगे। उसने ऐसा नहीं कहा कि वे निर्वाण प्राप्त करेंगे, जो कि बौद्ध धर्म का चरम लक्ष्य है। इस प्रकार अशोक के उपदेशों का उद्देश्य सहिष्णुता के आधार पर तत्कालीन समाज-व्यवस्था को बनाए रखना था। ऐसा नहीं लगता कि उसने किसी सम्प्रदायवादी धर्म का प्रचार किया।

इतिहास में अशोक का स्थान

  कहा जाता है कि अशोक की शान्तिवादी नीति ने मौर्य साम्राज्य को बर्बाद कर दिया, पर यह सही नहीं है। इसके विपरीत, अशोक ने अनेक उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। निःसन्देह प्राचीन विश्व के इतिहास में वह सबसे महान् धर्मप्रचारक् शासक हुआ। उसने अपनी आस्था के प्रति बड़े ही उत्साह और निष्ठा से काम किया और क्या घर क्या बाहर सर्वत्र सफलता पाई।
   अशोक ने देश में राजनैतिक एकता स्थापित की। उसने एक धर्म, एक भाषा और प्रायः एक लिपि के सूत्र में सारे देश को बाँध दिया। उसके लगभग सभी अभिलेख एक ही लिपि ब्राह्मी में हैं। देश के एकीकरण में उसने ब्राह्मी, खरोष्ठी, आरामाइक और यूनानी सभी लिपियों का सम्मान किया। स्पष्टतः उसने यूनानी, प्राकृत और संस्कृत जैसी भाषाओं को और विविध धार्मिक संप्रदायों को समन्वित किया। उसने सहनशील धार्मिक नीति चलाई। उसने प्रजा पर बौद्ध धर्म लादने की चेष्टा नहीं की, प्रत्युत उसने हर सम्प्रदाय के लिए दान दिए, भले ही वह सम्प्रदाय बौद्ध धर्म को न मानता हो या उस धर्म का विरोधी ही हो। धर्मप्रचार के कार्य में अशोक को अपार उत्साह था। उसने साम्राज्य से सुदूर भागों में भी अपने अधिकारियों को तैनात किया। इससे प्रशासन-कार्य में लाभ हुआ और साथ ही विकसित गंगा मैदान और पिछड़े दूरवर्ती प्रदेशों के बीच सांस्कृतिक सम्पर्क बढ़ा। भौतिक संस्कृति, जो साम्राज्य के मध्यवर्ती इलाकों की विशिष्टता थी, कलिंग और निचले दकन और उत्तरी बंगाल में फैल गई।
   सबसे बढ़कर, इतिहास में अशोक का नाम शान्ति, अनाक्रमण और सांस्कृतिक विजय की नीति के लिए अमर है। प्राचीन भारत के इतिहास में इस तरह की नीति अपनाने का कोई आदर्श अशोक के सामने नहीं था और न इस तरह का कोई उदाहरण किसी देश में मिलता है। हाँ, मिश्र भले ही इसका अपवाद हो जहाँ अखनातोन ने ईसापूर्व चौदहवीं सदी में शान्तिवादी नीति को अपनाया था। लेकिन यह स्पष्ट है कि अशोक को अतीत के अपने इस मिश्री समचिन्तक की जानकारी नहीं थी। कौटिल्य ने तो राजा को सलाह दी कि राजा को शक्ति द्वारा विजय पाने की चेष्टा सदा करनी चाहिए, लेकिन अशोक ने इसके ठीक उलटी नीति अपनाई। उसने अपने उत्तराधिकारियों से आक्रमण और विजय की नीति को त्याग देने को कहा जिसे मगध के राजा कलिंग युद्ध तक अपनाते चले आ रहे थे। उसने उन्हें शान्ति की नीति अपनाने की सलाह दी, जो नीति दो सदियों से लगातार चले आ रहे आक्रमणात्मक युद्ध के आत अत्यन्त ही आवश्यक हो गई थी। अशोक निरन्तर अपनी नीति पर दृढ़ रहा। यद्यपि उसके पास पर्याप्त साधन-सम्पदा थी और विशाल सेना थी, फिर भी उसने कलिंग विजय के बाद कोई युद्ध नहीं किया। इस अर्थ में वह अपने समय और अपनी पीढ़ी से बहुत आगे था।
   फिर भी उसके प्रतिनिधियों और सामन्तों पर उसकी इस नीति का स्थायी असर नहीं पड़ा, जिन्होंने 232 ई. पू. में उसके अवकाश ग्रहण करते ही अपने आपको अपने-अपने क्षेत्र का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया। इसी प्रकार अशोक की नीति उसके पड़ोसियों की मनोवृत्ति में कोई परिवर्तन नहीं ला सकी। जब अशोक ने 232 ई. पू. में अवकाश ग्रहण किया तब से 30 वर्षों के अन्दर ही पड़ोसी राजा उसके साम्राज्य की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर झपट पड़े।