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सिन्‍धु संस्कृति - कांस्य काल का प्रारंभ

भौगोलिक विस्तार

   सिन्धु या हड़प्पा संस्कृति उन अनेकों ताम्र-पाषाण संस्कृतियों से पुरानी है जिनका वर्णन पूर्व में किया जा चुका है, लेकिन यह उन संस्कृतियों से कहीं अधिक विकसित है। इस संस्कृति का उदय ताम्र-पाषाणिक पृष्ठभूमि पर भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर भाग में हुआ। इसका नाम हड़प्पा संस्कृति पड़ा क्योंकि इसका पता सबसे पहले 1924 में पाकिस्तान के पश्चिम पंजाब प्रान्त में अवस्थित हड़प्पा के आधुनिक स्थल में चला। सिन्ध के बहुत से स्थल प्राक्-हड़प्पीय संस्कृति का केन्द्रीय क्षेत्र बने। परिणाम-स्वरूप वह संस्कृति परिपक्व होकर सिन्ध और पंजाब में नगर-सभ्यता के रूप में परिणत हुई। इस परिपक्व हड़प्पा संस्कृति का केन्द्र-स्थल पंजाब और सिन्ध में, मुख्यतः सिन्ध घाटी में पड़ता है। यहीं से इसका विस्तार दक्षिण और पूरब की ओर हुआ। इस प्रकार हड़प्पा संस्कृति के अंतर्गत पंजाब, सिन्ध और बलूचिस्तान के भाग ही नहीं, बल्कि गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सीमान्त भाग भी थे। इसका फैलाव उत्तर में जम्मू से लेकर दक्षिण में नर्मदा के मुहाने तक और पश्चिम में बलूचिस्तान के मकरान समुद्र तट से लेकर उत्तर पूर्व में मेरठ तक था। यह समूचा क्षेत्र एक त्रिभुज के आकार का है। इसका पूरा क्षेत्रफल लगभग 1,299,600 वर्ग किलोमीटर है। अतः यह क्षेत्र पाकिस्तान से बड़ा तो है ही, प्राचीन मिश्र और मेसोपोटामिया से भी निश्चय ही बड़ा है। ईसा-पूर्व तीसरी और दूसरी सहस्त्राब्दी में संसार भर में किसी भी संस्कृति का क्षेत्र हड़प्पा संस्कृति के क्षेत्र से बड़ा नहीं था।
   अब तक इस उपमहाद्वीप में हड़प्पा संस्कृति के लगभग 1000 स्थलों का पता लग चुका है। इनमें कुछ हड़प्पा संस्कृति की आरंभिक अवस्था के हैं, कुछ परिपक्व अवस्था के, और कुछ उत्तर अवस्था के हैं किन्तु परिपक्व अवस्था वाले स्थलों की संख्या सीमित है और उनमें केवल आधे दर्जन को ही नगर की संज्ञा दी जा सकती है। इनमें दो सर्वाधिक महत्व के नगर थे - पंजाब में हड़प्पा और सिन्ध में मोहें जो दड़ो (अर्थात प्रेतों का टीला)। दोनों पाकिस्तान में पड़ते हैं। दोनों एक दूसरे से 483 किलोमीटर दूर थे और सिन्धु नदी द्वारा जुड़े हुए थे। तीसरा नगर सिन्ध में मोहें जो दड़ों से 130 किलोमीटर के करीब दक्षिण में चन्हुदड़ों स्थल पर था और चौथा नगर गुजरात में खंभात की खाड़ी के ऊपर लोथल स्थल पर। पाँचवाँ नगर उत्तरी राजस्थान में कालीबंगां (अर्थात् “काले रंग की चूंडियां”) व छठा नगर बनावली हरियाणा के हिसार जिले में था। कालीबंगां की तरह इसने भी दो सांस्कृतिक अवस्थाएँ देखी - हड़प्पा-पूर्व और हड़प्पा-कालीन। कच्ची ईंटों के चबूतरों, सड़कों और मोरियों के अवशेष हड़प्पा कालीन हैं। इन छहों स्थलों पर परिपक्व और उन्नत हड़प्पा संस्कृति के दर्शन होते हैं। सुतकागेंडोर और सुरकोतड़ा के समुद्रतटीय नगरों में भी इस संस्कृति की परिपक्व अवस्था दिखाई देती है। इन दोनों की विशेषता है एक-एक नगर-दुर्ग का होना। उत्तर हड़प्पा अवस्था गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप में रंगपुर और रोजड़ी स्थलों पर पाई गई हैं।

नगर-योजना और संरचनाएँ

  हड़प्पा संस्कृति की विशेषता थी इसकी नगर-योजना प्रणाली। हड़प्पा और मोहें जो दड़ों दोनों नगरों के अपने-अपने दुर्ग थे जहाँ शासक वर्ग का परिवार रहता था। प्रत्येक नगर में दुर्ग के बाहर एक-एक उससे निम्न स्तर का शहर था जहाँ ईंटों के मकानों में सामान्य लोग रहते थे। इन नगरों में भवनों के बारे में विशिष्ट बात यह थी कि ये जाल की तरह विन्यस्त थे। तदनुसार सड़कें एक दूसरे को समकोण बनाते हुए काटती थीं और नगर अनेक खंडों में विभक्त थे। यह बात सभी सिन्धु बस्तियों पर लागू थी, चाहे वे छोटी हो या बड़ी। बड़े-बड़े भवन हड़प्पा और मोहें जो दड़ों दोनों की विशेषता है, दूसरा तो भवनों में और भी समृद्ध है। उनके स्मारक इस बात का प्रमाण हैं कि वहाँ के शासक मजदूर जुटाने और कर-संग्रह में परम कुशल थे। ईंटों की बड़ी-बड़ी इमारतें देखकर सामान्य लोगों को भी यह भावना होगी कि इनके शासक कितने प्रतापी और प्रतिष्ठावान थे।
   मोहें जो दड़ों का शायद सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थल है विशाल स्नानागार, जिसका जलाशय दुर्ग के टीले में है। यह ईंटों के स्थापत्य का एक सुन्दर उदाहरण है। यह 11.88 मी. लंबा, 7.01 मी. चौड़ा और 2.43 मी. गहरा है। दोनों सिरों पर तल तक सीढ़ियाँ बनी हुईं हैं। बगल में कपड़े बदलने के कमरे हैं। स्नानागार का फर्श पकी ईंटों का बना है। पास के एक कमरे में एक बड़ा सा कुआँ है। इससे पानी निकालकर हौज में डाला जाता था। हौज के एक कोने में निर्गम-मुख है जिससे पानी बहकर नाले में जाता था। बताया जाता है कि यह विशाल स्नानागार धर्मानुष्ठान सम्बन्धी स्नान के लिए बना होगा जो भारत में हर धार्मिक कर्म में आवश्यक रहा है।
   मोहें जोदड़ो की सबसे बड़ी इमारत है अनाज रखने का कोठार, जो 45.71 मी. लंबा और 15.23 मी. चौड़ा है। पर हड़प्पा के दुर्ग में छह कोठार मिले हैं जो ईंटों के बने चबूतरों पर दो पाँतों में खड़े हैं। हर एक कोठार 15.23 मी. लंबा और 6.09 मी. चौड़ा है और नदी के किनारे से कुछेक मीटर दूरी पर है। इन बारह इकाईयों का समूचा तलक्षेत्र लगभग 838.1025 वर्गमीटर होता है, जो लगभग उतना ही होता है जितना मोहें जो दड़ो के कोठार का है। हड़प्पा के कोठारों के दक्षिण में खुला फर्श है और इस पर दो कतारों में ईंट के वृत्ताकार चबूतरे बने हुए हैं। स्पष्ट है कि इनका उपयोग फसल दावने के काम में होता था, क्योंकि फर्श में दरारों में गेहूँ और जौ के दाने मिले हैं। हड़प्पा में दो कमरों वाले बैरक भी हैं, जो संभवत: मजदूरों के रहने के लिए रहे होंगे।
   कालीबंगां में भी नगर के दक्षिण भाग में ईंटों के चबूतरे मिले हैं जो शायद कोठारों के लिए बने होंगे। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि कोठार हड़प्पा संस्कृति के महत्वपूर्ण अंग थे। हड़प्पा संस्कृति के नगरों में पकी ईंटों का इस्तेमाल एक विशेष बात है, क्योंकि मिश्र के समकालीन भवनों मे धूप में सूखी ईंटों का ही प्रयोग हुआ था। समकालीन मेसोपोटामिया में पकी ईंटों का प्रयोग मिला तो है, पर हड़प्पा संस्कृति के नगरों में ऐसी ईंटों का प्रयोग बहुत ही बड़े पैमाने पर हुआ है।
   मोहें जो दड़ों की जल-निकास प्रणाली अद्भुत थी। लगभग सभी नगरों के हर छोटे या बड़े मकान में प्रांगण और स्नानागार होता था। कालीबंगां के अनेक घरों में अपने-अपने कुएँ थे। घरों का पानी बहकर सडकों तक आता जहाँ इनके नीचे मोरियाँ बनी हुई थीं। अकसर से मोरियाँ इंर्टों और पत्थरों की सिल्लियों से ढकी रहती थीं। सड़कों की इन मोरियों में नरमोखे (मैनहोल) भी बने थे। सड़कों और मोरियों के अवशेष बनावली में भी मिले हैं। कुल मिलाकर स्नानघरों और मोरियों की व्यवस्था अनोखी है। हड़प्पा की निकास-प्रणाली तो और भी विलक्षण है। शायद कांस्य युग की दूसरी किसी भी सम्यता ने स्वास्थ्य और सफाई को इतना महत्व नहीं दिया जितना कि हड़प्पा संस्कृति के लोगों ने दिया।

कृषि

   सिन्धु प्रदेश में आज पूर्व की अपेक्षा बहुत की कम वर्षा होती है, इसलिए यह प्रदेश अब उतना उपजाऊ नहीं रहा। यहाँ के समृद्ध देहातों और शहरों को देखने से प्रकट होता है कि प्राचीन काल में यह प्रदेश खूब उपजाउ था। सम्प्रति यहॉ केवल 15 सेन्टीमीटर वर्षा होती है। ईसा-पूर्व चौथी सदी में सिकन्दर का एक इतिहासकार बता गया है कि सिन्ध इस देश के उपजाऊ भागों में गिना जाता था। पूर्व कल में सिन्धु प्रदेश में प्राकृतिक वनस्पति सम्पदा अधिक थी, जिसके कारण यहाँ अधिक वर्षा होती थी। यहाँ के वनों से इंर्टें पकाने और इमारत बनाने के लिए लकड़ी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल में लाई जाती थी। लम्बे अरसे तक खेती का विस्तार, बड़े पैमाने पर चराई और ईधन के लिए लकड़ी की खपत होते रहने से यहाँ की प्राकृतिक वनस्पति-सम्पदा क्षीण होती गई। इस प्रदेश की उर्वरता का एक विशेष कारण शायद सिन्धु नदी से हर साल आने वाली बाढ़ थी। गाँव की रक्षा के लिए खड़ी की गई पक्की इंर्ट की दीवारों से प्रकट होता है कि बाढ़ हर साल आती थी। सिन्धु नदी मिश्र की नील नदी की अपेक्षा कहीं अधिक जलोढ़ मिट्टी बहाकर लाती थी और इसे बाढ वाले मैदानों पर छोड़ जाती थी। जैसे नील ने मिश्र का निर्माण और वहाँ के लोगों का भरण-पोषण किया, वैसे ही सिन्धु नदी ने सिन्धु प्रदेश का निर्माण और वहाँ के लोगों का भरण-पोषण किया। सिन्धु सभ्यता के लोग बाढ़ उतर जाने पर नवम्बर के महीने में बाढ़ वाले मैदानों में बीज बो देते थे और अगली बाढ़ आने से पहले अप्रैल महीन में गेहूँ और जौ की अपनी फसल काट लेते थे। यहाँ कोई फावड़ा या फाल तो नहीं मिला है, लेकिन कालीबंगां की प्राक्-हड़प्पा अवस्था में जो कूँड (हलरेखा) देखे गये हैं उनसे पता चलता है कि हड़प्पा काल में राजस्थान में हल जोते जाते थे। हड़प्पाई लोग शायद लकड़ी के हलों का प्रयोग करते थे। इस हल को आदमी खींचते थे या बैल इस बात का पता नहीं है। फसल काटने के लिए शायद पत्थर के हँसियों का प्रयोग होता था। गबरबन्दों या नालों को बाँधों से घेरकर जलाशय बनाने की परिपाटी बलूचिस्तान और अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों की विशेषता रही है, किन्तु लगता है कि नहरों या नालों से सिंचाई की परिपाटी नहीं थी। हड़प्पाई गाँव, जो अधिकतर बाढ़ वाले मैदानों में थे, प्रचुर अन्न उपजा लेते थे, जो न केवल उनकी अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए, बल्कि खेती के काम से मतलब न रखने वाले नगरवासियों शिल्पियों, व्यापारियों और सामान्य नागरिकों की जरूरत पूरी करने के लिए भी पर्याप्त होता था।
   सिन्धु सभ्यता के लोग गेहूँ, जौ, राई, मटर, आदि अनाज पैदा करते थे। वे दो किस्म का गेहूँ और जौ उगाते थे। बनावली में मिला जौ बढ़िया किस्म का है। इनके अलावा वे तिल और सरसों भी उपजाते थे। परन्तु हड़प्पा कालीन लोथल में रहने वाले हड़प्पाईयों की स्थिति भिन्न रही है। लगता है कि लोथल के लोग 1800 ई. पू. में ही चावल उपजाते थे जिसका अवशेष वहाँ पाया गया है। मोहें जो दड़ों और हड़प्पा में और शायद कालीबंगां में भी अनाज बड़े-बड़े कोठारों में जमा किया जाता था। सम्भवतः किसानों से राजस्व के रूप में अनाज लिया जाता था और वह पारिश्रमिक चुकाने और संकट की घड़ियों में काम के लिए कोठारों में जमा किया जाता था। यह बात हम मेसोपोटामिया के नगरों के दृष्टान्त से कह सकते हैं जहाँ मजदूरी में जौ दिया जाता था। सबसे पहले कपास पैदा करने का श्रेय सिन्धु सभ्यता के लोगों को है। चूँकि कपास उत्पादन सबसे पहले सिन्धु क्षेत्र में ही हुआ, इसलिए यूनान के लोग इसे सिन्डन (Sindon) कहने लगे जो सिन्धु शब्द से उद्भूत हुआ है।

पशु पालना

   कृषि पर निर्भर होते हुए भी हड़प्पाई लोग बहुत-सारे पशु पालते थे। वे बैल-गाय, भैंस, बकरी, भेड़ और सूअर पालते थे। उन्हें कूबड़ वाला साँड विशेष प्रिय था। कुत्ते शुरू से ही पालतू जानवरों में थे। बिल्ली भी पाली जाती थी। कुत्ता और बिल्ली दोनों के पैरों के निशान मिले हैं। वे गधे और ऊँट भी रखते थे और शायद इन पर बोझा ढोते थे। घोड़े के अस्तित्व का संकेत मोहें जो दड़ो की एक ऊपरी सतह से तथा लोथल में मिले एक सन्दिग्ध मूर्तिका (टेराकोटा) से मिला है। गुजरात के पश्चिम में अवस्थित सुरकोतड़ा में घोड़े के अवशेषों के मिलने की रिपोर्ट आई है और वे 2000 ई. पू. के आसपास के बताए गए हैं, परन्तु पहचान सन्देहग्रस्त है। जो भी हो, इतना तो स्पष्ट है कि हड़प्पा काल में इस पशु के प्रयोग का आम प्रचलन नहीं था।
   हड़प्पाई लोगों को हाथी का ज्ञान था। वे गैंडे से भी परिचित थे। मेसोपोटामिया के समकालीन सुमेर के नगरों के लोग भी इन्हीं लोगों की तरह अनाज पैदा करते थे और उनके पालतू पशु भी प्रायः वही थे जो इनके थे। परन्तु गुजरात में बसे हड़प्पाई लोग चावल उपजाते थे और हाथी पालते थे, ये दोनों बातें मेसोपोटामिया के नगरवासियों के बारे में नहीं हैं।

शिल्प और तकनीकी ज्ञान

   हड़प्पा संस्कृति कांस्य युग की है। यों तो इस संस्कृति के लोग पत्थर के बहुत-सारे औजारों और उपकरणों का प्रयोग करते थे, लेकिन वे कांस्य के निर्माण और प्रयोग से भी भली भांति परिचित थे। काँसा ताँबे में टिन मिलाकर धातुशिल्पियों द्वारा बनाया जाता था, पर इनमें एक भी धातु हड़प्पाई लोगों को आसानी से उपलब्ध नहीं थी। इसलिए हड़प्पा में काँसे के औजार बहुतायत से नहीं मिलते हैं। अयस्कों (ताम्र-खनिजों) की अशुद्धियों से लगता है कि वहाँ ताँबा राजस्थान की खेत्री ताम्र-खानों से मँगाया जाता था, हालाँकि यह बलूचिस्तान से भी मँगाया जा सकता था। टिन शायद अफगानिस्तान से कठिनाई के साथ मंगाया जाता था, यद्यपि बताया गया है कि उसकी कुछ पुरानी खदानें बिहार के हजारीबाग में पाई गई हैं। हड़प्पाई स्थलों में जो काँसे के औजार और हथियार मिले हैं उनमें टिन की मात्रा कम है। फिर भी ये जो काँसे की वस्तुएँ छोड़ गए है वे नगण्य नहीं हैं। इन वस्तुओं से संकेत मिलता है कि हड़प्पा समाज के शिल्पियों में कसेरों (कांस्य-शिल्पियों) के समुदाय का महत्वपूर्ण स्थान था। वे प्रतिमाओं और बर्तनों के साथ-साथ कई तरह के औजार और हथियार भी बनाते थे, जैसे कुल्हाड़ी, आरी, छुरा और बरछा। हड़प्पाई शहरों में कई अन्य महत्वपूर्ण शिल्प भी चलते थे। मोहें जो दड़ों से बुने हुए सूती कपड़े का टुकड़ा निकला है और कई वस्तुओं पर कपड़े के छाप देखने में आए हैं। कताई के लिए तकलियों का इस्तेमाल होता था। बुनकर ऊनी और सूती कपड़ा बुनते थे। ईटो की विशाल इमारतें बताती हैं कि स्थापत्य (राजगीरी) एक महत्वपूर्ण शिल्प था। इस से राजगीरों (स्थपतियों) के एक वर्ग के अस्तित्व का भी आभास मिलता है। हड़प्पाई लोग नाव बनाने का काम भी करते थे। जैसा कि आगे बताया जाएगा, मुद्रा-निर्माण (मिट्टी की मुहरें बनाना) और मूर्तिका-निर्माण (मिट्टी की पुतलियाँ बनाना) भी महत्वपूर्ण शिल्प थे। स्वर्णकार चाँदी, सोना और रत्नों के आभूषण बनाते थे। सोना चाँदी सम्भवतः अफगानिस्तान से और रत्न दक्षिण भारत से आते थे। हड़प्पाई कारीगर मणियों के निर्माण में भी निपुण थे। कुम्हार के चाक का खूब प्रचलन था और हड़प्पाई लोगों के मृद्भांडो की अपनी खास विशेषताएँ थीं। ये भांडों को चिकने और चमकीले बनाते थे।

व्यापार

   सिन्धु सभ्यता के लोगों के जीवन में व्यापार का बड़ा महत्व था। इसकी पृष्टि हड़प्पा, मोहें जो दड़ो और लोथल में अनाज के बड़े-बड़े कोठारों के पाए जाने से ही नहीं होती, बल्कि एक बड़े भू-भाग में ढेर-सारी सीलों (मृन्मुद्राओं), एकरूप लिपि और मानकीकृत माप-तोलों के अस्तित्व से भी होती है। हड़प्पाई लोग सिन्धु-सभ्यता क्षेत्र के भीतर पत्थर, धातु, शल्क (हड्डी) आदि का व्यापार करते थे। लेकिन वे जो वस्तुएँ बनाते थे उनके लिए अपेक्षित कच्चा माल उनके नगरों में उपलब्ध नहीं था। वे धातु के सिक्कों का प्रयोग नहीं करते थे। सम्भव है कि वे सारे आदान-प्रदान विनिमय द्वारा ही करते हों। अपने तैयार माल और सम्भवतः अनाज भी नावों और बैलगाड़ियों पर लाद कर पड़ोस के इलाकों में ले जाते और उन वस्तुओं के बदले धातुएँ ले आते। वे अरब सागर के तट पर जहाजरानी (नौचालन) करते थे। वे चक्र के उपयोगों से परिचित थे और हड़प्पा में ठोस पहियों वाली गडियाँ प्रचलित थीं। यह भी प्रतीत होता है कि हड़प्पाई लोग किसी न किसी प्रकार के आज के इक्के (रथ) का भी इस्तेमाल करते थे।
   हड़प्पाई लोगों का वाणिज्यिक सम्बन्ध राजस्थान के एक क्षेत्र से था और अफगानिस्तान और ईरान से भी। उन्होंने उत्तरी अफगानिस्तान में एक वाणिज्य उपनिवेश स्थापित किया था जिसके सहारे उनका व्यापार मध्य एशिया के साथ चलता था। उनके नगरों का व्यापार दजला-फरात प्रदेश के नगरों के साथ चलता था। बहुत सी हड़प्पाई सीलें मेसोपोटामिया की खुदाई में निकली हैं और प्रतीत होता है कि हड़प्पाई लोगों ने मेसोपोटामियाई नागरिकों के कई प्रसाधनों का अनुकरण किया है।
   हड़प्पाई लोगों ने लाजवर्द मणि (Lapis Lazuli) का सुदूर व्यापार चलाया था, अवश्य ही इस मणि से शासक वर्ग की सामजिक प्रतिष्ठा बढ़ती होगी। 2350 ई. पू. के आसपास और उसके आगे के मेसोपोटामियाई अभिलेखों में मेलुहा के साथ व्यापारिक सम्बन्ध की चर्चा है, मेलुहा सिन्ध क्षेत्र का प्राचीन नाम है। मेसोपोटामिया के पुरालेखों में दो मध्यवर्ती व्यापार केन्द्रों का उल्लेख मिलता है - दलमुन और माकन। ये दोनों मेसोपोटामिया और मेलुहा के बीच में हैं। दिलमुन की पहचान शायद फारस की खाड़ी के बहरैन से की जा सकती है। उस बन्दरगाह नगर में हजारों कब्रें खुदाई का इन्तजार कर रही हैं।

राजनैतिक संगठन

   हमें हड़प्पाईयों के राजनैतिक संगठन के बारे में कोई स्पष्ट आभास नहीं है। हड़प्पा संस्कृति और सिन्घु सभ्यता की सांस्कृतिक एकता इसके सारे क्षेत्र में अनेक बातों से स्पष्ट है, जैसे मृद्भांड के स्वरूप, चर्ट-फलक, घनमाप, पकी मिट्टी की पिंडिका (टेराकोटा केक), कंगन, पशु-मूर्तिकाएँ, विशेषतः साँड की मूर्तिकाएँ, ताम्र और कांस्य उपकरण, उत्कीर्ण सील, सेलखड़ी, मनके, ईंट की माप आदि। सुदूर व्यापार के साक्ष्य तो इसको और भी सुदृढ़ करते हैं। ऐसी सांस्कृतिक एकता किसी केन्द्रित सत्ता के बिना सम्भव नहीं हुई होगी। यदि हड़प्पाई सांस्कृतिक अंचल को राजनैतिक अंचल का अभिन्न मानें, तो इस उपमहाद्वीप ने मौर्य साम्राज्य की स्थापना से पूर्व इतनी बड़ी राजनैतिक इकाई कभी नहीं देखी। इस इकाई की अद्भुत दृढ़ता इसी से स्पष्ट हो जाती है कि यह लगभग 600 वर्षों तक निरन्तर कायम रही।
   मिश्र और मेसोपोटामिया के नितान्त विपरीत, किसी भी हड़प्पाई स्थल पर मन्दिर नहीं पाया गया है। किसी भी प्रकार का कोई भी धार्मिक भवन नहीं। इसका अपवाद विशाल स्नानागार हो सकता है, जिसका उपयोग प्रोक्षण (शुद्धि या सफाई) के लिए किया जाता होगा। हड़प्पा अंचल में धार्मिक विश्वासों और आचारों में एकरूपता नहीं है। इसलिए यह सोचना गलत होगा कि हड़प्पा में पुरोहितों का वैसा ही शासन था, जैसा कि निचले मेसोपोटामिया के नगरो में था। ऐसा संकेत मिलता है कि उत्तर अवस्था में गुजरात के लोथल में अग्नि पूजा की परम्परा चली, किन्तु इसके लिए मन्दिरों का उपयोग नहीं होता था। शायद हड़प्पाई शासकों का ध्यान विजय की ओर उतना नहीं था जितना वाणिज्य की ओर, और हड़प्पा का शासन सम्भवतः वर्णिक् वर्ग के हाथ में था।

धार्मिक प्रथाएँ

   हड़प्पा में पकी मिट्टी की स्त्री-मूर्तिकाएँ भारी संख्या में मिली हैं। एक मूर्तिका में स्त्री के गर्भ से निकला एक पौधा दिखाया गया है। यह सम्भवतः पृथ्वी देवी की प्रतिमा है और इसका निकट सम्बन्ध पौधों के जन्म और वृद्धि से रहा होगा। इसलिए मालूम होता है कि हड़प्पाई लोग धरती को उर्वरता की देवी समझते थे और इसकी पूजा उसी तरह करते थे जिस तरह मिश्र के लोग नील नदी की देवी आइसिस् की पूजा करते थे। लेकिन हड़प्पाई लोग मिश्र वासियों की तरह मातृ-सत्तात्मक थे या नहीं, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है। मिश्र में राज्य या सम्पत्ति का उत्तराधिकार कन्या को मिलता था, किन्तु हड़प्पा समाज में उत्तराधिकार का स्वरूप क्या था यह हमें ज्ञात नहीं है।
   कुछ वैदिक सूक्तों में पृथ्वी माता की स्तुति है, किन्तु उनको कोई प्रमुखता नहीं दी गई है। सुदीर्घ काल के बाद ही हिन्दू धर्म में इस मातृदेवी को उच्च स्थान मिला है। ईसा की छठी सदी और उसके बाद से ही दुर्गा, अम्बा, काली, चंडी आदि विविध मातृदेवियों को पुराणों और तंत्रों में आराध्य देवियों का स्थान मिला। काल-क्रमेण प्रत्येक गाँव की अपनी अलग-अलग देवी हो गई।

सिन्धु घाटी के पुरूष देवता

   पुरूष देवता एक सील पर चित्रित किया गया है। उसके सिर पर तीन सींग है। वह एक योगी की ध्यान मुद्रा में एक टांग पर दूसरी टांग डाले बैठा (पद्मासन लगाए) दिखाया गया है। उसके चारों ओर एक हाथी, एक बाघ और एक गैंडा है, आसन के नीचे एक भैंसा है और पाँवों पर दो हिरण हैं। यह सील (मृन्मुद्रा) देखते ही हमें पौराणिक पशुपति महादेव की छवि ध्यान में आ जाती है। चारो पशु पृथ्वी के चारों ओर देखते हैं। ये देवताओं के वाहन हो सकते हैं, क्योंकि उत्तरकालीन हिन्दू धर्म में हम पाते हैं कि हरेक देवता का एक-एक खास वाहन माना गया है। शिव की प्रतिमा का ही नहीं, हम लिंग-पूजा का भी प्रचलन पाते हैं, जो कालान्तर में शिव की पूजा से गहन रूप से जुड़ गई थी। हड़प्पा में पत्थर पर बने लिंग और योनि के अनेकों प्रतीक मिले हैं। संभवतः ये पूजा के लिए बने थे। ऋग्वेद में लिंग-पूजक अनार्य जातियों की चर्चा है। लिंग-पूजा हड़प्पा काल में शुरू हुई और आगे चलकर हिन्दू समाज में पूजा की एक विशिष्ट विधि मानी जाने लगी।
वृक्षों और पशुओं की पूजा
   सिन्धु क्षेत्र के लोग वृक्ष-पूजा भी करते थे। एक मृन्मुद्रा (सील) पर पीपल की डालों के बीच में विराजमान देवता चित्रित हैं। इस वृक्ष की पूजा आज तक जारी है। हड़प्पा-काल में पशु-पूजा का भी प्रचलन था। कई पशु मृन्मुद्राओं पर अंकित हैं। इनमें सबसे महत्व का है कूबड़ वाला साँड। आज भी जब ऐसा साँड बाजार की गलियों में चलता है तो धर्मात्मा हिन्दू इसे रास्ता दे देते हैं। इसी तरह पशुपति महादेव के चतुर्दिक पशुओं की उपस्थिति से प्रकट होता है कि उनकी भी पूजा होती थी।
   इन बातों से स्पष्ट होता है कि सिन्धु प्रदेश के निवासी वृक्ष, पशु और मानव के स्वरूप में देवताओं की पूजा करते थे, परन्तु वे अपने इन देवताओं के लिए मन्दिर नहीं बनाते थे, जैसा कि प्राचीन मिश्र और मेसोपोटामिया में बनाया जाता था। धर्मोपासना-सूचक वस्तुओं के रहते हुए भी हड़प्पा के नगरीकरण को धर्म से जोड़ना ठीक न होगा, जो बात कांस्य युग के अन्य नगरीय समाजों पर भी लागू होती है। जब तक सिन्धु-लिपि पढ़ी नहीं जाती तब तक हड़प्पाई लोगो के धार्मिक विश्वासों के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है। ताबीज बड़ी तादाद में मिले हैं। शायद हड़प्पाई लोग विश्वास करते थे कि भूत-प्रेत उनका अनिष्ट कर सकते है, और इसलिए उनसे त्राणार्थ ताबीज पहनते थे। आर्येतर परम्परा से संबद्ध माने जाने वाले अर्थवेद में अनेकों तन्त्र-मन्त्र या जादू-टोने दिए गए हैं और रोगों तथा भूत-प्रेतों को भगाने के लिए ताबीज बताए गए हैं।

हड़प्पाई लिपि

   प्राचीन मेसोपोमियाइयों की तरह हड़प्पाई लोगों ने भी लेखन-कला का आविष्कार किया था। यद्यपि हड़प्पाई लिपि का सबसे पुराना नमूना 1853 में मिला था और 1923 तक पूरी लिपि प्रकाश में आ गई, किन्तु वह अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है। कुछ लोग इसके द्रविड़ या आद्य-द्रविड़ भाषा से जोड़ने का प्रयास करते हैं, कुछ लोग संस्कृत से, तो कुछ लोग सुमेरी भाषा से, परन्तु इन पठनों में से कोई भी सन्तोषप्रद नहीं है। जब लिपि ही पढ़ी नहीं जा सकी है तब हम यह कैसे बताएँ कि साहित्य में हड़प्पाई लोगों का क्या योगदान रहा। हम उनके विचारों और विश्वासों के बारे में भी कुछ नहीं कह सकते हैं। हड़प्पाइयों के अभिलेख उतने लम्बे-लम्बे नहीं हैं जितने मिश्रियों और मेसोपोटामियाइयों के हैं। अधिकांश अभिलेख मृन्मुद्राओं (सीलों) पर हैं और हर एक में दो-चार ही शब्द हैं। इन सीलों (मृन्मुद्राओं) का प्रयोग धनाढ्य लोग अपनी निजी सम्पत्ति को चिह्नित करने और पहचानने के लिए करते होंगे। इस लिपि में कुल मिलाकर 250 से 400 तक चित्राक्षर (पिक्टोग्राफ) हैं और चित्र के रूप में लिखा हर अक्षर किसी ध्वनि, भाव या वस्तु का सूचक है। हड़प्पा लिपि वर्णात्मक नहीं, बल्कि मुख्यतः चित्र-लेखात्मक है। मेसोपोटामिया और मिश्र की समकालीन लिपियों के साथ इसकी तुलना करने के प्रयास किए गए हैं। परन्तु यह तो सिन्धु प्रदेश का देशी आविष्कार है और पश्चिम एशिया की लिपियों से इसका कोई सम्बन्ध दिखाई नहीं देता है।

माप-तौल

   लिपि का ज्ञान हो जाने से निजी सम्पत्ति का लेखा-जोखा रखना आसान हो गया होगा। सिन्धु-क्षेत्र के नगरवासियों को व्यापार और अन्य आदान-प्रदानों में माप-तौल की आवश्यकता हुई और उन्होंने इसका प्रयोग भी किया। बाट के रूप में व्यवहृत बहुत-सी वस्तुएँ पाई गई हैं। उनसे प्रकट होता है कि तौल में 16 या उसके आवर्त्तकों का व्यवहार होता था, जैसे 16, 64, 160, 320 और 640। दिलचस्प बात यह है कि सोलह के अनुपात की यह परम्परा भारत में आधुनिक काल तक चलती रही है। हाल तक रूपया सोलह आने का होता था। हड़प्पाई लोग मापना भी जानते थे। ऐसे डंडे पाए गए हैं जिन पर माप के निशान लगे हुए हैं। इनमें एक डंडा काँसे का भी है।

मृद्भांड

   हड़प्पाई लोग कुम्हार के चाक का उपयोग करने में बड़े कुशल थे। उनके अनेक बर्तनों पर विभिन्न रंगों की चित्रकारी देखने को मिलती है। हड़प्पा-भांडों पर आम तौर से वृत्त या वृक्ष की आकृतियाँ मिलती हैं। कुछ ठीकरों पर मनुष्य की आकृतियाँ भी दिखाई देती हैं।
सीलें (मृन्मुद्राओं)
   हड़प्पा संस्कृति की सर्वोत्तम कलाकृतियाँ है उसकी मृन्मुद्राएँ (सीलें)। अब तक लगभग 2000 सीलें प्राप्त हुई हैं। इनमें से अधिकांश सीलों पर लघु लेखों के साथ-साथ एकसिंगी साँड, भैंस, बाघ, बकरी और हाथी की आकृतियाँ उकेरी हुई हैं।

प्रतिमाएँ

  हड़प्पाई शिल्पी लोग धातु की खूबसूरत मूर्तियाँ बनाते थे। काँसे की नर्तकी उनकी मूर्तिकला का सर्वश्रेष्ठ नमूना है। पूरी मूर्ति गले में पड़े हार के अलावा एकदम नग्न है। कुछ हड़प्पाई प्रस्तर प्रतिमाएँ मिली हैं। सेलखड़ी की एक मूर्ति के बायें कंधे तथा दायें हाथ के नीचे एक अलंकृत वस्त्र है और सिर के पीछे उस के बालों की छोटी लटें एक बुनी हुई पट्टिका द्वारा ठीक-ठीक रखी गई हैं।

मृन्मूर्तिकाएँ (टेराकोटा फ़िगर्स)

  सिन्धु प्रदेश में भारी संख्या में आग में पकी मिट्टी (जो टेराकोटा कहलाती हैं) की बनी मूर्तिकाएँ (फिगरिन) मिली हैं। इनका प्रयोग या तो खिलौने के रूप में या पूज्य प्रतिमाओं के रूप में होता था। इनमें पक्षी, कुत्ते, भेड़, गाय-बैल और बन्दर की प्रतिकृतियाँ भी मिलती हैं। पुरूषों और स्त्रियों की प्रतिकृतियाँ भी मिली हैं। जिनमें पुरूषों की संख्या से स्त्रियों की संख्या अधिक है। जहाँ सीलें जिनमें और प्रतिमाएँ मंजी दक्षता के साथ बनाई गई हैं, वहाँ इन मृन्मूर्तिकाओं में अकृत्रिम कला का चमत्कार है। इन दोनों कोटियों के शिल्पों के बीच जो अन्तर है वह इनका इस्तेमाल करने वाले वर्गों के बीच अन्तर का सूचक है। प्रथम कोटि की कलाकृतियों का उपयोग उच्च वर्ग के लोगों में होता था और द्वितीय कोटि का जन सामान्य में। प्रस्तर शिल्प में हड़प्पा संस्कृति पिछडी हुई थी। प्राचीन मिश्र और मेसोपोटामिया की तरह यहाँ हम कोई महान प्रस्तर-प्रतिमा नहीं पाते हैं।

उद्भव, उत्थान और अवसान

हड़प्पा संस्कृति का अस्तित्व मोटे तौर पर 2500 ई. पू. और 1800 ई. पू. के बीच रहा। लगता है, अपने अस्तित्व की पूरी अवधि भर यह संस्कृति एक ही प्रकार के औजारों, हथियारों और घरों का प्रयोग करती रही। सारी जीवन पद्धति में एकरूपता बनी रही। वही नगर-योजना, वही सीलें (मृन्मुद्राएँ), वही मृन्मूर्तिकाएँ और वही लम्बे-लम्बे चर्ट-फलक दिखाई देते रहे। लेकिन इस अपरिवर्तनीयता पर बहुत अधिक जोर देना ठीक नहीं होगा। हमें मोहें जो दड़ो की मृदभांड कला में समय-समय पर परिवर्तन भी दिखाई देते हैं। ईसा पूर्व अठारहवीं सदी में आकर इस संस्कृति के दो महत्वपूर्ण नगर हड़प्पा और मोहें जो दड़ों लुप्त हो गए, लेकिन अन्य स्थानों में हडप्पा संस्कृति धीरे-धीरे क्षीण हुई और क्षीण होते-होते भी गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश के अपने सीमान्त क्षेत्रों में लम्बे समय तक जीवित रही।
   जितना ही कठिन हड़प्पा संस्कृति का उद्भव जानना है उतना कठिन उसका अन्त जानना भी है। कई हड़प्पा-पूर्व बस्तियों के अवशेष पाकिस्तान के निचले सिन्ध और बलूचिस्तान प्रान्त में तथा राजस्थान के कालीबंगां में मिले हैं। हड़प्पा पूर्व किसान उत्तर गुजरात के नागवाड़ा में भी रहते थे। परन्तु किस तरह इन देशी बस्तियों से परिपक्व हड़प्पा संस्कृति उद्भूत हुई यह बात स्पष्ट नहीं है। न ही हमें इस बात का ही कोई स्पष्ट प्रमाण मिलता है कि इस उपमहाद्वीप के हड़प्पाई नगरों के पनपने में किसी बाहरी प्रभाव का हाथ था। हो सकता है कि हड़प्पा की नगर संस्कृति के विकास में मेसोपोटामिया के नगरों से सम्पर्क कुछ प्रेरक रहा हो। परन्तु हड़प्पा संस्कृति देशी ढंग की थी इस बात में कोई शंका नहीं है। इसमें कई ऐसे तत्व हैं जो इसे पश्चिम एशिया की समकालीन संस्कृतियों से पृथक करते हैं। सिन्धु सभ्यता के नगरों की योजना जाल-पद्धति की है और इसमें सड़कों, नालियों और मलकुंडों की अच्छी व्यवस्था है। दूसरी ओर मेसोपोटामिया के नगरों में बेतरतीब बढ़ते जाने की प्रवृत्ति देखी जाती है। हड़प्पा संस्कृति के सभी नगरों में सभी मकान आयताकार हैं, जिनमें पक्का स्नानघर और सीढ़ीदार कुआँ संलग्न हैं। पश्चिम एशिया के नगरों में इस तरह की नगर-योजना नहीं पाई गई है। सम्भवतः क्रीट द्वीप के क्नोसस नगर को छोड़ प्राचीन युग के किसी भी अन्य नगर में जल-निकास का ऐसा उत्तम प्रबन्ध देखने को नहीं मिलता। हड़प्पाई लोगों ने पकी इंर्टों के इस्तेमाल में जिस कौशल का परिचय दिया है, वैसा पश्चिम एशिया वाले नहीं दे पाए। हड़प्पाइयों के मृदभांड और उनकी सीलें (मृन्मुद्राएं) अपने खास ढंग की हैं और इन पर अंकित पशु-मंडल स्थानीय है और सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने अपनी एक खास लिपि बनाई, जिसका मिश्र और मेसोपोटामिया की लिपि से कोई साम्य नहीं है। यद्यपि हड़प्पा संस्कृति कांस्य युग की संस्कृति थी, तथापि इसमें काँसे का उपयोग सीमित हुआ और ज्यादातर पत्थर के औजार ही चलते रहे। अंत में, हड़प्पा संस्कृति का क्षेत्र जितना बड़ा रहा उतना बड़ा और किसी भी समकालीन संस्कृति का नहीं रहा। हड़प्पा नगर की संरचना पाँच किलोमीटर के घेरे में फैली हुई है और इस तरह कांस्य युग में अपने ढंग की बृहत्तम संरचनाओं में आती है। अभी तक हड़प्पा जैसा नगर विस्तार अन्यत्र कहीं भी देखने को नहीं मिला है।
   मेसोपोटामिया की प्राचीन सभ्यताएँ तो 1800 ई. पू. के बाद भी टिकी रहीं, हड़प्पा की नगर संस्कृति लगभग उसी समय लुप्त हो गई। इसके बहुत से कारण बताए जाते हैं। कहा जाता है कि सिन्धु क्षेत्र में वर्षा की मात्रा 3000 ई. पू. के आसपास तनिक सी बढ़ी और फिर ईसा-पूर्व दूसरी सहस्त्राब्दी के आरम्भ भाग में कम हो गई। इससे खेती और पशुपालन पर बुरा असर पड़ा। कुछ लोगों का मत है कि पड़ोस के रेगिस्तान के फैलाव के फलस्वरूप मिट्टी में लवणता बढ़ गई और उर्वरता घटती गई, इसी से सिन्धु सभ्यता का पतन हो गया। दूसरा मत यह है कि जमीन धंस गई या ऊपर उठ गई जिससे इसमें बाढ़ का पानी जमा हो गया, भूकम्प के कारण सिन्धु नदी की धारा बदल गई जिसके फलस्वरूप मोहें जो दडों की पृष्ठभूमि वीरान हो गई। यह भी मत है कि हड़प्पा संस्कृति को आर्यों ने नष्ट किया।
   कांस्य युग की इस विशालतम सांस्कृतिक सत्ता के विघटन के परिणाम क्या-क्या हुए यह अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है। हम नहीं जानते हैं कि क्या नगर के उजड़ जाने से वणिक और शिल्पी लोग देहात की ओर भाग गए और वहाँ हड़प्पा तकनीकी कौशलों को फैलाया। हमें सिन्ध, पंजाब और हरियाणा की नागरिकोत्तर काल की स्थिति के बारे में कुछ जानकारी है। सिन्धु क्षेत्र के भीतर हम कृषिक बस्तियों तो पाते हैं, लेकिन पूर्वकाल की संस्कृति के साथ उनका सम्बन्ध स्पष्ट नहीं होता है। हमें स्पष्ट और पर्याप्त जानकारी की अपेक्षा है।

हड़प्पा संस्कृति की नागरिकोत्तर अवस्था

हड़प्पा संस्कृति शायद 1800 ई. पू. के आरम्भ तक जीती-जागती रही। बाद में इसकी नागरिक अवस्था अलक्षित सी हो गई, जिसके परिचायक थे सुव्यवस्थित नगर-निवेश, व्यापक ईंट-संरचनाएँ, लिखने की कला, मानक बाट-माप, दुर्गनगर और निम्नस्तरीय शहर के बीच अन्तर, काँसे के औजारों का इस्तेमाल और काले रंग की आकृतियों से चित्रित लाल मृद्भांड का निर्माण। इसकी शैलीगत एकरूपता समाप्त हो गई और शैली में भारी विविधता आ गई और इस प्रकार हड़प्पा संसकृति की नागरिकोत्तर अवस्था आधम नागरिकोत्तर हड़प्पा संस्कृति के कुछ लक्षण पकिस्तान में, मध्य एवं पश्चिमी भारत में, तथा पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, जम्मू, कश्मीर, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी दिखाई देते हैं। इनका काल मोटे तोर पर 1800 ई. पू. से 1200 ई. पू. तक हो सकता है। हड़प्पा संस्कृति की नागरिकोत्तर अवस्था को उपसिन्धु संस्कृति भी कहते हैं। उत्तर हड़प्पा संस्कृति नाम और भी अधिक प्रचलित है।
   उत्तर हड़प्पा संस्कृतियाँ मूलतः ताम्रपाषाणिक हैं, जिनमें पत्थर और ताँबे के औजार चलते हैं। इनमें धातु के ऐसे ही उपकरण बनते थे जिनकी ढलाई आसान है। फिर भी कुल्हाड़ी, छेनी, कंगन, वक्र अस्तूरा, बंसी और बरछा मिलते हैं। ताम्रपाषाण संस्कृति के लोग हड़प्पा संस्कृति की उत्तर अवस्था में गाँवों में बस गए और खेती, पशुपालन, शिकार, मछली पकड़ने का धंधा करने लगे। शायद देहातों में धातु सम्बन्धी तकनीकी जानकारी के फैलने से खेती करने और बस्तियाँ बनाने में सहूलियत हुई। गुजरात के प्रभास पाटन (सोमनाथ) और रंगपुर जैसे कुछ स्थान तो हड़प्पा संस्कृति के मानों औरस पुत्र हैं। किन्तु उदयपुर के निकटवर्ती अहार में हड़प्पाई तत्व कुछेक ही पाए जाते हैं। गिलुंद में, जो अहार संस्कृति का एक स्थानीय केन्द्र जैसा लगता है, ईंटों की संरचनाएँ भी मिली हैं जिन्हें मोटे तौर पर 2000 ई. पू. और 1500 ई. पू. के बीच रखा जा सकता है। यों, पकाई हुई इंर्टें हरियाणा के भगवानपुरा में उत्तर हड़प्पाई अवस्था में मिली हैं, पर इसके सिवा और कहीं नहीं पाई गई हैं। हाँ, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बुलन्दशहर जिले के लाल किला के गैरिक मृदभांड (ओ. सी. पी.) स्थल पर चंद ईंटें मिली हैं। फिर भी यह ध्यान देने की बात है कि हडप्पाई तत्व न तो मालवा की उस ताम्रपाषाण संस्कृति (लगभग 1700-1200 ई. पू.) में मिलते हैं, जिसकी सबसे बड़ी बस्ती नवदाटोली में है और न उन अनेकों जोरवे स्थलों में ही मिलते हैं, जो तापी, गोदावरी और भीमा की घाटी में पाए गए हैं। जोरवे बस्तियों में सबसे बड़ी है दैमाबाद की, जो करीब 22 हेक्टेर में बसी है जहाँ 4000 की आबादी हो सकती है। इसे आद्य नगरीय कह सकते हैं। लेकिन अधिकांश जोरवे बस्तियाँ गाँव की हैं।
   नागरिकोत्तर हड़प्पाई बस्तियाँ स्वात घाटी में मिली हैं। यहाँ के लोग पशुचारण के साथ-साथ अच्छी खेती और पशुपालन भी करते थे। वे मन्द चाल वाले चाक पर बने काला-धूसर ओपदार मृद्भांडों का प्रयोग करते थे। ये मृद्भांड ईसा-पूर्व तीसरी सहस्त्राब्दी और उसके बाद के उन मृद्भांडों से मिलते हैं जो उत्तरी ईरान के पठार से प्राप्त हुए हैं। स्वात घाटी के निवासी भी चाक पर लाल पर काले रंग वाले मृदभांड तैयार करते थे, जो आरम्भिक नागरिकोत्तर काल के मृदभांडों से निकट सम्बन्ध जताते हैं। इनसे प्रकट होता है कि हड़प्पा से सम्बद्ध नागरिकोत्तर संस्कृति से इनका सम्बन्ध था। इसलिए स्वात घाटी को उत्तर हड़प्पा संस्कृति का उत्तरी छोर मान सकते हैं। भारत स्थित पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और जम्मू में भी कई उत्तर हड़प्पा स्थलों की खुदाई हुई है। इनमें जम्मू में मंडा, पंजाब में चंडीगढ़ और संघोल, हरियाणा में दौलतपुर और मितेथल और उत्तर प्रदेश में आलमगीर और हुलास उल्लेखनीय हैं। जान पड़ता है कि हड़प्पाई लोगों ने चावल की खेती तब शुरू की जब वे हरियाणा में दौलतपुर और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में हुलास पहुँचे। रागी उत्तर भारत के किसी भी हड़प्पा स्थल में अभी तक नहीं देखा गया है। आलमगीरपुर में उत्तर हड़प्पाई लोग कपास भी उपजाते थे जैसा कि हड़प्पा के मृदभांडों पर मिले कपड़े के छापों से मालूम होता है।
   उत्तरी और पूर्वी क्षेत्रों के उत्तर हड़प्पाई स्थलों में जो चित्रित हड़प्पाई मृद्भांड पाए गए हैं उनमें आकृतियाँ अपेक्षाकृत सरल हो गई हैं, हालाँकि कुछ नए पात्र-प्रकार भी मिलते हैं। कुछ उत्तर हड़प्पाई पात्र-प्रकार भगवानपुरा के चित्रित धूसर मृद्भांड अवशेषों से संमिश्रित पाए गए हैं, लेकिन इस काल में हड़प्पा संस्कृति पूर्ण विघटन की अवस्था में आ चुकी प्रतीत होती है।
   उत्तर हड़प्पाई अवस्था में लम्बाई मापने की कोई वस्तु नहीं पाई गई है। गुजरात में उत्तर काल में पत्थर के घनाकार बाट और पकी मिट्टी की पिंडिकाएँ (टेराकोटा केक) नहीं पाते हैं। आम तौर से सभी उत्तर हड़प्पाई स्थलों में मानव मूर्तिकाओं और वैशिष्ट्य सूचक चित्राकृतियों का अभाव है। यद्यपि गुजरात में प्रकाचित वस्तु (फायन्स) अप्रचलित हो चुकी थी, पर उत्तर भारत में यह खूब चलती थी। नागरिकोत्तर अवस्था में पहुँचने पर पश्चिम एशियाई केन्द्रों से हड़प्पाईयों का व्यापार समाप्त हो गया। लाजवर्द मणि, चर्ट, इन्द्रगोप मणि (कर्नेलिअन बेड) तथा तांबे और कांसे के पात्र व्यापार-वस्तुओं में या तो लुप्त हो चुके थे या विरल। यह सब स्वाभाविक था, क्योंकि पंजाब, हरियाणा और उत्तरप्रदेश में उत्खनित अधिकांश उत्तरकालीन हड़प्पा स्थल देहाती बस्तियाँ ही हैं।
   हड़प्पा संस्कृति की उत्तरकालीन अवस्थाओं में कुछ बाहरी औजार और मृद्भांड पाए गए हैं, जिनसे संकेत मिलता है कि सिन्धु घाटी में बाहर के लोग धीरे-धीरे प्रवेश करने लगे थे। मोहें जो दड़ों की अंतिम अवस्था में असुरक्षा और अशान्ति के कुछ लक्षण दिखाई देते हैं। आभूषणों की निधियाँ स्थान-स्थान पर गड़ी मिली हैं और एक स्थान पर आदमी की खोपड़ियों का ढेर मिला है। मोहें जो दड़ों की ऊपरी सतहों पर नई किस्म की कुल्हाडियाँ, छुरे और पसलीदर और सपाट चूल वाली छुरियाँ मिली है। ये कुछ बाहरी आक्रमण के संकेत देते हैं। हड़प्पा की उत्तम अवस्था के एक कब्रिस्तान में नए लोगो के अवशेष मिले हैं, जहाँ नवीनतम स्तरों पर नए प्रकार के मृद्भांड हैं। नए प्रकार के मृद्भांड बलूचिस्तान के कुछ स्थलों पर भी मिलते हैं। पंजाब और हरियाणा के कई स्थलों पर लगभग 1200 ई. पू. के उत्तरकालीन हड़प्पा मृदभांडों के साथ-साथ धूसर मृद्भांड और चित्रित धूसर मृदभांड पाए गए हैं जो आमतौर से वैदिक जनों से जुड़े हैं। ये सारे काम उन बर्बर अश्वारोही जनों के हो सकते हैं जो ईरान से पहाड़ियों के रास्ते आए होंगे। लेकिन ये नए लोग उतनी अधिक संख्या में नहीं आए कि पंजाब और सिन्धु के हड़प्पाई नगरों को तहस-नहस कर दें। यद्यपि वैदिक आर्यजन अधिकांशतः उसी सप्त-सिन्धु प्रदेश में बसे जहाँ एक समय हड़प्पा संस्कृति विराजमान थी, फिर भी हमें ऐसा कोई पुरातात्विक साक्ष्य नहीं मिलता है कि सुदृढ़ हड़प्पा-जनों और आर्यजनों के बीच कोई भारी संग्राम हुआ था। वैदिन जनों का 1800 ई. पू. और 1200 ई. पू. के बीच हड़प्पा संस्कृति की उत्तरकालीन अवस्था के लोगों के साथ सामना हुआ होगा।