| |||||||||
|
6 वीं सदी ई. पू. (बुद्धकाल) में राज्य, वर्ण और समाज
भौतिक जीवनउत्तरी भारत में विशेष कर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों का भौतिक जीवन कैसा था, इसका आभास पुरातात्विक साक्ष्य के साथ-साथ पालिग्रन्थों और संस्कृत सूत्र-साहित्य के संयुक्त आधार पर पाया जा सकता है। पुरातत्व के अनुसार ईसा-पूर्व छठी सदी उत्तरी काला पालिशदार मृद्भांड (संक्षेप में उ. का. पा. मृ.) अवस्था का आरम्भ काल है। इस अवस्था के अंग्रेजी संक्षेपाक्षर हैं N B P W अर्थात् नार्दर्न ब्लैक पालिश्ड वेयर। यह मृदभांड् बहुत ही चिकना और चमकीला होता है। इसकी बनावट उत्कृष्ट कोटि की होती थी और सम्भवतः इसका उपयोग धनवान लोग भोजनपात्र के रूप में करते थे। इस मृद्भांड के साथ आम तौर से लोहे के उपकरण भी पाए जाते हैं, विशेषकर शिल्पकर्म और कृषिकर्म में काम आने वाले उपकरण। इसी अवस्था में धातु-मुद्रा का प्रचलन भी आरम्भ हुआ। पकी इंर्टों और पक्के कुओं का प्रयोग इस अवस्था के मध्य में अर्थात् ईसा-पूर्व तीसरी सदी में शुरू हुआ।उ.का.पा.मृ. (N B P W) अवस्था में ही गंगा के मैदानों में नगरीकरण की शुरूआत हुई। यह भारत का द्वितीय नगरीकरण कहलाता है। हड़प्पाई नगर ईसापूर्व 1800 के आसपास अन्तिम रूप से अलक्षित हो गए। इसके बाद लगभग 1000 वर्षों तक भारत में कोई शहर नहीं पाया जाता है। फिर इनके प्रथम दर्शन ईसापूर्व छठी सदी के आसपास मध्य गंगा के मैदान में होते हैं। पालि और संस्कृत ग्रन्थों में उल्लिखित अनेक नगरों को खोद निकाला गया है, जैसे कौशाम्बी, श्रावस्ती, अयोध्या, कपिलवस्तु, वाराणसी, वैशाली, राजगीर, पाटलिपुत्र और चम्पा। हर एक में उ. का. पा. मृ. युग या उसकी मध्य अवस्था की बस्तियाँ और मिट्टी की संरचनाएँ मिली हैं। पटना में लकड़ी के पैलिसेड (लकड़कोट) मिले हैं जो मौर्य या मौर्य-पूर्व काल के हो सकते हैं। इनमें कई नगर किलाबन्द हैं। घर अधिकतर कच्ची ईंट और लकड़ी के बने थे, जो सम्भवतः मध्य गंगा के मैदानों की नम जलवायु में नष्ट हो गए हैं। यद्यपि पालि ग्रन्थों मे सतमंजिले प्रसादों का उल्लेख मिलता है, परन्तु वे कहीं भी पाए नहीं गए हैं। अब तक जो संरचनाएँ निकली हैं वे प्रभावकारी नहीं लगतीं, लेकिन अन्याय भौतिक अवशेषों के साथ-साथ देखें तो वे संकेत देती हैं कि चित्रित धूसर मृद्भांड बस्तियों की तुलना में इनकी आबादी में भारी वृद्धि हुई थी। अनेक नगर शासन के मुख्यालय थे, पर उनका मूल प्रयोजन जो भी रहा हो, अन्ततः वे बाजार बन गए और वहाँ शिल्पी और वणिक, आ-आ कर बसते गए। कहीं-कहीं तो शिल्पियों या कारीगरों की घनी आबादी हो गई। वैशाली के सद्दलपुत्त शहर में कुम्भकारों की 500 दुकानें थीं। शिल्पी और वणिक दोनों अपने-अपने प्रमुखों के नेतृत्व में श्रेणियाँ (ट्रेड यूनियन जैसा संघ) बनाकर संगठित थे। हमें शिल्पियों की 18 श्रेणियों का उल्लेख मिलता है, लेकिन विशेष रूप में उल्लेख केवल लुहारों, बढ़इयों, चर्मकारों और रंगकारों की श्रेणियों का हुआ। शिल्पी और वणिक दोनों नगरों में अपने-अपने नियत भागों में रहते थे। हम जानते हैं कि वाराणसी में वेस्स या वणिक लोगों की गली थी। इसी तरह हाथीदाँत के शिल्पियों की गली की भी चर्चा है। इस तरह श्रेणी व्यवस्था और स्थानीयकरण के परिणामस्वरूप शिल्पियों में विशेषीकरण आया। आम तौर से शिल्प या दस्तकारी वंशगत थी जिसके फलस्वरूप बेटा अपने कुल का व्यवसाय अपने पिता से सीख लेता था। शिल्पियों द्वारा बनाई गई वस्तुएँ वणिक लोग दूर-दूर तक ले जाते थे। पाँच सौ गाड़ी माल की चर्चा बार-बार आई है। इनमें कपड़ा, हाथीदाँत की वस्तुएँ, बर्तन आदि सामान रहते थे। इस काल के सभी प्रमुख नगर नदी के किनारे और व्यापार मार्गों के पास बसे थे और एक दूसरे से जुड़े थे। श्रावस्ती नगरी कौशाम्बी और वाराणसी दोनों से जुड़ी थी। वाराणसी तो बुद्ध के युग में एक महान् व्यापार-केन्द्र था। व्यापार मार्ग श्रावस्ती से पूरब और दक्षिण की ओर निकलकर कपिलवस्तु और कुशीनगर (कसिया) होते हुए वाराणसी तक गया था। सौदागर पटना में गंगा पार कर के राजगीर जाते थे। वे नदी-मार्ग से आधुनिक भागलपुर के निकट चम्पा भी जाते थे। यदि जातक-कथाओं को आधार मानें तो कोसल और मगध के वणिक मथुरा होते हुए उत्तर की ओर बढ़ते-बढ़ते तक्षशिला तक पहुँच जाते थे। इसी तरह वे मथुरा से दक्षिण और पश्चिम की ओर बढ़ते-बढ़ते उज्जैन और गुजरात के समुद्रतटीय प्रदेश तक पहुँच जाते थे। मुद्रा के प्रचलन से व्यापार को बढ़ावा मिला। वैदिक ग्रन्थों में आए निष्क और शतमान शब्द मुद्रा के नाम माने जाते हैं। लेकिन प्रतीत होता है कि वे धातु के बने अलंकरण रहे होंगे। वस्तुतः प्राप्त सिक्के तो ईसापूर्व छठी सदी से पहले के नहीं हैं। मालूम होता है कि वैदिक काल में लेन-देन का काम वस्तु-विनिमय प्रणाली से चलता होगा और कभी-कभी पशु का व्यवहार भी मुद्रा की तरह किया जाता होगा। धातु के सिक्के सबसे पहले गौतम बुद्ध के युग में मिलते है। आरम्भ में सिक्के अधिकतर चाँदी के होते थे, हालाँकि कुछ ताँबे के भी मिले हैं। ये सिक्के Punch marked कहलाते हैं क्योंकि ये धातु के टुकड़ों पर पेड़, मछली, साँड, हाथी, अर्द्धचन्द्र आदि किसी वस्तु की आकृतियों का ठप्पा मार कर बनाए जाते थे। ठप्पा मानकर बनाए जाने के कारण भारतीय भाषाओं में इन्हें आहत मुद्रा कहते हैं। इन मुद्राओं की सबसे पुरानी निधियाँ (होर्ड्स) पूर्वी उत्तर प्रदेश और मगध में मिली हैं, यों आरम्भ काल के कुछ सिक्के तक्षशिला में भी मिले हैं। पालिग्रन्थों से मुद्रा के प्रचुर प्रचलन का संकते मिलता है और यह भी पता चलता है कि वेतन और मूल्य का भुगतान सिक्कों में किया जाता था। सिक्के का प्रचलन इतना व्यापक हो गया था कि एक मरे चूहे का मूल्य भी सिक्के में आँका गया है। सम्भव है कि लिखने की कला अशोक से करीब दो शतक पहले शुरू हुई हो। आरम्भ के अभिलेख, शायद पत्थर और धातु पर अंकित न होने के कारण, लुप्त हो गए हैं। लेखन से न केवल नियमों और कर्मकांडो का संकलन सम्भव हुआ, बल्कि लेखा-जोखा रखना भी आसान हो गया, जो व्यापार में, कर-संग्रह में और बड़ी-बड़ी वेतनभोगी सेना रखने में परमावश्यक था। इसी काल में सूक्षम मापन विषयक ग्रन्थ भी रचे गए, जो शुल्बसूत्र कहलाते हैं। ये ग्रन्थ प्रमाणित करते हैं कि इससे पूर्व लेखन-कला प्रचलित हो चली थी। इन ग्रन्थों से खेतां और घरों के सीमांकन में सहायता मिली। यद्यपि उ. का. पा. मृ. (N B P W) अवस्था की कोई ग्रामीण बस्ती नहीं मिली है, पर इस मृद्भांड के ठीकरे बिहारे के मैदानों में और पूर्वी और केन्द्रीय उत्तर प्रदेश के मैदानों में 400 से भी अधिक स्थानों में पाए गए हैं। सुदृढ़ ग्रामीण आधार के बिना मध्य गंगा मैदान में शिल्प, वाणिज्य और नगरीकरण का होना हम सोच भी नहीं सकते हैं। राजा, पुरोहित, शिल्पी, वणिक, प्रशासक, सैनिक अधिकारी और अन्याय कार्यकर्ता, इन सबों का शहर में रहना तब तक सम्भव नहीं है जब तक कि इनके भरण-पोषण के लिए कर, बलि (नजराना) और राजांश पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न हो। नगरवासी कृषकेतर लोगों का पेट ग्रामवासी कृषक भरते थे। इसके बदले ग्रामवासियों को औजार, कपड़ा आदि वस्तुएँ नगरवासी शिल्पियों और व्यापारियों से मिलती थीं। कहा गया है कि गाँव के एक व्यापारी ने नगर के एक वणिक के जिम्मे 500 हल रखे थे। अवश्य ही ये हल लोहे के फाल वाले होंगे। कौशाम्बी में उ. का. पा. मृ. (N B P W) अवस्था में लोहे के कई औजार पाए गए है, जैसे कुल्हाड़ी, वसूला, छुरी, उस्तरा, कील, हँसिया आदि। इनमें से कई तो लगभग ईसापूर्व छठी-चौथी सदियों के स्तरों में मिले हैं और लगता है उन किसानों के इस्तेमाल के लिए होंगे जो नगदी या जिन्सी कीमत चुकाकर इन्हें खरीदते होंगे। पालि ग्रन्थों में अनगिनत गाँवों का उल्लेख है, और लगता है कि नगर गाँवों के समूह के बीच बसते थे। प्रतीत होता है कि ऐसी संकेन्द्रित ग्रामीण बस्तियाँ, जहाँ सभी लोग एक जगह बसे हों और उनके खेत अधिकतर बस्ती के बाहर फैले हों, सबसे पहले गौतम बुद्ध के युग में मध्य गंगा मैदानों में उभरी। पालि ग्रन्थों में गाँव के तीन भेद किए गए हैं। प्रथम कोटि में वे सामान्य गाँव हैं जिनमें विविध वर्णां और जातियों का निवास हो। ऐसे गाँवों की संख्या सबसे अधिक मालूम पड़ती है और इनका मुखिया भोजक कहलाता था। द्वितीय कोटि में ऐसे उपनगरीय गाँव थे जिन्हें शिल्पी-ग्राम कह सकते हैं, जैसे वाराणसी के निकट एक बढ़ई का गाँव या रथकार ग्राम था। अवश्य ही ऐसे गाँव अन्य गाँवों के लिए बाजार का काम करते होंगे और नगरों को देहात से जोड़ते होंगे। तृतीय कोटि में सीमान्त ग्राम आते हैं, जो जंगल से संलग्न देहातों की सीमा पर बसे होते थे। इन गाँवों के निवासी मुख्यतः बहेलिये और शिकारी होते थे जो अपना आहार बटोर कर जीते थे। गाँव की भूमि खेती के उपयुक्त टुकड़ों में विभाजित करके हर परिवार के बीच बँटी रहती थी। हर परिवार अपने-अपने हिस्से के खेतों में अपने परिवार के लोगों को या आवश्यकतानुसार कृषि-मजूदरों को भी लगाकर खेती करता था। खेतों को घेरने और सिंचाई की नहर बनाने का काम ग्राम-प्रमुख के तत्वाधान में किसान लोग मिलजुलकर कर लेते थे। किसान अपनी उपज का छठा भाग कर या राजांश के रूप में चुकाते थे। कर की वसूली सीधे राजा के एजेंट करते थे और आम-तौर से किसान और राज्य दोनों के बीच में कोई दरमियानी हकदार नहीं होता था। परन्तु कुछ गाँव ब्राहाणों और वणिकों को उपभोग के लिए सौंपे हुए थे। खेत के ऐसे बड़े-बड़े टुकडों की भी सूचना है जहाँ दासों और कृषि मजदूरों को लगाकर खेती कराई जाती थी। धनी किसान गृहपति कहलाते थे। ये लगभग वैश्यों के ही एक उपवर्ग में आते थे। इस काल में पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में पैदा होने वाला मुख्य अनाज चावल था। पालि ग्रन्थों में नाना प्रकार के धानों और धनखेतों का वर्णन है। इस काल के पालि और संस्कृत ग्रन्थों में रोपाई का पर्यायवादी शब्द मिलता है और लगता है कि धान की रोपाई की प्रणाली बुद्ध के युग में व्यापक रूप में प्रचलित हो गई थी। धान की रोपाई या पानी में धान उपजाने की प्रणाली से उत्पादकता में भारी बढ़ोत्तरी हुई। इसके अतिरिक्त, किसान जौ, दलहन, ज्वार, कपास और ईख की भी खेती करते थे। लोहे के फाल के प्रचलन के फलस्वरूप तथा इलाहाबाद और राजमहल के बीच की जलोढ़ मिट्टी की उर्वरता के फलस्वरूप खेती में भारी उन्नति हुई। तकनीकी ज्ञान नगरीय और ग्रामीण अर्थतन्त्र की प्रगति का मूलमन्त्र बन गया। मध्य गंगा घाटी के वर्षापोषित, जंगलो से भरे, कड़ी मिट्टी वाले प्रदेश को सफाई, खेती और बस्ती के उपयुक्त बनाने में लोहे की भूमिका महत्वपूर्ण हुई। लौहार यह जानते थे कि लोहे के औजारों को कड़ा कैसे बनाएं। राजघाट (वाराणसी) में मिले कुछ औजारों से प्रकट होता है कि वे सिंहभूम और मयूरभंज में मिलने वाले लौह अयस्क से बनाए गए थे। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि लोग देश की समृद्धतम लोहा-खानों से परिचित हो गए थे और इससे शिल्पकर्म और कृषिकर्म के लिए औजारों की उपलब्धि अवश्य ही बढ़ी होगी। भौतिक अवशेषों और पालि ग्रन्थों के अध्ययन से अर्थव्यवस्था की जो तस्वीर उभरती है वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उत्तर वैदिक कालीन ग्रामीण अर्थव्यवस्था से बहुत भिन्न है, और उस अर्थव्यवस्था से भी भिन्न है जो बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ भागों के कई ताम्रपाषाण समुदायों में पाई गई हैं। इसी क्षेत्र में हमें समुन्नत खाद्य-उत्पादक अर्थव्यवस्था मध्य गंगा मैदानों की जलोढ़ मिट्टी पर फैलती हुई सबसे पहले दिखाई देती है। यह ऐसी अर्थव्यवस्था थी जिससे न केवल सीधे उत्पादकों का भरणपोषण होता था, बल्कि ऐसे बहुत सारे अन्य लोगों का भी होता था जो न किसान थे, न शिल्पी। इस अर्थव्यवस्था से करों की नियमित वसूली और लम्बे समय के लिए सेना का रखरखाव सम्भव हुआ और इसी से ऐसी परिस्थति का निर्माण हुआ जिसमें बड़े-बड़े जनपद-राज्य बन और टिक सकते थे। प्रशासन पद्धतियों इस काल में हम बहुत से राज्य देखते हैं, पर उनमें केवल कोसल और मगध शक्तिशाली हुए। दोनों क्षत्रिय वर्ण के आनुवंशिक राजाओं द्वारा शासित सर्वांगपूर्ण राज्य थे। जातकों से, अर्थात् बुद्ध के पूर्व जन्मों की कथाओं से, ज्ञात होता है कि जनता अत्याचारी राजाओं और उनके प्रधान पुरोहितों को गद्दी से उतार देती थी और उनकी जगह नए राजाओं को बैठा देती थी। परन्तु निष्कासन की घटना उतनी ही विरल थी जितनी निर्वाचन की घटना। राजा के पद की प्रतिष्ठा सबसे ऊपर थी और उसके जानमाल की रक्षा का विशिष्ट प्रबन्ध रहता था। वह बुद्ध जैसे धार्मिक महापुरूषों के आगे ही नतमस्तक होता था। राजा प्रथमतः युद्ध नेता होता था जो अपने राज्य के लिए विजय पर विजय करता जाता था। बिम्बिसार और अजातशत्रु इसके अच्छे उदाहरण हैं।राजा अनेक अधिकारियों की सहायता से शासन करता था, जो ऊपर से लेकर नीचे गाँव के प्रधान तक क्रमबद्ध रहते थे। उच्च कोटि के अधिकारी महामात्र कहलाते थे। वे कई तरह के कार्य करते थे, जैसे सचिव (मन्त्रिन) सेनानायक, न्यायाधिकारी, महालेखाकार और अन्ततः पुर-प्रधान के कार्य। शायद आयुक्त नाम से विदित अधिकारियों का एक वर्ग भी कुछ राज्यों में इसी तरह का कार्य करता था। प्रशासन में मन्त्रियों की भूमिका बड़े महत्व की थी। मगध का वर्षकार और कोसल का दीर्घचारायण सफल और प्रभावशाली मन्त्री हुए। इनमें प्रथम ने वैशाली के लिच्छवियों के बीच फूट का बीज बोकर लिच्छवि गणराज्य पर अजातशत्रु का को प्रभुत्व दिलाया और द्वितीय ने कोसल के राजा की भारी सहायता की। जान पड़ता है कि उच्च अधिकारी और मन्त्री अधिकतर ब्राह्मण या पुरोहित वर्ग से चुने जाते थे। सामान्यतः वे राजा के अपने गौत्र के लोगों से नहीं लिए जाते थे। अब वैदिक काल का बान्धवाश्रित राज्य-तन्त्र उपेक्षित सा हो चुका था। कोसल और मगध दोनों में चाँदी की आहत मुद्रा के प्रचलन के बावजूद प्रभावशाली ब्राह्मणों और सेट्टियों को पारितोषिक के तौर पर राजस्व ग्राम दिये जाते थे। ऐसा करने में उन्हे अपने गोत्र के लोगों से अनुमति लेना आवश्यक नहीं था, जबकि उत्तर वैदिक काल में यह आवश्यक था। लेकिन ऐसे दान में दानग्राही को केवल राजस्व का हक दिया जाता था, शासन करने का नहीं। ग्रामांचल का प्रशासन गाँव के मुखिया के हाथ में रहता था। आरम्भ में, वह कबायली लड़ाकू टोली के नेता के रूप में काम करता था, इसलिए वह ग्रामणी कहलाता था, जिसका अर्थ था ग्राम या कबायली लड़ाकू टोली का नेता। जब जीवन में स्थिरता आ गई और हल से खेती करने की प्रणाली स्थापित हो गई तब कबायली लड़ाकू टोली स्थायी रूप से कृषक हो गई। अतः मौर्य पूर्व काल में ग्रामणी भी अपना रूप बदलकर गाँव का मुखिया हो गया। गाँव का मुखिया विभिन्न नामों से पुकारा जाता था, जैसे ग्रामभोजक, ग्रामणी या ग्रामिक। ग्रामणी पदनाम श्रीलंका में आज भी चलता है। कहा जाता है कि बिम्बिसार ने 86,000 ग्रामिकों को आहूत किया था। संख्या कहावती हो सकती है, लेकिन इससे प्रकट होता है कि ग्रामप्रधान का बड़ा महत्व था और उसका राजा के साथ सीधा सम्बन्ध रहता था। वह ग्रामवासियों पर कर निर्धारित करता था और वसूलता भी था। वह अपने इलाके में शान्ति-सुव्यवस्था भी बनाये रखता था। कभी-कभी अत्याचारी ग्रामप्रधान को गाँव के लोग दंड भी देते थे। सेना और कर लगाना राज्य की शक्ति में वास्तविक वृद्धि का संकेत इस बात से मिलता था कि उसकी पेशेवर या वैतनिक सेना कितनी बड़ी है। सिकन्दर के आक्रमण के समय मगध के नन्दवंशी राजा के पास 20,000 घुड़सवार सैनिक, 20,0000 पैदल सैनिक, 2000 रथ और लगभग 4000 हाथी थे। रथ का महत्व उत्तरी पूर्वी ही नहीं, उत्तरी-पश्चिमी भारत में भी घटता जा रहा था, जहाँ कि उनका प्रचलन आर्यों ने किया था। पश्चिमोत्तर भारत के शासक लोग बहुत कम हाथी रखते थे, जबकि उनमें से बहुतों के पास उतने घोड़े थे जितने मगध नरेश के पास। भारी संख्या में हाथी रहने से ही मगध के राजा अधिक शक्तिशाली माने जाते थे। भारी स्थायी सेना का भरण पोषण राज्य-कोष से करना होता था। हमें ज्ञात है कि नन्द राजाओं के पास अपार सम्पत्ति थी और इसी के बल पर वे सेना का भरणपोषण करने में समर्थ थे, लेकिन हमें यह मालूम नहीं है कि किन-किन विशेष उपायों से वे इतना कर संचय कर पाते थे। राजकोष प्रणाली ठोस नींव पर खड़ी थी। योद्धा और पुरोहित अर्थात् क्षत्रिय और ब्राह्मण करों से मुक्त थे और कर का सारा बोझ किसानों के सिर पर था, जिनमें अधिकतर वैश्य या गृहपति थे। बलि, जो वैदिक काल में कबीले के लोग अपने-अपने सरदार को स्वेच्छापूर्वक अर्पित करते थे, बुद्ध के युग में आकर किसानों द्वारा अनिवार्य रूप से देय हो गई और इसकी वसूली के लिए अधिकारी नियुक्त थे जो बलिसाधक कहलाते थे। जान पड़ता है कि राजा किसानों से उनकी उपज का छठा भाग कर के रूप में लेता था। करों का निर्धारण और वसूली गाँव के मुखिया की सहायता से राजा के कार्यकर्ता करते थे। लेखन के प्रचलन से कर निर्धारण और कर संग्रह में सुविधा हुई होगी। आहत मुद्राओं की अनेकानेक निधियों के मिलने से यह प्रकट होता है कि भुगतान नगद और जिन्स दोनों रूप में होता था। पूर्वोत्तर भारत में कर धान के रूप में चुकाया जाता था। इन करों के अतिरिक्त किसानों को राजा के काम में बेगार देना (अर्थात् मुफ्त में खटना) पड़ता था। जातक कथाओं में आया है कि कर के दुर्वह भार से बचने के लिए किसानों ने राज छोड़ दिया। शिल्पियों और व्यापारियों से भी कर वसूला जाता था। शिल्पियों से महीने में एक दिन राजा के लिए काम कराया जाता था और व्यापारियों से उनके माल की बिक्री पर चुंगी वसूली जाती थी। चुंगी वसूलने वाला अधिकारी शौल्किक या शुल्काध्यक्ष कहलाता था। जनपद राजाओं ने पूर्व की सभा और समिति को समाप्त कर दिया। इस तरह की जन-सभाएँ उत्तर वैदिक काल में ही लुप्त हो गई थीं। चूँकि ये सभा-समितियाँ कबायली संगठन थीं, इसलिए ज्यों-ज्यों कबीले विघटित हो-होकर वर्ण में लीन होते और अपनी पहचान खोते गए, त्यो-त्यों उक्त संगठन शिथिल होते-होते लुप्त हो गए। कबीलों का स्थान वर्णमूलक और जातिमूलक समुदायों ने लिया, इसलिए स्मृतिकारों ने जातीय नियमों और कुलाचारों को समुचित महत्व दिया। फिर भी ये नियम सामाजिक विषयों तक ही सीमित रहे। जन-सभाएँ ऐसे छोटे-छोटे राज्यों में ही सफल हो सकती थीं जहाँ कबीले के सभी सदस्य आसानी से जुटाए जा सकते हों, जैसा कि वैदिक काल में सम्भव रहा होगा। कोसल और मगध जैसे बड़े-बड़े राज्यों के उदित होने के बाद ऐसी बड़ी जन-सभाएँ आयोजित करना सम्भव नहीं रहा, जिनमें विभिन्न सामाजिक वर्गों और साम्राज्य से विभिन्न भागों के लोग जुट सकें। महज आवागमन की कठिनाई ही इतनी थी कि नियमित बैठकें की ही नहीं जा सकती थीं और पुरानी जन-सभाएँ कबायली थीं, अतः नए राज्यों में बसे वैदिकेतर कबीलों को उन सभाओं में स्थान नहीं दिया जा सकता था। इस तरह परिवर्तित स्थिति पुरानी जन-सभाओं के टिके रहने के लिए अनुकूल नहीं थी। उनकी जगह परिषद् नाम की एक छोटी सी समिति बनी जिसमें केवल ब्राह्मण रहते थे। इस काल में भी सभाएँ तो रहीं, किन्तु एकतांत्रिक राज्यों में नहीं। ये शाक्यों, लिच्छवियों आदि के छोटे-छोटे गणतांत्रिक राज्यों में चालू रहीं। गणतंत्र-एक प्रयोगगणतान्त्रिक शासन-पद्धति या तो सिन्धु घाटी में रही या पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के अन्तर्गत हिमालय की तराईयों में। सिन्धु घाटी के गणराज्य वैदिक कबीलों के अवशेष रहे होंगे। हो सकता है कि कुछ गणराज्य एकतान्त्रिक राज्य की जगह विकसित हुए हों। कुछ मामलों में बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग कबायली समानता के पुराने आदर्शों से प्रेरित रहे होंगे, जिनमें एकल राजा को अधिक महत्व नहीं दिया जाता था।गणराज्यों में वास्तविक सत्ता कबायली अल्पतन्त्रों (सीमित लोगों के संघटनों) के हाथ में होती थी। शाक्यों और लिच्छवियों के गणराज्यो में शासक वर्ग एक ही गोत्र और एक ही वर्ण का होता था। वैशाली के लिच्छवियों के मामले में, यद्यपि सभागार में 7707 राजा (प्रतिनिधि) जुटे, लेकिन ब्राह्मण इस में शमिल नहीं थे। मौर्यांत्तर काल में मालवों और क्षुद्रकों के गणराज्य में क्षत्रियों और ब्राह्मणों को नागरिकता मिली थी, लेकिन दासों और मजदूरों को इससे बाहर रखा गया था। पंजाब में व्यास नदी के तटवर्ती एक राज्य में ऐसे ही लोग सदस्य हो सकते थे जो राज्य को कम से कम एक हाथी दें। सिन्धु घाटी में अल्पतान्त्रिक राज्य का यह अच्छा उदारहण है। शाक्यों और लिच्छवियों का प्रशासन-तन्त्र सरल था। इसमें राजा, उपराजा, सेनापति और भांडागारिक (राजकोषाध्यक्ष) होते थे। कहा गया है कि लिच्छवियों के गणराज्यों में एक के ऊपर एक सात न्यायपीठ होते थे जो एक ही मामले की सुनवाई बारी-बारी से सात बार करते थे। लेनिक यह अत्यधिक उत्तम होने के कारण अविश्वसनीय है। जो भी हो, बुद्ध के युग में कुछ ऐसे राज्य भी थे जिनका शासन वंशपरम्परागर राजा नहीं करते थे, बल्कि जनसभाओं के प्रति उत्तरदायी लोग करते थे। इस प्रकार, प्राचीन गणराज्यों के लोगों का राजनैतिक सत्ता में बराबरी का हिस्सा भले ही न रहा हो, परन्तु भारत में गणतंत्र की परम्परा की प्राचीनता बुद्ध के युग तक पाते हैं। गणतन्त्र और राजतन्त्र के बीच बहुत सी भिन्नताएँ थीं। राजतन्त्र में प्रजा से राजस्व पाने का दावेदार एकमात्र राजा होता था, जबकि गणतंत्र में इसका दावेदार गण या गोत्र का हर अल्पाधिपति होता था जो राजन् कहलाता था। 7707 लिच्छवि राजाओं में हर-एक का अलग-अलग कोषागार और प्रशासन-तन्त्र था। प्रत्येक राजतन्त्र में उसकी नियमित स्थायी सेना होती थी और राज्य सीमा के भीतर प्रजा के समूह या समूहों को शस्त्रास्त्र रखने की अनुमति नहीं थी। लेकिन कबायली अल्पतन्त्र में हर राजा अपनी छोटी-छोटी सेना अपने सेनापति के अधीन रख सकता था, ताकि वह एक दूसरे का मुकाबला कर सकें। राजतन्त्र में ब्राह्मणों का बड़ा प्रभाव था, परन्तु आरम्भिक गणराज्यों में उनका कोई स्थान नहीं था और न उन्होंने अपनी स्मृतियों में इस तरह के राज्यों को मान्यता ही दी। अन्त में, गणराज्य और राजतन्त्र के बीच मुख्य अन्तर यह था कि गणतन्त्र का संचालन अल्पतान्त्रिक सभाएँ करती थीं, न कि कोई एक व्यक्ति, लेकिन राजतन्त्र में यह काम एक व्यक्ति करता था। गणतन्त्र की परम्परा मौर्य काल से कमजोर होने लगी। मौर्य-काल में भी एकतान्त्रिक राज्य कहीं अधिक मजबूत और प्रचलित थे। सम्भवतः प्राचीन मनीषियों ने राजतन्त्र को ही प्रचलित और उत्कृष्ट शासन-पद्धति माना। उनके लिए राज्य, शासन और राजपद सभी एक ही हुए। चूँकि बुद्ध के युग में राज्य सुप्रतिष्ठित हो चुका था, विद्वान लोग सोचने लगे कि इसका उद्भव किस प्रकार हुआ होगा। एक प्राचीनतम बौद्ध पालिग्रन्थ दीघनिकाय में बताया गया है कि पुरातन काल में मनुष्य सुख से रहते थे। धीरे-धीरे वे धनवान होते गए और घर बनाकर अपनी स्त्रियों के साथ रहने लगे। तब से धन और स्त्री को लेकर आपस में झगड़े होने लगे। ऐसे झगड़ों को दूर करने के लिए उन्होंने एक व्यक्ति को अपना प्रमुख चुन लिया ताकि वह शन्ति-व्यवस्था करे और लोगों की रक्षा करे। इस रक्षा के प्रतिफल में उन्होंने अपने प्रमुख को अपने धान्य में से कुछ देते रहने की प्रतिज्ञा की। वही प्रमुख राजा कहलाने लगा और इसी प्रकार राज्य का जन्म हुआ। सामाजिक वर्गीकरण और विधिव्यवस्थाभारतीय विधि और न्याय-व्यवस्था का उद्भव इसी काल में हुआ। पहले कबायली कानून चलते थे, जिसमें वर्गभेद को कोई स्थान नहीं था। लेकिन इस काल में आकर कबायली समुदाय स्पष्टतया चार वर्गां में या वर्णों में बँट गया - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। अतः धर्मसूत्रों में हर वर्ण के लिए अपने-अपने कर्तव्य (पेशा) तय कर दिए गए और वर्णभेद के आधार पर ही व्यवहार-विधि (सिविल ला) और दंडविधि (क्रिमिनल ला) तय हुई। जो वर्ण जितना ऊँचा था वह उतना ही पवित्र माना गया और व्यवहार एवं दंड-विधि में उस से उतनी ही उच्च कोटि के नैतिक आचरण की अपेक्षा की गई। शूद्रों पर हर प्रकार की अपात्रता लाद दी गई। वे धार्मिक और कानूनी अधिकारों से वंचित किए गए और समाज में सबसे नीचे दर्जे में रखे गए। उन्हें उपनयन-संस्कार का अधिकार न रहा। वे यदि ब्राह्मणों और अन्य वर्णां के प्रति अपराध करते थे तो अधिक कठोर दंड पाते थे। दूसरी ओर शूद्रों के प्रति किए गए अपराधों का हल्का दंड होता था। स्मृतिकारों ने कल्पना की कि शूद्रों का जन्म मूतिकर्ता के चरण से हुआ है, इसलिए उच्चवर्ण वाले विशेषतः ब्राह्मण शूद्रों के सम्पर्क से परहेज करते, उनका छुआ खाना नहीं खाते और उनके साथ वैवाहिक सम्बन्ध नहीं करते थे। शूद्र किसी ऊँचे पद पर रखा नहीं जा सकता था और उससे भी महत्व की बात यह है कि शूद्रों का कर्तव्य दास, शिल्पी और कृषि मजदूर के रूप में द्विजों की सेवा करना तय किया गया। इस विषय में, जैन और बौद्ध सम्प्रदायों ने भी उनकी स्थिति नहीं सुधारी। उन्हें नए धार्मिक संघ में प्रवेश की अनुमति भले ही दे दी गई, उनका सामान्य स्थान नीचे के नीचे ही रह गया। कहा गया है कि गौतम बुद्ध ब्राह्मणों की सभा में गए, क्षत्रियों की सभा में गए और गृहपतियों की सभा में गए, लेकिन इस क्रम में शूद्रों का कोई उल्लेख नहीं है।दीवानी और फौजदारी मामले राजा के प्रतिनिधि देखते थे, जो झटपट कठोर दंड दे देते थे, जैसा कोड़ा लगाना, सिर काट लेना, जीभ खींच लेना आदि। बहुधा फौजदारी मामलों में जैसा का तैसा दंड दिया जाता था, अर्थात् आँख फोड़ने वाले की आँख निकाली ली जाती थी और दाँत तोड़ने वाले के दाँत। ब्राह्मणों के विधिग्रन्थों मे नियम बनाते समय विभिन्न वर्णों की सामाजिक स्थिति का ध्यान तो रखा ही गया, उन वैदिकेतर कबायली समूहों के रीतिरिवाजों को भी अनदेखा न किया गया, जो वर्णाश्रित ब्राह्मणिक समाज में घुल-मिल गए थे और जिनकी संख्या विजयाभियानों के फलस्वरूप बढ़ती जा रही थी। इनमें से कुछ देसी कबायलियों की सामाजिक उद्भव-कथाएँ गढ़ ली गईं और उन्हें अपने ही नियमों से शासित होने की छूट दे दी गई। बुद्ध का युग कई कारणों से महत्वपूर्ण रहा। इसी काल में प्राचीन भारतीय राज्यतन्त्र, अर्थतन्त्र और समाज का अपना वास्तविक स्वरूप निखरा। कछारी इलाकों में, खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में लोहे के औजारों से होने वाली खेती के फलस्वरूप एक उन्नत अन्न उत्पादक अर्थतन्त्र का जन्म हुआ। किसानों से कर वसूलना सम्भव हुआ, और कर एवं बलि (नजराना) की नियमित वसूली के आधार पर बड़े-बड़े राज्य स्थापित हो सके। इस प्रणाली को बनाए रखने के लिए वर्णव्यवस्था की गई और हर-एक वर्ण का कर्तव्य (पेशा) स्पष्ट रीति से निर्धारित कर दिया गया। इस व्यवस्था के अनुसार, शासकों और योद्धाओं को क्षत्रिय कहा गया, पुरोहितों और शिक्षकों को ब्राह्मण कहा गया, किसानों और करदाताओं को वैश्य कहा गया और श्रमिकों के रूप में उक्त तीन वर्णों की सेवा करने वाले को शूद्र कहा गया। | |||||||||
| |||||||||