सत्यमेव जयते gideonhistory.com
विश्व साहित्य

विश्व साहित्य का उदय और उन्नीसवीं सदी का अंत

  इतिहास में उन्नीसवीं सदी और चीजों के अलावा विश्व साहित्य के उदय के लिए याद की जाएगी। विश्व साहित्य के उदय का स्वागत करते हुए कार्ल मार्क्स ने कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणा-पत्र (1848) में लिखा है - आधुनिक उद्योग ने विश्व बाजार की स्थापना की........... विश्व बाजार को अपने लाभ के लिए इस्तेमाल कर पूँजीपति वर्ग ने हर देश में उत्पादन और खपत को एक सार्वभौम रूप दे दिया.............. पुरानी स्थानीय और राष्ट्रीय पृथकता और आत्मनिर्भरता का स्थान चौतरफा अन्तःसम्पर्क ने, समस्त राष्ट्रों की परस्पर-निर्भरता ने ले लिया। भौतिक उत्पादन की तरह बौद्धिक उत्पादन के जगत में भी यह परिवर्तन घटित हुआ। अलग-अलग राष्ट्रों की बौद्धिक कृतियाँ सार्वभौम सम्पत्ति बन गईं। राष्ट्रीय एकांगीपन और संकुचित दृष्टिकोण दोनों अधिकाधिक असंभव होते जा रहे हैं और अनेक राष्ट्रीय और स्थानीय साहित्यों से एक विश्व साहित्य उत्पन्न हो रहा है।’’
   विश्व साहित्य के इस उदय का एहसास यूरोप के साहित्यकारों को भी था। वृद्ध गेटे (1749-1832) पहले से ही विश्व साहित्य की चर्चा कर रहे थे।
   साम्राज्य-विस्तार और उपनिवेश-निर्माण की प्रक्रिया में यूरोप एशिया, अफ्रीका और अमरीका की संस्कृतियों और साहित्यों के संपर्क में आ चुका था। वह इन देशों के साहित्य से प्रभावित भी हो रहा था तथा उन्हें प्रभावित भी कर रहा था।
   उन्नीसवीं सदी का अंत और बीसवीं सदी का आरंभ होते-होते यूरोप विश्व साहित्य का केन्द्र बन चुका था। साहित्य का गौरवशाली युग बीत चुका था। किन्तु संध्या के इस झुटपुटे में भी उसके साहित्य का आकर्षण कम नहीं हुआ था।
   उन्नीसवीं सदी के यूरोप की सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि है उपन्यास। रम्य आख्यान पहले भी लिखे गए थे और अन्यत्र भी। लेकिन जिसे ‘‘नाविल’’(उपन्यास) कहते हैं वह और चीज है। वह गद्य की ऐसी नई विधा है जिसकी सृष्टि यूरोप की आधुनिक प्रतिभा ने की। उपन्यास को आधुनिक ‘‘मध्य वर्ग का महाकाव्य’’ ठीक ही कहा गया है। वह आधुनिक समाज का यथार्थ चित्र भी है और इसके साथ ही आधुनिक सभ्यता की तीखी समीक्षा भी। रोजमर्रा की जिंदगी उसका विषय है और यथार्थवाद उसकी पद्धति।
   सदी के परिवर्तन-बिन्दु पर यूरोपीय उपन्यास की वह गौरवशाली परंपरा कुछ-न-कुछ बची हुई थी-इंग्लैंड और फ्रांस जैसे विकसित देशों से अधिक रूस जैसे पिछड़े देश में। दोस्तोएव्सकी (1821-81) और तोल्सतोय (1828-1910) इस दौर के सबसे महान उपन्यासकार हैं। दोनों ही उपन्यासकार यूरोप की आधुनिक सभ्यता के सबसे बड़े आलोचक हैं। औद्योगिक प्रगति और भौतिक समृद्धि से उन्हें संतोष न था। उनकी नजर यूरोपीय समाज के उस पहलू पर भी थी जिसमें गाँवों की बर्बादी, किसानों की दुर्दशा, कारखाने के मजदूरों की बदहाली और मध्य वर्ग का आध्यात्मिक पतन शामिल है। दोस्तोएव्सकी ने कारामाजोव बंधु (1879) में और तोल्सतोय ने पुनर्जीवन (1899) में आधुनिक समाज की तीखी आलोचना करते हुए एक नई व्यवस्था और एक नए मनुष्य के जन्म की ओर संकेत किया है।
   ब्रिटेन में टॉमस हार्डी (1840-1928), विलियम मॉरिस (1834-96) और जॉन रस्किन (1819-1900) अंग्रेजी के यथार्थवादी उपन्यासकारों की परंपरा में ग्रमीण समाज के विघटन, औद्योगिक शहरों की कुरूपता और दस्तकारी के विनाश का मार्मिक चित्र प्रस्तुत कर रहे थे। फ्रेंच लेखक जोला (1840-1902) अपने उपन्यास जर्मिनल (1885) में खान मजदूरों के विद्रोह को वाणी दे रहे थे तो नार्वे के नाटककार इब्सन (1828-1906) अपने नाटकों के द्वारा मध्यवर्गीय समाज के पारिवारिक जीवन की विडम्बनाओं की प्रस्तुति से मध्यवर्गीय समाज की जड़ें हिला रहे थे।
   कविता में स्वच्छदतावाद (रोमैंटिसिज्म) की क्रांतिकारी और उदात्त परंपरा का अंत हो चुका था और उसका स्थान एक ऐसी काव्य प्रवृत्ति ले रही थी जिसमे प्रतीकों के माध्यम से कवि अपने अद्वितीय अनुभव की ठीक-ठीक अभिव्यक्ति को चरम लक्ष्य समझता था। फ्रैंच प्रतीकवाद इस दौर का प्रमुख काव्यान्दोलन है जिसके प्रमुख कवि स्तेफान मलार्मे (1842-98) और आर्थर रैम्बो (1854-91) हैं।

बीसवीं सदी का आरंभ और नए प्रयोग

  बीसवीं सदी के आरंभ से लेकर प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) तक के वर्ष अन्य कलाओं के साथ-साथ साहित्य में भी नए प्रयोगों का दौर है। निरंतर नवीकरण यदि पूँजी की अपनी आंतरिक आवश्यकता है तो पूँजीवादी युग की कला इस नवीकरण की प्रक्रिया से बच नहीं सकती। इस मामले में कला ने विज्ञान का अनुसरण किया जहाँ प्रगति मूलमंत्र है और ‘‘नया’’ तथा ‘‘परवर्ती’’ श्रेष्ठता का समकक्ष है। इसलिए कलाकारों ने भी अनुभव किया कि कला को लगातार नया होने का प्रयत्न करना चाहिए। समकालीन होने का मतलब ही है तकनीकी नवीनता। इस प्रकार ‘‘नई कला’’ का आंदोलन चल पड़ा। इसे आवाँ गार्द (हरावलदस्ता) भी कहा जाता है। पेरिस इस ‘नई कला’ आंदोलन का केंन्द्र बन गया। संसार के विभिन्न देशों से युवा कलाकार एक-एक कर पेरिस में इकट्ठे होने लगे थे जिनमें से कुछ शरणार्थी थे और कुछ बोहेमियन। इतिहासकारों के अनुसार पिछली सदी के अंत में पेरिस में लगभग बीस हजार व्यक्ति ऐसे थे जो अपने आप को कलाकार कहते थे। पेरिस ‘‘रोशनियों के शहर’’ के रूप में मशहूर हो चला। यह वही शहर है जहाँ एक समय स्वयं फ्रांस के चित्रकार ऑरी मातीस (1869-1954), उपन्यासकार मार्सेल प्रूस्त (1871-1922) और कवि पोल वालेरी (1871-1945), स्पेन के चित्रकार पाब्लो पिकासो (1881-1973), रूसी चित्रकार शागल (1889), रूसी संगीतकार स्त्राविंस्की (1882-1971), इटली के चित्रकार मोदिग्यानी (1884-1920) और पोलैंडवासी चित्रकार पाल क्ली (1879-1940) जैसे नए प्रयोगकर्ता तथा महान कलाकार मौजूद थे।
   नए लेखकों को अपने समान-धर्मी कलाकारों के समान ही नए रूपों और नई भाषा की जरूरत इसलिए थी कि वे चेतना की उन नई गहराइयों को व्यक्त करना चाहते थे जिन्हें पहले उद्घाटित नहीं किया गया था। उन्हें ऐसे भाषाई ओजार की जरूरत थी जो की बुद्धि से परे के रहस्यों का पता लगा सकें। मार्सेल प्रूस्त ने अपने विराट उपन्यास बीती बातों की याद (1913-27) में अपनी ‘‘अस्मिता’’ की खोज के लिए स्मृति परतों को एक-एक कर उधेड़ना शुरू किया और उसके लिए उपन्यास में एक नई तकनीक ईजाद की।
   कवियों ने स्वयं भाषा में निहित संभावनाओं की तलाश करते हुए मुक्त छंछ (फ्री वर्स) कि कोशिश की और काव्य भाषा को अनावश्यक अलंकारों से मुक्त करके सटीक बिम्ब पर जोर दिया। इस दृष्टि से इस दौर के महत्वपूर्ण कवि पोल वालेरी (1871-1945), विलियम बटलर येट्स (1885-1939), रेनर मारिया रिल्के (1875-1926) और टी. एस. इलियट (1888-1965) महत्वपूर्ण हैं।
   इसी बीच इटली में कवि मारिनेत्ती (1876-1944) ने कविता का एक नया घोषणा-पत्र (1909) प्रकाशित किया जिसमें आधुनिक मशीन युग की गति और लय के अनुरूप कविता को भी गतिशील बनाने पर जोर था। वे अपने को भविष्यवादी (फ्यूचरिस्ट) कहते थे। ‘‘भविष्यवाद’’ का प्रभाव इटली के बाहर रूस के कुछ कवियों पर भी पड़ा। प्रारंभ में कुछ समय तक व्लादिमीर मायकोव्सकी (1893-1930) भी इस वाद की ओर आकृष्ट रहे।
   अंग्रेजी में बिम्बवाद नाम से एक काव्यान्दोलन चला जिसके हिमायती एजरा पाउंड (1885-1974) थे और सिद्धांतकार टी. ई. ह्यूम (1883-1917)। यह काव्यान्दोलन स्वच्छदतावाद के उच्छसित वाग्विलास का घोर विरोधी था और कविता को एक ठोस मूर्त और संक्षिप्त बिम्ब तक ही सीमित रखने के पक्ष में था।
   ‘नई कला’ के ये सारे आंदोलन क्षण-भंगुर साबित हुए। इनके शीघ्र लोप का कारण इन कला-आंदोलनों में निहित दोष है। इनमें कई तरह के अतंर्विरोध थे - शिष्ट रूचि और जन रूचि दोनों को एक साथ संतुष्ट करने का तनाव और मध्य वर्ग की नई आकांक्षाओं के साथ निराशावादी मनोदशा के साथ तालमेल आदि। इसके अतिरिक्त प्रयोगशील कलाकार में भविष्य दृष्टि की अपेक्षा ‘पीछे देखूँ’ मनोवृत्ति थी। अधिकांश प्रयोगशील कलाकार अराजनीतिक थे। इटली के भविष्यवादियों की तरह कुछ ऐसे भी थे जिनका झुकाव दक्षिण पंथ की ओर था। सच तो यह है कि कला में क्रान्ति की लंबी-चौड़ी बात करने के बावजूद अपनी जीवन-दृष्टि में ये प्रयोगवादी कलाकार तनिक भी परिवर्तनवादी न थे। कुल मिलाकर ये कला आंदोलन 19वीं सदी के यथार्थवाद के घोर विरोधी थे। अतिरेक के बावजूद इस आंदोलन ने कुछ प्रतिभाशाली कवि पैदा किए जैसे फ्रैंच कवि अपोलेनेयर (1880-1918) तथा रूसी कवि अलेक्सांद्र ब्लाक (1880-1921)।

दो महायुद्धों के बीच का पाश्चात्य साहित्य

प  ्रथम विश्व युद्ध ने साहित्य और कला के क्षेत्र में होने वाले सृजन के नये प्रयोगों पर तो आघात किया ही, सामाजिक पुनर्जीवन की उस आशा पर भी पानी फेर दिया जिसके साथ बीसवीं सदी शुरू हुई थी। इस युद्ध ने यूरोपीय समाज की जड़े हिला दीं। पेरिस अब भी कलाकारों और साहित्यकारों के आकर्षण का केन्द्र बना रहा किंतु ‘‘रोशनियों के शहर’’ की रोशनी काफी मद्धिम पड़ गई थी। साहित्यकारों की दृष्टि में यूरोप की संस्कृति मरणासन्न थी, मनुष्य की नियति अनिश्चित प्रतीत हो रही थी और अबुद्धिवाद के भयावह रूप प्रकट होने लगे थे। कुल मिलाकर यह सांस्कृतिक संकट का दौर था।
   स्पेंगलर ने इस युग को ‘पश्चिम का पतन’ (1918-22) के रूप में परिभाषित किया और टी.एस. इलियट ने ‘बंजर जमीन’ (द वेस्ट लैंड) (1922) कहा। टॉमस मान ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास जादू का पहाड़ (1924) में तपेदिक के सैनिटोरियम के प्रतीक के रूप में यूरोप के बीमार समाज को प्रस्तुत किया। साहित्य के क्षेत्र में नए प्रयोग एकदम बंद नहीं हुए, किन्तु हुआ यह कि इन प्रयोगों का लक्ष्य सभ्यता की समीक्षा हो गया। फ्रायड के विचार फैलकर व्यापक बौद्धिक वातावरण के अंग बन गए और उन विचारों ने मनुष्य के अवचेतन में दबी पड़ी बुद्धि से परे की वृत्तियों की खोज के लिए प्रेरित किया। जेम्स ज्वाइस (1882-1941) ने अपने नितांत प्रयोगशील उपन्यास यूलिसिज (1922) में सिर्फ चौबीस घंटे के घटनाक्रम के दायरे में मानव - मन की गहराइयों की सूक्ष्म से सूक्ष्म परतों को खोलकर रख दिया। डी.एच. लारेंस (1885-1930) ने ‘सेक्स’ (काम) के मामले में फ्रायड का तिरस्कार करते हुए भी अपने उपन्यासों में ‘सेक्स’ के माध्यम से यूरोपीय सभ्यता की नपुंसकता को प्रस्तुत किया। 1916 में ‘दादावाद’ नामक एक नया कला-आंदोलन शुरू हुआ जिसने जीवन की निरर्थकता की अभिव्यक्ति की। ‘दादा’ का अनुसरण करते हुए आंद्रे ब्रेतो (1896) ने अति यथार्थवाद (सर्रियलिज्म) नामक कला आंदोलन चलाया जिसके अनुसार मानव चेतना की मुक्ति का सर्वोत्तम उपाय स्वचालित लेखन है क्योंकि अवचेतन में दबे बिम्बों की अभिव्यक्ति इसी प्रकार संभव है। वर्जिनिया वुल्फ (1882-1941) ने भी इसी अवधि में अपने मनोवैज्ञानिक उपन्यास लिखे जिनके अनुसार जीवन ऐंद्रिय संवेदनों का ऐसा प्रवाह है जिसका कोई निश्चित लक्ष्य नहीं होता।
   इस दौर में कुछ ऐसे भी उपन्यासकार हुए जिन्होंने उपन्यास शिल्प में कोई नया प्रयोग तो नहीं किया किन्तु उनहोंने जीवन के अर्थ की खोज में गैर-यूरोपीय जनों को समझने की कोशिश की। जोजेफ कॉनराड (1857-1924) जन्म से पोलैंडवासी होते हुए भी इंग्लैंड के नागरिक बन गए और उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति के लिए अंग्रेजी भाषा को वरण किया। उन्होंने अंधकार का अन्तस्तल (1909) नामक उपन्यास में अफ्रीका में श्वेत लोगों की स्थिति का चित्रण किया। इसी प्रकार ई. एम. फार्स्टर (1879-1971) ने ऐ पैसेज टु इंडिया (1924) उपन्यास में भारतीय जनों के बीच रहने का अनुभव अंकित किया और फ्रांसीसी उपन्यासकार आद्रे मालरो (ज. 1901) ने ‘‘मानवीय अवस्थिति’’ (1933) में चीन के क्रांतिकारी संघर्ष की शुरूआत को उपन्यास का जीवंत रूप दिया।
   दोनों महायुद्धों के बीच यूरोप के बड़े देशों की अपेक्षा छोटे देशों में भी कुछ बड़े ही प्रतिभाशाली साहित्यकार हुए। उदाहरण के लिए स्पेन में फेदेरिको गार्सिया लोर्की (1890-1938), जिन्होंने अपने मार्मिक गीतों और काव्य नाटकों के द्वारा अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की। मध्य यूरोप के देशों में चैकोस्लोवाकिया की साहित्यिक परंपरा काफी समृद्ध है। इस दौर के दो चेक लेखक ऐसे हैं जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिली - यारोस्लाव हासेक (1884-1923) और कारेल चापेक (1890-1938)। हासेक का विशाल उपन्यास अच्छा सिपाही श्वाइक प्रथम विश्व युद्ध तथा आस्ट्रिया के साम्राज्य पर विनोदपूर्ण व्यंग्य है और कारेल चापेक के व्यंग्य चित्र भी बेजोड़ हैं। हंगरी में इस बीच दो प्रतिभाशाली कवि हुए, अत्तिला जोजेफ (1906-38) और मिक्लोश रादनोती (1912-45)। इनकी कविताएँ मरणोपरांत विश्व के सामने आईं तो लोग चमत्कृत रह गए। हंगरी के ही विश्व प्रसिद्ध साहित्य समालोचक और सौन्दर्य शास्त्री जार्ज लुकाच (1885-1971) हैं जो मार्क्सवादी आलोचना के आधार स्तंभ हैं। इसी क्रम में आयरलैंड जैसे छोटे देश का भी नाम लिया जा सकता है जिसने इस दौर में अंग्रेजी साहित्य को जार्ज बर्नाड शॉ, विलियम बटलर येट्स, जेम्स ज्वाइस, जान सिंजे जैसे प्रतिभाशाली लेखक दिए।
   द्वितीय विश्व युद्ध के आसपास फ्रांस और जर्मनी में अस्तित्ववाद नामक विचारधारा का व्यापक प्रचलन हुआ जिसके तहत कुछ महत्वपूर्ण उपन्यास और नाटक लिखे गए। अस्तित्वादी लेखक के रूप में फ्रांस के दो लेखकों को अतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली। उनके नाम हैं - ज्यां-पाल सार्त्‍त (1905-80) और अलबेर कामू (1913-60)। सार्त्र का प्रसिद्ध उपन्यास है उबकाई (1938) और कामू का अजनबी (1942)। दोनों ही जीवन की निरर्थकता और मनुष्य के अजनबीपन का चित्रण करते हैं। अस्तित्ववादी साहित्य के प्रसंग में चैकोस्लोवाकिया के जर्मन लेखक फ्रान्ज काफ्का (1883-1925) का भी जिक्र किया जाता है। इसका प्रसिद्ध उपन्यास मुकदमा है जिसमें एक मामूली आदमी को अपराधी घोषित कर दिया गया है किन्तु उसे नहीं मालूम होता कि उसका अपराध क्या है और न यही मालूम होता है कि उसकी सुनवाई किस अदालत में होगी।
   नाटक और थिएटर के क्षेत्र में इस युग को एक बड़ा जर्मन साहित्यकार पैदा करने का गौरव प्राप्त है और उसका नाम है बर्टोल्ट ब्रेख्त (1898-1956)। ब्रेख्त एक समर्थ कवि भी हैं किन्तु विश्व में वे मदर करेज और खाड़िया का घेरा जैसे क्रांतिकारी नाटकों और ‘एपिक थिएटर’ तथा ‘एलियनेशन इफेक्ट’ जैसी मौलिक अवधारणाओं के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।

बीसवीं सदी का अमरीकी साहित्य

  आजाद होने के बाद उन्नीसवीं सदी में ही अमरीकी साहित्य ने वाल्ट विटमैन (1819-92) जैसे लोकतंत्र के मस्त गायक, हर्मन मेल्विल (1819-91) जैसे साहसिक उपन्यासकार और मार्क ट्वेन (1835-1910) जैसे प्रखर व्यंग्यकार के द्वारा अपनी अलग पहचान बना ली थी। किन्तु अमरीकी साहित्य का स्वंतत्र राष्ट्रीय व्यक्तित्व प्रथम विश्व युद्ध के बाद उभरा। भौतिक समृद्धि, औद्योगिक उन्नति और राजनीतिक शक्ति के कारण संयुक्त राष्ट्र अमरीका यूरोप के अनेक लेखकों और बुद्धिजीवियों के लिए आकर्षण का केन्द्र बन गया था। यूरोप से भागे हुए शरणार्थियों के लिए अमरीका सबसे बड़ा शरण स्थल था और द्वितीय विश्व युद्ध से पहले ही उनका तांता लगा हुआ था। देश-देश के इन लेखकों और स्थानीय रेड इंडियन मूल निवासियों तथा नीग्रो लोगों के मेल-जोल से संयुक्त राष्ट्र अमरीका में एक नया ‘सामंजस्य’ पैदा हो रहा था। इस प्रक्रिया में अमरीकी साहित्य का रंग समकालीन यूरोपीय साहित्य से भिन्न हो गया।
   अमरीकी उपन्यास में यथार्थवाद की वह परंपरा अब भी जीवित थी जबकि यूरोप उसे इस बीच छोड़ चुका था। थियोडोर ड्रेजर (1871-1945) का उपन्यास एक अमरीकी त्रासदी (1925) और जॉन स्टाइनबेक (ज. 1902) का उपन्यास क्रोध के अंगूर (1939) इस यथार्थवाद के ज्वलंत उदाहरण हैं। वस्तुतः यह बर्बर यथार्थवाद था जिसे बर्दाश्त करना यूरोप की भद्र रूचि के लिए संभव न था। विलयम फाकनर (1897-1962) के धुर दक्षिण के अज्ञात जीवन पर लिखे हुए उपन्यास भी अमरीका की ठेठ अपनी परंपरा के सूचक हैं। किन्तु इस दौर के जिस अमरीकी कथाकार को अतंर्राष्ट्रीय ख्याति मिली वह अर्नेष्ट हेमिंग्वे (1898-1961) है। खास तौर से ठंडे ढंग से हिंसा के चित्रण के लिए और संक्षिप्त वाक्यों वाली भाषा के लिए हेमिंग्वे का उपन्यास बूढ़ा मछेरा और समुद्र श्रेष्ठ माना गया है। किन्तु हेमिंग्वे का महत्व मुख्य रूप से उनकी कहानियों के कारण है।
   इन उपन्यासकारों के समान उत्तरी अमरीका में ठेठ अमरीकी रंग के कवि भी हुए जिनमें रॉबर्ट फ्रास्ट (1874) को उनकी सादगी तथा रोजमर्रा की जिंदगी के बिम्बों और प्रतीकों के कारण विशेष ख्याति मिली। टी. एस. इलियट और एजरा पाउंड भी पैदाइशी अमरीकी कवि हैं किंतु उनका कार्यक्षेत्र इंग्लैंड ही रहा और उनकी मानसिकता भी बहुत कुछ यूरोपीय थी। उनकी क्षतिपूर्ति के रूप में अमरीका को वैलेस स्टीवेंस (1879-1955) जैसे चिंतनशील और आधुनिकतावादी कवि मिला। अमरीकी आलोचकों की राय में विलयन कार्लोस विलियम्स (1833-1963) अमरीकी मिजाज का ज्यादा अपना कवि है और उसकी कविताएँ सही मायने में अमरीकी मिट्टी की उपज कही जा सकती हैं।
   1920 के दशक से एक महान सांस्कृतिक आंदोलन शुरू हुआ, जिसका संबंध अश्वेत-लोगों के आत्मगौरव के अधिकार को पुष्ट करना था। इस आंदोलन को हारलेम नवजागरण के नाम से जाना जाता है (हारलेम न्यूयार्क शहर की मलिन बस्ती है, जहाँ अधिकतर अश्वेत लोग रहते हैं)। इस आंदोलन ने बहुत से अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि, लेखक, विद्वान तथा संगीतकार पैदा किए। इनमें से दो थे - लौंग्स्टन ह्यूस (1902-67) जो कवि, कहानीकार तथा उपन्यासकार थे, दूसरे थे कवि क्लाउद मैक्के जो जमैका के रहने वाले थे, पर अमरीका में बस गए थे।
   द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उत्तरी अमरीका में एलेन गिंसबर्ग के नेतृत्व में बीटनिक कविता का उदय हुआ जिसकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नवीनतावादी काव्य की एक विशिष्ट प्रवृत्ति के रूप में काफी चर्चा है।
   साहित्य में अमरीका का महत्त्व वस्तुतः सर्जनात्मक साहित्य से ज्यादा साहित्यिक समालोचना के लिए है। एक कवि-आलोचक ने अमरीका में इसे समालोचना का युग कहा है जो उचित ही है। यह अमरीकी आलोचना ‘नई आलोचना’ के नाम से प्रसिद्ध है। साठ के दशक के बाद से अमरीका में साहित्य-सिद्धांत की चर्चा सबसे ज्यादा है और वह ‘डिकांस्ट्रक्शन’ कहलाती है। इसके फ्रेंच चिंतक ज्याक देरिदा हैं लेकिन उसके लिए सबसे उर्वर भूमि अमरीका के विश्वविद्यालय ही हैं।

बीसवीं सदी का लैटिन अमरीकी साहित्य

  लैटिन अमरीका के अतंर्गत दक्षिण अमरीका, मैक्सिको, निकारागुआ तथा कैरेबियन में क्यूबा आदि के देश आते हैं जो किसी समय स्पेन और पुर्तगाल के उपनिवेश थे। स्वभावतः इन देशों की साहित्यिक भाषा स्पेनिश और पुर्तगाली है। संयुक्त राष्ट्र अमरीकी की अपेक्षा कुछ बातों में लैटिन अमरीकी साहित्य यूरोप के काफी निकट होते हुए भी बहुत-सी बातों में अधिक अलग है। इसका एक कारण तो इन देशों का आर्थिक पिछड़ापन है और दूसरा कारण इनका भूगोल है। कुछ देश घने जंगलों और भयानक नदियों के कारण कटे-छँटे हैं तो कुछ में लंबे-चौड़े रेगिस्तान हैं। इन देशों में श्वेत लोगों की अपेक्षा अश्वेत आबादी का अनुपात भी काफी हैं। यहाँ सदियों पुराने मिथकों और किवदंतियों की परंपरा भी काफी सशक्त और जीवत है। इन तमाम बातों ने लैटिन अमरीकी साहित्य को विशिष्ट रंग दिया है।
   लैटिन अमरीकी साहित्य में आधुनिकतावादी आन्दोलन का अग्रदूत निकारागुआ का कवि रूबेन दारियो (1867-1916) है जिसने स्पेन के साहित्य को भी नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इसके साथ ही चिली के कवि ग्राबिएला मिस्त्राल (1889-1957) का नाम सबसे महत्त्वपूर्ण है। वस्तुतः लैटिन अमरीकी साहित्य विशेष रूप से कविता के लिए विख्यात है। लैटिन अमरीकी कवियों में जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की उनमें प्रमुख हैं - पेरू के चेसार वायेखो (1895-1938), चिली के पाब्लोनेरूदा (1904-1973), अर्जेनटीना के होर्खेलुइस बोर्खेस (1899-1984), क्यूबा के निकोलास गियें (ज.1902), मैक्सिको के ओक्तावियो पाज (ज. 1914) तथा निकारागुआ के अर्नेस्तो कार्देनाल (ज.1925)।
   लैटिन अमरीकन कथा साहित्य की भी अपनी अलग पहचान है। इस दृष्टि से अर्जेनटीना के कवि-कहानीकार होर्खे लुइस बोर्खेस की नीतिकथा शैली में लिखी हुई लघुकथाएँ तथा फंतासियाँ आधुनिक विश्व साहित्य में बेजोड़ मानी गई हैं।
   लैटिन अमरीकन उपन्यास को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने का श्रेय कोलम्बिया के लेखक गाब्रिअल गार्सिया मार्केस (ज. 1928) को है जिनका प्रसिद्ध उपन्यास ‘एकान्त के एक सौ साल’ अपने जादुई यथार्थवाद के कारण विशिष्ट माना जाता है।
   इस क्षेत्र के सबसे जाने-माने फ्रेंच भाषा के कवि एमि सिजयर (ज. 1913) हैं। उनका जन्म कैरीबियन में फ्रांसीसी उपनिवेश मार्तिनीक में हुआ था। कवि एमि सिजयर नेग्रीच्यूड आंदोलन के अग्रदूतों में से एक माने जाते हैं।
   लैटिन अमरीकन साहित्य में राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक न्याय का स्वर प्रबल है। अपनी क्रांतिकारी चेतना और रूपविधान की ताजगी के कारण यह साहित्य संसार की मुक्तिकामी जनता के लिए विशेष रूप से आकर्षक है।

बीसवीं सदी का सोवियत साहित्य

  सोवियत संघ में रूसी भाषा के अलावा बाल्टिक, काकेशियाई, मध्य एशियाई गणराज्यों की एक दर्जन से अधिक प्रमुख भाषाओं का विकसित साहित्य है और प्रत्येक साहित्य की अपनी लंबी परंपरा है। 1917 की समाजवादी क्रांति के बाद रूसी के साथ अन्य गणराज्यों की भाषाओं के साहित्य को भी फूलने-फलने के अवसर बढ़े। किन्तु इसके साथ ही यह भी सच है कि सोवियत साहित्य के प्रेरणा स्रोत मैक्सिम गोर्की (1868-1936) अपनी आवारा जिंदगी की कहानियों और माँ (1908) नामक उपन्यास के द्वारा पहले ही विश्व विख्यात हो चुके हैं। क्रांति के बाद भी उन्होंने उसी तरह के कुछ और उपन्यास लिखे किन्तु उनका अधिक समय सोवियत लेखकों को प्रोत्साहन देने तथा अन्य सांस्कृतिक कार्यों में बीता। वस्तुतः सोवियत रूस का प्रतिनिधि उपन्यास धीरे बहे दोन रे (1929) है जिसके लेखक मिखाइल शोलोखोव (1905-84) हैं। उपन्यास के समान ही कहानी की विधा में भी क्रांति के बाद श्रेष्ठ रचनाएँ हुईं जिनमें इसाक बाबेल (1894-1938) और इवान बनिन (1870-1953) की कहानियाँ क्लासिक का दर्जा हासिल कर चुकी हैं। किन्तु सच्चाई यह है कि बीसवीं सदी का रूसी कथा-साहित्य अपनी 19वीं सदी की ऊँचाई प्राप्त न कर सका। इलिया एहरनबर्ग (1891-1967) ने फासिस्टों द्वारा यूरोप के देशों पर किए गए आक्रमणों तथा द्वितीय विश्व युद्ध के बारे में उपन्यास लिखे। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सर्वश्रेष्ठ सोवियत लेखक किरगीजिया का चंगेज ऐतमातोव (ज.1928) है और श्रेष्ठ कहानीकार वंसीली शकसिन (1939-74)। अंतर्राष्ट्रीय ख्यात प्राप्त करने वाले उपन्यासकारों में साइबेरिया के दो लेखक विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। वालेंतीन रस्पूतिन (ज.1937) और विक्तर अस्ताफयेव (ज. 1924)।
   तुलनात्मक दृष्टि से बीसवीं सदी की रूसी कविता की स्थिति बेहतर है। बीसवीं सदी के आरंभ में रूसी कविता में अनेक प्रकार के नये प्रयोग हुए। इनमें अतिवादिता भी थी। किंतु उन प्रयोगवादी कवियों ने क्रांति के बाद प्रौढ़ होकर सार्थक कविताएँ लिखीं। इन कवियों में सबसे पहला नाम स्वभावतः अलेक्सांद्र ब्लाक (1880-1921) का है। क्रांति के स्वागत में उन्होंने जो वे बारह शीर्षक कविता लिखी वह उनकी अमर रचना है। ब्लादिमीर मायकोव्सकी (1894-1930) सोवियत क्रांति के प्रतिनिधि कवि हैं। अन्य विशिष्ट कवियों में बोरीस पास्तरनाक (1890-1960), आन्ना अख्मातोवा (1889-1966), मारीना त्स्वेतायेवा (1892-1941), ओसीप मंदेलस्ताम (1891-1938), सर्गेइ येसेनिन (1895-1925), के नाम विश्व स्तर पर मान्य हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की पीढ़ी के जिन रूसी कवियों को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली उनमें येवगेनी येवतुशेंको (ज. 1933) और आन्द्रेई वोजनेसेंस्की (ज. 1933) का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
   अब सोवियत संघ में आधिकारिक रूप से स्वीकार कर लिया गया है कि स्तालिन की दमन नीति के कारण 1926-53 के बीच तीन दशकों तक साहित्य-रचना को गहरी क्षति पहुँची। यह स्थिति स्तालिन की मृत्यु के बाद भी लगभग दो दशकों तक एक हद तक बनी रही। अलैक्जेन्डर सोलजेनित्सिन उन रूसी लेखकों में सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं जो स्वेच्छा से अथवा विवश होकर सोवियत संघ के बाहर रहते थे। उनको 1970 में नोबेल पुरूस्कार दिया था। वे अब भी अपने देश से बाहर रह रहे हैं। वे समाजवाद के विरोधी तथा रूसी और स्लाब राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रवर्तक हैं। पिछले दशक से ‘ग्लासनोस्त’ के कारण साहित्य सृजन में पूरी स्वतंत्रता मिली है और इसके फलस्वरूप नए सृजन के साथ ही अतीत की प्रतिबंधित रचनाएँ भी प्रकाश में आ रही हैं। इन मुश्किलों के बावजूद इसमें कोई संदेह नहीं कि बीसवीं सदी रूसी साहित्य गुण में यूरोप और अमरीका के समकालीन साहित्य से किसी तरह हेठा नहीं है, बल्कि कुछ बातों में अधिक जीवंत और ताजगी भरा है।

एशिया में साहित्य के विकास की दिशाएँ

  आधुनिक एशियाई साहित्य के विकास में यूरोप के हस्तक्षेप ने निर्णायक भूमिका अदा की है। आप एशिया और उत्तरी अफ्रीका के देशों पर यूरोपीय साम्राज्यवादी देशों के आधिपत्य के बारे में पहले ही पढ़ चुके हैं। इनमें से अधिकांश तो प्रत्यक्ष रूप से उनके अधीन थे। कुछ देश ऐसे थे, जैसे-चीन, उन पर साम्राज्यों का अप्रत्यक्ष रूप से अधिकार था। जापान ही एशिया काएक मुख्य ऐसा देश था, जो साम्राज्यों के आधिपत्य से मुक्त रहा। संस्कृति और साहित्य की दृष्टि से अपेक्षाकृत अधिक प्राचीन और समृद्ध होते हुए भी एशिया के देश यूरोपीय हस्तक्षेप के समय बहुत कुछ अवरूद्ध विकास के दौर से गुजर रहे थे। यूरोपीय हस्तक्षेप से एशिया के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में हरकत आई। आर्थिक लूट और राजनीतिक दमन के बावजूद एशिया के देशों का नए विज्ञान और टैक्नालॉजी से परिचय हुआ और औद्योगीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई। एक-एक कर एशियाई देशों में यूरोपीय शिक्षा-प्रणाली का प्रचलन हुआ और धीरे-धीरे एक ऐसे शिक्षित वर्ग का उदय हुआ जो अपनी भाषा के अलावा अंग्रेजी या फ्रैंच या और कोई यूरोपीय भाषा जानता था। आधुनिक एशियाई साहित्य के विकास की अगुवाई इस द्विभाषी शिक्षित वर्ग ने की। इसी नवशिक्षित वर्ग के नेतृत्व में एशियाई देशों में उन्नीसवीं सदी के अंत तथा बीसवीं सदी के आरंभ में वह नई सांस्कृतिक चेतना फैली जिसे आधुनिक पुनर्जागरण कहा जाता है।
   इस एशियाई पुनर्जागरण में कुछ योगदान यूरोप के प्राच्यविद्याविदों का भी है। यूरोप के विद्वानों ने पूर्वी देशों में प्राचीन पांडुलिपियों की खोज की और फिर उनका संपादन और प्रकाशन किया। यूरोपीय पुरातत्वविदों ने प्राचीन ऐतिहासिक अवशेषों की खुदाई की और इस तरह इतिहास की भूली-बिसरी कड़ियों को फिर से जोड़ने का प्रयास किया। ऐसी ही खुदाइयों की उपलब्धि है अंकोरवाट, हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, अजंता की गुफाएँ और दजला-फारात के नगर। यह भी इतिहास की एक विडम्बना है कि जो यूरोप एक ओर एशिया की प्राचीन समाज-व्यवस्था को तहस-नहस कर रहा था, वही प्राचीन खोदकर निकाल भी रहा था। इस प्रकार यूरोपीय प्राच्यविद्याविदों ने एक अपनी मन-पसंद ‘प्राच्य’ (ओरिएंट) और ‘प्राच्यवाद’ (ओरिएंटलिज्म) का मिथक निर्मित किया जिससे एशियाई साहित्य काफी दूर तक प्रभावित हुआ।
   पश्चिम के सम्पर्क की प्रतिक्रिया एशिया के प्रत्येक देश में अलग-अलग हुई, किन्तु एक बात सब में समान है कि पश्चिमी साहित्य को एकदम खारिज किसी ने नहीं किया। साहित्य की अपनी प्राचीन परंपरा से ग्राह्य तत्वों का पुनराविष्कार करने के साथ ही समर्थ लेखकों ने यूरोपीय साहित्य से भी वांछित रूपों को ग्रहण किया, जैसे कथात्मक गद्य के रूप में ‘‘नाबिल’’ और कविता के क्षेत्र में मुक्त छंद (फ्री वर्स)।
   किन्तु पाश्चात्य रूप विधान को अपनाते हुए एशियाई देशों में साहित्य ने अंतर्वस्तु स्वदेशी रखी। उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के आरंभ में यह अंतर्वस्तु थी राष्ट्रवाद। इसलिए इस दौर के सारे एशियाई साहित्य में राष्ट्रीय जागरण अथवा राष्ट्रीय मुक्ति का स्वर प्रधान है। इस क्रम में यदि अतीत का गौरव गान है तो उसके साथ ही प्राचीन रूढ़ियों के प्रति आत्म समीक्षा की भी दृष्टि हैं आधुनिक एशियाई साहित्य की एक विशेषता और है जो उसे लैटिन अमरीकी तथा अफ्रीकी साहित्य से एकदम अलग करती है। यूरोप के दबाव के बावजूद एशियाई देशों ने अपना साहित्य सृजन किसी यूरोपीय भाषा में न कर मुख्यतः अपनी ही भाषा में किया। एशियाई देशों मे अंग्रेजी या फ्रेंच में कविता कहानी या उपन्यास लिखने वाले अपवाद ही हैं, लैटिन अमरीका और अफ्रीका की तरह सामान्य नियम नहीं।

भारतीय साहित्य

  एशिया में राष्ट्रीय पुनर्जागरण की अभिव्यक्ति सबसे पहले भारतीय साहित्य में हुई और उसके प्रथम प्रतिनिधि साहित्यकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर (1861-1941) हैं। रवीन्द्र नाथ एशिया के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार (1913) हैं। स्पष्ट है कि अंतर्राष्ट्रीय ख्याति सबसे पहले उन्हीं को मिली। रवीन्द्रनाथ में प्राचीन भारतीय परंपरा और नवीन यूरोपीय चेतना का सुंदर समन्वय है। वे राष्ट्रीय जागरण के साथ ही विश्व मानववाद के श्रेष्ठ गायक हैं। साठ वर्षों की लंबी साहित्य साधना में रवीन्द्रनाथ ने कविता, कहानी, उपन्यास निबंध आदि गद्य-पद्य की सभी विधाओं में रचना की और प्रत्येक विधा में श्रेष्ठता का प्रतिमान स्थापित किया। नोबेल पुरस्कार उन्हें ‘गीतांजलि’ नामक छोटे से काव्य संग्रह पर मिला जिसकी कविताएँ मूलतः बंगला में लिखी गई थीं लेकिन उनका अंग्रेजी अनुवाद उन्होंने स्वयं किया। अंग्रेजी भाषा पर अधिकार होते हुए भी रवीन्द्रनाथ ने अपनी भाषा बंगला में ही सृजनशील साहित्य रचा, यह उनके राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रमाण है। रवीन्द्रनाथ ने भारतीय कविता को नए ढंग का ‘‘लिरिक’’ दिया। तीन खंडों में संकलित गल्पगुच्छ नामक पुस्तक की कहानियों के द्वारा उन्होंने भारत में आधुनिक कहानी की भी शुरूआत की जिसमें से कुछ कहानियाँ विश्व साहित्य में स्थान पाने योग्य हैं। उनके गोरा और घरेबाइरे शीर्षक उपन्यास भी श्रेष्ठ उपन्यासकार की प्रतिभा का आभास देते हैं। संगीत के क्षेत्र में भी रवीन्द्रनाथ ने मौलिक सृष्टि की जिसका प्रमाण रवीन्द्र संगीत है। वृद्धावस्था में उन्होंने चित्र रचना में भी नए प्रयोग किए जिन्हें आज भी चित्रकला-मर्मज्ञ उच्चकोटि की कलाकृति मानते हैं। रवीन्द्रनाथ की बहुमुखी प्रतिभा अनायास ही यूरोप के ‘‘रिनेसाँस’’ के मुकम्मल कलाकर की याद दिलाती है। वे भारतीय स्वाधीनता संघर्ष के अग्रदूत और आधुनिक भारतीय साहित्य के जनक थे इसलिए राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी उन्हें आदर से गुरूदेव कहते थे।

उपन्यास

  यूरोप के साथ भारत के सम्पर्क की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि ‘उपन्यास’ है जिसका जन्म भारतीय साहित्य में उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ही हो गया था और बंगला के प्रसिद्ध उपन्यासकार बंकिमचंद्र चटर्जी (1838-94) इस दौर के पहले महत्त्वपूर्ण लेखक हैं। उन्होंने अधिकांशतः ऐतिहासिक उपन्यास लिखे। इन उपन्यासों मे सबसे अधिक ख्याति ‘आनंदमठ (1882) को मिली-विशेष रूप से ‘वंदेमातरम्’ जैसे ओजस्वी राष्ट्रगीत के कारण।
   किन्तु विश्व उपन्यास में भारत की अपनी विशिष्ट पहचान बनाई उर्दु हिंदी के उपन्यासकार और कहानीकार प्रेमचंद (1880-1936) ने। उन्होंने भारतीय किसान को अपने उपन्यास का ‘हीरो’ बनाया और किसानों के दुख-दर्द तथा संघर्ष की यथार्थवादी गाथा लिखी। प्रेमचंद के दर्जन भर उपन्यासों में रंगभूमि (1924) और गोदान (1936) अमर कृतियाँ हैं तथा लगभग तीन सौ कहानियों में ‘कफन’, ‘पूस की रात’, ‘सवा सेर गेहूँ’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’ क्लासिक का दर्जा हासिल कर चुकी हैं।
   प्रेमचंद ने ग्राम जीवन के उपन्यासों की जो परंपरा कायम की उसे मजबूत करने वाले लेखकों में बंगला के तीन बनर्जी-विभूतिभूषण बनर्जी (1899-1954), ताराशंकर बनर्जी (1898-1971) तथा मानिक बनर्जी (1908-56) प्रमुख हैं। विभूतिभूषण के उपन्यास पथेर पांचाली (1929) को सत्यजित राय की फिल्म के द्वारा अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिल चुकी है। ताराशंकर के उपन्यास गणदेवता और मानिक के उपन्यास पदनादीर माझी का अनुवाद भी अनेक भाषाओं में हो चुका है। हिंदी में इस परंपरा को आगे बढ़ाया फणीश्वर नाथ रेणु (1921-77), ने अपने उपन्यास मैला आंचल (1954) के द्वारा, उछिया में गोपीनाथ महंती (ज. 1915) ने परजा के द्वारा, मलयालम में तकषी शिवशंकर पिल्लै (ज. 1912) ने मछुआरे के द्वारा, गुजराती में पन्नालाल पटेल (ज. 1918) ने मळेलाजीव के द्वारा, शिवराम कारंत (ज.1902) ने चोमन डुडि के द्वारा और मराठी में भालचंद्र नेमाडे (ज. 1938) ने कोसला के द्वारा। इस प्रकार ग्राम जीवन तथा अंचल विशेष के उपन्यास भारतीय भाषाओं में और भी लिखे गए हैं।
   मध्य वर्ग की सामाजिक और पारिवारिक समस्याओं को लेकर उपन्यास लिखने वालों में सबसे लोकप्रिय बंगला के उपन्यासकार शरतचंद्र चटर्जी (1876-1938) हैं। हिंदी में इस प्रकार के मनोवैज्ञानिक उपन्यास लिखने में सबसे अधिक ख्याति जैनेन्द्र कुमार (1905-88) को मिली। कन्नड़ में नैतिक अंतर्द्वद्व को लेकर लिखा हुआ प्रसिद्ध उपन्यास संस्कार है जिसके लेखक यू. आर. अनंतमूर्ति (ज.1932) हैं।
   1947 में भारत का विभाजन एक ऐतिहासिक ट्रेजिडी है जिसके बारे में उर्दू और हिंदी में कुछ अत्यंत उच्च कोटि के उपन्यास लिखे गए। इनमें हिन्दी में यशपाल (1903-73) का झूठा-सच (1958-1960) और उर्दू से कुर्रतुल-ऐन-हैदर का उपन्यास आग का दरिया (1961) सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।
   स्वाधीनता के बाद मराटी में ‘दलित लेखन’ का आंदोलन चला। इसके अंतर्गत दलित वर्ग के लेखकों ने समाज के सबसे निचले तबके के बारे में स्वानुभव पर आधारित कुछ बहुत मार्मिक उपन्यास लिखे। इन उपन्यासों में दया पवार (ज. 1935) का अछूत सबसे प्रसिद्ध है। दूसरे महत्त्वपूर्ण दलित लेखक बाबू राव बागुल (ज. 1931) हैं।

कहानी

  उपन्यास के साथ ही साथ भारत में आधुनिक ढंग की कहानी रचना का भी सूत्रपात हुआ। रवीन्द्रनाथ ठाकुर और प्रेमचंद के बाद कहानी विधा को जिन लेखकों ने समृद्ध किया उनमें यशपाल और जैनेन्द्र (हिन्दी) के अलावा मलयालम के वैकोम मुहम्मद बशीर (ज. 1914) और उर्दू के सआदत हसन मंटो (1912-35), राजेन्द्र सिंह बेदी (1915-84) और कृशन चंन्दर (1914-77) के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। स्वाधीनता के बाद भारतीय भाषाओं में पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से कहानी विधा में विशेष प्रगति हुई है और अनगिनत प्रतिभाएँ सामने आईं हैं।

कविता

  भारतीय भाषाओं में कविता की परंपरा बहुत लंबी और समृद्ध रही है। फिर भी पश्चिमी साहित्य के सम्पर्क में आधुनिक भारतीय कविता नई दिशाओं की और बढ़ी। बीसवीं सदी के आरंभ में भारतीय कविता में रोमांटिक उत्थान आया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर इस रोमांटिक आंदोलन के अग्रदूत थे और अंग्रेजी के वर्ड्सवर्थ और शैली जैसे रोमांटिक कवि प्रेरणा स्रोत। किन्तु भारतीय रोमांटिक कविता अंग्रेजी रोमांटिक कविता से इस बात में विशिष्ट थी कि इसमें सामंतवाद विरोध के साथ साम्राज्यवाद विरोध का स्वर भी समाविष्ट था। वस्तुतः भारत की रोमांटिक कविताएँ भारत के स्वाधीनता संग्राम की वाणी थीं। स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारत की सभी भाषाओं में श्रेष्ठ रोमांटिक कवि हुए। इनमें सबसे उल्लेखनीय हैं उर्दू के मुहम्मद इकबाल (1876-1938), हिंदी के निराला (1897-1961), बँगला के काजी नजरूल इस्लाम (1899-1976), मराठी के केशवसुत (1866-1905 ), मलयालम के जी. शंकर कुरूप (ज.1902)। तमिल के राष्ट्रवादी कवि सुब्रह्मण्य भारती (1882-1921) भी इसी दौर के श्रेष्ठ कवि हैं। सन् 1936 में प्रगतिशील साहित्य आंदोलन के कारण भारतीय कविता में परिवर्तन आया। कविता कल्पना के आकाश से नीचे उतरकर धरती पर आई और उसने भाव तथा भाषा दोनों स्तरों पर यथार्थवाद का रास्ता अपनाया। कविता प्रकृति और व्यक्तिगत प्रेम की सीमित दुनिया से बाहर निकलकर रोजमर्रा की जिंदगी और आम आदमियों के दुख दर्द को व्यक्त करने की दिशा में प्रवृत्त हुई। इसी समय कविता में नए प्रयोगों की भी शुरूआत हुई। प्रयोग की इस प्रवृत्ति में एक हद तक अंग्रेजी की इलियट-प्रवर्तित आधुनिकतावादी कविता की भी प्रेरणा थी। भारतीय भाषाओं में इस नई कविता के प्रमुख कवि हैं - हिंदी के अज्ञेय (1911-1987) और मुक्तिबोध (1917-64), उर्दू के मजाज (1909-55) और फ्रैज (1911-84), बँगला के जीवना नंद दास (1899-1954), मराठी के बी. एस. मर्ढेंकर (1907-56) और गुजराती के उमाशंकर जोशी (1911-87)।
   1947 में स्वाधीनता प्राप्ति के बाद नई कविता ने और भी प्रगति की। प्रतिभाशाली कवियों की पूरी एक नई पीढ़ी ने कविता के क्षेत्र में प्रवेश किया, जिसे अंग्रेजी अनुवाद के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली। इन कवियों मे रघुवीर सहाय और केदारनाथ सिंह (हिंदी), सुकान्त भट्टाचार्य और शक्ति चट्टोपाध्याय (बँगला), दिलीप चित्रे और अरूण कोल्हटकर (मराठी), रमाकांत रथ (उड़िया) के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

नाटक और रंगमंच

  पाश्चात्य नाटक और रंगमंच का परिचय पाकर भारत के नाटककारों और रंगकर्मियों ने अपनी प्राचीन नाट्य परंपरा को पुनर्जीवित करने के साथ ही पश्चिमी और पूर्वी शैलियों का समन्वय करके नए नाट्य प्रयोग की शुरूआत की। इस प्रयास में शेक्सपियर के अतिरिक्त मोलियर, इब्सन, चेखव और ब्रेख्त की प्रेरणा सबसे महत्त्वपूर्ण रही है। इस बीच लोकनाट्य की विभिन्न शैलियों का भी पुनरूद्धार और संस्कार किया गया। 1936 भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा) के संगठित प्रयास से लोकजागरण के लिए नए रंगमंच और नए नाटकों के निर्माण की दिशा में काफी प्रगति हुई। नाटक और रंगमंच के क्षेत्र में सबसे उल्लेखनीय कार्य बँगाल, महाराष्ट्र और कर्नाटक में हुआ। नए नाटककारों में सबसे महत्त्वपूर्ण हैं बादल सरकार (बँगला), विजय तेंदुलकर (मराठी) और गिरीश कर्नाड (कन्नड़)। रंगमंच के विकास में सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान शम्भू मित्र, इब्राहिम अल्काजी, श्रीराम लागू, बी. वी. कारंत, हबीब तनवीर और सत्यदेव दुबे का है।
   भारतीय अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक हैं मुल्कराज आनंद (ज. 1905), राजा राव (ज. 1909) और आर. के. नरायन (ज. 1906)।

चीनी साहित्य

  डॉ. सन यात-सेन (1866-1925) के नेतृत्व में 1911 में चीन में एक क्रांति हुई, जिसके फलस्वरूप राजशाही मांचूवंश का तख्ता पलट दिया गया और चीन को एक गणराज्य घोषित कर दिया गया। डॉ. सन यात-सेन की चीनी गणराज्य के पिता के रूप में प्रतिष्ठा हैं बाद में चीन में एक महान सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय आंदोलन शुरू हुआ जिसे चतुर्थ मई आंदोलन के नाम से जाना जाता है। इस काल में एक नए साहित्यिक आंदोलन की शुरूआत हुई जिसके नेता हू शिह (1891-1962) और चेन तु-सिउ (1879-1942) थे। उन्होंने पूर्ववर्ती कृत्रिम भाषा के स्थान पर ‘पाइ-हुआ’ अर्थात् ‘सीधी-सादी’ भाषा के प्रयोग पर बल दिया। चीनी साहित्य के लिए बोलचाल की भाषा का यह आंदोलन क्रांतिकारी सिद्ध हुआ। चीनी साहित्य के इतिहास में 1917-1937 का काल युगांतकारी माना जाता है। इस बीच चीन में राष्ट्रीयता की भावना का व्यापक प्रसार हुआ। एक ओर विज्ञान और टैक्नोलॉजी के साथ-साथ पश्चिमी यूरोप के आधुनिक विचारों से चीनी बुद्धिजीवी परिचित हो रहे थे तो दूसरी ओर रूस की समाजवादी क्रांति का भी प्रभाव पड़ रहा था। डॉ. सन यात-सेन ने कुमिंतांग नाम से जिस राष्ट्रवादी राजनीतिक पार्टी का गठन किया था उसमें कम्युनिस्ट भी शामिल थे। किन्तु 1925 में उनकी मृत्यु के बाद च्यांग काई शेक ने कम्युनिस्टों को निकालकर ही संतोष नहीं किया बल्कि उनके दमन का भी रास्ता अपनाया। स्वभावतः इस राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में चीनी बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों में भी विचारों के स्तर पर ध्रुवीकरण हुआ। कुछ का झुकाव पश्चिमी यूरोप की और था तो कुछ का सोवियत रूस और समाजवाद की ओर। इस दौर में चीनी साहित्य में जो प्रतिभा उभरकर सबसे ऊपर आई उसका नाम है लु शुन (1881-1936) उन्हें अक्सर जार्ज बर्नार्ड शॉ और मैक्सिम गोर्की का सम्मिलित रूप कहा जाता है। इसका कारण है उनका प्रखर व्यंग्य और जनसाधारण के लिए मानवीय करूणा। लु शुन के हाथों चीनी साहित्य में नए ढंग से यथार्थवादी कथा साहित्य की शुरूआत हुई। कोई उपन्यास उन्होंने नहीं लिखा लेकिन उनकी पागल की डायरी और आइ क्यू की कहानी विश्व कथा साहित्य में अद्वितीय और अमर कृतियाँ हैं। कहानियों के समान ही लु शुन के छोटे-छोटे व्यंग्यात्मक निबंधों ने भी जन-जागृति में क्रांतिकारी भूमिका अदा की थी।
   लु शुन की ही यथार्थवाद परंपरा को आगे बढ़ाने वाले उपन्यासकार और कहानीकार हैं माओ तुन (1896-1981) जो आगे चलकर समाजवादी चीन के संस्कृति मंत्री हुए। माओ तुन का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है अर्धरात्रि (1923) उन्होंने आगे चलकर 1927-28 मैं मोहभंग, दुविधा और खोज शीर्षक से एक त्रयी लिखी जो ग्रहण नाम से एक साथ प्रकाशित हुई। इसमें विदेशी आक्रमण, जमींदारी प्रथा, आर्थिक विपन्नता और राष्ट्रीय अव्यवस्था के दौर में विभिन्न सामाजिक वर्गों के व्यक्तियों की मनोदशा का अत्यंत यथार्थवादी चित्रण हुआ है।
   इसी वाम-पंथी परंपरा के महत्वपूर्ण कवि कुओ मो-जो (1892-1978) हैं जो आगे चलकर चीन की समाजवादी प्रथा के उप-प्रधान मंत्री पद पर आसीन हुए किन्तु चीन के सबसे महत्त्वपूर्ण क्रांतिकारी कवि वस्तुतः आइचिंग (ज. 1910) हैं, जिन्होंने 26 वर्ष की उम्र में 1936 में अपने प्रथम कविता संग्रह से चीनी कविता में क्रांति उपस्थित कर दी। इनके प्रेरणा स्रोत रैम्बो, मायकोब्सकी और विटमैन थे। स्वाधीन चीन में भी 1957 तक ये रचनारत रहे। किन्तु इसके बाद इन्हें राजनीतिक दृष्टि से संदिग्ध समझकर सुधार के लिए कम्यून में भेज दिया गया जहाँ बीस वर्षां तक उन्होंने तनहाई का जीवन बिताया। राजनीतिक स्थिति बदलने पर ये पुनः स्थापित हुए और इस बुढ़ापे में भी नए उत्साह से काव्य-सृजन कर रहे हैं। चीन के गैर-वामपंथी लेखकों में हू शिह (1891-1962) अंत तक समझौताहीन प्रयोगशील बने रहे। पा चिन (ज. 1905) की रूचि कन्फूशियन-परिवार के विघटन के चित्रण तक सीमित रही। इस प्रवृत्ति के लेखकों में आइलीन चाड़ के उपन्यास धान के अंकुर का गीत (1955) को पश्चिमी देशों में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है। इसी प्रकार छियेन-छुंग शू के उपन्यास घिरा हुआ शहर (1947) की भी काफी प्रशंसा हुई है। इस पीढ़ी के लेखक लाओ शू (1899-1966) सबसे महत्त्वपूर्ण हैं और उनका उपन्यास रिक्शावाला अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति पा चुका है।
   राजनीतिक उथल पुथल-विशेषतः सांस्कृतिक क्रांति के कारण चीनी साहित्य को काफी क्षति पहुँची। फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं कि चीन में बीसवीं सदी के दौरान उच्चकोटि के उपन्यासों, कहानियों और कविताओं की रचना हुई और इन रचनाओं से विश्व साहित्य समृद्ध हुआ।

जापानी साहित्य

  जापान में आधुनिक साहित्य का आंरभ मेजी पुनरूत्थान (1868) के साथ संबद्ध है। इस युग में पाश्चात्य साहित्य के साथ जापान के बुद्धिजीवियों और लेखकों का सम्पर्क हुआ। अंग्रेजी तथा अन्य यूरोपीय भाषाओं के साहित्य का अनुवाद बड़े पैमाने पर हुआ। साहित्य में बोलचाल की भाषा के प्रयोग पर बल दिया गया। शोयोत्सुबोउचि (1859-1935) का ग्रंथ उपन्यास के तत्व (1883) आधुनिक जापानी साहित्य की गीता माना जाता है। इस ग्रंथ के द्वारा उन्होंने उपन्यास में यथार्थवाद का महत्त्व रेखांकित किया। इसके साथ ही त्सुबोउचि ने स्वयं भी यथार्थवादी उपन्यास लिखकर उदाहरण प्रस्तुत किया।
   जापानी उपन्यास को कलात्मक परिपक्वता प्रदान करने का श्रेय मोरी ओगाई (1862-1922) को है। इस दौर के दूसरे महत्वपूर्ण उपन्यासकार नात्सु-मे तोसेकी (1867-1916) हैं। तोसेकी का उपन्यास मैं बिल्ली का बच्चा हूँ एक अध्यापक की पालतू बिल्ली की आत्मकथा है जिसमें मनुष्य की विसंगतियों और मध्य वर्गीय समाज के खोखलेपन पर तीखा व्यंग्य किया गया है। इनकी सबसे प्रसिद्ध कृति बोच्चान है जो एक स्कूल टीचर की आत्म कथा है।
   1912 से 1925 के बीच का काल जापानी साहित्य में ताइशो युग कहलाता है। रूस पर जापान की विजय के कारण जापान में जो आत्मविश्वास आया वह मानसिकता इस युग के साहित्य का मुख्य स्वर है। शिगा नाओया (1883-1971) के उपन्यास अंधेरी रात की राह को इस काल की सर्वश्रेष्ठ कृति कहा जा सकता है। 1926 में सम्राट हिरोहितो के राज्यारोहण के साथ जापानी साहित्य का शोवा युग शुरू होता है। 1928 में जापान मजदूर संगठन की स्थापना के साथ जापान में सर्वहारा साहित्य सृजन का जोर बढ़ा। विशेष बात यह है कि जापानी सर्वहारा साहित्य की रचना करने वालों में बहुत से लेखक स्वयं मजदूर वर्ग के हैं।
   1931 में मंचुरिया और 1932 में शंघाई में सैनिक हस्तक्षेप करने के साथ जापान में फासिस्ट शक्तियाँ बल पकड़ने लगीं। इस वातावरण में जापानी बुद्धिजीवियों को पीड़ा हुई। उसका चित्रण खूनोसुके आकुतागावा (1892-1937) की रचनाओं में मिलता है। शोवा युग के अवसाद और निराशा को कलात्मक रूप से प्रतिबिम्बित करने का काम ओसामू दाजाई (1909-1948) ने भी किया।
   जापानी कविता विश्व में ‘हाइकू’ के लिए प्रसिद्ध है जो एक अत्यंत प्राचीन काव्य रूप है। आधुनिक युग में नए जापानी कवियों ने हाइकू को नई संवेदना के साथ पुनर्जीवित किया। मासाओका शिकि (1867-1902) हाइकू के चार प्रमुख कवियों में एक माने जाते हैं। कविता के क्षेत्र में जापान में भी बीसवीं सदी के आरंभ में रोमांटिक उत्थान का दौर था।
   द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापानी साहित्यकारों में सबसे महत्वपूर्ण काफू नागाइ (1879-1959) और यासुनारि कावाबाता (1899-1972) हैं। कावाबाता को 1968 का नोबेल पुरूस्कार का सम्मान प्राप्त है।

अरबी तुर्की और फारसी साहित्य

  आधुनिक अरब कविता के रहनुमा अमीन रेहानी (1876-1940) और खलील जिब्रान (1883-1931) हैं जिन्हें ‘महजरी’ अथवा न्यूयार्क शायर कहा जाता है। इन्होंने इस्लाम-पूर्व और सूफी परंपरा के स्वप्नदर्शी कवि की अवधारणा को पुनर्जीवित किया। रेहानी ने वाल्ट विटमैन से प्रेरणा लेकर अरबी में मुक्त छंद और गद्य कविता की शुरूआत की। चालीस के दशक से अरबी कविता में चार धाराएँ दिखाई पड़ती हैं - (1) तफला (1947-57)-इसके प्रमुख कवि अल् सय्यब (1926-64) और अल् बयाती (1926) हैं। इसको इराकी स्कूल भी कहते हैं। अल् बयाती इराकी कम्युनिस्ट पार्टी से संबद्ध थे। इनकी बारिश का गीत बहुत मशहूर है। (2) मजल्लत शेर तहरीक (1957-67) - इसे सीरिया स्कूल भी कहते हैं। इसके सभी शायर अरब क्रिश्चियन हैं। (3) हुजैराँ तर्जवा (1967-82) - इसे जून का अनुभव भी कहते हैं। इजरायल के हाथों अरब की अपमानजनक हार इस दौर की कविता का मुख्य विषय है। इस दौर के सबसे महत्त्वपूर्ण शायर फिलिस्तीनी कवि मोहम्मद दरवेश (1942) हैं, जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है। (4) बेरूत तजर्बा (1982)। जून 1982 में इजरायल ने लेबनान पर हमला करके बेरूत पर कब्जा कर लिया था। इस दर्द को जिन कवियों ने वाणी दी उनका संबंध इस दौर से माना जाता है। अरबी कविता के इन सभी युगों से अरब जाति की प्रबल राष्ट्रीय भावना का अहसास होता है।
   नए तुर्की साहित्य के अग्रदूत और सबसे बड़े कवि तौफीक फिक्रत (1887-1915) हैं। विज्ञान में उनकी आस्था थी और वे अपने जमाने की बुराइयों के कट्टर आलोचक थे। कमाल अतातुर्क ने जब तुर्की गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति की हैसियत से तुर्की में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरू की तो उनका ध्यान तुर्की भाषा के सुधार की ओर भी गया। उन्होंने 1932 में तुर्की भाषा वैज्ञानिक सोसाइटी की स्थापना की और इस सोसाइटी के द्वारा उन्होंने बोलचाल की तुर्की का प्रचलन किया और लैटिन लिपि को मान्यता दी। यहाँ से तुर्की साहित्य में एक क्रांतिकारी दौर की शुरूआत हुई। इस दौर के सबसे क्रांतिकारी तुर्की कवि नाजिम हिकमत (1902-63) हैं जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई। उनकी जिंदगी का ज्यादा समय जेल और देश निकाला की सजा भुगतते हुए सोवियत रूस में बीता। तुर्की कविता पर भी पश्चिम की आधुनिकतावादी कविता का असर पड़ा। इस असर के सबसे महत्त्वपूर्ण कवि ओहिनिवेली कनिक (1914-50) हैं। तुर्की ने पचास के दशक में ‘किसान’ कवियों को भी पैदा किया जिनमें सबसे उल्लेखनीय मोहम्मद बशरन (ज. 1926) हैं। तुर्की के युवा कवियों में सबसे प्रयोगशील सजाइ करकोच (ज. 1933) हैं। उन्होंने अनेक फ्रेंच कविताओं का अनुवाद किया है। वे अपने धार्मिक विश्वासों में परंपरावादी हैं। किन्तु कविता की तकनीक में सर्रियलिस्ट हैं। क्रांतिकारी कवियों की नवीनतम धारा के सबसे होनहार कवि अताओल बहरामलू (ज. 1942) हैं।
   ईरान में आधुनिक फारसी कविता के अग्रदूत नीमा योशेच (1896-1959) हैं। इन्होंने फ्रेंच राज्य क्रांति के विचारों से प्रेरणा लेकर ईरान में क्रांतिकारी भावना फैलाने का प्रयास किया। कारे शबेपा इनकी प्रसिद्ध कविता है जिसके केन्द्र में आम आदमी है। नीमा की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले समकालीन फारसी के सबसे बड़े कवि अहमद शामलू (ज. 1925) हैं। अपने कम्युनिस्ट विचारों के लिए शामलू को कई बार जेल की सजा भुगतनी पड़ी। उन्होंने फारसी में आजाद बह्र का प्रचलन किया। ईरान के नाविल-निगारों में दो लेखक सबसे महत्त्वपूर्ण हैं - एक तो बुर्जुग अलवी जो प्रगतिशील विचारों के हैं और उनका नाविल चश्मेहा काफी मशहूर है। दूसरे उपन्यासकार हैं-सादिक हिदायत (1903-51), जो कुछ-कुछ अस्तित्ववादी विचारधारा से प्रभावित हैं। इन्होंने फन्तासी शैली में मनोवैज्ञानिक उपन्यास लिखे हैं अंग्रेजी में उनके एक उपन्यास का अनुवाद अंधा उल्लू (द ब्लाइंड आउल) शीर्षक से हुआ है। तमाम पाबंदियों के बावजूद ईरान में महिला लेखिकाओं का भी उदय हुआ जो अपने विचारों में काफी क्रांतिकारी हैं। ऐसी लेखिकाओं में सबसे महत्त्वपूर्ण नाम फरोग फर्रूखजाद (1934-66) का है। शुरू के पचास बर्षो तक शाह के तानाशाही शासन के बाद अयातुल्ला खुमैनी के धार्मिक कठमुल्लापन के कारण ईरान में शायरों और लेखकों को इतनी पाबंदियों का सामना करना पड़ा कि इतनी शानदार और लंबी साहित्यिक परंपरा के बावजूद आधुनिक फारसी साहित्य विशेष विकास न कर सका। इतना ही नहीं इन मुसीबतों के बीच ईरान में जो कुछ महत्त्वपूर्ण लिखा गया उसकी जानकारी भी बाहरी दुनिया को पूरी-पूरी न मिली।

अफ्रीकी साहित्य

  विश्व रंगमंच पर अफ्रीकी साहित्य का प्रवेश द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हुआ। अफ्रीका में उपनिवेशवाद और रंगभेद के विरूद्ध असंतोष का आरंभ बीसवीं सदी के प्रथम दशक में ही हो गया था। भारतीय नागरिक मोहनदास करमचंद गाँधी दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजी दमन के विरूद्ध आवाज उठाने वाले पहले व्यक्ति थे। प्रथम विश्व युद्ध के बाद पूर्वी अफ्रीका में जोमो केन्याटा ने अफ्रीकी राष्ट्रवाद का नेतृत्व किया था किन्तु राष्ट्रीयता की लहर संपूर्ण अफ्रीका में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ही प्रबल हुई। इस राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख नेता घाना के क्वामे न्यूक्रूमा थे उन्होंने ही सबसे पहले ‘‘आजादी अभी’’ का नारा दिया। अफ्रीकी राष्ट्रवाद का प्रमुख स्वर उपनिवेशवाद-विरोधी था। यह उपनिवेशवाद विरोध अफ्रीकी बुद्धिजीवियों ने किया। अफ्रीकी जागरण का नेतृत्व पश्चिमी शिक्षा प्राप्त अफ्रीकी बुद्धिजीवियों ने किया। अफ्रीकी साहित्य एशिया साहित्य से इस बात में भिन्न है कि अफ्रीकी साहित्य का माध्यम सामान्यतः फ्रेंच, अंग्रेजी, पोतुगीज या यूरोपीय भाषा ही रहीं। लियोपोल्ड सेदोर सेंगोर (ज. 1906) पहले अफ्रीकी साहित्यकार हैं जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली। 1960 में जब सेनेगल फ्रांसीसी अपनिवेशवाद के शिकंजे से मुक्त हुआ तो सेंगोर उसके प्रथम राष्ट्रपति भी चुने गए। उन्हें फ्रैंच में लिखने वाले सबसे बड़े अफ्रीकी कवि के रूप में मान्यता मिली। उन्हें ‘‘नेग्रीच्यूड’’ का मसीहा कहा गया। सेंगोर के अनुसार ‘‘नेग्रीच्यूड’’ की भावना को व्यक्त करने वाली प्रतिनिधि अफ्रीकी कविताओं का एक संकलन भी प्रकाशित किया जिसकी भूमिका प्रसिद्ध फ्रांसीसी साहित्यकार ज्यां पाल सार्त्र ने लिखी थी। सेनेगल के ही दूसरे महत्वपूर्ण उपन्यासकार सेम्बीन उस्मान (ज. 1923) हैं जिन्होंने अपने यथार्थवादी उपन्यासों, कहानियों और विशेषतः फिल्मों के द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अफ्रीकी पहचान की स्थापना की। उस्मान ने साहित्य में इस स्तर तक पहुँचने के लिए लंबा संघर्ष किया। शुरू-शुरू में एक मछुआरे थे फिर गोदी मजदूर और उसके बाद ट्रेड यूनियन नेता। वे फ्रांस की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य भी थे। उस्मान एक कमिटेड लेखक हैं। उन्होंने अफ्रीकी उपन्यास को गतिशील यथार्थवाद प्रदान किया। लमन्दा और जाला शीर्षक उपन्यासों और इन्हीं उपन्यासों पर स्वंय उन्हीं द्वारा बनाई गई फिल्मों को विशेष ख्याति मिली है।
   दक्षिण अफ्रीका के साहित्यकारों में दो नाम सबसे प्रसिद्ध हैं। कवि डेनिस ब्रूटस (ज. 1924) और उपन्यासकार अलेक्स ला गुमा (ज. 1925) दक्षिण अफ्रीका की श्वेत सरकार की सख्त रंगभेद नीति के कारण साहित्यकारों को अनेक प्रकार की यातनाओं से गुजरना पड़ा है। जेल की सजा और देश-निकाला आम बात है। इन कठिन स्थितियों ने दक्षिण अफ्रीकी साहित्य को सबसे ज्यादा जुझारू किया है। स्वभावतः वहाँ के सभी कवि राजनीतिक संघर्ष में भाग लेने वाले सक्रिय कार्यकर्ता हैं। डेनिस ब्रूटस की कविताएँ भी जेल और देश-निकाले के इन्ही अनुभवों की अभिव्यक्ति हैं। पीड़ा की सच्ची अनुभूति और बिम्बों की ताजगी के कारण ये कविताएँ समकालीन अंग्रेजी कविता की अमूल्य निधि मानी जाती हैं।
   ला गुमा दक्षिण अफ्रीकी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य और प्रतिबद्ध उपन्यासकार हैं। अपने प्रथम उपन्यास ए वाक् इन दि नाइट (1962) के प्रकाशन के साथ ही वे मशहूर हो गए। उन्होंने अनेक मार्मिक कहानियाँ भी लिखी हैं जो ज्यादातर ब्लैक अर्फियस पत्रिका में छपी हैं। ला गुमा को 1973 में अफ्रीकी एशियाई लेखक संघ ने साहित्य का लोटस पुरस्कार देकर सम्मानित किया था।
   नाइजीरिया संभवतः साहित्य सृजन में सभी अफ्रीकी देशों से आगे है। लेखकों की संख्या भी अधिक और कृतियाँ भी अधिक प्रकाशित हुई हैं। नोबेल पुरस्कार वैसे तो काफी विवादास्पद हो चुका है फिर भी अफ्रीका में साहित्य का पहला नोबेल पुरूस्कार पाने का गौरव नाइजीरिया के अंग्रेजी कवि, नाटककार और उपन्यासकार वाले शोयेंका (1934) को ही प्राप्त हुआ। उनके अनेक नाटक ब्रिटेन में खेले गए हैं और अनेक उपन्यास इन्टरप्रेटर्स की प्रशंसाकारी समीक्षाएँ प्रकाशित हुई हैं। चिनुआ अचेबे (1930) नाइजीरिया के दूसरे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार हैं जिन्होंने अपने उपन्यासों, कहानियों, लेखों और भाषणों से अफ्रीकी साहित्य को मान्यता दिलाने में अहम भूमिका निभाई है और कुछ लोगों की राय में अचेबे शोयेंका से ज्यादा बड़े लेखक हैं।
   अचेबे के मुख्य उपन्यास हैं थिन्गस फाल एपार्ट (1958) और ए मैन ऑफ दि पिपुल (1966)। उनका एक कहानी संग्रह काफी चर्चित हुआ है-गर्ल्स ऐट वार एण्ड अदर स्टोरीज (1922)। उन्होंने कविताएँ भी लिखी हैं और बिवेयर सोल एंड ब्रदर्स (1971) नाम से कविता संग्रह प्रकाशित भी हुआ है। अफ्रीकी साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए अचेबे ओकिके नामक एक साहित्यिक पत्रिका भी निकालते हैं। हाइनेमन एजुकेशनल बुक्स के अफ्रीकन राइटर सीरीज के संपादकीय सलाहकार की हैसियत से उन्होंने अफ्रीकी साहित्य के प्रकाशन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
   गैब्रिएल ओकारा (1921) नाइजीरिया के अग्रणी कवि हैं। इनका कविता संग्रह दि फिसर मैन्स इन्वोकेशन (1978) को कामन वेल्थ पोइट्री प्राइज का सम्मान (1979) प्राप्त हैं। ओकारा ने अंग्रेजों में अपनी स्थानीय बोली का मिश्रण करके भाषा के अनूठे प्रयोग किए हैं। उनकी कविता में अफ्रीकी मौखिक परंपरा की गूँज सुनाई पड़ती है।
   क्रिस्टोफर ओकिबो (1932-67) नाइजीरिया के ऐसे क्रांतिकारी कवि हैं जो नाइजीरियाई गृह युद्ध के दौरान बियाफरा की फौज में मेजर की हैसियत से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
   नाइजीरिया में उनके बारे में अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। अचेबे और शोयेंका जैसे लेखकों ने उनकी स्मृति में अपनी रचानाएँ समर्पित की हैं। कीनिया के सबसे महत्त्वपूर्ण और क्रातिकारी लेखक हैं गुगी वा थियांगो (1938)। अपने लेखन के लिए उन्होंने स्वाधीन कीनिया में जेल की सजा भी काटी और देश-निकाला भी भोगा। पिछले बारह वर्षों से इंग्लैंड में शरणार्थी की तरह जीवन बिता रहे हैं क्योंकि उन्हें स्वदेश आने की अनुमति नहीं है। अपने प्रथम उपन्यास वीप नाट, चाइल्ड के प्रकाशन (1964) के साथ ही गुगी ने अपनी विशिष्ट पहचान बना ली। उनके अन्य प्रसिद्ध उपन्यास है - दि रीवर बिटवीन, ए ग्रेन ऑफ व्हीट और पेटल्स ऑफ ब्लड (1977)। एक अन्य लेखक गुगी वा मिरी के साथ मिलकर इन्होंने एक नाटक आई विल मैरी ह्वेन आई वांट लिखा जो रंगमंच की प्रस्तुति पर इतना उत्तेजक प्रमाणित हुआ कि कीनिया सरकार ने उसके प्रदर्शन पर रोक लगा दी। अफ्रीकी लेखकों में गुगी संभवतः सबसे क्रांतिकारी हैं।
   मेजा मवांगी (1948) गुगी के बाद दूसरी पीढ़ी के सबसे जागरूक लेखक हैं। मवांगी का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है किल मी क्विक (1973)। इस पर उन्हें 1974 का ‘‘केन्याटा पुरस्कार’’ मिला। इसमें उन्होंने अपनी पीढ़ी के गरीबों और दलितों की समस्याओं का चित्रण किया। गुगी से अपना अंतर स्पष्ट करते हुए मवांगी ने लिखा है कि उन्होंने माउ-माउ में सक्रिय लोगों की निजी दुख गाथा लिखी है जबकि मैंने निःसंग मशीन के उद्घाटन का प्रयास किया है। मवांगी के अन्य उपन्यास हैं। केरकेस फॉर हाऊँड्स, गोइंग डाउन रिवर रोड, काकरोच डांस। अफ्रीका के अधिकांश देशों के स्वाधीन हो जाने के बाद अफ्रीकी साहित्य की विषय वस्तु में जबर्दस्त परिवर्तन आया है। औपनिवेशिक अनुभव और सांस्कृतिक संघर्ष अब अफ्रीकी साहित्य के मुख्य विषय नहीं रहे। नया अफ्रीकी साहित्य देश के अंदर के शत्रुओं से संघर्ष कर रहा है। कुछ देशों में उपन्यास गाँव से हटकर शहर की और उन्मुख हो रहा है और कुछ देशों के साहित्य में साधारण जनता के असंतोष और विद्रोह को अधिक प्रखरता से व्यक्त किया जा रहा है।
   अफ्रीकी साहित्य में साहित्य की माध्यम भाषा को लेकर भी एक नया आंदोलन शुरू हो चला है। गुगी जैसे कुछ लेखकों ने अंग्रेजी, फ्रैंच आदि यूरोपीय भाषाओं को छोड़कर अफ्रीका की अपनी स्थानीय भाषाओं में साहित्य-रचना की पहल की है। इस प्रकार स्वयं अफ्रीकी भाषाओं में भी साहित्य सृजन का आंदोलन चल पड़ा है।