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विजय नगर और बहमनी साम्राज्य तथा भारत में पुर्तगालियों का आगमन
विंध्याचल के दक्षिण में, भारत पर 200 वर्षां से अधिक समय तक विजयनगर और बहमानी राज्यों का प्रभुत्व रहा। उन्होंने विशाल राजधानियों और नगरों का निर्माण करने व उनको भव्य भवनों एवं अट्टालिकाओं से सजाने के अतिरिक्त कला और साहित्य को भी प्रोत्साहन दिया। यही नहीं उन्हें राज्य में शान्ति व व्यवस्था बनाये रखने एवं व्यापार तथा हस्तशिल्पकलाओं को बढ़ावा देने का भी श्रेय है। कानून और व्यवस्था बनाये रखी, व्यापार तथा हस्तशिल्प का विकास किया, कला और साहित्य को प्रोत्साहन दिया तथा अपनी राजधानियों को सुन्दर बनाया। इस प्रकार उत्तर भारत में जबकि विघटनकारी शक्तियाँ धीरे-धीरे विजयी हुर्इ, दक्षिण भारत और दकन में लम्बे समय तक स्थिर शासन की स्थिति बनी रही। स्थिरता के इस दौर की समाप्ति पन्द्रहवी शताब्दी के अन्त में बहमनी साम्राज्य के विघटन से और उनके पचास-साठ वर्षों के बाद 1565 की बन्निहट्टी की लड़ाई में पराजय के बाद विजयनगर साम्राज्य के टूटने से हुआ। इस बीच भारत की परिस्थितियों में आमूल परिवर्तन आया। इस परिवर्तन के दो कारण थे। पहला, समुद्री मार्ग से यूरोपवासियों (पुर्तगालियों) का पश्चिम भारत में आगमन तथा भारतीय समुद्री पर अपना आधिपत्य जमाने का प्रयास व दूसरा उत्तरी भारत में मुगलों का आगमन। मुगलों के आगमन से उत्तर भारत में एक बार पुनः एकता के दौर का सूत्रपात हुआ। पर साथ ही भूमि आधारित एशियाई शक्तियों और समुद्र पर प्रभुत्व रखने वाली यूरोपीय शक्तियों के मध्य एक लम्बे संघर्ष का भी सूत्रपात हुआ।
विजयनगर साम्राज्य-स्थापना और बहमनी साम्राज्य के साथ संघर्षविजयनगर साम्राज्य की स्थापना पाँच भाईयों वाले परिवार के दो सदस्यों हरिहर और बुक्का ने की थी। किवंदतियों के अनुसार वे वारंगल के कैकतियों के सामंत थे और बाद में आधुनिक कर्नाटक में काम्पिली राज्य में मन्त्री बने थे। जब एक मुसलमान विद्रोही को शरण देने पर मुहम्मद तुगलक ने काम्पिली को रौंद डाला, तो इन दोनों भाईयों को भी बंदी लिया गया। इन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया और तुगलक ने इन्हें वहीं विद्रोहियों को दबाने के लिए नियुक्त कर दिया। तब मदुरई के एक मुसलमान प्रान्तीय प्रशासक ने स्वयं को स्वतन्त्र घोषित कर दिया था और मैसूर के होइसल और वारंगल के शासक भी स्वतन्त्र होने की कोशिश कर रहे थे। कुछ समय बाद ही हरिहर और बुक्का ने अपने नये स्वामी और धर्म को छोड़ दिया। उनके गुरु विद्यारण के प्रयत्न से उनकी शुद्धि हुई और उन्होंने विजयनगर में अपनी राजधानी स्थापित की। हरिहर के राज्यारोहण का समय 1336 ई. निर्धारित किया गया है।शुरु में इस नये राज्य को मैसूर के होइसल राजा व मदुरई के सुल्तान का मुकाबला करना पड़ा। मदुरई का सुल्तान महत्वाकांक्षी था। एक लड़ाई में उसने होइसल राजा को हरा दिया और उसे बर्बर तरीके से मार डाला। होइसल राज्य का पतन होने पर हरिहर और बुक्का को अपनी छोटी सी रियासत के विस्तार का मौका मिला। होइसल का सारा प्रदेश 1346 तक विजयनगर के अधिकार में आ गया था। इस लड़ाई में हरिहर और बुक्का के भाईयों ने उनकी मदद की थी और उन्होंने अपने सम्बन्धियों के साथ मिल कर जीते हुए प्रदेश का प्रशासन सम्भाल लिया। इस प्रकार, प्रारंभ में विजय नगर साम्राज्य एक प्रकार का सहकारी शासन था। जो किसी एक व्यक्ति के हाथ में सन्निहित नहीं था वरन् इसमें कई लोगों की भागीदारी थी। बुक्का 1356 में अपने भाई का उत्तराधिकारी बना और उसने 1377 तक राज्य किया। विजयनगर की शक्ति में विस्तार के कारण अन्य राज्यों के साथ संघर्ष अवश्यंभावी था। उसे दक्षिण और उत्तर दोनों ओर संघर्ष करना पड़ा। दक्षिण में उनके प्रमुख शत्रु मदुरई के सुल्तान थे। मदुरई और विजयनगर के बीच लगभग चार दशकों तक युद्ध की स्थिति बनी रही। 1377 तक मदुरई की सल्तनत का अस्तित्व मिटा दिया। विजयनगर साम्राज्य का प्रसार अब सारे दक्षिण भारत, रामेश्वरम् तक हो गया इसमें तमिल व चेरा (केरल) के प्रदेश भी सम्मिलित थे। उत्तर में विजयनगर को बहमनी सल्तनत जैसे सशक्त प्रतिद्वन्दी का सामना करना पड़ा। बहमनी राज्य की स्थापना 1347 में हुई थी। इसका संस्थापक एक महत्वाकांक्षी अफगान अलाउद्दीन हसन था। उसने एक ब्राह्मण गंगू की सेवा में रह कर शक्ति बढ़ाई थी। इसलिए उसे हसन गंगू कहा जाता है। राज्यारोहण के बाद उसने अलाउद्दीन हसन बहमन शाह की उपाधि धारण की। कहा जाता है कि वह अपने को अर्द्ध-पौराणिक ईरानी योद्धा बहमन शाह का वंशज मानता था, किन्तु लोक श्रुतियों के अनुसार बहमन शाह उसके ब्राह्मण आश्रयदाता के प्रति आदर का प्रतीक था। इसके पीछे तथ्य कोई भी हो, यह निश्चित है कि इस उपाधि के कारण राज्य को बहमनी साम्राज्य कहा गया। विजयनगर के शासकों और बहमनी सुल्तानों के स्वार्थ तीन अलग-अलग क्षेत्रों तुंगभद्रा दोआब, कृष्णा-कावेरी घाटी और मराठवाड़ा में टकराये। तुंगभद्रा दोआब कृष्णा और तुंगभद्रा नदी के बीच का क्षेत्र था। अपनी आर्थिक संपदाओं के कारण यह क्षेत्र पूर्वकाल में पश्चिमी चालुक्य और चोलाओं के बीच तथा बाद के समय में यादवों और होइसलों के बीच संघर्ष का क्षेत्र बना रहा। कृष्णा-गोदावरी क्षेत्र जो बहुत उपजाऊ था और जो अपने क्षेत्र में फैले असंख्य बंदरगाहों के कारण उस क्षेत्र के विदेश व्यापार पर नियंत्रण रख सकता था। संघर्ष बहुधा इन दोनों ही क्षेत्रों पर अधिकार के लिये होता था। मराठा प्रदेश की लड़ाई हमेशा कोंकण व उस क्षेत्र पर नियंत्रण के लिये होती थी, जहाँ से कोंकण का मार्ग था। कोंकण पश्चिमी घाट और समुद्र के बीच की पतली भू-पट्टी था। यह बहुत उपजाऊ क्षेत्र था और प्रदेश में बनने वाली वस्तुओं के निर्यात और ईराकी तथा ईरानी घोड़ों के आयात के लिए एक महत्वपूर्ण बन्दरगाह गोआ भी इसी में था। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, अच्छी नस्लों के घोड़ों भारत में नहीं मिलते थे। अतः दक्षिणी राज्यों के लिए गोआ के रास्ते घोड़ों का आयात बहुत महत्वपूर्ण था। विजयनगर और बहमनी साम्राज्यों के बीच सैनिक संघर्ष एक आम बात हो गई थी। वस्तुतः यह संघर्ष तब तक चलता रहा जब तक कि ये दोनों राज्य बने रहे। ये सैनिक संघर्ष उन क्षेत्रों के, जिनके लिये युद्ध लड़ा जाता था, आसपास के क्षेत्रों के लिए भयंकर विनाश का कारण बनते थे। इससे जान-माल का भी बहुत नुकसान होता था। दोनों पक्ष शहरों और गाँवों को रौंद डालते थे, उन्हें जला देते थे, पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों को पकड़कर दासों के रूप में बेच देते थे तथा और भी कई तरह की बर्बरता से काम लेते थे। 1367 में तुंगभद्रा-दोआब के मुद्दे को लेकर बुक्का प्रथम ने मुद्कल के किले पर चढ़ाई की तो उसने एक आदमी को छोड़ कर सभी को कत्ल कर डाला। जब यह समाचार बहमनी सुल्तान के पास पहुँचा, तो उसे बहुत क्रोध आया और उसने तुरन्त कूच कर दिया। मार्ग में उसने प्रतिज्ञा की कि जब तक बदले में एक लाख हिन्दुओं का खून नहीं कर लूँगा, तलवार को म्यान में नहीं रखूँगा। वर्षा का मौसम और विजयनगर की सेना के कड़े मुकाबले के बावजूद वह कृष्णा नदी पार करने में सफल हुआ और उसने मुद्कली पर पुनः अधिकार कर लिया। फिर उसने तुंगभद्रा नदी पार की। यह पहला मौका था जब किसी बहमनी सुल्तान ने स्वयं विजयनगर की सीमा में पैर रखा था। विजयनगर का राजा लड़ाई में हार गया और जंगलों में जाकर छिप गया। कहा जाता है कि इसी लड़ाई में सबसे पहले दोनों ही पक्षों द्वारा तोपखाने का प्रयोग हुआ था। बहमनी सुल्तान की जीत इसलिए हुई थी क्योंकि उसके पास बेहतर किस्म का तोपखाना और घुड़सवार सेना थी। लड़ाई कई महीनों तक चलती रही, लेकिन बहमनी सुल्तान न तो राजा को पकड़ सका और न ही उसकी राजधानी को जीत सका। इस दौरान पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों का व्यापक स्तर पर कत्ले आम चलता रहा। आखिर दोनों पक्ष थक गए और उन्होंने सन्धि का फैसला किया इस सन्धि के अन्तर्गत दोनों पक्ष अपनी पुरानी सीमाओं पर लौट गए किन्तु दोआब का प्रदेश दोनों के बीच बँट गया। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण तथ्य दोनों पक्षों द्वारा युद्ध में क्रूरता का परित्याग करने के सिलसिले में निर्णय लिया गया था। दोनों ही पक्षों ने स्वीकार किया कि चूँकि दोनों ही राज्य एक लम्बे अरसे तक पड़ोसी रहेंगे, अतः युद्ध में असहाय और निहत्थे लोगों का वध न किया जाये। हालाँकि इस संधि का उल्लंघन कई बार किया गया, परन्तु इससे दक्षिण भारत में युद्धों को अधिक मानवीय बनाने की सहायता अवश्य मिली। मदुरई की सल्तनत को मिटा कर दक्षिण में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर लेने के बाद, हरिहर द्वितीय (1377-1405 ई.) के नेतृत्व में विजयनगर साम्राज्य ने पूर्व में विस्तार की नीति अपनाई। इस क्षेत्र में कई छोटी-छोटी स्वतन्त्र हिन्दू रियासतें थीं। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण डेल्टा के ऊपरी भागों में रेड्डियों की रियासत और कृष्णा-गोदावरी डेल्टा के निचले हिस्से में वारंगल राज्य था। उत्तर में उड़ीसा के राजा तथा पूर्व में बहमनी सुल्तानों की रूचि भी इस क्षेत्र में थी। हालाँकि वारंगल के शासक ने दिल्ली सुल्तान के खिलाफ हसनगंगू की मदद की थी लेकिन उसके उत्तराधिकारी ने वारंगल पर आक्रमण करके कौलास तथा गोलकुण्डा के पहाड़ी किले पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। दक्षिण में व्यस्त होने के कारण विजय नगर इस समय हस्तक्षेप करने की स्थिति में नहीं था। बहमनी सुल्तान ने गोलकुण्डा को अपनी सीमा निर्धारित करके यह वचन दिया था कि भविष्य मे वह या उसके उत्तराधिकारी वारंगल पर कभी आक्रमण नहीं करेंगे। इस संन्धि को पक्का करने के लिए वारंगल के शासक ने बहमनी सुल्तान को बहुमूल्य रत्नों से जड़ा एक सिंहासन भेंट किया था। कहा जाता है कि इसका निर्माण मुहम्मद तुगलक को भेंट करने के लिए करवाया गया था। वारंगल और बहमनी राज्य की यह संधि 50 वर्षों तक रही। यही सब से बड़ा कारण था कि विजयनगर न तो तुंगभद्रा दोआब पर ही कभी अधिकार कर सका था और न उस क्षेत्र में बहमनी आक्रमणों को रोक पाया था। मध्ययुगीन लेखकों ने विजयनगर व बहमनी के बीच हुई लड़ाइयों का वर्णन विस्तार से किया है। किन्तु इनका हमारे लिये विशेष ऐतिहासिक महत्व नहीं है। दोनों पक्षों की स्थिति लगभग एक सी रही, केवल लड़ाई में पलड़ा कभी एक पक्ष की ओर छुक जाता था और कभी दूसरे पक्ष की ओर। हरिहर द्वितीय भी बहमनी और वारंगल की संयुक्त शक्ति के मुकाबले अपनी स्थिति बनाये रखने में सफल रहा। उसकी सबसे बड़ी सफलता पश्चिम में बहमनी राज्य से बेलगाँव और गोआ का अधिकार छीनना था। उसने उत्तरी श्रीलंका पर भी एक आक्रमण किया। कुछ समय की अव्यवस्था के बाद देवराय प्रथम (1406-1422) हरिहर द्वितीय का उत्तराधिकारी बना। उसके राज्यकाल के प्रारंभ में ही तुंगभद्रा दोआब की लड़ाई फिर से छिड़ गई। बहमनी शासक फिरोजशाह के हाथों उसकी हार हुई और उसे हुनों, मोतियों और हाथियों के रूप में दस लाख का हर्जाना देना पड़ा। उसे सुल्तान के साथ अपनी लड़की की शादी करनी पड़ी और दहेज के रूप में दोआब क्षेत्र में स्थित बांकापुर भी सुल्तान को देना पड़ा, ताकि भविष्य में लड़ाई की गुंजाइश न रहे। यह विवाह बड़ी शान-ओ-शौकत के साथ किया गया। जब फिरोज शाह बहमनी शादी के लिए विजयनगर पहुँचा तो राजा देवराय ने नगर से बाहर आकर बड़ी शान से उसका स्वागत किया। नगर द्वार लेकर महल तक दस किलोमीटर लम्बे मार्ग को सोने, मखमल और रेशमी कपड़ों और बहुमूल्य वस्तुओं से सजाया गया था। दोनों राजा नगर-चौक के केन्द्र से साथ-साथ घोड़ों पर सवार होकर गुजरे। देवराय के सम्बन्धी मार्ग में इस जुलूस के साथ शामिल हुए और दोनों शासकों के आगे-आगे पैदल चले। उत्सव तीन दिन तक चलता रहा। दक्षिण भारत में यह इस प्रकार का पहला राजनीतिक विवाह नहीं था। इससे पहले खेरला का राजा शान्ति स्थापित करने के लिए फिरोजशाह बहमनी के साथ अपनी लड़की की शादी कर चुका था। कहा जाता है कि वह राजकुमारी सुल्तान की सर्वप्रिय बेगम थी। किंतु ये विवाह अपने आप में शान्ति स्थापित नहीं कर सके। कृष्णा-गोदावरी के दोआब को लेकर विजयनगर, बहमनी राज्य और उड़ीसा में फिर संघर्ष छिड़ गया। रेड्डियों के राज्य में अस्तव्यतता की स्थिति देख कर देवराय ने वारंगल के साथ उसे आपस में बाँट लेने की संधि कर ली। बहमानियों से वारंगल के अलग हो जाने के कारण दक्षिण में शक्ति संतुलन बदल दिया। देवराय को फिरोजशाह बहमनी को बुरी तरह पराजित करने में सफलता मिली और उसने कृष्णा नदी के मुहाने तक का सारा प्रदेश हड़प लिया। देवराय प्रथम ने शान्ति की कलाओं की भी अवहेलना नहीं की। उसने तुंगभद्रा पर एक बाँध बनवाया, ताकि वहाँ से शहर में नहर लाकर पानी की कमी को दूर कर सके। इससे आस-पास के खेतों की सिंचाई भी होती थी। यह जानकारी भी मिलती है कि इससे उसके राजस्व में 350,000 पेरदाओं की भी वृद्धि हुई। सिंचाई के लिए उसने हरिद्रा नदी पर भी बाँध बनवाया। कुछ अव्यवस्था के बाद देवराय द्वितीय (1422-1446) विजयनगर की गद्दी पर बैठा। वह इस वंश का महानतम शासक माना जाता है। अपनी सेना को भी शक्तिशाली बनाने के लिए उसने अधिकाधिक मुसलमानों को भर्ती किया। फरिश्ता के अनुसार देवराय द्वितीय का विचार था कि बहमनी सेना की श्रेष्ठता मजबूत घोड़ों और बड़ी संख्या में तीरन्दाओं के कारण थी। इसीलिये उसने 2000 मुसलमानों को सेना में नौकरी और जागीरें दी और सब हिन्दू सैनिकों और सैनिक अधिकारियों को उनसे तीर-अंदाजी सीखने का आदेश दिया। विजयनगर की सेना में मुसलमानों की भर्ती कोई नयी बात नहीं थी, क्योंकि देवराय प्रथम की सेना में भी 10,000 मुसलमान सैनिक थे। फरिश्ता कहता है कि इस प्रकार देवराय द्वितीय ने तीर-अंदाजी में कुशल 60,000 हिन्दू, 80,000 घुड़सवार और 200,000 पैदल सैनिक एकत्र कर लिए। हो सकता है कि यह संख्या बढ़ा-चढ़ाकर बतायी गई हो। फिर भी यह निश्चित है इतनी बड़ी घुड़सवार सेना के निर्माण से राज्य के स्रोतों पर काफी दबाव पड़ा होगा, क्योंकि अच्छे घोड़े आयात करने पड़ते थे और इस व्यापार का एकाधिकार रखने वाले अरब लोग उनके लिए ऊँची कीमत वसूल करते थे। अपनी नयी सेना को लेकर देवराय द्वितीय ने 1443 में तुंगभद्रा नदी को पार किया और मुद्कल, बांकापुर आदि को फिर से जीतने की कोशिश की। ये नगर कृष्णा नदी के दक्षिण में थे और पुरानी लड़ाइयों में बहमनी राज्य के अधिकार में आ गये थे। तीन भीषण लड़ाइयाँ लड़ी गई, लेकिन अन्ततः दोनों पक्षों को पुरानी सीमाओं को स्वीकार करना पड़ा। सोलहवीं शताब्दी का एक पुर्तगाली लेखक नूनिज कहता है कि क्विलान, श्रीलंका, पूलीकट पेगू और तेनसिरिम (क्रमशः वर्मा और मलाया में) के राजा देवराय द्वितीय को कर देते थे। किन्तु इसमें संशय है कि विजयनगर के राजाओं के पास इतनी समुद्री शक्ति थी कि वे पेगू और तेनसिरिम से निरन्तर कर ले सकें। सम्भवतः इस कथन का आशय यह था कि इन देशों के शासकों का विजयनगर से संपर्क था और उन्होंने उसकी शुभकामानाएँ प्राप्त करने के लिए उपहार भेजे थे। हाँ, श्रीलंका पर अवश्य कई बार आक्रमण किए गए। इस बात की संभावना है कि वह विजयनगर का करद था। किन्तु शक्तिशाली नौसेना के बिना इस पर भी संभव नहीं हो सकता था। इस प्रकार लगातार कई समर्थ राजाओं के नेतृत्व में विजयनगर पन्द्रहवीं शताब्दी में पूर्वार्द्ध में दक्षिण का सर्वाधिक शक्तिशाली और समृद्ध राज्य बन गया। इतालवी यात्री निकोलो कोन्ती ने 1420 में विजयनगर की यात्रा की थी। उसने उसका सुन्दर वर्णन किया है। वह कहता है - ‘‘नगर का घेरा साठ मील है, इसकी दीवारें पहाड़ों तक चली गई हैं और नीचे की ओर घाटियों को घेरे हुए हैं - अनुमान है कि इस नगर में नब्बे हजार लोग ऐसे हैं, जो शस्त्र धारण करने योग्य हैं। राजा भारत के अन्य राजाओं से ज्यादा शक्तिशाली है।’’ फरिश्ता भी लिखता है - ‘‘बहमनी वंश के राजकुमार सिफ्र दिलेरी के बस पर अपनी श्रेष्ठता बनाये हुए हैं, अन्यथा शक्ति, समृद्धि और क्षेत्रफल में बीजानगर (विजयनगर) के राजा उनसे कहीं बढ़ कर हैं।’’ फारसी यात्री अब्दुर्रज्जाक ने भारत तथा अन्य देशों का बहुत भ्रमण किया था। उसने देवराय द्वितीय के समय में विजयनगर की भी यात्रा की। उसने इस राज्य का भव्य वर्णन किया है। वह कहता है कि इस राजकुमार के राज्य में 300 बन्दरगाह हैं। इनमें से प्रत्येक कालीकट के बराबर है। इसके राज्य की भूमि इतनी फैली हुई है कि उसकी यात्रा करने में तीन महीने लग जाते हैं। इस बात से सभी यात्री सहमत हैं कि राज्य में बहुत अधिक नगर और गाँव थे। अब्दुर्रज्जाक कहता है कि ‘‘देश के अधिकांश हिस्से पर खेती होती है और भूमि उपजाऊ है। सेना की संख्या 11 लाख है।’’ अब्दुर्रज्जाक विजयनगर को संसार के सबसे शानदार नगरों में से एक मानता है। नगर का वर्णन करने हुए वह कहता है कि ‘‘इसका निर्माण इस प्रकार से हुआ है कि सात किले और इतनी ही दीवारें एक-दूसरे को घेरे हुए हैं, सातों किले का क्षेत्रफल, जो अन्य किलों के केन्द्र में बना है, हिरात के बाजार से दस गुना बड़ा है।‘‘ महल के पास स्थित चार बाजार ‘‘अत्यंत लम्बे व चौड़े थे।’’ भारतीय परम्परा के अनुरूप एक वर्ण या व्यसाय के लोग शहर के एक भाग में रहते थे। संभवतः मुसलमान अपने लिए सुरक्षित अलग हिस्से में रहते थे। बाजारों और राजा के महल में साफ, कटे हुए, पालिश किए पत्थरों से बने नाले ओर नहरें दिखाई देती थीं। बाद के एक यात्री के अनुसार यह उस समय के पश्चिम के सबसे बड़े नगर रोम से भी बड़ा और भव्य नगर था। विजयनगर के राजा बहुत समृद्ध समझे जाते थे। अब्दुर्रज्जाक इस ओर संकेत करता है कि ‘‘राजा के महल में कई तहखाने हैं जिन में इस प्रकार सोना चाँदी भरा हुआ है कि वह एक ढेर लगता है।’’ राजाओं द्वारा सम्पत्ति इकट्ठा करना प्राचीन प्रथा थी। किन्तु इस प्रकार इकट्ठी की गई सम्पतित का विनिमय नहीं हो पता था और कई बार विदेशी आक्रमणों का कारण बनती थी। बहमनी साम्राज्य विस्तार और विघटनबहमनी राज्य के उत्थान और देवराय द्वितीय की मृत्यु (1446) तक विजयनगर साम्राज्य के साथ उसके संघर्ष के इतिहास के विषय में हम चर्चा कर चुके है। बहमनी राज्य में सशक्तम व्यक्तित्व फिरोज शाह बहमनी (1307-1422) का है। वह धर्मशास्त्र की विभिन्न शाखाओं में अर्थात् कुरान की व्याख्याओं और न्यायशास्त्र से पूर्ण परिचित था। वनस्पति विज्ञान, प्राकृतिक विज्ञान, रेखा गणित, तर्क शास्त्र आदि में उसकी विशेष रूचि थी। वह अच्छा खुशनवीस (Callig-raphist) और कवि था और बातचीत के दौरान कविताओं की रचना कर दिया करता था। फरिश्ता के अनुसार वह फारसी, अरबी और तुर्की के अतिरिक्त तेलुगु, कन्नड़ और मराठी भाषा का भी अच्छा ज्ञाता था। उसकी अनेक पत्नियाँ थीं। वे अलग-अलग धर्मों और देशों की थी। उसकी कई हिन्दू पत्नियाँ भी थीं। कहा जाता है कि वह उनमें से प्रत्येक से उसी भाषा में बातचीत करता था।फिरोज शाह बहमनी दकन को भारत का सांस्कृतिक केन्द्र बनाने के लिए कृत-संकल्प था। दिल्ली सल्तनत के विघटन से उसके इस लक्ष्य की पूर्ति में बहुत सहायता मिली, क्योंकि बहुत-से विद्वान दिल्ली से दकन में आ बसे। राजा ने ईरानी और इराकी विद्वानों को भी प्रोत्साहन दिया। वह कहा करता था कि राजा को प्रत्येक देश के विद्वानों और श्रेष्ठ लोगों को सम्मान देना चाहिए क्योंकि इससे उसके समाजों की जानकारी मिलती है और दुनिया में घूमने से प्राप्त उनके अनुभवों से कुछ लाभ हो सकता है। वह अधिकतर आधी रात तक साधुओं, कवियों, इतिहास-वार्ताकारों और अपने दरबारियों में से श्रेष्ठतम वि़और बुद्धिमानों के साथ रहता था। उसने पुराने और नये टेस्टामेन्ट का अध्ययन किया था और सब धर्मों की शिक्षाओं का आदर करता था। फरिश्ता ने उसे ऐसा पुरातन पंथी मुसलमान कहा है, जिसमें केवल शराब पीने और संगीत सुनने की ही कमजोरियाँ थीं। फिरोजशाह बहमनी का सबसे अच्छा कार्य प्रशासन में बड़े स्तर पर हिन्दुओं को सम्मिलित करना था। कहा जाता है कि इसी समय से दक्कनी ब्राह्मण राज्य के प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने लगे। विशेष रूप से राजस्व के क्षेत्र में प्रमुख रही। दक्कनी हिन्दुओं ने विदेशी निवेश में भी एक संतुलन बनाये रखा। फिरोजशाह बहमनी ने खगोल शास्त्र को प्रोत्साहन दिया ओर दौलतावाद में एक बेधशाला भी बनवाई। उसने अपने राज्यकी प्रमुख बन्दरगाहों, चौल और दभोल पर काफी ध्यान दिया। इन बन्दरगाहों में फारस की खाड़ी और लाल सागर से जाने वाले व्यापारी जहाज दुनिया भर में सुख-सुविधाओं का सामान लेकर आते थे। खेरला के गांड राजा नरसिंह राय को पराजित करके फिरोजशाह बहमनी ने बरार की ओर अपने राज्य का विस्तार करना शुरू किया। राय ने उसे चालीस हाथियों, पाँच मन सोना और एक बेटी की शादी भी उससे कर दी। खेरला नरसिंह को वापिस मिल गया और उसे राज्य का एक अमीर बना दिया गया। साथ ही उसे बढ़ी हुई टोपी व खिल्लत प्रदान की गई। देवराय प्रथम की कन्या की फिरोजशाह बहमनी के साथ शादी और विजयनगर के साथ उसकी बाद की लड़ाइयों का वर्णन पहले ही किया जा चुका है। कृष्णा-गोदावरी के दोआब के अधिकार के लिए संघर्ष फिर भी जारी रहा। बहमनी राज्य को 1415 में एक धक्का लगा। जैसा कि पहले बताया जा चुका है फिरोजशाह बहमनी देवराय प्रथम के हाथों पराजित हुआ। इस हार से स्थिति कमजोर हो गई व उसे अपने भाई के हक में गद्दी छोड़नी पड़ी। अहमद शाह प्रथम, जिसे गेसू दराज के साथ के कारण वली कहा जाता था, दक्षिण भारत में पूर्वी तट के अधिकार के लिए संघर्ष करता रहा। वह इस बात को नहीं भूल सका कि पिछली दो लड़ाइयों में बहमानियों की हार हुई थी और इस युद्ध में वारंगल ने विजयनगर का साथ दिया था। बदला लेने के लिए उसने वारंगल पर चढ़ाई की, राजा को हराकर मार डाला और वारंगल का अधिकांश भाग अपने राज्य में मिला लिया। नये प्रदेश में अपना शासन सुदृढ़ करने के लिए वह अपनी राजधानी गुलबर्गा से बीदर ले आया। इसके बाद उसका ध्यान मालवा, गोंडवाना और कोंकण की ओर गया। वारंगल पर बहमनी-विजय से दक्षिण में शक्ति संतुलन बदल गया। बहमनी राज्य धीरे-धीरे विस्तृत होने लगा तथा पेशवाई महमूद गवाँ (1448) की दीवानी के समय वह उन्नति के उच्चतम शिखर पर पहुँच गया था। महमूद गवाँ के आरंभिक जीवन के विषय में कोई जानकारी नहीं मिलती। वह जन्म से ईरानी था और पहले वह व्यापारी था। किसी ने सुल्तान से उसका परिचय कराया और शीघ्र ही वह उसका प्रिय-पात्र बन गया। उसे व्यापारियों के प्रमुख (मालिक-उत्-तुज्जार) की उपाधि मिली। शीघ्र ही उसे प्रमुख वजीर (पेशवा) का पद प्राप्त हुआ। अगले 20 वर्षों के काल में दक्कन की राजनीति पर महमूद गवाँ का प्रभाव छाया रहा। उसने कई पूर्वी प्रदेशों को जीत पर बहमनी राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। विजयनगर राज्य में कांची जैसे दूरस्थ स्थान पर आक्रमण से सिद्ध होता है कि बहमनी सेना शक्तिशाली थी। महमूद गवाँ का प्रमुख सैनिक योगदान दभोल और गोआ सहित पश्चिमी समुद्री तट पर विजय थी। इन बन्दरगाहों का हाथ से निकल जाना विजयनगर के लिए नुकसानदेह सिद्ध हुआ। गोआ और दभोल पर अधिकार होने से ईरान और इराक आदि के साथ बहमनी राज्य का समुदी व्यापार और भी बढ़ गया था। आन्तरिक व्यापार और उत्पादन की भी वृद्धि हुई। महमूद गवाँ ने राज्य की उत्तरी सीमा निर्धारित करने का प्रयत्न भी किया। अहमद शाह प्रथम के समय से ही खलजी शासकों द्वारा शासित मालवा राज्य, गोंडवाना, बरार और कोंकण पर अधिकार का प्रयत्न करता रहा था। इस संघर्ष में बहमनी सुल्तानों ने गुजरात के राजाओं की सहायता ली थी। काफी लड़ाई के बाद यह फैसला हुआ था कि गांडवाना में स्थित खेरला मालवा के अधिकार में रहेगा और बरार बहमानियों के। फिर भी, मालवा के शासक बरार को छीनने के अवसर की तलाश में थे। अतः बरार के लिए महमूद गवाँ को मालवा के महमूद खलजी के साथ कई कड़ी लड़ाइयाँ लड़नी पड़ी। गुजरात के राजा की सक्रिय सहायता के कारण महमूद गवाँ का पलड़ा भारी रहा। दक्षिण की लड़ाइयाँ से यह स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ मतभेद या मैत्री का आधार धार्मिक नहीं था वरन् उसके पीछे राजनीतिक, सामाजिक व व्यापार पर नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य निहित रहते थे। दूसरी बात यह कि उत्तर और दक्षिण दोनों ही स्थानों के राज्यों में संघर्ष एक-दूसरे से पूरी तरह अलग-थलग नहीं था। पश्चिम के मालवा और गुजरात दक्षिण में संघर्षों में लिप्त थे, पूर्व में उड़ीसा बंगाल के साथ संघर्षरत था, कोरोमण्डल तट पर भी उसकी दृष्टि थी। उड़ीसा के शासकों ने 1450 के बाद दक्षिण में गहरे आक्रमण किये। उसकी सेनाएँ दक्षिण में मदुरई तक पहुँच गई। उनकी सक्रियता से विजयनगर साम्राज्य और कमजोर हो गया। देवराय द्वितीय की मृत्यु के पश्चात् आन्तरिक संघर्ष के कारण वह पहले ही कमजोर पड़ गया था। महमूद गवाँ ने बहुत से आन्तरिक सुधार भी किए। उसने राज्य को आठ प्रांतों या तरफ़ों में विभाजित किया। प्रत्येक तरफ पर एक तरफदार होता था, जो प्रशासन का काम चलाता था। प्रत्येक अमीर का वेतन और कार्य निर्धारित था। 500 घोड़ों के दल की व्यवस्था के लिये प्रत्येक अमीर को सालाना 100,000 हून मिलते थे। वेतन नकद भी हो सकता था और जागीर के रूप में भी। जिन्हें जागीर के रूप में वेतन मिलता था, उन्हें राजस्व वसूल करने के लिए कुछ राशि अलग से भी मिलती थी। प्रत्येक प्रांत में जमीन का एक भाग (खालिमा) सुल्तान के खर्च के लिए सुरक्षित होता था। जमीन की पैमाइश तथा काश्तकारों पर के राज्य को अदा किये जाने वाले भू-राजस्व की राशि निर्धारित करने का भी प्रयास किया गया। महमूद गवाँ कलाओं का महान संरक्षण था। उसने राजधानी बीदर में बहुत बड़ा मदरसा बनवाया था। इस सुन्दर भवन में रंगीन टाइल लगी थीं और यह तिमंजिला था। इसमें एक हजार अध्यापक और विद्यार्थी रह सकते थे। उन्हें भोजन और कपड़ा भी राज्य की ओर से मुफ्त दिया जाता था। महमूद गवाँ के आमन्त्रण पर उस समय के प्रसिद्ध ईरानी और इराकी विद्वान भी इस मदारसे में आये। बहमनी राज्य की बड़ी समस्याओं में से एक थी अमीरों का आपसी संघर्ष, ये सरदार दो वर्गों में विभाजित थे पुराने और नये अथवा दक्कनी व आफ्राकी (जिन्हें गरीब कहा जाता था) महमूद गवाँ भी नयों में से था और उसे दक्कनियों का विश्वास जीतने के लिए बहुत प्रयत्न करना पड़ा था। यद्यपि उसने मेल-मिलाप की उदार नीति अपनायी फिर भी दलगत संघर्ष मिटाया नहीं जा सका। उसके विरोधी तरुण सुल्तान के कान भरने में सफल हुए और 1482 में उसने उसे फाँसी पर चढ़वा दिया। उस समय महमूद गवाँ 70 वर्ष का था। दलगत संघर्ष उसकी मृत्यु के पश्चात् और भी उग्र हो गया। कई प्रान्तीय शासक स्वतन्त्र हो गये। शीघ्र ही बहमनी राज्य पाँच स्वन्त्र राज्यों में विभाजित हो गया। ये राज्य थे - गोलकुण्डा, बीजापुर, अहमदनगर, बरार और बीदर। इन में से अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुण्डा ने 17वीं शताब्दी में अपने मुगल-साम्राज्य में विलय तक दक्षिण की राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाई। बहमनी राज्य ने दक्षिण और उत्तर के मध्य एक सांस्कृतिक सेतु का कार्य किया। इस प्रकार जिस संस्कृति का विकास हुआ, उसमें कुछ ऐसी निजी विशेषताएँ थीं, जो उसे उत्तर की संस्कृति से अलग करती थी। बाद के राजाओं ने भी इन सांस्कृतिक परम्पराओं को सुरक्षित रखा और कालान्तर में इन्होंने मुगलकाल में मुगल-संस्कृति के विकास को भी प्रभावित किया। विजयनगर - चरमोत्कर्ष और विघटनजैसा कि पहले संकेत दिया जा चुका है कि देवराय द्वितीय की मृत्यु के पश्चात् विजयनगर साम्राज्य में अव्यवस्था आ गई थी। वंशधर के ही उत्तराधिकारी होने का सिद्धान्त निश्चित नहीं हो सकने के कारण गद्दी के प्रतिद्वन्द्वियों के बीच कई युद्ध हुए। इसमें कई करद राज्य स्वतन्त्र हो गये। राज्य के मन्त्री शक्तिशाली हो गये और उन्होंने जनता के कई उपहार और भारी कर वसूलने शुरू कर दिये। इससे जनता में असंतोष होने लगा। राज्य का शासन कर्नाटक और आन्ध्रप्रदेश के कुछ भाग तक सीमित रह गया। राजा भोग-विलास में डूब गये और राज्य कार्य की अवहेलना करने लगे। कुछ समय बाद राजा के मन्त्री सलुव ने गद्दी पर अधिकार कर लिया। प्राचीन संगम वंश के राज्य का अन्त हो गया। सलुव ने आन्तरिक कानून और व्यवस्था को फिर से स्थापित किया और नये वंश का सूत्रपात किया। यह वंश भी जल्दी ही समाप्त हो गया। अन्ततः कृष्णदेव द्वारा नये वंश तुलूप की स्थापना हुई। कृष्णा देवराय (1509-30) इस वंश का महानतम व्यक्ति था। कतिपय इतिहासकार उसे विजयनगर साम्राज्य का महानतम शासक मानते हैं। कृष्ण देव को राज्य में कानून और व्यवस्था की पुनर्स्थापना ही नहीं करनी पड़ती थी बल्कि उसे विजयनगर के पुराने शत्रु बहमनी राज्य के उत्तराधिकारी राज्यों और उड़ीसा का भी मुकाबला करना पड़ा। उड़ीसा ने विजयनगर साम्राज्य के बहुत से हिस्सों पर अधिकार कर लिया था। इसके अतिरिक्त उसे पुर्तगालियों का भी सामना करना पड़ा। जिनकी शक्ति में धीरे-धीरे विस्तार हो रहा था। विजयनगर के तटवर्ती क्षेत्रों के छोटे-छोटे करद राज्यों को डरा कर वे उनसे आर्थिक व राजनीतिक सुविधाएँ प्राप्त कर रहे थे। इसके लिये वे समुद्र पर अपने नियन्त्रण व भ्रष्ट स्थिति का फायदा उठा रहे थे। उन्होंने राय को तटस्थ बने रहने के लिए रिश्वत देने का प्रस्ताव भी किया। यह रिश्वत बीजापुर से गोआ का अधिकार पुनः छीनने के लिए सहायता और घोड़ों के आयात में एकाधिकार के प्रस्ताव के रूप में थी।सात साल तक कई लड़ाइयाँ लड़ने के बाद कृष्ण देव ने पहले उड़ीसा को, कृष्णा नदी तक क्षेत्र के सब जीते हुए प्रदेशों को विजयनगर को लौटाने को विवश किया। इस प्रकार अपनी स्थिति मजबूत करके कृष्ण देव ने तुंगभद्रा दोआब के लिए पुरानी लड़ाई शुरू कर दी। इसका परिणाम यह हुआ कि उसके दो शत्रुओं, उड़ीसा और बीजापुर ने, आपस में संन्धि कर ली। कृष्ण देव ने युद्ध के लिए काफी तैयारियाँ कीं। उसने रायपुर और मुद्कल पर आक्रमण करके युद्ध छेड़ दिया। बीजापुर के सुल्तान की युद्ध में 1520 में पूर्ण पराजय हुई। उसे कृष्णा नदी के पार खदेड़ दिया गया। उसकी जान मुश्किल से बची। विजयनगर की सेना बेलगाँव पहुँची, फिर उसने बीजापुर पर अधिकार किया और कई दिन तक लूटपाट होती रही। उसके बाद उन्होंने गुलबर्गा को नष्ट किया। तब कहीं कोई संधि हुई। इस प्रकार कृष्ण देव के समय से विजयनगर सैनिक दृष्टि से दक्षिण का शक्तिशाली राज्य हो गया। दक्षिणी शक्तियों ने पुराने शत्रुओं को उभारने में तो जल्दबाजी की लेकिन पुर्तगालियों के उभरने से उनके व्यापार को जो खतरा पैदा हो रहा था, उस पर उनका ध्यान नहीं गया। नौसेना के गठन में चोल राजाओं और विजयनगर के प्रारंभिक राजाओं ने बहुत ध्यान नहीं दिया। कई विदेशी यात्रियों ने तत्कालीन विजयनगर की दशा का वर्णन किया है। इतालवी यात्री पाएस, कृष्ण देव के दरबार में अनेक वर्षों तक रहा। लेकिन वह यह भी कहता है कि ‘वह महान और न्याय प्रिय शासक है, पर उसे क्रोध बहुत जल्दी आता है।’’ वह अपनी प्रजा को प्यार करता था और प्रजा-कल्याण की उसकी भावना ने किम्वदंतियों का रूप धारण कर लिया था। कृष्ण देव महान् भवन निर्माता भी था। उसने विजयनगर के पास एक नया शहर बनवाया ओर बहुत बड़ा तालाब खुदवाया, जो सिंचाई के काम भी आता था। वह तेलुगू और संस्कृत का अच्छा विद्वान था। उसकी बहुत-सी रचनाओं में से तेलुगू में लिखी राजनीति पर एक पुस्तक और एक संस्कृत नाटक ही उपलब्ध है। उसके राज्यकाल में तेलुगू साहित्य का नया युग प्रारंभ हो हुआ। जबकि संस्कृत से अनुवाद की अपेक्षा तेलुगू मे मौलिक साहित्य लिखा जाने लगा। वह तेलुगू के साथ-साथ कन्नड़ और तमिल-कवियों को भी प्रोत्साहन दिया करता था। बरबोसा, पाएस और नूनिज जैसे विदेशी यात्रियों ने उसके श्रेष्ठ प्रशासन और उसके शासन काल में साम्राज्य की समृद्धि की चर्चाएँ की हैं। कृष्ण देव की सबसे बड़ी उपलब्धि उसके शासन काल में साम्राज्य में पनपी सहिष्णुता की भावना थी। बरबोसा कहता है कि ‘‘राजा की ओर से किसी भी व्यक्ति को कहीं भी आने जाने की छूट है। बिना किसी कठिनाई के या इस पूछताछ के कि वह ईसाई है, यहूदी है, मूर है अथवा नास्तिक है, अपने धार्मिक सिद्धान्तों के अनुसार आचरण कर सकता है।’’ बरबोसा ने कृष्ण देव की प्रशंसा उसके राज्य में प्राप्त न्याय और सामनता के कारण भी की है। कृष्ण देव की मृत्यु के पश्चात् उसके सम्बन्धियों में परस्पर उत्तराधिकार के लिए संघर्ष हुआ, क्योंकि उसके पुत्र उस समय नाबालिग थे। अतः 1543 में सदाशिव राय गद्दी पर बैठा और उसने 1567 तक राज्य किया। परन्तु वास्ताविक शक्ति एक त्रिगुट के पास थी, जिनका मुखिया राजा राम था। राजा राम को कई मुस्लिम ताकतों को आपस में भिड़ाने में सफलता मिली। उसने पुर्तगालियों से एक व्यापारिक समझौता किया, जिससे बीजापुर के राजा के घोड़ों की बिक्री बन्द कर दी गई। फिर कई लड़ाईयों के बाद उसने बीजापुर तथा गोलकुण्डा और अहमद नगर को बुरी तरह पराजित किया। ऐसा प्रतीत होता है कि राजा राम का लक्ष्य केवल इन राज्यों के मध्य शक्ति-संतुलन का पलड़ा विजयनगर के पक्ष के लिए करना ही था। कालान्तर में उन्होंने विजयनगर के विरुद्ध संयुक्त होकर 1565 में तालिकोट के निकट बन्नीहट्टी में उसे पराजित किया। इस युद्ध को राक्षस-टंगड़ी या तालिकोट का युद्ध भी कहा जाता है। राजा राम को घेर कर पकड़ लिया गया और उसे तुरन्त मार डाला गया। कहा जाता है कि इस युद्ध में 100,000 हिन्दुओं का वध किया गया। विजयनगर को पूरी तरह से लूट लिया गया और उसे विध्वंस कर दिया गया। बन्नीहट्टी की लड़ाई को सामान्य रूप से विजयनगर साम्राज्य के शानदार युग का अन्त माना जाता है। हालाँकि राज्य उसके बाद भी लगभग 100 वर्ष तक घिसट-घिसट कर चलता रहा, लेकिन उसकी सीमाएँ लगातार सकुंचित होती रहीं और दक्षिण भारत में रायों का राजनीतिक दृष्टि से कोई महत्व शेष नहीं रहा। विजयनगर - प्रशासन और आर्थिक जीवनविजयनगर के शासकों के मस्तिष्क में राज्य का स्वरूप बहुत साफ था। राजनीति पर अपनी पुस्तक में कृष्णदेव राय राजा के लिए लिखता है कि ‘तुम्हें बड़े ध्यान से व शक्ति के अनुसार (निर्दोष की) सुरक्षा और (अपराधी को) दण्ड का काम करना चाहिए। उसमें अपने देखे-सुने की अवहेलना नहीं करनी चाहिए।’ उसने राजा को प्रजा पर सामान्य या हल्के कर लगाने की सलाह दी है।विजयनगर साम्राज्य में राजा की सहायता के लिए एक मन्त्रिमंडल होता था, जिसमें साम्राज्य के श्रेष्ठ सामन्त होते थे। साम्राज्य, राज्य का मंडलम् (प्रान्त) और उसके अन्तर्गत नाडु (जिला), स्थल (तहसील या उप-जिला) और ग्राम में विभक्त था। विजयनगर के शासकों ने स्वायत्त ग्राम-प्रशासन की चोल परम्परा को बनाये रखा। लेकिन नायकों के वंशानुगत होने की परम्परा ने स्वायत्त शासन की स्वतन्त्रता को सीमित अवश्य कर दिया। प्रान्तों के प्रशासक पहले राजकुमार हुआ करते थे। बाद में साम्राज्य के शासक वंशों और सामन्तों में से भी इस पद पर नियुक्तियाँ होने लगीं। प्रान्तीय प्रशासक काफी सीमा तक स्वतन्त्र होते थे। वे अपना दरबार लगाते थे, अपने अधिकारी नियुक्त करते थे और अपनी ही सेना भी रखते थे। वे अपने सिक्के भी चला सकते थे। परन्तु यह अधिकार छोटे सिक्कों के परिचालन तक सीमित था। प्रान्तीय प्रशासक की कार्याविधि निश्चित नहीं होती थी, वह उसकी योग्यता और शक्ति पर निर्भर करती थी। उनको नये कर लगाने या पुराने करों को हटाने का अधिकार भी था। प्रत्येक को केन्द्र की सेवा में निश्चित मात्रा में सैनिक और पैसा प्रेषित करता था। अनुमान है कि साम्राज्य की कुल आय 12,000,000 पराडो थी, जिसमें से आधा केन्द्रीय सरकार को मिलता था। बहुत से क्षेत्र ऐसे भी थे जो अधीनस्थ शासकों द्वारा शासित थे, अर्थात् शासकों के द्वारा जिन्हें युद्धों में परास्त करने के बाद, राज्य लौटा दिया गया था। राजा सेनापतियों को भी निश्चित कर के एवज में कुछ क्षेत्र (अमरम्) प्रदान करता था। ये सेनापति पलाइयागार (पालिगार) अथवा नायक कहलाते थे। इन्हें साम्राज्य की सेवा के लिए पैदल-सैनिकों, घुड़सवारों और हाथियों की एक निश्चित संख्या रखना पड़ती थी। नायकों को भी केन्द्रिय राजस्व में एक निश्चित राशि देनी पड़ती थी। यह साम्राज्य का एक शक्तिशाली वर्ग था और कभी-कभी राजा को इन्हें काबू में रखने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ता था। विजयनगर साम्राज्य की इन कमजोरियों का उसके विघटन में बहुत बड़ा हाथ था। तंजोर और मदुरई आदि स्थानों के नायक तभी से स्वतन्त्र हो गये थे। इतिहासकार विजयनगर साम्राज्य में किसानों की आर्थिक स्थिति पर एकमत नहीं हैं क्योंकि अधिकांश यात्रियों को ग्रामीण-जीवन के बारे में कोई विशिष्ट जानकारी न होने के कारण उन्होंने इस विषय में मात्र सामन्य टिप्पणियाँ दी हैं। सामान्यतः यही अनुमान है कि सामन्य नागरिक की आर्थिक स्थिति पहले जैसी ही रही। उनके मकान मिट्टी और फूस के थे, जिनके दरवाजे भी छोटे थे। वे अक्सर नंगे पाँव चलते थे और कमर के ऊपर कुछ नहीं पहनते थे। उच्च वर्ग के लोग कभी-कभी मँहगे जूते, सिरों पर रेशमी पगड़ी पहनते थे, लेकिन कमर के ऊपर वे भी कुछ नहीं पहनते थे। सभी वर्गों के लोग आभूषण के शौकीन थे और ‘कानों, गर्दनों और बाजुओं आदि पर कोई-न-कोई आभूषण पहनते थे।’’ इस बात की कोई जानकारी नहीं मिलती कि किसान अपने उत्पादन का कितना अंश लगान के रूप में देते थे। एक आलेख के अनुसार करों की दर इस प्रकार थी। सर्दियों में कुरूवाई (चावल की एक किस्म ) का 1/3, तिल, रग्गी और चने आदि का 1/4, बाजरा और शुष्क भूमि पर उत्पन्न होने वाले अन्य अनाजों का 1/6। इस प्रकार अनाज, भूमि, सिंचाई के साधनों के अनुसार लगान की दर अलग-अलग थी। लगान के अतिरिक्त सम्पत्ति-कर, विक्रय-कर, व्यवसाय कर, युद्ध के समय सैन्यकर, विवाह कर आदि विभिन्न कर भी लगाये जाते थे। सोलहवीं शताब्दी का यात्री निकितिन कहता है कि ‘‘देश में जनसंख्या बहुत है, ग्रमीणों की दशा बहुत शोचनीय है जब कि सामंत समृद्ध हैं और ऐश्वर्यपूर्ण जीवन का आनंद उठाते हैं।’’ विजयनगर साम्राज्य में नगरों में निवास करने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि हुई तथा व्यापार का विकास हुआ। बहुत से नगर मन्दिरों के समीप के क्षेत्र में विकसित हुए। ये मन्दिर बड़े विशाल थे और यहाँ तीर्थयात्रियों की सुख-सुविधा तथा प्रसाद भगवान की सेवा व पुरोहितों के लिये खाद्यान्नों तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति की आवश्यकता निरन्तर बनी रहती थी। इन मन्दिरों के पास अपार धन-सम्पित्त थी तथा ये अन्तर्देशीय व समुद्री दोनों ही प्रकार के व्यापारों में सक्रिय रूप से हिस्सा लेते थे। पुर्तगालियों का उत्थान1498 में वास्कोडिगामा का कालीकट आगमन एक अत्यन्त महत्वपूर्ण घटना है। वह अब्दुल मनीद नायक गुजराती पथ प्रदर्शक की सहायता से अफ्रीकी तट से अपने दो जहाजों सहित भारत आने में सफल हो गया। यह घटना एक नये दौर के सूत्रपात की द्योतक मानी जाती रही है। जिसमें समुद्रों का नियंत्रण यूरोपियनों के एक दल के हाथ में सन्निहित हो गया। इससे भारतीय व्यापार तथा व्यापारियों को आघात पहुँचा और अन्ततः यूरोपीय शक्तियाँ भारत में तथा समीपवर्ती देशों में अपना औपनिवेशिक साम्राज्य और प्रभुत्व स्थापित करने में सफल हुईं। इस विचार को पाश्चात्य और भारतीय इतिहासकारों द्वारा गम्भीर चुनौती मिली है। यह नयी विचारधारा विशेष रूप से द्वितीय विश्व युद्ध के बाद और इस क्षेत्र में यूरोपीय शक्तियों के राजनीतिक प्रभुत्व की समाप्ति के बाद से पनपना प्रारम्भ हुई है।भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति पर पुर्तगालियों के प्रभाव की समीक्षा करने के पूर्व हमें उन तथ्यों व उद्देश्यों पर विचार करना होगा जिनके कारण पुर्तगाली भारत आये थे। पुर्तगाली भारत में उस समय आये जबकि यूरोपीय अर्थव्यवस्था का तेजी से विकास हो रहा था, जिसका कारण मुख्यतः जंगलों को काट कर व दलदलों को सुखाकर काश्त योग्य भूमि का विस्तार किया जाना था। सुविकसित हल (Heavy Plough) की सहायता से बड़ी जमीन को तोड़ना आसान हो गया तथा फसलों को वैज्ञानिक तरीकों से व बदल-बदल कर बोने के कारण खाद्यान्नों के अतिरिक्त माँस की आपूर्ति में भी भारी वृद्धि हुई। इस वृद्धि का प्रभाव नगरों के उत्थान तथा अन्तर्देशीय व विदेशी व्यापार में वृद्धि के रूप में प्रगट हुआ। रोमन काल से ही पाश्चात्य देशों में पूर्वी व्यापारिक वस्तुओं की बड़ी खपत थी। इनमें चीन के रेशम व भारत, दक्षिण पूर्वी एशिया के मसाले व जड़ी बूटियों की माँग प्रमुख थी। यूरोप में आर्थिक पुनरुत्थान के बाद इस माँग में और भी वृद्धि हुई। इन में काली मिर्च व मसालों की माँग प्रमुख रूप से थी। सर्दियों में चारे की कमी के कारण अधिकांश जानवरों को मार दिया जाता था। उस माँस को सुरक्षित रखने व खाने योग्य बनाने के लिए मसालों की जरूरत पड़ती थी। ये मसाले व विशेष रूप से काली मिर्च लीवान्त, मिसु तथा काले सागर के बन्दरगाहों तक मुख्यतः स्थल मार्ग द्वारा लाई जाती थी व इसका कुछ हिस्सा भारत और दक्षिण पूर्वी बन्दरगाहों से जल मार्ग द्वारा भी भेजा जाता था। पन्द्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में उस्मानी तुर्कों की शक्ति में वृद्धि होने के कारण इन सभी क्षेत्रों पर तुर्कों का नियंत्रण स्थापित हो गया। उन्होंने 1453 में कौन्सटैन्टीनोपिल पर अधिकार कर लिया व बाद में सीरिया तथा मिसु भी उन के अधिकार में आ गया। तुर्क पहले से चले आ रहे व्यापार के विरोधी नहीं थे। किन्तु उनके द्वारा काली मिर्च के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित कर लेने के कारण यूरोपियनों के व्यापारिक हितों को खतरा पहुँचा। पूर्वी यूरोप के देशों की ओर तुर्कों के विस्तार तथा एक सशक्त जहाजी बेड़े के माध्यम से पूर्वी भू-मध्यसागर को ‘‘तुर्की झील’’ बना देने से यूरोपीय व्यापारी चिन्तित हो गये। पूर्वी देशों से व्यापार में सबसे बड़ा हिस्सा वेनिस तथा जिनोआ का था किन्तु वे तुर्कों के खिलाफ आवाज उठाने की स्थिति में नहीं थे। वेनिस ने फौरन ही तुर्कों से सन्धि कर ली थी। अतः तुर्कों के इस खतरे के विरुद्ध संघर्ष का सूत्रपात भूमध्य सागर के पश्चिमी भाग में स्थित शक्तियों- स्पेन व पुर्तगाल द्वारा किया गया। उन्हें उत्तरी शक्तियों द्वारा धन तथा जन-शक्ति से सहायता प्रदान की गई तथा जिनोआ ने, जो व्यापार में वेनिस के प्रतिद्वन्दी थे, जहाज और तकनीकी जानकारी प्रदान की। इस प्रकार केवल पुर्तगालियों द्वारा ही भारत के लिये सीधे रास्ते की खोज प्रारंभ नहीं की गई थी। यह बहुत से देशों का संयुक्त प्रयास था। सामुद्रिक खोजों के दौर के सूत्रपात के पीछे यही तथ्य निहित है। अमेरिका की क्रिस्टोफर कोलम्बस द्वारा खोज की गई या यों कहे ‘‘पुनः खोज’’ की गई। क्योंकि उत्तर से नौरीमन तथा रेड इन्डियन भी डैरिंग जलडमरू मध्य पार करके पहले ही अमेरिका पहुँच चुके थे। प्रिंस हेनरी ने 1418 से ही हर साल दो तीन जहाज अफ्रीका के पश्चिमी तट की खोज व स्थिति का अध्ययन करने के लिए व भारत के लिये जल मार्ग खोज कर भेजना प्रारंभ कर दिया था। इसके दो उद्देश्य थे, पूर्व से समृद्ध व्यापार में अरबों तथा अपने प्रतिद्वन्दी वेनिस के प्रभाव को समाप्त करना तथा अरबों, तुर्कों की बढ़ती हुई शक्ति को नियन्त्रित करना, जिसके लिये अफ्रीका और एशिया के विद्यार्थियों में ईसाई धर्म का प्रचार करना। इन दोनों उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये उसने बड़े जोश से काम करना प्रारम्भ किया। वस्तुतः ये दोनों उद्देश्य एक दूसरे के पूरक तथा का न्याय संगत थे। पोप ने 1453 में एक आदेश पत्र (bull) जारी करके इसको स्वीकृति दी। जिसके द्वारा पुर्तगाल द्वारा केपनोर के आगे ‘‘खोजे जाने वाले’’ भू-क्षेत्रों को ‘‘सदा के लिये’’ इस शर्त पर दे दिया कि वे उन के रहने वाले लोगों को ईसाई बनायेंगे। 1481 में वार्थोलोम्यू दियाज ने केप आव गुड होप को चक्कर लगा कर भारत और यूरोप के मध्य प्रत्यक्ष सम्बन्धों की नींव डाली। इतनी लम्बी समुद्री यात्राएँ कुछ नई खोजों के द्वारा ही संभव हो सकीं। जिसमें कुतुबनुमा (mariner's compass) तथा दिन में समुद्री यात्रा के लिए एस्ट्रोलैव (astrolabs) मुख्य है। इनमें से कोई भी यूरोपीय आविष्कार नहीं है। कुतुबनुमा का ज्ञान चीन वासियों को कई शताब्दी पूर्व से ही था। किन्तु इस का प्रयोग व्यापाक स्तर पर प्रारंभ नहीं हुआ था। किन्तु एस्ट्रौलैव का प्रयोग अरबों, भारतीयों तथा अन्य लोगों के द्वारा व्यापक रूप से किया जाता रहा था। यूरोप वासियों के जहाज भी चीनी जहाजों की तुलना में श्रेष्ठ नहीं थे। किन्तु साहस और अभियान की भावना वास्तव में नई थी। जिसके चिन्ह 13वीं शताब्दी से व्यापार और वाणिज्य के विकास में परिभाषित किये जा सकते हैं, जिसके कारण यूरोपीय देशों के प्रतिर्स्पधा उग्र होनी ही थी। पुनर्जागरण की नई बौद्धिक चेतना का प्रभाव भी उतना ही महत्वपूर्ण था। पुनर्जागरण स्वतन्त्र अन्वेषण की भावना का प्रतीक था। चर्च के संकुचित ज्ञान की परिधियों से निकल कर जगत के तथ्यों को प्रगट करना व प्रसार करना इसी चेतना का परिणाम था। इसी कारण विदेशी आविष्कारों (चीनी, अरब) जैसे बारुद, छापा, दूरबीन आदि को अपनाने व उनमें सुधार का प्रयास किया गया। धातु शोधन विद्या सम्बन्धी जानकारी में वृद्धि होने के कारण उत्तम किस्म की तोपों आदि का निर्माण प्रारंभ हो गया। वास्कोडिगामा के कालीकट पहुँचने पर अरब व्यापरियों ने, जिनकी कालीकट में एक महात्वपूर्ण बस्ती थी, उसका विरोध किया। किन्तु वहाँ के जेमोरिन ने पुर्तगालियों का स्वागत किया और उनको काली मिर्च तथा जड़ी-बूटी ले जाने की अनुमति प्रदान की। पुर्तगालियों ने वास्कोडिगामा द्वारा लाई गई वस्तुओं की कीमत यात्रा के सारे खर्चे व व्यापरिक वस्तुओं की लागत की 60 गुना आंकी। इन सब के बावजूद भारत व यूरोप के मध्य सीधे व्यापार का विकास धीरे-धीरे हुआ। इसका एक कारण पुर्तगालियों द्वारा इस क्षेत्र में एकाधिकार स्थापित कर लेना था। प्रारंभ से ही पुर्तगाली शासक पूर्वी व्यापार पर शाही एकाधिकार स्थापित करने के लिए कटिबद्ध थे। इस व्यापार में प्रतिद्वन्दी देशों के अतिरिक्त व्यक्तिगत स्तर पर व्यापार करने वाले व्यापारियों को भी माँग लेने-देने के लिये तैयार नहीं थे। पुर्तगालियों की बढ़ती हुई शक्ति से आशंकित हो कर मिश्र के सुल्तान ने एक जहाजी बेड़ा तैयार करवाया और उसे भारत की ओर भेजा। गुजरात के शासक के कुछ जहाज भी इस में शामिल हो गये। प्रारंभिक एक विजय के बाद, जिसमें पुर्तगाली गवर्नर का पुत्र डान अलमयेदा मारा गया, यह संयुक्त बेड़ा पुर्तगालियों द्वारा 1509 में नष्ट कर दिया गया। इसके पश्चात् हिन्द महासागर में पुर्तगालियों की नौ सैनिक सर्वोपरिता स्थापित हो गई। वे अब पुर्तगाली फारस की खाड़ी तथा लाल सागर क्षेत्र में अपना प्रभाव जमाने में समर्थ हो गये। इस घटना के कुछ समय पश्चात् ही अल्बुकर्क पूर्व में पुर्तगालियों के अधीनस्थ भू-क्षेत्रों का गर्वनर बना। भारत पहुँचने के पश्चात् अल्बुकर्क ने सम्पूर्ण पूर्वी व्यापार पर प्रभुत्व जमाने की नीति के समर्थन की शुरुआत की। इसके लिये उसने एशिया और अफ्रीका के सामरिक महत्व के अनेक स्थानों में किलों की स्थापना की। अपने विचार के समर्थन में उसने लिखा, ‘‘केवल नौ सेना के आधार पर स्थापित कोई भी राज्य अधिक दिनों तक टिक नहीं सकता’’। उसने तर्क प्रस्तुत किया कि किलों की कमी से ’’न तो कोई राजा व्यापार कर सकता है और न तो वह किसी के साथ मित्रता कायम कर सकता है।’’ सन् 1510 में अल्बुकर्क ने बीजापुर से गोवा को छीनकर अपनी नयी नीति का शुभारंभ किया। गोवा का द्वीप एक बढ़िया प्राकृतिक बन्दरगाह और किला था। यह सामरिक स्थल पर स्थित था, यहाँ से पुर्तगाली लोग मलाबार के व्यापार का नियंत्रण कर सकते थे और दक्षिण के राजाओं की नीति का निरिक्षण कर सकते थे। पुर्तगालियों के लिये यह गुजरात के समुद्री बन्दरगाह के बहुत निकट था, जिससे उनकी उपस्थिति का आभास हो सकता था। इस प्रकार पूर्व में गोवा, पुर्तगाली व्यापारिक और राजनीतिक गतिविधियों का मध्य केन्द्र बन गया था। इस प्रकार पुर्तगाली, गोआ के सामने की मुख्य भूमि, पर कब्जा करने में सफल हो गये और बीजापुर के दामन राजौरी और दमोला के बन्दरगाहों को नाकाबन्दी और लूट-पाट करने में सफल हुए। इस प्रकार बीजापुर का सामुद्रिक व्यापार ठप्प हो गया। पुर्तगालियों ने गोवा को आधार बना कर श्रीलंका के कोलम्बो, सुमात्रा के सचिन पर किले बनाकर अपनी स्थिति को सुदृढ़ किया और मलय प्रायद्वीप तथा सुमात्रा के बीच स्थित संकरी खाड़ी में होने वाले आवागमन का मलक्का बंदरगाह से नियंत्रण किया। अदन के किनारे, लाल सागर के मुहाने पर स्थित, सोकोत्रा के द्वीप पर भी पुर्तगालियों ने अपना ठिकाना बनाया तथा ओरमूफ के शासक (जिसका फारस की खाड़ी के मार्ग पर नियंत्रण था।) को इस बात के लिए बाध्य किया कि उन्हें वहाँ पर एक किला बनाने की अनुमति दे। पुर्तगालियों की सफलता वास्तविक रूप में उतनी नहीं थी, जितनी की प्रतीत होती थी। प्रारंभ से उन्हें कुछ आंतरिक और बाह्य चुनौतियों का सामना करना पड़ा। एक बाह्य चुनौती तुर्कों के द्वारा उपस्थित की गयी, जिनसे कभी-कभी अरबों तथा कुछ भारतीय शक्तियाँ मिल जाया करती थीं। सीरिया, मिश्र और अरेबिया की विजय के बाद तुर्क पूर्वी यूरोप की राजधानी बियना को 1529 में भयभीत किया जिसे रक्षा का द्वार माना जाता था। फारस की खाड़ी और लाल सागर तट पर तुर्की शक्ति के विकास और हिन्द महासागर के पश्चिमी भाग पर प्रभुत्व जमाना तुर्कों और पुर्तगालियों के मध्य संघर्ष का कारण था। आटोमन के प्रसिद्ध वजीर लूफती पाशा ने सन् 1541 के पश्चात् तुर्की सुल्तान प्रतापी को लिखा ‘‘वह सुल्तानों के अधीन बहुतों ने पृथ्वी पर अधिपत्य जमाया, लेकिन बहुत कम लोगों ने समुद्र पर शासन किया। समुद्री युद्ध के संचालन में गैर मुसलमान लोग उनसे आगे हैं। हमें अवश्य उन्हें पराजित करना चाहिए।’’ गुजरात के व्यापार और तटीय क्षेत्रों पर पुर्तगालियों के बढ़ते हुए भय से गुजरात के सुल्तान ने आटोमन शासक के पास राजदूतों का एक दल भेजा जिन्होंने उसे विजय की बधाई दी और सहायता की माँग की। बदले में उस्मानी शासक ने गैर-मुसलमानों अर्थात् पुर्तगालियों से लड़ने के लिए इच्छा व्यक्त की। जिन्होंने अरबिया समुद्री तटों की शांति भंग की है। इस समय से लेकर आगे तक दोनों देशों के बीच लगातार राजदूतों और पत्रों का आदान प्रदान होता रहा। सन् 1529 में पुर्तगालियों को लाल सागर में खदेड़ कर सुलेमान रईस के नेतृत्व में एक जहाजी बेड़ा गुजरात के शासक बहादुरशाह की मदद के लिए भेजा गया। बहादुर शाह ने इनका स्वागत किया और तुर्की पदाधिकारियों में से जिनका नाम भारतीयों जैसा था, क्रमशः सूरत और दीव को प्रान्तीय शासक बनाया। इन दोनों में से रूमी खाँ बाद में चलकर प्रधान तोपजी के रूप में बहुत प्रसिद्ध हुआ। सन् 1531 में स्थानीय लोगों के साथ दुंदुभि सन्धि कर पुर्तगालियों ने दमन और दीव पर आक्रमण किया। लेकिन आटोमन सेनाध्यक्ष रूमी खाँ ने उनके आक्रमण को विफल बना दिया। फिर भी पुर्तगालियों ने समुद्र तट के निचले भाग चोल में एक किला बनाया। गुजरात तुर्की सन्धि मजबूत होने के पूर्व मुगलों की ओर से गुजरात को एक बड़े खतरे का सामना करना पड़ा। हुमायूँ ने गुजरात पर आक्रमण किया। इस खतरे का सामना करने के लिये बहादुर शाह ने बेसीन का द्वीप पुर्तगालियों को दे दिया। मुगलों के विरुद्ध एक रक्षात्मक और आक्रामक संधि भी सम्पन्न हुई और दीव में पुर्तगालियों को एक किला निर्माण करने की अनुमति प्रदान की गई। इस प्रकार पुर्तगाली गुजरात में अपना पाँव जमाने में सफल हुए। पुर्तगालियों को सुविधाएँ प्रदान करने के पश्चात् शीघ्र बहादुर शाह को पश्चाताप करना पड़ा। मुगलों को गुजरात से निकाल बाहर करने के साथ ही पुनः उसने आटोमन सुल्तान से मदद की याचना की और यह प्रयत्न किया कि पुर्तगाली कब्जा दीव से आगे न बढ़े। किले के गर्वनर के जहाज पर संधि वार्ता के दौरान बहादुरशाह को विश्वासघात का संदेह हुआ। हाथापाई के परिणामस्वरूप पुर्तगाली प्रान्तीय शासक मारा गया और बहादुरशाह समुद्र तट पर तैरते हुए डूबकर मर गया। यह घटना सन् 1536 की है। यद्यपि आटोमन सुल्तान इस्लाम के रक्षक होने का दावा करते थे और इस प्रकार वे फारस की खाड़ी और उसके पार भी पुर्तगालियों के विरोधी थे, उन्होंने व्यवहारिक रूप से अपनी स्थिति के लिये गंभीरता से फारस की खाड़ी या उसके पार कभी संघर्ष नहीं किया। इस तथ्य के बावजूद भी तुर्कों ने शस्त्रों के विकास का काम जारी रखा और कुछ हद तक पश्चिम में नौ सैनिक शक्ति का विकास की ओर भी ध्यान दिया। तुर्की नौ सेना ने पूर्वी भू-मध्य सागर में अपना प्रभुत्व कायम रखा और जिब्राल्टर के पार भी आक्रमण किया। सन् 1536 में भारतीय समुद्र में पुर्तगालियों के विरुद्ध तुर्की ने अपनी सबसे बड़ी नौ सैनिक शक्ति का प्रदर्शन किया। इस बेड़े में 45 जहाज थे, 20,000 व्यक्ति थे, जिनमें 7000 पैदल सैनिक या जानिस्सारि शामिल थे। इस बेड़े का अधिकारी सल्तनत का सबसे बड़ा विश्वासपात्र व्यक्ति 82 वर्षीय सुलेमान माशा था। उसे कैरों का प्रान्तीय शासक नियुक्त किया गया था। जहाजी बेड़ा सन् 1538 में दीव पहुँचा और उसे घेर लिया। दुर्भाग्य वश तुर्की सेनापति के उद्दंड व्यवहार के कारण गुजरात के सुल्तान ने अपना समर्थन वापस ले लिया। दो माह के घेरे के पश्चात् दीव की विशाल पुर्तगाली जंगी बेड़ों के आने की सूचना पाकर तुर्की बेड़ा पीछे हट गया। पुर्तगालियों के लिए दो शताब्दी तक तुर्कों का खतरा बना रहा। सन् 1551 में पेरी रईस ने कालीकट के जमोटिन की सहायता से मस्कत और ओरमुज के किलों पर आक्रमण किया। इसी बीच पुर्तगालियों ने दमन को उसके शासक से प्राप्त कर लिया और अपनी स्थिति को मजबूत कर लिया। सन् 1554 में अलि रईस के नेतृत्व में उस्मानी तुर्कों द्वारा अंतिम आक्रमण किया गया। इन तुर्कों द्वारा अंतिम आक्रमणों की असफलता के परिणामस्वरूप तुर्कों के दृष्टिकोण में परिवर्तन आया। सन् 1566 में पुर्तगालियों और उस्मानी ने एक समझौता किया कि वे मसाले और भारतीय व्यापार में साझेदारी करेंगे और अरब सागर में संघर्ष नहीं करेंगे। उस्मानियों ने पुनः एक बार अपना ध्यान यूरोप पर लगाया और पुर्तगालियों से पूर्वी देशों के साथ ही व्यापार को आपस में बाँटने का समझौता कर लिया। इससे उन्हें मुगलों की बढ़ती हुई शक्ति के साथ सन्धि करने की आवश्यकता नहीं रही। परन्तु जैसा की हम देखेंगे, इसके कुछ आर्थिक परिणाम भी हुए। भारतीय वाणिज्य और व्यापार पर पुर्तगालियों का प्रभावप्रारंभ से पुर्तगाली ना तो हिन्द महासागर के विशाल विस्तार को नियंत्रित रख सके, न व्यापार या व्यापारियों पर नियंत्रण प्राप्त कर सके। वे केवल कुछ सामानों के व्यापार पर एकाधिकार कर सके और अन्य लोगों पर कर थोपने में सफल हो सके। इस प्रकार काली मिर्च, अस्त्र-शस्त्र और गोला बारुद तथा युद्ध के लिये घोड़ों के व्यापार पर शाही एकाधिकार माना गया। इन सामानों के व्यापार के लिये किसी भी देश को यहाँ तक कि पुर्तगाल के निजी व्यापारियों को भी अनुमति नहीं दी गई। ऐसे जहाज जो अन्य वस्तुओं के व्यापार में व्यस्त थे, उन्हें पुर्तगाली अधिकारियों से अनुमति पत्र लेना पड़ता था। पुर्तगाली ने पूर्व या अफ्रीका की ओर जाने वाले जहाजों को गोवा होकर जाने के लिए दबाब डालने का भी प्रयास किया।इन नियमों को लागू करने के लिये पुर्तगालियों ने निषिद्ध माल के व्यापार में लगे किसी भी संदेहात्मक जहाज की तलाशी लेने के लिए अपने अधिकार का दावा किया। जो जहाज तलाशी के लिए तैयार नहीं होते उन्हें युद्ध का पुरूस्कार मान लिया जाता था और उन्हें डुबा दिया जाता था या कैद कर लिया जाता था। उन पर सवार नर-नारियों को गुलाम बना लिया जाता था। इससे निरंतर युद्ध की स्थिति बनी रही। पुर्तगालियों ने शीघ्र ही यह अनुभव कर लिया कि समुद्री व्यापार से उन्हें जो कुछ भी लाभ होता था उसकी अपेक्षा उन्हें स्थानीय व्यापार में नुकसान अधिक हो रहा है। समुद्री व्यापार की उनकी यह पद्धति भी एशिया के समुद्री व्यापार की खुली परम्पराओं के विपरीत थी। यह सत्य है कि एशिया के अनेक जहाज तोप और सैनिक ढोते थे लेकिन ये मालाबार और अरब समुद्री तट पर उपद्रव मचाने वाले जलदस्युयों की तुलना में अधिक सुरक्षित थे। एशियाई व्यापार के प्रचलित तौर तरीकों में पुर्तगाली बहुत मुश्किल से कुछ परिवर्तन ला सके। एशिया के बहु लाभ दायक व्यापार जैसे कि भारतीय वस्तु व्यापार, चाँवल एवं चीनी के व्यापार, दक्षिण पूर्वी भाग के मसालों के व्यापार, पश्चिमी एशिया के सोने और घोड़ों के व्यापार तथा चीनी मिट्टी एवं रेशम के व्यापार पर, गुजराती एवं अरबी व्यापारियों ने अपना प्रभुत्व जमाए रखा। प्रारंभ से लेकर दो दशकों तक पुर्तगाली काली मिर्च और मसाले के यूरोपीय व्यापार पर भी एकाधिपत्य नहीं जमा पाए थे। सोलहवीं शताब्दी के अंत तक निकट पूर्व और मिश्र के बाजारों में काली मिर्च का निर्यात स्थल मार्ग और लाल सागर द्वारा पहले जितनी भारी मात्रा में किया जाता था उतना ही अंत तक जारी रहा। इसका कारण यह था कि एशिया के बड़े साम्राज्य के मुगलों और सफवी स्थल व्यापार को बढ़ाने और रक्षा करने में समर्थ थे। यह इसलिये भी संभव था, क्योंकि गुजराती लोग दक्कन दीव और लाल सागर होकर सुमात्रा में अचिक से मिश्र तथा एक नया व्यापार मार्ग खोजने में सफल हुए जहाँ पुर्तगाली नौ सेना काम नहीं कर सकती थी। पुर्तगाली न तो गोवा को एशियाई व्यापार का महत्वपूर्ण केन्द्र बनाने में समर्थ हो सके और न ही वे काम्बे और इसके उत्तराधिकारी गुजरात के सूरत बदंरशाह को ही प्रभावहीन बना सके। वे केवल मालाबार व्यापार पर विपरीत प्रभाव डाल सके और बंगाल के समुद्री व्यापार को यह चटगाँव से नष्ट कर सके। भारत और जापान के साथ व्यापार का आरंभ पुर्तगालियों की देन है, जहाँ से ताँबा और चाँदी प्राप्त किये जाते थे। उन्होंने व्यापक रूप से यह प्रदर्शित किया। भारत जैसे विकसित देश में भी किस प्रकार नौ सेना शक्ति का प्रयोग व्यापार में परेशान करने और बाधा डालने में किया जा सकता है। यूरोपीय पुनर्जागरण के कारण विकसित यूरोपीय विज्ञान एवं तकनीक को भारत लाने का काम भी पुर्तगालियों ने नहीं किया। कुछ अंश तक इसका कारण यह था कि इटली और उत्तरी यूरोप की तरह ही स्वयं पुर्तगाली भी इस पुनर्जागरण से प्रभावित नहीं थे। बाद में कैथोलिक धर्म के विकास के साथ यहूदियों में प्रतिक्रिया हुई। उन्होंने इसकी ओर अपना ध्यान उन्मुख किया। उन्होंने भी मध्य अमेरिका से आलू, तम्बाकू, मकई आदि जैसे कुछ कृषि उत्पादनों को भारत लाने में मदद की। मुगलों की शक्ति के उदय के पश्चात् इनका चारों ओर प्रचार हो गया। तालिकोटा में 1565 की विजयनगर की पराजय से दक्कनी राज्यों को इतना साहस बँधा कि उन्होंने दक्षिणी तट से पुर्तगालियों को भगाने के लिए संयुक्त प्रयत्न किया। जब तक दक्षिण में बीजापुर को विजयनगर से खतरा बना रहा, तब तक पुर्तगालियों के साथ शान्ति उसके लिए आवश्यक थी क्योंकि घोड़ों के व्यापार पर उनका अधिकार था और उसके साथ छेड़छाड़ का मतलब यह होता है कि वह व्यापार विजयनगर के पक्ष में हो जाता। बीजापुर के सुल्तान अली आदिल शाह ने 1570 में अहमदनगर के सुलतान के साथ एक समझौता किया। कालिकट के जेमोरियन को भी इस समझौते में शामिल किया गया। इन सुल्तानों ने अपने-अपने क्षेत्र में पुर्तगाली स्थलों पर आक्रमण करने का निर्णय किया। गोवा पर आक्रमण का नेतृत्व स्वयं आदिल शाह ने किया, जबकि चोल पर निजाम शाह ने घेरा डाला। लेकिन एक बार फिर पुर्तगाली सुरक्षा-पंक्ति जिसकी सहायता के लिए नौ-सैना तैनात थी, उनके लिए बहुत मजबूत सिद्ध हुई। इस प्रकार पुर्तगाली भारतीय समुद्रों और दक्षिणी तट के अधिपति बने रहे। | |||||||||
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