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20वीं सदी की विरासत
अपनी बात हमने इस तर्क से आरंभ की थी कि पिछले लगभग सौ साल के समय को मानव इतिहास का विशिष्ट काल खंड माना जा सकता है। यह बताया जा चुका है कि इस काल की कई खूबियाँ हैं। इनमें से एक खास खूबी यह है कि दुनिया एक हो गई है। इस पुस्तक में विवेचित घटनाएँ और परिवर्तन इसको प्रमाणित करते हैं। दुनिया परस्पर निर्भर हो चुकी है और दुनिया के किसी भी हिस्से में घटी घटना का हर जगह तत्काल असर होता है।
बहरहाल यदि एक विशेष अर्थ में देखें तो दुनिया सचमुच एक नहीं हुई है। इम देख चुके हैं कि साम्राज्यों की दुनिया ढह चुकी है लेकिन साम्राज्यों के ढह जाने से शोषण पर आधारित अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का अंत नहीं हुआ है। दुनिया का अधिकांश भाग अभी भी आर्थिक शोषण का शिकार है। यह शोषण धनी और आर्थिक रूप से विकसित देशों द्वारा किया जाता है। उपनिवेशकालीन शासन के दौरान स्थापित आर्थिक शोषण की व्यवस्था अधिकांश देशों में अब भी पहले की तरह चल रही है। कोई भी देख सकता है कि आज की दुनिया तीन हिस्सों में बँटी हुई है - यानी दुनिया के भीतर तीन दुनिया का अस्तित्व है, पहली दुनिया में पश्चिम के विकसित देश और जापान की गिनती होती है, दूसरी दुनिया में विकसित समाजवादी देश आते हैं (इनमें से अधिकांश नई अर्थव्यवस्था शुरू करने की प्रक्रिया में हैं), बाकी बचे देशों की गिनती तीसरी दुनिया में होती है। इनमें से अधिकांश देश पहले उपनिवेश अथवा अर्ध उपनिवेश थे। इन्हीं को विकासशील देश भी कहा जाता है। तीसरी दुनिया के देश अभी भी कच्चे माल, कृषि उपज तथा खनिज वस्तुओं के उत्पादक और आपूर्ति करने वाले हैं। इन देशों की अधिकांश जनता भुखमरी, बेरोजगारी और निरक्षरता का शिकार है। इस विभाजन को अकसर उत्तर तथा दक्षिण में भी विभाजित किया जाता है, आर्थिक रूप से विकसित देशों को उत्तर और अल्पविकसित और विकासशील देश दक्षिण कहलाते हैं। प्रौद्योगिकी में विकास के बावजूद विकसित और विकासशील देशों के बीच की खाई नहीं पट सकी है। विश्व की आबादी का अधिकांश हिस्सा गरीबी की हालत में जीता है। अनुमान लगाया गया है कि 1990 तक दुनिया की आबादी पाँच हजार आठ सौ करोड़ हो जाएगी। इसमें से लगभग चार हजार करोड़ लोग (लगभग 70 प्रतिशत) तीसरी दुनिया में रहते हैं। चार हजार करोड़ लोगों का जीवन स्तर सबसे धनी देशों के लोगों के जीवन स्तर की तुलना करने पर कुल 5 से 10 प्रतिशत के बीच बैठता है। जहाँ संपन्न देशों के सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जी. एन. पी.) की प्रति व्यक्ति आय 10,750 डॉलर है लेकिन निचले और मध्यम आय वाले देशों के सकल राष्ट्रीय उत्पादक की प्रति व्यक्ति आय 700 डॉलर तथा दक्षिण एशियाई देशों की 240 डॉलर है। आज लगभग 50 हजार लाख लोग ऐसे हैं जो भुखमरी का जीवन बिता रहे हैं। जहाँ विकसित देश में पैदा होने वाला हर बच्चा जिंदा रहता है इसके विपरीत तीसरी दुनिया में जो बच्चे जन्म लेते हैं, उनमें 1000 बच्चों में से 93 बच्चे पैदा होने के एक साल के भीतर काल के गाल में समा जाते हैं। अनुमान लगाया गया है कि एक स्विस व्यक्ति जिन चीजों का उपयोग करता है, वह एक सुमाली नागरिक द्वारा किए गए उपभोग का 40 गुना है अथवा ब्रिटेन में एक बिल्ली को उतना ही प्रोटीनयुक्त आहार उपलब्ध होता है जितना एक औसत अफ्रीकावासी को मिलता है। 9620 करोड़ इस समय विश्व में निरक्षरों की संख्या है, इसमें 9,200 करोड़ लोग (तकरीबन 95 प्रतिशत) तीसरी दुनिया के देशों में रहते हैं। उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध, गरीब और धनी देशों के बीच यह असमानता कोई संयोग या ईश्वर प्रदत्त नहीं है। यह उन स्थितियों से उपजी है जो सौ वर्ष से भी अधिक समय में साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद ने उत्पन्न की हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ एक विश्व की अवधारणा का प्रतीक है। दुनिया के लगभग सभी बड़े और छोटे देशों को इसमें समान सदस्य के रूप में प्रतिनिधित्व मिला हुआ है। इसमें कुछ की आबादी कुछ लाख भर है, जबकि अन्य देशों की कई करोड़ है। संयुक्त राष्ट्र संघ का घोषणा-पत्र (इसको अध्याय 4 में उद्धृत किया गया है) संयुक्त राष्ट्र संघ की जनता के दृढ़ निश्चय को व्यक्त करते हुए कहता है कि ‘‘युद्ध की तबाही से अगली पीढ़ियों को बचाने के लिए..... मानव के मूल अधिकारों में अपनी अटूट आस्था जताने के लिए, व्यक्ति मानव के सम्मान तथा उसकी योग्यता के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करने के लिए, व्यापक स्वाधीनता में सामाजिक प्रगति और रहन-सहन के बेहतर जीवन स्तर को बढ़ावा देने के लिए .... सभी लोगों का आर्थिक और सामाजिक उन्नति के लिए संपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय साधनों का उपयोग करने का’’, हम संकल्प करते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ का सार्वभौम मानवाधिकारों का घोषणा-पत्र 1984 में स्वीकार किया गया था। इसमें नागरिक अधिकारों तथा स्वतंत्रताओं पर बल दिया गया है, वे अधिकार हैं - भाषण और प्रकाशन की स्वतंत्रता, संगठन बनाने या संगठित होने की स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता, आंदोलन करने की स्वतंत्रता, बिना कारण बताए गिरफ्तार करने और जेल में डालने से स्वतंत्रता और देश की सरकार में अपनी बात रखने की राजनीतिक स्वतंत्रता। इसके साथ ही आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता जिसमें काम करने का अधिकार सामाजिक सुरक्षा का अधिकार तथा उस स्तर की आमदनी का अधिकार, जो मानवीय गरिमा से मेल खाती हो, आराम करने तथा अवकाश का अधिकार और शिक्षा का अधिकार। दक्षिणी गोलार्ध की अधिकांश जनता और उत्तरी गोलार्ध की भी कुछ जनता आज भी सामाजिक और आर्थिक अधिकारों से वंचित है। लेकिन ऐसा कहने का यह अर्थ नहीं लिया जाना चाहिए कि नागरिक अधिकारों तथा नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक स्वतंत्रता की हालत पूरी दुनिया में अच्छी है। सामाजिक और आर्थिक अधिकारों से वंचित रखना मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग है। अध्याय 6 में जिस नई अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की रचना का संदर्भ आया है, वह दुनिया को एक करने के लिए जरूरी है यदि पिछले चार दशकों के दस्तावेजों से हम कुछ संकेत ग्रहण करें तो इस बात की संभावना है कि यह प्रकिया न सिर्फ लंबी बल्कि परम दुखदाई भी होगी। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से विनाश के साधनों का जबरदस्त विकास हुआ है, इसके कारण ‘एक विश्व’ और आवश्यक बन गया है। कुछ विद्वानों ने सुझाया है कि आधुनिक सभ्यता का आरंभ बिंदु एक नए तिथिक्रम से माना जाना चाहिए जिसमें हिरोशिमा पर जिस वर्ष बम गिराया गया था, उसे प्रथम वर्ष कहा जाना चाहिए। हिरोशिमा को नष्ट करने वाला बम छोटा बच्चा (लिटिल बॉय) नाम से जाना जाता है। उस बम की विस्फोटक शक्ति 20,000 टन टी. एन. टी. के बराबर थी। अधिक-से-अधिक विनाशकारी हथियार बनाने की पागल दौड़ के फलस्वरूप आज विश्व में लगभग 50 हजार नाभिकीय मौजूद हैं। इनकी संहारक क्षमता हिरोशिमा पर गिराए गए बम की तुलना में 25 लाख गुना अधिक है। अनुमान लगाया गया है कि आज कुल जितने नाभिकीय बम दुनिया में बनाकर रखे गए हैं, उनमें यदि दुनिया की जनसंख्या का भाग कर दिया जाए तो परिणाम 5 टी. एन. टी. आएगा। इसका अर्थ यह हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति, स्त्री तथा बच्चे के लिए नाभिकीय शस्त्रागार में 15 टन टी. एन. टी. के बराबर बम मौजूद हैं। इससे पूरी मानव जाति का एक बार की कौन कहे कई बार संहार किया जा सकता है। पिछले दशकों में संसार की अविभाज्यता को उतनी तल्खी से किसी बात ने सामने नहीं रखा है जितना मानव के समग्र संहार के लिए मनुष्यों द्वारा तैयार किए गए हथियारों ने सामने रखा है। जिन लोगों ने इनका विकास किया है, वे भी इस बात से सहमत हैं कि नाभिकीय हथियारों वाले युद्ध में कोई पक्ष भी विजेता नहीं होगा। 1980 के दशक के मध्य में कई देशों के वैज्ञानिकों को मिलाकर एक समिती गठित की गई थी, इस समिति ने अनुमान लगाया था कि यदि नाभिकीय शस्त्रों का युद्ध में उपयोग हुआ तो पृथ्वी पर 20 हजार लाख प्राणी अबिलंब नाभिकीय ज्वाला में जलकर राख हो जाएँगे, अणु-प्रभावित होंगे अथवा रेडियोधर्मी किरणों से मारे जाएँगे। इसके तुरंत बाद ‘‘नाभिकीय शीत’’ का काल आरम्भ हो जाएगा क्योंकि पृथ्वी की सतह पर धुएँ तथा राख की एक मोटी परत कालीन की तरह बिछ जाएगी। जलते हुए नगरों, वनों, खेतों, कारखानों और तेज से यह राख और धुआँ पैदा होगा। पृथ्वी पर सभी विकसित जैविकता (पशु, प्राणी, वनस्पति आदि) निष्प्राण हो जाएगी और इस पृथ्वी नामक ग्रह का इतिहास 30 या 40 हजार लाख वर्ष पीछे चला जाएगा। जीवन के जो रूप पृथ्वी पर करोड़ों-करोड़ों साल की लंबी प्रक्रिया के दौर से होकर विकसित हुए हैं, उनका अस्तित्व ही नहीं रहेगा। संभव है कि कुछ अत्यंत सूक्ष्म जैविकता का रूप बचा रह जाए जिसके भीतर से करोड़ों साल पहले उच्चतर रूपों का विकास हुआ होगा। पहले संकेत किया जा चुका है कि खगोल भौतिकीविद इस बात की खोज में लगे हुए हैं कि इस ब्रह्माण्ड में कहीं और जीवन है अथवा नहीं। इस दिशा में उनको अभी तक कोई सफलता नहीं मिली है। कुछ वैज्ञानिकों का मत है कि ब्रह्माण्ड में कहीं और जीवन के होने की कोई संभावना नहीं है। इस बात की संभावना है कि पृथ्वी के अलावा और किसी ग्रह पर जीवन के होने के कोई संकेत ही न मिलें और सिर्फ पृथ्वी पर ही जीवन हो लेकिन जीवन का यह छोटा सा चिन्ह भी नष्ट हो जाएगा, यदि नाभिकीय युद्ध हुआ तो। उस स्थिति में जीवन के अतिसूक्ष्म अविकसित चिन्ह ही बचे रह जाएँगे। नाभिकीय युद्ध में विनाश की कोई सीमा नहीं होगी। इसमें उत्तर-दक्षिण, विकसित और विकासशील सब कुछ स्वाहा हो जाएगा। इतनी जानकारी के बाद भी इन विनाशकारी हथियारों का उत्पादन, परीक्षण और भंडारण होता गया है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में विश्व ने सैकड़ों युद्धों और सशस्त्र टकरावों को देखा है। बहरहाल, लेकिन अभी तक विश्वव्यापी युद्ध नहीं छिड़ सका है। इसका श्रेय कभी-कभी इन विनाशकारी हथियारों को दिया जाता है। कुछ देश इन हथियारों का विकास तथा अपने पास इनके होने को इस आधार पर उचित बताते हैं कि इनसे किसी भावी आक्रमण पर रोक लगती है। इनको शांति का रक्षक कहकर भी न्यायोचित ठहराया जाता है क्योंकि कहा जाता था कि ये ‘‘परस्पर विनाश को सुनिश्चित’’ करते हैं यानी यह सबको नष्ट करने के लिए आश्वस्त करते हैं। यह बहुत अटपटा लगता है कि इनका अब भी विकास जारी है, इस बात को जानते हुए भी कि इनका उपयोग नहीं किया जा सकता है। एक बात यह भी है कि हम इस बात को सुनिश्चित कर सकते हैं कि इनका इस्तेमाल नहीं किया जाएगा ? यदि जानबूझ कर इनके इस्तेमाल का निर्णय कोई न भी ले तो दुर्घटना की संभावना तो बनी ही रहती है। अतीत में ऐसे अवसर आ चुके हैं जब इनके उपयोग पर विचार किया गया था। केवल पूर्ण प्रतिबंध, इन हथियारों को एकदम समाप्त करने के बाद ही यानी नाभिकी निरस्त्रीकरण से ही मनुष्य के भावी जीवन की सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सकता है। निरस्त्रीकरण का सवाल बहुत घनिष्ट रूप से विकास के सवाल से जुड़ा हुआ है। अनुमान लगाया गया है कि हथियारों पर किया जाने वाला सिर्फ पाँच हफ्ते का खर्च विश्व के प्रत्येक परिवार को पीने का स्वच्छ जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराने के लिए काफी है। आज हथियारों पर जो भी संसाधन खर्च हो रहा है, उसका एक अंश ही अभाव तथा कष्ट का अंत कर सकता है और उसी से तीसरी दुनिया के आर्थिक विकास की गति तेज हो सकती है। दूसरा एक और सवाल है जिसके कारण एक विश्व की परिकल्पना अनिवार्य हो गई है। यह सवाल पर्यावरण का है। यह भी विकास की समस्या से घनिष्ट रूप से जुड़ी हुई है। विश्व स्तर पर पर्यावरण के लिए खतरे की गंभीरता की तुलना नाभिकीय शस्त्रों के खतरों से की जा सकती है। इस संबंध में जनसंख्या का विकास एक प्रमुख मुद्दा है। इस शताब्दी के आरंभ में दुनिया की आबादी 16 हजार लाख थी जो 1990 में बढ़कर तकरीबन 5.8 बिलियन (10,000 लाख-1 बिलियन) हो गई है। यदि वर्तमान दर पर यह बढ़ती रही तो इक्कीसवीं सदी के मध्य तक यह 12 से 14 बिलियन के बीच पहुँच जाएगी। आज प्रतिवर्ष 20 टन खनिज पदार्थ निकाला जाता है तथा एक व्यक्ति पूरे साल में एक टन कूड़ा फेंकता है। पृथ्वी के संसाधनों का दोहन पहले ही चौंकाने वाली सीमा को पार कर गया है। पृथ्वी कितनी मानव जनसंख्या का भरणपोषण कर सकती है। यह अत्यंत गंभीर और विवाद का मुद्दा है। जनसंख्या का सवाल विकास से भी घनिष्ट रूप से जुड़ा है। विश्व की लगभग 70 प्रतिशत आबादी तीसरी दुनिया में रहती है और तीसरी दुनिया में ही ज्यादा आबादी बढ़ रही है। संपन्न देशों में जनसंख्या स्थिर हो गई है। जनसंख्या और विकास में जुड़े हुए हैं। इसलिए तीसरी दुनिया के विकास के लिए विश्व स्तर पर आह्वान की भी आवश्यकता है। पृथ्वी के साधनों के दोहन (इसमें तीसरी दुनिया के संसाधन भी शामिल हैं) की दर इतनी ऊँची इसलिए है क्योंकि संपन्न देशों में इन संसाधनों की उपभोग की दर काफी ऊँची है। उदाहरण के लिए, ऐसा अनुमान है कि उत्तरी अमरीका में उर्जा की खपत पूरे विश्व की ऊर्जा की खपत का 33 प्रतिशत (विश्व की आबादी का 5 या 6 प्रतिशत आबादी वाला देश है) है। विश्व की वर्तमान अर्थव्यवस्था न सिर्फ विश्व की मौजूदा असमानता की जड़ है बल्कि पृथ्वी में संचित संसाधनों के अधिकाधिक दोहन की भी कारक है। पर्यावरण का विनाश किसी एक क्षेत्र या देश का सवाल नहीं रह गया है। ‘‘जिन चीजों से मनुष्य का जीवन संभव बनता है, उन सबका प्रदूषण और विनाश’’ आज मानव जाति की केंद्रीय समस्या हो गई है। औद्योगिक प्रदूषण की समस्या केवल उन देशों तक सीमित नहीं है, जहाँ से यह पैदा होता है। प्रदूषक तत्व हवाओं के जरिए यात्रा करते हैं। यह यात्रा हजारों किलोमीटर की होती है तथा इस यात्रा के लिए किसी पासपोर्ट (पारपत्र) की आवश्यकता नहीं होती है। ये हवा तथा पानी को प्रदूषित करते हैं तथा झीलों और वनों में पशु जगत को नुकसान पहुँचाते हैं। अनुमान लगाया गया है कि यूरोप में वन क्षेत्र का 22 प्रतिशत तेजाबी बारिश से नष्ट हो चुका है और हजारों झीलों में रहने वाले जलचर मर चुके हैं। एक अनुमान के मुताबिक सारी वनस्पति और पशुओं का बीस प्रतिशत दुनिया में सिर्फ 25 सालों में नष्ट हुआ है। समुद्र में जीवों और पौधों को खतरा पैदा हो गया है क्योंकि इसको गंदगी और प्रदूषण का कूड़ादान बना दिया गया है। दुनिया के किसी भी हिस्से में इधर-उधर घूमने फिरने वाले पशुओं और पक्षियों के लिए पर्यावरण की क्षति खतरा बन सकती है। पर्यावरण प्रदूषण से पृथ्वी के चारों ओर की ओजोन की छतरी को खतरा है क्योंकि यह दिनोंदिन पतली होती जा रही है। इससे पृथ्वी के सभी प्रकार के प्राणियों और वनस्पतियों का जीवन खतरे में है। परिवेश के विनाश का श्रीगणेश चाहे जिस भी जगह से हो, इसकी कोई राजनीतिक सीमा नहीं है, किसी एक देश की चिंता का विषय नहीं है या मात्र कुछ देशों के सरोकार तक यह सीमित नहीं है। यह हम सबको प्रभावित करता है। सिर्फ मानव जीवन को ही नहीं, जीवन के सभी रूपों को इससे भारी खतरा है। 26 अप्रैल 1986 को सोवियत संघ के यूक्रेन प्रांत में चेर्नोविल नामक स्थान पर एक नाभिकीय पावर स्टेशन में दुर्घटना हुई थी, उसके विकिरण का प्रभाव क्षेत्र 3,000 किलोमीटर दूर तक था। इन सबका मतलब यह है कि एक दुनिया की रचना, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और शांति पर आधारित विश्व की रचना केवल सद्भावना की बात नहीं रह गई है बल्कि यह अस्तित्व की जरूरत है। अब यह विश्वास करना संभव है कि पिछले दो-तीन वर्ष इतिहास में नए मोड़ को इंगित करते हैं। 1980 के दशक के मध्य में लगा था कि शीत युद्ध फिर से जीवित हो रहा है, अब संभवतः हमेशा के लिए समाप्त हो चुका है। इस उम्मीद के लिए ठोस आधार हैं कि तनाव में कमी का जो समय शुरू हुआ था, उसकी विश्व में परिणति सहमति और सौहार्द्र में होगी। यह सिर्फ युद्धविहीन विश्व के लिए नहीं होगा बल्कि जितनी समस्याओं का मानव जाति सामना कर रही है, नई दुनिया में उन सबका समाधान आपसी सहयोग से किया जाएगा। | |||||||||
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