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द्वितीय विश्‍व युद्ध - विश्‍व का भीषण नरसंहार

युद्ध का आरंभ

   23 अगस्त, 1939 को सोवियत संघ और जर्मनी ने अनाक्रमण संधि पर हस्ताक्षर किए। अब पोलैण्ड पर आक्रमण का आधार तैयार हो चुका था। जैसाकि कहा जा चुका है, हिटलर को विश्वास था कि पश्चिमी शक्तियाँ पहले की ही तरह इस आक्रमण को अपनी मौन सहमति दे देंगी। उसने अपने सेनापतियों से कहा था, ’’हमारे शत्रु क्षुद्र कीड़ों के समान हैं। मैं उन्हें म्यूनिख में ही देख चुका हूँ।’’ हिटलर की सेनाओं ने 1 सितंबर, 1939 को पोलैण्ड पर हमला कर दिया। 3 सितंबर 1939 को ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी के खिलाफ लड़ाई का ऐलान कर दिया। चूँकि लड़ाई की इस घोषणा के बाद भी पोलैण्ड को ब्रिटेन और फ्रांस से कोई भी मदद न मिली, इसलिए कोई तीन हफ्तों में ही उसकी पराजय हो गई। ब्रिटेन और फ्रांस न तो प्रत्यक्ष रूप से पोलैण्ड की मदद के लिए आए और न ही उन्होंने पश्चिम में जर्मनी के खिलाफ कोई सैनिक कार्रवाई की। इस प्रकार दूसरा विश्व युद्ध आरंभ तो हो चुका था, मगर वह अभी पूर्व में यूरोप के एक छोटे से हिस्से तक ही सीमित था। युद्ध की घोषणा के बाद कोई सात महीनों तक ब्रिटेन और फ्रांस तथा जर्मनी के बीच कुछ छोटी-मोटी समुद्री झड़पों को छोड़ कोई बड़ी लड़ाई नहीं हुई। द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहास के इस काल को ’नकली युद्ध’ (Phoney war) कहा जाता है।
   पोलैण्ड पर जर्मन हमले के कुछ ही दिनों बाद सोवियत संघ ने पोलैण्ड के पूर्वी भाग पर कब्जा कर लिया। इसमें वे क्षेत्र शामिल थे जो पहले कभी रूसी साम्राज्य के यूक्रैन और बाइलोरूस के अंग रह चुके थे। इन क्षेत्रों को सोवियत संघ के यूक्रैनी और बाइलोरन्सी गणतंत्रों में शामिल कर लिया गया। इन क्षेत्रों पर सोवियत संघ के कब्जे को इस आधार पर उचित ठहराया गया कि इन्हें प्रथम विश्व युद्ध के बाद पोलैण्ड ने उससे छीन लिया था और यह कि पोलैण्ड में जर्मनी के बढ़ आने से उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ गई थी। अनेक पश्चिमी इतिहासकारों का मत है कि पोलैण्ड के पूर्वी भाग पर सोवियत संघ का कब्जा उसके बँटवारे के लिए सोवियत-जर्मन योजना का ही एक हिस्सा था। नवंबर 1939 में सोवियत संघ और फिनलैंड के बीच युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध का खात्मा मार्च 1940 में सोवियत-फिनिश शांति संधि पर हस्ताक्षर के साथ हुआ। इस संधि के अनुसार सोवियत संघ को फिनलैंड के उत्तर में एक नौसैनिक अड्डा और कुछ क्षेत्र मिल गया और दोनों देशों ने तय किया कि दोनों में से कोई भी किसी एक के भी दुश्मन देश से हाथ नहीं मिलाएगा। इस काल में सोवियत संघ अपने सैनिक अड्डे बाल्टिक राज्यों (लैट्विया, लिथुआनिया और एस्टोनिया) में बना चुका था जो कभी रूसी साम्राज्य के अंग थे। पर प्रथम विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्र हो गए थे। अगस्त 1940 तक इन देशों में सोवियत गणतंत्रों की स्थापना हो चुकी थी और वे सोवियत संघ के भाग बन चुके थे।

युद्ध का आरंभडेनमार्क और नार्वे पर विजय

   अप्रैल 1940 के आरंभ में ब्रिटिश प्रधानमंत्री चैम्बरलेन ने घोषणा की कि ’’हिटलर ने मौका खो दिया था’’ क्योंकि उसने पश्चिम पर उस समय हमला नहीं किया था जबकि पश्चिम इसके लिए तैयार नहीं हुआ था। मगर कुछ ही दिनों में उसकी बात गलत साबित हो गई और महीना भर बाद उसका प्रधानमंत्री पद भी छिन गया। स्वीडन जर्मनी को लौह अयस्क देनेवाला एक प्रमुख देश था और स्वीडन से मालों की आपूर्ति बनाए रखने के लिए नार्वे पर कब्जा करना जर्मनी के लिए महत्वपूर्ण था। इस बीच नार्वे में एक फासीवादी आंदोलन आरंभ हो चुका था और उसका नेता विद्कुन क्विजलिंग, नार्वे पर जर्मनी की विजय सुनिश्चित करने के लिए लगातार जर्मनी के संपर्क में था। 9 अप्रैल, 1940 को जर्मनी ने डेनमार्क और नार्वे पर हमला कर दिया। डेनमार्क ने बिना किसी लड़ाई के ही आत्मसमर्पण कर दिया और नार्वे के फासीवादियों के सक्रिय सहयोग से जून के आरंभ तक नार्वे की भी पराजय हो गई। नार्वे की सहायता के लिए भेजी गई ब्रिटिश और फ्रांसीसी सेनाएँ तो इसके पहले ही नार्वे छोड़कर जा चुकी थीं। डेनमार्क और नार्वे की विजय के बाद जर्मनी को उत्तरी यूरोप में महत्वपूर्ण वायु सैनिक और नौसैनिक अड्डे मिल गए।

बेल्जियम, हालैण्ड और फ्रांस का पतन

   10 मई, 1940 को जर्मनी ने हालैण्ड, बेल्जियम, लक्जेमबर्ग और फ्रांस पर हमला बोल दिया। हालैण्ड ने पाँच दिनों के अंदर समर्पण कर दिया और लक्जेमबर्ग ने मात्र कुछ घंटों में। हमले के 17 दिनों के बाद, 28 मई को बेल्जियम के सम्राट ने अपनी सेनाओं को आत्मसमर्पण के आदेश दिए। इस प्रकार ‘नकली युद्ध’ का काल समाप्त हो गया। 26 मई को लगभग 350,000 ब्रिटिश, फ्रांसीसी और (आत्मसमर्पण की आज्ञा मानने से इंकार करने वाली) बेल्जियन फौजों, जो पीछे हटकर डनकिर्क पहुँच चुकी थीं, का निकाला जाना आंरभ किया गया और 4 जून तक वे ब्रिटेन पहुँचाई जा चुकी थीं। उन्होंने अपनी सभी भारी युद्ध सामग्री डनकिर्क में ही छोड़ दी। इस बीच ब्रिटेन और फ्रांस में कुछ राजनीतिक परिवर्तन भी आए। 10 मई को चैम्बरलेन ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और उसकी जगह विंस्टन चर्चिल एक मिली-जुली सरकार का प्रधान मंत्री बनाया गया। इस सरकार में लेबर पार्टी के क्लीमेंट एटली को उप प्रधानमंत्री बनाया गया। इसके पहले, मार्च 1940 में फ्रांस के प्रधानमंत्री दलादियर को हटाया जा चुका था-इसलिए नहीं कि उसके अंतर्गत फ्रांस ने जर्मनी पर हमला नहीं किया था, बल्कि इसलिए कि सोवियत-फिनिश युद्ध के दौरान वह सोवियत संघ पर हमला करने में नाकाम रहा था। उसकी जगह पॉल रेनाड ने ले ली। इस समय फ्रांसीसी मंत्रिमंडल के अधिकांश सदस्य ‘पराजयवादी’ अर्थात जर्मनी के आगे आत्मसमर्पण के इच्छुक थे। 9 जून को फ्रांस की सरकार पेरिस छोड़कर भाग खड़ हुई और उस पर जर्मन सेनाओं ने 14 जून को कब्जा कर लिया। अब फ्रांसीसी सरकार का प्रमुख मार्शल हेनरी फिलिप पेतैन थी। उसने जर्मनी से शांति की प्रार्थना की। इटली इस समय तक युद्ध से अलग रहा था। अब जबकि फ्रांस और ब्रिटेन की पराजय लगभग निश्चित लग रही थी, वह भी 10 जून को जर्मनी की ओर से शामिल हो गया। 22 जून को पेतैन की सरकार ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसके अनुसार अल्सास-लोरैन को जर्मनी में मिला लिया गया, उत्तरी फ्रांस जर्मन सेनाओं के कब्जे में आ गया और लगभग आधे फ्रांस पर पेतैन की सरकार को नियंत्रण बनाए रखने की छूट दे दी गई। पेतैन की इस कठपुतली सरकार को जो अब स्थानांतरित होकर विची पहुँच चुकी थी, फ्रांसीसी उपनिंविशों पर भी नियंत्रण बनाए रखने की छूट दे दी गई और वह नाजियों से सहयोग करने लगी। चार्ल्स देगाल, जो फ्रांस पर जर्मनी के हमले के समय फ्रांसीसी सेना में कर्नल थे, फ्रांसीसी समर्पण के बाद भागकर ब्रिटेन चले गए थे। देगाल, जो अब जनरल देगाल बन चुके थे, के नेतृत्व में अब स्वाधीन फ्रांस का एक आंदोलन आरंभ हुआ और नाजी जर्मनी से लड़ने के लिए ब्रिटेन में एक फ्रांसीसी सेना का गठन किया गया। फ्रांस के जिस भाग पर नाजियों से सहयोग करने वाली पेतैन सरकार का शासन था, विची फ्रांस के नाम से जाना जाता हैं।

ब्रिटेन की लड़ाई

   लगभग पूरे पश्चिमी यूरोप पर कब्जा कर चुकने के बाद जर्मनी ने अब ब्रिटेन पर हमले की योजना बनाई। इस योजना को ‘समुद्र-सिंह’ का नाम दिया गया। ब्रिटेन पर हमला कर सकना तभी संभव था जबकि इंग्लिश चैनल पर जर्मनी का कब्जा होता क्योंकि ब्रिटेन पहुँचने के लिए जर्मन फौजों का उसे पार करना आवश्यक था। इसलिए ब्रिटिश वायुसेना और नौसेना को नाकारा बनाना जरूरी था ताकि वे चैनल पार कर सकने में बाधक ने हों। जर्मन बमवर्षक और लड़ाकू विमानों ने ब्रिटिश बंदरगाहों, हवाई पट्टियों और हवाई जहाज के कारखानों पर हमले करने आरंभ कर दिए। चैनल तथा ब्रिटेन के बंदरगाहों और नगरों के लिए दोनों देशों के हवाई जहाजों के बीच घमासान युद्ध हुए। जर्मन वायुसेना को ब्रिटिश वायुसेना की अपेक्षा अधिक नुकसान उठाना पड़ा। ब्रिटिश वायुसेना के कड़े प्रतिरोध के कारण जर्मनी ने ब्रिटेन के बड़े नगरों, खासकर लंदन पर रात में हमले शुरू किए ताकि लोगों का मनोबल तोड़ा जा सके। बदले में ब्रिटेन ने जर्मनी पर हवाई धावे किए। ब्रिटेन और जर्मनी की इस हवाई लड़ाई को ब्रिटेन की लड़ाई कहा जाता है। अपने जोशीले भाषणों से ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने ब्रिटिश जनता का मनोबल बनाए रखा। इनमें से कुछेक भाषण विश्व में भाषण कला के प्रसिद्ध उदाहरण माने जाते हैं। अपने देश-वासियों को मात्र ‘‘खून, मेहनत, आँसू और पसीना’’ की पेशकश करते हुए उसने एक भाषण में कहा : ‘‘हालाँकि अनेक पुराने और प्रसिद्ध राज्य गेस्टपो की और नाजी शासन के घिनौने तंत्र की जकड़ में आ चुके हैं, या आ सकते हैं, मगर फिर भी हम अंत तक लड़ेंगे। हम फ्रांस में लड़ेंगे। हम सागरों और महासागरों में लड़ेंगे। हम बढ़ती ताकत और आत्मविश्वास के साथ हवा में लड़ेंगे और किसी भी कीमत पर अपने द्वीप की रक्षा करेंगे। हम समुद्र तटों पर, हवाई ठिकानों पर, खेतों में और सड़कों पर लड़ेंगे और हम पहाड़ियों में लड़ेंगे, मगर हम समर्पण हरगिज नहीं करेंगे।’’ ब्रिटिश अपनी हवाई पट्टियों को किसी खास नुकसान के बिना, सुरक्षित बचाए रखने में और अपने हवाई जहाजों के कारखानों में उत्पादन बढ़ाने में कामयाब रहे। इससे ब्रिटेन की लड़ाई में हुए नुकसान की भरपाई हो गई। ब्रिटिश प्रतिरोध के कारण ‘समुद्र-सिंह’ कार्रवाई को अनिश्चित काल के लिए टाल दिया गया और नवंबर 1940 तक लंदन पर जर्मन हवाई हमले भी कमोबेश पूरी तरह बंद हो गए।

युद्ध के दूसरे क्षेत्र

   इस बीच यूरोप के दूसरे भागों तथा अफ्रीका में भी युद्ध का विस्तार हो चुका था। 27 सिंतबर, 1940 को जर्मनी, इटली और जापान के एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के अनुसार, हर देश ने वचन दिया कि किसी भी एक पर किसी अन्य शक्ति का हमला होने पर वह अपना पूरा समर्थन उसे देगा। जर्मनी और इटली ने जापान के इस दावे को स्वीकार कर लिया कि वह एक वृहत्तर पूर्वी एशिया सहसमृद्धि क्षेत्र स्थापित करना चाहता था। इसका अर्थ था न केवल चीन और मंचूरिया बल्कि पूरे पूर्वी तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया पर जापान की विजय। बदले में जापान ने यूरोप में जर्मनी और इटली के अधिकार को मान्यता दे दी। अक्टूबर 1940 में इटली ने यूनान पर हमला किया, पर उसे कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। तब उसने जर्मनी से सहायता माँगी। नवंबर 1940 और मार्च 1941 के बीच जर्मनी, हंगरी, रोमानिया, चैकोस्लोवाकिया और बुल्गारिया से भी त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर कराके उन देशों में अपनी सेनाएँ भेज चुका था। इस प्रकार ये देश जर्मनी, इटली और जापान के सहयोगी बन गए। इस समय तक हिटलर सोवियत संघ पर हमला करने का मन बना चुका था। उपरोक्त देशों में जर्मन सेनाएँ भेजना भी सोवियत संघ पर हमले की तैयारी का एक अंग था। अप्रैल में जर्मनी ने यूगोस्लाविया में अपनी सेना भेजी और यूनान में भी जो इटली के हमले को नाकाम कर चुका था। अब ये देश भी पराधीन हो गए। जून 1941 तक जर्मनी और इटली ब्रिटेन और सोवियत संघ को छोड़कर पूरे यूरोप पर कब्जा कर चुके थे। इस बीच इटली ने ब्रिटिश सोमालीलैंड तथा सूडान पर हमला बोल दिया था और मिस्र की ओर बढ़ने लगा था। मगर दिसंबर 1941 तक ब्रिटेन अफ्रीका में अपने उन सभी उपनिवेशो को, जिन्हें इटली ने छीन लिया था, न केवल वापस ले चुका था, बल्कि लीबिया को छोड़कर शेष अफ्रीका से भी वह इटली की फौजों को खदेड़ चुका था। फरवरी 1941 में जर्मन सेनाएँ लीबिया भेजी गईं और जर्मनी तथा इटली ने अफ्रीका में अंग्रेजों के खिलाफ एक और मुहिम का आरंभ कर दिया। अफ्रीका की इस लड़ाई का, जो और भी दो साल तक चलती रही।

सोवियत संघ पर जर्मनी का आक्रमण

   पूर्व में हम कम्युनिज्म और सोवियत संघ के प्रति हिटलर की नफरत, पश्चिमी देशों द्वारा हिटलर का तुष्टीकरण, फासीवादी आक्रमण को रोकने के लिए एक गठबंधन कायम करने के बारे में सोवियत संघ के प्रयासों तथा सोवियत-जर्मन अनाक्रमण संधि पर हस्ताक्षर का उल्लेख कर आए हैं। हिटलर का हमेशा यही विचार रहा था कि वह जो ‘वास्तविक’ युद्ध करेगा वह सोवियत संघ के खिलाफ होगा। उसका विश्वास था कि विशाल संसाधनों वाले सोवियत संघ पर उसकी विजय जर्मनी को ‘अविजेय’ बना देगी और उसे ‘‘सभी महाद्वीपों के खिलाफ युद्ध छेड़ने’’ की शक्ति प्रदान करेगी। सोवियत संघ की विजय का लक्ष्य भी जर्मनी के दूसरे सैनिक अभियानों के उद्देश्य से बहुत भिन्न था। इसे पूरे सफाये का युद्ध बनाया जाने वाला था और यह सफाया मात्र कम्युनिज्म का ही नहीं होता। हिटलर का सपना यह था कि वह यूराल पर्वतमाला के पूर्व के क्षेत्रों में ‘शुद्ध आर्य रक्त’ के 10 करोड़ लोगों, यानी जर्मनों को बसाएगा और चूँकि इतनी बड़ी संख्या में जर्मन उपलब्ध न थे इसलिए यह लाभ उत्तरी यूरोपीय, डच और अंग्रेज जैसे दूसरे लोगों को भी दिया जाता जिन्हें ‘‘नस्ली दृष्टि से जर्मनों के करीब का’’ समझा जाता था। इस क्षेत्र में हिटलर जिस ‘सभ्यता’ की बुनियाद डालना चाहता था उसका वर्णन उसने युद्ध के दिनों में इस प्रकार किया था ‘‘इस क्षेत्र का एशियाई स्तेपी वाला चरित्र समाप्त होना चाहिए। इसका यूरोपीयकरण किया जाना चाहिए......‘राइख के किसानों (अर्थात् जर्मन किसानों) को असाधारण रूप से सुंदर बस्तियों में रहना हैं। जर्मन संस्थाओं और अधिकारियों को शानदार भवन तथा गवर्नरों को महल चाहिए। प्रत्येक नगर के चारों ओर 30 या 40 किलोमीटर की दूरी तक मनमोहक गाँवों का एक घेरा बनाया जाएगा........जर्मन नगर तार में मोतियों की तरह होंगे और नगरों के चारों ओर बस्तियाँ होंगी। कारण कि हम अपने लिए लेबेंसराउम’ पुराने और तबाहहाल रूसी बिलों में घुसकर तो नहीं बनाएँगे। जर्मन आबादियों का एक सिरे से एक ऊँचा स्तर होना चाहिए।’’ यहूदियों का एक सिरे से सफाया और स्लाव जातियों को गुलाम बनाना इस योजना के अभिन्न अंग थे।
   सोवियत संघ पर हमले की योजना 1940 के आरंभ में ही बनाई जाने लगी थी। इसे ‘आपरेशन बार्ब रोसा’ का गुप्त नाम दिया गया। लाल सेना (अर्थात् सोवियत संघ की सेना) के बारे में हिटलर के विचार कोई अच्छे न थे और वह इसे ‘‘मात्र एक मखौल’’ कहता था। इस योजना के अनुसार सोवियत संघ की हार नौ या अधिक से अधिक सत्रह हफ्तों में निश्चित थी। यह तो बाद में पता चला कि यह हमला नाजी जर्मनी और स्वयं हिटलर के विनाश का कारण बन गया।
   जर्मन हमले के आरंभ के बाद सोवियत सरकार ने सोवियत-जर्मन समझौते को इस आधार पर उचित ठहराया कि इससे सोवियत संघ को डेढ़ वर्ष की शांति मिली थी और नाजी हमले के मुकाबले के लिए अपनी सेनाओं को तैयार करने का अवसर मिला था। दूसरे शब्दों में, यह समय पाने की एक तरकीब थी। जब हमला हुआ तो सोवियत संघ एकदम बेखबर था और उसे भयानक हारों और बरबादियों का सामना करना पड़ा। कुछ सोवियत लेखक इसका कारण ‘‘समुचित समय का अभाव’’ बतलाते हैं जिसके कारण सोवियत संघ हमले के मुकाबले के लिए अपनी तैयारी पूरी नहीं कर सका था। मगर अधिकांश इतिहासकारों का विचार है कि स्तालिन को अनाक्रमण संधि पर आवश्यकता से अधिक भरोसा था और वह यह विश्वास करने लगा था कि जर्मनी लंबे समय तक पश्चिमी सम्राज्यवादी देशों से युद्ध में ही उलझा रहेगा और यह कि सोवियत संघ के लिए कोई तात्कालिक खतरा न था। इस संदर्भ में यह जानना जरूरी है कि युद्ध के आरंभ से ही स्तालिन ने सोवियत संघ में नाजी-विरोधी और जर्मन-विरोधी विचारों की अभिव्यक्ति पर रोक लगा रखी थी। जर्मनी द्वारा सोवियत संघ पर हमले के पहले तक द्वितीय विश्व युद्ध को आक्रामक फासीवाद शक्तियों द्वारा आरंभ किया गया युद्ध नहीं, बल्कि साम्राज्यवादियों का एक आपसी युद्ध मात्र बतलाया जाता रहा।
   जर्मन हमले की शुरूआत 22 जून, 1941 को किसी औपचारिक युद्ध-घोषणा के बिना हुई। हवाई हमलों की सहायता से जर्मन टैंक तेजी से सोवियत संघ में घुस आए। यह मार्चा लेनिनग्राद, मास्को और कीव की तरफ 3000 किलोमीटर से अधिक लंबा था। सोवियत सेनाएँ धीरे-धीरे हटती रहीं और जर्मन फौजों ने कीव, स्मोलेंस्क और ओदेसा पर कब्जा कर लिया। जर्मनी को आशा थी कि सोवियत संघ के साथ उसका युद्ध जाड़े शुरू होने के पहले ही समाप्त हो जाएगा। अक्टूबर के आरंभ में मास्को भी घिर गया। मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। जल्द ही रूसी टैंक भी आगे बढ़ने लगे। नवंबर के मध्य तक मास्को पर हमले बंद हो चुके थे। नवंबर के अंत तक तापमान गिरकर -40 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया। फलस्वरूप जर्मनों के भारी फौजी साज-समान का बड़ा भाग बेकार हो गया। इस जाड़े को झेल सकने के लिए जर्मन सैनिकों के पास पूरे कपड़े भी न थे। दिसंबर में जवाबी सोवियत हमला शुरू हुआ और जनवरी तक जर्मन सेनाओं को मास्को से दूर खदेड़ दिया गया। इस प्रकार ‘आपरेशन बार्बा रोसा’ तो नाकाम रहा, मगर उसका पूरा विनाश तो अभी होना बाकी था। इस बीच दुनिया में कई और महत्वपूर्ण घटनाएँ घटित हो चुकी थीं।

युद्ध में संयुक्त राज्य का प्रवेश

   जब दूसरा विश्व युद्ध आरंभ हुआ तब संयुक्त राज्य अमरीका ने तटस्थ रहने की घोषणा की थी। फासीवादी शक्तियों के हमलों के आरंभ से ही अमरीका ने ब्रिटेन और फ्रांस जैसी नीति अपना रखी थी। सुदेतेनलैंड के बारे में म्यूनिख वार्ता के दौरान अमरीकी राष्ट्रपति ने चैम्बरलेन की तुष्टीकरण की नीति का समर्थन किया था। अमरीका ने चीन पर जापानी हमले का विरोध तो किया था, मगर इससे अधिक कुछ भी नहीं किया था। जुलाई 1941 तक अमरीका में जापान द्वारा आवश्यक वस्तुओं की खरीद पर कोई रोक न थी। अधिकांश अमरीकी युद्ध में ब्रिटेन के प्रति हमदर्दी तो रखते थे, पर खुद अमरीका के युद्ध में भाग लेने के विरोधी थे। तथाकथित ‘‘पैसा दो और माल लो’’ के आधार पर ब्रिटेन को अमरीका से हथियार खरीदने की छूट दे दी गई थी। ब्रिटेन के प्रति अमरीका का समर्थन धीरे-धीरे बढ़ता गया। बेरमूडा और वेस्ट इंडीज जैसे ब्रिटिश उपनिवेशों में नौसैनिक और वायुसैनिक अड्डे बनाने की छूट पाने के बदले अमरीका ने सिंतबर 1940 में ब्रिटेन को 50 साल पुराने विध्वंसक जहाज दिए थे। 1941 के आरंभ तक अंग्रेज इस स्थिति में नहीं रह गए थे कि उन हथियारों और दूसरी वस्तुओं के दाम चुका सकें जिनके लिए वे अमरीका पर बुरी तरह निर्भर थे। मार्च 1941 में अमरीका कांग्रेस ने एक कानून बनाकर अमरीकी राष्ट्रपति को यह अधिकार दे दिया कि जिस किसी देश की रक्षा ‘‘सयुक्त राज्य की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण’’ हो उसे हथियार उधार या पट्टे पर दे। इसे ‘उधारी-पट्टा’ प्रणाली के नाम से जाना गया। अब ब्रिटेन को अमरीका से भारी संख्या में हथियार मिलने लगे। आगे चलकर अमरीका ने ब्रिटेन जाने वाले अपने जहाजों की जर्मन हमलों से रक्षा करने का भार भी अपने ऊपर ले लिया। साथ ही साथ, अमरीकी कारखाने भारी संख्या में हथियार, हवाई जहाज और जलयान बनाने लगे। नवंबर 1941 में अमरीका की ‘उधारी-पट्टा’ प्रणाली को सोवियत संघ के लिए भी लागू किया गया।
   एक और महत्वपूर्ण घटना थी-ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल और अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट (जिसे 1940 में तीसरी बार राष्ट्रपति चुना गया था) की एक घोषणा। इसे अगस्त 1941 में उनकी एक मीटिंग के बारे में जारी किया गया था। इसे अटलांटिक चार्टर के नाम से जाना जाता है। यह एक महत्वपूर्ण दस्तावेज था, हालाँकि इसमें युद्ध में भाग लेने के बारे में अमरीका की प्रत्यक्ष सैनिक प्रतिबद्धता का कहीं कोई संकेत न था। इस घोषणा पत्र में ‘‘विश्व के लिए एक बेहतर भविष्य’’ की रूपरेखा निर्धारित करने के लिए कुछ साझे सिद्धांत सामने रखे गए थे। इन दोनों देशों ने इन सिद्धांतो से अपनी प्रतिबद्धता घोषित की और ये सिद्धांत एक तरह युद्ध के लक्ष्य बन गए। दोनों देशों ने कहा कि वे ‘‘क्षेत्रीय या किसी और प्रकार का कोई विस्तार’’ या कोई भी ऐसा क्षेत्रीय परिवर्तन नहीं चाहते थे ‘‘जो संबद्ध जनता की मुक्त रूप से व्यक्त इच्छाओं के अनुकूल न हो।’’ घोषणा पत्र में यह भी कहा गया कि दोनों देश ‘‘सभी जनगणों से अपनी पसंद की सरकार चुनने के अधिकार का आदर करते हैं और वे चाहते हैं कि उन सबको संप्रभुता के अधिकार और स्वशासन वापस मिलें जो उनसे बलपूर्वक छीन लिए गए थे।’’ इस घोषणा ने ‘‘नाजी जर्मनी के पूर्णविनाश’’ का आह्वान भी किया। सोवियत संघ ने भी इस अटलांटिक चार्टर पर हस्ताक्षर कर दिए।
   यहाँ यह बात दिलचस्प हैं कि जब भारतीय नेताओं ने ब्रिटेन से अपनी स्वतंत्रता वापस माँगी और इसके समर्थन में अटलांटिक चार्टर के सिद्धांतों का हवाला दिया, तो चर्चिल ने यह कहकर उन्हें अँगूठा दिखा दिया कि ये सिद्धांत केवल जर्मन कब्जे वाले देशों पर लागू होते हैं।
   अमरीका अभी सीधे-सीधे युद्ध में शामिल नहीं हुआ था। जुलाई 1941 में जापान ने हिंदचीन के देश वियतनाम पर कब्जा कर लिया। अक्टूबर में जापान में एक और भी आक्रामक सरकार सत्ता में आई। इसका प्रमुख जनरल हिदेकी तोजो था। जापानियों ने हमले के एक और दौर की तैयारी आरंभ कर दी। यह हमला अबकी बार प्रशांत क्षेत्र में होना था। 7 दिसंबर, 1941 को जापानी बमवर्षक विमानों ने हवाई में पर्ल हार्बर स्थित अमरीकी नौसैनिक अड्डे पर हमला किया। अमरीका का विचार था कि इस क्षेत्र में जापानी हमला हुआ तो ब्रिटिश और डच उपनिवेशों पर होगा। इसलिए वह इस हमले से हैरान रह गया। इस बमबारी में अमरीका के 188 वायुयान, अनेक जंगी जलपोत, क्रूजर और दूसरे नौसैनिक यान नष्ट हो गए तथा 2000 से ऊपर नाविक और सैनिक मारे गए। जापानियों को बहुत मामूली नुकसान हुआ। 8 दिसंबर को अमरीका ने जापान के खिलाफ युद्ध की घोषणा की। 11 दिसंबर को जर्मनी और इटली ने अमरीका के खिलाफ और फिर अमरीका ने जर्मनी और इटली के खिलाफ यु़द्ध की घोषणा की।
   1941 की इन घटनाओं-सोवियत संघ पर जर्मन हमला, पर्ल हार्बर पर जापानी हमला और युद्ध में अमरीका का प्रवेश-ने युद्ध को सही अर्थों में एक विश्वव्यापी युद्ध बना दिया। 1942 के मध्य तक जापान प्रशांत महासागर के अनेक द्वीपों, फिलीपीन, इंडोनेशिया, बर्मा, मलाया, सिंगापुर और थाइलैंड पर कब्जा कर चुका था। इस काल में एक फासीवाद-विरोधी गठबंधन का उदय हुआ जिसमें ब्रिटेन, सोवियत संघ और अमरीका शामिल थे। विंस्टन चर्चिल न इसे ‘‘महान गठबंधन’’ (grand alliance) का नाम दिया। ब्रिटेन और अमरीका अब एक संयुक्त कमान के अंतर्गत युद्ध चला रहे थे, पर ऐसी कोई संयुक्त कार्रवाई सोवियत संघ के साथ मिलकर नहीं की गई। फिर भी तीनों देशों के बीच सक्रिय सहयोग चल रहा था और कई बार तो उन्होंने साझी रणनीतियाँ अपनाई। उसके अलावा अमरीकी उद्योगों के विशाल संसाधनों का उपयोग अब युद्ध के लिए हो रहा था। भारी मात्रा में युद्ध-सामग्री बनाई जा रही थी जिसमें 300,000 वायुयान और 85,000 टैंक शामिल थे। अमरीका को ‘‘विजय का शस्त्रागार’’ कहा गया है। सोवियत संघ ने जनरल देगाल को मान्यता दी जिसने आगे चलकर सभी ‘स्वाधीन फ्रांसीसियों’ के नेता के रूप में एक अस्थायी सरकार स्थापित की।

स्तालिनग्राद की लड़ाई

   वर्ष 1942 में यूरोप का युद्ध लगभग पूरी तरह एक ओर सोवियत सेनाओं तथा दूसरी ओर जर्मन सेनाओं तथा जर्मनी के सहयोगी देशों जैसे रोमानिया और बुल्गारिया की सेनाओं के बीच लड़ा गया। मास्को पर जर्मन हमले के नाकाम कर दिए जाने के बाद जर्मन सेनाएँ काकेशस में दूर तक घुस गईं। मार्च 1942 में हिटलर ने दावा किया था कि उस साल गर्मी तक लाल सेना का सफाया हो जाएगा। जुलाई में जर्मन सेनाओं ने स्तालिनग्राद पर हमला किया और सितंबर के मध्य तक उस नगर की सीमाओं तक पहुँच गई। उसके बाद आरंभ हुआ वह युद्ध जिसे द्वितीय विश्व युद्ध का ‘‘अकेला सबसे बड़ा शक्ति-परीक्षण’’ कहा जाता है। नवंबर के मध्य तक जर्मन सेनाएँ स्तालिनग्राद के अंदर और चारों ओर मौजूद थीं।
   अब स्तालिनग्राद की सड़कों पर एक-एक इंच जमीन के लिए कड़ा मुकाबला शुरू हो चुका था। मगर नवंबर के आखिरी दिनों में स्तालिनग्राद के अंदर और चारों ओर मौजूद जर्मन सेनाएँ सोवियत सेनाओं द्वारा घिर चुकी थीं। उनके पास निकलने का रास्ता नहीं रहा था। उन तक कोई रसद नहीं पहुँच रही थी। घिरी हुई जर्मन सेना के कमानदार जनरल पाउलस ने 24 जनवरी, 1943 को खबर भेजी कि शेष बची जर्मन सेना में कोई 20,000 घायल थे जिनकी देखभाल नहीं हो पा रही थी। इसके अलावा 20,000 सैनिकों को पाला मार चुका था, उनके पास हथियार न थे और वे भूखों मर रहे थे। 31 जनवरी को उसने आत्मसमर्पण कर दिया। स्तालिनग्राद की लड़ाई लगभग पाँच माह चली और शहर मलबे का ढेर बनकर रह गया। इस लड़ाई में जर्मनों की हार को ‘‘इतिहास में किसी जर्मन सेना की सबसे बड़ी पराजय’’ कहा गया है। इसमें जर्मनी और उसके सहयोगी देशों के तीन लाख से ऊपर सैनिक मारे गए। उनके केवल 90,000 सैनिक बचे रहे और उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया।
   जुलाई 1941 में सोवियत सरकार ने ब्रिटेन से अपील की थी कि वह फ्रांस पर हमला करके एक ‘दूसरा मोर्चा’ खोले ताकि उसके खिलाफ, जर्मन सेनाओं का दबाव कम हो सके। परन्तु इस पर सहमति न हो सकी। मई और जून 1942 में सोवियत संघ ने अमरीका और ब्रिटेन से ‘दूसरा मोर्चा’ खोलने की दरख्वास्त एक बार फिर की। अमरीकी राष्ट्रपति इसके लिए तैयार थे। परन्तु अंततः ब्रिटेन और अमरीका ने इसके बजाय उत्तरी अफ्रीका में फौजें भेजने का फैसला कर लिया। यूरोप में 1942 में दूसरा मोर्चा न खोलने का तर्क यह दिया गया कि अमरीका और ब्रिटेन, दोनों ही यूरोप में जर्मन सेनाओं का सीधा मुकाबला करने की हालत में नहीं थे। 1942 के पूरे वर्ष में यूरोप के युद्ध में ब्रिटेन और अमरीका की फासीवादी ताकतों की नौसैनिक घेराबंदी करने तथा जर्मन नगरों पर बमबारी करने तक ही सीमित रही। इसके कारण सोवियत संघ को यह विश्वास हो गया कि ब्रिटेन और अमरीका सोवियत संघ को कमजोर बनाकर रख देना चाहते थे ताकि वे अपनी फौजें बचाकर रख सकें और युद्ध के बाद के चरणों में शक्तिशाली बनकर उभर सकें। मगर स्तालिनग्राद में जर्मनों की तबाही के बाद इन तीन शक्तियों के बीच सहयोग बढ़ा। ब्रिटेन और अमरीका के अंदर भी दूसरा मोर्चा खोलने की माँग जोर पकड़ने लगी।
   जर्मनी और उसके सहयोगी देशों की सेनाओं ने 1943 के मध्य में सोवियत संघ पर एक और भयानक फौजी हमला किया। पर अगस्त में उन्हें बुरी तरह मुँह की खानी पड़ी और उनके पाँच लाख सैनिक मारे गए। इसे कुर्स्क का युद्ध कहते हैं। उसके बाद अनेक बार धीरे-धीरे पीछे धकेल दिया गया तथा जनवरी 1944 के बाद वे पूर्वी मोर्चे के हर क्षेत्र से पीछे हटने लगे। सोवियत संघ से जर्मन फौजें पीछे हटती हुई

उत्तरी अफ्रीका और प्रशांत में युद्ध

   फासीवादी ताकतें 1942 में अपनी विजय की चरम सीमा तक पहुँच गयी थीं परंतु 1943 में उन्हें युद्ध के लगभग सारे मोर्चो पर हार का सामना करना पड़ा। उत्तरी अफ्रीका में इटली की हार के बाद उसकी मदद के लिए जनरल रोमेल के नेतृत्व में जर्मन सेनाएँ भेजी गई थी। उनको उल्लेखनीय सफलताएँ मिली थीं और अगस्त 1942 में उन्होंने मिस्र में ब्रिटिश फौजों पर हमला किया। जर्मन सेना तथा जनरल मांटगुमरी के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना के बीच अल अलामीन में युद्ध हुआ। नवंबर में जर्मन सेना को पीछे हटना पड़ा। अल अलामीन के युद्ध के कुछ ही बाद अटलांटिक तट पर मोरक्को में और अल्जीरिया में ब्रिटिश और अमरीकी सेनाएँ उतरीं। ये दोनों ही देश फ्रांस के उपनिवेश थे और उन पर जर्मनी के सहयोगी विची फ्रांस का नियंत्रण था। मगर कुछ समय बाद इन देशों में स्थित फ्रांसीसी सेनाएँ मित्र राष्ट्रों से आ मिलीं। जर्मनी ने विची फ्रांस पर कब्जा कर लिया और फिर फ्रांस के एक और उपनिवेश ट्यूनिशिया में मदद के लिए सेना भेजी। मार्च 1943 तक रोमेल की सेनाएँ भागकर ट्यूनीशिया पहुँच चुकी थीं। मई 1943 में ब्रिटिश और अमरीकी सेनाओं ने ट्यनीशिया में एक हमला किया। जर्मन और इतालवी सेनाओं ने आत्मसमर्पण कर दिया। इस प्रकार उत्तरी अफ्रीका में जर्मनी और इटली की उपस्थिति का अंत हो गया। इसके पहले 1941 में इराक में एक जर्मन समर्थक विद्रोह को ब्रिटिश कुचल चुके थे तथा ब्रिटेन और आजाद फ्रांस की सेनाओं ने सीरिया और लेबनान पर कब्जा कर लिया था जो अभी तक विची फ्रांस के नियंत्रण में थीं।
   प्रशांत क्षेत्र में 1942 में अमरीका और जापान के बीच अनेक नौसैनिक लड़ाइयाँ हुईं। हालाँकि जापानी हमलों को रोक दिया गया था, मगर 1943 में मित्र राष्ट्रों ने जापान के प्रशांत क्षेत्र के अनेक द्वीपों को वापस ले लिया। चीन में जापान के हमले जारी रहे और मित्र राष्ट्र वहाँ अपनी फौजें नहीं उतार सके। वे च्यांग काई-शेक को रसद भिजवाने में सफल रहे, पर च्यांग की फौज जापानियों पर कोई हमला नहीं कर सकी।

यूरोप में मित्र राष्ट्रों की विजय

   1943 के आरंभ में ब्रिटेन और अमरीका ने फैसला किया था कि पश्चिमी यूरोप में हमला करने का कार्य 1944 तक के लिए टाल दिया जाए। जुलाई में जब कुर्स्क की लड़ाई चल रही थी, उन्होंने सिसली पर हमला किया। तब तक इटली में व्यापक असंतोष फैल चुका था। अनेकों हड़तालें हो रही थीं। यह असंतोष सशस्त्र सेनाओं में भी फैल चुका था जिन्हें हर जगह हार का सामना करना पड़ा था। उन्होंने बड़ी संख्या में मित्र राष्ट्रों की सेनाओं के आगे आत्मसमर्पण कर दिया। 25 जुलाई, 1943 को मुसोलिनी को हरा दिया गया और एक नई सरकार शासन में आई। अब इटली ने युद्ध से अलग होने की इच्छा व्यक्त की। 3 सितंबर को मित्रराष्ट्रों की सेनाओं ने दक्षिणी इटली पर हमला बोला और इटली ने बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया। 10 सितंबर को जर्मन फौजों ने रोम समेत उत्तरी इटली पर कब्जा कर लिया। उन्होंने मुसोलिनी को नजरबंदी से छुड़ाया। फिर जर्मनों के सरंक्षण में उसने उत्तरी इटली में अपनी सरकार बनाई। अब वह जर्मनी के हाथों का खिलौना बन चुका था। इटली की सेना का निरस्त्रीकरण किया जाने लगा और फासीवाद-विरोधी प्रतिरोध आंदोलन का दमन आरंभ हुआ। दक्षिणी इटली में एक नई सरकार बनी और उसने जर्मनी के खिलाफ लड़ाई का ऐलान कर दिया। हालाँकि मित्र राष्ट्रों की सेनाएँ कई माह तक उत्तरी इटली की ओर बढ़ीं, मगर वहाँ प्रतिरोध आंदोलन लगातार मजबूत होता रहा और उसने जर्मन कब्जे और मुसोलिनी के खिलाफ जमकर मुकाबला किया।
   1945 के आरंभ तक सोवियत संघ फिनलैंड को हरा चुका था जो इस बीच जर्मनी का सहयोगी बन चुका था। सोवियत संघ पूर्वी यूरोप के देशों-पोलैंड, रोमानिया, बुल्गारिया, हंगरी और चैकोस्लोवाकिया के अधिकांश भागों को भी मुक्त करा चुका था। इसके पहले इनमें से कुछ देशों में फासीवादी सरकार सत्ता में आकर जर्मनी की ओर से युद्ध में शामिल हो चुकी थी। पोलैंड जैसे दूसरे देशों पर जर्मनी का सीधा कब्जा था। फासीवादी फौजें यूनान, युगोस्लाविया और अल्बानिया से भी खदेड़ दी गईं।
   जून 1944 में मित्र राष्ट्रों ने पश्चिमी यूरोप में दूसरा मोर्चा खोला। 6 जून, 1944 को कयामत का दिन कहा जाता है। इस दिन मित्र राष्ट्रों की सेनाएँ पहली बार फ्रांस के उत्तरी तट पर स्थित नार्मेन्डी में उतरीं। जुलाई के अंत तक फ्रांस में उतरने वाली मित्र राष्ट्रों की सेनाओं की संख्या 16 लाख तक पहुँच चुकी थी। इनका कमांडर अमरीकी सेना का जनरल ड्वाइट डी. आइजनहावर था जो आगे चलकर अमरीका का राष्ट्रपति बना। सिंतबर 1944 तक मित्र राष्ट्रों की सेनाओं ने फ्रांस, लक्जेमबर्ग और बेल्जियम को मुक्त करा लिया। जर्मनों का आखिरी बड़ा जवाबी हमला दिसंबर 1944 में बेल्जियम के आर्देनेस क्षेत्र में हुआ। इसके बाद आरंभ होने वाली लड़ाई को बल्ज की लड़ाई कहते हैं। यह लड़ाई जनवरी 1945 के मध्य में तब खत्म हुई जब मार्शल जुकोव के नेतृत्व में सोवियत सेनाओं ने पूरे पूर्वी मोर्चे पर एक भयानक हमला किया और हिटलर को अपनी अधिकांश सेनाएँ आर्देनेस से हटाकर पूर्व में भेजनी पड़ीं।

जर्मनी का आत्मसमर्पण

   जब जर्मनी ने उत्तरी इटली पर कब्जा करके मुसोलिनी को छुड़ाया और मुसोलिनी ने जर्मन कब्जे वाले क्षेत्र में अपनी सरकार बनाई, उसके बाद कई महीनों तक इटली में लड़ाई चलती रही। मगर जून 1944 तक मित्र राष्ट्रों की सेनाओं ने रोम समेत अनेक इतालवी नगरों को मुक्त करा लिया। इस बीच इटली की फासीवाद-विरोधी शक्तियों की गतिविधियाँ बहुत तेज हो चुकी थीं। 23 अप्रैल, 1945 को इटली के उन क्षेत्रों में एक विद्रोह उठ खड़ा हुआ जो अभी भी फासी कब्जे में थे। 28 अप्रैल, 1945 को मुसोलिनी, जो इस बीच गिरफ्तार हो चुका था, को फाँसी दे दी गई। इटली में मौजूद जर्मनों ने आत्मसमर्पण कर दिया। इसी के साथ इटली में फासीवाद का अंत हो गया।
   जनवरी 1945 के आरंभ तक जर्मनी का पतन निश्चित हो चुका था। जनवरी 1945 में होने वाले सोवियत हमले ने पूर्व में जर्मनों की आखिरी ताकत को भी तोड़ दिया। 17 जनवरी को वारसा, 13 फरवरी को बुडापेस्ट और 13 अप्रैल को वियना को मुक्त करा लिया गया। सोवियत सेनाएँ जर्मनी में घुस आईं और उन्होंने 25 अप्रैल को बर्लिन की घेराबंदी कर ली। इस बीच मार्च में मित्र राष्ट्रों की फौजों के हमले पश्चिम में आरंभ हो चुके थे और अप्रैल के मध्य तक उन्होंने पश्चिमी जर्मनी के एक बड़े भाग पर कब्जा कर लिया था। 30 अप्रैल, 1945 को हिटलर ने आत्महत्या कर ली। उसी दिन राइखस्टाग (जर्मन संसद) के भवन पर सोवियत सेनाओं ने लाल झंडा लहरा दिया। बर्लिन में छिटपुट लड़ाइयाँ दो दिन और जारी रहीं। 7 मई, 1945 को जर्मनी ने जनरल आइजनहावर के राइम्स स्थित मुख्यालय पर अमरीका, ब्रिटेन फ्रांस और सोवियत संघ के प्रतिनिधियों के आगे आत्मसमर्पण कर दिया। 8 मई को जर्मनी ने बर्लिन में स्थित सोवियत मुख्यालय पर एक और बेशर्त आत्मसमर्पण किया। 11 मई को चैकोस्लोवाकिया को मुक्त करा लिया गया और यूरोप में युद्ध का अंत हो गया।

जापान का आत्मसमर्पण

   जर्मनी के आत्मसमर्पण के बाद भी एशिया और प्रशांत क्षेत्र में लड़ाई जारी रही। इस क्षेत्र में 1944 में मित्र राष्ट्रों को अनेक जीतें हासिल हुईं थीं, मगर जापान अभी भी एक भारी सेना के साथ चीन, मंचूरिया और दूसरी जगहों पर जमा बैठा था। 6 अगस्त, 1945 को एक अमरीकी हवाई जहाज ने जापान के हिरोशिमा नगर पर पहला परमाणु बम गिराया। 9 अगस्त को नागासाकी पर दूसरा परमाणु बम गिरा। इन बमों से इन दो नगरों के 320,000 से अधिक लोग मारे गए। 8 अगस्त को सोवियत संघ ने जापान के खिलाफ लड़ाई का ऐलान किया। अगस्त 1945 तक जापानी सेनाओं ने मंचूरिया में सोवियत सेना के, दक्षिण-पूर्व एशिया में ब्रिटिश सेना के और चीन में च्यांग काई-शेक तथा चीनी कम्युनिस्टों की सेनाओं के आगे आत्मसमर्पण कर दिया था। 2 सिंतबर 1945 को जापान ने आत्मसमर्पण किया और दूसरे विश्व युद्ध का अंत हो गया।

फासी बर्बरता और प्रतिरोध आंदोलन

   फासी हमलों और कब्जों का अर्थ था कब्जाए गए देशों की जनता पर अत्यंत अमानवीय बर्बरताएँ। शब्द ‘फासीवाद’ का इस्तेमाल इटली, जर्मनी और जापान अर्थात् तीनों धुरी शक्तियों द्वारा स्थापित व्यवस्था के लिए किया जाता है। पर इन तीनों में भी जर्मनी का नाजीवाद सबसे क्रूर था। नस्ली शुद्धता तथा ‘आर्य’ नस्ल की श्रेष्ठता के सिद्धांतों में विश्वास रखने वाले नाजी शेष जनता को इंसान नहीं मानते थे और समझते थे कि वे सिर्फ सफाया कर दिए जाने या कम से कम गुलाम बनाए जाने के पात्र हैं। उन्होंने यूरोप दासों का और मृत्यु का एक विशाल शिविर बना देना चाहा। इन्हीं देशों के हमलों के कारण ही दूसरा विश्व युद्ध हुआ जो इतिहास का सबसे विनाशकारी युद्ध था। युद्ध की समाप्ति फासीवाद-विराधी मोर्चे की जीत के साथ हुई जिसमें सोवियत संघ, अमरीका, ब्रिटेन और उनके सहयोगी शामिल थे। यह मोर्चा फासीवादी शक्तियों की पराजय का मूल आधार और एक अनिवार्य दशा थी। इसके द्वारा फासीवादी शक्तियों ने जिन देशों पर हमला और कब्जा किया उनमें और खुद फासीवादी देशों में, जनता के प्रतिरोध आंदोलन उभरे। इन आंदोलनों ने फासीवादी शक्तियों की हार में एक महत्वपूर्ण और कुछ मामलों में नाजुक भूमिका निभाई।
   नाजी बर्बरता का आरंभ खुद जर्मनी में हुआ। अनेक यातना-शिविर बनाए गए जहाँ फासीवाद-विरोधियों और यहूदियों को भेजा जाता था। इनमें अनेकों मार भी दिए जाते थे। 1939 में ‘‘गभीर रूप से अस्वस्थ और ठीक न हो सकने वाले लोगों’’ के सफाये का हुक्म जारी हुआ। फलस्वरूप उस साल लगभग 70 हजार लोग मार डाले गए। मगर विनाश का असल युद्ध सोवियत संघ पर हमले के साथ शुरू हुआ। यूरोप के कब्जाए गए क्षेत्रों की नागरिक आबादी का एक बड़ा भाग या तो मार डाला गया या दास बनाकर उनसे काम लिया जाने लगा। खास कहर यहूदियों पर टूटा। सिर्फ 1941 में सोवियत संघ के दस लाख लोग मार डाले गए। इनमें लगभग आधे यहूदी थे। नाजियों ने पोलैण्ड, चैकोस्लोवाकिया, आस्ट्रिया, हालैंड, फ्रांस और जर्मनी में यातना-शिविर बनाए। इनमें से कुछ थे-पोलैण्ड में आउशवित्ज (ओस्विएसिम), बेल्जेक और त्रेबलिंका तथा जर्मनी में दशाऊ, बर्गेन-बेल्सेन और बुखेनबाल्ड के यातना-शिविर। पूरे यूरोप के दसियों लाख लोग इन शिविरों में ठूँस दिए गए। इनमें से कुछ तो शुद्ध रूप से मृत्यु-शिविर थे। जुलाई 1941 में यहूदी समस्या के ‘अंतिम समाधान’ के लिए एक हुक्म जारी हुआ। इसका अर्थ था-‘‘पूर्वी क्षेत्रों में यहूदी नस्ल का सुनियोजित जैविक विनाश’’।
   इन शिविरों के बारे में पूरे तथ्य तो तभी सामने आए जब मित्र राष्ट्रों की सेनाओं ने उन क्षेत्रों को मुक्त करा लिया जिनमें ये शिविर स्थापित थे और बाद में जब युद्ध संबंधी अपराधों तथा मानवता-विरोधी अपराधों के लिए न्यूरेमबर्ग का मुकदमा चलाया गया। इन शिविरों में आरंभ में बंदियों को गोली मार दी जाती थी पर इसे खर्चीला और कठिन पाया गया तो इंसानों के सफाये के लिए बड़े भयानक साधन ईजाद किए गए। एक जर्मन कंपनी आई.जी. फार्बेन के अधीन कीड़ेमार दवाएँ बनाने वाली एक फर्म ने एक जहरीली गैस तैयार की और 1942 के बाद इस काम के लिए इसी गैस का उपयोग किया जाने लगा। इसका उपयोग सबसे पहले 17 मार्च 1942 को पोलैण्ड में बेल्जेक स्थित मृत्यु-शिविर में किया गया जब एक ही दिन में 15,000 लोग मार डाले गए। इन बंदियों को छोटी कोठरियों में यह कहकर ले जाया गया कि ये नहाने के लिए बनाई गई थीं। ये कोठरियाँ वास्तव में गैस चैम्बर थीं जिनके दरवाजे गैस अवरोधक धातु के बने थे। उसके बाद गैस के स्फटिक अंदर फेंक दिए गए। पच्चीस मिनट बाद एक्जास्ट पम्पों के द्वारा गैस युक्त हवा निकाल ली गई और धातु के दरवाजे खोल दिए गए। मुर्दा शरीरों पर से आभूषण, दाँत और बाल हटा लेने के बाद उनको भठ्ठियों में झोंक दिया गया जहाँ वे जलकर राख हो गए। फिर उस राख को पास की नदियों में बहा दिया गया।
   लोगों को सीधे-सीधे मारने के बजाय नाजियों ने जर्मन उद्योगपतियों को इसका मौका दिया कि वे बंदियों के श्रम का पूरा-पूरा उपयोग करें। शिविरों के बंदी क्रुप्स, आई. जी. फार्बेन, सीमेंस, आदि कुछ औद्योगिक फर्मों को किराये पर भेजे जाने लगे। कुछ औद्योगिक फर्मों ने तो शिविरों के नजदीक ही अपनी औद्योगिक इकाइयाँ भी खोल लीं। गाड़ियाँ जब बंदियों को लेकर आतीं तो स्त्रियों, बच्चों, बूढ़ों और बीमारों को सीधे मृत्यु-शिविरों में पहुँचा दिया जाता तथा स्वस्थ पुरूषों को काम के स्थानों तक भेज दिया जाता जहाँ उन्हें काम करा-करा के मार डाला जाता। जो लोग बीमार पाए जाते उन्हें हर सुबह मृत्यु शिविरों में भेज दिया जाता। औद्योगिक फर्में मनुष्य के चमड़े से वस्तुएँ तक बनाने लगीं।
   बंदियों को गैस चैम्बरों में मारने के अलावा नाजी डॉक्टर उन पर जीव वैज्ञानिक प्रयोग भी करते। बंदियों में अनेकों प्रकार की बीमारियाँ पैदा करके उन पर वैकसीन के परीक्षण किए जाते। कुछ को धीरे-धीरे मरने के लिए छोड़ दिया जाता और उनके शरीर में होने वाले जैविक परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता। ये प्रयोग इतने भयानक थे कि बतला सकना असंभव है। हाल के वर्षों में जापानियों द्वारा किए गए ऐसे ही प्रयोग सामने आए हैं।
   अनुमान है कि नाजियों ने कुल मिलाकर एक करोड़ से अधिक असैनिक नागरिक मारे होंगे। इनमें सामूहिक हत्याएँ भी शामिल हैं, जैसे चैकोस्लोवाकिया के नाजी गवर्नर हेड्रिख की हत्या का बदला लेने के लिए लिडिस गाँव के सारे पुरूषों का सफाया और ऐसी ही दूसरी बर्बरताएँ पर अधिकांश लोगों का शिविरों में व्यवस्थित रूप से सफाया किया गया। आउशवित्ज शिविर में मारे जाने वालों की संख्या अनुमान है कि चालीस लाख होगी। मारे जाने वालों में बहुमत यहूदियों का था। कोई 60 लाख यहूदियों का सफाया किया गया जो यूरोप की कुल यहूदी आबादी का 75 प्रतिशत थे। यहूदियों की इस सामूहिक हत्या को ‘सत्यानाश’ (holocaust) कहा जाता हैं। यूरोप से जो दसियों लाख लोग मारे जाने या काम कराने के लिए इन शिविरों में लाए गए उनके अलावा यूरोप के विभिन्न भागों से 75 लाख लोग जर्मन कारखानों में दासों की तरह काम करने के लिए भी जर्मनी लाए गए। इनमें लगभग बीस लाख युद्धबंदी भी शामिल थे।

मित्र राष्ट्रों के हवाई हमले और परमाणु बमों का उपयोग

   दूसरे विश्व युद्ध के दौरान कोई 15 लाख असैनिक नागरिक हवाई हमलों में मारे गए। असैनिक नागरिकों पर हवाई हमले हालाँकि पहले जर्मनी ने शुरू किए, मगर मित्र राष्ट्रों ने भी व्यापक पैमाने पर असैनिक आबादियों पर हवाई हमले किए। 13-14 फरवरी 1945 को ब्रिटेन ने जर्मन नगर ड्रेसडेन पर साढ़े छः लाख से अधिक बम गिराए जिनसे लगभग 1,35,000 लोग मारे गए। जैसा कि कहा गया है, अमरीका द्वारा प्रयुक्त दो परमाणु बमों ने लगभग 320,000 जापानी स्त्री-पुरूषों और बच्चों को मार डाला। अमरीका द्वारा परमाणु बमों के प्रयोग को बहुत से लोग एक घृणित कृत्य मानते हैं- न केवल इन दो बमों द्वारा मारे गए लोगों की भारी संख्या के कारण, बल्कि सामूहिक संहार के इस नए हथियार के प्रयोग-मात्र के कारण भी। अनेक विद्वान इस तर्क को स्वीकार नहीं करते कि अगर इन बमों का उपयोग न किया गया होता तो जापान के साथ युद्ध लंबा खिंचता और फिर इन बमों से जितने लोग मारे गए उनसे कहीं बहुत अधिक लोग दोनों ओर से मारे जाते। इन परमाण्विक अस्त्रों का विकास अमरीका ने युद्ध के दौरान अनेक देशों की वैज्ञानिक प्रतिभाओं और संसाधनों का उपयोग करके किया था। अमरीका और दूसरे देशों के बहुत से वैज्ञानिकों ने परमाण्विक अस्त्रों के विकास के लिए काम किया था, क्योंकि उनको भय था कि अगर जर्मनी ने पहले इनका विकास कर लिया तो उनका उपयोग वह दुनिया को अपने अधीन बनाने के लिए कर सकता है। मगर यूरोप में युद्ध की समाप्ति के समय यह स्पष्ट था कि उनके विकास की दिशा में किसी अन्य देश ने कोई खास प्रगति नहीं की है। कुछ विद्वानों का विचार है कि अमरीका ने, जो उस समय ऐसे हथियारों से लैस अकेला देश था, युद्ध पश्चात् काल में अपनी सैनिक श्रेष्ठता का प्रदर्शन करने के लिए इन अस्त्रों का उपयोग किया था।
   सोवियत संघ, जिसे नागरिकों और सैनिकों, दोनों के सिलसिले में सबसे अधिक जानें गँवानी पड़ी थीं, पोलिश सेना के 10,000 अफसरों की 1939 या 1940 में हत्या करने का और उन्हें केटिन के जंगलों में सामूहिक कब्रों में दफन करने का दोषी ठहराया जाता है।

प्रतिरोध आंदोलन

   जैसा कि कहा जा चुका है, फासीवादी शक्तियों ने जिन देशों पर हमला करके कब्जा किया था उनमें से प्रत्येक देश में, स्वयं फासीवादी देशों में और उनके सहयोगी देशों में जनता के प्रतिरोध आंदोलन उठ खड़े हुए। इन आंदोलनों की ताकत बढ़ती गई और खासकर सोवियत संघ के और आगे चलकर अमरीका के युद्ध में प्रवेश करने के बाद उनकी गतिविधियाँ तेज हो गईं। फासीवाद-विरोधी गठबंधन के निर्माण के बाद पराजित देशों और स्वयं फासीवादी देशों में सारी फासीवाद-विरोधी शक्तियों के एकजुट होने में मदद मिली    जब नाजी फौजें चैकोस्लोवाकिया में घुसीं और उन्होंने स्लोवाकिया में एक कठपुतली सरकार स्थापित की तो वहाँ के अनेक नेता भागकर दूसरे देशों में चले गए। 1940 में चैकोस्लोवाकिया की एक निर्वासित सरकार एडुअर्ड बेनेस के नेतृत्व में बनाई गई। चैकोस्लोवाक प्रतिरोध-आंदोलन के योद्धा, जिनमें कम्युनिस्ट, सोशल-डेमोक्रेट और दूसरे लोग शामिल थे, युद्ध के पूरे काल में जर्मनों के खिलाफ छापामार गतिविधियाँ चलाते रहे। नाजी गवर्नर की हत्या का जिक्र किया जा चुका है। अगस्त 1944 में चैकोस्लोवाकिया में एक विद्रोह उठ खड़ा हुआ और वहाँ की कठपुतली सरकार के सैनिक भी छापामारों से आ मिले। प्राग के 5 मई 1945 के उस विद्रोह का जिक्र पहले ही किया जा चुका है जिसने चैकोस्लोवाकिया पर जर्मन कब्जे को पूरी तरह समाप्त कर दिया।
   दूसरे विश्व युद्ध का आरंभ पोलैण्ड पर हमले से हुआ था और युद्ध में सबसे अधिक नुकसान उसी का हुआ। युद्ध में कोई 65 लाख पोल मारे गए जो पोलैण्ड की कुल आबादी का 20 प्रतिशत थे। इनमें लगभग आधे यहूदी थे। जर्मन हमले के आरम्भ से ही पोलैण्ड में एक शक्तिशाली प्रतिरोध आंदोलन उठ खड़ा हुआ था। इस प्रतिरोध का मार्गदर्शन पोलैण्ड की एक निर्वासित सरकार कर रही थी जिसका प्रमुख जनरल सिकोर्स्की था। इस सरकार का मुख्यालय पहले फ्रांस और फिर लंदन में रहा। 1942 में पोलिश कम्युनिस्टों ने अपना एक प्रतिरोध संगठन बना लिया और जर्मन-विरोधी गतिविधियाँ चलाने लगे। इन दोनों संगठनों में हमेशा तालमेल रहा हो, ऐसी बात नहीं थी। जब पोलैण्ड की निर्वासित सरकार ने इस पर जोर दिया कि पोलैण्ड की युद्ध पूर्व सीमाओं को मान्यता दी जाए और उन क्षेत्रों को भी जिनके सोवियत संघ अपना होने का दावा करता था, तो सोवियत सरकार के साथ उसके संबंध बिगड़ गए। उसके कुछ दुखद परिणाम हुए। 1 अगस्त 1944 को वारसा में एक जन विद्रोह उठ खड़ा हुआ। तब तक सोवियत सेनाएँ पोलैण्ड के अधिकांश भाग को मुक्त करा चुकी थीं। मगर विद्रोह के नेताओं ने, जो निर्वासित सरकार के समर्थक थे और मुक्त वारसा का उसके हवाले करना चाहते थे। सोवियत सेनाओं के साथ अपने विद्रोह की योजनाओं के समन्वय का प्रयास नहीं किया। वारसा की जनता कब्जा करने वाली जर्मन फौजों से बड़ी बहादुरी से लड़ी मगर उसे बाहर से कोई मदद नहीं पहुँच सकी। फलस्वरूप विद्रोह बड़ी निर्ममता से कुचल दिया गया। इसमें कोई ढाई लाख पोल मारे गए।
   युगोस्लाविया में फासीवादी कब्जे और उसके स्थानीय समर्थकों के खिलाफ प्रतिरोध आंदोलन का नेतृत्व कम्युनिस्ट पार्टी कर रही थी जिसके नेता जोसिप ब्राज टीटो थे। विभिन्न छापामार दस्तों को मिलाकर जन मुक्ति सेना बनाई गई। इस सेना के योद्धाओं ने विद्रोहों को संगठन किया और 1944 के अंत तक युगोस्लाविया के अधिकांश भाग मुक्त कराए जा चुके थे। युगोस्लाविया की निर्वासित सरकार को देश के अंदर शायद ही कोई समर्थन प्राप्त था और वहाँ टीटो के नेतृत्व में एक सरकार की स्थापना हुई।
   पूर्व में कहा जा चुका है कि जब जर्मनी ने फ्रांस पर हमला किया तब फ्रांस की सरकार ने जर्मनी के आगे समर्पण कर दिया। जनरल देगाल ने मुक्त फ्रांस आंदोलन की बुनियाद डाली जिसका मुख्यालय लंदन में था। जुलाई 1942 में फ्रांसीसी कम्युनिस्टों की पहलकदमी पर एक राष्ट्रीय मोर्चे का गठन किया गया जिससे फासीवाद-विरोधी सभी ताकतें एकजुट हो गईं। फ्रांसीसी प्रतिरोध आंदोलन इससे एक शक्तिशाली आंदोलन बन गया। उसने 1944 के आरंभ में ‘‘देश के अंदर की फ्रांसीसी शक्तियाँ’’ (French forces of the in-terior) का गठन किया जिसकी सदस्यता पाँच लाख थी। प्रतिरोध आंदोलन के सदस्यों ने जर्मनों और उनके फ्रांसीसी सहयोगियों के खिलाफ तोड़-फोड़ के हजारों कारनामे अंजाम दिए। फ्रांस में मित्र राष्ट्रों की फौजें उतारे जाने में एक नाजुक भूमिका रही। अपनी ताकत के बल पर उन्होंने फ्रांस के अनेक भागों को जर्मन कब्जे से मुक्त करा लिया। जनरल देगाल के नेतृत्व में फ्रांस की एक अस्थायी सरकार बनाई गई जिसमें कम्युनिस्टों समेत फ्रांस की विभिन्न फासीवाद-विरोध शक्तियों के प्रतिनिधि शामिल थे। 19 और 20 अगस्त, 1944 को फ्रांसीसी प्रतिरोध आंदोलन ने पेरिस में एक विद्रोह का संगठन किया, जर्मन कमानदार ने, जिसने शहर को बरबाद करने के बारे में हिटलर की आज्ञा मानने से इंकार कर दिया था, प्रतिरोध आंदोलन के आगे आत्मसमर्पण कर दिया। इसके कुछ ही बाद जनरल देगाल के नेतृत्व वाली अस्थायी सरकार पेरिस पहुँच गई।
   युद्ध में मारे गए कुल लोगों की संख्या को देखें तो सबसे अधिक नुकसान सोवियत संघ का हुआ और कुल आबादी में मारे गए लोगों के प्रतिशत को देखे तो उसका स्थान पोलैण्ड के बाद ही आता है। जर्मनों द्वारा सोवियत लाल सेना के बंदी बनाए या मारे गए सैनिकों की संख्या 40 लाख बताई जाती है। इसके अलावा 60 लाख असैनिक नागरिकों की हत्याएँ भी जर्मनों ने कीं, इनमें कोई साढ़े सात लाख यहूदी भी थे। सोवियत अनुमानों के अनुसार युद्ध में मारे गए सोवियत लोगों की कुल संख्या लगभग दो करोड़ थी जो कुल आबादी का कोई दस प्रतिशत थी। कुछ पश्चिमी इतिहासकारों का मत है कि सोवियत संघ में स्तालिन के शासन के खिलाफ व्यापक असंतोष था और देश के कम से कम कुछ भागों में लोगों ने जर्मन हमले का स्वागत इस आशा से किया कि शायद इससे स्तालिन का समाप्त हो सके। मगर युद्ध के आरंभिक चरणों में ही सोवियत जनता पर जर्मनों ने जो भयानक अत्याचार किए उनसे लोगों को पता चल गया कि उनके लिए हिटलर के आने का क्या नतीजा होगा। इस तरह जर्मन दरिंदगियों ने उन्हें एकजुट कर दिया और उन्होंने हमलावरों के खिलाफ एक अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली प्रतिरोध आंदोलन आरंभ किया। सोवियत संघ के जो भाग जर्मन सेना के हाथ आ गए थे उनमें से प्रत्येक में बड़े पैमाने पर छापामार युद्ध आरंभ हो गया। सोवियत सेना के घनिष्ठ संपर्क में रहकर चलने वाली इन छापामार गतिविधियों ने सोवियत संघ में जर्मनों की करारी हार में एक जीवंत भूमिका निभाई। सोवियत संघ के क्षेत्रों में दस लाख से अधिक योद्धाओं ने जर्मन सेना के खिलाफ छापामार युद्ध में भाग लिया।
   1940 में यूनान पर हमला करने के बाद वहाँ इतालवी सेना की बड़ी दुर्गत हुई। उसके बाद जर्मन सेना ने यूनान पर कब्जा कर लिया। यूनान की सरकार और सम्राट भागकर काहिरा जा पहुँचे। जर्मनी-विरोधी प्रतिरोध का नेतृत्व यूनानी कम्युनिस्टों ने किया जिन्होंने एक राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा और एक राष्ट्रीय जन मुक्ति सेना का गठन कर रखा था। उन्होंने विभिन्न फासीवाद-विरोधी संगठनों को एकजुट किया और यूनान के अनेक भाग मुक्त करा लिए गए। मगर इसके फौरन बाद यूनान की निर्वासित सरकार और प्रतिरोध आंदोलन के बीच टकराव होने लगे। 1944 के अंतिम भाग में जब प्रतिरोध आंदोलन ने यूनान को फासीवादियों से मुक्त करा लिया, उसके बाद ब्रिटिश सेनाओं की सहायता से निर्वासित सरकार को यूनान में ला बिठाने के प्रयास किए जाने लगे। इस कारण एक गृहयुद्ध आरंभ हो गया जो द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद भी कुछ समय तक जारी रहा।
   इटली वह पहला देश था जहाँ फासीवाद विजयी हुआ था। वहाँ फासीवाद की पराजय में प्रमुख भूमिका प्रतिरोध आंदोलन की रही। इतालवी फासीवादियों को यूरोप और अफ्रीका, दोनों महाद्वीपों में हर जगह सैनिक पराजय का मुँह देखना पड़ा था। 1942 में इटली के कम्युनिस्ट और समाजवादी फासी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए एकजुट हो गए। मुसोलिनी के हटाए जाने और उत्तरी इटली पर जर्मनों का कब्जा होने के बाद जर्मन-अधिकृत क्षेत्र में एक शक्तिशाली प्रतिरोध आंदोलन उठ खड़ा हुआ। इस आंदोलन में पामिरो तोगलियाती के नेतृत्व में इतालवी कम्युनिस्टों की भूमिका खास तौर पर उल्लेखनीय रही। जर्मन कब्जे और इतालवी फासीवाद को प्रतिरोध आंदोलन का आखिरी धक्का अप्रैल 1945 में लगा जब जेनेवा, मिलान और तूरीन मुक्त करा लिए गए और मुसोलिनी को पकड़कर गोली मार दी गई।
   जर्मनी में युद्ध के आरंभ से बहुत पहले ही सारे विरोधियों का निर्ममता के साथ दमन कर दिया गया था। जो नाजी-विरोधी जर्मन भाग निकले थे, उन्होंने नाजी-विरोधी प्रचार चलाया और नाजी शासन तथा उसके हमलावराना मंसूबों के खिलाफ विश्व जनमत को उभारने में मदद पहुँचाई। इसमें प्रमुख भूमिका रही उन महानतम साहित्यकारों की जिनकी रचनाओं की नाजियों ने खुले-आम होली जलाई थी और जर्मन कम्युनिस्टों की। नाजी-विरोधी जर्मन स्पेन के गृह युद्ध में भी स्पेनी गणतंत्र की रक्षा के लिए लड़े। युद्ध के दौरान नाजी-विरोधी जर्मनों के छोटे-छोटे समूह खुद जर्मनी के अंदर भी तोड़-फोड़ की छोटी-मोटी कार्रवाइयाँ करते रहे। निर्वासित जर्मनों तथा कुछ जर्मन युद्धबंदियों ने जर्मनी के अंदर और बाहर नाजी-विरोधी प्रचार चलाया। 1944 में कुछ जर्मन फौजी अफसरों ने हिटलर की हत्या का षड्यंत्र रचा क्योंकि उन्हें विश्वास था कि हिटलर देश को पूरी तबाही की ओर ले जा रहा था। 20 जुलाई 1944 को कर्नल क्लाउस सेंक फॅान स्टाउफेनबर्ग ने एक बम हिटलर के रास्टेनबर्ग स्थित मुख्यालय में रखा जहाँ से हिटलर पूर्व का युद्ध चला रहा था। बम फटा जरूर मगर यह उस स्थान के पास नहीं रखा गया था जहाँ हिटलर बैठता था। इस तरह विस्फोट में हिटलर बच गया, वह केवल झुलसकर ही रह गया। स्टाउफेनबर्ग तथा दूसरे षड्यंत्रकारियों को पकड़कर गोली मार दी गई। जनरल रोमेल भी, जो जर्मन सेना के सबसे प्रतिभाशाली अफसरों में एक था और जिसने उत्तरी अफ्रीका में जर्मन सेना का नेतृत्व किया था, इस षड्यंत्र में शामिल था। उसे गोली तो नहीं मारी गई मगर आत्महत्या करने की छूट दे दी गई। जापानी शासन के अंतर्गत आने वाले सभी एशियाई देशों में भी प्रतिरोध आंदोलन तेजी से फैला। इनमें सबसे अधिक शक्तिशाली था चीन का प्रतिरोध-युद्ध जो द्वितीय विश्व युद्ध के बहुत पहले से जारी था। सियान की घटना, जिसका उल्लेख पहले किया जा चुका है, के बाद जापान-विरोधी प्रतिरोध कम्युनिस्टों और कुओमिनतांग के आपसी गृह युद्ध से अधिक महत्वपूर्ण हो गया, हालाँकि इन दोनों में सचमुच एकता स्थापित न हो सकी। जिन दूसरे देशों में ब्रिटिश, डच या फ्रांसीसी शासन को हटाकर जापानी शासन की स्थापना हुई वहाँ पहले से अस्तित्व में आ चुके उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रवादी आंदोलनों ने अब जापानी कब्जे के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध का आरंभ किया। इन देशों में होने वाले भयानक जापानी अत्याचार भी जापानी कब्जे के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध के तेज होने के लिए जिम्मेदार थे। फिलीपीन, हिंदचीन, इंडोनेशिया, बर्मा, मलाया जैसे लगभग सभी एशियाई देशों में कम्युनिस्ट जापान-विरोधी प्रतिरोध-आंदोलन की प्रमुख शक्ति थे। इसका एकमात्र अपवाद थाइलैंड था। 1941 में हो ची मिन्ह के नेतृत्व में वियतनामी कम्युनिस्टों ने वियतमिन्ह लीग की स्थापना की जिसने विची फ्रांस और जापान के समर्थकों का मुकाबला किया। 2 सितंबर 1945 को उन्होंने जनवादी वियतनाम गणराज्य की घोषणा की। बर्मा में फासीवाद-विरोधी जन-स्वतंत्रता लीग का गठन आंग सान के नेतृत्व में किया गया। फिलीपीन में जापान-विरोधी जनसेना ने जापान के खिलाफ हथियारबंद कार्रवाइयों का आयोजन किया। एशिया में जापानी साम्राज्यवाद के पतन में इन सभी आंदोलनों की नाजुक भूमिका रही। भारत में, जो जापानी कब्जे से बचा रह गया था, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत की स्वाधीनता का संघर्ष चलाते हुए, यूरोप में नाजी कब्जे और एशिया में जापानी कब्जे के खिलाफ लड़ रहे जनगण को अपना पूरा-पूरा समर्थन दिया।

युद्ध में मित्र राष्ट्रों के लक्ष्य

   युद्ध के दौरान अनेकों मीटिंगों और सम्मेलनों का आयोजन किया गया ताकि युद्ध लड़ने के लिए साझी रणनीतियाँ विकसित की जा सकें और युद्ध किन उद्देश्यों के लिए लड़ा जा रहा है, इसके बारे में सहमति हो सके। इनमें से कुछ मीटिंगों और सम्मेलनों में अनेक देशों ने भाग लिया। मगर सबसे महत्वपूर्ण निर्णय तो तीन मित्र राष्ट्रों के नेताओं द्वारा लिए गए। ये थे- ब्रिटेन के चर्चिल, सोवियत संघ के स्तालिन और अमरीका के रूजवेल्ट (12 अप्रैल, 1945 को रूजवेल्ट की मृत्यु हुई। उसके बाद इन मीटिंगों में उसके उत्तराधिकारी ट्रूमैन ने भाग लिया)।
   अगस्त 1941 में चर्चिल और रूजवेल्ट द्वारा जारी अटलांटिक चार्टर का उल्लेख किया जा चुका है। इसके जारी होने के कुछ ही समय बाद इस पर सोवियत संघ ने भी हस्ताक्षर कर दिए।
   1 जनवरी 1942 को 26 देशों के प्रतिनिधियों ने एक संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र जारी किया। इस घोषणा के कारण जो फासीवाद-विरोधी मित्र राष्ट्र-गठबंधन पहले ही बन चुका था, उसका एक औपचारिक गठन हो गया। इस घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों ने साझे दुश्मन को हराने के लिए हर प्रयास करने तथा इस उद्देश्य से एक-दूसरे के साथ सहयोग करने की शपथ ली। वे इस पर भी सहमत हो गए कि शत्रु देशों के साथ अलग से कोई वार्ता नहीं करेंगे या उनके साथ अलग से कोई युद्धबंदी या शांति संधि नहीं करेंगे।
   जनवरी 1943 में एक महत्वपूर्ण घटना घटी। मोरक्को के अटलांटिक तट पर स्थित कैसाब्लांका में रूजवेल्ट और चर्चिल ने मुलाकात की। युद्धबंदी के लिए फासीवादी ताकतों के आगे रखी जाने वाली शर्तां को लेकर ब्रिटेन और अमरीका के अंदर तथा इन दोनों देशों के बीच कुछ मतभेद थे। रूजवेल्ट ने फासीवादी ताकतों के ‘बेशर्त आत्मसमर्पण’ की माँग करके इन विवादों को समाप्त कर दिया। यह अब सभी मित्र राष्ट्रों, जिन्हें अब संयुक्त राष्ट्र कहा जाने लगा था, की साझी माँग बन गई।
   मास्को में 19 से 30 अक्टूबर 1943 तक ब्रिटेन, सोवियत संघ और अमरीका के विदेश मंत्रियों की जो बैठक हुई, उससे फासीवाद-विरोधी गठबंधन और मजबूत बना। इस बैठक में दूसरा मोर्चा खोलने के सवाल पर विचार हुआ और इटली तथा आस्ट्रिया के बारे में घोषणाएँ स्वीकृत की गईं। यह तय हुआ कि यूरोपीय राज्यों से संबंधित प्रश्नों पर विचार-विमर्श के लिए सलाहकार परिषदें बनाई जाएँ, इन विषयों में फासीवादी राज्यों और उनके सहयोगियों के समर्पण की शर्तें भी शामिल थीं। इस बैठक में ‘‘चार राष्ट्रों की घोषणा’’ जारी की गई, यह चौथा राष्ट्र चीन था। घोषणा में ‘‘यथाशीघ्र एक ऐसे सामान्य अंतर्राष्ट्रीय संगठन’’ की स्थापना की जाए जो ‘‘अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए सभी राष्ट्रों की प्रभुतासंपन्न समानता पर आधारित हो और जिसकी सदस्यता बड़े-छोटे राष्ट्रों के लिए खुली हो।’’ इस घोषणा को संयुक्त राष्ट्र चार्टर का आरंभ माना जा सकता है। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य आगामी शिखर-वार्ता की तैयारी करना था।
   1 दिसंबर 1943 को ब्रिटेन, अमरीका और चीन के प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर से काहिरा घोषणा जारी की गई। इस घोषणा का संबंध मुख्य रूप से जापान और उसके कब्जे वाले देशों से था। इसमें जापान से बेशर्त आत्मसमर्पण की तथा 1894 के बाद जीते गए सभी क्षेत्रों को वापस लौटाने की माँग की गई। आश्चर्य की बात है कि इस घोषणा में, एशिया के वे यूरोपीय उपनिवेश जो जापान के कब्जे में आ गए थे, उनके जनगण के लिए आत्मनिर्णय के सिंद्धात का कोई उल्लेख नहीं किया गया था। तीन मित्र राष्ट्रों की पहली शिखर-वार्ता 28 नवंबर से 2 दिसंबर 1943 तक ईरान के नगर तेहरान में हुई। इस बैठक में चर्चिल, स्तालिन और रूजवेल्ट ने भाग लिया। तब तक सोवियत संघ यूरोप के युद्ध की निर्णायक शक्ति बनकर उभर चुका था। बैठक में चर्चिल और रूजवेल्ट ने मई 1944 में दस लाख आंग्ल-अमरीकी फौजें उतारने की बात मान ली। यह वही दूसरा मोर्चा था जिसका लंबे समय से इंतजार था। सोवियत संघ ने यह बात मान ली कि जर्मनी की हार हो चुकने के बाद वह जापान-विरोधी युद्ध में भाग लेगा। बैठक में युद्ध पश्चात काल में पोलैण्ड की सीमाओं के प्रश्न पर भी विचार हुआ। जब लंदन में बैठी पोलैण्ड सरकार उन शर्तों पर सहमत नहीं हुई जिन पर तेहरान की बैठक में मोटे तौर पर सहमति हुई थी, तब सोवियत सरकार के समर्थन से एक पोलिश राष्ट्रीय परिषद् स्थापित की गई जिसमें बहुमत कम्युनिस्टों का था। इससे पोलिश प्रतिरोध आंदोलन में फूट पड़ गई और सोवियत संघ तथा पोलैण्ड की लंदन-स्थित निर्वासित सरकार के बीच भी दरार पड़ गई।
   21 अगस्त से 28 सितंबर 1944 तक ब्रिटेन सोवियत संघ और अमरीका के प्रतिनिधियों ने अमरीका में वाशिंगटन के करीब डुम्बार्टन ओक्स में, एक सम्मेलन का आयोजन संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना और उसके संविधान पर विचार करने के लिए किया। इस सम्मेलन में बाद में चीन का प्रतिनिधि भी शामिल हुआ। यह संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। एक संयुक्त राष्ट्र चार्टर तैयार करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की एक विस्तृत बैठक सान फ्रांसिस्को में मई-जून 1984 में करने का निर्णय किया गया।
   1945 के आरंभ में जब जर्मनी की पराजय लगभग निश्चित हो चुकी थी, सोवियत संघ के याल्ता नामक स्थान पर 4 से 11 फरवरी, 1945 में चर्चिल, स्तालिन और रूजवेल्ट का एक सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन में अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। जर्मनी से बेशर्त समर्पण कराना तीनों देशों का साझा लक्ष्य घोषित किया गया। समर्पण के बाद जर्मनी के भविष्य के बारे में विभिन्न उपायों पर भी सहमति हुई। इस बैठक में घोषणा की गई कि तीनों मित्र राष्ट्रों का ‘‘अनुल्लंघनीय उद्देश्य’’ ‘‘जर्मन सैन्यवाद तथा नाजीवाद को नष्ट करना तथा यह सुनिश्चित करना है कि जर्मनी फिर कभी विश्व-शांति को भंग नहीं कर सकेगा।’’ यह तय पाया गया कि जर्मनी के समर्पण के बाद उसे चार भागों में बाँट दिया जाए और ब्रिटेन, सोवियत संघ, फ्रांस और अमरीका का एक-एक भाग पर नियंत्रण हो। पोलैण्ड की सीमाओं पर भी सहमति हुई, कर्जन लाइन को सोवियत-पोल सीमा तथा ओदेस्नाइस्से लाइन को पोलैण्ड की पश्चिमी सीमा के रूप में स्वीकार किया गया। तय हुआ कि स्थापित की जा चुकी अस्थायी पोलैण्ड सरकार में लंदन-स्थित गैर-कम्युनिस्ट पोलों को भी शामिल किया जाए और स्वतंत्र चुनाव यथाशीघ्र कराए जाएँ। ‘मुक्त यूरोप संबंधी घोषणा’ के द्वारा तीनों देशों ने वचन दिया कि वे यूरोपीय देशों को लोकतांत्रिक संस्थाएँ स्थापित करने में सहायता देंगे। जर्मनी की हार के तीन माह के अंदर जापान-विरोधी युद्ध में शामिल होने का वचन सोवियत संघ ने दिया। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बारे में भी महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। तय किया गया कि जर्मनी से युद्धरत सभी राज्यों के लिए संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता 1 मार्च 1945 को खोल दी जाएगी, ताकि उसके चार्टर की तैयारी के लिए आयोजित होने वाले सान फ्रांसिस्को सम्मेलन में वे भी भाग ले सकें। इस सम्मेलन के लिए 25 अप्रैल 1945 की तारीख तय की गई। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् की संरचना, परिषद् के स्थायी सदस्यों तथा शांति और सुरक्षा को प्रभावित करने वाले सभी फैसलों के सिलसिले में इन स्थायी सदस्यों की सहमति के सिद्धांत पर भी सहमति हुई।
   याल्टा बैठक के निर्णय के अनुसार संयुक्त राष्ट्र का एक सम्मेलन सान फ्रांसिस्को में 25 अप्रैल से 26 जून 1945 तक आयोजित किया गया। जर्मनी के आत्मसमर्पण के पहले ही इस सम्मेलन ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर विचार-विमर्श आरंभ कर दिया। इस चार्टर पर 50 भागीदार देशों ने 26 जून को, जापान के समर्पण के पहले ही हस्ताक्षर किए। यह संयुक्त राष्ट्र चार्टर 24 अक्टूबर 1945 से लागू माना गया। यह चार्टर संयुक्त राष्ट्र के लक्ष्यों और संरचना की रूपरेखा निर्धारित करता है। इसका आरंभ इन शब्दों से होता है -

हम संयुक्त राष्ट्र के जनगण कृतसंकल्प हैं

   बाद की पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका से बचाने के लिए जिसने हमारे जीवनकाल में दो-दो बार मानव जाति को अकथनीय दुखों से दो-चार किया है और मूलभूत मानव अधिकारों में, मनुष्य की गरिमा और क्षमता में, स्त्रियों और पुरूषों के तथा बड़े-छोटे, सभी राष्ट्रों के समान अधिकारों में अपनी आस्था पुनर्व्यक्त करने के लिए और वे परिस्थितियाँ, जिनमें न्याय तथा संधियों और अंतर्राष्ट्रीय कानून के अन्य स्रोतों से उत्पन्न उत्तरदायित्वों का सम्मान संभव हो, कायम करने के लिए और व्यापकतर स्वतंत्रता के वातावरण में सामाजिक प्रगति तथा जीवन के बेहतर मानदंडों को प्रोत्साहन देने के लिए और लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सहिष्णुता का व्यवहार करने तथा अच्छे पड़ोसियों की तरह एक-दूसरे के साथ शांतिपूर्वक रहने के लिए और अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के उद्देश्य से अपनी शक्तियों का संयुक्त उपयोग करने के लिए और आवश्यक सिद्धांतों को मान्यता देकर उनके व्यवहार के लिए समुचित विधियों का विकास करके यह सुनिश्चित करने के लिए कि साझे हितों के अलावा कभी भी सशस्त्र शक्ति का प्रयोग नहीं किया जाएगा और सभी जनगणों की आर्थिक और सामाजिक उन्नति को प्रोत्साहित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय तंत्र का उपयोग करने के लिए और इसलिए हमने इन लक्ष्यों की पूर्ति के लिए अपने प्रयासों का समन्वय करने का निश्चय किया है।
   तद्नुसार हमारी सरकारों ने......संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तुत चार्टर से सहमति व्यक्त की है और इस प्रकार वे एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन स्थापित कर रही है जिसका नाम संयुक्त राष्ट्र संघ होगा।

चार्टर की धारा 1 में संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्य इस प्रकार बतलाए गए हैं -

   (1) अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना तथा इसके लिए शांति के लिए पेश खतरों की रोक-थाम और उन्मूलन के लिए, हमले की कार्रवाइयों या शांतिभंग की अन्य कार्रवाइयों के दमन के लिए प्रभावी सामूहिक उपाय करना तथा शांतिपूर्ण उपायों से और न्याय और अंतर्राष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों के अनुरूप अंतर्राष्ट्रीय विवादों या शांतिभंग का कारण बन सकने वाली स्थितियों में तालमेल बिठाना या उनका निपटारा करना,
(2) जनगण के समान अधिकारों और आत्मनिर्णय के सिद्धात के प्रति आदर के आधार पर राष्ट्रों के बीच मित्रवत् संबंधों का विकास करना तथा सार्वभौम शांति को स्थायी बनाने के लिए अन्य समुचित उपाय करना,
(3) आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक या मानवीय चरित्र वाली अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के हल निकालने के लिए तथा नस्ल, लिंग, भाषा या धर्म का भेदभाव किए बिना मानव-अधिकारों और मूलभूत स्वाधीनताओं के प्रति आदर का भाव विकसित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग सुनिश्चित करना तथा
(4) इन साझे लक्ष्यों की प्राप्ति के कार्य में राष्ट्रों की कार्यवाहियों में समन्वय बिठाने की दृष्टि से एक केंद्र कार्य करना।

चार्टर में संयुक्त राष्ट्र की संरचना तथा उसकी प्रमुख संस्थाओं की रूपरेखा भी निर्धारित की गई है। ये प्रमुख संस्थाएँ इस प्रकार हैं -

(1) महासभा (General Assembly)

इसमें सभी सदस्य-राष्ट्रों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं।

(2) सुरक्षा परिषद् (Security Council)

इसके पाँच स्थायी सदस्य होते हैं-अमरीका, ब्रिटेन, सोवियत संघ, चीन और फ्रांस इनके अलावा छः अन्य राष्ट्र भी इसके सदस्य होते हैं और उनका चुनाव महासभा द्वारा दो वर्षां के लिए किया जाता है। बाद में इन अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाकर दस कर दी गई।

(3) आर्थिक और सामाजिक परिषद् (Eco-nomic & social council)

इसमें महासभा द्वारा चुने गए 18 सदस्य होते हैं। बाद में उनकी संख्या बढ़ाकर 27 कर दी गई।

(4) न्यासिता परिषद् (Trusteeship coun-cil)

इसके सदस्य न्यास-क्षेत्रों तथा अन्य क्षेत्रों का प्रशासन करने वाले राज्यों से बराबर-बराबर संख्या में लिए जाते हैं।

(5) अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (International court of justice)

सचिवालय (Secretariat)
चार्टर में एक ‘‘अस्वशासी क्षेत्रों से संबधित घोषणा’’ भी शामिल है। इसमें इस सिद्धांत को मान्यता दी गई है कि ‘‘इन क्षेत्रों के निवासियों के हित ही सर्वापरि हैं’’ और यह दायित्व निश्चित किया गया है कि वहाँ ‘‘स्वशासन का विकास किया जाए, इन जनगणों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को समुचित महत्व दिया जाए और उन्हें अपनी स्वंतत्र राजनीतिक संस्थाओं के क्रमिक विकास में सहायता दी जाए।’’ चार्टर में अनेक आयोगों तथा विशेष एजेंसियों और संस्थाओं की भी परिकल्पना की गई है। आर्थिक और सामाजिक परिषद् के अधीन काम करने वाली ऐसी दो विशेष एजेंसियाँ हैं - संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)। संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना फासीवादी देशों के खिलाफ युद्ध में भाग लेने वाले देशों की एक महत्वपूर्ण और स्थायी उपलब्धि है।
   जर्मनी के आत्मसमर्पण के बाद तीन प्रमुख मित्र राष्ट्रों का एक सम्मेलन जर्मनी के पोट्सडम नामक स्थान पर हुआ। 17 जुलाई से 2 अगस्त, 1945 तक होने वाले इस सम्मेलन में चर्चिल, स्तालिन और हैरी ट्रूमैन ने भाग लिया। (रूजवेल्ट की मृत्यु के बाद ट्रूमैन अमरीका के राष्ट्रपति चुने गए थे।) 28 जुलाई के बाद इस सम्मेलन में क्लीमेंट एटली ने भाग लिया जो ब्रिटेन में लेबर पार्टी के सत्तारूढ़ होने के बाद वहाँ के प्रधानमंत्री बने थे। पोट्सडम सम्मेलन में विचार-विमर्श का मुख्य विषय जर्मनी था। इस सम्मेलन द्वारा जारी घोषणा में कहा गया था : ‘‘जर्मन सैन्यवाद तथा नाजीवाद को नष्ट किया जाएगा तथा मित्र राष्ट्र आज और भविष्य में भी एक साथ मिलकर ऐसे उपाय करेंगे कि जर्मनी फिर कभी अपने पड़ोसियों या विश्वशांति के लिए खतरा न बन सके।’’ इस सम्मेलन में पोलैण्ड की पश्चिमी सीमा के बारे में तथा पूर्वी प्रशिया का उत्तरी भाग सोवियत संघ और दक्षिणी भाग पोलैण्ड को देने के बारे में भी सहमति हुई। फासी संगठन को प्रतिबंधित करने, जर्मनी की सैनिक शक्ति को नष्ट करने, कार्टेलों का उन्मूलन करके और युद्ध सामग्री का उत्पादन करने वाले उद्योगों पर नियंत्रण करके जर्मन अर्थव्यवस्था का पुनर्गठन करने, जर्मनी द्वारा हर्जाना भरे जाने तथा चार नियंत्रण-क्षेत्रों में जर्मनी का बँटवारा करने के बारे में भी सहमति हुई। नाजी युद्ध-अपराधियों पर मुकदमा चलाने का फैसला भी किया गया। बाद में यह मुकदमा जर्मनी के न्यूरेमबर्ग नगर में चलाया गया और लगभग एक वर्ष तक जारी रहा। बारह मुल्जिमों को मौत की सजाएँ दी गईं। कुछ जर्मन उद्योगपतियों समेत शेष अपराधियों को जेल की सजाएँ दी गईं।
   दूसरा विश्व युद्ध मानव-इतिहास का सबसे विनाशकारी युद्ध था। इसमें पाँच करोड़ से अधिक इंसानी जानें गईं। इस युद्ध की पूरी लागत लगभग 140 खरब डालर आँकी गई है। परन्तु विध्वंस के इन आँकड़ों से ही उस विनाश लीला का भरपूर अनुमान नहीं लगाया जा सकता जो इस युद्ध के कारण हुई।