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मराठों का उत्कर्ष एवं मुगल साम्राज्य का पतन
मराठों का उदयहम देख चुके हैं कि जब मुगल दकन की ओर बढ़ रहे थे, तब अहमदनगर तथा बीजापुर में मराठे प्रशासन तथा सैनिक सेवाओं में महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त थे तथा राज्य के काम-काज में उनका प्रभाव और उनकी शक्ति बढ़ती जा रही थीं। दकन के सुलतानों तथा मुगलों, दोनों ने, मराठों का समर्थन प्राप्त करने की चेष्टा की। मलिक अम्बर ने अपनी सेना में बड़ी संख्या में मराठों की भर्ती की। यद्यपि मोरे, घटगे तथा निंबालकर जैसे कुछ प्रभावशाली मराठा परिवारों ने कुछ क्षेत्रों में प्रभाव कायम कर लिया था तथापि मराठे राजपूतों की तरह बड़े तथा सुसंगठित राज्य स्थापित करने में सफल नहीं हुए थे। साम्राज्य की स्थापना का श्रेय शाहजी भोंसले तथा उनके लड़के शिवाजी को हैं जैसा कि हम देख चुके हैं कि कुछ समय शाहजी ने मुगलों को चुनौती दी। अहमदनगर में उसका इतना प्रभाव था कि शासकों की नियुक्ति में भी उसका हाथ होता था। लेकिन 1636 की सन्धि के अंतर्गत शाहजी को उन क्षेत्रों को छोड़ना पड़ा जिन पर उसका प्रभाव था। उसने बीजापुर के शासक की सेवा में प्रवेश किया और अपना ध्यान कर्नाटक की ओर लगाया। उस समय की अशांत स्थिति का लाभ उठाकर शाहजी ने बंगलौर में ठीक उस तरह एक अर्द्धस्वायत्त राज्य की एक स्थापना का प्रयत्न किया जैसा कि गोलकुण्डा के एक प्रमुख अमीर मीर जुमला ने कोरोमण्डल तट के एक क्षेत्र पर अपनी रियासत कायम करने की कोशिश की थी। इसके अलावा कुछ और सरदारों ने भी ऐसी ही रियासतों स्थापित करने की चेष्टा की जिसका एक उदाहरण पश्चिम तट पर अबीसीनियाई सीदी सरदारों ने प्रस्तुत किया। पूना के आस-पास के क्षेत्रों में अपना शासन स्थापित करने के शिवाजी के प्रयासों की यही पृष्ठभूमि थी।शिवाजी का प्रारंभिक जीवनशाहजी पूना की जागीर अपनी उपेक्षित पटरानी जीजाबाई तथा नाबालिग लड़के शिवाजी को सौंपकर चला गया था। 1645 तथा 1647 के बीच अठारह वर्ष की आयु में पूना के निकट राजगढ़, कोंकण तथा तोरण के किलों पर कब्जा करके शिवाजी ने अपनी बहादुरी का प्रमाण दिया था। 1647 में अपने अभिभावक दादाजी कोंणदेव की मृत्यु के बाद शिवाजी पूरी तरह आजाद हो गया था और अपने पिता की सारी जागीर उसके नियन्त्रण में आ गई थी।शिवाजी ने अपना असली विजय अभियान 1656 में आरंभ किया तब उसने मराठा सरदार चन्द्रराव मोरे से जावली छीन लिया। जावली का राज्य तथा वहाँ मोरों का खजाना बहुत महत्वपूर्ण था और शिवाजी ने इस पर धोखे से कब्जा किया था। जावली की विजय से वह मावल क्षेत्र का शासक हो गया और सतारा तथा कोंकण तक का रास्ता उसके लिए साफ हो गया। मावल के पैदल सैनिक शिवाजी की सेना के प्रमुख अंग बन गये। उनकी सहायता से शिवाजी ने पूना के निकट और भी कई पहाड़ी किलों को जीतकर अपनी स्थिति खूब मजबूत कर ली। 1657 में बीजापुर पर मुगल आक्रमण के कारण शिवाजी बीजापुर के जवाबी हमले से बच गया। उसने औरंगजेब के साथ पहले बातचीत का तरीका अपनाया लेकिन इसके बाद शिवाजी ने अपना रुख बदल लिया और मुगल क्षेत्रों पर ही आक्रमण कर बड़ी मात्रा में धन लूटा। जब औरंगजेब का बीजापुर के नये शासक के साथ समझौता हो गया तब उसने शिवाजी को भी क्षमा कर दिया। लेकिन औरंगजेब को शिवाजी पर भरोसा नहीं था उसने बीजापुर के शासक को सलाह दी कि वह शिवाजी को उन सभी बीजापुरी क्षेत्रों से निकाल दे जिन पर शिवाजी ने कब्जा कर रखा था। औरंगजे़ब ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि बीजापुर का शासक शिवाजी को अपनी सेवा में रखना चाहे भी तो उसे मुगल सीमा के पार कर्नाटक में रखे। औरंगजेब जैसे ही उत्तर में लौटा, शिवाजी ने एक बार फिर बीजापुर के क्षेत्रों के ही विरुद्ध अभियान आरंभ कर दिया। उसने कोंकण के पहाड़ तथा समुद्र के बीच के तटीय क्षेत्र पर हमला किया तथा उत्तरी भाग पर अपना कब्जा कर लिया। उसने कई अन्य पहाड़ी किले भी जीते। बीजापुर के शासक ने शिवाजी के खिलाफ अब कड़ी कार्रवाई करने की सोची। उसने बीजापुर के प्रमुख सरदार अफजल खाँ को दस हजार सैनिकों के साथ शिवाजी के खिलाफ भेजा। अफजलखाँ को आदेश था कि वह किसी भी तरीके से शिवाजी को बंदी बना ले। उन दिनों षड़यन्त्र तथा धोखाधड़ी आम बात थी और अफजल खाँ तथा शिवाजी, दोनों ने कई अवसरों पर ऐसे तरीके अपनाये थे। शिवाजी की सेना खुले मैदान में युद्ध करने की आदी नहीं थी और वह हिचकिचा रही थी। अफजल खाँ ने शिवाजी को व्यक्तिगत भेंट के लिए एक सन्देश भेजा और इस बात का वादा किया कि वह बीजापुर दरबार में उसे क्षमा दिलवा देगा। शिवाजी को विश्वास था कि यह धोखा है वह उस भेंट के लिए पूरी तरह तैयार होकर गया और चालाकी तथा साहस से खान की हत्या कर डाली (1659)। इसके बाद शिवाजी ने उसकी नेतृत्वहीन सेना को तितर-बितर कर दिया जळसस सारे साजोसामान और तोपखाने पर कब्जा कर लिया। इस विजय से मराठा सेना की हिम्मत बढ़ गई और उसने पन्हाला के मजबूत किले पर भी कब्जा कर लिया तथा दक्षिण कोंकण और कोल्हापुर के जिलों में कई क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की। अपने अभियानों के कारण शिवाजी का नाम घर-घर में फैल गया और लोग उसकी जादुई शक्तियों के बारे में चर्चा करने लगे थे। मराठा क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग उसकी सेना में भर्ती होने के लिए आने लगे। यहाँ तक कि पेशेवर अफगान सैनिक, जो पहले बीजापुर की सेवा में थे वे भी शिवाजी की सेना में भर्ती हो गये। उधर मुगल सीमा के इतने नजदीक मराठों की शक्ति को बढ़ता देख औरंगजेब चिन्तित था। औरंगजेब ने दकन के नये मुगल प्रशासक शाइस्ता खाँ जो औरंगजेब का संबंधी भी था, को शिवाजी के क्षेत्रों पर आक्रमण करने का आदेश दिया। आरम्भ में शिवाजी को विशेष सफलता नहीं मिली। शाइस्ता खाँ ने 1660 में पूना पर कब्जा कर लिया और उसे अपना मुख्यालय बनाया। इसके बाद उसने शिवाजी के चंगुल से कोंकण को छुड़ाने के लिए वहाँ अपनी सेना भेजी। मराठों की बहादुरी तथा शिवाजी के छापामार हमलों के बावजूद मुगल उत्तरी कोंकण पर कब्जा करने में सफल हो गये और कोई चारा न देख शिवाजी ने एक अत्यन्त साहसपूर्ण कदम उठाया। वह रात के अंधेरे में पूना में शाइस्ता खाँ के खेमें में घुस गया और जब वह हरम में था, उस पर हमला कर दिया (1663)। उसने शाइस्ता खाँ के लड़के तथा उसके एक सेनाध्यक्ष को मार डाला तथा खान को भी जख्मी कर दिया। इस साहसपूर्ण हमले के बाद शाइस्ता खाँ की इज्जत घट गई और उधर शिवाजी की प्रतिष्ठा एक बार फिर कायम हो गई। औरंगजेब ने गुस्से में आकर शाइस्ता खाँ को बंगाल भेज दिया। यहाँ तक कि उस समय की प्रथा के विपरीत बदली के समय औरंगजेब ने खान से मिलने से भी इन्कार कर दिया। इस बीच शिवाजी ने एक और साहस का काम किया। उसने मुगलों के मुख्य बन्दरगाह सूरत पर आक्रमण किया (1664) तथा उसे पूरी तरह लूटा। इस हमले में उसके हाथ अपार सम्पत्ति लगी। पुरन्दर की सन्धि और शिवाजी का आगरा आगमनशाइस्ता खाँ की असफलता के बाद औरंगजेब ने अपने प्रमुख तथा विश्वसनीय सलाहकार, आमेर के राजा जयसिंह को शिवाजी का मुकाबला करने भेजा। राजा जयसिंह को सभी प्रकार के सैनिक तथा प्रशासनिक अधिकार दिये गये जिससे उसको दकन के मुगल प्रशासक पर निर्भर नहीं रहना पड़े और वह सीधे सम्राट के साथ अपना संपर्क रख सके। अपने से पहले के मुगल सरदारों की तरह राजा जयसिंह ने मराठों की शक्ति का अनुमान लगाने में गलती नहीं की। उसने पूरी तरह से राजनीतिक तथा सैनिक तैयारियाँ कीं और शिवाजी के सभी विरोधियों को अपने पक्ष में करने का प्रयत्न किया। यहाँ तक कि शिवाजी को पूर्णतः अकेला कर देने के लिए उसने बीजापुर के सुलतान को भी अपने पक्ष में करने की चेष्टा की। राजा जयसिंह ने पूना की ओर रुख करते हुए शिवाजी के प्रमुख अड्डे पुरन्दर का किला जिसमें शिवाजी अपने परिवार के साथ रहता था और जहाँ उसका खजाना था, पर आक्रमण करने का निश्चय किया। उसने 1665 में पुरन्दर के किले की घेराबन्दी कर ली तथा घेरे को उठाने के मराठों के सभी प्रयासों को विफल कर लिया। अपनी पराजय तथा कहीं से कोई सहायता न आती देख शिवाजी ने जयसिंह से बातचीत करने का निश्चय किया। बहुत विचार-विमर्श के बाद निम्नलिखित बातों पर सन्धि हुई -(1) शिवाजी को अपने 35 किलों में से चार लाख हून प्रति वर्ष के लगान वाले 23 किलों तथा उसके आसपास के क्षेत्रों को मुगलों को सौंपने पड़े। शिवाजी के पास एक लाख हून वाले 12 किले बच पाये और उसे सम्राट के प्रति सेवा और निष्ठा का वचन भी देना पड़ा। (2) कोंकण में चार लाख हून प्रति वर्ष की आय वाले क्षेत्र जिन पर शिवाजी का पहले ही अधिकार था, शिवाजी के पास थे। इसके अलावा बालाघाट में पाँच लाख हून प्रतिवर्ष आय वाले इलाके, जिन्हें शिवाजी को बीजापुर से जीतना था, भी उसे दिए गए। इनके बदले में शिवाजी को मुगलों को चालीस लाख हून किस्तों में देना था। शिवाजी ने व्यक्तिगत रूप से सेवा करने से छूट माँगी। इसके बदले उसके स्थान पर उसके छोटे पुत्र संभाजी को 5000 मनसब की पद्वी प्रदान की गई। शिवाजी ने यह वचन दिया कि वह दकन में मुगलों के अभियानों में उनका साथ देगा। जयसिंह ने बड़ी होशियारी से शिवाजी तथा बीजापुर के शासक के बीच झगड़े के बीज को बो दिया। लेकिन इस योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करती थी कि मुगलों को हर्जाना भरने के लिये बीजापुर के क्षेत्रों पर कब्जा करने के शिवाजी के प्रयास में मुगल कितना साथ देते हैं। बाद में यह योजना असफल भी इसी कारण से हुई। औरंगजेब अभी भी शिवाजी के बारे में पूरा विश्वस्त नहीं था और बीजापुर पर मुगल तथा मराठों के मिले-जुले हमले को आशंका की नजर से देखता था। उधर जयसिंह के विचार बिल्कुल अलग थे। उसके अनुसार बीजापुर तथा सारे दकन पर विजय प्राप्त करने के लिए शिवाजी की मैत्री प्राप्त करना पहला कदम था। यदि एक बार इस बात में उन्हें सफलता मिल गई तब शिवाजी को मुगलों का मित्र बने रहने के अलावा और कोई चारा नहीं रहता था। जैसा कि जयसिंह ने औरंगजेब को लिखा ‘हम शिवा को एक वृत्त के केन्द्र की तरह बाँध लेंगे।’ इसके बावजूद बीजापुर के विरुद्ध मुगल तथा मराठों का मिला-जुला अभियान असफल रहा। शिवाजी को पन्हाले के किले पर कब्जा करने का काम सौंपा गया लेकिन वे भी इस कार्य में असफल रहे। अपनी योजना को इस तरह ढहता देख जयसिंह ने शिवाजी को आगरा जाकर सम्राट से मिलने पर राजी कर लिया। जयसिंह ने सोचा कि यदि शिवाजी तथा औरंगजेब में किसी प्रकार का समझौता हो जाए तब बीजापुर पर एक बार पुनः आक्रमण करने के लिए औरंगजेब को अधिक साधन उपलब्ध कराने पर राजी किया जा सकता है। लेकिन उसकी यह योजना भी बुरी तरह असफल रही। शिवाजी जब आगरा आये तब उसे 5000 मनसब की श्रेणी में रखा गया। शिवाजी को यह बात अत्यंत अपमानजनक लगी क्योंकि यह पदवी उसके नाबालिग लड़के को दी गई थी। इसके अलावा औरंगजेब का जन्म दिवस मनाया जा रहा था और उसे शिवाजी से बातचीत करने का समय नहीं मिला। शिवाजी ने गुस्से में आकर मुगल सेवा में भर्ती होने से इन्कार कर दिया और वहाँ से बाहर निकल आया। इस प्रकार की घटना राजदरबार में पहले कभी नहीं घटी थी और राजदरबार के एक प्रभावशाली दल ने औरंगजेब पर जोर दिया कि वह सम्राट की मर्यादा बनाये रखने के लिए शिवाजी को कड़े से कड़ा दंड दे ताकि अन्य लोगों भी इससे उदाहरण लें। शिवाजी क्योंकि जयसिंह के आश्वासन पर आगरा आया था, इसलिए औरंगजेब ने जयसिंह को ही लिखकर उसकी सलाह माँगी। जयसिंह ने शिवाजी से नरम बर्ताव करने पर जोर दिया लेकिन इसके पहले कि कोई फैसला किया जाता शिवाजी (1666 में) कारावास से निकाल भागा। वह भाग निकलने में किस प्रकार सफल हुआ इसे सब अच्छी तरह जानते हैं और इसे यहाँ दोहराने की आवश्यकता नहीं। शिवाजी के निकल भागने के लिए औरंगजेब ने स्वयं अपनी लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया। इसमें सन्देह नहीं कि शिवाजी की आगरा यात्रा के बाद ही मुगलों तथा मराठों के संबंधों में एक बड़ी खाई पैदा हुई। शिवाजी वापस लौटने के दो साल बाद तक चुप बैठा रहा इस घटना से यह सिद्ध हो गया कि जयसिंह की आशा के विपरीत औरंगजेब शिवाजी के साथ अपनी मैत्री को अधिक महत्व नहीं देता था। उसके लिए शिवाजी एक छोटे भूमिया (जमींदार) से अधिक नहीं था। जैसा कि बाद की घटनाओं से स्पष्ट हो जाता है। औरंगजेब द्वारा शिवाजी के महत्व की अनदेखी करना और उसकी मैत्री को हासिल करने का प्रयास नहीं करना, औरंगजेब की बहुत बड़ी राजनीतिक भूल थी। शिवाजी के साथ सम्बन्ध विच्छेद - शिवाजी का प्रशासन और उनकी उपलब्धियाँयद्यपि बीजापुर के विरुद्ध अभियान की असफलता से पुरन्दर की सन्धि का कोई महत्व नहीं रह गया था फिर भी इस सन्धि के प्रति संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाने के कारण एक प्रकार से औरंगजेब ने शिवाजी को अपना विजय अभियान एक बार फिर शुरू करने के लिए मजबूर सा कर दिया। शिवाजी अपने 23 किलों तथा 4 लाख हून की आय वाले क्षेत्रों को मुगलों के हाथों में देखना सहन नहीं कर सकता था विशेषकर जबकि बीजापुर की तरफ से उसे कोई लाभ नहीं हुआ था। उसने मुगलों के खिलाफ अपना संघर्ष फिर जारी किया तथा 1670 में दूसरी बार सूरत को लूटा। अगले चार वर्षों के दौरान उसने पुरन्दर सहित कई किले मुगलों से वापस ले लिए तथा बरार तथा खानदेश सहित अन्य मुगल क्षेत्रों पर भी हमले किये। इस समय मुगल उत्तर पश्चिम में विद्रोही अफगानों से जूझ रहे थे इसीलिए शिवाजी की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया जा सका। शिवाजी ने बीजापुर के साथ भी अपना संघर्ष फिर आरंभ किया तथा रिश्वत देकर पन्हाला और सतारा को हासिल कर लिया और कनारा क्षेत्र में भी आक्रमण किए।1674 में औपचारिक रूप से राजगढ़ में शिवाजी का राज्याभिषेक हुआ। उसकी शुरुआत पूना के एक साधारण जागीरदार के रूप में हुई थी और वह अब सबसे शक्तिशाली मराठा सरदार था। अपने राज्य के विस्तार और सैनिक शक्ति के कारण वे दकन के सुल्तानों जैसी हैसियत रखता था। शिवाजी के औपचारिक राज्याभिषेक से कई उद्देश्यों की प्राप्ति हुईं। सबसे पहले तो इससे वह किसी भी अन्य मराठा सरदार के मुकाबले में अधिक शक्तिशाली तथा श्रेष्ठ रूप में उभर कर आया। इनमें से कुछ सरदार अभी भी उन्हें हेय दृष्टि से देखते थे। अपनी सामाजिक स्थिति को मजबूत करने के लिए शिवाजी ने खानदानी मराठा परिवारों (जैसे मोहिते तथा शिर्के वगैरह) में शादियाँ कीं। राज्याभिषेक के अवसर पर एक पण्डित गंगाभट्ट, जो समारोह का अध्यक्ष था, ने घोषणा की, शिवाजी एक उच्चवर्गीय क्षत्रिय हैं। इसके अलावा एक विद्रोही की बजाय अब शिवाजी के लिए एक स्वतन्त्र शासक के रूप में दकन के सुल्तानों के साथ बराबरी की हैसियत से सन्धि करना संभव हो गया। मराठा राष्ट्र भावना के विकास में भी यह एक और महत्वपूर्ण कदम था। 1676 में शिवाजी ने एक नया साहसपूर्ण कदम उठाया। हैदराबाद में मदन्ना तथा अखन्ना दो भाईयों की सहायता से उसने बीजापुरी कर्नाटक पर आक्रमण करने का फैसला किया। कुतुब शाह ने अपनी राजधानी में उसका भव्य स्वागत किया और दोनों के बीच एक संधि हुई। कुतुब शाह ने शिवाजी को एक लाख हून प्रति वर्ष (5 लाख रूपयों के बराबर) देना स्वीकार किया तथा अपने दरबार में एक मराठा राजदूत को रहने की इजाजत दी। दोनों में यह फैसला हुआ कि कर्नाटक की सम्पत्ति तथा क्षेत्रों का वे आपस में बँटवारा कर लेंगे। कतुबशाह ने शिवाजी को तोपखानें तथा सेना की टुकड़ी भी दी। इसके अलावा शिवाजी की सेना के खर्च के लिए धन भी दिया। यह सन्धि शिवाजी के पक्ष में बड़ी लाभदायक रही और इसके कारण वह बीजापुर के अधिकारियों से जिंजी तथा वैलोर छीनने में सफल हो गया। उसने अपने सौतेले भाई एकोजी के भी कई क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। यद्यपि शिवाजी ने हैंदव धर्मोधारक (हिन्दू धर्म की सुरक्षा करने वाला) की पदवी ग्रहण की थी पर इसके बावजूद उसने इस क्षेत्र की हिन्दू आबादी को बड़ी निष्ठुरता से लूटा जब वह इस बड़े खजाने के साथ वापस लौटा तब उसने कतुब शाह के साथ इसका बँटवारा करने से इन्कार कर दिया और इस तरह उससे अपने संबंध बिगाड़ लिए। कर्नाटक अभियान शिवाजी का अन्तिम महत्वपूर्ण अभियान था। उसने जिंजी में जो अड्डा स्थापित किया था वह बाद में मराठों के खिलाफ औरंगजेब के हमलों के दौरान उसके लड़के राजाराम के लिए सुरक्षा अथवा शरणस्थल बन गया। कर्नाटक अभियान से लौटने के कुछ ही समय बाद 1680 में शिवाजी की मृत्यु हो गई। लेकिन इसी बीच उसने एक मजबूत प्रशासन व्यवस्था की नींव रख दी थी। शिवाजी का प्रशासन बहुत हद तक दकन राज्यों की प्रशासन व्यवस्था पर आधारित था। यद्यपि उन्होंने आठ मन्त्रियों की नियुक्ति की और इन्हें अष्टप्रधान की संज्ञा दी फिर भी इसे एक मन्त्रिमण्डल नहीं कहा जा सकता, हर मन्त्री सम्राट के प्रति जिम्मेदार था। पेशवा सबसे मुख्य मन्त्री था जो राज्य के प्रशासन तथा अर्थ-व्यवस्था को देखता था। दूसरा मुख्य पदाधिकारी सर-ए-नौबत (सेनापति) था यह एक सम्मानित पद्वी थी जो किसी प्रमुख मराठा सरदार को दी जाती थी। लेखाकार को मजूमदार कहा जाता था और वाके नवीस घरेलू मामलों तथा गुप्तचर विभाग के लिए जिम्मेदार था। सुरूनवीस अथवा चिटनिस राजा को पत्र व्यवहार में मदद करते थे। दबीर राजा को विदेशी मामलों में सहायता करता था न्याय तथा अनुदानों के विभाग न्यायधीश तथा पण्डित राव के अधीन था। इन नियुक्तियों से अधिक महत्वपूर्ण शिवाजी की सेना का संगठन तथा कर व्यवस्था थी। शिवाजी अपने सैनिकों को नगद वेतन देना पसंद करता था, यद्यपि कुछ सरदारों को कर अनुदान (सरंजाम) भी दिये जाते थे। सेना में कड़ा अनुशासन था। अभियानों के दौरान स्त्रियों तथा नर्तकियों को सेना के साथ ले जाने पर मनाही थी। हमलों के दौरान लूटी गई सम्पत्ति का हर सैनिक को ब्यौरा देना पड़ता था और इसका हिसाब बड़ी सावधानी से रखा जाता था। उनकी नियमित सेना (पागा) में तीस से चालीस हजार घुड़सवार थे और उनका नेतृत्व हवलदारों के हाथों में था। हवलदारों को निश्चित वेतन दिए जाते थे। इसके अलावा अस्थायी सैनिक (सिलहदार) भी थे। किलों की देख-रेख बहुत सावधानी से की जाती थी। उनकी हिफाजत के लिए मवाली प्यादे और तोपची तैनात किए जाते थे। कहते हैं, धोखेबाजी से बचने के ऐहतियात के तौर पर किले की जिम्मेदारी तीन समकक्ष अधिकारियों को दी जाती थी। मालूम होता है, राजस्व व्यवस्था के मामले में शिवाजी ने मलिक अंबर की तद्विषयक व्यवस्था का अनुकरण किया। 1679 ई. में अन्नाजी दत्तो ने नए सिरे से राजस्व निर्धारित करने का काम पूरा किया। ऐसा सोचना सही नहीं है कि शिवाजी ने देशमुखी या जमींदारी प्रथा समाप्त कर दी थी और उसने अपने अधिकारियों को मोकासा या जागीरें नहीं दीं। लेकिन शिवाजी मिरासदारों या भूमि पर वंशानुगत अधिकारों से युक्त लोगों पर कड़ी निगाह रखता था। स्थिति का वर्णन करते हुए अठारहवीं सदी का लेखक सभासद कहता है कि - ‘‘ये लोग अपनी उगाही का बहुत छोटा सा हिस्सा सरकार को देते थे। फलतः मिरासदार फूलते-फलते रहे और उन्होंने गाँवों में किले और गढ़ियाँ बनवाकर तथा पैदल सैनिक और बंदूकची भर्ती करके अपनी शक्ति बढ़ा ली। यह वर्ग बेलगाम हो गया था और इसने देश पर अपना दबदबा कायम कर लिया था।’’ शिवाजी ने उनके किलों और गढ़ियों को ध्वस्त करके उन्हें अनुशासन स्वीकार करने को मजबूर कर दिया। शिवाजी ने अपने राज्य के निकट के मुगल इलाकों पर एक कर लगाकर अपनी आय में वृद्धि की। यह कर भू-राजस्व का एक चौथाई होता है, इसलिए इसे चौथाई या चौथ कहा जाने लगा। शिवाजी न केवल एक सुयोग्य सेनापति, कुशल युद्धनीतिज्ञ तथा चतुर कूटनीतिज्ञ साबित हुआ, बल्कि उसने देशमुखों की शक्ति पर अंकुश लगा कर एक शक्तिशाली राज्य का शिलान्यास भी किया। सेना उसकी नीतियों को अंजाम देने का एक प्रभावकारी उपकरण थी, क्योंकि तब एक स्थान से दूसरे स्थान को तेजी से पहुँचना सबसे ज्यादा अहमियत रखता था। सेना अपने वेतन के लिए बहुत हद तक पड़ौसी इलाकों की लूट पर निर्भर थी। लेकिन इसी से शिवाजी द्वारा स्थापित राज्य को ‘‘युद्ध आधारित राज्य’’ नहीं कहा जा सकता। इसमें संदेह नहीं कि उसका स्वरूप क्षेत्रीय था, लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं है कि उसका अपना एक निश्चित जनाधार था। इस हद तक शिवाजी एक लोकप्रिय शासक था जो मुगल अतिक्रमण के खिलाफ जनभावना का प्रतीक बन गया था। औरंगजेब और दकनी राज्य (1658-88 ई.)दकनी राज्यों के साथ औरंगजेब के संबंधों में तीन चरणों का निर्देश किया जा सकता है। प्रथम चरण का दौर 1668 ई. तक रहा। इन वर्षों के दौरान मुख्य रूप से इस बात की कोशिश की गई कि बीजापुर से वे इलाके फिर से हासिल कर लिए जाएँ जो मूलतः अहमदनगर के थे लेकिन 1636 ई. की संधि के अनुसार बीजापुर के अधिकार में चले गए थे। 1684 ई. तक चलने वाले दूसरे चरण में मराठों को दकन में मुगल साम्राज्य के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जाता रहा और शिवाजी तथा बाद में उसके बेटे संभाजी के खिलाफ बीजापुर और गोलकुंडा पर मुगलों का साथ देने के लिए दबाव डालने का प्रयत्न किया जाता रहा। लेकिन साथ ही मुगल दक्षिणी राज्यों को अपने पूर्ण प्रभुत्व और नियंत्रण में लाने के लिए उनके प्रदेशों पर भी जब-तब हमले करते रहे। अंतिम चरण तब आरंभ हुआ जब औरंगजेब को मराठों के खिलाफ बीजापुर और गोलकुंडा का सहयोग प्राप्त करने की आशा नहीं रह गई और उसने तय किया कि मराठों का विनाश करने के लिए सबसे पहले बीजापुर और गोलकुंडा को जीतना जरूरी है।1636 ई. की संधि के तहत शाहजहाँ ने अहमदनगर राज्य के प्रदेशों का एक तिहाई हिस्सा बीजापुर को इस शर्त पर दे दिया था कि वह मराठों को समर्थन देना छोड़ दे। उसने यह वादा भी किया था कि मुगल बीजापुर और गोलकुंडा पर ‘‘कभी भी’’ कब्जा नहीं करेंगे। लेकिन इस संधि का त्याग शाहजहाँ ने खुद ही कर दिया था। 1657-58 ई. में मुगलों ने बीजापुर और गोलकुंडा के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया था। गोलकुंडा को हर्जाने में एक भारी रकम अदा करनी पड़ी और बीजापुर को 1636 ई. में दिये गए निजामशाही प्रदेश मुगलों को लौटाने पड़े। इसका जो ‘‘कारण’’ बताया गया वह यह था कि इन राज्यों ने कर्नाटक के भरपूर इलाके जीत लिए थे और उन्हें इस आधार पर मुगलों को मुआवजा देना चाहिए कि दोनों राज्य मुगलों के मातहत थे और इनकी देश विजय इसलिए संभव हो पाई कि मुगलों ने उन पर तटस्थ रहने की कृपा की थी। वास्तविकता यह थी कि दकन में मुगल सेना की तैनातगी पर भारी खर्च होता था और मुगलों को दकनी प्रदेशों से इतनी आमदनी नहीं होती थी कि वह खर्च पूरा हो पाता। एक लंबे अर्से तक यह खर्च गुजरात और मालवा के खजानों से दी गई आर्थिक सहायता से चलता रहा था। मालूम होता है, दकन में फिर से क्रमिक रूप से आगे बढ़ने की नीति के दूरगामी परिणामों का अंदाजा न तो शाहजहाँ लगा पाया और न औरंगजेब। इन नीति से मुगलों द्वारा की गई संधियों और उनके दिए वचनों पर से दकनी राज्यों का भरोसा हमेशा के लिए उठ गया और मराठों के विरूद्ध ‘‘हार्दिक गठबंधन’’ असंभव हो गया। इस नीति का अनुसरण औरंगजेब ने चौथाई सदी तक पूरी आजिजी से किया, लेकिन कामयाबी के नाम पर उसके हाथ कुछ नहीं आया। प्रथम चरण (1658-68 ई.)जब औरंगजेब गद्दी पर बैठा तो दकन में उसके सामने दो समसयाएँ थीं - शिवाजी की उदीयमान शक्ति द्वारा उपस्थित किया गया खतरा और बीजापुर को 1636 ई. की संधि के अनुसार दिए गए प्रदेशों को लौटाने पर राजी करना। कल्याणी और बीदर पर मुगलों ने 1657 ई. में अधिकार कर लिया था। 1660 ई. में रिश्वत देकर परेंदा भी हासिल कर लिया गया। शोलापुर अब भी नियंत्रण से बाहर था। गद्दीनसीन होने के बाद औरंगजेब ने जयसिंह से शिवाजी और आदिलशाह, दोनों को सबक सिखाने को कहा। इससे प्रकट होता है कि औरंगजेब को एक ओर मुगल सेना की श्रेष्ठता पर जरूरत से ज्यादा विश्वास था तो दूसरी ओर वह अपने विरोधियों की शक्ति को कम करके आँक रहा था। लेकिन जयसिंह कुशल राजनीतिज्ञ था। उसने औरंगजेब को जबाव दिया - ‘‘इन दोनों मूर्खों पर एक साथ आक्रमण करना नासमझी होगी।’’लेकिन जयसिंह अकेला मुगल राजनीतिज्ञ था जिसने इस दौर में दकन में संपूर्ण आक्रमण नीति की हिमायत की। उसकी राय थी कि दकन में संपूर्ण आक्रामक नीति अपनाए बिना मराठा समस्या का समाधान नहीं हो सकता था। औरंगजेब भी इस निष्कर्ष पर पहुँचा, लेकिन बीस साल बाद। बीजापुर पर आक्रमण की योजना बनाते समय जयसिंह ने औरंगजेब को लिखा था - ‘‘बीजापुर विजय संपूर्ण दकन और कर्नाटक की विजय की भूमिका है।’’ लेकिन औरंगजेब यह साहसिक नीति अपनाने में झिझक गया। हम उसके कारणों का केवल अुनमान ही लगा सकते हैं। ईरान के शाह ने उत्तर-पश्चिम में खतरनाक रूख अपना लिया था। दकन विजय के लिए लड़ाई लंबी चलती और उसमें खुद बादशाह की उपस्थिति भी जरूरी होती। शाहजहाँ के अनुभव से यह स्पष्ट था कि बड़ी सेना को किसी सरदार या महत्वाकांक्षी शाहजादे की कमान में नहीं छोड़ा जा सकता था। इसके अलावा, शाहजहाँ अभी जीवित था। इस हालत में औरंगजेब लड़ाई का संचालन करने के लिए लंबे समय तक राजधानी से बहुत दूर कैसे रह सकता था ? जयसिंह के पास जितना सीमित साधन था उसको देखते हुए बीजापुर के खिलाफ उसके अभियान (1665 ई.) की नाकामयाबी निश्चित थी। इस लड़ाई से मुगलों के खिलाफ दकनी राज्यों का संयुक्त मोर्चा एक बार फिर कायम हो गया, क्योंकि कुतुबशाह ने बीजापुर की सहायता के लिए एक विशाल सेना भेजी। दकनियों ने छापामार लड़ाई का तरीका अपनाया। उन्होंने जयसिंह को बीजापुर की ओर बढ़ने दिया, लेकिन वे जिन इलाकों से भी पीछे हटते थे उसे बिल्कुल वीरान कर देते थे जिससे मुगलों को कही कोई रसद पानी नहीं मिल रहा था। जयसिंह ने देखा कि उसके पास नगर पर हमला करने के लिए आवश्यक साधन नहीं हैं, क्योंकि वह अपने साथ घेराबंदी में काम आने वाली तोपें नहीं लाया था। अतः नगर पर घेरा डालना असंभव था। मजबूरन उसे पीछे लौटना पड़ा और पीछे लौटने का सिलसिला भी उसे मँहगा पड़ा। इस अभियान से जयसिंह न कुछ धन प्राप्त कर सका और न कोई प्रदेश। निराशा और औरंगजेब की नाराजगी के कारण जयसिंह जल्दी ही चल बसा (1667 ई.)। अगले साल (1667 ई.) मुगलों ने रिश्वत के बल पर शोलापुर से आत्मसमर्पण करवा लिया। इसके साथ ही प्रथम चरण समाप्त हो गया। दूसरा चरण (1668-84 ई.)1668 ई. से 1676 ई. तक मुगलों ने दकन में स्थिति पर नजर रखते हुए प्रतीक्षा करने के अलावा लगभग कुछ नहीं किया। इस दौरान एक नई बात यह हुई कि गोलकुंडा में मदन्ना और अखन्ना नामक दो भाई काफी शक्तिशाली होकर उभरे। 1672 ई. से लेकर 1687 ई. तक की अवधि में गोलकुंडा राज्य के नष्ट होने के पूर्व तक उस पर एक तरह से यही दोनों भाई शासन करते रहे। इन्होंने गोलकुंडा, बीजापुर और शिवाजी का एक त्रिपक्षीय गठबंधन स्थापित करने की नीति को अंजाम देने की कोशिश की। बीजापुर दरबार की गुटबाजी और शिवाजी की महत्वाकांक्षा के कारण इस नीति के मार्ग में बीच-बीच में बाधा पड़ती रही। बीजापुर दरबार की गुटबाजी के कारण यह भरोसा नहीं किया जा सकता था कि वह राज्य बराबर किसी एक नीति का अनुसरण करता रहेगा। अपने तात्कालिक हितों की खातिर कभी वे मुगल विरोधी तो कभी मुगल समर्थक नीति अपना लेते थे। शिवाजी कभी बीजापुर को लूटता था तो कभी मुगलों के खिलाफ उसे मदद देता था। यद्यपि औरंगजेब का मराठों की बढ़ती शक्ति के कारण गंभीर चिंता हो रही थी, तथापि मालूम होता है कि वह दकन में मुगल विस्तार को एक सीमा के अंदर ही रखना चाहता था। इसलिए उसने बीजापुर में बार-बार एक ऐसे गुट को प्रतिष्ठित करने और समर्थन देने का प्रयत्न किया जो शिवाजी के खिलाफ मुगलों के साथ सहयोग करे और गोलकुंडा की बातों में न आए।इस नीति को अंजाम देने के लिए मुगलों ने लगातार कई बार बीजापुर के मामले में फौजी दखलंदाजी की, जिसकी तफसील देना यहाँ जरूरी नहीं है। तमाम मुगल कूटनीतिक प्रयत्नों और सैनिक प्रयासों का कुल परिणाम यह निकला कि उनके खिलाफ तीनों दकनी राज्य एक हो गए। दकन में मुगलों के प्रतिनिधि दिलेर खाँ ने 1679-80 ई. में बीजापुर पर अधिकार करने की एक आखिरी कोशिश की, जो नाकाम रही। इसका कारण यह था कि दकन में किसी भी मुगल प्रतिनिधि के पास इतने साधन नहीं रहे कि वह दकनी राज्यों की संयुक्त शक्ति का मुकाबला कर सकता। इस बीच परिस्थिति में एक नया तत्व भी जुड़ गया था। तात्पर्य कर्नाटकी पैदल सैनिकों से हैं। बीजापुर की मदद के लिए बीदर सरदार प्रेम नाइक ने तीस हजार कर्नाटकी सैनिक भेज दिए थे, जिन्होंने बीजापुर पर मुगल घेरे को नाकाम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बीजापुर की सहायता के लिए शिवाजी ने भी एक बड़ी फौज भेजी और उधर मुगल प्रदेशों में भी वह चारों ओर लूटपाट मचाता रहा। इस प्रकार दिलेर खाँ कुछ भी हासिल न कर पाया, उल्टे अपनी सेना को बीजापुर के खिलाफ केंद्रित करके मुगल प्रदेशों को मराठों की लूटपाट के लिए अरक्षित छोड़ दिया। इन परिस्थितियों में औरंगजेब ने उसे दकन में वापस बुला लिया। तीसरा चरण (1684-87 ई.)इस प्रकार 1676-80 ई. में मुगलों को दकन में कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई। तभी 1681 ई. में अपने विद्रोही पुत्र शाहजादे अकबर का पीछा करता हुआ औरंगजेब दकन पहुँचा। आरंभ में उसने अपनी सेना को शिवाजी के बेटे और उत्तराधिकारी संभाजी के खिलाफ लगा दिया और स्वयं बीजापुर और गोलकुंडा को मराठों से विमुख करने के प्रयत्न में जुट गया। लेकिन उसके प्रयत्नों का भी परिणाम वही हुआ जो पहले के प्रयत्नों का हुआ था। मुगलों के खिलाफ दकन की एकमात्र ढाल मराठे थे और दकनी राज्य उसे खोने को तैयार नहीं थे।अब औरंगजेब ने अंतिम निबटारे का फैसला किया। अपने मातहत शासक के तौर पर उसने आदिलशाह से शाही सेना के लिए रसद पानी की व्यवस्था करने, मुगल सेना के अपने राज्य से होकर निर्बाध गुजरने देने की सुविधा देने और मराठों के खिलाफ लड़ाई के लिए पाँच से छह हजार घुड़सवार सुलभ कराने को कहा। उसने यह माँग भी रखी कि मुगलों का विरोध करने वाले प्रमुख बीजापुर सरदार शारजा खाँ को निष्कासित कर दिया जाए। अब खुला संघर्ष अनिवार्य था। आदिलशाह ने गोलकुंडा और संभाजी दोनों से सहायता माँगी जो बहुत ही तत्परता से सुलभ करा दी गई, परन्तु दकनी राज्यों की संयुक्त सेनाएँ भी मुगल सेना की संपूर्ण शक्ति का सामना नहीं कर पाई, खास कर इसलिए कि इस बार उस सेना की कमान का संचालन स्वयं मुगल शहंशाह कर रहा था। तब भी अठारह महीनों की घेराबंदी के बाद ही मुगल बीजापुर पर कब्जा कर सके (1686 ई.) और घेराबंदी के अंतिम चरण में स्वयं शहंशाह मौके पर मौजूद था। इससे स्पष्ट हो जाता है कि पहले जयसिंह (1665 ई.) और दिलेर खाँ (1679-80 ई.) को क्यों विफल होना पड़ा था। बीजापुर के पतन के बाद गोलकुंडा पर मुगलों का आक्रमण अनिवार्य था। कुतुबशाह ने इतने ‘‘गुनाह’’ किए थे कि औरंगजेब उसे माफ कर ही नहीं सकता था। उसने काफिर मदन्ना और अखन्ना के हाथों में सारी सत्ता सौंप दी थीं और कई अवसरों पर शिवाजी की सहायता भी की थी। औरंगजेब की चेतावनी के बावजूद बीजापुर की सहायता के लिए 40,000 सैनिक भेजना उसका सबसे ताजा विश्वासघात था। 1685 ई. में प्रबल प्रतिरोध के बावजूद मुगलों ने गोलकुंडा पर कब्जा कर लिया था। कुतुबशाह के भारी आर्थिक सहायता देने, कुछ इलाके मुगलों को सौंपने और मदन्ना तथा अखन्ना को हटा देने पर राजी होने पर औरंगजेब ने कुतुबशाह को माफ कर दिया था। मदन्ना और अखन्ना को घसीट कर सड़क पर लाया गया और उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया (1686 ई.), परन्तु यह जघन्य कृत्य भी कुतुबशाह को बचा न सका। बीजापुर के पतन के बाद औरंगजेब ने कुतुबशाह से अंतिम रूप से हिसाब चुकता करने का फैसला किया। गोलकुंडा पर आक्रमण 1687 ई. में आरंभ हुआ और छह महीने से अधिक समय की घेराबंदी के बाद विश्वासघात और रिश्वत के बल पर उसे फतह कर लिया गया। औरंगजेब विजयी तो हो गया था लेकिन उसे जल्दी पता लग गया कि बीजापुर तथा गोलकुंडा का पतन उसकी कठिनाइयों की शुरूआत ही थी। अब औरंगजेब के जीवन का आखिरी और सबसे कठिन चरण आरंभ हुआ। औरंगजेब मराठे तथा दकन - अन्तिम चरण (1687-1707)बीजापुर तथा गोलकुण्डा के पतन के बाद औरंगजेब ने अपनी सारी शक्ति मराठों के खिलाफ लगा दी। 1689 में अपने गुप्त अड्डे, संगमेश्वर में, एकाएक मुगलों के आक्रमण से शंभाजी अचंभित रह गया। उसे औरंगजेब के सामने लाया गया और विद्रोही तथा काफिर ठहरा कर उसकी हत्या कर दी गई। यह औरंगजेब की निस्सन्देह एक और बड़ी राजनीतिक गलती थी। मराठों से समझौता कर औरंगजेब बीजापुर तथा गोलकुण्डा पर अपनी विजय को पक्का कर सकता था। शंभाजी की हत्या कर न केवल उसने इसका मौका गवा दिया बल्कि मराठों को अपना संघर्ष और तेज करने का बहाना दे दिया। किसी एक शक्तिशाली नेता के अभाव में मराठा सरदारों ने खुले आम मुगल क्षेत्रों में लूटपाट आरम्भ कर दी। मुगल सेना को देखते ही वे इधर-उधर छिप जाते थे। मराठों को समाप्त करने के बदले औरंगजेब ने इन्हें सारे दकन में अपनी गतिविधियों को बढ़ाने का अवसर दिया। शंभाजी के छोटे भाई राजाराम का राज्याभिषेक तो हुआ लेकिन राजधानी पर मुगलों का आक्रमण होता देख वह वहाँ से भाग निकला। राजाराम ने भाग कर पूर्वी तट पर जिंजी में शरण ली और वहाँ से मुगलों के खिलाफ अपने संघर्ष को जारी रखा। इस प्रकार मराठों का विद्रोह पश्चिम से लेकर पूर्वी तट तक फैल गया।कुछ समय तक औरंगजेब अपने सारे शत्रुओं को समाप्त कर अपनी शक्ति के शिखर पर पहुँच गया था। उसके कुछ उमरा इस राय के थे कि उसे उत्तर भारत लौट जाना चाहिए और मराठों के खिलाफ संघर्ष का काम दूसरों पर छोड़ देना चाहिए। इसके अलावा ऐसा लगता है कि एक और पक्ष भी था जिसे युवराज शाह आलम का समर्थन प्राप्त था और जिसकी राय थी कि कर्नाटक का राज्य बीजापुर तथा गोलकुण्डा के अधीनस्थ शासकों पर छोड़ दिया जाना चाहिए। औरंगजेब ने इन सभी प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया। यहाँ तक कि दकन को शासकों से बातचीत करने के लिए शाह आलम को बन्दी बना लिया। उसका विश्वास था कि वह मराठों की शक्ति को कुचलने में सफल हो गया है। इस कारण 1690 के बाद औरंगजेब ने कर्नाटक के विशाल तथा समृद्ध क्षेत्र को कब्जे में करने पर ध्यान दिया। लेकिन यह औरंगजेब के बस के बाहर की बात थी। उसने बीजापुर तथा गोलकुण्डा के राज्यों में स्थिर प्रशासन कायम करने के बदले दूर-दूर तक आक्रमण किए जिससे विभिन्न क्षेत्रों में सम्पर्क साधन दूर-दूर तक फैल गए जिनकी रक्षा करना कठिन था और जिन पर मराठों ने हमले करने शुरू कर दिए। 1690 तथा 1703 के बीच औरंगजेब मराठों से समझौता न करने की अपनी जिद पर अड़ा रहा। उसने जिंजी से राजाराम पर घेरा डाल दिया जो बहुत दिनों तक चला। 1698 में जिंजी का पतन हुआ लेकिन राजाराम वहाँ से निकल भागने में सफल हो गया। उधर मराठों का संघर्ष और तेज हो गया और इससे कई अवसरों पर मुगलों को बड़ी हानि उठानी पड़ी। मराठों ने कई किलों को वापस ले लिया और राजाराम भी सतारा लौटने में सफल हुआ। इन पराजयों से औरंगजेब हतोत्साहित नहीं हुआ। उसने सभी मराठों के किलों पर पुनः कब्जा करने की ठानी। 1700 से 1705 में साढ़े पाँच वर्षों तक औरंगजेब अपने रुग्ण शरीर को एक किले से दूसरे किले तक ढोता फिरा। बाढ़, महामारी तथा मराठों के छापामारों ने मुगल सेना को तबाह कर डाला। अनेक सैनिक मारे गये। सैनिकों तथा उमरा के बीच असन्तोष तथा उनकी थकावट बढ़ती गईं। उनका साहस भी धीरे-धीरे खत्म होता गया। यहाँ तक कि कई जागीरदारों ने मराठों के साथ गुप्त समझौते कर उन्हें चौथ देना स्वीकार कर लिया ताकि मराठे उनकी जागीरों को शान्ति से रहने दें। आखिरकार 1703 में औरंगजेब ने मराठों के साथ बातचीत शुरु की। वह शंभाजी के पुत्र शाहू को रिहा करने पर तैयार हो गया जो समतारा में अपनी माँ के साथ बन्दी बना लिया गया था। शाहू के साथ अच्छा वर्ताब किया गया। उसे राजा की पद्वी तथा 7000 का मनसब प्रदान किया गया था। बड़ा होने पर उसकी शादी प्रतिष्ठित मराठे परिवारों की दो लड़कियों के साथ की गई थी। औरंगजेब शाहू को शिवाजी का स्वराज्य तथा दकन में सरदेशमुखी का अधिकार देकर उसकी विशेष हैसियत को मान्यता प्रदान करने के लिए तैयार था। शाहू का स्वागत करने के लिए 70 से अधिक मराठे सरदार इकट्ठे हुए। लेकिन औरंगजेब ने अन्तिम क्षण में मराठों के उद्देश्यों के प्रति आशंकित होकर इन सभी तैयारियों को रद्द कर दिया। 1706 में औरंगजेब को विश्वास हो गया कि मराठों के सभी किलों पर कब्जा करना उसके बस के बाहर की बात है। उसने धीरे-धीरे अहमदाबाद की ओर लौटना शरु किया, पर रास्ते में मराठों के आक्रमण होते रहे। इस प्रकार 1707 में औरंगाबाद में औरंगजेब ने जब आखिरी साँस ली तब वह अपने पीछे एक ऐसा साम्राज्य छोड़ गया जो क्षीण पड़ गया था और जिसमें तरह-तरह की आन्तरिक समस्याएँ उभर कर सामने आ रही थीं। मुगल साम्राज्य का पतन - औरंगजेब की जिम्मेदारीemsp; औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य का तेजी से पतन होने लगा। मुगल दरबार उमरा के बीच आपसी झगड़ों और षड़यन्त्रों का अड्डा बन गया और शीघ्र ही महत्वाकांक्षी तथा प्रान्तीय शासक स्वाधीन रूप में कार्य करने लगे। मराठों के हमले दकन से फैलकर साम्राज्य के मुख्य भाग, गंगा घाटी तक पहुँच गए। साम्राज्य की कमजोरी उस समय विश्व के सामने स्पष्ट हो गई जब 1739 में नादिरशाह ने मुगल साम्राट को बन्दी बना लिया तथा दिल्ली को खुले आम लूटा।प्रश्न उठता है कि मुगल साम्राज्य के पतन के लिए औरंगजे़ब की मृत्यु के बाद की घटनाएँ किस हद तक जिम्मेदार थीं और किस हद तक औरंगजेब की गलत नीतियाँ ? इस बात को लेकर इतिहासकारों में काफी मतभेद रहा है हालाँकि औरंगजेब को इसके लिए जिम्मेदार होने से पूर्णतया मुक्त नहीं किया जा सकता, अधिकतर आधुनिक इतिहासकार औरंगजेब के शासनकाल को देश की तात्कालिक आर्थिक, सामाजिक, प्रशासनिक तथा बौद्धिक स्थिति और उसके शासनकाल के पहले और उसके दौरान की अन्तराष्ट्रीय गतिविधियों के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। मध्ययुगीन भारत की आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति का पूरा मूल्याँकन किया जाना अभी बाकी है। पहले के अध्याय में हम देख चुके हैं कि 17वीं शताब्दी के दौरान भारत में वाणिज्य तथा व्यापार का बहुत विकास हुआ तथा हस्तकला के माध्यम से निर्मित वस्तुओं का उत्पादन इनके अनुकूल था। यह उसी समय संभव था जब कपास तथा नील जैसे कच्चे माल का भी उत्पादन साथ-साथ बढ़ता रहा हो। इस काल में मुगल सरकारी आंकड़ों के अनुसार उस क्षेत्र का विकास हुआ था जहाँ ‘जब्ती’’ अर्थात् जमीन की पैमाइश के आधार पर लगान का तरीका प्रचलित था। इस बात के भी कुछ सबूत मिलते हैं कि कृषि योग्य भूमि का भी विस्तार हुआ। यह आर्थिक परिस्थितियों के अलावा मुगलों की प्रशासनिक नीतियों के कारण ही संभव हुआ। हर मनसबदार तथा ऐसे धार्मिक नेता जिसे भूमि अनुदान में मिलती थी, से आशा की जाती थी कि वह कृषि के विस्तार और विकास में व्यक्तिगत रुचि लेगा। कृषि सम्बन्धित दस्तावेजों को सावधानी से रखा जाता था। इतिहासकारों को इन विस्तृत ब्यौरों को देखकर आश्चर्य होता है। इनमें हर गाँव के न केवल हलों, बैलों तथा कुँओं की संख्या दी गई है बल्कि किसानों की संख्या भी दर्ज की गई है। इसके बावजूद ऐसा विश्वास करने के कारण भी हैं कि वाणिज्य तथा व्यापार और कृषि उत्पादन उतनी तेजी से नहीं बढ़ रहा था, जितना की स्थिति और आवश्यकता के अनुसार बढ़ना चाहिए था। इसके कई कारण थे। मिट्टी की घटती हुई उपजाऊ शक्ति का सामना करने के लिए कृषि के नये उपायों के बारे में लोगों को कोई जानकारी नहीं थी। लगान की दर बहुत ऊँची थी। अकबर के समय से, यदि हम जमींदारों तथा अन्य स्थानीय अधिकारियों के हिस्से को शामिल करें तब यह कुल उत्पादन का करीब-करीब आधा हिस्सा होती थी। यद्यपि राज्य का हिस्सा अलग-अलग क्षेत्रों के अनुसार अलग-अलग था, अर्थात् राजस्थान तथा सिन्ध जैसे कम उपजाऊ राज्यों में कम तथा कश्मीर में केसर उत्पादन करने वाले उपजाऊ क्षेत्रों में अधिक था, आमतौर पर लगान इतना अधिक नहीं था कि इसके कारण किसान खेती छोड़ दें। वास्तव में पूर्वी राजस्थान के आंकड़ों से पता चलता है कि 17वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तथा अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ में नये गाँव बराबर बसते गये (इससे पहले की अवधि के आंकड़े हमें प्राप्त नहीं हैं)। ऐसा लगता है कि सामाजिक तथा कुछ हद तक प्रशासनिक कारणों से कृषि का उतना अधिक विकास नहीं हो पाया। अनुमान लगाया जाता है, कि इस काल में देश की आबादी साढे बारह करोड़ थी। इसका अर्थ यह हुआ कि कृषि भूमि बहुत बड़ी मात्रा में उपलब्ध थी। लेकिन इसके बावजूद हमें कई गाँवों में भूमिहीन मजदूरों के बारे में सुनने को मिलता है। इनमें से अधिकतर लोग अछूत वर्ग में समझे जाते थे। खेती करने वाला वर्ग तथा जमींदार न तो चाहते थे कि अछूत नये गाँव बसायें और इस प्रकार जमीन की मिल्कियत हासिल करें और न ही इस बात को प्रोत्साहन देते थे। उनका हित इसी में था कि ये लोग गाँव में अतिरिक्त श्रमिक के तौर पर ही रहें और उनके लिए मृत जानवरों की खाल उतारने तथा चमड़े की रस्सियाँ बनाने जैसे छोटे काम करते रहें। भूमिहीन अथवा गरीब (जिसके पास बहुत कम जमीन थी) लोगों के पास न तो ऐसा संगठन था और न ही इतनी पूँजी थी कि वे अपने बल पर नई जमीन पर खेती कर सकें अथवा नये गाँव बसा सकें, कभी-कभी नयी जमीन पर खेती करने के कार्य में राज्य पहल करता था। लेकिन अछूत इसका पूरा लाभ नहीं उठा सकते थे क्योंकि राज्य को इस काम में स्थानीय जमींदारों तथा गाँव के मुखियों (मुकद्दमों) का सहयोग लेना ही पड़ता था और ये, जैसा कि हम देख चुके हैं, दूसरी जातियों के होते थे और अपने ही वर्ग के हितों के प्रति जागरूक थे। इस प्रकार उत्पादन तो धीरे-धीरे बढ़ा परन्तु शासक वर्ग की आशाएँ तथा उनकी माँगे तेजी से बढ़ती गईं। इस प्रकार मनसबदारों की संख्या 1605 में जहाँगीर के सम्राट बनने के समय में 2069 से बढ़कर शाहजहाँ के शासनकाल में 1637 में 8000 तथा औरंगजेब के शासनकाल के उत्तरार्द्ध में 11,456 हो गई। मनसबदारों की संख्या इस प्रकार पाँच गुनी हो गई लेकिन साम्राज्य की आय इस अनुपात में नहीं बढ़ी। इसके बावजूद शाहजहाँ के शासनकाल में एक भव्य काल की शुरुआत हुई। मुगल मनसबदारों के वेतन विश्व में सबसे ऊँचे थे ही। इस काल में उनकी अमीरी और विलासिता और भी अधिक बढ़ गई। यद्यपि कई मनसबदार वाणिज्य तथा व्यापार में, परोक्ष रूप से अथवा ऐसे व्यापारियों के माध्यम से जो उनके लिए कार्य करते थे, हिस्सा लेते थे फिर भी वाणिज्य तथा व्यापार से होने वाली आय जमीन से होने वाली आय का पूरक मात्र थी। उनकी समस्याएँ और भी बढ़ गई क्योंकि 17वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में कीमतें मोटे तौर पर दुगनी हो गई थीं। इस कारण वे किसानों तथा जमीदारों को चूसकर जमीन से होने वाली आय को ही बढ़ाने में दिलचस्पी रखते थे। हमें जमीदारों की संख्या तथा उनके रहन-सहन के स्तर के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं है। जमीदारों के प्रति मुगल नीतियों में पारस्परिक विरोध था। एक ओर तो यह माना जाता था कि राज्य की आन्तरिक स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा जमींदार ही हैं, दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन को चलाने के लिए बड़े पैमाने पर इनकी नियुक्ति होती थी। इनमें से कईयों - राजपूतों, मराठों तथा अन्य को-मनसब प्रदान किए जाते थे और साम्राज्य के राजनैतिक आधार के विस्तार के लिए राजनीतिक पदों पर इनकी नियुक्ति की जाती थी। इस प्रक्रिया में जमींदारों का वर्ग बहुत शक्तिशाली हो गया था और वह अब मनसबदारों की गैरकानूनी माँगों को मानने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था। न ही किसानों पर लगान का बोझ बढ़ाना आसान था। विशेषकर जबकि उपजाऊ भूमि बड़ी मात्रा में उपलब्ध थी और जमींदारों तथा गाँव के मुखियों में अधिक खेतिहरों को अपने यहाँ काम करने के लिए लाने की होड़ लगी रहती थी। ऐसे किसान जो रोजगार की खोज में एक गाँव से दूसरे गाँव जाते रहते थे। उन्हें पाही अथवा ऊपरी कहा जाता था। मध्ययुगीन ग्रामीण समाज के ये एक प्रमुख अंग थे लेकिन इनके अध्ययन पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि जमींदार जमीन से अधिक से अधिक कमाना चाहते थे और कई बार ऐसे तरीके अपनाते थे जो राज्य द्वारा स्वीकृत नहीं थे। इस कारण मध्ययुगीन ग्रामीण समाज के सभी आन्तरिक संघर्ष उभर कर सामने आ गये। कुछ क्षेत्रों में किसानों के बीच गम्भीर असन्तोष फैला तथा अन्य क्षेत्रों में जमींदारों के नेतृत्व में विद्रोह तक हो गये। कई अवसरों पर इन जमींदारों ने स्वतंत्र क्षेत्रीय राज्य स्थापित करने के प्रयास भी किए। प्रशासनिक स्तर पर भी मनसबदारों के बीच व्यापक असन्तोष तथा भेदभाव फैला और इससे जगीरदारी व्यवस्था में गम्भीर संकट पैदा हो गया। मनसबदारों को अपनी जागीरों से वह आय नहीं प्राप्त हो पाती, जो कागज पर दर्ज थी। फलस्वरूप उनमें से बहुत से अपने हिस्से के सैनिक नहीं रख पाते थे। दकन में विशेष रूप से स्थिति बहुत खराब थी। शांति और मुनासिब सैनिक दल के अभाव से वे धेला भी वसूल नहीं कर पाते थे। स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि इस युग के एक इतिहासकार भीमसेन के अनुसार बहुत से मनसबदारों ने गुप्त रूप से मराठा सरदारों से निजी तौर पर यह तय कर लिया था कि वह उन्हें इस शर्त पर चौथ या अपनी आय का चौथाई हिस्सा दे देंगे यदि वह उनकी जागीरों में कोई गड़बड़ न करें। एक और समस्या जागीरों की कमी थी। बीजापुर और गोलकुण्डा को साम्राज्य में शामिल करने के बाद औरंगजेब ने युद्धों का खर्चा भरने के लिए सबसे अच्छी और सरलता से प्रशासित जागीरों को सीधे राज्य के अधीन अर्थात् ‘‘खालिसा’’ में ले लिया था। राजनीतिक उद्देश्यों के लिए बहुत से पुराने दकनी उमरा और मराठा सरदारों को मनसब और जागीरों भी प्रदान करनी थीं। इसलिए पुराने मनसबदारों के बेटों और उनके दामादों के लिए जागीरों की भारी कमी थी। इतिहासकार खाफी खाँ के शब्दों में स्थिति इतनी गम्भीर थी कि एक अनार सौ बीमार। छोटे स्तर पर जागीरदार तो विशेष रूप से संकट में थे क्योंकि उन्हें क्लर्क और दफ्तर के दूसरे पदाधिकारी बहुत सताते थे और उनसे रिश्वत माँगते थे और यदि वे रिश्वत देने में असमर्थ रहते तो उन्हें गरीब कम आय वाली जागीरों में भेज दिया जाता था। जागीरदारी व्यवस्था में आए संकट का मनसबदारों पर बड़ा दबाव पड़ा। अधिक से अधिक संख्या में जागीरें प्रदान करने और इसके साथ-साथ जागीर की कागज पर दर्ज आय और वसूलयाबी के मध्य अंतर की समस्या को सुलझाने के लिए शाहजहाँ ने मनसबदारों द्वारा रखे जाने वाले घोड़ों और सवारों की संख्या में कटौती कर दी। इन आदेशों को इस तरीके से स्पष्ट किया गया कि तनख्वाह वर्ष में 6 या 5 मास के वेतन के बराबर होगी। लेकिन जागीरों की कमी बनी रही और विशेष रूप से औरंगजेब के शासनकाल के अन्तिम हिस्से में यह कमी अत्यंत गम्भीर हो गई। दकन की विजय से भी समस्या का समाधान नहीं निकला, क्योंकि पुराने दकन राज्यों के अफसरों तथा मराठों को, जो इस क्षेत्र में सक्रिय और प्रभावशाली भी थे, राज्य की सेवा में भर्ती किया जाए। इससे उन मुगल उमरा (खानजादों) में काफी असन्तोष फैला जिन्होंने मुगल सम्राट की सेवा की थी और जिनके बेटे और दामाद सरकारी नौकरी तथा संरक्षण पर निर्भर कर रहे थे जिससे उन्हें अब वंचित किया जा रहा था। मुगलों द्वारा विकसित मनसबदारी व्यवस्था मुगल काल की सबसे प्रमुख विशेषता थी। हम देख चुके हैं कि किस प्रकार बिना जातिभेद के मुगल योग्य व्यक्तियों को अपनी सेवा में आकर्षित करने में सफल हुए थे। इनमें से देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोग थे और कुछ विद्रोही भी थे। व्यक्तिगत आधार पर बने मुगलों के प्रशासनिक ढाँचे के अन्तर्गत मनसबदारों ने बड़ी सफलता से काम किया और देश को काफी हद तक सुरक्षा तथा शांति प्रदान की। मनसबदारों की यह भूमिका सम्राट के प्रति मात्र सेवा-भाव थी और ये अधिकतर अपने ही हितों का ध्यान रखते थे। कुछ इतिहासकारों का यह तर्क गलत है कि मनसबदारों का संगठन औरंगजेब की मृत्यु के बाद इसलिए कमजोर पड़ गया क्योंकि मध्य एशिया से कुशल लोगों का आना रुक गया। वास्तव में औरंगजेब के सिहासनारूढ़ होने तक अधिकतर मुगल मनसबदार ऐसे व्यक्ति थे, जिनका जन्म भारत में हुआ था। ऐसा विश्वास करने का कोई कारण नहीं है कि इनकी योग्यता का हृास भारतीय जलवायु के कारण हुआ। यह तर्क अंग्रेज इतिहासकारों ने जातिभेद के आधार पर इसलिए दिया है जिससे वे ठंडे देशों के लोगों द्वारा भारत के आधिपत्य को उचित ठहरा सकें, लेकिन ये तर्क अब नहीं स्वीकार किए जा सकते। यह भी कहा गया है कि क्योंकि सरदारों का वर्ग ऐसे लोगों का बना था जिसमें कई जातियों के लोग सम्मिलित थे, इसलिए उनमें कोई राष्ट्रीय चेतना नहीं थी और उन्होंने राष्ट्रविरोधी कार्य भी किए। इसके लिए बहुधा यह तर्क दिया जाता है कि मुग़ल उमरा वर्ग का विकास क्योंकि विभिन्न जातियों, वर्गां और समुदायों से हुआ था, अतः उसमें राष्ट्रीय चेतना का अभाव होना स्वाभाविक ही था। लेकिन राष्ट्रीयता की भावना का, उस अर्थ में जिसे हम आज समझते हैं, मध्ययुग में कोई अस्तित्व नहीं था। इसके स्थान पर नमकहलाली की भावना प्रभावशाली थी तथा इसी कारण सरदार मुगल वंश के प्रति वफादार बने रहे और उनमें एक प्रकार से देशभक्ति जीवित रही, जैसा कि हम देख चुके हैं कि विदेश से आने वाले अमीरों का अपने स्वदेश से कोई विशेष सम्पर्क नहीं रहता था और वह वस्तुतः मुगल भारतीय सांस्कृतिक आदर्शों को ही अपना लेता था। मुगलों ने प्रशासनिक व्यवस्था के हर स्तर पर सावधानी से ऐसे तरीके लागू किए जिनसे विभिन्न जाति अथवा धर्म के लोगों के बीच ऐसा सन्तुलन बना रहे ताकि महत्वाकांक्षी अमीरों अथवा उनके दलों पर प्रभावशाली नियन्त्रण रखा जा सके। अमीरों ने स्वाधीन होने की चेष्टा तभी प्रारंभ की जब औरंगजेब के उत्तराधिकारियों की असमर्थता के कारण तथा जागीरदारी व्यवस्था में उत्पन्न संकट के कारण प्रशासनिक व्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर होने लगी। इस प्रकार मुगलों का शीघ्रता से विघटन मुगल प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरी के कारण नहीं बल्कि परिणाम था। यह अवश्य कहा जा सकता है कि मुगल प्रशासन बहुत हद तक केन्द्रित था और इसकी सफलता अंततः बादशाह की योग्यता पर निर्भर करती थी। योग्य शासकों के अभाव में वजीरों ने उसका स्थान लेने की चेष्टा की पर असफल रहे। इस प्रकार इस व्यवस्था के पतन तथा व्यक्तिगत असफलता की एक-दूसरे पर प्रतिक्रिया हुई। राजनीतिक क्षेत्र में औरंगजेब ने कई गम्भीर गलतियाँ कीं। हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं कि किस प्रकार वह मराठों के आन्दोलन के सही स्वरूप को नहीं समझ सका और शिवाजी को मित्र बनाने की जयसिंह की सलाह अनदेखी कर दी। संभाजी की हत्या उसकी एक और बड़ी गलती थी। इसके बाद मराठों का ऐसा कोई प्रभावशाली नेता नहीं बच गया जिससे औरंगजेब बातचीत या समझौता कर सकता। उसे विश्वास था कि बीजापुर और गोलकुण्डा को अपने कब्जे में करने के बाद मराठे उससे दया की भीख माँगेंगे और उसकी शर्तों को स्वीकार करने के अलावा उनके पास और कोई चारा नहीं रह जायेगा। औरंगजेब मराठों के स्वराज्य के क्षेत्र को संकुचित करना और उनसे निष्ठा का वचन चाहता था। जब औरंगजेब ने अपनी गलती महसूस की और मराठों से बातचीत शुरू की तब चौथ तथा सरदेशमुखी की माँग आड़े आ गई। बहुत हद तक इस बाधा को भी दूर किया गया। 1703 में मराठों और औरंगजेब के बीच समझौता करीब-करीब हो ही गया था, लेकिन जैसा कि हम देख चुके हैं कि औरंगजेब शाहू तथा मराठा सरदारों के प्रति अन्त तक अविश्वासी बना रहा। इस तरह औरंगजेब मराठों की समस्या का समाधान ढूँढ़ने में असफल रहा और अन्त तक इसका शिकार बना रहा। उसने कई मराठा सरदारों को मनसब प्रदान किए। यहाँ तक कि उच्चतम स्तर पर राजपूत सरदारों की अपेक्षा मराठा सरदारों के पास अधिक मनसब थे। लेकिन इसके बावजूद मराठा सरदारों पर पूरी तरह विश्वास नहीं किया गया। राजपूतों की तरह उन्हें जिम्मेदारी अथवा विश्वास का कोई पद नहीं सौंपा गया। इस प्रकार मराठे मुगल राजनीतिक व्यवस्था के अभिन्न अंग कभी नहीं बन सके। यदि औरंगजेब शिवाजी, संभाजी या शाहू से भी कोई राजनीतिक समझौता कर लेता तो इससे स्थिति में बहुत बड़ा फर्क पड़ता। मराठों के खिलाफ दकनी राज्यों को संगठित करने की असफलता के लिए औरंगजेब की आलोचना की जाती है। यह भी कहा जाता है, कि उन्हें जीतकर औरंगजेब ने अपने साम्राज्य को इतना बढ़ा लिया था कि यह अपने ही भार के कारण ढह गया। शाहजहाँ के ही काल में 1636 की सन्धि भंग होने के बाद औरंगजेब तथा दकनी राज्यों के बीच गाढ़ी एकता असंभव थी। सम्राट बनने के बाद औरंगजेब दकन में पूर्ण विजय की नीति अपनाने से हिचकिचा रहा था। उसने दकनी राज्यों की विजय का निर्णय जब तक संभव था, टाला। मराठों की बढ़ी शक्ति, गोलकुण्डा में मदन्ना तथा अखन्ना द्वारा शिवाजी को दिए गए समर्थन और इस भय से कि बीजापुर पर शिवाजी तथा गोलकुण्डा (जिस पर मराठों का प्रभाव था) का प्रभुत्व कायम हो जाएगा, औरंगजेब दकन में अभियान चलाने को मजबूर हो गया था। बाद में शहजादा अकबर को पनाह देकर संभाजी ने औरंगजेब को एक प्रकार से बड़ी चुनौती दी थी। औरंगजेब ने शीघ्र ही महसूस किया कि बीजापुर तथा गोलकुण्डा को कब्जे में किये बिना मराठों से टक्कर लेना आसान नहीं है। गोलकुण्डा, बीजापुर तथा कर्नाटक में मुगल प्रशासन के विस्तार से मुगल प्रशासनिक सेवा टूटने लगी थी। मुगलों के सम्पर्क साधन भी मराठों के हमलों के लिए खुले थे। यहाँ तक कि इस क्षेत्र के मुगल सरदारों के लिए अपनी जागीरों से निर्धारित लगान की वसूली भी असंभव हो गई और कई बार उन्हें मराठों के साथ गुप्त सन्धियाँ करनी पड़ीं। इसके परिणामस्वरूप मराठों की शक्ति और प्रतिष्ठा बड़ी और उधर साम्राज्य की प्रतिष्ठा को धक्का पहुँचा। संभवतः औरंगजेब यदि अपने सबसे बड़े लड़के शाह आलम की यह राय मान लेता कि बीजापुर तथा गोलकुण्डा के साथ समझौता किया जाना चाहिए और उनके कुछ ही क्षेत्रों को साम्राज्य में मिलाया जाना चाहिए तो औरंगजेब के लिए बहुत लाभदायक होता। शाह आलम इस पक्ष में भी था कि बहुत दूर होने के कारण कर्नाटक पर प्रभावशाली नियन्त्रण रखना असंभव है इसलिए उसे वहीं के अधिकारियों के हाथों में छोड़ दिया जाना चाहिए। मुगल साम्राज्य के पतन के दकनी तथा अन्य युद्धों और उत्तरी भारत से बहुत समय के लिए औरंगजेब का गैरहाजिर होना भी बहुत महत्वपूर्ण कारण थे। औरंगजेब ने कई गलत नीतियाँ अपनाई थीं और उसमें कई व्यक्तिगत कमजोरियाँ भी थीं जैसे, वह अत्यधिक सन्देही तथा संकीर्ण विचारों का था। लेकिन इसके बावजूद मुगल साम्राजय बहुत शक्तिशाली था तथा उसकी सैनिक और प्रशासनिक व्यवस्था ठोस थी। मुगल सेना दकन के पहाड़ी क्षेत्रों में मराठा छापामारों के हमलों का सामना करने में भले ही असफल रही हो और मराठों के किलों पर मुश्किल से कब्जा कर सकी हो और कब्जा कर लेने के बाद उन्हें अधिक काल तक अपने अधीन रखने में असफल भी रही हो लेकिन इसमें कोई सन्देह नहीं कि उत्तरी भारत के मैदानों तथा कर्नाटक के विस्तृत पठार में मुगल तोपखाना अभी भी सबसे अधिक प्रभावशाली था। औरंगजेब की मृत्यु के चालीस साल बाद भी जब मुगल तोपखाने की शक्ति और क्षमता घट गई, मराठे खुले मैदान में उसका मुकाबला नहीं कर सकते थे। लम्बे समय तक अराजकता, युद्ध तथा मराठों के हमले से दकन की आबादी भले ही कम हुई हो और वहाँ का व्यापार, उद्योग तथा कृषि आदि की उन्नति में अवश्य ही व्यवधान पैदा हो गया था, परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि साम्राज्य के मुख्य भाग उत्तर भारत में, जो अर्थिक और राजनैतिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण था मुगल प्रशासन अत्यंन्त प्रभावशाली बना हुआ था। यहाँ तक कि जिलों के स्तर पर मुगल प्रशासन इतना उपयोगी सिद्ध हुआ कि इनके कई तत्व ब्रिटिश प्रशासन में सम्मिलित किए गए। सैनिक पराजयों और औरंगजेब की गलतियों के बावजूद राजनीतिक तौर पर लोगों के दिलो-दिमाग पर मुगल वंश का प्रभाव छाया रहा। जहाँ तक राजपूतों का सवाल है हम देख चुके हैं कि मारवाड़ का संघर्ष इसलिए आरंभ नहीं हुआ था कि औरंगजेब ने हिन्दुओं की स्थिति क्षीण करने के लिये इस बात का प्रयास किया कि हिन्दुओं का कोई प्रभावशाली नेता न रहे बल्कि इसलिए कि नासमझी के कारण उसने दो मुख्य प्रतिद्वन्दियों के बीच मारवाड़ के राज्य को विभाजित कर दोनों की दुश्मनी मोल ले ली। उसके इस कार्य से मारवाड़ के अतिरिक्त मेवाड़ का शासक उससे क्षुब्ध हो गया क्योंकि वह मुगल हस्तक्षेप को बहुत बड़ा खतरा समझता था। इसके बाद मारवाड़ तथा मेवाड़ के साथ जो लम्बा संघर्ष चला उससे मुगल साम्राज्य की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का पहुँचा यद्यपि यह बात अलग है कि 1681 के बाद इस संघर्ष का कोई विशेष सामरिक महत्व नहीं रहा। इस बात में सन्देह है कि 1681 तथा 1706 के बीच यदि दकन में अधिक संख्या में राठौर राजपूत नियुक्त किये जाते तो मराठों से होने वाले संघर्ष में कोई विशेष अंतर पड़ता। जो भी हो, पहले की तरह राजपूत अधिक मनसब और वतन जागीर की वापसी की माँग करते रहे। इन माँगों को औरंगजेब की मृत्यु के 6 साल के अन्दर अंदर स्वीकार कर लिया गया और इसके साथ ही मुगल साम्राज्य के लिए राजपूतों की समस्या समाप्त हो गई। इस काल के पश्चात से साम्राज्य के विघटन में उन्होंने न तो कोई भूमिका निभाई और न ही वे उसके पतन की प्रक्रिया को रोक सके। औरंगजेब की धार्मिक नीति की समीक्षा तात्कालिक सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में की जानी चाहिए। औरंगजेब स्वभाव से बड़ा कट्टर था और इस्लाम के कानून के अंतर्गत ही काम करना चाहता था। लेकिन इस कानून का विकास भारत के बाहर बिल्कुल विभिन्न परिस्थितियों में हुआ था और यह आशा नहीं की जा सकती थी यह भारत में भी कारगर सिद्ध होगा। औरंगजेब ने कई अवसरों पर अपनी गैर-मुसलमान प्रजा की भावनाओं को समझने से इन्कार कर दिया। मन्दिरों के प्रति अपनाई गई उसकी नीति और इस्लाम के कानून के आधार पर जजिया को दुबारा लागू करके न तो वह मुसलामानों को अपने पक्ष में कर सका और न ही इस्लामी कानूनों पर आधारित राज्य के प्रति उनकी निष्ठा प्राप्त कर सका। दूसरी ओर इस नीति के कारण हिन्दू भी उसके विरुद्ध हो गये और ऐसे वर्गों के हाथ मजबूत हो गये जो राजनीतिक तथा अन्य कारणों से मुगल साम्राज्य के विरोधी थे। वास्तव में इस सारी प्रक्रिया में धर्म अपने आप में इतना महत्वपूर्ण नहीं था। यह तथ्य औरंगजेब की मृत्यु के बाद के काल से पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है। औरंगजेब की मृत्यु के 6 वर्षों के अन्दर जजिया को समाप्त कर दिया गया तथा नये मन्दिरों के निर्माण पर लगी पाबंदी को उठा लिया गया लेकिन इससे भी साम्राज्य के पतन और विघटन की प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ा। अंत में हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि मुगल साम्राज्य का पतन और विघटन आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा संगठनात्मक कारणों से हुआ। अकबर की नीतियों से विघटन के तत्वों पर कुछ समय तक प्रभावशाली नियन्त्रण रखा जा सका। लेकिन सामाजिक व्यवस्था में कोई मूलभूत परिवर्तन करना उसके भी बस के बाहर की बात थी। औरंगजेब ने सिंहासन संभालने के समय तक विघटन की सामाजिक और आर्थिक शक्तियाँ उभर कर और शक्तिशाली हो गई थीं। इस व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन करने के लिए न तो औरंगजेब में राजनीतिक योग्यता और न ही दूरदर्शिता थी। वह ऐसी नीतियों के पालन में भी असमर्थ रहा जिनसे परस्पर विरोधी तत्वों पर कुछ समय के लिए रोक लगाई जा सकती। इस प्रकार औरंगजेब न केवल परिस्थितियों का शिकार था बल्कि उसने स्वयं ऐसी परिस्थितियों के निर्माण में योग दिया जिनका अन्ततः वह स्वयं शिकार बना। औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य का तेजी से पतन होने लगा। मुगल दरबार उमरा के बीच आपसी झगड़ों और षड़यन्त्रों का अड्डा बन गया और शीघ्र ही महत्वाकांक्षी तथा प्रान्तीय शासक स्वाधीन रूप में कार्य करने लगे। मराठों के हमले दकन से फैलकर साम्राज्य के मुख्य भाग, गंगा घाटी तक पहुँच गए। साम्राज्य की कमजोरी उस समय विश्व के सामने स्पष्ट हो गई जब 1739 में नादिरशाह ने मुगल साम्राट को बन्दी बना लिया तथा दिल्ली को खुले आम लूटा। प्रश्न उठता है कि मुगल साम्राज्य के पतन के लिए औरंगजे़ब की मृत्यु के बाद की घटनाएँ किस हद तक जिम्मेदार थीं और किस हद तक औरंगजेब की गलत नीतियाँ ? इस बात को लेकर इतिहासकारों में काफी मतभेद रहा है हालाँकि औरंगजेब को इसके लिए जिम्मेदार होने से पूर्णतया मुक्त नहीं किया जा सकता, अधिकतर आधुनिक इतिहासकार औरंगजेब के शासनकाल को देश की तात्कालिक आर्थिक, सामाजिक, प्रशासनिक तथा बौद्धिक स्थिति और उसके शासनकाल के पहले और उसके दौरान की अन्तराष्ट्रीय गतिविधियों के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। मध्ययुगीन भारत की आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति का पूरा मूल्याँकन किया जाना अभी बाकी है। पहले के अध्याय में हम देख चुके हैं कि 17वीं शताब्दी के दौरान भारत में वाणिज्य तथा व्यापार का बहुत विकास हुआ तथा हस्तकला के माध्यम से निर्मित वस्तुओं का उत्पादन इनके अनुकूल था। यह उसी समय संभव था जब कपास तथा नील जैसे कच्चे माल का भी उत्पादन साथ-साथ बढ़ता रहा हो। इस काल में मुगल सरकारी आंकड़ों के अनुसार उस क्षेत्र का विकास हुआ था जहाँ ‘जब्ती’’ अर्थात् जमीन की पैमाइश के आधार पर लगान का तरीका प्रचलित था। इस बात के भी कुछ सबूत मिलते हैं कि कृषि योग्य भूमि का भी विस्तार हुआ। यह आर्थिक परिस्थितियों के अलावा मुगलों की प्रशासनिक नीतियों के कारण ही संभव हुआ। हर मनसबदार तथा ऐसे धार्मिक नेता जिसे भूमि अनुदान में मिलती थी, से आशा की जाती थी कि वह कृषि के विस्तार और विकास में व्यक्तिगत रुचि लेगा। कृषि सम्बन्धित दस्तावेजों को सावधानी से रखा जाता था। इतिहासकारों को इन विस्तृत ब्यौरों को देखकर आश्चर्य होता है। इनमें हर गाँव के न केवल हलों, बैलों तथा कुँओं की संख्या दी गई है बल्कि किसानों की संख्या भी दर्ज की गई है। इसके बावजूद ऐसा विश्वास करने के कारण भी हैं कि वाणिज्य तथा व्यापार और कृषि उत्पादन उतनी तेजी से नहीं बढ़ रहा था, जितना की स्थिति और आवश्यकता के अनुसार बढ़ना चाहिए था। इसके कई कारण थे। मिट्टी की घटती हुई उपजाऊ शक्ति का सामना करने के लिए कृषि के नये उपायों के बारे में लोगों को कोई जानकारी नहीं थी। लगान की दर बहुत ऊँची थी। अकबर के समय से, यदि हम जमींदारों तथा अन्य स्थानीय अधिकारियों के हिस्से को शामिल करें तब यह कुल उत्पादन का करीब-करीब आधा हिस्सा होती थी। यद्यपि राज्य का हिस्सा अलग-अलग क्षेत्रों के अनुसार अलग-अलग था, अर्थात् राजस्थान तथा सिन्ध जैसे कम उपजाऊ राज्यों में कम तथा कश्मीर में केसर उत्पादन करने वाले उपजाऊ क्षेत्रों में अधिक था, आमतौर पर लगान इतना अधिक नहीं था कि इसके कारण किसान खेती छोड़ दें। वास्तव में पूर्वी राजस्थान के आंकड़ों से पता चलता है कि 17वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तथा अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ में नये गाँव बराबर बसते गये (इससे पहले की अवधि के आंकड़े हमें प्राप्त नहीं हैं)। ऐसा लगता है कि सामाजिक तथा कुछ हद तक प्रशासनिक कारणों से कृषि का उतना अधिक विकास नहीं हो पाया। अनुमान लगाया जाता है, कि इस काल में देश की आबादी साढे बारह करोड़ थी। इसका अर्थ यह हुआ कि कृषि भूमि बहुत बड़ी मात्रा में उपलब्ध थी। लेकिन इसके बावजूद हमें कई गाँवों में भूमिहीन मजदूरों के बारे में सुनने को मिलता है। इनमें से अधिकतर लोग अछूत वर्ग में समझे जाते थे। खेती करने वाला वर्ग तथा जमींदार न तो चाहते थे कि अछूत नये गाँव बसायें और इस प्रकार जमीन की मिल्कियत हासिल करें और न ही इस बात को प्रोत्साहन देते थे। उनका हित इसी में था कि ये लोग गाँव में अतिरिक्त श्रमिक के तौर पर ही रहें और उनके लिए मृत जानवरों की खाल उतारने तथा चमड़े की रस्सियाँ बनाने जैसे छोटे काम करते रहें। भूमिहीन अथवा गरीब (जिसके पास बहुत कम जमीन थी) लोगों के पास न तो ऐसा संगठन था और न ही इतनी पूँजी थी कि वे अपने बल पर नई जमीन पर खेती कर सकें अथवा नये गाँव बसा सकें, कभी-कभी नयी जमीन पर खेती करने के कार्य में राज्य पहल करता था। लेकिन अछूत इसका पूरा लाभ नहीं उठा सकते थे क्योंकि राज्य को इस काम में स्थानीय जमींदारों तथा गाँव के मुखियों (मुकद्दमों) का सहयोग लेना ही पड़ता था और ये, जैसा कि हम देख चुके हैं, दूसरी जातियों के होते थे और अपने ही वर्ग के हितों के प्रति जागरूक थे। इस प्रकार उत्पादन तो धीरे-धीरे बढ़ा परन्तु शासक वर्ग की आशाएँ तथा उनकी माँगे तेजी से बढ़ती गईं। इस प्रकार मनसबदारों की संख्या 1605 में जहाँगीर के सम्राट बनने के समय में 2069 से बढ़कर शाहजहाँ के शासनकाल में 1637 में 8000 तथा औरंगजेब के शासनकाल के उत्तरार्द्ध में 11,456 हो गई। मनसबदारों की संख्या इस प्रकार पाँच गुनी हो गई लेकिन साम्राज्य की आय इस अनुपात में नहीं बढ़ी। इसके बावजूद शाहजहाँ के शासनकाल में एक भव्य काल की शुरुआत हुई। मुगल मनसबदारों के वेतन विश्व में सबसे ऊँचे थे ही। इस काल में उनकी अमीरी और विलासिता और भी अधिक बढ़ गई। यद्यपि कई मनसबदार वाणिज्य तथा व्यापार में, परोक्ष रूप से अथवा ऐसे व्यापारियों के माध्यम से जो उनके लिए कार्य करते थे, हिस्सा लेते थे फिर भी वाणिज्य तथा व्यापार से होने वाली आय जमीन से होने वाली आय का पूरक मात्र थी। उनकी समस्याएँ और भी बढ़ गई क्योंकि 17वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में कीमतें मोटे तौर पर दुगनी हो गई थीं। इस कारण वे किसानों तथा जमीदारों को चूसकर जमीन से होने वाली आय को ही बढ़ाने में दिलचस्पी रखते थे। हमें जमीदारों की संख्या तथा उनके रहन-सहन के स्तर के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं है। जमीदारों के प्रति मुगल नीतियों में पारस्परिक विरोध था। एक ओर तो यह माना जाता था कि राज्य की आन्तरिक स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा जमींदार ही हैं, दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन को चलाने के लिए बड़े पैमाने पर इनकी नियुक्ति होती थी। इनमें से कईयों - राजपूतों, मराठों तथा अन्य को-मनसब प्रदान किए जाते थे और साम्राज्य के राजनैतिक आधार के विस्तार के लिए राजनीतिक पदों पर इनकी नियुक्ति की जाती थी। इस प्रक्रिया में जमींदारों का वर्ग बहुत शक्तिशाली हो गया था और वह अब मनसबदारों की गैरकानूनी माँगों को मानने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था। न ही किसानों पर लगान का बोझ बढ़ाना आसान था। विशेषकर जबकि उपजाऊ भूमि बड़ी मात्रा में उपलब्ध थी और जमींदारों तथा गाँव के मुखियों में अधिक खेतिहरों को अपने यहाँ काम करने के लिए लाने की होड़ लगी रहती थी। ऐसे किसान जो रोजगार की खोज में एक गाँव से दूसरे गाँव जाते रहते थे। उन्हें पाही अथवा ऊपरी कहा जाता था। मध्ययुगीन ग्रामीण समाज के ये एक प्रमुख अंग थे लेकिन इनके अध्ययन पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि जमींदार जमीन से अधिक से अधिक कमाना चाहते थे और कई बार ऐसे तरीके अपनाते थे जो राज्य द्वारा स्वीकृत नहीं थे। इस कारण मध्ययुगीन ग्रामीण समाज के सभी आन्तरिक संघर्ष उभर कर सामने आ गये। कुछ क्षेत्रों में किसानों के बीच गम्भीर असन्तोष फैला तथा अन्य क्षेत्रों में जमींदारों के नेतृत्व में विद्रोह तक हो गये। कई अवसरों पर इन जमींदारों ने स्वतंत्र क्षेत्रीय राज्य स्थापित करने के प्रयास भी किए। प्रशासनिक स्तर पर भी मनसबदारों के बीच व्यापक असन्तोष तथा भेदभाव फैला और इससे जगीरदारी व्यवस्था में गम्भीर संकट पैदा हो गया। मनसबदारों को अपनी जागीरों से वह आय नहीं प्राप्त हो पाती, जो कागज पर दर्ज थी। फलस्वरूप उनमें से बहुत से अपने हिस्से के सैनिक नहीं रख पाते थे। दकन में विशेष रूप से स्थिति बहुत खराब थी। शांति और मुनासिब सैनिक दल के अभाव से वे धेला भी वसूल नहीं कर पाते थे। स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि इस युग के एक इतिहासकार भीमसेन के अनुसार बहुत से मनसबदारों ने गुप्त रूप से मराठा सरदारों से निजी तौर पर यह तय कर लिया था कि वह उन्हें इस शर्त पर चौथ या अपनी आय का चौथाई हिस्सा दे देंगे यदि वह उनकी जागीरों में कोई गड़बड़ न करें। एक और समस्या जागीरों की कमी थी। बीजापुर और गोलकुण्डा को साम्राज्य में शामिल करने के बाद औरंगजेब ने युद्धों का खर्चा भरने के लिए सबसे अच्छी और सरलता से प्रशासित जागीरों को सीधे राज्य के अधीन अर्थात् ‘‘खालिसा’’ में ले लिया था। राजनीतिक उद्देश्यों के लिए बहुत से पुराने दकनी उमरा और मराठा सरदारों को मनसब और जागीरों भी प्रदान करनी थीं। इसलिए पुराने मनसबदारों के बेटों और उनके दामादों के लिए जागीरों की भारी कमी थी। इतिहासकार खाफी खाँ के शब्दों में स्थिति इतनी गम्भीर थी कि एक अनार सौ बीमार। छोटे स्तर पर जागीरदार तो विशेष रूप से संकट में थे क्योंकि उन्हें क्लर्क और दफ्तर के दूसरे पदाधिकारी बहुत सताते थे और उनसे रिश्वत माँगते थे और यदि वे रिश्वत देने में असमर्थ रहते तो उन्हें गरीब कम आय वाली जागीरों में भेज दिया जाता था। जागीरदारी व्यवस्था में आए संकट का मनसबदारों पर बड़ा दबाव पड़ा। अधिक से अधिक संख्या में जागीरें प्रदान करने और इसके साथ-साथ जागीर की कागज पर दर्ज आय और वसूलयाबी के मध्य अंतर की समस्या को सुलझाने के लिए शाहजहाँ ने मनसबदारों द्वारा रखे जाने वाले घोड़ों और सवारों की संख्या में कटौती कर दी। इन आदेशों को इस तरीके से स्पष्ट किया गया कि तनख्वाह वर्ष में 6 या 5 मास के वेतन के बराबर होगी। लेकिन जागीरों की कमी बनी रही और विशेष रूप से औरंगजेब के शासनकाल के अन्तिम हिस्से में यह कमी अत्यंत गम्भीर हो गई। दकन की विजय से भी समस्या का समाधान नहीं निकला, क्योंकि पुराने दकन राज्यों के अफसरों तथा मराठों को, जो इस क्षेत्र में सक्रिय और प्रभावशाली भी थे, राज्य की सेवा में भर्ती किया जाए। इससे उन मुगल उमरा (खानजादों) में काफी असन्तोष फैला जिन्होंने मुगल सम्राट की सेवा की थी और जिनके बेटे और दामाद सरकारी नौकरी तथा संरक्षण पर निर्भर कर रहे थे जिससे उन्हें अब वंचित किया जा रहा था। मुगलों द्वारा विकसित मनसबदारी व्यवस्था मुगल काल की सबसे प्रमुख विशेषता थी। हम देख चुके हैं कि किस प्रकार बिना जातिभेद के मुगल योग्य व्यक्तियों को अपनी सेवा में आकर्षित करने में सफल हुए थे। इनमें से देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोग थे और कुछ विद्रोही भी थे। व्यक्तिगत आधार पर बने मुगलों के प्रशासनिक ढाँचे के अन्तर्गत मनसबदारों ने बड़ी सफलता से काम किया और देश को काफी हद तक सुरक्षा तथा शांति प्रदान की। मनसबदारों की यह भूमिका सम्राट के प्रति मात्र सेवा-भाव थी और ये अधिकतर अपने ही हितों का ध्यान रखते थे। कुछ इतिहासकारों का यह तर्क गलत है कि मनसबदारों का संगठन औरंगजेब की मृत्यु के बाद इसलिए कमजोर पड़ गया क्योंकि मध्य एशिया से कुशल लोगों का आना रुक गया। वास्तव में औरंगजेब के सिहासनारूढ़ होने तक अधिकतर मुगल मनसबदार ऐसे व्यक्ति थे, जिनका जन्म भारत में हुआ था। ऐसा विश्वास करने का कोई कारण नहीं है कि इनकी योग्यता का हृास भारतीय जलवायु के कारण हुआ। यह तर्क अंग्रेज इतिहासकारों ने जातिभेद के आधार पर इसलिए दिया है जिससे वे ठंडे देशों के लोगों द्वारा भारत के आधिपत्य को उचित ठहरा सकें, लेकिन ये तर्क अब नहीं स्वीकार किए जा सकते। यह भी कहा गया है कि क्योंकि सरदारों का वर्ग ऐसे लोगों का बना था जिसमें कई जातियों के लोग सम्मिलित थे, इसलिए उनमें कोई राष्ट्रीय चेतना नहीं थी और उन्होंने राष्ट्रविरोधी कार्य भी किए। इसके लिए बहुधा यह तर्क दिया जाता है कि मुग़ल उमरा वर्ग का विकास क्योंकि विभिन्न जातियों, वर्गां और समुदायों से हुआ था, अतः उसमें राष्ट्रीय चेतना का अभाव होना स्वाभाविक ही था। लेकिन राष्ट्रीयता की भावना का, उस अर्थ में जिसे हम आज समझते हैं, मध्ययुग में कोई अस्तित्व नहीं था। इसके स्थान पर नमकहलाली की भावना प्रभावशाली थी तथा इसी कारण सरदार मुगल वंश के प्रति वफादार बने रहे और उनमें एक प्रकार से देशभक्ति जीवित रही, जैसा कि हम देख चुके हैं कि विदेश से आने वाले अमीरों का अपने स्वदेश से कोई विशेष सम्पर्क नहीं रहता था और वह वस्तुतः मुगल भारतीय सांस्कृतिक आदर्शों को ही अपना लेता था। मुगलों ने प्रशासनिक व्यवस्था के हर स्तर पर सावधानी से ऐसे तरीके लागू किए जिनसे विभिन्न जाति अथवा धर्म के लोगों के बीच ऐसा सन्तुलन बना रहे ताकि महत्वाकांक्षी अमीरों अथवा उनके दलों पर प्रभावशाली नियन्त्रण रखा जा सके। अमीरों ने स्वाधीन होने की चेष्टा तभी प्रारंभ की जब औरंगजेब के उत्तराधिकारियों की असमर्थता के कारण तथा जागीरदारी व्यवस्था में उत्पन्न संकट के कारण प्रशासनिक व्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर होने लगी। इस प्रकार मुगलों का शीघ्रता से विघटन मुगल प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरी के कारण नहीं बल्कि परिणाम था। यह अवश्य कहा जा सकता है कि मुगल प्रशासन बहुत हद तक केन्द्रित था और इसकी सफलता अंततः बादशाह की योग्यता पर निर्भर करती थी। योग्य शासकों के अभाव में वजीरों ने उसका स्थान लेने की चेष्टा की पर असफल रहे। इस प्रकार इस व्यवस्था के पतन तथा व्यक्तिगत असफलता की एक-दूसरे पर प्रतिक्रिया हुई। राजनीतिक क्षेत्र में औरंगजेब ने कई गम्भीर गलतियाँ कीं। हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं कि किस प्रकार वह मराठों के आन्दोलन के सही स्वरूप को नहीं समझ सका और शिवाजी को मित्र बनाने की जयसिंह की सलाह अनदेखी कर दी। संभाजी की हत्या उसकी एक और बड़ी गलती थी। इसके बाद मराठों का ऐसा कोई प्रभावशाली नेता नहीं बच गया जिससे औरंगजेब बातचीत या समझौता कर सकता। उसे विश्वास था कि बीजापुर और गोलकुण्डा को अपने कब्जे में करने के बाद मराठे उससे दया की भीख माँगेंगे और उसकी शर्तों को स्वीकार करने के अलावा उनके पास और कोई चारा नहीं रह जायेगा। औरंगजेब मराठों के स्वराज्य के क्षेत्र को संकुचित करना और उनसे निष्ठा का वचन चाहता था। जब औरंगजेब ने अपनी गलती महसूस की और मराठों से बातचीत शुरू की तब चौथ तथा सरदेशमुखी की माँग आड़े आ गई। बहुत हद तक इस बाधा को भी दूर किया गया। 1703 में मराठों और औरंगजेब के बीच समझौता करीब-करीब हो ही गया था, लेकिन जैसा कि हम देख चुके हैं कि औरंगजेब शाहू तथा मराठा सरदारों के प्रति अन्त तक अविश्वासी बना रहा। इस तरह औरंगजेब मराठों की समस्या का समाधान ढूँढ़ने में असफल रहा और अन्त तक इसका शिकार बना रहा। उसने कई मराठा सरदारों को मनसब प्रदान किए। यहाँ तक कि उच्चतम स्तर पर राजपूत सरदारों की अपेक्षा मराठा सरदारों के पास अधिक मनसब थे। लेकिन इसके बावजूद मराठा सरदारों पर पूरी तरह विश्वास नहीं किया गया। राजपूतों की तरह उन्हें जिम्मेदारी अथवा विश्वास का कोई पद नहीं सौंपा गया। इस प्रकार मराठे मुगल राजनीतिक व्यवस्था के अभिन्न अंग कभी नहीं बन सके। यदि औरंगजेब शिवाजी, संभाजी या शाहू से भी कोई राजनीतिक समझौता कर लेता तो इससे स्थिति में बहुत बड़ा फर्क पड़ता। मराठों के खिलाफ दकनी राज्यों को संगठित करने की असफलता के लिए औरंगजेब की आलोचना की जाती है। यह भी कहा जाता है, कि उन्हें जीतकर औरंगजेब ने अपने साम्राज्य को इतना बढ़ा लिया था कि यह अपने ही भार के कारण ढह गया। शाहजहाँ के ही काल में 1636 की सन्धि भंग होने के बाद औरंगजेब तथा दकनी राज्यों के बीच गाढ़ी एकता असंभव थी। सम्राट बनने के बाद औरंगजेब दकन में पूर्ण विजय की नीति अपनाने से हिचकिचा रहा था। उसने दकनी राज्यों की विजय का निर्णय जब तक संभव था, टाला। मराठों की बढ़ी शक्ति, गोलकुण्डा में मदन्ना तथा अखन्ना द्वारा शिवाजी को दिए गए समर्थन और इस भय से कि बीजापुर पर शिवाजी तथा गोलकुण्डा (जिस पर मराठों का प्रभाव था) का प्रभुत्व कायम हो जाएगा, औरंगजेब दकन में अभियान चलाने को मजबूर हो गया था। बाद में शहजादा अकबर को पनाह देकर संभाजी ने औरंगजेब को एक प्रकार से बड़ी चुनौती दी थी। औरंगजेब ने शीघ्र ही महसूस किया कि बीजापुर तथा गोलकुण्डा को कब्जे में किये बिना मराठों से टक्कर लेना आसान नहीं है। गोलकुण्डा, बीजापुर तथा कर्नाटक में मुगल प्रशासन के विस्तार से मुगल प्रशासनिक सेवा टूटने लगी थी। मुगलों के सम्पर्क साधन भी मराठों के हमलों के लिए खुले थे। यहाँ तक कि इस क्षेत्र के मुगल सरदारों के लिए अपनी जागीरों से निर्धारित लगान की वसूली भी असंभव हो गई और कई बार उन्हें मराठों के साथ गुप्त सन्धियाँ करनी पड़ीं। इसके परिणामस्वरूप मराठों की शक्ति और प्रतिष्ठा बड़ी और उधर साम्राज्य की प्रतिष्ठा को धक्का पहुँचा। संभवतः औरंगजेब यदि अपने सबसे बड़े लड़के शाह आलम की यह राय मान लेता कि बीजापुर तथा गोलकुण्डा के साथ समझौता किया जाना चाहिए और उनके कुछ ही क्षेत्रों को साम्राज्य में मिलाया जाना चाहिए तो औरंगजेब के लिए बहुत लाभदायक होता। शाह आलम इस पक्ष में भी था कि बहुत दूर होने के कारण कर्नाटक पर प्रभावशाली नियन्त्रण रखना असंभव है इसलिए उसे वहीं के अधिकारियों के हाथों में छोड़ दिया जाना चाहिए। मुगल साम्राज्य के पतन के दकनी तथा अन्य युद्धों और उत्तरी भारत से बहुत समय के लिए औरंगजेब का गैरहाजिर होना भी बहुत महत्वपूर्ण कारण थे। औरंगजेब ने कई गलत नीतियाँ अपनाई थीं और उसमें कई व्यक्तिगत कमजोरियाँ भी थीं जैसे, वह अत्यधिक सन्देही तथा संकीर्ण विचारों का था। लेकिन इसके बावजूद मुगल साम्राजय बहुत शक्तिशाली था तथा उसकी सैनिक और प्रशासनिक व्यवस्था ठोस थी। मुगल सेना दकन के पहाड़ी क्षेत्रों में मराठा छापामारों के हमलों का सामना करने में भले ही असफल रही हो और मराठों के किलों पर मुश्किल से कब्जा कर सकी हो और कब्जा कर लेने के बाद उन्हें अधिक काल तक अपने अधीन रखने में असफल भी रही हो लेकिन इसमें कोई सन्देह नहीं कि उत्तरी भारत के मैदानों तथा कर्नाटक के विस्तृत पठार में मुगल तोपखाना अभी भी सबसे अधिक प्रभावशाली था। औरंगजेब की मृत्यु के चालीस साल बाद भी जब मुगल तोपखाने की शक्ति और क्षमता घट गई, मराठे खुले मैदान में उसका मुकाबला नहीं कर सकते थे। लम्बे समय तक अराजकता, युद्ध तथा मराठों के हमले से दकन की आबादी भले ही कम हुई हो और वहाँ का व्यापार, उद्योग तथा कृषि आदि की उन्नति में अवश्य ही व्यवधान पैदा हो गया था, परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि साम्राज्य के मुख्य भाग उत्तर भारत में, जो अर्थिक और राजनैतिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण था मुगल प्रशासन अत्यंन्त प्रभावशाली बना हुआ था। यहाँ तक कि जिलों के स्तर पर मुगल प्रशासन इतना उपयोगी सिद्ध हुआ कि इनके कई तत्व ब्रिटिश प्रशासन में सम्मिलित किए गए। सैनिक पराजयों और औरंगजेब की गलतियों के बावजूद राजनीतिक तौर पर लोगों के दिलो-दिमाग पर मुगल वंश का प्रभाव छाया रहा। जहाँ तक राजपूतों का सवाल है हम देख चुके हैं कि मारवाड़ का संघर्ष इसलिए आरंभ नहीं हुआ था कि औरंगजेब ने हिन्दुओं की स्थिति क्षीण करने के लिये इस बात का प्रयास किया कि हिन्दुओं का कोई प्रभावशाली नेता न रहे बल्कि इसलिए कि नासमझी के कारण उसने दो मुख्य प्रतिद्वन्दियों के बीच मारवाड़ के राज्य को विभाजित कर दोनों की दुश्मनी मोल ले ली। उसके इस कार्य से मारवाड़ के अतिरिक्त मेवाड़ का शासक उससे क्षुब्ध हो गया क्योंकि वह मुगल हस्तक्षेप को बहुत बड़ा खतरा समझता था। इसके बाद मारवाड़ तथा मेवाड़ के साथ जो लम्बा संघर्ष चला उससे मुगल साम्राज्य की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का पहुँचा यद्यपि यह बात अलग है कि 1681 के बाद इस संघर्ष का कोई विशेष सामरिक महत्व नहीं रहा। इस बात में सन्देह है कि 1681 तथा 1706 के बीच यदि दकन में अधिक संख्या में राठौर राजपूत नियुक्त किये जाते तो मराठों से होने वाले संघर्ष में कोई विशेष अंतर पड़ता। जो भी हो, पहले की तरह राजपूत अधिक मनसब और वतन जागीर की वापसी की माँग करते रहे। इन माँगों को औरंगजेब की मृत्यु के 6 साल के अन्दर अंदर स्वीकार कर लिया गया और इसके साथ ही मुगल साम्राज्य के लिए राजपूतों की समस्या समाप्त हो गई। इस काल के पश्चात से साम्राज्य के विघटन में उन्होंने न तो कोई भूमिका निभाई और न ही वे उसके पतन की प्रक्रिया को रोक सके। औरंगजेब की धार्मिक नीति की समीक्षा तात्कालिक सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में की जानी चाहिए। औरंगजेब स्वभाव से बड़ा कट्टर था और इस्लाम के कानून के अंतर्गत ही काम करना चाहता था। लेकिन इस कानून का विकास भारत के बाहर बिल्कुल विभिन्न परिस्थितियों में हुआ था और यह आशा नहीं की जा सकती थी यह भारत में भी कारगर सिद्ध होगा। औरंगजेब ने कई अवसरों पर अपनी गैर-मुसलमान प्रजा की भावनाओं को समझने से इन्कार कर दिया। मन्दिरों के प्रति अपनाई गई उसकी नीति और इस्लाम के कानून के आधार पर जजिया को दुबारा लागू करके न तो वह मुसलामानों को अपने पक्ष में कर सका और न ही इस्लामी कानूनों पर आधारित राज्य के प्रति उनकी निष्ठा प्राप्त कर सका। दूसरी ओर इस नीति के कारण हिन्दू भी उसके विरुद्ध हो गये और ऐसे वर्गों के हाथ मजबूत हो गये जो राजनीतिक तथा अन्य कारणों से मुगल साम्राज्य के विरोधी थे। वास्तव में इस सारी प्रक्रिया में धर्म अपने आप में इतना महत्वपूर्ण नहीं था। यह तथ्य औरंगजेब की मृत्यु के बाद के काल से पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है। औरंगजेब की मृत्यु के 6 वर्षों के अन्दर जजिया को समाप्त कर दिया गया तथा नये मन्दिरों के निर्माण पर लगी पाबंदी को उठा लिया गया लेकिन इससे भी साम्राज्य के पतन और विघटन की प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ा। अंत में हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि मुगल साम्राज्य का पतन और विघटन आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा संगठनात्मक कारणों से हुआ। अकबर की नीतियों से विघटन के तत्वों पर कुछ समय तक प्रभावशाली नियन्त्रण रखा जा सका। लेकिन सामाजिक व्यवस्था में कोई मूलभूत परिवर्तन करना उसके भी बस के बाहर की बात थी। औरंगजेब ने सिंहासन संभालने के समय तक विघटन की सामाजिक और आर्थिक शक्तियाँ उभर कर और शक्तिशाली हो गई थीं। इस व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन करने के लिए न तो औरंगजेब में राजनीतिक योग्यता और न ही दूरदर्शिता थी। वह ऐसी नीतियों के पालन में भी असमर्थ रहा जिनसे परस्पर विरोधी तत्वों पर कुछ समय के लिए रोक लगाई जा सकती। इस प्रकार औरंगजेब न केवल परिस्थितियों का शिकार था बल्कि उसने स्वयं ऐसी परिस्थितियों के निर्माण में योग दिया जिनका अन्ततः वह स्वयं शिकार बना। औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य का तेजी से पतन होने लगा। मुगल दरबार उमरा के बीच आपसी झगड़ों और षड़यन्त्रों का अड्डा बन गया और शीघ्र ही महत्वाकांक्षी तथा प्रान्तीय शासक स्वाधीन रूप में कार्य करने लगे। मराठों के हमले दकन से फैलकर साम्राज्य के मुख्य भाग, गंगा घाटी तक पहुँच गए। साम्राज्य की कमजोरी उस समय विश्व के सामने स्पष्ट हो गई जब 1739 में नादिरशाह ने मुगल साम्राट को बन्दी बना लिया तथा दिल्ली को खुले आम लूटा। प्रश्न उठता है कि मुगल साम्राज्य के पतन के लिए औरंगजे़ब की मृत्यु के बाद की घटनाएँ किस हद तक जिम्मेदार थीं और किस हद तक औरंगजेब की गलत नीतियाँ ? इस बात को लेकर इतिहासकारों में काफी मतभेद रहा है हालाँकि औरंगजेब को इसके लिए जिम्मेदार होने से पूर्णतया मुक्त नहीं किया जा सकता, अधिकतर आधुनिक इतिहासकार औरंगजेब के शासनकाल को देश की तात्कालिक आर्थिक, सामाजिक, प्रशासनिक तथा बौद्धिक स्थिति और उसके शासनकाल के पहले और उसके दौरान की अन्तराष्ट्रीय गतिविधियों के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। मध्ययुगीन भारत की आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति का पूरा मूल्याँकन किया जाना अभी बाकी है। पहले के अध्याय में हम देख चुके हैं कि 17वीं शताब्दी के दौरान भारत में वाणिज्य तथा व्यापार का बहुत विकास हुआ तथा हस्तकला के माध्यम से निर्मित वस्तुओं का उत्पादन इनके अनुकूल था। यह उसी समय संभव था जब कपास तथा नील जैसे कच्चे माल का भी उत्पादन साथ-साथ बढ़ता रहा हो। इस काल में मुगल सरकारी आंकड़ों के अनुसार उस क्षेत्र का विकास हुआ था जहाँ ‘जब्ती’’ अर्थात् जमीन की पैमाइश के आधार पर लगान का तरीका प्रचलित था। इस बात के भी कुछ सबूत मिलते हैं कि कृषि योग्य भूमि का भी विस्तार हुआ। यह आर्थिक परिस्थितियों के अलावा मुगलों की प्रशासनिक नीतियों के कारण ही संभव हुआ। हर मनसबदार तथा ऐसे धार्मिक नेता जिसे भूमि अनुदान में मिलती थी, से आशा की जाती थी कि वह कृषि के विस्तार और विकास में व्यक्तिगत रुचि लेगा। कृषि सम्बन्धित दस्तावेजों को सावधानी से रखा जाता था। इतिहासकारों को इन विस्तृत ब्यौरों को देखकर आश्चर्य होता है। इनमें हर गाँव के न केवल हलों, बैलों तथा कुँओं की संख्या दी गई है बल्कि किसानों की संख्या भी दर्ज की गई है। इसके बावजूद ऐसा विश्वास करने के कारण भी हैं कि वाणिज्य तथा व्यापार और कृषि उत्पादन उतनी तेजी से नहीं बढ़ रहा था, जितना की स्थिति और आवश्यकता के अनुसार बढ़ना चाहिए था। इसके कई कारण थे। मिट्टी की घटती हुई उपजाऊ शक्ति का सामना करने के लिए कृषि के नये उपायों के बारे में लोगों को कोई जानकारी नहीं थी। लगान की दर बहुत ऊँची थी। अकबर के समय से, यदि हम जमींदारों तथा अन्य स्थानीय अधिकारियों के हिस्से को शामिल करें तब यह कुल उत्पादन का करीब-करीब आधा हिस्सा होती थी। यद्यपि राज्य का हिस्सा अलग-अलग क्षेत्रों के अनुसार अलग-अलग था, अर्थात् राजस्थान तथा सिन्ध जैसे कम उपजाऊ राज्यों में कम तथा कश्मीर में केसर उत्पादन करने वाले उपजाऊ क्षेत्रों में अधिक था, आमतौर पर लगान इतना अधिक नहीं था कि इसके कारण किसान खेती छोड़ दें। वास्तव में पूर्वी राजस्थान के आंकड़ों से पता चलता है कि 17वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तथा अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ में नये गाँव बराबर बसते गये (इससे पहले की अवधि के आंकड़े हमें प्राप्त नहीं हैं)। ऐसा लगता है कि सामाजिक तथा कुछ हद तक प्रशासनिक कारणों से कृषि का उतना अधिक विकास नहीं हो पाया। अनुमान लगाया जाता है, कि इस काल में देश की आबादी साढे बारह करोड़ थी। इसका अर्थ यह हुआ कि कृषि भूमि बहुत बड़ी मात्रा में उपलब्ध थी। लेकिन इसके बावजूद हमें कई गाँवों में भूमिहीन मजदूरों के बारे में सुनने को मिलता है। इनमें से अधिकतर लोग अछूत वर्ग में समझे जाते थे। खेती करने वाला वर्ग तथा जमींदार न तो चाहते थे कि अछूत नये गाँव बसायें और इस प्रकार जमीन की मिल्कियत हासिल करें और न ही इस बात को प्रोत्साहन देते थे। उनका हित इसी में था कि ये लोग गाँव में अतिरिक्त श्रमिक के तौर पर ही रहें और उनके लिए मृत जानवरों की खाल उतारने तथा चमड़े की रस्सियाँ बनाने जैसे छोटे काम करते रहें। भूमिहीन अथवा गरीब (जिसके पास बहुत कम जमीन थी) लोगों के पास न तो ऐसा संगठन था और न ही इतनी पूँजी थी कि वे अपने बल पर नई जमीन पर खेती कर सकें अथवा नये गाँव बसा सकें, कभी-कभी नयी जमीन पर खेती करने के कार्य में राज्य पहल करता था। लेकिन अछूत इसका पूरा लाभ नहीं उठा सकते थे क्योंकि राज्य को इस काम में स्थानीय जमींदारों तथा गाँव के मुखियों (मुकद्दमों) का सहयोग लेना ही पड़ता था और ये, जैसा कि हम देख चुके हैं, दूसरी जातियों के होते थे और अपने ही वर्ग के हितों के प्रति जागरूक थे। इस प्रकार उत्पादन तो धीरे-धीरे बढ़ा परन्तु शासक वर्ग की आशाएँ तथा उनकी माँगे तेजी से बढ़ती गईं। इस प्रकार मनसबदारों की संख्या 1605 में जहाँगीर के सम्राट बनने के समय में 2069 से बढ़कर शाहजहाँ के शासनकाल में 1637 में 8000 तथा औरंगजेब के शासनकाल के उत्तरार्द्ध में 11,456 हो गई। मनसबदारों की संख्या इस प्रकार पाँच गुनी हो गई लेकिन साम्राज्य की आय इस अनुपात में नहीं बढ़ी। इसके बावजूद शाहजहाँ के शासनकाल में एक भव्य काल की शुरुआत हुई। मुगल मनसबदारों के वेतन विश्व में सबसे ऊँचे थे ही। इस काल में उनकी अमीरी और विलासिता और भी अधिक बढ़ गई। यद्यपि कई मनसबदार वाणिज्य तथा व्यापार में, परोक्ष रूप से अथवा ऐसे व्यापारियों के माध्यम से जो उनके लिए कार्य करते थे, हिस्सा लेते थे फिर भी वाणिज्य तथा व्यापार से होने वाली आय जमीन से होने वाली आय का पूरक मात्र थी। उनकी समस्याएँ और भी बढ़ गई क्योंकि 17वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में कीमतें मोटे तौर पर दुगनी हो गई थीं। इस कारण वे किसानों तथा जमीदारों को चूसकर जमीन से होने वाली आय को ही बढ़ाने में दिलचस्पी रखते थे। हमें जमीदारों की संख्या तथा उनके रहन-सहन के स्तर के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं है। जमीदारों के प्रति मुगल नीतियों में पारस्परिक विरोध था। एक ओर तो यह माना जाता था कि राज्य की आन्तरिक स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा जमींदार ही हैं, दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन को चलाने के लिए बड़े पैमाने पर इनकी नियुक्ति होती थी। इनमें से कईयों - राजपूतों, मराठों तथा अन्य को-मनसब प्रदान किए जाते थे और साम्राज्य के राजनैतिक आधार के विस्तार के लिए राजनीतिक पदों पर इनकी नियुक्ति की जाती थी। इस प्रक्रिया में जमींदारों का वर्ग बहुत शक्तिशाली हो गया था और वह अब मनसबदारों की गैरकानूनी माँगों को मानने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था। न ही किसानों पर लगान का बोझ बढ़ाना आसान था। विशेषकर जबकि उपजाऊ भूमि बड़ी मात्रा में उपलब्ध थी और जमींदारों तथा गाँव के मुखियों में अधिक खेतिहरों को अपने यहाँ काम करने के लिए लाने की होड़ लगी रहती थी। ऐसे किसान जो रोजगार की खोज में एक गाँव से दूसरे गाँव जाते रहते थे। उन्हें पाही अथवा ऊपरी कहा जाता था। मध्ययुगीन ग्रामीण समाज के ये एक प्रमुख अंग थे लेकिन इनके अध्ययन पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि जमींदार जमीन से अधिक से अधिक कमाना चाहते थे और कई बार ऐसे तरीके अपनाते थे जो राज्य द्वारा स्वीकृत नहीं थे। इस कारण मध्ययुगीन ग्रामीण समाज के सभी आन्तरिक संघर्ष उभर कर सामने आ गये। कुछ क्षेत्रों में किसानों के बीच गम्भीर असन्तोष फैला तथा अन्य क्षेत्रों में जमींदारों के नेतृत्व में विद्रोह तक हो गये। कई अवसरों पर इन जमींदारों ने स्वतंत्र क्षेत्रीय राज्य स्थापित करने के प्रयास भी किए। प्रशासनिक स्तर पर भी मनसबदारों के बीच व्यापक असन्तोष तथा भेदभाव फैला और इससे जगीरदारी व्यवस्था में गम्भीर संकट पैदा हो गया। मनसबदारों को अपनी जागीरों से वह आय नहीं प्राप्त हो पाती, जो कागज पर दर्ज थी। फलस्वरूप उनमें से बहुत से अपने हिस्से के सैनिक नहीं रख पाते थे। दकन में विशेष रूप से स्थिति बहुत खराब थी। शांति और मुनासिब सैनिक दल के अभाव से वे धेला भी वसूल नहीं कर पाते थे। स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि इस युग के एक इतिहासकार भीमसेन के अनुसार बहुत से मनसबदारों ने गुप्त रूप से मराठा सरदारों से निजी तौर पर यह तय कर लिया था कि वह उन्हें इस शर्त पर चौथ या अपनी आय का चौथाई हिस्सा दे देंगे यदि वह उनकी जागीरों में कोई गड़बड़ न करें। एक और समस्या जागीरों की कमी थी। बीजापुर और गोलकुण्डा को साम्राज्य में शामिल करने के बाद औरंगजेब ने युद्धों का खर्चा भरने के लिए सबसे अच्छी और सरलता से प्रशासित जागीरों को सीधे राज्य के अधीन अर्थात् ‘‘खालिसा’’ में ले लिया था। राजनीतिक उद्देश्यों के लिए बहुत से पुराने दकनी उमरा और मराठा सरदारों को मनसब और जागीरों भी प्रदान करनी थीं। इसलिए पुराने मनसबदारों के बेटों और उनके दामादों के लिए जागीरों की भारी कमी थी। इतिहासकार खाफी खाँ के शब्दों में स्थिति इतनी गम्भीर थी कि एक अनार सौ बीमार। छोटे स्तर पर जागीरदार तो विशेष रूप से संकट में थे क्योंकि उन्हें क्लर्क और दफ्तर के दूसरे पदाधिकारी बहुत सताते थे और उनसे रिश्वत माँगते थे और यदि वे रिश्वत देने में असमर्थ रहते तो उन्हें गरीब कम आय वाली जागीरों में भेज दिया जाता था। जागीरदारी व्यवस्था में आए संकट का मनसबदारों पर बड़ा दबाव पड़ा। अधिक से अधिक संख्या में जागीरें प्रदान करने और इसके साथ-साथ जागीर की कागज पर दर्ज आय और वसूलयाबी के मध्य अंतर की समस्या को सुलझाने के लिए शाहजहाँ ने मनसबदारों द्वारा रखे जाने वाले घोड़ों और सवारों की संख्या में कटौती कर दी। इन आदेशों को इस तरीके से स्पष्ट किया गया कि तनख्वाह वर्ष में 6 या 5 मास के वेतन के बराबर होगी। लेकिन जागीरों की कमी बनी रही और विशेष रूप से औरंगजेब के शासनकाल के अन्तिम हिस्से में यह कमी अत्यंत गम्भीर हो गई। दकन की विजय से भी समस्या का समाधान नहीं निकला, क्योंकि पुराने दकन राज्यों के अफसरों तथा मराठों को, जो इस क्षेत्र में सक्रिय और प्रभावशाली भी थे, राज्य की सेवा में भर्ती किया जाए। इससे उन मुगल उमरा (खानजादों) में काफी असन्तोष फैला जिन्होंने मुगल सम्राट की सेवा की थी और जिनके बेटे और दामाद सरकारी नौकरी तथा संरक्षण पर निर्भर कर रहे थे जिससे उन्हें अब वंचित किया जा रहा था। मुगलों द्वारा विकसित मनसबदारी व्यवस्था मुगल काल की सबसे प्रमुख विशेषता थी। हम देख चुके हैं कि किस प्रकार बिना जातिभेद के मुगल योग्य व्यक्तियों को अपनी सेवा में आकर्षित करने में सफल हुए थे। इनमें से देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोग थे और कुछ विद्रोही भी थे। व्यक्तिगत आधार पर बने मुगलों के प्रशासनिक ढाँचे के अन्तर्गत मनसबदारों ने बड़ी सफलता से काम किया और देश को काफी हद तक सुरक्षा तथा शांति प्रदान की। मनसबदारों की यह भूमिका सम्राट के प्रति मात्र सेवा-भाव थी और ये अधिकतर अपने ही हितों का ध्यान रखते थे। कुछ इतिहासकारों का यह तर्क गलत है कि मनसबदारों का संगठन औरंगजेब की मृत्यु के बाद इसलिए कमजोर पड़ गया क्योंकि मध्य एशिया से कुशल लोगों का आना रुक गया। वास्तव में औरंगजेब के सिहासनारूढ़ होने तक अधिकतर मुगल मनसबदार ऐसे व्यक्ति थे, जिनका जन्म भारत में हुआ था। ऐसा विश्वास करने का कोई कारण नहीं है कि इनकी योग्यता का हृास भारतीय जलवायु के कारण हुआ। यह तर्क अंग्रेज इतिहासकारों ने जातिभेद के आधार पर इसलिए दिया है जिससे वे ठंडे देशों के लोगों द्वारा भारत के आधिपत्य को उचित ठहरा सकें, लेकिन ये तर्क अब नहीं स्वीकार किए जा सकते। यह भी कहा गया है कि क्योंकि सरदारों का वर्ग ऐसे लोगों का बना था जिसमें कई जातियों के लोग सम्मिलित थे, इसलिए उनमें कोई राष्ट्रीय चेतना नहीं थी और उन्होंने राष्ट्रविरोधी कार्य भी किए। इसके लिए बहुधा यह तर्क दिया जाता है कि मुग़ल उमरा वर्ग का विकास क्योंकि विभिन्न जातियों, वर्गां और समुदायों से हुआ था, अतः उसमें राष्ट्रीय चेतना का अभाव होना स्वाभाविक ही था। लेकिन राष्ट्रीयता की भावना का, उस अर्थ में जिसे हम आज समझते हैं, मध्ययुग में कोई अस्तित्व नहीं था। इसके स्थान पर नमकहलाली की भावना प्रभावशाली थी तथा इसी कारण सरदार मुगल वंश के प्रति वफादार बने रहे और उनमें एक प्रकार से देशभक्ति जीवित रही, जैसा कि हम देख चुके हैं कि विदेश से आने वाले अमीरों का अपने स्वदेश से कोई विशेष सम्पर्क नहीं रहता था और वह वस्तुतः मुगल भारतीय सांस्कृतिक आदर्शों को ही अपना लेता था। मुगलों ने प्रशासनिक व्यवस्था के हर स्तर पर सावधानी से ऐसे तरीके लागू किए जिनसे विभिन्न जाति अथवा धर्म के लोगों के बीच ऐसा सन्तुलन बना रहे ताकि महत्वाकांक्षी अमीरों अथवा उनके दलों पर प्रभावशाली नियन्त्रण रखा जा सके। अमीरों ने स्वाधीन होने की चेष्टा तभी प्रारंभ की जब औरंगजेब के उत्तराधिकारियों की असमर्थता के कारण तथा जागीरदारी व्यवस्था में उत्पन्न संकट के कारण प्रशासनिक व्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर होने लगी। इस प्रकार मुगलों का शीघ्रता से विघटन मुगल प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरी के कारण नहीं बल्कि परिणाम था। यह अवश्य कहा जा सकता है कि मुगल प्रशासन बहुत हद तक केन्द्रित था और इसकी सफलता अंततः बादशाह की योग्यता पर निर्भर करती थी। योग्य शासकों के अभाव में वजीरों ने उसका स्थान लेने की चेष्टा की पर असफल रहे। इस प्रकार इस व्यवस्था के पतन तथा व्यक्तिगत असफलता की एक-दूसरे पर प्रतिक्रिया हुई। राजनीतिक क्षेत्र में औरंगजेब ने कई गम्भीर गलतियाँ कीं। हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं कि किस प्रकार वह मराठों के आन्दोलन के सही स्वरूप को नहीं समझ सका और शिवाजी को मित्र बनाने की जयसिंह की सलाह अनदेखी कर दी। संभाजी की हत्या उसकी एक और बड़ी गलती थी। इसके बाद मराठों का ऐसा कोई प्रभावशाली नेता नहीं बच गया जिससे औरंगजेब बातचीत या समझौता कर सकता। उसे विश्वास था कि बीजापुर और गोलकुण्डा को अपने कब्जे में करने के बाद मराठे उससे दया की भीख माँगेंगे और उसकी शर्तों को स्वीकार करने के अलावा उनके पास और कोई चारा नहीं रह जायेगा। औरंगजेब मराठों के स्वराज्य के क्षेत्र को संकुचित करना और उनसे निष्ठा का वचन चाहता था। जब औरंगजेब ने अपनी गलती महसूस की और मराठों से बातचीत शुरू की तब चौथ तथा सरदेशमुखी की माँग आड़े आ गई। बहुत हद तक इस बाधा को भी दूर किया गया। 1703 में मराठों और औरंगजेब के बीच समझौता करीब-करीब हो ही गया था, लेकिन जैसा कि हम देख चुके हैं कि औरंगजेब शाहू तथा मराठा सरदारों के प्रति अन्त तक अविश्वासी बना रहा। इस तरह औरंगजेब मराठों की समस्या का समाधान ढूँढ़ने में असफल रहा और अन्त तक इसका शिकार बना रहा। उसने कई मराठा सरदारों को मनसब प्रदान किए। यहाँ तक कि उच्चतम स्तर पर राजपूत सरदारों की अपेक्षा मराठा सरदारों के पास अधिक मनसब थे। लेकिन इसके बावजूद मराठा सरदारों पर पूरी तरह विश्वास नहीं किया गया। राजपूतों की तरह उन्हें जिम्मेदारी अथवा विश्वास का कोई पद नहीं सौंपा गया। इस प्रकार मराठे मुगल राजनीतिक व्यवस्था के अभिन्न अंग कभी नहीं बन सके। यदि औरंगजेब शिवाजी, संभाजी या शाहू से भी कोई राजनीतिक समझौता कर लेता तो इससे स्थिति में बहुत बड़ा फर्क पड़ता। मराठों के खिलाफ दकनी राज्यों को संगठित करने की असफलता के लिए औरंगजेब की आलोचना की जाती है। यह भी कहा जाता है, कि उन्हें जीतकर औरंगजेब ने अपने साम्राज्य को इतना बढ़ा लिया था कि यह अपने ही भार के कारण ढह गया। शाहजहाँ के ही काल में 1636 की सन्धि भंग होने के बाद औरंगजेब तथा दकनी राज्यों के बीच गाढ़ी एकता असंभव थी। सम्राट बनने के बाद औरंगजेब दकन में पूर्ण विजय की नीति अपनाने से हिचकिचा रहा था। उसने दकनी राज्यों की विजय का निर्णय जब तक संभव था, टाला। मराठों की बढ़ी शक्ति, गोलकुण्डा में मदन्ना तथा अखन्ना द्वारा शिवाजी को दिए गए समर्थन और इस भय से कि बीजापुर पर शिवाजी तथा गोलकुण्डा (जिस पर मराठों का प्रभाव था) का प्रभुत्व कायम हो जाएगा, औरंगजेब दकन में अभियान चलाने को मजबूर हो गया था। बाद में शहजादा अकबर को पनाह देकर संभाजी ने औरंगजेब को एक प्रकार से बड़ी चुनौती दी थी। औरंगजेब ने शीघ्र ही महसूस किया कि बीजापुर तथा गोलकुण्डा को कब्जे में किये बिना मराठों से टक्कर लेना आसान नहीं है। गोलकुण्डा, बीजापुर तथा कर्नाटक में मुगल प्रशासन के विस्तार से मुगल प्रशासनिक सेवा टूटने लगी थी। मुगलों के सम्पर्क साधन भी मराठों के हमलों के लिए खुले थे। यहाँ तक कि इस क्षेत्र के मुगल सरदारों के लिए अपनी जागीरों से निर्धारित लगान की वसूली भी असंभव हो गई और कई बार उन्हें मराठों के साथ गुप्त सन्धियाँ करनी पड़ीं। इसके परिणामस्वरूप मराठों की शक्ति और प्रतिष्ठा बड़ी और उधर साम्राज्य की प्रतिष्ठा को धक्का पहुँचा। संभवतः औरंगजेब यदि अपने सबसे बड़े लड़के शाह आलम की यह राय मान लेता कि बीजापुर तथा गोलकुण्डा के साथ समझौता किया जाना चाहिए और उनके कुछ ही क्षेत्रों को साम्राज्य में मिलाया जाना चाहिए तो औरंगजेब के लिए बहुत लाभदायक होता। शाह आलम इस पक्ष में भी था कि बहुत दूर होने के कारण कर्नाटक पर प्रभावशाली नियन्त्रण रखना असंभव है इसलिए उसे वहीं के अधिकारियों के हाथों में छोड़ दिया जाना चाहिए। मुगल साम्राज्य के पतन के दकनी तथा अन्य युद्धों और उत्तरी भारत से बहुत समय के लिए औरंगजेब का गैरहाजिर होना भी बहुत महत्वपूर्ण कारण थे। औरंगजेब ने कई गलत नीतियाँ अपनाई थीं और उसमें कई व्यक्तिगत कमजोरियाँ भी थीं जैसे, वह अत्यधिक सन्देही तथा संकीर्ण विचारों का था। लेकिन इसके बावजूद मुगल साम्राजय बहुत शक्तिशाली था तथा उसकी सैनिक और प्रशासनिक व्यवस्था ठोस थी। मुगल सेना दकन के पहाड़ी क्षेत्रों में मराठा छापामारों के हमलों का सामना करने में भले ही असफल रही हो और मराठों के किलों पर मुश्किल से कब्जा कर सकी हो और कब्जा कर लेने के बाद उन्हें अधिक काल तक अपने अधीन रखने में असफल भी रही हो लेकिन इसमें कोई सन्देह नहीं कि उत्तरी भारत के मैदानों तथा कर्नाटक के विस्तृत पठार में मुगल तोपखाना अभी भी सबसे अधिक प्रभावशाली था। औरंगजेब की मृत्यु के चालीस साल बाद भी जब मुगल तोपखाने की शक्ति और क्षमता घट गई, मराठे खुले मैदान में उसका मुकाबला नहीं कर सकते थे। लम्बे समय तक अराजकता, युद्ध तथा मराठों के हमले से दकन की आबादी भले ही कम हुई हो और वहाँ का व्यापार, उद्योग तथा कृषि आदि की उन्नति में अवश्य ही व्यवधान पैदा हो गया था, परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि साम्राज्य के मुख्य भाग उत्तर भारत में, जो अर्थिक और राजनैतिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण था मुगल प्रशासन अत्यंन्त प्रभावशाली बना हुआ था। यहाँ तक कि जिलों के स्तर पर मुगल प्रशासन इतना उपयोगी सिद्ध हुआ कि इनके कई तत्व ब्रिटिश प्रशासन में सम्मिलित किए गए। सैनिक पराजयों और औरंगजेब की गलतियों के बावजूद राजनीतिक तौर पर लोगों के दिलो-दिमाग पर मुगल वंश का प्रभाव छाया रहा। जहाँ तक राजपूतों का सवाल है हम देख चुके हैं कि मारवाड़ का संघर्ष इसलिए आरंभ नहीं हुआ था कि औरंगजेब ने हिन्दुओं की स्थिति क्षीण करने के लिये इस बात का प्रयास किया कि हिन्दुओं का कोई प्रभावशाली नेता न रहे बल्कि इसलिए कि नासमझी के कारण उसने दो मुख्य प्रतिद्वन्दियों के बीच मारवाड़ के राज्य को विभाजित कर दोनों की दुश्मनी मोल ले ली। उसके इस कार्य से मारवाड़ के अतिरिक्त मेवाड़ का शासक उससे क्षुब्ध हो गया क्योंकि वह मुगल हस्तक्षेप को बहुत बड़ा खतरा समझता था। इसके बाद मारवाड़ तथा मेवाड़ के साथ जो लम्बा संघर्ष चला उससे मुगल साम्राज्य की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का पहुँचा यद्यपि यह बात अलग है कि 1681 के बाद इस संघर्ष का कोई विशेष सामरिक महत्व नहीं रहा। इस बात में सन्देह है कि 1681 तथा 1706 के बीच यदि दकन में अधिक संख्या में राठौर राजपूत नियुक्त किये जाते तो मराठों से होने वाले संघर्ष में कोई विशेष अंतर पड़ता। जो भी हो, पहले की तरह राजपूत अधिक मनसब और वतन जागीर की वापसी की माँग करते रहे। इन माँगों को औरंगजेब की मृत्यु के 6 साल के अन्दर अंदर स्वीकार कर लिया गया और इसके साथ ही मुगल साम्राज्य के लिए राजपूतों की समस्या समाप्त हो गई। इस काल के पश्चात से साम्राज्य के विघटन में उन्होंने न तो कोई भूमिका निभाई और न ही वे उसके पतन की प्रक्रिया को रोक सके। औरंगजेब की धार्मिक नीति की समीक्षा तात्कालिक सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में की जानी चाहिए। औरंगजेब स्वभाव से बड़ा कट्टर था और इस्लाम के कानून के अंतर्गत ही काम करना चाहता था। लेकिन इस कानून का विकास भारत के बाहर बिल्कुल विभिन्न परिस्थितियों में हुआ था और यह आशा नहीं की जा सकती थी यह भारत में भी कारगर सिद्ध होगा। औरंगजेब ने कई अवसरों पर अपनी गैर-मुसलमान प्रजा की भावनाओं को समझने से इन्कार कर दिया। मन्दिरों के प्रति अपनाई गई उसकी नीति और इस्लाम के कानून के आधार पर जजिया को दुबारा लागू करके न तो वह मुसलामानों को अपने पक्ष में कर सका और न ही इस्लामी कानूनों पर आधारित राज्य के प्रति उनकी निष्ठा प्राप्त कर सका। दूसरी ओर इस नीति के कारण हिन्दू भी उसके विरुद्ध हो गये और ऐसे वर्गों के हाथ मजबूत हो गये जो राजनीतिक तथा अन्य कारणों से मुगल साम्राज्य के विरोधी थे। वास्तव में इस सारी प्रक्रिया में धर्म अपने आप में इतना महत्वपूर्ण नहीं था। यह तथ्य औरंगजेब की मृत्यु के बाद के काल से पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है। औरंगजेब की मृत्यु के 6 वर्षों के अन्दर जजिया को समाप्त कर दिया गया तथा नये मन्दिरों के निर्माण पर लगी पाबंदी को उठा लिया गया लेकिन इससे भी साम्राज्य के पतन और विघटन की प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ा। अंत में हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि मुगल साम्राज्य का पतन और विघटन आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा संगठनात्मक कारणों से हुआ। अकबर की नीतियों से विघटन के तत्वों पर कुछ समय तक प्रभावशाली नियन्त्रण रखा जा सका। लेकिन सामाजिक व्यवस्था में कोई मूलभूत परिवर्तन करना उसके भी बस के बाहर की बात थी। औरंगजेब ने सिंहासन संभालने के समय तक विघटन की सामाजिक और आर्थिक शक्तियाँ उभर कर और शक्तिशाली हो गई थीं। इस व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन करने के लिए न तो औरंगजेब में राजनीतिक योग्यता और न ही दूरदर्शिता थी। वह ऐसी नीतियों के पालन में भी असमर्थ रहा जिनसे परस्पर विरोधी तत्वों पर कुछ समय के लिए रोक लगाई जा सकती। इस प्रकार औरंगजेब न केवल परिस्थितियों का शिकार था बल्कि उसने स्वयं ऐसी परिस्थितियों के निर्माण में योग दिया जिनका अन्ततः वह स्वयं शिकार बना। | |||||||||
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