सत्यमेव जयते gideonhistory.com
द्वितीय विश्‍व युद्ध के विश्‍व का राजनीतिक परिदृश्‍य
  प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद 45 वर्षों के दौरान संसार में नाटकीय परिवर्तन हुए हैं। विश्व की राजनीतिक शक्ल का पूरी तरह रूपांतरण हो गया है। इस युग ने विश्व में साम्राज्यवादी प्रभुत्व को पूरी तरह विघटित होते हुए देखा है। इसी के साथ यूरोप का वर्चस्व भी ढह गया है। 1945 में पचास देशों ने मिलकर संयुक्त राष्ट्र संघ (यूनाइटेड नेशंस) की स्थापना की थी। मार्च 1990 में स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में नामीबिया के उदय से संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्यों की संख्या बढ़ कर 160 हो गई। इनमें से अधिकांश नए सदस्य देश या तो एशिया महाद्वीप अथवा अफ्रीका के हैं, जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अपनी आजादी हासिल की है।
   जर्मनी, जापान और इटली की पराजय के तत्काल बाद ब्रिटेन और फ्रांस के साम्राज्य उनके हाथ से बाहर निकल गए। इसके बाद विश्व में सबसे बड़ी शतिक्यों के रूप में संयुक्त राज्य अमरीका तथा सोवियत संघ (यू. एस. एस. आर.) उभरकर सामने आए। विश्व की गतिविधियों में इन दोनों देशों की भूमिका काफी प्रभावशाली थी और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जो दो शक्ति गुट कायम हुए, उनके ये दोनों देश अगुवा थे। संयुक्त राज्य अमरीका पश्चिमी यूरोप, उत्तरी अमरीका और प्रशांत क्षेत्र के गुट की अगुवाई कर रहा था। इन देशों ने अपने को ‘स्वतंत्र दुनिया’ का नाम देना मुनासिब समझा और अपने लिए यही नाम चुना। सोवियत संघ समाजवादी गुट में प्रभावशाली ताकत था। पूर्वी यूरोप के देशों और बाद में चीन तथा उत्तर कोरिया में कम्युनिस्ट पार्टियों का कब्जा होने पर यह गुट अस्तित्व में आया। इन दोनों गुटों के आपसी संबंधों में तथा एक ही गुट के देशों के पारस्परिक रिश्तों में बहुत से परिवर्तन हुए हैं लेकिन संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ अभी भी संसार की दो प्रमुख शक्ति बने हुए हैं। यह स्थिति अभी भी नहीं बदली है।
   दुनिया के हर हिस्से में काफी व्यापक राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन हुए हैं। परिवर्तन की दिशा और परिवर्तन का परिमाण भिन्न-भिन्न देशों में अलग-अलग है, लेकिन नागरिक, राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक अधिकारों पर बल देने के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकारों के सार्वभौम घोषणा-पत्र को परिवर्तन की मुख्य दिशा का प्रतीक माना जा सकता है। पहले ही बताया जा चुका है कि दुनिया का तकरीबन हर देश स्वतंत्र हो चुका है और वहाँ के लोग, चाहे सिद्धांत रूप में ही सही, अपने भाग्य के स्वामी बन चुके हैं। बहरहाल, यद्यपि परिवर्तन की मुख्य दिशा राजनीतिक स्वतंत्रता के विकास, वयस्क मताधिकार की स्थापना तथा प्रतिनिधि संस्थाओं की स्थापना की तरफ रही हैं लेकिन अब भी बहुत से देशों में सैनिक तानाशाहों, निरंकुश शासकों और कुलीनतंत्रों की सरकारें राज कर रही हैं। बहुत से यूरोपीय देशों की राजनीतिक प्रणाली में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं जो हाल तक कम्युनिस्ट पार्टियों के शासन में थे। दो महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक व्यवस्थाओं में भी परिवर्तन हुए हैं, वे व्यवस्थाएँ हैं - पूँजीवाद और समाजवाद। पूँजीवाद सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था वाले देशों में मजदूर यूनियनों, श्रमिक और समाजवादी आंदोलनों द्वारा चलाए गए संघर्षों के परिणामस्वरूप आर्थिक और सामाजिक अधिकारों को मान्यता मिली है। ज्यादातर विकसित पूँजीवादी देश कल्याणकारी नीतियों, का अनुसरण करते हैं, इससे दूसरे विश्व युद्ध के बाद पूँजीवादी व्यवस्था से पैदा हुई परेशानियों में थोड़ी कमी आई है। जिस प्रकार की समाजवादी अर्थव्यवस्थाएँ सोवियत संघ में और दूसरे विश्व युद्ध के बाद पूर्वी यूरोप और चीन में कायम की गई, उनमें भी महत्वपूर्ण बदलाव आ रहा है। जिस दौर में पहले-पहल समाजवादी अर्थव्यवस्थाओं का निर्माण हुआ था उसकी तुलना में आज इन देशों में उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। इन व्यवस्थाओं में केंद्रीयकृत नियंत्रण को भी ढीला किया जा रहा है। अपनी जनता को आर्थिक और सामाजिक अधिकार सुनिश्चित करने के लिए नवस्वतंत्र देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं के निर्माण में लगे हुए हैं। उपनिवेशवादी शासन से जो पिछड़ापन उनको विरासत में मिला है, बहरहाल, इनमें से अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्थाओं की वह मुख्य विशेषता बना हुआ है। आज भी विश्व अर्थव्यवस्था उन देशों के सामाजिक आर्थिक पिछड़ेपन को बरकरार रखने में मुख्य कारक है। इन्हें हम तीसरी दुनिया के नाम से जानते हैं।
   गत 45 वर्षों के दौरान सामाजिक-आर्थिक व्यवस्थाओं में परिवर्तन के अलावा प्रौद्योगिकीय बदलावों ने नाटकीय मोड़ लिया है। इन प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों ने उन्नत पूँजीवादी देशों की अर्थव्यवस्थाओं का विशेष रूपांतरण कर दिया है। इसके अलावा संयुक्त राज्य अमरीका, जापान और जर्मनी प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में उभरकर सामने आए हैं। प्रौद्योगिकी में विकास के कारण आर्थिक रूप से विकसित तथा तीसरी दुनिया के देशों के बीच की खाई को और गहरा कर दिया है। तीसरी दुनिया के देशों का ही विकासशील देशों के रूप में दुनिया का विभाजन दूसरे विश्व युद्ध के बाद की दुनिया की प्रमुख विशेषता बन गया है।
   दूसरे विश्व युद्ध के बाद का समय तनावों और टकरावों का दौर रहा है। फासीवाद को पराजित करने के लिए युद्ध के दौरान जो गठबंधन किया गया था, युद्ध समाप्त होने के तत्काल बाद वह समाप्त हो गया। इसके बाद दो गुटों के बीच टकराव का दौर शुरू हुआ। इन गुटों को हम पश्चिमी गुट तथा सोवियत गुट के नाम से जानते हैं। यह टकराव इन पैंतालीस वर्षां में अधिक समय तक चला और इसे शीत युद्ध के नाम से जाना जाता है। इसके साथ-साथ अत्यंत विनाशकारी शस्त्रों की होड़ चली थी जिससे मानव जीवन के अस्तित्व को ही खतरा पैदा हो गया। दुनिया के अलग-अलग भागों में कई युद्ध भड़के और यद्यपि इन सारे युद्धों में इन दोनों विरोधी गुटों के देश प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में शामिल थे लेकिन इन युद्धों का स्वरूप स्थानीय बना रहा। इस अवधि के दौरान कई ऐसे अवसर आए जब दुनिया विनाश के कगार पर पहुँचती दिखी लेकिन विश्व युद्ध नहीं होने दिया गया। इस दौरान शांति का समय भी आया, तनावों में कुछ शिथिलता आई और बहुत हाल की स्थितियों को देखने में ऐसा लगता है कि राज्यों के बीच परस्पर तनावों के अंत के युग की शुरूआत हो चुकी है। फिर भी जिस प्रकार के हथियारों का जखीरा एकत्र हुआ है, इससे केवल वास्तविक निःशस्त्रीकरण और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से शांति की गारंटी हो सकती है, युद्ध से बचने भर से काम नहीं चलेगा क्योंकि शांति जीवन रक्षा का पर्याय बन गई है। 1940 के दशक के उत्तरार्ध तथा 1950 के दशक के सैनिक गुटों और सैनिक संधियों में कुछ शिथिलता आई है और लगता है कि इनका महत्व अब नहीं रह गया है। अब यह उम्मीद की जा सकती है कि पिछले पैंतालीस साल का समय वास्तविक शांतिमय दुनिया का मंगलाचरण था।
   शीत युद्ध को खत्म करने में एशियाई, अफ्रीकी और लैटिन अमरीकी देशों की भूमिका काफी निर्णायक रही है। विश्व की गतिविधियों में अपनी स्वतंत्र भूमिका पर ये देश बल देते रहे हैं। शुरू में इनकी संख्या थोड़ी थी लेकिन बाद में दुनिया की दो तिहाई हो गई। इस प्रकार दुनिया में तनाव कम करने में इन देशों ने काफी मदद की। इन्होंने किसी भी सैनिक गुट में शामिल होने से इंकार कर दिया। इसी से शांति का वातावरण बनाने में आसानी हुई। विश्व की गतिविधियों में इन देशों की अपनी स्वतंत्र भूमिका के साथ खड़ा होना द्वितीय युद्धोत्तर विश्व की खास खूबी रही है।

शीत युद्ध

  यूरोप के स्वतंत्र हुए देशों के भविष्य से जुड़े हुए बहुत से सवालों पर ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ के नेताओं ने तेहरान, याल्टा तथा पोत्सदम की बैठकों में आपस में समझौता किया। पोत्सदम की बैठक में विदेश मंत्रियों की एक परिषद् गठित की गई थी। इस परिषद् ने केंद्रीय शक्तियों और उनके सहयोगियों के साथ शांति संधि की शर्तों पर बातचीत की। सन् 1947 तक समझौते हो गए तथा इटली, रूमानिया, बल्गेरिया, हंगरी और फिनलैण्ड के साथ शांति संधियों पर हस्ताक्षर किए गए। 1955 में आस्ट्रिया पर से मित्र राष्ट्रों का कब्जा खत्म हुआ जब उसके साथ एक संधि पत्र पर हस्ताक्षर किए गए। बहरहाल जर्मनी और जापान के सवाल पर दोनों पक्ष किसी समझौते पर नहीं पहुँच सके। जबकि सोवियत संघ की आपत्ति के बावजूद पश्चिमी देशों ने जापान के साथ संधि पर हस्ताक्षर किए, वहीं जर्मनी के विषय में मतभेद के कारण अमरीका तथा ब्रिटेन के नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों और सोवियत संघ के बीच टकराव हुए। युद्ध के तत्काल बाद, युद्ध के समय के गठबंधन ढीले पड़ने लगे थे और शीत युद्ध अथवा हथियारों की शांति का दौर शुरू हो गया था।

शीत युद्ध की शुरूआत

  बहुत से इतिहासकार शीत युद्ध की शुरूआत 1917 से मानते हैं, जब रूस में बोल्शेविक क्रांति हुई थी। जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि बहुत से पश्चिमी देशों ने नई सोवियत सरकार को नष्ट करने के लिए अपनी फौजें रूस भेजीं थीं। उस सरकार को नष्ट करने के लिए जो क्रांति के बाद वहाँ बनाई गई थी, विदेशी हसतक्षेप, बहरहाल असफल हो गया था और 1920 तक इसका अंत हो चुका था। उसके बाद सोवियत संघ के प्रति अधिकांश पश्चिमी देशों ने शुतुर्मुर्गी रूख अख्तियार कर लिया था और सोवियत सरकार को मान्यता प्रदान करने में और उसके साथ कूटनीतिक संबंध कायम करने में उन्हें वर्षों लग गए थे। जर्मनी में फासीवाद की विजय के बाद पश्चिमी देशों को उम्मीद थी कि जर्मनी का आक्रमण सोवियत संघ के खिलाफ होगा। इसलिए केंद्रीय शक्तियों को खुश रखने की नीति उन्होंने अपनाई थी तथा आक्रमण के प्रतिरोध के लिए सोवियत संघ पर जर्मनी के आक्रमण के बाद युद्ध के दौरान सोवियत-अमरीकी-ब्रिटिश गठजोड़ हुआ जिसके कारण जर्मनी और अन्य केंद्रीय शक्तियों की पराजय हुई। लेकिन युद्ध के दौरान भी यह गठजोड़ तनावमुक्त नहीं था। संयुक्त राज्य अमरीका और ब्रिटेन ने एक संगठित कमान के तहत अपनी सैनिक कार्रवाई संयुक्त रूप से की तथा अपने स्वतंत्र निर्णय लेकर काम किए। दूसरा मोर्चा खोलने के प्रश्न पर यह खास तौर पर स्पष्ट हो गया था। इसके विषय में सोवियत संघ का ख्याल था कि इसमें जानबूझकर बिलंब किया जा रहा है। युद्ध के दौरान, शुरू में ही यूरोप के भविष्य को लेकर मतभेद उभर आए थे जैसे पोलैण्ड के सवाल को लेकर। यद्यपि इनमें से अधिकांश मतभेदों को तेहरान, याल्टा तथा पोत्सदम में हुई बातचीत के दौरान सुलझा लिया गया था लेकिन सोवियत संघ के विषय में पश्चिमी देशों का शकशुबहा बरकरार था। पूर्वी यूरोप में जर्मनी पर सोवियत संघ की विजय के कारण पश्चिमी देशों में बेचैनी महसूस की जाने लगी थी। ब्रिटिश लोग सोवियत सेना के बर्लिन की ओर बढ़ने के कारण चौंक उठे थे यद्यपि बर्लिन जर्मनी का हिस्सा था और आम समझौते में इसको मुक्त कराने का जिम्मा सोवियत संघ को सौंपा गया था। चर्चिल ने संयुक्त राज्य अमरीका के राष्ट्रपति पर काफी दबाव डाला कि वे जनरल आइजन हावर (जो मित्र राष्ट्रों की फौजी कमान के प्रमुख थे) को लिपजिग के बजाए बर्लिन की ओर कूच करने के लिए कहें।
   पूर्वी यूरोप की घटनाओं ने कम्युनिज्म के विषय में युद्ध-पूर्व के पश्चिम के भय को फिर से जिंदा कर दिया। याल्टा में ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ ने ‘‘यूरोप की मुक्ति का घोषणा-पत्र’’ नामक दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे जिसके मुताबिक मित्र राष्ट्रों को स्वतंत्र चुनावों के जरिए लोकतांत्रिक संस्थाएँ बनाने के लिए यूरोप के मुक्त राष्ट्रों की मदद करनी थी। लेकिन हर शक्ति ने इन देशों में अपनी पसंद की सरकारों को बढ़ावा देने की कोशिश की। युद्ध खत्म होने के तीन साल के भीतर पूर्वी यूरोप के सभी देशों में कम्युनिस्टों के प्रभुत्व वाली सरकारें स्थापित हो गईं। मुक्त होने के तत्काल बाद इन देशों में संयुक्त मोर्चा वाली सरकारें बनाई गईं। इनमें कम्युनिस्टों के साथ अन्य विचारों के लोग भी शामिल हुए थे। खास तौर से पोलैण्ड और चैकोस्लोवाकिया में कम्युनिस्टों के प्रभुत्व वाली सरकारों के गठन से ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमरीका नाराज हुए। उनका आरोप था कि तय हुआ था कि इन देशों में लोकतांत्रिक संस्थाओं का निर्माण स्वतंत्र चुनावों के जरिए कराया जाएगा लेकिन सोवियत संघ ने वादाखिलाफी की है।
   1946 में पोलैण्ड की अस्थाई सरकार में विभाजन हो गया। इसका संबंध सोवियत विरोधी उन नेताओं से था जिनका मुख्यालय लंदन में था। बाद में चलकर चुनाव कराए गए जिसमें दो दलों को 90 प्रतिशत स्थान मिले। इन दोनों दलों ने मिलकर संयुक्त मजदूर पार्टी का गठन किया, यही बाद में वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी कहलाई। मुख्य विरोधी दल के नेताओं ने आरोप लगाया कि स्वतंत्र चुनाव नहीं हुए हैं और उनके हजारों कार्यकर्त्ता गिरफ्तार कर लिए गए हैं। मई 1946 में चैकोस्लोवाकिया में चुनावों में मिली जुली सरकार बनाई गई थी। इस सरकार में कम्युनिस्ट पार्टी के अलावा अन्य दल भी शामिल थे। फरवरी 1948 में कम्युनिस्टों ने माँग की कि सरकार का पुनर्गठन किया जाना चाहिए क्योंकि सरकार में शामिल कुछ पार्टियाँ फासीवादियों को पनाह दे रही हैं। सोवियत संघ ने आरोप लगाया कि चैकोस्लोवाकिया के राष्ट्रपति एडुअर्ड बेन्स ने दबाव में आकर इसका पुनर्गठन किया है। इसके बाद कम्युनिस्ट पार्टी के प्रभुत्व वाली सरकार सत्ता में आई। इसी प्रकार के परिर्वतन बल्गारिया, रूमानिया और हंगरी में भी हुए। युगोस्लाविया और अल्बानिया में भी कम्युनिस्ट सत्ता में आए जिन्होंने राष्ट्रीय प्रतिरोध का नेतृत्व किया था। इस प्रकार सात पूर्वी यूरोपीय देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों के प्रभुत्व वाली सरकारें कायम हो गईं और अब कम्युनिस्ट पार्टी के शासन वाला सोवियत संघ दुनिया का अकेला देश नहीं रह गया। इस परिवर्तन से ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमरीका विशेष रूप से चिंतित थे। वे मानते थे कि यह स्वतंत्र विश्व के लिए खतरा है।
   जर्मनी की घटनाओं ने सोवियत संघ और पश्चिमी देशों के बीच मतभेदों को और उग्र बना दिया। जर्मनी को चार क्षेत्रों में बाँटा गया था और इनमें से एक-एक क्षेत्र पर क्रमशः सोवियत संघ, ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमरीका और फ्रांस का नियंत्रण था। पोत्सदम की बैठक में जर्मनी की एक ही आर्थिक क्षेत्र के रूप में परिकल्पना की गई थी और उसमें एक ही मुद्रा का चलन होना था। मित्र राष्ट्रों की एक नियंत्रण परिषद् गठित की गई थी जिसमें इन चारों देशों के सैनिक कमान के लोग थे। इसका काम संयुक्त रूप से परिवहन, वित्त आदि बातों की देखभाल करना था। लेकिन धीरे-धीरे जर्मनी के दो हिस्से ही हुए। संयुक्त राज्य अमरीका, ब्रिटेन तथा फ्रांस को मिलाकर एक क्षेत्र बन गया (यह पश्चिमी भाग था) तथा सोवियत संघ के नियंत्रण वाला भाग दूसरा क्षेत्र या पूर्वी क्षेत्र बना। पश्चिमी हिस्से ने पूर्वी हिस्से को औद्योगिक कलपुर्जे आदि भेजना बंद कर दिया और पूर्वी हिस्से ने पश्चिमी हिस्से को कृषि उत्पादों की आपूर्ति रोक दी। इस प्रकार दोनों हिस्सों के आर्थिक संबंध टूट गए। अब दोनों हिस्सों की अलग-अलग मुद्राएँ चलन में आईं। दोनों भागों की आर्थिक और राजनीतिक नीतियाँ अलग-अलग हो गई। पूर्वी हिस्से में भू-स्वामियों की बड़ी जोतें जब्त कर ली गईं तथा उनको किसानों में बाँट दिया गया, काफी बड़ी संख्या में उद्योगों और खानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया तथा फासीवादी शासकों के सत्ता में आने के बाद जो जर्मन कम्युनिस्ट प्रवास में थे तथा अन्य दल जो इनके साथ सरकार बनाने के लिए उत्सुक थे, उनको प्रोत्साहित किया गया। पश्चिमी भाग में बड़े पैमाने पर अमरीका से प्राप्त मदद से पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का निर्माण शुरू हुआ तथा जो राजनीतिक दल कम्युनिस्टों और सोवियत संघ के प्रति शत्रु भाव रखते थे, उनकी स्थिति प्रभावशाली होने लगी। पश्चिमी जर्मनी में अपनाई गई नीतियों का आधार कम्युनिज्म और रूस का भय था। 1947 तक आते-आते जर्मनी के साफ-साफ दो आर्थिक और राजनीतिक हिस्से हो गए थे। बाद में दो अलग-अलग स्वतंत्र राज्यों का दर्जा देकर इस विभाजन की औपचारिकता पूरी कर दी गई।
   ग्रीस में गृह युद्ध हुआ। इसके कारण भी शीत युद्ध को बढ़ावा मिला। अध्याय 4 में इस बात का जिक्र किया जा चुका है कि ग्रीस पर फासीवादी कब्जे का प्रतिरोध करने वालों में कम्युनिस्ट मुख्य शक्ति थे। लेकिन जो ब्रिटिश सेनाएँ ग्रीस भेजी गईं थीं, वे वहाँ पुनः राजशाही को ही स्थापित कराना चाहती थीं और राजा को गद्दी पर बैठाना चाहती थीं जिसे वापस लाया गया था। इसी दौरान ग्रीस में गृह युद्ध भड़क उठा। वहाँ पर लगभग 10,000 ब्रिटिश सैनिक थे जो गृहयुद्ध में ग्रीस के कम्युनिस्टों के विरूद्ध लड़े थे। लेकिन 1947 के शुरू में ही ब्रिटेन ने ग्रीस से हट जाने का निर्णय किया। ब्रिटेन ने संयुक्त राज्य अमरीका को सूचित किया कि गृह युद्ध में ग्रीस की सरकार के समर्थन में अब वह आगे लड़ने में असमर्थ है। इसका खर्च अब वह बर्दाश्त नहीं कर सकता है। ब्रिटेन का ग्रीस से हटने तथा सैनिक तथा वित्तीय मदद बंद करने का अर्थ यह था कि वहाँ के गृह युद्ध में कम्युनिस्टों की जीत हो जाती। संयुक्त राज्य अमरीका ने तय किया कि ग्रीस सरकार केसमर्थन का बोझ वह खुद उठाएगा। इसके साथ ही वह टर्की के समर्थन का भार भी खुद ही ढोएगा क्योंकि उसको लग रहा था कि दोनों देशों को सोवियत संघ से खतरा है।
   1945-47 की अवधि आमतौर पर शीत युद्ध की शुरूआत मानी जाती है। शीत युद्ध का पहला तीर विस्ंटन चर्चिल के तरकस से निकला था। जब वे ब्रिटेन के प्रधान पद से अलग हो चुके थे। संयुक्त राज्य अमरीका में उन्होंने एक व्याख्यान दिया था। उसके श्रोताओं में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रूमन भी विद्यमान थे। चर्चिल ने वहाँ कहा था, ‘‘बाल्टिक प्रदेश के राज्यों से लेकर त्रिस्ते तक (जो कि एड्रियाटिक क्षेत्र में है) पूरे महाद्वीप में एक लोहे का पर्दा लटक गया है।’’ यहाँ चर्चिल का लोहे के पर्दे से आशय है यूरोप का सोवियत संघ तथा सोवियत प्रभाव के अंतर्गत देश और शेष यूरोप में बँटवारा। इसका अर्थ यह था कि चर्चिल की दृष्टि में सोवियत संघ, संयुक्त राज्य अमरीका और ब्रिटेन के बीच संधि समाप्त हो चुकी थी। उन्होंने अपने भाषण में इस बात की भी अपील की थी कि सोवियत संघ का मुकाबला करने के लिए ब्रिटेन-अमरीका के बीच राजनीतिक और सैनिक गठजोड़ होनी चाहिए। ग्रीस के गृह युद्ध में अमरीकी हस्तक्षेप के निर्णय को शीत युद्ध की औपचारिक शुरूआत कहा जा सकता है। ग्रीस सरकार के लिए 400 मीलियन डॉलर की सैनिक और आर्थिक सहायता की माँग करते हुए राष्ट्रपति ट्रूमन ने एक नीतिगत वक्तव्य दिया जिसे ट्रूमन सिद्धांत के नाम से जाना जाता है। अपने भाषण में ट्रूमन ने कहा था, ‘‘मुझे विश्वास है कि स्वतंत्र देशों को समर्थन देना संयुक्त राज्य अमरीका की नीति होनी चाहिए, ऐेसे देश जो मुट्ठी भर शक्तिशाली देशों की अधीनता के विरूद्ध अथवा बाहरी दबाव के विरूद्ध प्रतिरोध कर रहे हैं।’’
   ट्रूमन सिद्धांत में कम्युनिज्म (साम्यवाद) को स्वंतत्र दुनिया के लिए खतरा बताया गया था जिसे संयुक्त राज्य अमरीका स्वंतत्र दुनिया का अगुवा होने के नाते विश्व के किसी कोने में सफल होने की इजाजत नहीं देगा। हर क्रांति को सोवियत विस्तारवाद का नतीजा माना जाता था। इस विस्तारवाद को पूरी ताकत के साथ कुचलना अमरीका का कर्तव्य माना गया था। लगभग तीन दशकों तक यह सिद्धांत संयुक्त राज्य अमरीका की विदेश नीति का आधारभूत सिद्धांत था तथा विश्व में हर टकराव को सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमरीका के बीच संघर्ष के रूप में देखती थी।

बर्लिन को लेकर संकट और जर्मनी का विभाजन

  ब्रिटेन, फ्रांस और संयुक्त राज्य अमरीका के नियंत्रण वाले पश्चिम जर्मनी के क्षेत्रों को मिलाकर 1948 के प्रांरभ तक पश्चिमी शक्तियों ने एक नए राज्य के निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। इन क्षेत्रों को ‘‘यूरोपीय पुनर्निर्माण कार्यक्रम’’ के अंतर्गत भी लाया जा रहा था। इसके तहत युद्ध में तहस नहस हुए पश्चिमी यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं को खड़ा करने के लिए संयुक्त राज्य अमरीका को काफी बड़े पैमाने पर मदद देनी थी। बर्लिन शहर सोवियत नियंत्रण वाले क्षेत्र में आता था। इसको भी उसी तरह चार भागों में बाँटा गया था, जैसे शेष जर्मनी को बाँटा गया था। पश्चिम की तीनों शक्तियों ने पश्चिम बर्लिन को पश्चिम जर्मनी का हिस्सा माना। इसे अलग राज्य के रूप में खड़ा किया जा रहा था। सोवियत संघ इस बात के खिलाफ था। सन् 1948 में पश्चिमी जर्मनी से बर्लिन को जोड़ने वाली सड़क को उसने बंद कर दिया। यह सड़क सोवियत क्षेत्र से होकर गुजरती थी और पश्चिम बर्लिन को पश्चिम जर्मनी से जोड़ती थी। पश्चिम बर्लिन की नाकेबंदी का उद्देश्य बर्लिन के बारे में सोवियत संघ की बात मानने के लिए पश्चिमी शक्तियों को मजबूर करना था। इससे युद्ध का खतरा पैदा हो गया। पश्चिमी देश पश्चिम बर्लिन से टस से मस होने को तैयार नहीं थे लेकिन बिना बाहर से रसद पहुँचाए पश्चिमी शक्तियाँ उसे अपने अधीन नहीं रख सकती थीं। पश्चिम बर्लिन के लिए बहुत बड़े पैमाने पर हवाई जहाजों से सामान की आपूर्ति करके पश्चिमी देशों ने इस नाकेबंदी का जवाब दिया। यह नाकेबंदी लगभग 11 महीनों तक चली। इस अवधि में 275,000 हवाई जहाजों ने भोजन सामग्री और ईंधन वहाँ पहुँचाया। यह सामग्री पश्चिम के मित्र देशों द्वारा भेजी गई थी। इस प्रकार शत्रुता के खतरे से स्थिति को संभाल लिया गया था। मई 1949 में सोवियत संघ ने नाकेबंदी समाप्त कर दी।
   इस बीच एक नई सैनिक संधि अस्तित्व में आ चुकी थी। अप्रैल 1949 में, संयुक्त राज्य अमरीका और यूरोप के अधिकांश देश जैसे ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, लक्जेमबर्ग, हॉलैण्ड, नार्वे, डेनमार्क, पुर्तगाल, इटली, आइसलैण्ड और कनाडा ने मिलकर उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) बनाया। इस संधि के जरिए पश्चिमी देशों ने पुनस्त्रीकरण कर काफी बड़ा कार्यक्रम शुरू किया। कहा गया था कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य यूरोप में ‘‘रूसी विस्तारवाद’’को रोकना और कम्युनिज्म आगे न बढ़ने देना था। अगले छः सालों के दौरान संयुक्त राज्य अमरीका ने यूरोप के उत्तरी एटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के देशों को 17,500 मीलियन डॉलर सैनिक सहायता के रूप में दी। सन् 1952 में ग्रीस तथा टर्की दोनों ने इस संगठन की सदस्यता ग्रहण कर ली।
   सन् 1949 में जर्मन संघीय गणराज्य (पश्चिम जर्मनी) की स्थापना की गई और बॉन को इसकी राजधानी बनाया गया। पश्चिमी जर्मनी का पुनस्त्रीकरण भी इसके साथ ही आंरभ हुआ यद्यपि पश्चिमी जर्मनी को 1955 में औपचारिक रूप से नाटो की सदस्यता दी गई। दूसरे विश्व युद्ध के समाप्त होने के चार साल के भीतर ही पश्चिमी देशों द्वारा सैनिक संगठन बनाना काफी प्रमुख घटना थी। इससे पश्चिमी देशों तथा सोवियत संघ के बीच टकरावों को और बुरी स्थिति में डाल दिया। पश्चिम जर्मनी की स्थापना के कुछ ही महीनों बाद, सोवियत नियंत्रण क्षेत्र वाला जर्मनी नया राज्य बना तथा इसका नाम रखा गया-जर्मन जनवादी गणतंत्र। इस प्रकार 1949 के अंत तक जर्मन के विभाजन की औपचारिकताएँ पूरी हो चुकी थीं तथा दो अलग अलग जर्मन राज्यों का उदय हो चुका था जो एक दूसरे के सामने युद्ध की मुद्रा में खड़े थे। जर्मनी का यह विभाजन 45 वर्षों तक जारी रहा तथा इसका अंत अभी हाल में 3 अक्टूबर 1990 को हुआ है जब दोनों जर्मनियों को फिर एक कर दिया गया।
   सन् 1955 में जब पश्चिम जर्मनी को उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन का सदस्य बनाया गया तो सोवियत संघ और कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा शासित पूर्वी यूरोप के देशों ने अपना सैनिक संगठन बनाया जिसे वारसा संधि के नाम से जाना जाता है। वारसा संधि के देशों के पास नाटो के देशों की तरह ही एक संयुक्त सैनिक कमान थी। इस बीच शीत युद्ध पूरे विश्व में फैल गया जो शुरू में यूरोप तक ही सीमित था। नाटो के अलावा दुनिया के अन्य भागों में संयुक्त राज्य अमरीका द्वारा प्रायोजित सैनिक संगठन स्थापित किए गए थे।
   दूसरे विश्व युद्ध के अंत में संयुक्त राज्य अमरीका दुनिया की सबसे बड़ी सैनिक ताकत के रूप में उभर कर सामने आया था। चार वर्षां तक यह अकेला देश था जिसके पास आण्विक हथियार थे। आण्विक शस्त्रों पर एकाधिकार के कारण विश्व में सैनिक श्रेष्ठता में संयुक्त राज्य अमरीका बेताज का बादशाह था। कुछ इतिहासकारों का मत यह है कि हिरोशिमा और नागासाकी पर अणु बम गिराना द्वितीय विश्व युद्ध की अंतिम कार्रवाई उतना नहीं था (जो एक प्रकार से समाप्ति की तरफ बढ़ रहा था) जितना विश्व युद्ध के बाद की दुनिया को संयुक्त राज्य अमरीका की सैनिक श्रेष्ठता का प्रदर्शन। संयुक्त राज्य अमरीका द्वारा अणु-अस्त्र का रखना, इस दृष्टिकोण के अनुसार, बाकी दुनिया को आतंकित करने के लिए था ताकि वह इसके सामने घुटने टेक दे। संयुक्त राज्य अमरीका का आण्विक हथियारों पर एकाधिकार उस समय खत्म हो गया जब सोवियत संघ ने 1949 में एक आण्विक परीक्षण किया। उसके बाद से अधिकाधिक मारक हथियारों का विकास शीत युद्ध का प्रमुख परिणाम हो गया और परिणामस्वरूप अंतर्राष्ट्रीय तनाव और टकराव अधिक बढ़ गए। सन् 1940 के दशक के समाप्त होने तक शीत युद्ध दुनिया के अन्य हिस्सों में भी फैलने लगा था।

एशिया में टकराव

  नाटो की स्थापना के पाँच महीने बाद सितंबर 1949 में सोवियत संघ ने घोषणा की कि उसने अणु बम का परीक्षण किया है। इससे संयुक्त राज्य अमरीका की सैनिक श्रेष्ठता को गहरा धक्का लगा। इस सूचना से संयुक्त राज्य अमरीका स्तंभित हो गया। इस सूचना को कम्युनिज्म के भय को तीव्र करने के लिए इस्तेमाल किया गया। इसके बाद के कुछ वर्षां में अमरीका में एक विचित्र मनोवृत्ति को बढ़ावा देने की कोशिश की गई जिसे ‘‘ईश्वर विहीन’’ कम्युनिज्म के प्रति ‘‘उनमादी विरोध’’ कहा गया। संयुक्त राज्य अमरीका की सरकार के नेता, संयुक्त राज्य अमरीकी कांग्रेस के कुछ सदस्य तथा जन संचार माध्यमों के एक हिस्से ने इस उन्माद को और बढ़ावा दिया। इसके लिए मनगढ़त बातें फैलाई गईं कि सोवियत संघ के एजेंट अमरीकी प्रशासन में घुसे हुए हैं और यहाँ की सुरक्षा व्यवस्था में तोड़फोड़ की कार्रवाई कर रहे हैं। कहा गया कि सोवियत संघ के भेदियों ने संयुक्त राज्य अमरीका और ब्रिटेन के आण्विक रहस्यों को सोवियत संघ तक पहुँचा दिया है, इसीलिए सोवियत संघ को अणु बम बनाने में मदद मिली है। वैज्ञानिक अणुबम परियोजना से जुड़े वैज्ञानिकों की निष्ठा पर शक किया गया। इनमें से कुछ पर मुकदमा चलाया गया और काफी लंबी अवधि के लिए जेल में डाला गया, यहाँ तक कि कुछ को मृत्युदंड भी दिया गया। उस जमाने के कुछ चोटी के विद्वानों का विचार था कि यदि गुप्तचरी के आरोप में कुछ सत्यता भी हो कि अणुबम के रहस्य को रूस पहुँचाया गया तो भी इससे सोवियत वैज्ञानिकों की अणुबम बनाने की क्षमता पर कोई गुणात्मक प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि जिन दिनों अमरीकी वैज्ञानिकों ने इस परियोजना पर काम करना शुरू किया उन्हीं दिनों रूसी वैज्ञानिकों ने भी इस विषय पर काम प्रारंभ किया था। बहुत सी बड़ी हस्तियों ने इस बात की तरफ भी इशारा किया था कि संयुक्त राज्य अमरीका, सोवियत संघ तथा ब्रिटेन दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मित्र थे, इसलिए इनके बीच वैज्ञानिक रहस्यों के आदान-प्रदान को राजद्रोह की कोटि में नहीं रखा जा सकता। लेकिन गुप्तचरी के भय को भरपूर हवा दी गई और सोवियत संघ के प्रति शत्रुता और भय पैदा करने के लिए तथा स्थिति को और अधिक बिगाड़ने के लिए इसका खुलकर उपयोग किया गया।
   इसके तत्काल बाद संयुक्त राज्य अमरीका और उसके सहयोगियों को एक और धक्का लगा। पहली अक्टूबर 1949 को चीनी जनवादी गणराज्य (कम्युनिस्ट चीन) की स्थापना हो गई। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानियों के विरूद्ध चीन में च्यांग काई-शेक की सरकार को लड़ने के लिए संयुक्त राज्य अमरीका ने बड़े पैमाने पर हथियारों की आपूर्ति कर रखी थी। अध्याय तीन में बताया जा चुका है कि चीन में गृह युद्ध स्थगित कर दिया गया था और च्यांग काई-शेक को कम्युनिस्टों के विरूद्ध लड़ने की जगह ज्ञापन के साथ युद्ध को प्राथमिकता देने के लिए मजबूर किया गया था। जापान के साथ संयुक्त रूप से संघर्ष करने के लिए च्यांग काई-शेक की सरकार और कम्युनिस्टों में एकजुटता तो कायम नहीं हो सकी थी लेकिन युद्ध के दौरान इस दिखावे को कायम रखा गया कि ये दोनों यदि एकजुट नहीं हो सके तो आपस में लड़ भी नहीं रहे हैं। जुलाई 1946 में दुबारा गृह युद्ध छिड़ गया। तीन साल से थोड़ा ही अधिक समय गुजरा होगा कि संयुक्त राज्य अमरीका द्वारा अतिपरिष्कृत हथियारों की आपूर्ति तथा अमरीका में प्रशिक्षित वायु सैनिकों के बावजूद च्यांग काई-शेक की फौजें पूरी तरह समाप्त कर दी गई। अपने बचे खुचे सैनिकों को लेकर च्यांग काई-शेक ताईवान (फारमोसा) भाग गया। दूसरे विश्व युद्ध में जापान की पराजय के बाद ताईवान को मुक्त कराया गया था। विश्व की सबसे अधिक आबादी वाले देश में कम्युनिस्टों की विजय ने कम्युनिज्म के भय को और तीव्र कर दिया। चीन में कम्युनिस्ट शासन की समाप्ति और चीन की मुख्य भूमि पर च्यांग काई-शेक के शासन की पुनः स्थापना विश्व की गतिविधियों में अमरीकी नीति का मुख्य हिस्सा बन गया। दो दशक से भी अधिक समय तक चीन को संयुक्त राज्य अमरीका ने मान्यता नहीं दी। अपने मित्र राष्ट्रों के सहयोग से अमरीका ने चीन को संयुक्त राष्ट्र संघ से बाहर रखा। संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन की जगह (इसमें सुरक्षा परिषद् की स्थाई सदस्यता भी शामिल है) च्यांग काई-शेक की सरकार विराजमान रही यद्यपि संयुक्त राज्य अमरीका की सेना की मदद से यह एक छोटे से चीनी द्वीप पर काबिज थी। च्यांग काई-शेक की सेना को संयुक्त राज्य अमरीका लगातार हथियारों से लैस करता रहा ताकि चीन की मुख्य भूमि पर वह आक्रमण कर सके। कम्युनिज्म के भय के कारण संयुक्त राज्य अमरीका ने एशियाई देशों के मामले में दखल देना शुरू कर दिया और इस प्रकार शीत युद्ध एशिया के आँगन में आकर खड़ा हो गया। संयुक्त राज्य अमरीका एशिया के कई सैनिक टकरावों और युद्धों में भी शामिल था। हर मुद्दे को शीत युद्ध के रूप में देखने की वजह से स्वतंत्रता के लिए उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रवादी संघर्षों में व्यस्त देशों से भी अमरीका का टकराव हुआ तथा कुछ स्वतंत्र देशों के साथ भी झगड़ा हुआ जो अपनी राष्ट्रीय स्वाधीनता को मजबूत बनाने की कोशिश कर रहे थे और इस बात की कोशिश कर रहे थे कि विश्व के मामले में अपनी स्वतंत्र भूमिका अदा करें।

कोरिया का युद्ध

  कोरिया का युद्ध अपने किस्म का पहला युद्ध था जिसमें संयुक्त राज्य अमरीका प्रत्यक्ष भागीदार था। यह युद्ध 1950 में भड़का था। जापान की हार के बाद कोरिया पर जापानी कब्जा समाप्त हो गया। इसके बाद कोरिया दो अलग-अलग नियंत्रण-क्षेत्रों में बाँट दिया गया। इसका उत्तरी भाग सोवियत संघ के कब्जे में था और दक्षिणी भाग संयुक्त राज्य अमरीका के नियंत्रण में। यह विभाजन 38 वें समांतर के साथ-साथ था। सितंबर 1948 में सोवियत संघ ने उत्तरी कोरिया से अपनी फौजें वापस बुला लीं और उसके बाद उत्तरी कोरिया ने अपने को जनवादी लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया। संयुक्त राज्य अमरीका की फौजें दक्षिण कोरिया से जून 1949 में हटीं तथा अगस्त 1949 में दक्षिण कोरिया ने अपने को कोरिया गणराज्य घोषित किया। उत्तरी कोरिया की सरकार के राष्ट्राध्यक्ष किम इल-सुंग थे जो कोरिया की कम्युनिस्ट पार्टी के भी नेता थे। दक्षिण कोरिया के नेता सिंगमान री थे, जो दक्षिण पंथी तानाशाह थे। दोनों में से किसी भी सरकार ने कोरिया के बँटवारे को स्वीकार नहीं किया और दोनों ही सरकारों ने दावा किया कि उनका लक्ष्य कोरिया का एकीकरण है। सन् 1950 में दोनों के बीच लड़ाई छिड़ गई और इसके लिए दोनों ही ने एक दूसरे पर आरोप लगाया। हालाँकि आमतौर पर माना जाता है कि युद्ध का श्रीगणेश उत्तरी कोरिया की ओर से किया गया था। यह दृष्टिकोण संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् का था जिसने उत्तर कोरिया के खिलाफ दक्षिण कोरिया की मदद के पक्ष में मतदान किया। बहरहाल यह बात याद रखने की है कि दक्षिण कोरिया को सुरक्षा परिषद् का समर्थन मिलना उस हालत में संभव हुआ जब सोवियत संघ ने चीन को संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य न बनाए जाने के कारण उसका बहिष्कार किया था। दो महीनों के भीतर उत्तरी कोरिया की फौजों ने संपूर्ण दक्षिण कोरिया पर एक झटके में कब्जा कर लिया और दक्षिण कोरिया की राजधानी तो युद्ध आरंभ होने के तीसरे दिन ही उत्तरी कोरिया के कब्जे में आ गई थी। लेकिन बहुत बड़े पैमाने पर संयुक्त राज्य अमरीका की थल सेना, नौ सेना तथा वायु सेना ने इस युद्ध में हस्तक्षेप किया और उत्तरी कोरिया की फौजों को पीछे ढकेल दिया गया। संयुक्त राज्य अमरीका की फौजों ने उत्तरी कोरिया के भीतर घुस कर युद्ध किया। इस समय चीनी फौजें हरकत में आईं तथा संयुक्त राज्य अमरीका की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर किया। 1951 के मध्य में ही युद्ध ने गतिरोध के दौर में प्रवेश किया। युद्ध विराम के लिए बातचीत के दौर चले, इसमें भारत ने काफी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। युद्ध विराम पर जुलाई 1953 में हस्ताक्षर हुए। इसके द्वारा युद्ध पूर्व की स्थिति को बहाल कर दिया गया। इस लड़ाई में 142,000 अमरीकी फौजी मारे गए तथा अन्य देशों के 17,000 फौजी मारे गए जो संयुक्त राज्य अमरीका की ओर युद्ध में भाग लेने आए थे। इस युद्ध में मारे गए कोरियाई लोगों की संख्या अनुमानतः तीस तथा चालीस लाख के बीच थी।
   सन् 1945 के बाद कोरिया का युद्ध पहला प्रमुख युद्ध था तथा ऐसा पहला युद्ध भी था जिसमें इतने बड़े पैमाने संयुक्त राज्य अमरीका की सीधी भागीदारी थी तथा इसके काफी लोग इसमें मारे गए। पूरे दूसरे विश्व युद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमरीका के मृत लोगों की संख्या लगभग तीस लाख आँकी गई है। इतनी बड़ी संख्या में मौतों के बावजूद यह बात याद रखने की है कि कोरिया का युद्ध सीमित क्षेत्र का युद्ध था। इस बात का पूरा खतरा बना हुआ था कि कहीं यह विश्व युद्ध का रूप न ले ले। कोरिया के युद्ध में जनरल मैकार्थर ने अमरीकी फौजों का नेतृत्व किया था। वे चीन पर आक्रमण करना चाहते थे। इस बात का भी खतरा था कि इस लड़ाई में अमरीका कहीं आण्विक हथियारों का उपयोग न कर दे।

शीत युद्ध का तीव्र रूप

  कोरिया में युद्ध विराम संधि पर हस्ताक्षर होने के पहले ही शीत युद्ध का रूप तीव्र होने लगा था। इसके परिणामस्वरूप दूसरे क्षेत्रों में टकराव और युद्ध शुरू हो गए थे। इस दौर की अमरीकी विदेश नीति पर जॉन फास्टर डलेस का नियंत्रण था। सन् 1953 से 59 के दौरान डलेस संयुक्त राज्य अमरीका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट्स थे। इस समय आइजन हावर अमरीका के राष्ट्रपति थे। उन्होंने संयुक्त राज्य अमरीका की कम्युनिज्म को रोकने की नीति की भर्त्सना की तथा उसे अपर्याप्त बताया और आक्रामक नीति की वकालत की ताकि कम्युनिज्म को पीछे ढकेला जा सके। इसके लिए उन्होंने लोगों को कम्युनिस्ट आतंक से मुक्त करने की सिफारिश की। उन्होंने कुछ खतरनाक सिद्धांतों की वकालत की । इन सिद्धांतों में से एक था बहुत बड़े पैमाने पर बदला लेने का सिद्धांत। इसका आशय था नाभिकीय शस्त्रास्त्रों का उपयोग। दूसरा था ‘‘किनारे पर ले जाने’’ का सिद्धांत जिसका आशय यह था कि सोवियत संघ को ठेल कर युद्ध की ओर ले जाया जाए ताकि उसे छूट देने के लिए विवश किया जा सके। उन्होंने दावा किया था कि बिना युद्ध में कूदे युद्ध के किनारे तक ठेल कर ले जाने की क्षमता एक योग्य राजनेता की एक जरूरी कला है और यदि आप ‘‘किनारे तक जाने से भयभीत होते हैं तो समझिए आप गए।’’
   इस अवधि में हथियारों की दौड़ एक नई अवस्था में पहुँच चुकी थी। नवंबर 1952 में संयुक्त राज्य अमरीका ने ताप नाभिकीय बम का परीक्षण किया जिसे आम लोग हाइड्रोजन बम के नाम से जानते हैं। इसके तत्काल बाद सोवियत संघ ने अगस्त 1953 में यही परीक्षण किया। जो अणु बम हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराया गया था, उसकी तुलना में इन हथियारों की संहारक शक्ति सैकड़ों हजारों गुना ज्यादा थी। ‘‘किनारे ढकेलने का सिद्धांत’’ (दि डाक्ट्रिन ऑफ ब्रिंकमैनशिप) मनुष्य जाति के जीवन के लिए विनाश के खतरे से परिपूर्ण था, खासकर तब जब दो विरोधी शक्तियाँ इस प्रकार के खतरनाक हथियारों से लैस हों। बहरहाल इन हथियारों के विकास को इस आधार पर न्यायोचित ठहराया गया कि इससे दोनों ही ओर से विनाश के खतरे हैं। अतः भय के कारण दोनों एक दूसरे पर आक्रमण नहीं करेंगे अर्थात् इनमें से एक भी यदि शत्रु को नष्ट करने की कोशिश करता है तो उसे मालूम है कि दूसरा पक्ष उसे भी नष्ट कर देगा। एक अर्थ यह भी था कि यदि किसी देश के पास संहारक हथियार हों तो इस भय के कारण कोई देश युद्ध आरंभ नहीं करेगा कि उस पर आक्रमण किया जा सकता है, इस भय से वह रूका रहेगा। इसी विश्वास के चलते 1957 में ब्रिटेन ने अपनी रोकथाम के लिए बम बनाए और बाद में फ्रांस और चीन भी इसी रास्ते पर गए।
   दुनिया के हर भाग में संयुक्त राज्य अमरीका ने सैनिक संधियाँ करनी शुरू कर दीं और वह सोवियत संघ तथा चीन को चारों तरफ से घेर कर सैनिक अड्डे स्थापित करने लगा। 1954 में दक्षिण-पूर्व एशिया संधि संगठन (सीटों, नाटो की तर्ज पर) स्थापित किया गया और आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, फ्रांस, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान, थाइलैंड, फिलिपाइंस तथा संयुक्त राज्य अमरीका इसके सदस्य थे। इसके तत्काल बाद बगदाद संधि पर हस्ताक्षर किए गए। इसके मुताबिक ईरान, टर्की, इराक और पाकिस्तान का संयुक्त राज्य अमरीका से सैनिक समझौता हुआ। इसके बाद इराक में क्रांति हुई और वहाँ राजतंत्र समाप्त कर दिया गया। इराक उसके बाद बगदाद संधि से अलग हो गया। इराक के अलग होने के बाद बगदाद संधि का नाम बदल कर सेंट्रल ट्रीटी ऑरगेनाइजेशन (सेंटो) रखा गया। इन सैनिक संधियों का उपयोग एशिया की अनेक गैर लोकतांत्रिक सरकारों को बनाए रखने के लिए किया गया। इन देशों को काफी बड़े पैमाने पर हथियार मुहैया कराए गए। इससे इसके सदस्य देशों में भी आपस में तनाव पैदा हुआ साथ ही उन पड़ोसी देशों के साथ भी इन सदस्य देशों के संबंधों में तनाव आया, जिन्होंने इन संधियों में शामिल होने से इनकार किया था। जो देश इन संधियों में शामिल नहीं थे, वे इनको अलग-अलग क्षेत्रों में तथा पूरे विश्व में तनाव का कारण मानते थे और वे यह भी मानते थे कि इससे उनकी स्वतंत्रता को खतरा भी है। इसी संदर्भ में गुट निरपेक्ष आंदोलन का जन्म हुआ। जो देश विश्व की गतिविधियों में अपनी स्वतंत्र भूमिका रखना चाहते थे तथा तनावों को कम करने में सक्रिय भूमिका निभाना चाहते थे, वे गुट निरपेक्ष बने अर्थात् उन्होंने इन सैनिक संगठनों में शामिल होने से मना कर दिया। जिन देशों ने संयुक्त राज्य अमरीका के साथ सैनिक संधियों में शामिल होने से मना किया, जान फास्टर डलेस ने उनकी भर्त्सना की और उन्हें ‘‘अनैतिक की संज्ञा दी।
   एशिया के देशों की राष्ट्रवादी ताकतों से संयुक्त राज्य अमरीका का टकराव हुआ, खासतौर पर जहाँ राष्ट्रवादी ताकतों ने आमूल सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक पुनर्निर्माण के कार्यक्रम को एक दूसरे के साथ जोड़कर देखा था। इस प्रकार की सभी ताकतों को या तो कम्युनिस्ट माना जाता था अथवा कम्युनिस्टों का मित्र समझा जाता था। अलोकप्रिय दक्षिण पंथी सरकारों की सहायता करने के प्रयास किए गए। यहाँ तक कि बड़े पैमाने पर सहायता देकर सैनिक तानाशाही शासनों को बरकरार रखने की भी कोशिश की गई। ईरान से लेकर उत्तरी अफ्रीका तक फैला क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया क्योंकि इस क्षेत्र में अपार तेल संसाधन थे। तेल निकालने तथा तेल शोधन का काम पश्चिमी कंपनियों के हाथ में था, खासतौर पर ये कंपनियाँ ब्रिटेन, फ्रांस अथवा अमरीका के नियंत्रण में थीं। पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह नियंत्रण काफी महत्वपूर्ण था तथा इसको कायम रखना उनकी विदेश नीति का न्याय संगत उद्देश्य था। जिन सरकारों ने अपने प्राकृतिक संसाधनों पर अपने विकास के लिए अधिकार जताने के प्रयास किए, उनका तख्ता पलटने की कोशिश की गई। इस तख्ता पलट या तोड़फोड़ का मुख्य उपकरण संयुक्त राज्य अमरीका की खुफिया एजेंसी सी. आई. ए. थी। इसकी स्थापना 1947 में की गई थी। सी. आई. ए. के पास खर्च करने के लिए बहुत बड़ी राशि होती थी और इसके खर्चे को सार्वजनिक जाँच पड़ताल से अलग रखा गया था। यह संगठन न सिर्फ अपने विशाल खुफिया जाल के जरिए सूचनाएँ एकत्र करने का काम करता था बल्कि दूसरे देशों की सरकारों के खिलाफ पर्दे के पीछे से पेरामिलिटरी कार्रवाई का संचालन भी किया करता था।
   1957 में ईरान की मजलिस (संसद) ने एंग्लो-ईरानी तेल कंपनी के राष्ट्रीयकरण का आदेश दिया। इस कंपनी का नियंत्रण ब्रिटिश मालिकों के हाथ में था। मुहम्मद मुस्सदक को ईरान का प्रधान-मंत्री बनाया गया था। इस समय सरकार पर तुदेह पार्टी का नियंत्रण था जो मूलगामी सामाजिक सुधारों की वकालत करती थी। संयुक्त राज्य अमरीका को पक्का विश्वास था कि मुहम्मद मुस्सदक सोवियत संघ से दोस्ताना संबंध है। मुस्सदक की नेतृत्व वाली सरकार का तख्ता पलट दिया गया और इस तख्ता पलट में सी. आई. ए. ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। संयुक्त राज्य अमरीका की मदद से ईरान के शाह रजा पहलवी ने अपना निरंकुश राज कायम कर लिया। सैनिक संधियों के माध्यम से ईरान के शाह संयुक्त राज्य अमरीका से बँधे थे तथा ईरान के तेल भण्डार के विकास के लिए उन्होंने संयुक्त राज्य अमरीका की तेल कंपनियों को काफी सुविधाएँ दे रखीं थीं। उनका निरंकुश शासन लगभग 25 वर्षों तक चला और ईरान में क्रांति द्वारा 1978 में इसको समाप्त किया गया।

वियतनाम युद्ध

  संयुक्त राज्य अमरीका की कम्युनिज्म को रोक कर रखने की नीति ने उसे वियतनाम के साथ लंबे युद्ध में उलझा दिया। अध्याय तीन और चार में हिंदचीन में राष्ट्रवादी आंदोलनों का जिक्र किया जा चुका है। सितंबर 1945 में वियतनाम के राष्ट्रवादियों ने हो ची-मिन्ह के नेतृत्व में वियतनामी गणतंत्र की स्थापना की थी। जापान ने हिंदचीन से फ्रांसीसी लोगों को बाहर कर दिया गया था, इन्होंने पुनः अपना शासन वहाँ स्थापित करने की कोशिश की। इस काम में पहले उनको ब्रिटेन से और बाद में संयुक्त राज्य अमरीका से सहायता मिली। इस प्रकार वियतनाम में 1947 से फ्रांस औपनिवेशिक युद्ध में उलझा रहा। संयुक्त राज्य अमरीका इस युद्ध में इसलिए कूदा था कि वियतनाम में राष्ट्रवादी शक्तियों का नेतृत्व कम्युनिस्ट पार्टी कर रही थी। जॉन फास्टर डलेस ने वियतनाम की लड़ाई में संयुक्त राज्य अमरीका के सीधे-सीधे उलझने की वकालत की थी और लड़ाई जारी रखने के लिए वे फ्रांस पर लगातार दबाव डालते रहे क्योंकि इस लड़ाई के लिए धन की व्यवस्था संयुक्त राज्य अमरीका कर रहा था। हो ची-मिन्ह के नेतृत्व में वियतनामी राष्ट्रवादी ताकतों को चीन और रूस से मदद मिल रही थी लेकिन वे मुख्यतः अपनी निजी ताकत और अपने देश की जनता के जबरदस्त समर्थन के भरोसे डटे हुए थे। सन् 1954 में फ्रांस की फौजों को जबर्दस्त पराजय का सामना करना पड़ा। वियतनाम की सेना ने डेन बिन्ह फू में 12,000 फ्रांसीसी फौजी सिपाहियों को चारों ओर से घेर लिया। इसके बाद राष्ट्रपति आइजन हावर ने जॉन फास्टर डलेस की यह सलाह नहीं मानी कि संयुक्त राज्य अमरीका को अपनी फौजें वियतनाम में भेजनी चाहिए। सन् 1954 में जिनेवा में एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए जिसके मुताबिक वियतनाम में फ्रांसीसी शासन का अंत हो गया। अस्थाई तौर पर उत्तर वियतनाम और दक्षिण वियतनाम, दो हिस्सों में वियतनाम को बाँट दिया गया लेकिन चुनावों के बाद इसको दुबारा एक किया जाना था और चुनाव का समय 1956 तय किया गया था। लेकिन नाओ दिन्ह-दिएम के भ्रष्ट तथा तानाशाही शासन के अधीन संयुक्त राज्य अमरीका ने दक्षिण वियतनाम को स्वतंत्र राज्य के रूप में विकसित करना आरंभ कर दिया। क्योंकि दुनिया में सब लोग मान रहे थे कि हो ची-मिन्ह की पार्टी चुनावों में भारी बहुमत से जीतकर आने वाली है। संयुक्त राज्य अमरीका की सलाह और मदद से दिएम की सरकार ने चुनाव कराने से मना कर दिया। दक्षिण वियतनाम के गुरिल्लों को कुचलने के लिए और उत्तर वियतनाम की सेना का प्रतिरोध करने के लिए संयुक्त राज्य अमरीका ने दक्षिण वियतनाम की फौज को शस्त्रास्त्रों से लैस करना शुरू कर दिया। सन् 1963 में अमरीकी समर्थन और मदद के बावजूद अपनी बढ़ती हुई बदनामी के कारण दिएम की सरकार ढहने के कगार पर आ पहुँची। संयुक्त राज्य अमरीका ने वहाँ की सेना की सत्ता पलटने के लिए मदद की और सत्ता परिवर्तन हुआ। दक्षिण वियतनाम में कम्युनिस्ट विरोधी शासन को बनाए रखने के लिए संयुक्त राज्य अमरीका की सरकार अधिकाधिक सूचनाबद्ध होती गई। अमरीका के नीति निर्धारकों ने एक सिद्धांत गढ़ा जिसको ‘‘डोमिनो सिद्धांत’’ कहा जाता है। इस सिद्धांत का तात्पर्य इन शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है, यदि दक्षिण वियतनाम पर कम्युनिस्टों का कब्जा हो गया तो दूसरे सभी दक्षिण-पूर्व एशिया के देश ढह जाएँगे और इनमें कम्युनिस्टों का राज कायम हो जाएगा। इसके कारण समूचा एशिया कम्युनिस्टों के विस्तार-क्षेत्र मे आ जाएगा। अमरीका सैनिक सलाहकारों के रूप में अपनी फौजें भेजने लगा। सन् 1967 के अंत तक 500,000 अमरीकी सैनिक वियतनाम में लड़ रहे थे। अनुमान लगाया गया है कि संयुक्त राज्य अमरीका ने 1967 तक वियतनाम की धरती पर जितने बम गिराए थे उनकी शक्ति द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान समूचे यूरोप पर गिराए गए बमों से कहीं ज्यादा थी। संयुक्त राज्य अमरीका द्वारा वियतनाम में छेड़ा गया युद्ध मानव इतिहास का सर्वाधिक कुख्यात युद्ध था। समुची दुनिया की जनता ने इसकी निंदा की। यहाँ तक कि संयुक्त राज्य अमरीका की जनता ने भी इसकी जबरदस्त निंदा की। सन् 1945 के बाद कोई अकेली घटना दुनिया में नहीं हुई जिसने पूरी दुनिया की जनता को एकजुट किया हो जितनी एकजुटता वियतनाम युद्ध के कारण हुई। सन् 1975 में यह लड़ाई समाप्त हुई जब संयुक्त राज्य अमरीका की अंतिम सैनिक टुकड़ी वहाँ से हटी तथा दक्षिण वियतनाम की सेना को घोर पराजय का मुहँ देखना पड़ा। 50,000 से ज्यादा अमरीकी सैनिक मारे गए और 300,000 के करीब घायल हुए। वियतनामी नागरिकों और सैनिकों में मरने वालों की संख्या इससे कहीं ज्यादा थी। सारा देश ही तहस नहस कर दिया गया था। जल्दी ही वियतनाम एक संयुक्त देश के रूप में उभरा। एशिया में एक छोटे से देश की जनता के हाथों सैनिक दृष्टि से विश्व के सबसे शक्तिशाली देश की पराजय समकालीन विश्व इतिहास में महान ऐतिहासिक महत्व की घटना थी।  

अरब जगत

  संयुक्त राज्य अमरीका और उसके सहयोगियों की अरब राष्ट्रवाद को रोकने की नीति द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के समय में अरब जगत में टकराव का मुख्य कारण थी। यह सब कम्युनिज्म के विस्तार तथा इस क्षेत्र में सोवियत संघ के प्रभाव को रोकने के नाम पर किया गया था। तेल के संसाधनों पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के पश्चिमी देशों के दृढ़ निश्चय की चर्चा पहले की गई है। इस क्षेत्र में तनाव का दूसरा प्रमुख स्रोत इसराइल राज्य था। इस क्षेत्र में इसराइल संयुक्त राज्य अमरीका का मुख्य सहयोगी भी था। इसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं कि यहूदियों को बाहर से लाकर फिलिस्तीन में बसाने तथा उनके लिए एक देश की रचना करने के सवाल पर ब्रिटेन तथा अरब राष्ट्रवाद के बीच टकराव था। नवंबर 1947 में फिलिस्तीन को अरब राज्य तथा यहूदी राज्य में बाँटने पर संयुक्त राष्ट्र संघ सहमत हो गया था। लेकिन 14 मई 1948 को फिलिस्तीन के विभाजन के पूर्व ही वह वहाँ से हट गया जो शासनादेश के अंतर्गत फिलिस्तीन पर काबिज था। इसराइल यहूदी राज्य घोषित कर दिया गया और घोषणा के दूसरे ही दिन संयुक्त राज्य अमरीका ने उसे मान्यता दे दी। इसराइल द्वारा यहूदी राज्य की स्थापना के बाद अरबों तथा इसराइल के बीच युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में अरबों की पराजय हुई। फिलिस्तीन के अरब लोग अपनी भूमि और अपने घर से वंचित कर दिए गए और दस लाख से भी अधिक अरबों को शरणार्थी बन कर दूसरे अरब देशों में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा। सन् 1946 में जोर्डन (पहले का ट्रांस जोर्डन) एक स्वतंत्र साम्राज्य बना था। जोर्डन नदी के पश्चिम में फिलिस्तीन का जो भू-भाग था उस पर जोर्डन ने कब्जा कर लिया। इसका प्रचलित नाम पश्चिमी तट है। इसमें अमरीका ने जोर्डन की मदद की थी। इस क्षेत्र के शक्तिशाली राज्य के रूप में इसराइल का निर्माण किया जाने लगा और अरब राष्ट्रवाद की बढ़ती शक्ति को रोकने के लिए उसका उपयोग किया जाने लगा।
   1950 तथा 1960 के दशक में अब्दुल गमाल नासिर के नेतृत्व में मिस्र राष्ट्रवादी ताकतों का प्रतिनिधि था। सन् 1954 में ब्रिटेन को मिस्र से अपनी फौजें हटाने के लिए कहा गया। इसी समय मिस्र ने सोवियत संघ से प्राप्त हथियारों की मदद से अपनी स्वतंत्र सैनिक शक्ति का गठन शुरू किया। नील नदी के दूसरी ओर, आस्वान बाँध बनाने के लिए संयुक्त राज्य अमरीका ने सहायता का प्रस्ताव किया था लेकिन जब मिस्र को सोवियत संघ से हथियार मिलने लगे तो अमरीका ने आस्वान बाँध के लिए मदद बंद कर दी। 26 जुलाई 1956 को स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। 29 अक्टूबर 1956 को इसराइल ने मिस्र पर आक्रमण कर दिया। इसके दूसरे दिन स्वेज नहर पर कब्जा करने के लिए ब्रिटिश तथा फ्रांसीसी फौजें वहाँ उतारी गई। मिस्र के ऊपर ब्रिटिश, फ्रांसीसी तथा इसराइली आक्रमण का पूरे विश्व स्तर पर विरोध किया गया। विरोध का यह स्वर ब्रिटेन तथा फ्रांस में भी फूटा था। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इसकी निंदा की। 5 नवंबर को सोवियत संघ ने आक्रमणकारियों को मिस्र से बाहर चले जाने के लिए अंतिम चेतावनी दी और उसने मिस्र की रक्षा के लिए प्रक्षेपास्त्रों के प्रयोग की भी धमकी दी। 7 नवंबर 1956 को मिस्र में फ्रांसीसी-ब्रिटिश सैनिक कार्रवाई समाप्त हो गई तथा उनकी सेनाएँ हटा ली गईं। मिस्र तथा इसराइल युद्ध विराम के लिए सहमत हो गए।
   सन् 1956 में मिस्र में युद्ध की समाप्ति को अरब राष्ट्रवाद की विजय के रूप में देखा गया। इससे इस क्षेत्र में सोवियत संघ का असर भी बढ़ा। अब आस्वान बाँध के निर्माण के लिए मिस्र ने सोवियत संघ से मदद माँगी। विभिन्न अरब राज्यों को एकजुट करके नासिर ने अरब एकता को सुदृढ़ करने की कोशिश की। इन घटनाओं से संयुक्त राज्य अमरीका चौंक गया तथा एक योजना की घोषणा की गई। इस घोषणा को ‘‘आइजन हावर सिद्धांत’’ के नाम से जाना जाता हैं। इस सिद्धांत को अंतर्राष्ट्रीय साम्यवाद (इंटरनेशनल कम्युनिज्म) कहा जाता है। इस सिद्धांत के मुताबिक संयुक्त राज्य अमरीका ने इनको इस क्षेत्र के देशों की रक्षा के लिए सैनिक और आर्थिक मदद देने का निर्णय किया। लेकिन जुलाई 1958 में इराक में पश्चिमी देशों की पिट्ठू सरकार को उखाड़ फेंका गया। इन देशों की पश्चिम समर्थक सरकारों को गिरने से रोकने के लिए संयुक्त राज्य अमरीका की फौजी टुकड़ियों को लेबनान और जोर्डन भेजा गया। संयुक्त राज्य अमरीका इसराइल को भी लगातार अस्त्रशस्त्र से लैस करता रहा।
   1967 में एक दूसरा युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में एक तरफ इसराइल था और दूसरी ओर मिस्र, जोर्डन और सीरिया थे। इसको छः दिन वाले युद्ध के नाम से जाना जाता है। इसमें अरब राज्यों की पराजय हुई। इसराइल ने मिस्र के सिनाय प्रायद्वीप वाले भू-भाग पर कब्जा कर लिया। उसने जोर्डन नदी के पश्चिमी तट वाले फिलिस्तीन भू-भाग जो जोर्डन से ले लिया तथा सीरिया का एक हिस्सा भी उसके कब्जे में आ गया। इसराइल ने पूरे जेरूसलम नगर को भी अपने नियंत्रण में कर लिया। सन् 1973 में एक अन्य अरब इसराइल युद्ध हुआ। इस युद्ध के दौरान तेल उत्पादक देशों ने घोषणा की कि जो देश इसराइल का समर्थन कर रहे हैं, उनको तेल की आपूर्ति बंद कर दी जाएगी। इसका मतलब संयुक्त राज्य अमरीका और उसके सहयोगी नाटो देश थे। लेकिन नाटो के यूरोपीय सदस्य देशों ने इसराइल के समर्थन में संयुक्त राज्य अमरीका के साथ जाने से इनकार कर दिया और स्वयं संयुक्त राज्य अमरीका ने युद्ध विराम के लिए इसराइल को मनाया।
   पिछले चार दशकों के दौरान जहाँ संयुक्त राज्य अमरीका की मदद से इसराइल ने अपनी सैनिक शक्ति मजबूत कर ली है और आक्रमण करके कई अरब देशों के भू-भाग को हड़प लिया है और अब इनको खाली करने से इनकार कर दिया है, वहीं अरब देश एकजुट होने में असफल रहे हैं। इस क्षेत्र में संयुक्त राज्य अमरीका की सैनिक सहायता केवल इसराइल तक सीमित नहीं रही है। अपने तेल संबंधी हितों की रक्षा के लिए इस क्षेत्र में रूढ़िवादी सरकारों की मदद करके उसने अपने प्रभाव का विस्तार किया है अरब राष्ट्रों के आपसी मतभेदों और टकरावों से भी अमरीका ने फायदा उठाया है। इराक द्वारा कुवैत पर कब्जा कर लेना अरब देशों के आपसी टकरावों और मतभेदों का ताजा उदाहरण है। इस क्षेत्र में अमरीका की रीति और अरबों के आपसी टकरावों का गंभीर नतीजा फिलिस्तीनी जनता का लगातार दमन है।

क्यूबा का प्रक्षेपास्त्र संकट

  क्यूबा में नाभिकीय प्रक्षेपास्त्रों को लगाने पर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के इतिहास का सबसे गंभीर संकट उत्पन्न हुआ। नाभिकीय शस्त्रों के विकास के बाद उनको छोड़ने की नई पद्धति का भी विकास किया गया अर्थात् इन शस्त्रों को गिराने के नए तरीके ईजाद किए गए। इस काम के लिए प्रक्षेपास्त्रों का विकास किया गया। ये प्रक्षेपास्त्र अथवा रॉकेट नाभिकीय शस्त्रों को विश्व के किसी भी भाग में हजारों किलोमीटर दूर स्थित लक्ष्यों तक ले जा सकते थे। संयुक्त राज्य अमरीका ने दुनिया के विभिन्न भागों में इन प्रक्षेपास्त्रों को तैनात कर रखा था। इन सबके लक्ष्य बिंदु सोवियत संघ में थे। सोवियत संघ के पास आमतौर पर इस प्रकार के प्रक्षेपास्त्रों के अड्डे नहीं थे। उसके प्रक्षेपास्त्रों के अड्डे उसके अपने भू-भाग के अंदर ही थे। दोनों पक्षों के पास पनडुब्बियाँ भी थीं। ये पनडुब्बियाँ इन प्रक्षेपास्त्रों को लाने-लेजाने का काम करती थीं। शुरू में इन प्रक्षेपास्त्रों की मार करने की दूरी काफी कम थी यानी कुछ सौ किलोमीटर तक ही ये प्रक्षेपास्त्र हथियारों को ले जा सकते थे। इससे इनके अड्डों को शत्रु देश के भू-भाग के निकट स्थापित करना आवश्यक होता था। दूसरे देशों के विषय में जासूसी करने के लिए भी नई प्रौद्योगिकी विकसित हो चुकी थी। उदाहरण के लिए बहुत अधिक ऊँचाई पर तेज गति से उड़नेवाले हवाई जहाज शत्रु देश के भू-भाग का सही-सही चित्र ले सकते थे और पता लगा सकते थे कि सेना, टैंक, हवाई अड्डे, उद्योग आदि इस किस स्थान पर हैं। इतना ही नहीं वे यह भी पता लगा सकते थे कि प्रक्षेपास्त्रों को ठीक-ठीक कहाँ लगाया गया है और उनका चित्र भी ले सकते थे।
   जनवरी 1959 में फीदेल कास्त्रों के नेतृत्व में क्यूबा में क्रांति हुई। जब नई सरकार ने नए मूलगामी सामाजिक तथा आर्थिक सुधार लागू करना चालू कर दिए तो संयुक्त राज्य अमरीका की सरकार उसके खिलाफ हो गई। क्यूबा की नई सरकार ने कृषि में सुधार किए और उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया। अमरीका की सरकार की नाराजी का एक कारण यह भी था कि नई सरकार ने सोवियत संघ और चीन से दोस्ताना संबंध कायम किए थे। जनवरी 1961 में संयुक्त राज्य अमरीका ने क्यूबा से सारे कूटनीतिक संबंध तोड़ लिए साथ ही उसने सारे आर्थिक संबंध भी खत्म कर लिए। अप्रैल 1961 में क्यूबा सरकार का तख्ता पलटने के लिए उसने 2000 क्यूबा के निर्वासित लोगों की पिग्स की खाड़ी के पास उतार दिया। बहरहाल इस आक्रमण का हास्यास्पद अंत दो दिनों के अंदर ही हो गया। इसे तत्काल कुचल दिया गया। क्यूबा पर आक्रमण के लिए यद्यपि सारे विश्व में अमरीका की निंदा की गई थी लेकिन संयुक्त राज्य अमरीका की सरकार क्यूबा सरकार का तख्ता पलटने का अपना इरादा छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी। उस समय अमरीका की राष्ट्रपति की कुर्सी पर जॉन एफ. केनेडी विराजमान थे। उन्होंने पिग्स की खाड़ी के आक्रमण की नाटकीय विफलता के बाद खुलेआम घोषणा की थी, ‘‘क्यूबा को कम्युनिस्टों के हाथ में हम नहीं छोड़ना चाहते हैं।’’ 1962 में जो संकट उठ खड़ा हुआ था, उसकी यही पृष्ठभूमि थी।
   उल्लिखित किया जा चुका है कि सोवियत संघ को अमरीका ने चारों ओर से सैनिक अड्डों से घेर रखा था। इनमें से कुछ अड्डों पर तो नाभिकीय प्रक्षेपास्त्र तैनात थे लेकिन सोवियत संघ का अमरीकी भू-भाग के आसपास कोई भी सैनिक अड्डा नहीं था। जासूसी करने वाले अपने जहाजों से लिए गए चित्रों से संयुक्त राज्य अमरीका को पता चला कि क्यूबा में सोवियत संघ प्रक्षेपास्त्रों का अड्डा तैयार कर रहा है। यह जगह संयुक्त राज्य अमरीका के दक्षिणी भाग से 150 किलोमीटर से भी कम दूरी पर है। जितने युद्ध अमरीका ने लड़े हैं, वह सभी दूसरों की धरती पर लड़े गए, उसकी अपनी धरती अभेद्य और सुरक्षित थी। युद्ध के सभी स्थान अमरीका से काफी दूर थे। क्यूबा में प्रक्षेपास्त्रों के लगने से उसकी अपनी धरती भी आक्रमण की परिधि में आ रही थी। यद्यपि सोवियत संघ ने यह काम पहली बार किया था, जिसे संयुक्त राज्य अमरीका काफी पहले से करता चला आ रहा था अर्थात् वह सैनिक अड्डे बनाता चला आ रहा था। और यद्यपि यह किसी देश का अपना अधिकार हैं कि जिस देश से चाहे, उससे सैनिक मदद ले, लेकिन सोवियत संघ की इस कार्रवाई से अमरीका चौंक गया। उसने ऐसी नीति अख्तियार की कि उस नीति के चलते संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ में युद्ध हो सकता था। यह ऐसी घटना होती जो दोनों के बीच विभिन्न तनावों और टकरावों के बावजूद पहले कभी नहीं घटी थी। यह युद्ध समस्त मानवता के लिए खतरा होता। 22 अक्टूबर 1962 को राष्ट्रपति केनेडी ने क्यूबा की नौसैनिक तथा हवाई नाकेबंदी की घोषणा कर दी। इसका मतलब यह था कि क्यूबा की तरफ जाने वाले किसी भी पानी के जहाज या हवाई जहाज को संयुक्त राज्य अमरीका रोकेगा। क्यूबा के प्रक्षेपास्त्र वाले स्थानों पर आक्रमण के लिए भी संयुक्त राज्य अमरीका तैयार था। इस संकट से दुनिया विनाश के कगार पर पहुँच गई थी लेकिन 26 अक्टूबर को इसे सुलझा लिया गया। ठीक उसी दिन सोवियत प्रधान मंत्री निकिता खुश्चेव ने राष्ट्रपति केनेडी को एक संदेश भेजा। इसमें कहा गया था कि यदि अमरीका यह प्रण करे कि वह क्यूबा पर कभी आक्रमण नहीं करेगा तो सोवियत संघ क्यूबा से अपने प्रक्षेपास्त्र हटा लेगा। इस पर अमरीका मान गया तथा संकट टल गया। संयुक्त राज्य अमरीका ने टर्की में प्रक्षेपास्त्र लगा रखे थे जो सोवियत संघ से एकदम लगे हुए थे। अमरीका ने वहाँ से प्रक्षेपास्त्र हटाने का वादा किया।

शीत युद्ध के अंत की ओर

  थोड़े निश्चय के साथ जब यह कहना मुमकिन है कि अब शीत युद्ध का अंत हो गया था। सन् 1950 से लेकर अब तक तनाव में कमी को आगे बढ़ाने के लिए अनेक तरह के प्रयास किए गए हैं तथा अतीत में कई अवसरों पर ऐसा लगा कि दोनों महाशक्तियों के बीच ‘‘तनावों में कमी’’ का समय आरंभ हो गया है। यह कहा जा चुका है कि शांति का वातावरण बनाने में गुट निरपेक्ष आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसके द्वारा किए गए कुछ प्रयासों का अलग से ब्यौरा दिया जाएगा। बहरहाल, तनाव में कमी की शुरूआत का संकेत देने वाली कई घटनाओं के साथ नए तनावों और टकरावों की घटनाएँ भी घटती रही हैं। मुठभेड़ की नीति में परिवर्तन में एक कारक दिनों-दिन अधिक महत्वपूर्ण होता जा रहा है। वह कारक इस बात का एहसास है कि मानव इतिहास में इसके पहले जो कुछ हुआ है, उसके विपरीत विश्व स्तर के युद्ध की संभावना को अंतर्राष्ट्रीय संबंधो के संचालन का आधार नहीं बनाया जा सकता है। विश्व के हर हिस्से में युद्ध विरोधी जन-आंदोलन, नाभिकीय हथियारों पर रोक, एम. ए. डी. का सिद्धांत तथा वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट और हथियारों की दौड़ के विरोध में उठी उनकी आवाज ने शांति का वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की हैं। गुट निरपेक्ष आंदोलन निरस्त्रीकरण पर जोर देता आया है ताकि दुनिया में मानव की यातना समाप्त करने और विश्व के विकास के लिए इसमें खर्च होने वाले संसाधनों का उपयोग किया जा सके। कट्टर सैनिक समझौतों में भी अब शिथिलता की प्रवृत्ति दिखने लगी है। सन् 1950 के दशक में शुरू हुए विश्व साम्यवादी आंदोलन में फूट से कम्युनिस्ट विस्तारवाद के हौवे की अपील अब काफी मंद हो गई है, यद्यपि बहुतेरे पश्चिमी देश और खासतौर पर संयुक्त राज्य अमरीका, कहीं भी और किस भी मूलगामी परिवर्तन को देख कर चौंक जाते हैं और कई मामलों में तो दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में अमरीका ने हस्तक्षेप भी किया है। लेकिन सोवियत संघ तथा चीन के बीच फूट ने साम्यवाद (कम्युनिज्म) के भय को निर्मूल कर दिया जिसे पहले अखण्ड और अभेद्य माना जाता था। सन् 1961 में अल्बानिया वारसा संधि गुट से अलग हो गया था तथा रूमानिया ने सोवियत संघ से स्वतंत्र होकर अपनी भूमिका तय कर ली। सन् 1970 के दशक के शुरू में ही संयुक्त राज्य अमरीका और चीन के आपसी संबंध सुधरने लगे और 1971 में चीन को संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बना लिया गया। संयुक्त राज्य अमरीका द्वारा प्रायोजित सैनिक गठबंधनों का स्वरूप भी अब बदला है। सन् 1966 में फ्रांस ने नाटो की सेना से अपनी फौजी टुकड़ियाँ वापस बुला ली थीं तथा फ्रांस की जमीन से नाटो की सेना और सैनिक अड्डे हटा लिए गए थे। सन् 1970 के दशक की शुरूआत में ही चरणबद्ध तरीके से ‘‘सीटो’’ को सैनिक संधि के रूप में समाप्त किया जाने लगा था, 1973 में पाकिस्तान इससे अलग हो गया था और फ्रांस 1974 में अलग हुआ।
   शीत युद्ध की समाप्ति की प्रक्रिया उतनी सरल नहीं है। सन् 1956 में हंगरी में एक आंदोलन हुआ और 1968 में चैकोस्लोवाकिया की सरकार बदल गई जिसका तात्पर्य था कि ये दोनों देश सोवियत गुट से बाहर चले गए होते। इन दोनों देशों में सोवियत सेनाओं ने हस्तक्षेप किया। चैकोस्लोवाकिया में वारसा संधि के अन्य देशों की सेनाओं ने भी हस्तक्षेप किया तथा सोवियत समर्थक सरकार को सत्ता में बैठाया गया। सन् 1961 में पूर्वी जर्मनी ने पश्चिमी तथा पूर्वी जर्मनी के बीच एक दीवार खड़ी कर दी। इससे पश्चिमी देशों में काफी बड़े पैमाने पर आक्रोश पैदा हुआ। सन् 1979 में अफगान सरकार की मदद के लिए सोवियत संघ ने वहाँ अपनी सेनाएँ भेजीं ताकि उन विद्रोहियों को कुचला जा सके जिन्हें संयुक्त राज्य अमरीका ने हथियारों से लैस किया था और जो पाकिस्तान की मदद से अफगानिस्तान में सक्रिय थे। बहुत से देशों में और खास तौर से लैटिन अमरीकी देशों में संयुक्त राज्य अमरीका के सैनिक हस्तक्षेप की घटनाएँ क्यूबा में प्रक्षेपास्त्र संकट के बाद के दौर में घटीं। अमरीका ने अफ्रीका में भी उन शासनों के विरूद्ध विद्रोहियों को मदद दी जिनको वह सोवियत अथवा कम्युनिस्ट समर्थक मानता था।
   1989 के बाद तनावों में और कमी हुई है। इसका एक प्रमुख कारक पूर्वी यूरोप के देशों में होने वाले परिवर्तन हैं। इन देशों के शासन पर कम्युनिस्ट पार्टियों का एकाधिकार था। अब वह समाप्त हो गया है। सोवियत संघ को गोर्बाचोव के नए नेतृत्व द्वारा अपनाई गई नई नीतियों के परिणामस्वरूप यह सब कुछ संभव हुआ है। सन् 1945 के बाद विश्व इतिहास में पैंतालिस सालों के बाद जर्मनी का एकीकरण इतिहास के एक चरण का अंत माना गया है, जिसकी चर्चा पहले की जा चुकी है। कोरिया का एकीकरण भी एक वास्तविक संभावना बन गया है।
   पहले भी यह संकेत किया गया है कि विनाश के साधनों के विनाश से ही शांति को सुनिश्चित किया जा सकता है। जिन हथियारों की विनाशकारी शक्ति सामान्य मनुष्य की कल्पना के परे है, उन हथियारों का अस्तित्व ही तनाव का कारण है। इसलिए टकरावों का अंत लोगों को निरस्त्रीकरण की ओर अवश्य ले जाएगा और इसकी शुरूआत नाभिकीय निरस्त्रीकरण से की जा सकती है। हाल की घटनाओं से यह उम्मीद बँधती है कि जल्दी ही इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जाएँगे। सन् 1963 में परीक्षण पर प्रतिबंध संबंधी समझौते पर संयुक्त राज्य अमरीका, सोवियत संघ और ब्रिटेन ने हस्ताक्षर किए, इसमे आकाश और पानी में नाभिकीय हथियारों के परीक्षण पर प्रतिबंध लगाया गया था। फ्रांस और चीन ने इस पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था और इन दोनों देशों ने आकाश में नाभिकीय परीक्षण जारी रखा। लेकिन 1969 में संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ में हथियारों को कम करने के उद्देश्य से बातचीत शुरू हुई और 1972 में कुछ विशेष प्रकार के प्रक्षेपास्त्रों को सीमित करने के समझौते पर सहमति हो गई। इन वार्तालापों का नाम साल्ट (स्ट्रेटेजिक आर्म्स लिमिटेशन टाल्क्स) दिया गया था। निरस्त्रीकरण की दिशा में चलने वाली इस बातचीत में 1980 के दशक में तब अवरोध उत्पन्न हुआ जब संयुक्त राज्य अमरीका ने एक नए प्रकार की शस्त्रव्यवस्था का कार्य प्रारंभ किया। इसे एस. डी. आई. (स्ट्रेटेजिक डिफेंस इनिशिएटिव) या ‘स्टार वार’ नाम से जाना जाता है। इसका मतलब है कि हथियारों की दौड़ एक भयानक नई ऊँचाई की ओर बढ़ेगी यानी इसमें बाह्याकाश का एक नया आयाम जुड़ेगा। नए अंतराष्ट्रीय परिवेश में यह उम्मीद संभव है कि शस्त्र की इस नई प्रणाली की दिशा में चलने वाला काम रोक दिया जाएगा। इस बीच हाल के महीनों में कुछ और प्रगति हुई है। यह प्रगति है - भूमिगत नाभिकीय परीक्षणों पर प्रतिबंध तथा यूरोप में फौजों की संख्या में कटौती।

संयुक्त राज्य अमरीका, सोवियत संघ और यूरोप

  इसके पहले के खंड में 1945 के बाद के दौर वाले अंतर्राष्ट्रीय टकरावों के विशेष संदर्भ में संयुक्त राज्य अमरीका, सोवियत संघ और यूरोप के कुछ देशों से जुड़ी कुछ घटनाओं और परिवर्तनों की चर्चा हम कर चुके हैं। इन देशों के इतिहास के कुछ अन्य पहलुओं का अध्ययन उपयोगी हो सकता है, विशेष रूप से जो घटनाएँ उनकी प्रगति और उनके विकास से जुड़ी हैं, उनका अध्ययन काफी उपयोगी सिद्ध होगा।

संयुक्त राज्य अमरीका

  द्वितीय विश्व युद्ध के अंत के बाद की अवधि में संयुक्त राज्य अमरीका विश्व में प्रमुख रूप से उभरकर सामने आया। दुनिया का हर हिस्सा संयुक्त राज्य अमरीका के हित क्षेत्र में आ गया। संयुक्त राज्य अमरीका भी दुनिया में अपने को महान नैतिक शक्ति के रूप में देखता था। बहुत से अमरीकियों को ऐसा सोचना अच्छा लगता था कि जिस काल में जी रहे हैं, उसको ‘अमरीकी सदी’ कहना काफी न्यायसंगत होगा।
   द्वितीय विश्व युद्ध से संयुक्त राज्य अमरीका की अर्थव्यवस्था को कोई क्षति नहीं पहुँची थी। वास्तव में महामंदी से उत्पन्न समस्याएँ कमोबेश युद्ध के दौर में ही अंतिम रूप से हल कर ली गई थीं। युद्ध के बाद का दौर अभूतपूर्व आर्थिक समृद्धि का समय था। सन् 1940 से 1985 की सकल राष्ट्रीय आय 100 बिलियन डॉलर से बढ़कर 4100 बिलियन डालर हो गई। जबकि जनसंख्या 13 करोड़ 20 लाख से बढ़कर 23 करोड़ 80 लाख तक ही पहुँची। अमरीकी जनता की समृद्धि की झलक वहाँ उपभोक्तावादी सांस्कृतिक विकास अथवा उपभोक्तावादी सांस्कृतिक में दिखाई देती हैं। उपभोक्त वस्तुओं में बहुत अधिक विविधता आई और इनके इस्तेमाल और उत्पादन में अभूतपूर्व संवृद्धि हुई। मोटरकार इस उपभोक्ता संस्कृति का प्रतीक हो गई। छोटा अथवा बड़ा हर प्रौद्योगिक नवाचार मौजूदा उत्पाद को पुराना अथवा व्यर्थ कर देता था। अपने निजी विशाल प्राकृतिक संसाधनों के कारण और साथ ही विश्व के कई दूसरे भागों के संसाधनों पर नियंत्रण की वजह से अमरीका इस उपभोक्ता को कायम रखने में सफल रहा।
   जैसा इसके पहले के कालों में हुआ था कि अर्थव्यवस्था की संवृद्धि के परिणामस्वरूप उसके केंद्रीयकरण में भी वृद्धि हुई थी। अर्थव्यवस्था के अधिकांश भाग को अपेक्षाकृत थोड़ी सी बड़ी कंपनियाँ और निगम नियंत्रित कर रही थीं। इस विकास के कुछ पहलुओं पर अध्याय छः में विचार किया गया है। हथियारों से जुड़े हुए उद्योगों की संवृद्धि में जबर्दस्त वृद्धि हुई तथा सुरक्षा उपकरणों को पाने के लिए सरकार द्वारा बहुत बड़ी राशि खर्च किए जाने से कुछ बड़े निगमों को फायदा पहुँचा। शांति के दौर में उद्योग तथा सेना के बढ़ते हुए मेलमिलाप से बहुत से अमरीकी लोग भी चौंके और जनवरी 1961 के प्रारंभ में अपने पद से मुक्त होते समय संयुक्त राज्य अमरीका के राष्ट्रपति आइजन हावर ने सैनिक साजोसामान बनाने वाले उद्योगपतियों के बढ़ते हुए अनुचित प्रभाव के प्रति चेतावनी दी थी। पूँजीवादी व्यवस्था वाले अधिकांश लोकतांत्रिक देशों की तुलना में संयुक्त राज्य अमरीका में राजनीतिक नेताओं, उच्च पदों पर बैठे नौकरशाहों, सैनिक प्रतिष्ठानों, निगमों और बड़े-बड़े वित्तीय संस्थानों के आपसी रिश्ते काफी घनिष्ट रहे हैं। बहुधा सरकार को जब वित्तीय घाटे का सामना करना पड़ता था जब निगमों पर कर लगाने की जगह सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों और स्वास्थ्य सेवाओं में कटौती की जाती थी।
   हाल के वर्षों में संयुक्त राज्य अमरीका का आर्थिक वर्चस्व घटा है। सन् 1948 से 1952 के बीच यूरोपीय पुनर्रचना योजना (यूरोपियन रिकवरी प्लान) के अंतर्गत संयुक्त राज्य अमरीका ने पश्चिमी यूरोप को लगभग 12 बिलियन डॉलर की वित्तीय मदद दी। इस योजना को मार्शल योजना के नाम से जाना जाता है। मार्शल उन दिनों अमरीका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट थे। इस योजना से बहुत कम समय में यूरोप की अर्थ-व्यवस्था में सुधार कर के उसे युद्ध पूर्व के स्तर पर लाने में मदद मिली। बाद के वर्षों में पश्चिमी यूरोप के देशों की अर्थव्यवस्थाओं की विकास दर काफी तेज रही। विश्व में आर्थिक शक्ति के रूप में जापान का भी उदय हुआ और न सिर्फ विश्व बाजार में बल्कि अमरीका के अपने घरेलू बाजार में भी जापानी माल ने संयुक्त राज्य अमरीका के माल से होड़ लेना शुरू कर दिया। औद्योगिक उत्पादन के आंकड़ो से भी अमरीकी बाजार में प्रभुत्व का पतन स्पष्ट हो जाएगा। सन् 1950 में विश्व के औद्योगिक उत्पादन में अमरीका का हिस्सा 60 प्रतिशत था लेकिन 1980 में यह लगभग 45 प्रतिशत रह गया था। पश्चिमी यूरोप तथा जापान संयुक्त राज्य अमरीका के प्रमुख आर्थिक प्रतिद्वंदी बन गए थे।
   अपनी विश्व सर्वोच्चता में संयुक्त राज्य अमरीका की आस्था को पहला सदमा उस समय लगा जब 1957 में सोवियत संघ ने अंतिरिक्ष में अपना पहला उपग्रह ‘स्पूतनिक’ छोड़ा। इसके तीन साल बाद सोवियत संघ ने अंतरिक्ष में मनुष्य को भेजा। इन सदमों के कारण संयुक्त राज्य अमरीका ने उन क्षेत्रों में जोरदार प्रयास चालू कर दिए जिनमें अब तक वह अपने को सोवियत संघ में आगे मानता चला आ रहा था किंतु वास्तव में सोवियत संघ उससे काफी आगे निकल चुका था। अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रमों के लिए विशाल संसाधन मुहैया कराए गए। जब संयुक्त राज्य अमरीका के अंतरिक्ष यात्री 1969 में चाँद पर उतरे और उस पर चले तब अमरीका को महान वैज्ञानिक उपलब्धि हाथ लगी।
   संयुक्त राज्य अमरीका में लोगों के जीवन पर कई सालों तक शीत युद्ध ने अत्यंत दूषित प्रभाव डाला। इसकी चर्चा पहले की जा चुकी है कि संयुक्त राज्य अमरीका में ‘‘ईश्वरविहीन साम्यवाद’’ का उन्माद पैदा किया गया था। कम्युनिस्ट विरोधी और मूलगामी परिवर्तन-विरोधी होता था, उसे गैर-अमरीकी तथा विध्वंसकारी माना जाता था। टू्रमैन के (1945-1952) राष्ट्रपतित्व काल में सरकारी कर्मचारियों की वफादारी की जाँच पड़ताल की जाती थी और इसके चलते हजारों लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया था। जो विचार ‘‘गैर-अमरीकी’’ माना जाता था, उसे स्कूलों कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाने के आरोप में हजारों अध्यापकों को नौकरी से हटा दिया गया था। बहुत से फिल्म की पटकथा लेखकों और निर्माताओं को जेल में डाल दिया गया था और बहुतों को अतीत में कम्युनिस्टों के साथ अपने संबंधों का राज न बताने के आरोप में जेल में डाल दिया गया, काली सूची में उनके नाम डाल दिए गए तथा हालीवुड में उनके रोजगार पाने पर पाबंदी लगा दी गई थी। आइजन हावर के राष्ट्रपतित्व काल में भी कुछ वर्षों तक मूलगामी परिवर्तन चाहने वालों का विरोध करने वाला उन्माद जारी रहा। वे दो बार 1952 तथा 1956 में अमरीका के राष्ट्रपति चुने गए थे। 1953 में सारी दुनिया में अपीलों और विरोधों के बावजूद जूलियस रोजेनवर्ग और ईथल रोजेन वर्ग को सोवियत संघ को अण्विक रहस्य बताने के आरोप में फाँसी पर लटका दिया गया। जे. रॉबर्ट ओपेनहेमर की सरकारी जमानत नामंजूर कर दी गई थी। इन्हें अमरीकी अणु बम का जनक माना जाता है। वे अणु बम परियोजना के अध्यक्ष थे। ऐसा इसलिए किया गया था क्योंकि उन्होंने हाइड्रोजन बम परियोजना का विरोध किया था। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने इस बात को छिपाया है कि अतीत में उनके कम्युनिस्टों से संबंध थे। संयुक्त राज्य अमरीका के अंदर कम्युनिस्टों के खिलाफ इस जिहाद का नेतृत्व सिनेटर मैकार्थी कर रहे थे। सन् 1950 से 1954 के बीच, ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने ‘‘अमरीकी जनजीवन में आंतक फैला रखा’’ था। वे अनेक सीधे सरल लोगों को देशद्रोही घोषित कर चुके थे, यहाँ तक कि सरकारी विभागों के विरूद्ध भी आरोप लगा चुके थे। सेना पर उन्होंने आरोप लगाया था कि वह देशद्रोहियों को प्रश्रय दे रही हैं। सन् 1954 में उन पर कलंक का टीका लगा और साम्यवाद विरोधी उन्माद धीरे-धीरे मंद हुआ, यद्यपि इस उन्माद के शिकार हुए लोगों को उनकी प्रतिष्ठा वापस नहीं दिलाई जा सकी।
   द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के अधिकांश समय तक साम्यवाद का विरोध करना अमरीका की विदेश नीति का उद्देश्य बना रहा। लैटिन अमरीका में संयुक्त राज्य अमरीका की नीति कमोबेश पहले जैसी ही चलती रही और संयुक्त राज्य ने अनेक लैटिन अमरीका देशों में वहाँ की सरकारों का तख्ता पलटने के लिए सैनिक टुकड़ियाँ भेजी और विद्रोहियों की मदद ली। उसे यह शक था कि वे सरकारें वामपंथी थे और इसीलिए अमरीका विरोधी थे। जॉन एफ. केनेडी ने, जो 1960 में संयुक्त राज्य के राष्ट्रपति चुने गये थे, अमरीकी घरेलू नीति में एक नये गतिशील युग की शुरूआत की। लेकिन उन्हीं के राष्ट्रपतित्व काल में अमरीका वियतनाम के साथ प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में उलझने लगा था। अमरीका को बे ऑफ पिग्स के मामले में असफलता मिली और क्यूबा में सोवियत प्रक्षेपास्त्रों के टकराव की नौबत आ गयी जिसकी चर्चा पहले की जा चुकी है। 1963 में शांति की एक प्रमुख पहल की गयी, जब संयुक्त राज्य के राष्ट्रपति केनेडी और सोवियत संघ नेता निकिता खुश्चेव ने वातावरण, बाहरी अन्तरिक्ष और जल में नाभिकीय परिक्षणों पर प्रतिबन्ध लगाते हुए एक संधि पर हस्ताक्षर किये। 22 नवंबर, 1963 में राष्ट्रपति केनेडी की हत्या कर दी गयी। जिस व्यक्ति पर हत्या करने की आशंका की गयी थी, उसकी भी पुलिस की हिरासत में हत्या कर दी गयी, जिसे लाखों लोगों ने अपने टेलीविजन पर देखा कि कैसे हत्या की गयी। बाद में न्यायिक आयोग के विचारों पर शंकायें उभरने लगीं कि राष्ट्रपति की हत्या में केवल एक ही व्यक्ति का हाथ था।
   कभी-कभी संयुक्त राज्य का लोकप्रिय सरकारों को समर्थन संयुक्त राज्य के लिए कठिनाईयाँ खड़ी कर देता था और ऐसे कार्य करने की ओर प्रेरित करता था जो संयुक्त राज्य के कानून के तहत अवैध थे। संयुक्त राज्य ने बहुत लम्बे समय तक फिलिपीन में फर्दिनेन्ड मार्कोस और हाइती में ज्याँ क्लादे डुवेलियर की सरकारों को अनवरत समर्थन दिया था। ज्याँ क्लादे डुवेलियर को आम तौर पर पापा डॉक के नाम से बुलाया जाता है। लेकिन ये सरकारें इतनी अधिक अलोकप्रिय हो गयीं कि संयुक्त राज्य को इनके तानाशाहों को पदच्युत करने के लिए समर्थन देना पड़ा। ईरान के मामले में भी संयुक्त राज्य ने पहले तो एक साहसिक कदम उठाया जो कि असफल हो गया और बाद में संयुक्त राज्य के अधिकारियों ने ईरान के साथ कुछ ऐसे लेन देन किये जो संयुक्त राज्य के कानून के अनुसार अवैध या गैरकानूनी थे। 1979 में ईरान का शाह, जो एशिया में संयुक्त राज्य के सबसे बड़े समर्थकों में से एक था, ईरान में एक क्रांति के कारण देश छोड़ कर भाग गया। ईरान सरकार ने संयुक्त राज्य को शाह को ईरान के हवाले करने की माँग की। ईरान की सरकार शाह के विरूद्ध, जो अपना इलाज करने संयुक्त राज्य आया हुआ था, मुकदमा दायर करना चाहती थी। संयुक्त राज्य के इन्कार करने पर ईरानियों ने अनेक अमरीकियों को बंधक बना लिया। अप्रैल 1980 में जिमी कर्टर ने, जो 1977 में राष्ट्रपति बने थे, उन बंधकों को छुड़ाने के लिए संयुक्त राज्य के कमांडो भेजे। कमांडो की यह गतिविधि दुर्भाग्यपूर्ण रही। आखिरकार 1981 के आरंभ में जब संयुक्त राज्य ने संयुक्त राज्य के बैंकों में रोकी हुई या जमा परिसम्‍पत्ति को वापस किया, तब उन बंधकों को रिहा कर दिया गया। इसके बाद, रोनाल्ड रीगन (1981-89) के राष्ट्रपतित्व में एक बहुत बड़ा अनैतिक कार्य सामने आया। संयुक्त राज्य के उच्च अधिकारियों ने निकारागुआ की सरकार के विरूद्ध विद्रोहियों का समर्थन करने के लिए एक गैर कानूनी सौदेबाजी की। ऐसा माना जाता है कि ये उच्च अधिकारी राष्ट्रपति की सहमति से गैर कानूनी सौदेबाजी कर रहे थे।
   वियतनाम के युद्ध के विषय में पहले ही वर्णन किया जा चुका है। यह युद्ध संयुक्त राज्य की शर्मनाम हार के साथ खत्म हुआ। जब लिंडन जॉन्सन (1963-69) संयुक्त राज्य के राष्ट्रपति थे, तब इस युद्ध में तेजी आने लगी। रिचर्ड निक्सन (1969-74) के राष्ट्रपतित्व में इसमें और अधिक तेजी आ गयी। कम्बोडिया में बम बारी हुई और कम्बोडिया की सरकार गिरा दी गयी। उसकी जगह सैनिक जनरल के अंतर्गत एक संयुक्त राज्य समर्थक सरकार स्थापित की गयी। संयुक्त राज्य ने युद्ध को हिन्दचीन के तीसरे देश लाओस तक बढ़ा दिया था। राष्ट्रपति निक्सन ने चीन के संबन्धों को सामान्य करने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी और चीन को संयुक्त राज्य में 1971 में प्रवेश मिल गया था। 1972 में निक्सन चीन गये। जिस सॉल्ट वार्ता का पहले जिक्र किया गया है, उसे सोवियत संघ के साथ शुरू किया गया। 1973 में संयुक्त राज्य ने अपनी सेना को वियतनाम से वापस बुला कर युद्ध का अंत करने की स्वीकृति दी। बहरहार, युद्ध अगले दो सालों तक और चला। आखिरकार, अप्रैल 1975 में, जब संयुक्त राज्य के आखिरी हवाई जहाजों और हेलिकॉप्टरों ने शहर छोड़ा, उत्‍तरी वियतनामी सेना टुकड़ियों और दक्षिण वियतनाम की राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा की सेना टुकड़ियों ने जब सायगॉन, संयुक्त राज्य समर्थक सरकार की राजधानी में प्रवेश किया और अंततः युद्ध का अंत हो गया।
   निक्सन के राष्ट्रपति पद से त्याग पत्र देने के बाद वियतनाम का युद्ध खत्म हुआ। निक्सन ने एक बहुत बड़े घोटाले का राज खुलने के कारण त्याग पत्र दिया था। इसे लोग ‘‘वाटर गेट’’ का घोटाला कहते हैं। सन् 1972 में उनको दुबारा राष्ट्रपति चुना गया था लेकिन इसके तत्काल बाद उन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए गए। उन पर ये आरोप डेमोक्रेटिक पार्टी के कार्यालय में खुफिया यंत्र लगाने की अनुमति देने तथा देश की फाइलों को चोरी कराने को लेकर लगाए गये। उन्होंने यह दावा किया कि वे कोई धूर्त अथवा लफंगे नहीं हैं लेकिन महाभियोग लगाए जाने की संभावना को देखते हुए उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
   लगातार बनी रहने वाली गरीबी एक ऐसा मुद्दा था जिसका संयुक्त राज्य अमरीका के आगे आने वाले प्रशासन को सामना करना था। विश्व के सबसे संपन्न देश में 1980 के दशक में लगभग 15 प्रतिशत आबादी को (यानी लगभग तीन करोड़ लोग) सरकारी दस्तावेजों में गरीबों की सूची में रखा गया था। विभिन्न नस्ल के लोगों में गरीबी का विस्तार संयुक्त राज्य अमरीकी समाज के भीतर असमानता को प्रतिबिंबित करता था।
   सन् 1980 के दशक में अमरीका में लगभग 33 प्रतिशत काले लोग, 20 प्रतिशत हिस्पानी (स्पेनिश भाषा भाषी यानी मैक्सिको, प्यूरिटो रिको आदि देशों से आए लोग) तथा लगभग 12 प्रतिशत श्वेत लोग गरीब थे। शहरों में आवासहीनता अमरीका की दूसरी प्रमुख समस्या थी।
   युद्ध के बाद ढाई दशक से भी अधिक समय तक अमरीका को झकझोरने वाला प्रमुख मुद्दा नस्लवादी भेदभाव और असमानता का रहा है और वह आज भी बना हुआ है। अध्याय दो और तीन में आरंभिक काल में समानता के लिए काले लोगों द्वारा चलाया जाने वाला आंदोलन और उसके दमन की चर्चा की जा चुकी है। सन् 1950 के दशक में नागरिक अधिकारों को लेकर एक अत्यंत शक्तिशाली आंदोलन खड़ा हुआ और अगले दो दशकों में इसको उल्लेखनीय सफलता मिली। इस आंदोलन के प्रमुख लक्ष्य पृथकतावाद की समाप्ति तथा काले लोगों के साथ भेदभाव का खात्मा रहे हैं। इसके अलावा काले लोगों को अपने मत के उपयोग का अधिकार और उनकी गरीबी को समाप्त करना भी इसका लक्ष्य था। यहाँ तक कि अमरीकी फौजों में भी पृथकतावादी नीति का अनुसरण किया जाता था। ट्रूमन के राष्ट्रपतित्व काल में इस नीति को समाप्त किया गया था। संयुक्त राज्य अमरीका के दक्षिणी राज्यों में स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, बसें, रेलगाड़ियाँ, कॉफी हाउस, होटल, प्रेक्षागृह तथा अन्य नागरिक सेवा संबंधीं जगहों पर पृथकतावाद कायम था। काले लोग मतदाता सूची में भी नहीं शामिल किए जाते थे। सन् 1896 में उच्चतम न्यायालय ने पृथकवाद को कानूनी दर्जा प्रदान कर दिया था और ‘‘अलग लेकिन समान’’ जैसा खोखला सिद्धांत प्रतिपादित किया गया था। सन् 1954 में उसी उच्चतम न्यायालय ने इस सिद्धांत को अस्वीकार कर दिया और अपना मत इन शब्दों में व्यक्त किया, ‘‘हमारा निष्कर्ष है कि जनशिक्षा के क्षे़त्र में ‘अलग लेकिन समान’ के सिद्धांत के लिए कोई जगह नहीं है। अलग शिक्षा सुविधाओं में असमानता निहित होती ही है।’’ इससे काले लोगों के बच्चों ने उन स्कूलों में प्रवेश पाने का प्रयास किया जो पूरी तरह श्वेत लोगों के लिए थे। कुछ राज्यों के गवर्नरों ने इसको बलात् रोकने की कोशिश की। सन् 1957 में अरकनसास के लिटिल रॉक कस्बे के एक स्कूल में 17 काले बच्चों को प्रवेश के लिए चुना गया। स्कूल में प्रवेश करने से उन्हें रोकने के लिए स्कूल के बाहर उस राज्य के गवर्नर ने रक्षक खड़े कर दिए। मजबूर होकर संघ (केंद्र) की सरकार ने गवर्नर और रक्षकों को कानून तोड़ने से रोकने के लिए लिटिल रॉक कस्बे में 1000 पैरा टू्रपर सैनिक भेज दिए। ये सैनिक पूरे शिक्षा सत्र वहाँ पहरा देते रहे तथा एक वर्ष तक वहाँ डटे रहे। इसी प्रकार की एक घटना 1962 में घटी थी जब एक काले विद्यार्थी को मिसिसिपी विश्वविद्यालय में दाखिला मिला था।
   मार्टिन लूथर किंग नागरिक अधिकारों के लिए चलाए जाने वाले आंदोलनों के सबसे ताकतवर नेता थे। बहुत गहरे स्तर पर वे गाँधी जी से प्रभावित थे। पृथकतावाद के खिलाफ उन्होंने एक अहिंसक आंदोलन प्रारंभ किया। अलग राज्य के मांटागोमरी नगर से यह विरोध प्रारंभ किया गया। यहाँ पर काले लोगों ने बसों का बहिष्कार आरंभ किया। यह आंदोलन दूसरे क्षेत्रों में भी फैला और इसने नया रूप धारण किया। उदाहरण के लिए रेस्त्रां में लोग रास्ता रोककर धरने पर बैठने लगे। काले लोग पृथकतावाद को मानने वाले रेस्त्रां में जाकर बैठ जाते और खाने के आदेश देते तथा मना किए जाने पर अपनी जगह से उठने की बजाए चुपचाप बैठे रहते थे। इस आंदोलन में विद्यार्थियों ने काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे झुण्ड के झुण्ड निकल पड़ते। इनमें काले और गोरे दोनों ही छात्र शामिल होते। उन्होंने इसको ‘‘स्वतंत्र यात्रा’’ का नाम दे रखा था। वे नस्लीय भेदभाव तथा अलगाववाद के विरूद्ध अहिंसक तरीके से अपना रोष प्रकट करते थे। काले लोगों को मतदाता सूची में शामिल करने का भी एक जबरदस्त आंदोलन चलाया गया। इन आंदोलनों में भाग लेने वालों को कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, पुलिस के कारण उन्हें शारीरिक क्षति उठानी पड़ी, श्वेत लोगों के गुंडों की चोटें बर्दाश्त करनी पड़ीं। बहुतों की हत्या भी की गई। स्वतंत्रता के इन यात्रियों का प्रमुख गीत था, ‘‘हम होंगे कामयाब एक दिन।’’ सन् 1963 में वाशिंगटन डी. सी. (अमेरिका की राजधानी) में लिंकन स्मारक के सामने एक विशाल रैली का आयोजन किया गया। इसी रैली में मार्टिन लूथर किंग ने दिल को झकझोरने वाला अपना प्रसिद्ध व्याख्यान, ‘‘मैंने एक सपना संजोया है’’ दिया था। इसके बाद के सालों में नागरिक अधिकारों को कानूनी अधिकारों के रूप में मान्यता दिलाने में मदद मिली। हालाँकि अपने आप में कानूनी अधिकारों का कोई अर्थ नहीं था, न ही वे प्रभावी थे और धीरे-धीरे नागरिक अधिकारों का आंदोलन उग्र रूप ग्रहण करता गया। नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले अनेक नेता युद्ध विरोधी आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे। ‘काली शक्ति’ (ब्लैक पावर) कहा जाने वाला एक उग्रवादी आंदोलन भी जोर पकड़ने लगा। सन् 1968 में मार्टिन लूथर किंग की हत्या कर दी गई। अमरीका के कई शहरों में इस हत्या की प्रतिक्रिया में प्रजातीय (रेशियल) दंगे भड़क उठे। सन् 1964 का नोबल शांति पुरस्कार मार्टिन लूथर किंग को दिया गया। ‘‘अंतर्राष्ट्रीय भाई चारे’’ का जवाहरलाल नेहरू पुरूस्कार उनके मरणोपरांत दिया गया।
   इसी प्रकार के आंदोलन अमरीकन इंडियन तथा हिस्पानी लोगों में भी उठ खड़े हुए थे। अमरीकी इंडियन लोगों की उस समय जनसंख्या लगभग दस लाख और हिस्पानी लोगों की एक करोड़ पचास लाख थी। सन् 1960 के दशक में मूलगामी परिवर्तन का पक्षधर एक नया गुट उभरने लगा। इनमें मुख्य रूप से नौजवान और बुद्धिजीवी लोग शामिल थे। इनके अस्तित्व में आने और ऊपर उठने में मुख्य कारक वियतनाम युद्ध था। इसके कारण एक शक्तिशाली युद्ध विरोधी आंदोलन भड़क उठा था। विश्वविद्यालयों में युद्ध विरोधी प्रदर्शन हुए। हजारों की संख्या में छात्रों ने फौज में जाने से मना कर दिया। कई कनाडा या अन्य देशों में भाग गए। विश्वविद्यालय परिसरों में हिंसा की अनेक वारदातें हुईं और कई जगहों पर प्रदर्शनों को दबाने के लिए पुलिस को पाश्विक तरीके अपनाने पड़े। अकेले केंट स्टेट विश्वविद्यालय में पुलिस की गोली से चार विद्यार्थी मारे गए। बाद में चल कर मूलगामी परिवर्तन का पक्षधर गुट विश्व स्तर के शांति, निरस्त्रीकरण तथा पर्यावरण संरक्षण आदि जैसे मुद्दों से अधिकाधिक जुड़ता गया।

सोवियत संघ

  फासीवाद को पराजित कर द्वितीय विश्व युद्ध को समाप्त करने में सोवियत संघ द्वारा निभाई गई भूमिका की प्रशंसा पूरी दुनिया की फासीवादी ताकतों ने की। सोवियत जनता के द्वारा लड़ा गया युद्ध उनके लिए ‘‘महान् देश भक्तिपूर्ण युद्ध’’ (दि ग्रेट पैट्रियॉटिक वार) था। इसको जीतने के लिए उन्होंने हर संभव बलिदान किए। पहले यह बताया जा चुका है कि इस युद्ध में लगभग दो करोड़ (बीस मीलियन) लोग मारे गए थे। इस युद्ध के कारण उसकी अर्थव्यवस्था को जिस विनाश के दौर से गुजरना पड़ा, दुनिया के इतिहास में उसकी और कोई मिसाल नहीं है। सोवियत संघ के लगभग 70,000 गाँव तथा 1,700 नगर नष्ट कर दिए गए थे। हजारों की संख्या में औद्योगिक प्रतिष्ठानों को मिट्टी में मिला दिया गया था और विशाल भू-क्षेत्र बंजर हो गया था। युद्ध समाप्त होते ही सोवियत संघ ने बहुत बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण का काम शुरू कर दिया। सन् 1946 में चौथी पंचवर्षीय योजना आरंभ की गई और 1940 के दशक के अंत के पहले औद्योगिक उत्पादन को युद्ध पूर्व की अवस्था तक ला खड़ा किया गया था। कृषि के अधिक यंत्रीकरण तथा बड़े-बड़े सामूहिक फार्मों के द्वारा 1950 के दशक के आरंभ होने के समय तक कृषि उत्पादन को भी युद्ध पूर्व की स्थिति तक पहुँचा दिया गया था। बाद के सालों में भी पंचवर्षीय योजनाओं के जरिए सोवियत अर्थव्यवस्था का विकास चलता रहा और सफल राष्ट्रीय उत्पाद की दृष्टि से विश्व में यह दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई।
   बहरहाल अपनी संवृद्धि के बावजूद सोवियत अर्थव्यवस्था कुछ गंभीर समस्याओं से लगातार जूझती रही। भारी उद्योगों पर ज्यादा जोर देने के कारण आधारिक ढाँचा खड़ा करने में तो मदद मिली लेकिन उपभोक्ता सामग्री बनाने वाला उद्योग, आवश्यकता पूरी करने वाली सामग्री बनाने में काफी पीछे रह गया। इस असंतुलन या अनुपातहीनता का नतीजा यह हुआ कि अपनी आर्थिक शक्ति के बावजूद जनता के रहन-सहन का स्तर पश्चिम के विकसित देशों की तुलना में काफी नीचे रह गया। यहाँ तक कि आर्थिक विकास की दृष्टि से भी 1980 के दशक के मध्य में सोवियत नेता यह मानने लगे कि कई सालों से अर्थव्यवस्था स्थिर खड़ी है। उसमें विकास नहीं हो रहा है। कृषि उत्पादन के क्षेत्र की असफलता अधिक प्रमुखता से सामने आई थी। प्रोद्योगिक के विकास की दृष्टि से, सुरक्षा और अंतरिक्ष अनुसंधान क्षेत्रों के अलावा कुछ उन्नत पूँजीवादी देशों से सोवियत संघ काफी पीछे रह गया था। तकनीकी और वैज्ञानिक मानवशक्ति में सोवियत संघ किसी भी दूसरे देश से बहुत आगे था लेकिन इसके बावजूद वह स्थिति पैदा हो गई थी जिसका ऊपर उल्लेख किया जा चुका है।
   सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था की असफलता का दोष उस पद्धति के सिर मढ़ा जाता है जिसे ‘‘आदेश पद्धति’’ (कमाण्ड सिस्टम) कहा जाता है। जिस प्रकार की आर्थिक योजना सोवियत संघ में लागू की गई, उसके कारण अतिकेंद्रीयकरण हुआ और इसने व्यक्तिगत औद्योगिक प्रतिष्ठानों की पहल को हर स्तर पर निर्जीव कर दिया। उद्योग के कुछ हिस्सों में ऐसे माल का उत्पादन किया गया था जिसकी कोई माँग नहीं थी। उत्पादों की कीमत नकली तरीके से तय की जाती थी। इससे अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ बढ़ा। पिछले पाँच सालों से सोवियत संघ में गंभीर बहस चल रही है कि सोवियत अर्थव्यवस्था के दोषों को दूर करने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए और इसको जनता की जरूरतों के अनुकूल कैसे बनाया जा सकता है।
   जिस एक क्षेत्र में सोवियत संघ कमोबेश अमरीका के बराबर है, वह है सैनिक क्षमता। दूसरे क्षेत्रों की तुलना में सैनिक आवश्यकता से संबंधित प्रौद्योगिकी में विकास का स्तर काफी ऊँचा है तथा विश्व की श्रेष्ठतम प्रौद्यौशिकी से उसकी तुलना हो सकती है। अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़े विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के विकास के बारे में भी यही बात सच है। वास्तव में एक समय सोवियत संघ का अंतरिक्ष अनुसंधान संयुक्त राज्य अमरीका के अंतरिक्ष अनुसंधान से आगे माना जाता था जैसा कि अंतरिक्ष में प्रथम उपग्रह के छोड़ने से स्पष्ट था और बाद में पहले-पहल मनुष्ययुक्त उपग्रह के छोड़ने से भी यह बात जाहिर होती है। इसके बाद कास्मोनट्स को लंबी अवधि तक अंतरिक्ष में रखा गया जिनको बाद के सालों में अंतरिक्ष में भेजा गया था। सेना के ऊपर बहुत अधिक मात्रा में व्यय तथा शस्त्र प्रौद्योगिकी ने सोवियत सैनिक ताकत को संयुक्त राज्य अमरीका के बराबर कर दिया है। किसी समय यह न्यायोचित भी था क्योंकि यह अमरीका को अपनी इच्छा दूसरों पर थोपने से रोकता था। लेकिन उत्पादन और उपयोगी क्षेत्रों से विशाल संसाधनों को दूसरी दिशा में मोड़ कर सोवियत अर्थव्यवस्था को कमजोर करने में यह एक प्रमुख कारक रहा है।
   बोल्शेविक क्रांति के बाद की सोवियत संघ की राजनीतिक गतिविधियों की कुछेक विशेषताओं की चर्चा पूर्व में की जा चुकी है। सन् 1930 के दशक के आखिरी सालों में आकर सोवियत संघ की राजनीति और प्रशासन पर स्तालिन की पकड़ मजबूत हो चुकी थी। युद्ध के बाद उनके निरंकुश शासन की कठोरता में कोई कमी नहीं हुई थी। स्तालिन ने सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेता के रूप में शासन किया। लेकिन लगता है कि कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर के विभिन्न निकायों की ताकत कम हो गई थी। मसलन केंद्रीय समिति, पार्टी कांग्रेस और पोलितब्यूरो को रबर की मुहर बना दिया गया था जब इनमें स्तालिन के निर्णयों की पुष्टि भर की जाती थी। पार्टी संविधान के अनुसार हर चार वर्ष बाद पार्टी कांग्रेस आयोजित की जानी चाहिए थी। लेकिन 13 साल के अंतराल के बाद 1952 में पार्टी कांग्रेस आयोजित की गई। सन् 1930 और 1940 के दशकों के दौरान बोल्शेविक क्रांति का लगभग प्रत्येक नेता या तो मर गया अथवा उसका सफाया कर दिया गया। दमनकारी व्यवस्था को सांस्थानिक दर्जा मिल गया था। हर विरोध को षड़यंत्र समझा जाता था। हजारों लोग श्रम शिविरों में भेजे गए तथा हजारों जेलों में सड़ना पड़ा। सोवियत सुरक्षा पुलिस दमन की नीति का महत्वपूर्ण औजार थी। दमन से बुद्धिजीवियों के जीवन को बहुत अधिक क्षति पहुँची। कला, संस्कृति और विज्ञान भी इससे प्रभावित हुए। सोवियत संघ में जीव विज्ञान को भी भारी नुकसान हुआ। इसकी वजह भी दमनकारी नीतियों को बताया गया है। स्तालिन सोवियत जीव विज्ञान में बुर्जुआ प्रवृत्ति देख रहे थे। राज्य की तरफ से एक जीवविज्ञानी को मदद मिल रही थी जिसके सिद्धांतों को मार्क्सवादी अथवा कहना चाहिए, स्तालिनवादी का मार्क्सवादी रूप, माना जा रहा था। हाल की रपटों में कहा गया है कि सोवियत संघ में भौतिकी की भी वही गति होते-होते बच गई, क्योंकि बहुत से भौतिकीविद् जिन्हें बुर्जुआ प्रभाव का शिकार बताया जाता था, वे अणु बम परियोजना में काम कर रहे थे और उनको हटाने से वह योजना खटाई में पड़ सकती थी। जनवरी 1953 में 9 डॉक्टरों पर एक सोवियत नेता की हत्या का आरोप लगाया गया जिसका देहांत 1948 में हुआ था। यह भी आरोप लगाया गया कि इन डॉक्टरों ने कुछ उच्च सैनिक अधिकारियों का स्वास्थ्य नष्ट करने का भी षड्यंत्र रचा था, जो अधिकारी इनकी देखरेख में अपनी चिकित्सा करा रहे थे, इनको गिरफ्तार कर लिया गया। इनकी गिरफ्तारी को दूसरी दमनकारी कार्रवाई का प्रस्थान बिंदु माना जा रहा था, लेकिन 9 मार्च 1953 को स्तालिन का देहांत हो गया।
   स्तालिन के देहांत के तत्काल बाद कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। सितंबर 1953 में निकिता खुश्चेव सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रथम सचिव नियुक्त किए गए। सन् 1958 में वे प्रधानमंत्री भी हो गए। यद्यपि इन दोनों पदों पर एक साथ होने की वजह से खुश्चेव का पार्टी और सरकार पर असाधारण नियंत्रण था, लेकिन इससे वे तानाशाह शासक नहीं बन सके। इस समय पार्टी तथा सरकार पर सामूहिक नेतृत्व का नियंत्रण था। यह उस समय साबित हो गया जब 1964 में खुश्चेव को नेतृत्व से अलग कर दिया गया और लियोनिद ब्रेझनेव पार्टी के प्रथम सचिव बनाए गए तथा अलेक्सेई कोसिगिन को प्रधानमंत्री बनाया गया।
   स्तालिन के देहांत के शीघ्र बाद बड़े पैमाने पर दमन की नीति का अंत हो गया। डॉक्टरों को रिहा कर दिया गया और बताया गया की उनकी गिरफ्तारी गैर कानूनी थी। राज्य के विरूद्ध जिन हजारों लोगों पर आरोप लगाए गए थे और जिनको श्रम शिविरों और जेलों में भेजा गया था, उन सबको रिहा कर दिया गया तथा उनके पुनर्वास की व्यवस्था की गई। फरवरी 1956 में सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी की बीसवीं कांग्रेस हुई। इस कांग्रेस को सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों में महत्वपूर्ण परिवर्तनों के लिए याद किया जाता है। इसने घरेलू और विदेश नीति में, आर्थिक और राजनीतिक नीतियों में परिवर्तन किए। खुश्चेव ने पार्टी तथा जनता के विरूद्ध स्तालिन द्वारा किए गए अपराधों के बारे में इस कांग्रेस में एक रिपोर्ट पेश की थी। यद्यपि यह रिपोर्ट कांग्रेस की एक गुप्त बैठक में पढ़ी गई थी और इसको जारी नहीं किया गया था, लेकिन इसका सांराश जल्दी पूरी दुनिया को मालूम हो गया। इन परिवर्तनों के कारण वहाँ लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रणाली की स्थापना तो नहीं हुई और न ही पूरे तौर पर बुद्धिजीवियों और नागरिकों की स्वतंत्रता की बहाली हुई लेकिन बड़े पैमाने पर दमन और आतंक का युग अवश्य समाप्त हो गया। इन परिवर्तनों को प्रतीकात्मक रूप से दो साहित्यिक रचनाओं में देखा जा सकता है पहली रचना ईलिया एहरेन बुर्ग की पुस्तक दि था (बर्फ का पिघलना) और दूसरी सोल्झेनित्सिन की पुस्तक वन डे इन दि लाइफ ऑफ इवान डेनिसोविच (इवान डेनिसोविच के जीवन का एक दिन) है। इसमें श्रम शिविर की जिंदगी का चित्रण किया गया है। बहरहाल नागरिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध बने रहे, प्रकाशनों, विदेश यात्राओं आदि पर भी प्रतिबंध जारी रहा। इनके अलावा बीसवीं कांग्रेस के लगभग तीस वर्ष बाद तक अनेक दमनात्मक उपायों का उपयोग किया जाता रहा। सन् 1985 में उस समय दमनात्मक व्यवस्था पूरी तरह समाप्त कर दी और सच्ची लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित की गई जब मिखाइल गोर्बाचोव को पार्टी का नेता चुना गया और अभी हाल में उन्हें सोवियत संघ का राष्ट्रपति भी चुना गया है।
   सोवियत संघ की विदेश नीति को इस तथ्य ने बड़े गहरे स्तर पर प्रभावित किया है कि अपनी स्थापना के एकदम शुरू से ऐसे देशों से घिरा हुआ था जो उसका खुल्लम खुल्ला विरोध कर रहे थे। जिस सामाजिक-आर्थिक प्रणाली की वह रचना का प्रयास कर रहा था, उसके भी वे विरोधी थे। सन् 1920 और 1930 के दशक में वह अकेली प्रमुख शक्ति था जिसने उपनिवेशों के लोगों को उनके स्वतंत्रता संग्राम में पूरा समर्थन दिया। सन् 1930 के दशक के दौरान वह लगातार फासीवाद तथा फासीवादी अनाक्रमण का विरोध करता रहा था। उसके रूख में तब परिवर्तन आया जब जर्मनी के साथ उसने अनाक्रमण संधि पर हस्ताक्षर किए। इस दौरान उसके प्रमुख सहयोगी थे, विभिन्न देशों की कम्युनिस्ट पार्टियाँ जो सोवियत संघ के एक मात्र समाजवादी देश की रक्षा करना अपना महत्वपूर्ण कर्तव्य मानतीं थीं। युद्ध के दौरान उसकी साख दुनिया में काफी बढ़ गई लेकिन पूर्वी यूरोप में उसने जो नीतियाँ अख्तियार कीं, उनके चलते उसकी इस साख को धक्का लगा। इन देशों में सोवियत संघ की मदद से कम्युनिस्ट पार्टियों की सरकारें स्थापित हुईं। यद्यपि इन अधिकांश देशों में कम्युनिस्टों को काफी जनसमर्थन हासिल था, लेकिन यह जनसमर्थन बहुमत का नहीं था। इसके परिणामस्वरूप इन कम्युनिस्ट पार्टियों ने जनता में अपनी साख खो दी। अब जनता में उनकी वह साख नहीं रही जो जनता को मुक्त कराने के दौरान तथा मिलीजुली सरकारों में भागीदारों के रूप में थी, जब मुक्ति के बाद इन सरकारों का गठन किया गया था। बाद में चलकर स्तालिन के प्रभाव और दबाव में उसी प्रकार की दमनात्मक व्यवस्था इन देशों में भी कायम की गई जैसी व्यवस्था स्तालिन ने रूस में बनाई थी। सन् 1948 में विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन से यूगोस्लाविया को निकाल दिया गया। इस घटना के बाद पूर्वी यूरोप के देशों में कुछ महत्वपूर्ण और नामी कम्युनिस्ट नेताओं को मार्शल टीटो का एजेंट होने के आरोप में निकाला गया था। टीटो यूगोस्लाविया के प्रमुख कम्युनिस्ट नेता थे। उनमें से बहुतों को जेल की सजा हुई और कुछ को फाँसी की सजा दी गई। इस पूरे दौर में और स्तालिन की मृत्यु तक पूर्वी यूरोप की सरकारों तथा कम्युनिस्ट पार्टियों के कार्यां में हस्तक्षेप की नीति जारी रही। कहा जा सकता है कि स्तालिन को यह नीति अमरीकी ‘‘विरोध नीति’’ की प्रतिक्रिया स्वरूप अपनानी पड़ी थी। युद्ध के तत्काल बाद के दौर में कई देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों ने क्रांति करने का प्रयास किया था। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इनमें से कई प्रयास स्तालिन के इशारे पर किए गए थे। यह बात याद रखने की है कि इस दौर में सभी साम्राज्यवादी देशों के पीछे अमरीकी सैनिक शक्ति का सहारा था। संयुक्त राज्य अमरीका ने अनेक देशों में राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी सरकारों को दबाने के लिए और कुलीनतंत्रीय और राजतंत्रीय सरकारों की स्थापना के लिए बहुधा अपनी सैनिक शक्ति का उपयोग किया। शीत युद्ध को ठंडा करने के लिए महाशक्तियों के टकराव की स्थिति को समाप्त करने के लिए सोवियत नीति ने कुछ खास नहीं किया।
   स्तालिन की मृत्यु के बाद सोवियत विदेश नीति में एक बहुत महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। सहअस्तित्व पर नए सिरे से काफी बल दिया जाने लगा। यह एक महत्वपूर्ण बदलाव था। अलग-अलग समाज व्यवस्था, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था वाले देशों के बीच सह-अस्तित्व की नीति अपनाने की बात कही गई थी। हाल में स्वतंत्र हुए भारत जैसे देश द्वारा अपनाई गई गुट निरपेक्षता की नीति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की नीति थी और जहाँ तक सोवियत विदेश नीति का प्रश्न है, उसमें यह खुश्चेव का योगदान था। सदा से कम्युनिस्टों का विश्वास रहा है कि यद्यपि वे राष्ट्रीय नीति के उपकरण के रूप में युद्ध का विरोध करते हैं, लकिन जब तक साम्राज्यवाद इस धरती पर कायम है, युद्ध का होना अवश्यंभावी है। शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को मानने का अर्थ है, युद्ध की अपरिहार्यता के सिद्धांत से भटकना। गुट निरपेक्ष आंदोलन के नेताओं के साथ सोवियत संघ के नेता इस बात पर जोर देते थे कि वर्तमान विश्व में युद्ध का मतलब होगा पूरी मानवता का विनाश, इसलिए इसकी जगह सहअस्तित्व की नीति अपनाई जानी चाहिए इसके साथ ही भिन्न-भिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था वाले देशों के बीच शांतिपूर्ण प्रतिस्पर्धा की नीति चलनी चाहिए। सन् 1950 के दशक के उत्तरार्ध के बाद की पूरी अवधि में निरस्त्रीकरण के लिए सोवियत संघ ने कई अत्यंत महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखे लेकिन जैसा पहले बताया जा चुका है कि निरस्त्रीकरण की दिशा में युद्ध को समाप्त करने के लिए प्रयास में बहुत कम प्रगति हुई है। यहाँ पर इस बात का जिक्र करना आवश्यक लगता है कि गुट निरपेक्ष आंदोलन द्वारा की गई तमाम पहलों का सोवियत संघ ने बराबर समर्थन किया है और कुछ गुट निरपेक्ष देशों ने तो यह राय जाहिर की कि सोवियत संघ तथा अन्य समाजवादी देश गुट निरपेक्ष आंदोलन के ‘‘स्वाभाविक सहयोगी’’ हैं। सोवियत विदेश नीति अनेक नवस्वाधीन राष्ट्रों की राष्ट्रीय स्वतंत्रता को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण घटक बन गई। सोवियत संघ की रसद तथा राजनीतिक मदद से अनेक स्वाधीनता आंदोलन चलाए गए। अपनी अर्थव्यवस्था के निर्माण के प्रयास में भी सोवियत संघ ने इन देशों की मदद की। शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की वकालत कम्युनिस्ट आंदोलन में फूट का प्रमुख कारण थी। इसकी प्रक्रिया 1950 के दशक के उत्तरार्ध में आरंभ हुई। माओ त्से-तुंग के नेतृत्व में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का युद्ध की अपरिहार्यता के सिद्धांत में विश्वास जारी रहा। माओ त्से-तुंग ने कहा था कि यद्यपि करोड़ों लोग नाभिकीय युद्ध में मारे जाएँगे लेकिन समाजवाद की विजय होगी। कुछ चीनी कम्युनिस्ट नेताओं और दूसरे देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों में उनके समर्थकों का विचार था कि शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की नीति से समाजवादी क्रांति के लिए चलने वाला संघर्ष कमजोर होगा।
   शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की नीति पर चलने के बावजूद संयुक्त राष्ट्र अमरीका की बराबरी में बने रहने के लिए सोवियत संघ ने संहारक शस्त्रों के निर्माण का कार्य भी जारी रखा, यद्यपि नाभिकीय, सामान्य और संपूर्ण रूप से निरस्त्रीकरण के लिए प्रस्ताव रखना उसने जारी रखा। इतना ही नहीं, उसने कई एकतरफा निर्णय भी लिए। उदाहरण के लिए, सोवियत संघ ने घोषणा की कि वह कभी भी नाभिकीय शस्त्रों के इस्तेमाल की पहल नहीं करेगा तथा उसने संयुक्त राज्य अमरीका से अपील की कि वह भी इसी तरह की प्रतिबद्धता जाहिर करे। उसने नाभिकीय शस्त्रों का भूमिगत परीक्षण बंद कर दिया और घोषणा की कि यदि संयुक्त राज्य अमरीका इस प्रकार के परीक्षण बंद कर दे तो वह भविष्य में कभी भी परीक्षण नहीं करेगा। लेकिन अमरीका की ओर से एकतरफा पहल किए जाने की इन कोशिशों का कोई रचनात्मक जवाब नहीं मिला।
   अनेक वर्षों तक पूर्वी यूरोप के प्रति सोवियत संघ की नीति में हुए परिवर्तन उन परिवर्तनों की तुलना में अपेक्षाकृत कम मूलगामी थे, जिनका उल्लेख अभी ऊपर किया गया है। हम पहले ही बता चुके हैं कि दो अवसरों पर-1956 में हंगरी में और 1968 में चैकोस्लोवाकिया में- रूस ने बड़े पैमाने पर सैनिक हस्तक्षेप किए थे। इनका मकसद इन देशों के कम्युनिस्ट नेतृत्व में परिवर्तन करना था, जो अपने देश की नीतियों को अधिक लोकतांत्रिक दिशा की ओर मोड़ना चाहता था। वास्तव में ब्रेझनेव पार्टी के प्रथम सचिव के पद पर खुश्चेव को हटाकर आए थे। वे ही बाद में सोवियत संघ के राष्ट्रपति भी बन गए थे। उन्होंने घोषणा की थी कि दूसरे समाजवादी देश के मामले में किसी समाजवादी देश का हस्तक्षेप करना उसका कर्तव्य है, यदि उस देश में समाजवाद के अस्तित्व को कोई खतरा उत्पन्न हो गया हो।
   90 के दशक में सोवियत संघ में जो परिवर्तन हुए हैं, इसको कुछ लोग अकसर सोवियत संघ की दूसरी क्रांति की संज्ञा दे रहे हैं। बहुत से प्रश्न अब खुलकर सामने आए हैं और उन पर खुलकर गंभीर और स्वतंत्र बहस चल रही है। इस बहस में सोवियत संघ का वर्तमान गणनात्मक स्वरूप भी एक मुद्दा है। सोवियत संघ में इस समय जो कुछ हो रहा है, उसमें लगभग सारी चीजों के प्रति काफी अनिश्चय की स्थिति अभी बनी हुई है। बहरहाल इसमें बहुत शक की गुंजाइश नहीं है कि यह बताना संभव है कि 1990 में शीत युद्ध हमेशा के लिए समाप्त हो चुका है और इस सदी में पहले की तुलना में संसार शांतिपूर्ण विकास की दिशा में अधिक बढ़ता जाएगा और यह इसलिए संभव है कि इस देश के नए नेतृत्व ने नई नीतियाँ अख्तियार की हैं जिसके प्रधान मिखाईल गोर्बाचोव हैं। जैसे यह पुस्तक छपने की अंतिम अवस्था में पहुँची, सूचना मिली कि गोर्बाचोव को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह किसी राष्ट्राध्यक्ष को दिया जाने वाला दूसरा सम्मान है। 84 साल पहले अमरीकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट को पहली बार यह सम्मान प्राप्त हुआ था। बहरहाल नोबेल पुरस्कार से सम्मानित दो राष्ट्राध्यक्ष व्यक्तित्व के लिहाज से एकदम मित्र हैं, उनके प्रयास और उपलब्धियाँ भी एक दूसरे से नितांत भिन्न हैं।

यूरोप

  यूरोप में युद्ध के बाद के दौर में घटी घटनाओं के कुछ पहलुओं पर हम पहले ही विचार कर चुके हैं। इसे पूरी तरह समझने के लिए हर देश के बारे में पृथक-पृथक कुछ विस्तार से बताना आवश्यक होगा लेकिन यहाँ कुछ प्रमुख विशेषताओं के संक्षिप्त सर्वेक्षण का प्रयास ही किया गया है। पहले यह बताया जा चुका है कि युद्धोत्तर यूरोप की प्रमुख विशेषता यूरोप का बँटवारा है। इस बँटवारे में एक तरफ पूर्वी यूरोप के देश हैं जिनमें कम्युनिस्ट शासन है और जो सोवियत संघ से जुड़े हुए हैं और दूसरी ओर यूरोप के अन्य देश हैं, उनमें भिन्न-भिन्न प्रकार की लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्थाएँ हैं और ये संयुक्त राज्य अमरीका से जुड़े हुए हैं। बाद के देशों में अपवाद, यूरोप के तीन पिछड़े हुए देश थे, वे थे - स्पेन तथा पुर्तगाल और काफी वर्षां तक ग्रीस भी था पुर्तगाल में सालाजार का तानाशाही शासन कायम था, जिसकी स्थापना 1922 में हुई थी और 1968 तक बनी रही। स्वास्थ्य खराब होने के कारण उसने पद त्याग दिया। पुर्तगाल के समाजवादियों कम्युनिस्टों तथा दूसरे लोकतंत्रवादियों की मदद से सेना के कनिष्ठ अधिकारियों के एक गुट ने तानाशाही सरकार का तख्ता पलट दिया तथा एक नया लोकतांत्रिक संविधान लागू किया गया। गृह युद्ध में फ्रैंको की विजय के बाद स्पेन में स्थापित फासीवादी तानाशाही 1975 तक उसके मृत्यु पर्यंत कायम रही। उसकी मृत्यु के बाद उदारीकरण का दौर शुरू हुआ तथा राजनीतिक बंदियों की रिहाई भी शुरू हुई। चालीस वर्षों के बाद 1977 में पहली बार स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव वहाँ हुए। इस देश में स्पेन की समाजवादी पार्टी प्रमुख ताकत के रूप में उभर कर सामने आई। ग्रीस में गृह युद्ध की समाप्ति के बाद कोई स्थिर लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था नहीं कायम हुई। सन् 1967 में सेना अधिकारियों के एक गुट ने सत्ता पर कब्जा कर लिया। इसके बाद वहाँ एक अत्याचारी शासन की स्थापना हुई। कई सालों तक लोकतंत्र की बहाली ग्रीस की राजनीति में प्रमुख मुद्दा था जो यूरोप के लोगों को आंदोलित किए हुए था। कई मशहूर संस्कृति और राजनीति कर्मी देश छोड़ कर बाहर भाग गए और बहुत से ग्रीस की जेलों में सड़ते रहे। देश के भीतर जहाँ एक प्रतिरोधी आंदोलन उठ खड़ा हुआ, वहीं देश के बाहर जबरदस्त विरोध प्रदर्शनों के द्वारा इसका समर्थन किया गया। सन् 1974 में ग्रीस में सैनिक तानाशाही सरकार का पतन हुआ तथा पुनः ग्रीस को गणतंत्र घोषित किया गया।
   यूरोप के तीन देशों में और साथ ही कुछ अन्य देशों में खासतौर पर इटली और फ्रांस में भी समाजवादी और कम्युनिस्ट मुख्य शक्ति थे यद्यपि हाल के वर्षों में इटली और फ्रांस में कम्युनिस्ट पार्टियों का असर कम हुआ है। पश्चिम जर्मनी और यूरोप के अन्य अनेक देशों में समाजवादी लोकतांत्रिक पार्टियाँ प्रमुख राजनीतिक पार्टियाँ रही हैं और बहुधा अकेले अथवा किसी दूसरे दल के साथ मिलकर शासन में भागीदार रही हैं। ब्रिटेन में लेबर पार्टी अलग-अलग समय पर सत्ता में रही है। दूसरे विश्व युद्ध ने यूरोप की जनता की सोच पर मूलगामी प्रभाव डाला था। यूरोप के कई देशों में द्वितीय विश्व युद्ध के तत्काल बाद वामपंथी सरकारें सत्ता में आईं। सन् 1947 तक फ्रांस तथा इटली में कम्युनिस्ट भी सरकार के अंग थे। इन सरकारों ने बहुत से महत्वपूर्ण कानून बनाए जिनसे कई तरह की भयंकर असमानताओं को समाप्त करने में मदद मिली। ये असमानताएँ युद्ध पूर्व के अधिकांश यूरोपीय समाजों का प्रमुख लक्षण थीं। इन देशों में उद्योगों के कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। यहाँ पर श्रमिक यूनियनें काफी ताकतवर थीं। इससे कल्याणकारी कार्यक्रमों को बंद करना संभव नहीं हो सका, यहाँ तक कि जब रूढ़िवादी अथवा मध्यमार्गी सरकारें सत्ता में आईं तब भी समाजवादियों द्वारा चालू किए गए कल्याणकारी कार्यक्रम चलते रहे।
   ‘यूरोपीय पुनर्निर्माण कार्यक्रम’ (यूरोपियन रिकवरी प्रोग्राम) की बात हम पहले कर चुके हैं। इस कार्यक्रम से यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं को युद्ध पूर्व स्थिति में लौटने में मदद मिली अर्थात् उनके विकास का जो स्तर युद्ध के पहले था सुधार कर उस स्तर तक वे अपने को ले आई। इसके बाद इनकी अर्थव्यवस्था का जबरदस्त विकास हुआ जिसमें फ्रांस तथा पश्चिम जर्मनी तो औद्योगिक महाशक्ति के रूप में उभरे। खास तौर पर पश्चिमी जर्मनी का आर्थिक विकास तो अद्भुत था। इसने यूरोप के सभी दूसरे देशों को काफी पीछे छोड़ दिया। पूर्वी यूरोप के देशों को ‘यूरोपीय पुनर्निर्माण कार्यक्रम’ का फायदा नहीं मिला। उन्हें मुख्यतः अपने निजी संसाधनों पर ही निर्भर रहना पड़ा। सोवियत संघ उस स्थिति में नहीं था कि वह उतने बड़े पैमाने पर इनकी मदद कर सके, जिस बड़े पैमाने पर पश्चिमी यूरोप के देशों को अमरीकी मदद मिली थी। इनमें से अधिकांश देश पिछड़ी अर्थव्यवस्था वाले कृषि प्रधान देश थे। फासीवादी शासन और फासीवादी कब्जे के दौरान इनको तहस-नहस भी किया गया था। बहरहाल इन देशों के भीतर हाल में हुई उथल-पुथल को देखते हुए यह लगता है कि इन देशों में हुए महत्वपूर्ण विकास की अपेक्षा की गई है। यद्यपि यह भी सच है कि इनका आर्थिक विकास का स्तर पश्चिम यूरोपीय देशों के बराबर नहीं था। आर्थिक रूप से इन पिछड़े हुए देशों का औद्योगीकरण इनकी महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। एक ओर जहाँ सोवियत रूस जैसी अर्थव्यवस्था इनके ऊपर थोप दी गई जिससे इनका आर्थिक विकास अवरूद्ध हुआ, वहीं कुछ व्यक्तियों के हाथ में आर्थिक शक्ति के केंद्रीयकरण से पैदा होने वाली बुराइयों से ये देश बचे रहे। इन देशों में पुराने बड़े भू-स्वामी आदि जैसे शासक वर्गों को समाप्त कर दिया गया। पूर्वी जर्मनी का आर्थिक विकास विशेष रूप से महत्वपूर्ण था। यह देश इस क्षेत्र का प्रमुख औद्योगिक देश बन गया था। यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इन देशों की समाजवादी अर्थव्यवस्थाएँ क्या रूप अख्तियार करेंगी। यह भी कहना मुश्किल है कि इन देशों में अब कम्युनिस्ट पार्टियों का शासन समाप्त हो गया है। युद्ध के बाद अनेक वर्षां तक यूरोप के शीत युद्ध का मुख्य केंद्र बना रहा। यूरोप के शीत युद्ध के प्रमुख मुद्दों की चर्चा की जा चुकी है। पश्चिमी यूरोप के अधिकांश देश नाटो संगठन के सदस्य थे और उन सदस्य देशों की धरती पर नाटो के सैनिक थे और सैनिक अड्डे भी थे जो नाभिकीय शस्त्रों और प्रक्षेपास्त्रों से लैस थे। इन शस्त्रों तथा प्रक्षेपास्त्रों को अमरीका ने वहाँ तैनात कर रखा था। इनसे यूरोप में और अधिक तनाव पैदा हुआ। यूरोप में शांति आंदोलनों की प्रमुख माँग नाटो के प्रक्षेपास्त्र अड्डों को समाप्त करने की थी, जो 1950 के दशक के उत्तरार्ध में काफी शक्तिशाली बन गया था। ब्रिटेन तथा फ्रांस ने अपने निजी नाभिकीय शस्त्रों का विकास करना आरंभ कर दिया। इसी को इन लोगों ने ‘‘स्वतंत्र प्रतिरोधक’’ की संज्ञा दी थी। अभी भी ब्रिटेन का इस बात में यकीन बना हुआ था कि वह विश्व की महान शक्ति है और इसलिए यह उसके लिए जरूरी था कि उसके पास संयुक्त राज्य अमरीका द्वारा उसके भू-भाग पर लगाए गए शस्त्रों के अलावा अपने नाभिकीय हथियार हैं। यूरोप में सबसे शक्तिशाली शांति आंदोलन ब्रिटेन में प्रारंभ हुआ था। इसका नेतृत्व ‘‘नाभिकीय निरस्त्रीकरण अभियान’’ नामक संगठन कर रहा था। इसने ब्रिटेन स्थित संयुक्त राज्य अमरीकी ठिकानों को खत्म करने की माँग की। इसने यह भी माँग रखी कि ब्रिटेन को एक तरफा नाभिकीय निरस्त्रीकरण कर देना चाहिए।
   युद्ध के बाद युरोप की स्थिति में जो बदलाब आया उसकी मुख्य विशेषता यह थी कि विश्व के ऊपर उसका वर्चस्व समाप्त हो गया। युद्ध समाप्त होने के दो दशकों के भीतर ही एशिया और अफ्रीका में अधिकांश यूरोपीय साम्राज्य ध्वस्त हो गए। यूरोप के साम्राज्यवादी देश अपना साम्राज्य छोड़ने के इच्छुक नहीं थे और कुछ मामलों में तो वे राष्ट्रवादी आंदोलन के साथ लंबे युद्ध में उलझ गए। उदाहरण के लिए 1947-54 के बीच फ्रांस हिंदचीन को अपने अधीन बनाए रखने के लिए लगातार युद्ध करता रहा और इसी तरह अल्जीरिया में उसने 1954-62 तक युद्ध किया। यह बात विचित्र लग सकती है लेकिन सच है कि सबसे पिछड़े हुए साम्राज्यवादी यूरोपीय देश पुर्तगाल ने सबसे लंबी अवधि तक अपना साम्राज्य अपने कब्जे में बनाए रखा। पुर्तगाली शासन के खिलाफ अंगोला में राष्ट्रवादी सशस्त्र प्रतिरोध तब तक चला जब तक पुर्तगाल में तानाशाही शासन कायम रहा। क्रांति के बाद नई पुर्तगाली सरकार ने मोजांबीक तथा अंगोला के स्वतंत्रता सेनानियों से समझौता वार्ता शुरू की। मोजांबीक 1975 तथा अंगोला 1976 में आजाद हुआ।
   पश्चिम यूरोप के एकीकरण के लिए आंदोलन का उदय महत्वपूर्ण घटना थी। यह पश्चिमी यूरोप को महाशक्ति बनाने में मददगार साबित होगी। इस दिशा में अगुवाई करने वाले देशों में प्रमुख देश फ्रांस था। उसको विश्वास था कि संयुक्त पश्चिमी यूरोप का वह स्वाभाविक अगुवा था। इस दिशा में 1957 में पहला महत्वपूर्ण कदम उठाया गया और यूरोपीय आर्थिक समुदाय की स्थापना की गई। इसमें शामिल होने वाले देशों के नाम इस प्रकार हैं। फ्रांस, पश्चिम, जर्मनी, बेल्जियम, हॉलैण्ड, लक्जमबर्ग तथा इटली। इसको कामन मार्केट या साझा बाजार की संज्ञा दी गई है। पश्चिमी देशों को मिलाकर एक महासंघ बनाने की यह पूर्वपीठिका थी। प्रारंभ में ब्रिटेन को साझा बाजार से बाहर रखा गया था लेकिन 1961 में जब उसने इसमें शामिल होने की इच्छा जाहिर की तो फ्रांस ने उसे शामिल नहीं होने दिया। अंततः उसे 1973 में साझा बाजार में शामिल किया गया था। उसके साथ डेनमार्क और आयरलैंड को भी इसमें शामिल किया गया था। यूरोपीय साझा बाजार के 9 सदस्यों ने मिलकर यूरोपीय संसद की स्थापना की। आगे चलकर ग्रीस, स्पेन और पुर्तगाल को भी साझा बाजार में ले लिया गया। अगले कुछ सालों में राजनीतिक यथार्थ के रूप में संयुक्त पश्चिमी यूरोप का उदय एक वास्तविक संभावना बन चुका है। साझा बाजार वाले देशों में एक सामान्य मुद्रा को चालू करने तथा एक देश से दूसरे यूरोपीय देशों में आने जाने के लिए पासपोर्ट से छुट्टी पाने की योजना पहले से ही विचाराधीन है। इस बीच पश्चिम जर्मनी साझा बाजार वाले देशों में सबसे ताकतवर देश के रूप में सामने आया है। एकीकरण के बाद संभावना इस बात की है कि वह और ताकतवर बनकर उभरेगा और उसका प्रभाव बढ़ेगा। अपने साम्राज्य खो जाने के बाद भी विश्व में पश्चिमी यूरोपीय देशों के मिलने से बड़ी ताकत के रूप में उनके उठ खड़े होने की संभावना बढ़ गई है। संयुक्त राज्य अमरीका पर उनकी निर्भरता अब कम हो गई है और विश्व की गतिविधियों में उनकी स्वतंत्र भूमिका की संभावना अब बढ़ गई है।

(एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका)

स्वतंत्र राष्ट्रों का अविर्भाव

  दूसरे विश्व युद्ध के समाप्त होने के लगभग 25 सालों के भीतर एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका के अधिकांश देश स्वतंत्र हो गए। ये देश पहले साम्राज्यवादी शासन के अधीन थे। इसके बाद जो बच गए थे, उसके बाद के वर्षों में साम्राज्यवादी शासन के चंगुल से बाहर हो गए। 1990 के साल तक पहुँचते-पहुँचते दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में एकाध अपवादों को छोड़ कर किसी दूसरे देश के सीधे राजनीतिक नियंत्रण से प्रत्येक देश मुक्त हो चुका है। मूलतः एक ही महत्वपूर्ण देश ऐसा रह गया है, जो स्वतंत्र नहीं है। वह देश दक्षिण अफ्रीका है। वास्तव में तो यह देश स्वतंत्र है और गणराज्य है। यह इस अर्थ में स्वतंत्र है कि इस पर किसी और देश का शासन नहीं है, लेकिन इस पर श्वेत अल्पसंख्यकों का शासन है और देश की राजनीतिक व्यवस्था में लगभग 80% आबादी का कोई दखल नहीं है। उनको नस्ल के आधार पर इससे वंचित रखा गया है। बहरहाल दक्षिण अफ्रीका में भी यह उम्मीद दिख रही है कि श्वेत प्रभुत्व की वर्तमान व्यवस्था को समाप्त करने के लिए जल्दी ही मूलभूत परिवर्तन होंगे। दूसरा देश फिलिस्तीन है, जहाँ कुछ इसी प्रकार के नस्लवादी कानून थोपे गए हैं। इस देश में यहूदी राज्य का निर्माण किया गया है जिसका नाम इसराइल है। इसमें रहने वाले लोग दुनिया के अन्य हिस्सों से आए हैं। ये मुख्यतः यूरोप से यहाँ आकर बसे हैं। अपना शासन कायम करने के बाद उन्होंने इस देश के बाशिंदों को विस्थापित कर दिया। इसराइल द्वारा अधिकृत क्षेत्र में जो फिलिस्तीनी इसके बाद भी रहते रहे, उनकी दशा उपनिवेश में रहने वाले नागरिकों जैसी थी। दक्षिण अफ्रीका में श्वेत लोगों के शासन के समाप्त होने पर और फिलिस्तीन के स्वतंत्र राज्य बनने के बाद लगभग दुनिया का हर हिस्सा स्वतंत्र हो जाएगा।
   एशिया में राष्ट्रवाद के उदय तथा राष्ट्रवादी आंदोलन के विकास की चर्चा हम पहले कर चुके हैं। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान राष्ट्रवादी आंदोलनों की भूमिका तथा केंद्रीय शक्तियों के पराजय की बात भी पहले की जा चुकी है। द्वितीय विश्व युद्ध को हर जगह स्वतंत्रता और इसने उन देशों के स्वतंत्रता आंदोलन की शक्तियों को सुदृढ़ किया है जो साम्राज्यवादी देशों के शासन के अधीन रहे हैं। ये देश फासीवादी आक्रमण के खिलाफ एकजुट हुए थे। साथ ही उन देशों में भी इसे लोकतंत्र की रक्षा करने वाला माना गया है, जहाँ पुराने साम्राज्यवादी देशों को केंद्रीय शक्तियों ने सत्ता से बाहर कर दिया है। उदाहरण के लिए एशिया में भारत में ब्रिटिश शासन जारी था, लेकिन अन्य देशों में जापान, ब्रिटिश, फ्रांसीसी और उच्च लोगों को सत्ता से उखाड़ दिया था। इन सभी देशों में युद्ध के दौरान राष्ट्रवादी आंदोलन काफी ताकतवर बन गए थे और जब युद्ध खत्म हुआ इन सारे देशों में साम्राज्यवाद विरोधी तूफान उठ खड़ा हुआ। जिन उपनिवेशों से साम्राज्यवादी खदेड़ दिए गए थे, पुराने साम्राज्यवादी देशों ने हिंदचीन, हिंदेशिया और बर्मा जैसे उपनिवेशों में दुबारा अपना शासन कायम करने की कोशिश की थी। लेकिन उनको जबरदस्त प्रतिरोधों का सामना करना पड़ा और कई मामलों में तो राष्ट्रवादी आंदोलनों द्वारा सशस्त्र प्रतिरोध किए गए। इस अध्याय में ही इसके पहले हम यह बता चुके हैं कि साम्राज्यवादी देशों और राष्ट्रवादी आंदोलनों के बीच के कुछ संघर्ष ‘‘शीत युद्ध’’ संघर्ष बन गए तथा संयुक्त राज्य अमरीका इनमें साम्राज्यवादी देशों की मदद करने आ खड़ा हुआ। अफ्रीका के अनेक भागों में दो युद्धों के बीच की अवधि में जहाँ राष्ट्रवाद का उदय होने लगा था। युद्ध समाप्त होने के बाद वहाँ शक्तिशाली राष्ट्रवादी आंदोलन अपना रूपाकार ग्रहण करने लगे।
   युद्ध के बाद कई अन्य कारक थे जिन्होंने साम्राज्यवाद के पतन की प्रक्रिया को तेज करने में मदद की। फासीवाद को नष्ट करने के अलावा द्वितीय विश्व युद्ध ने यूरोप के साम्राज्यवादी देशों को कमजोर कर दिया था। इनमें से अधिकांश देश अपने आप फासीवादी आक्रमण के शिकार हुए थे। उदाहरण के लिए फ्रांस, बेल्जियम और हॉलैण्ड (नीदरलैण्ड्स), यूरोप के तीन उपनिवेशवादी देश युद्ध के दौरान जर्मनी के नियंत्रण में थे। ब्रिटेन के पास सबसे बड़ा साम्राज्य था। यह भी अपनी ध्वस्त हुई अर्थव्यवस्था के साथ युद्ध के बाहर निकला था। इनमें से कोई भी देश अब बहुत बड़ी ताकत नहीं रह गया था। इनकी जगह अब दुनिया की सबसे बड़ी ताकत संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ थे। कम्युनिस्ट पार्टियों के शासन में पूर्वी यूरोपीय देशों में समाजवादी सरकारों की स्थापना के कारण भी यूरोप के साम्राज्यवादी देशों की ताकत कम हुई थी। वे अब इस हालत में नहीं थे कि लंबे समय तक अपने उपनिवेशों को कायम रखने के लिए युद्ध करते। जिन देशों ने लंबे औपनिवेशिक युद्ध चलाए, उन्हें गंभीर आंतरिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। उदाहरण के लिए अलजीरिया और हिंदचीन में उपनिवेशवादी युद्ध से फ्रांस में गभीर राजनीतिक संकट पैदा हो गया था। इससे एक समय तो उसकी राजनीतिक प्रणाली को ही खतरा पैदा हो गया था। अफ्रीका में पुर्तगाल द्वारा चलाया गया औपनिवेशक युद्ध पुर्तगाल में तानाशाही शासन के पतन का प्रमुख कारक था। विश्व के बदले हुए राजनीतिक परिवेश में उपनिवेशवाद को ‘‘श्रेष्ठ सभ्यता’’ का लक्षण नहीं माना जाता था। इसके एकदम उलटा हर जगह जनता के मन में इसकी छवि पाश्विक शक्ति, अन्याय, शोषण, अमानवीय और अनैतिक विशेषणों के रूप में उभरती थी। यहाँ तक कि उपनिवेशवादी देशों की जनता भी इसको इसी रूप में देखने लगी थी। 1945 के बाद विश्व में आत्मनिर्णय, राष्ट्रीय संप्रभुता और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में समानता और सहयोग प्रमुख विचार थे। इस प्रकार उपनिवेशवादी शासन को कायम रखने के प्रयास लोगों में लोकप्रिय नहीं थे, यहाँ तक कि साम्राज्यवादी देशों की जनता में भी यह लोकप्रिय नहीं थे। फ्रांस द्वारा चलाए गए उपनिवेशवादी युद्धों का विरोध फ्रांस की जनता के ही एक काफी बड़े हिस्से ने किया था। 1956 में ब्रिटेन में कुछ बहुत बड़े सरकार विरोधी प्रदर्शन देखने को मिलते हैं जब इसराइल और फ्रांस के साथ मिलकर ब्रिटेन ने मिस्र पर हमला किया था। अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिए अब साम्राज्यवादियों ने दूसरे प्रकार के तर्क पेश करने शुरू कर दिए, जैसे जनता को शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता हस्तांतरित करने के लिए तैयार करना ताकि भाई-भाई में और कबीलों में खूनी संघर्षों को रोका जा सके, अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा करना, आतंकवाद को रोकना, साम्यवाद को रोकना आदि, इसके अलावा उपनिवेश की जनता को लोकतंत्र की शिक्षा देना।
   विभिन्न देशों के स्वतंत्रता संघर्षों के बीच एकजुटता का विकास स्वतंत्रता आंदोलन को सुदृढ़ करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक था। हर देश के स्वतंत्रता संघर्ष ने दूसरे देशों में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलनों का समर्थन किया। उदाहरण के लिए इंडोनेशिया और हिंदचीन में क्रमशः डच और फ्रांसीसी शासन को दुबारा कायम करने के लिए भारत के ब्रिटिश शासकों द्वारा 1946 में भारतीय फौजें भेजने के विरोध में तथा इंडोनेशिया और हिंदचीन की स्वतंत्रता के समर्थन में भारत में बड़े-बड़े प्रदर्शन हुए।
   जब ये देश आजाद हुए तब इस एकजुटता ने काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जैसे ही कोई देश आजाद हुआ, उसने दूसरे देश के स्वतंत्रता आंदोलन का सक्रिय रूप से समर्थन किया। अंतर्राष्ट्रीय संगठन के स्तर पर यह समर्थन राजनीतिक था लेकिन किसी-किसी मामले में इसमें भौतिक रूप से भी मदद दी गई। जो देश अभी भी विदेशी शासन के अंतर्गत थे, उनकी मदद के लिए नवस्वतंत्र देशों द्वारा राष्ट्रकुल (कामन वेल्थ) और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे मंच का इस्तेमाल किया गया। गुट निरपेक्ष आंदोलन की स्थापना के समय से ही साम्राज्यवाद विरोध और उपनिवेशवाद विरोध गुट निरपेक्ष आंदोलन के अत्यंत महत्वपूर्ण उद्देश्य रहे हैं और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों की मदद करके यह उन उद्देश्यों को पूरा करने की कोशिश करता रहा है। इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं है कि 1990 में स्वतंत्र होने के काफी पहले से दक्षिण-पश्चिम अफ्रीकी जनसंगठन (स्वापो) गुट निरपेक्ष आंदोलन का पूरी तरह सदस्य रहा है। इसी संगठन ने नामीबिया के स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया था। 1976 में फिलीस्तीनी मुक्ति संगठन गुट निरपेक्ष आंदोलन का पूर्ण सदस्य बन चुका था। अफ्रीकी स्वतंत्रता संग्राम को मजबूत बनाने में अफ्रीका के स्वतंत्र राज्यों की मुख्य भूमिका रही हैं। 1963 में उन लोगों ने अफ्रीकी एकता संगठन की स्थापना की। इनके अनेक उद्देश्यों में एक उद्देश्य अफ्रीका महाद्वीप से सभी प्रकार के उपनिवेशवाद की समाप्ति था। स्वतंत्रता आंदोलनों को सोवियत संघ तथा अन्य समाजवादी देशों का समर्थन भी मिला था।
   साम्राज्यवाद को अंत की तरफ लाने की प्रक्रिया को तीव्र करने वाली प्रमुख शक्ति संयुक्त राष्ट्र संघ भी रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणा पत्र और सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा-पत्र की चर्चा हम पहले ही कर चुके हैं। इन दस्तावेजों में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की इच्छा-आकांक्षाओं की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति हुई है। अपनी स्थापना के एकदम शुरू से ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने उपनिवेशों का सवाल उठाया था। जैसे-जैसे भूतपूर्व उपनिवेशों के देश राष्ट्र संघ के सदस्य बनते गए और वहाँ उनकी संख्या बढ़ी वैसे-वैसे उपनिवेशवाद को समाप्त करने के सवाल को अहमियत मिली तथा उपनिवेशों को स्वतंत्रता प्राप्त करने का रास्ता सरल बनाने में इसकी भूमिका क्रमशः बढ़ती गई। हाल में नामीबिया को मुक्ति दिलाने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
   द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहले स्वतंत्र हुए देशों में भारत भी एक था। यद्यपि ब्रिटिश शासक देश को बाँटने में कामयाब रहे, भारतीय स्वतंत्रता का ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक था। एशिया और अफ्रीका के सभी देशों के स्वतंत्रता आंदोलनों के लिए भारत का मुक्ति संग्राम प्रेरणा स्रोत रहा है। स्वतंत्रता मिलने के पहले ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के नेता एशियाई संबंध के एक साझे मंच पर बहुत से एशियाई देशों के नेताओं को संगठित कर चुके थे। इसको भारतीय नेताओं ने ही संगठित किया था। यह अधिवेशन विश्व में नए कारक के रूप में एशिया के उदय का प्रतीक था। अपनी आजादी के लिए संघर्षरत सारी जनता के लिए आजाद भारत प्रेरणा स्रोत था। 1948 के शुरू में 4 जनवरी को बर्मा (अब म्यनमार) और 4 फरवरी को सीलोन (अब श्री लंका) आजाद हो गए। जापान की हार के बाद मलाया पर ब्रिटिश फौजों ने फिर कब्जा जमा लिया था, वह 1957 में स्वतंत्र हुआ था। 1963 में उसने अपने को मलेशिया संघ के रूप में घोषित किया, इसमें सिंगापुर भी शामिल था। इसके पूर्व सिंगापुर भी ब्रिटिश उपनिवेश था। लेकिन 1965 में सिंगापुर ने अपने को स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया। जापान के समर्पण के तत्काल बाद राष्ट्रवादियों द्वारा इंडोनेशिया गणतंत्र घोषित किया जा चुका था। लेकिन ब्रिटिश फौजों की मदद से डच लोग पुनः अपना शासन स्थापित करने आ पहुँचे। इसके बाद एक युद्ध हुआ। 1949 में युद्ध समाप्त हुआ और उसी साल 27 दिसंबर को हॉलैण्ड ने इंडोनेशिया की स्वतंत्रता को मान्यता दी। इसकी चर्चा पहले की जा चुकी है कि वियतनाम के युद्ध में पहले फ्रांस की पराजय हुई और उसके बाद अमरीका की पराजय हुई। युद्ध के दौरान जापानी कब्जे के खिलाफ हिंदचीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में वियतनामी राष्ट्रवादियों ने युद्ध किया था। 2 सितंबर 1945 को वियतनाम में लोकतांत्रिक गणराज्य की अस्थाई सरकार की घोषणा की गई। लेकिन तत्काल बाद ब्रिटिश फौजों की मदद से फ्रांसीसियों ने वहाँ अपना शासन कायम करना चाहा। दिएन बिन्ह प्लू के पतन के बाद 1945 में वियतनाम में उपनिवेशवादी युद्ध समाप्त हो गया। अमरीका के विरूद्ध चलने वाले युद्ध का अंत 1975 में हुआ और 30 अप्रैल 1975 को अमरीका समर्थित दक्षिण वियतनाम की राजधानी सैगाँव को मुक्त करा लिया गया। 1976 में दोनों वियतनाम एक हो गए और सैगाँव का नाम बदलकर हो ची-मिन्ह नगर कर दिया गया। इस नगर को यह नाम वियतनामी जनता के महान नेता के नाम पर दिया गया था जिसने वियतनाम में स्वतंत्रता संग्राम की शुरूआत की थी और 1969 में अपनी मृत्यु के समय तक इस संग्राम की अगुवाई की थी। ये हर जगह के युवाओं तथा स्वतंत्रता प्रेमियों के आदर्श नायक (आदर्श पुरूष) बन गए थे। हिंदचीन तीन देशों को मिला कर बना था। उनमें से एक देश लाओस ने 1945 में अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया। लेकिन पहले फ्रांस और बाद में संयुक्त राज्य अमरीका का लाओस में हस्तक्षेप जारी रहा। लाओस में संयुक्त राज्य अमरीका का हस्तक्षेप 1973 में आकर खत्म हुआ लेकिन विभिन्न गुटों के बीच टकराव दिसंबर 1975 में तब आकर समाप्त हुआ जब राजतंत्र का उन्मूलन कर दिया गया। हिंदचीन का तीसरा देश कंबोडिया (अब कंपूचिया) था। जापान की हार के बाद वहाँ भी फ्रांसीसी लौट आए लेकिन फ्रांसीसियों ने अंततः 1953 में वहाँ अपना शासन समाप्त कर दिया और कंबोडिया स्वतंत्र हो गया। 1975 में वियतनाम में जब सैनिक हस्तक्षेप समाप्त हुआ तब कंबोडिया में भी अमरीका समर्थक सरकार को उखाड़ फेंका गया। लेकिन इसके बाद वहाँ बहुत खूंखार सरकार सत्ता में आई जिसको पोल पोत सरकार कहा जाता है। पोल पोत सरकार ने अपनी ही जनता के विरूद्ध नरसंहार की नीति का अनुसरण किया। 1979 में वियतनाम की फौजों की मदद से इस सरकार को हटा दिया गया। फिर भी कंबोडिया में संघर्ष चलता रह। कई साल तक संयुक्त राज्य अमरीका और एशिया के कई देश पोल पोत सेनाओं का समर्थन करते रहे। तीन प्रमुख कंबोडियाई गुटों के बीच पिछले कुछ महीनों से समझौता वार्ता चल रही है। इसमें शामिल होने वाले गुट हैं कंबोडिया की वर्तमान सरकार, राजकुमार सिंहानुक के नेतृत्व वाला गुट, जिनकी सरकार को 1970 में अमरीका की मदद से उखाड़ फेंका गया था तथा तीसरा गुट पोल पोत के नेतृत्व वाला है।
   अरब राष्ट्रवाद के विकास तथा कुछ अरब देशों में स्वतंत्रता आंदोलनों की चर्चा पहले की जा चुकी है। फ्रांसीसियों ने लेबनान को पृथक राज्य बना दिया था। युद्ध के दौरान फ्रांसीसी अधिकारी लेबनान में विची फ्रांस के पक्ष से जुड़े रहे लेकिन उनको सत्ता से हटा दिया गया तथा इस देश पर फ्रांसीसी फौजों ने कब्जा कर लिया। नवंबर 1943 में लेबनान की स्वतंत्रता को मान्यता मिल गई यद्यपि फ्रांसीसी फौजें 1946 तक वहाँ बनी रहीं। 1950 के दशक से लेबनान में कई उथल-पुथल हो चुके हैं तथा राजनीतिक रूप से उसे कई बार अस्थिरता के दौर से गुजरना पड़ा है। सीरिया में फ्रांसीसियों के खिलाफ एक विद्रोह हुआ था इसमें ब्रिटेन, फ्रांस का समर्थक था। 17 अप्रैल 1946 को सीरिया स्वतंत्र हो गया और फ्रांस की फौजें वहाँ से हट गई। मिस्र में राजतंत्र का उस समय खात्मा हो गया जब कर्नल गमाल अब्दुल नासिर के नेतृत्व में सैनिक अधिकारियों के एक गुट ने 1952 में सत्ता पर कब्जा कर लिया। नई सरकार ने ब्रिटिश फौजों को वापस लौटने के लिए कहा। ये फौजें मिस्र में स्वेज नहर के इलाके में तैनात की गईं थीं। 1956 में ब्रिटिश फौजें मिस्र से वापस चली गई लेकिन जैसा कि पहले बताया गया है कि अक्टूबर 1956 में इसराइल की फौजों के साथ ब्रिटिश और फ्रांस की फौजों ने मिस्र पर आक्रमण कर दिया लेकिन उनको तत्काल वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया गया। नासिर अरब राष्ट्रवाद के प्रमुख नेता होकर उभरे। गुट निरपेक्ष आंदोलन के जन्मदाताओं में उनका भी नाम है। इसकी चर्चा पहले हो चुकी है कि इराक में ब्रिटिश समर्थक राजतंत्र को क्रांति के जरिए समाप्त कर दिया गया था। उन्नीसवीं सदी के अंत में कुवैत ब्रिटिश नियंत्रण में आ चुका था। उसके विशाल तेल संसाधनों पर ब्रिटेन तथा संयुक्त राज्य अमरीका की तेल कंपनियों का नियंत्रण था। 9 जून 1967 को कुवैत पूरी तरह से प्रभुता संपन्न राज्य बना। ओटोमान साम्राज्य के समाप्त होने के बाद उत्तरी यमन स्वतंत्र राज्य बन गया था लेकिन दक्षिण यमन में ब्रिटिश लोगों ने अपने शासन को मजबूत कर लिया था। अदन शहर को ब्रिटिश भारत का एक हिस्सा बनाया जा चुका था लेकिन 1937 में इसको अलग उपनिवेश बना दिया गया था। इसको दक्षिण अरब का एक हिस्सा बनाया गया था। इसकी स्थापना ब्रिटिश लोगों ने की थी। 1963 में दक्षिण यमन में एक सशस्त्र विद्रोह शुरू हुआ। 1967 में दक्षिण यमन एक स्वतंत्र राज्य बन गया और ब्रिटिश फौजें वहाँ से वापस चली गईं। हाल में यमन के दोनों भागों का एकीकरण हो गया है। 1956 में ट्यूनिशिया और मोरक्को में भी फ्रांसीसी शासन समाप्त हो गया। लीबिया पर इटली का शासन कायम हो गया था तथा जर्मनी और मित्र राष्ट्रों के बीच द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इसकी धरती पर कई महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ लड़ी गईं। बाद में चलकर इस देश पर ब्रिटिश और फ्रांसीसी फौजों ने कब्जा कर लिया। 24 दिसंबर 1951 में वह राजशाही शासन वाला स्वतंत्र देश बना। 1969 में राजशाही को उखाड़ फेंका गया और लीबिया एक गणतंत्र राज्य बना। दूसरे विश्व युद्ध के अंत में अरब राज्यों को मिलाकर ‘‘अरब लीग’’ की स्थापना की गई। अरब राज्यों को एकजुट करने में, अरब राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने में और अरब राज्यों की स्वाधीनता को सुदृढ़ बनाने में अनेक वर्षों तक ‘‘अरब लीग’’ की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही। सभी अरब राज्यों की चिंता के मुख्य विषयों में एक विषय फिलिस्तीन का सवाल रहा है यहाँ पश्चिमी देशों की मदद से ‘‘इसराइल’’ नामक राज्य की स्थापना की गई थी और उसको बनाए रखा गया। इस प्रकार फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना को रोका गया। अरब राष्ट्रवादी इसराइल को अपनी धरती पर साम्राज्यवाद की सीमा चौकी मानते हैं। 1964 से ही यासिर अराफात के नेतृत्व में फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन, फिलिस्तीनी स्वतंत्र राज्य की स्थापना के लिए संघर्ष करता आ रहा है। हाल में फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन ने एक सरकार की स्थापना की घोषणा की है। कई देशों ने इस सरकार को मान्यता दे दी है।
   अल्जीरिया में एक स्वतंत्रता संग्राम प्रारंभ किया गया था। यह सबसे लंबे संघर्षों में से एक था। फ्रांस ने 1930 में अल्जीरिया पर कब्जा करना आरंभ किया था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अपना शासन बनाए रखने के लिए फ्रांस अल्जीरिया के साथ एक लंबे औपनिवेशिक युद्ध में उलझ गया। अन्य फ्रांसीसी उपनिवेशों से भिन्न बहुत बड़ी संख्या में फ्रांसीसी वहाँ आकर बस गए। 1960 में उनकी संख्या लगभग 10 लाख थी। अधिकांश अर्थव्यवस्था और अल्जीरिया के प्रशासन पर उनका नियंत्रण था और जब फ्रांस की जनता और यहाँ तक कि फ्रांस की सरकार जब समझौता करने के पक्ष में थी, वे अपना नियंत्रण बनाए रखने पर अड़े हुए थे। यह परिस्थिति ऐसी थी जिसकी तुलना दक्षिण अफ्रीका या दक्षिणी रोडेशिया से की जा सकती है जहाँ श्वेत प्रवासी ऐसे सभी समझौतों के विरोध में थे जिनसे उनका प्रभुत्व खत्म हो जाता। 1958 में अल्जीरिया में एक राष्ट्रवादी आंदोलन ने जन विद्रोह का आह्वान किया। इसके तुरंत बाद बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय मुक्ति युद्ध आरंभ हो गया। अल्जीरिया के ‘‘राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चे’’ (एफ. एल. एन.) ने अपनी निजी मुक्ति वाहिनी बनाई। इसकी अपनी पूर्णकालिक सशस्त्र सेनाएँ थीं, इसके साथ उसकी गुरिल्ला इकाइयाँ भी थीं। अल्जीरिया में इस समय फ्रांसीसी फौजियों की संख्या 800,000 थी। ये बड़े पैमाने पर लूट पाट, हत्या में व्यस्त थे और लोगों को यातना भी देते थे। 1958 में ‘‘राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चे’’ ने अपनी अस्थाई सरकार गठित की। इस सरकार को कई देशों ने मान्यता प्रदान की। 1958 में फ्रांसीसी प्रवासियों तथा अल्जीरिया की फ्रांसीसी सेना ने ‘‘चौथे गणतंत्र’’ (1946 से फ्रांसीसी सरकार को इसी नाम पुकार जाता था) को सत्ता से उखाड़ फेंकने का नेतृत्व किया। फ्रांस में जनरल द गाल सत्ता में आए और एक नए संविधान को लागू किया गया। इसके अनुसार पाँचवें गणतंत्र की स्थापना हुई। अल्जीरिया में फ्रांसीसी प्रवासियों और सेना को यह उम्मीद थी कि अल्जीरिया में फ्रांसीसी सरकार का राज कायम रखने के उनके प्रयास में फ्रांस की नई सरकार उनका समर्थन करेगी। बहरहाल, जब उनको पता चला कि जनरल द गाल अल्जीरिया के लोगों के साथ समझौता करने के पक्ष में हैं तब उन्होंने उनके विरूद्ध एक असफल विद्रोह संगठित करने का प्रयास किया। मार्च 1962 में द गाल की सरकार ने ‘‘राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चे’’ के साथ बातचीत शुरू की और इसकी वजह से वह युद्ध विराम हुआ। अल्जीरिया को स्वतंत्र करने तथा वहाँ से सेना की पूरी तरह से वापसी के बारे में भी समझौता हुआ। अप्रैल 1962 में अल्जीरिया की आजादी के सवाल पर एक जनमत संग्रह कराया गया और फ्रांस की जनता ने बहुत ज्यादा संख्या में अल्जीरिया की स्वाधीनता के पक्ष में मत दिया। इसी तरह से 1 जुलाई 1962 में भी एक जनमत संग्रह कराया गया। इसमें 99 प्रतिशत लोगों ने अल्जीरिया की पूर्ण स्वाधीनता के पक्ष में मत दिया। 3 जुलाई 1962 को फ्रांस ने अल्जीरिया की स्वतंत्रता को मान्यता प्रदान कर दी। राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम में फ्रांस की सेना द्वारा लगभग 15 लाख अल्जीरियावासी मारे गए थे।
   द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के सालों में दक्षिण अफ्रीका के ज्यादातर देशों में स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने के लिए राष्ट्रवादी संगठन बनाए गए। साम्राज्यवादी देशों ने समझ लिया था कि लंबे समय तक वे अब अफ्रीका पर शासन नहीं कर सकते। दक्षिण अफ्रीका में स्वतंत्र होने वाला पहला देश घाना (ब्रिटिश शासन के दौरान इसका नाम गोल्ड कोस्ट था) था। घाना में क्वामें न्यूक्रूमा के नेतृत्व में स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी गई। वे अफ्रीकी राष्ट्रवाद को आगे ले जाने वाले महान नेता थे। विश्व के मामलों में अपनी राष्ट्रीय संप्रभुसत्ता और स्वतंत्र भूमिका का दावा करने और स्वतंत्रता हासिल करने के उद्देश्य से अफ्रीकी लोगों को संगठित करने में उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी। 1949 में उन्होंने एक दल की स्थापना की। इसका नाम ‘‘कनवेंशन पीपुल्स पार्टी’’ था। 1956 के चुनावों में इस पार्टी को 70 प्रतिशत से भी अधिक स्थान मिले थे और 6 मार्च 1957 को घाना स्वतंत्र राज्य बन गया। 1960 में अफ्रीका के सत्रह देशों को स्वतंत्रता मिली। इस वर्ष को इसीलिए अफ्रीकी वर्ष का खिताब मिला। इनमें से 13 देश फ्रांसीसी उपनिवेश थे। ये 17 देश थे - मौरिटानिया, माली नाइजर, चाड, सेनेगल, आइवरी कोस्ट, अपरवोल्टा (अब बुरकिना फासों), नाइजीरिया, टोगा, बेनिन, कैमरून, गैबन, कांगो, (पहले फ्रेंच कांगो), जायरे (पहले बेल्जियन कांगो), सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, सोमालिया और मेडागास्कर। 1960 में साम्राज्यवाद विरोध की जिस लहर की लपेट में अफ्रीका आया था, उसने ब्रिटिश प्रधानमंत्री हेरॉल्ड मैकमिलन को भी प्रभावित किया था। 1960 के मार्च महीने में अफ्रीका के ब्रिटिश उपनिवेशों का दौरा करते समय उन्होंने हवा के बदलते हुए रूख की बात कही जो अफ्रीकी महाद्वीप में चल रही थी और उन्होंने कहा,‘‘.....हमें यह अच्छा लगे या न लगे राष्ट्रीय चेतना का यह विकास एक राजनीतिक यथार्थ है और हमें अपनी राष्ट्रीय नीति तय करने के समय इसे ध्यान में अवश्य रखना चाहिए।’’
   ब्रिटिश सम्राज्यवाद काफी लंबे अरसे से ‘‘परिवर्तन’’ की इस हवा को रोकने की कोशिश कर रहा था। केनिया में 1920 में राष्ट्रीय आंदोलन की शुरूआत की गई और आगे चलकर जोमा केन्याटा इसके नेताओं में सबसे महान नेता के रूप में उभरे। 1943 में ‘‘केनिया अफ्रीकन यूनियन’’ स्थापित की गई थी। बाद में चलकर इसी का नाम ‘‘केनिया अफ्रीकन नेशनल यूनियन’’ हो गया। 1952 में केनिया में माऊ-माऊ आंदोलन भड़क उठा। यह विद्रोह मुख्यतः की कूयू जनजाति की किसान जनता ने किया था कयोंकि ब्रिटिश उपनिवेशवादी शासकों ने उनकी भूमि हड़प ली थी। बहुत से पश्चिमी लेखकों ने माऊ-माऊ विद्रोहियों को आतंकवादी माना है और कहा है कि उन्होंने अमानवीय रूप से नरसंहार किए। पाश्विक ताकत का उपयोग कर ब्रिटिश लोगों ने इसको दबा दिया। इसमें लगभग 15,000 हजार कीनियाई मौत के घाट उतार दिए गए थे। 1953 में जोमो केन्याटा को गिरफ्तार कर लिया गया तथा उनको सात साल की जेल की सजा हुई। उन पर माऊ-माऊ विद्रोह का नेतृत्व करने का आरोप लगाया गया था। ब्रिटिश अधिकारी अपना दमन समाप्त करने के लिए मजबूर कर दिए गए क्योंकि उनके इस दमन की सारे विश्व में निंदा की गई थी। 1961 में कैन्याटा को रिहा कर दिया गया। 12 दिसंबर 1964 को केनिया गणराज्य बना और जोमो केन्याटा इसके प्रथम राष्ट्रपति घोषित किए गए।
   1960 के दशक में अफ्रीका में बाकी बचे ब्रिटिश उपनिवेशों में से अधिकांश स्वतंत्र हो गए। इनमें निम्नांकित देश शामिल थे - तंजानिया (पहले का तांगानिका और जंजीबार), 1961 में सिएरा लिओन, 1962 में यूगांडा, जांबिया (पहले उत्‍तर रोडेशिया), 1964 में मलावी (पहले न्यासा लैंड), 1965 में गांबिया, 1968 में बोत्स्वाना, स्वाजी-लैंड तथा लेसोथो। प्रथम विश्व युद्ध के समाप्त होने के समय से ही रूआंडा और बरूंडी बेल्जियम के उपनिवेश थे। ये दोनों 1962 में स्वतंत्र हुए। 1960 के दशक की समाप्ति तक अफ्रीका के ज्यादातर देश आजाद हो चुके थे। निम्नांकित देशों में स्वतंत्रता संघर्ष अभी भी जारी था - पुर्तगाली उपनिवेश अंगोला और मोजांबीक (इनकी चर्चा पहले की जा चुकी है।) और गिनी बिसाऊ तथा केप वर्दी आइलैंड्स। ये सभी देश स्वतंत्र हो गए। नामीबिया (दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका) 21 मार्च 1990 को आजाद हुआ है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से दक्षिण अफ्रीका ने इसको अपना उपनिवेश बनाकर अपने अधीन रखा था। दूसरा देश जिंबाब्वे (दक्षिण रोडेशिया) है जिसको स्वतंत्रता मिलने से पहले लंबे संघर्ष से गुजरना पड़ा है। यह ब्रिटिश उपनिवेश था लेकिन 1965 में वहाँ के श्वेत प्रवासियों ने इयान स्मिथ के नेतृत्व में सत्ता हथिया ली। देश को स्वतंत्रता मिलने की संभावना से वे चौंक पड़े थे क्योंकि स्वतंत्रता का अर्थ था बहुमत वाले काले लोगों का शासन। दक्षिण अफ्रीका की तर्ज पर, दक्षिण अफ्रीका के समर्थन से वहाँ श्वेत लोगों की अल्पमत सरकार बनाई गई और इसने उसको स्वतंत्रता का एकतरफा घोषणा-पत्र कहा। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुरोध पर दुनिया के अधिकांश देशों ने दक्षिण रोडेशिया पर प्रतिबंध लगाए। दक्षिण रोडेशिया में एक शक्तिशाली गुरिल्ला आंदोलन पैदा हुआ। आसपास के अफ्रीकी राज्यों ने इस आंदोलन की मदद की। गुट निरपेक्ष और समाजवादी देशों ने भी मदद की। उन्होंने महसूस किया कि दक्षिण अफ्रीकी मदद के बावजूद वे स्वतंत्रता संघर्ष का दमन नहीं कर सकते थे, श्वेत लोगों की अल्पमत सरकार ने घुटने टेक दिए। 1980 में दक्षिण रोडेशिया में चुनाव हुए। इसमें हर काले तथा हर गोरे का एक ही वोट था। इस चुनाव में राष्ट्रवादी पार्टियों की भारी विजय हुई और यह देश स्वतंत्र हो गया। इसका नया नाम जिंबाब्वे रखा गया। यहाँ की नई सरकार के नेता रॉबर्ट मुगाबे हुए। यहाँ हुई गुट निरपेक्ष देशों की बैठक के अध्यक्ष रॉबर्ट मुगाबे ही थे। यह बैठक जिंबाब्वे की राजधानी हरारे में 1986 में हुई थी।
   ‘अफ्रीकी एकता संगठन’ अफ्रीका में साम्राज्यवादी शासन की समाप्ति की प्रक्रिया को तेज करने वाली ताकतों में काफी महत्वपूर्ण ताकत थी। इसकी चर्चा पहले भी की जा चुकी है। इसकी स्थापना पैन अफ्रीकी सम्मेलन में 1963 में अदीस अबाबा में की गई थी। अफ्रीकी राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने में 1960 के दशक में यह सम्मेलन खासतौर से महत्वपूर्ण था।
   दक्षिण अमरीका और वेस्टइंडीज में ब्रिटेन के पास अभी भी कुछ उपनिवेश बाकी बचे थे। 1960 के दशक से प्रारंभ करके ये सारे देश स्वतंत्र हो गए। 1962 में जमैका और ट्रिनिडाड-टोबैगो, 1966 में गायना और बारबोडोस, 1976 में ग्रेनेडा। उन्नीसवीं सदी के शुरू से ही गायना के पूर्व में स्थित सुरीनाम हॉलैंड के शासन में था। 25 नवंबर 1975 को वह स्वतंत्र हुआ था।
   जिन देशों के स्वतंत्र होने का जिक्र अभी किया गया है, उसकी प्रक्रिया बहुत सरल और बाधाहीन नहीं रही है। अधिकांश देशों के मामले में उपनिवेशों को आजादी देने के बाद भी उपनिवेशवादी ताकतों ने वहाँ अपना प्रभाव बरकरार रखने की पूरी कोशिश की थी। कुछ देशों में खासतौर पर जब उपनिवेशवादी देशों अथवा उनके समर्थकों को लगा कि उपनिवेशवादी शासन की बागडोर क्रांतिकारी नेताओं के हाथ में हस्तांतरित होने की संभावना है, तब उन्होंने सीधे हस्तक्षेप किया। 1953 में ब्रिटिश गायना (अब गायना) को आजादी मिलने के पहले वहाँ चुनाव कराए गए। इस चुनाव में प्रोग्रेसिव पीपुल्स पार्टी ने 25 में से 18 स्थानों पर विजय हासिल की। डॉ. छेदी जगन और फॅार्बिस बर्नहम के नेतृत्व में यह पार्टी ब्रिटिश गायना की साम्राज्यवाद का विरोध करने वाली पार्टियों में सबसे आगे थी। इसको जनता के हर तबके से समर्थन मिला अर्थात् इसके समर्थकों में भारतीय मूल के लोग और काले दोनों ही थे। डॉ. छेदी जगन प्रधानमंत्री बने। उन्होंने मूलगामी सामाजिक और आर्थिक सुधार लागू करना प्रारंभ किया। लेकिन लगभग चार महीनों के बाद ही सरकार बर्खास्त कर दी गई और संविधान को स्थगित कर दिया गया। वहाँ पर ब्रिटिश सेना को उतारा गया तथा प्रोग्रेसिव पीपुल्स पार्टी (पी. पी. पी.) के नेताओं - डॉ. छेदी जगन और फॉर्बिस बर्नहम को गिरफ्तार कर लिया गया। यह सब कुछ कम्युनिज्म (साम्यवाद) को रोकने के नाम पर किया गया था। इसके बाद वहाँ ब्रिटिश लोगों ने नस्लवादी भावना को हवा देकर प्रोग्रेसिव पीपुल्स पार्टी में फूट डलवाई और उसका विभाजन करवाया। 1957 के चुनावों में डॉ. छेदी जगन की पार्टी की दुबारा जीत हुई। उन्होंने स्वतंत्रता की माँग को लेकर अपना आंदोलन तेज किया। 1961 के चुनावों में फिर इसी पार्टी को बहुमत मिला। लेकिन सरकार को वित्तीय मदद देने से इनकार कर दिया गया तथा नस्लवादी तनाव और हिंसा को खूब हवा दी गई। 1964 के चुनावों में बर्नहम ने दूसरी पार्टी से हाथ मिला लिया जो पहले प्रोग्रेसिव पीपुल्स पार्टी का विभाजन कर अलग हो गए थे। उनकी पार्टी को पी. पी. पी. से कम मत मिले लेकिन दूसरी पार्टी के साथ मिलकर उन्होंने सरकार बनाई और गायना के प्रधानमंत्री बन बैठे। 1966 में गायना जब आजाद हुआ तो बर्नहम ही उसके प्रधानमंत्री बने। आगामी कई सालों तक नस्लवादी दंगे जारी रहे।
   जायरे (बेल्जियम कांगो) में स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व पैट्रीस लुमुंबा ने किया। इन्होंने ‘‘कांगो राष्ट्रीय आंदोलन’’ (एम. एन. सी.) नामक दल की स्थापना की। 30 जून 1960 को कांगो स्वतंत्र हो गया और पैट्रिक लुमुंबा इसके प्रधानमंत्री बने। लेकिन इसके तुरंत बाद इसके एक प्रांत - कटांगा, के गवर्नर ने यह घोषणा कर दी कि कटांगा कांगो से अलग हो गया है। कटांगा में खनिज संसाधन (ताँबा) का बहुत बड़ा भण्डार है और इस भंडार पर पश्चिमी कंपनियों का कब्जा था। इन कंपनियों ने कटांगा के गवर्नर का समर्थन किया। इस पृथकतावाद के समर्थन में काफी संख्या में भाड़े के सैनिकों को लगाया गया। कांगो सरकार के अनुरोध पर उस देश के बँटवारे और विदेशी हस्तक्षेप को (कटांगा के अलग होने से) रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की सेनाएँ कांगो भेजी गईं। बहरहाल संयुक्त राष्ट्र संघ की सेनाएँ कांगो की रक्षा करने में असमर्थ रहीं और पैट्रिक लुमुंबा की हत्या कर दी गई, लेकिन ये सेनाएँ बाद में कटांगा के टुकड़े होने से बचाने में सफल हो गईं। 1965 कर्नल मोबूतू ने कांगों की सत्ता पर कब्जा कर लिया तथा देश के राष्ट्रपति बने। कर्नल मोबूतू वहाँ सेना के प्रमुख थे। कांगो का नाम बदल कर जायरे कर दिया गया। अफ्रीका में राष्ट्रवादी पुनरूत्थान के सबसे महान नेताओं में लुमुंबा की गणना की जाती है। उनको राष्ट्रवादी नेता का सम्मान भी मिला। ऐसा माना जाता है कि इस महान राष्ट्रवादी नेता की हत्या का षड़यंत्र अमरीका की गुप्तचर संस्था सी. आई. ए. ने रचा था। ऐसी ही एक कोशिश अंगोला में भी की गई जहाँ देश के स्वतंत्र होने के बाद अगोस्तीनो नेटो के नेतृत्व में एक सरकार का गठन किया गया। बहरहाल इस सरकार को अमरीका ने गिराने की कोशिश की और इसमें दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार ने प्रतिद्वंदी गुट को शस्त्रादि मुहैया कराया। दक्षिण अफ्रीका की फौजें भी अंगोला में गईं और अंगोला की फौजों के खिलाफ लड़ीं। विदेशी आक्रमणकारियों के प्रतिरोध में मदद के लिए अंगोला ने क्यूबा से मदद माँगी। इस प्रकार अंगोला की स्वतंत्रता को समाप्त करने का प्रयास असफल कर दिया गया। हाल में एक समझौता हुआ है इसमें अंगोला में विदेशी हस्तक्षेप समाप्त करने पर सहमति हुई है। इसमें वहाँ से विदेशी सैनिकों की वापसी के मुद्दे पर भी सहमति हुई है।
   सबसे अधिक भ्रष्ट और नस्लवादी दमन पर आधारित व्यवस्था दक्षिण अफ्रीका में स्थापित की गई थी। अध्याय 3 में दक्षिण अफ्रीका की घटनाओं के कुछ पहलुओं का ब्यौरा हम दे चुके हैं। अल्पमत वाली गोरी सरकार द्वारा इस देश में नस्ल पर आधारित पृथकतावादी व्यवस्था लागू की गई। इसे अपार्थीड (पृथकतावाद) के नाम से जाना जाता है। इसके नेता डैनियल मलान 1948 में सत्ता में आए थे। इस नीति को आगे आने वाली सरकारों ने भी जारी रखा। यहाँ गैर-गोरों की जनसंख्या 80 प्रतिशत से भी अधिक थी। इनको मतदान के अधिकार से वंचित रखा गया, हड़तालों पर पाबंदी लगा दी गई, कुछ विशेष इलाकों से काले लोगों को हटाकर दूसरे इलाकों में भेज दिया गया, शिक्षा को अलग-अलग कर दिया गया, अंतरजातीय (काले-गोरे) विवाहों को गैर कानूनी और अनैतिक घोषित कर दिया गया। कम्युनिज्म (साम्यवाद) दमन अधिनियम लागू करके हर तरह के मतभेदों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। ‘‘कम्युनिज्म (साम्यवाद) दमन अधिनियम’’ के अंतर्गत सिर्फ राजनीतिक रचनाओं पर ही नहीं विश्व के महान साहित्यकारों की रचनाओं पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। अफ्रीकी लोगों के आवागमन पर भी कठोर पाबंदियाँ थोपी गई तथा उनको इधर-उधर आने जाने के लिए अपने साथ ‘पास’ (स्वीकृति पत्र) रखना जरूरी हो गया। राष्ट्र कुल देशों के प्रधानमंत्रियों के सम्मेलन में पृथकतावादी नीति पर जब वक्ताओं ने जबर्दस्त आक्रमण किया तब दक्षिण अफ्रीका राष्ट्र कुल (कामन वेल्थ) से अलग हो गया। हर तरफ पृथकतावाद के विरूद्ध लोगों ने घृणा भाव दर्शाया तथा अधिकांश देशों ने दक्षिण अफ्रीका के साथ अपने सारे संबंध समाप्त कर लिए। संयुक्त राष्ट्र संघ ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ आर्थिक और सैनिक प्रतिबंध लगाने की मांग की और विश्व जनमत के दबाव तथा अपने देश के भीतर के जनमत के दबाव के चलते पश्चिमी देशों ने भी प्रतिबंधों को लागू करना शुरू कर दिया। बहरहाल, अपनी नीतियों की इतनी अधिक निंदा सुनने के बाद भी दक्षिण अफ्रीका अपनी अमानवीय और पाश्विक हरकतों से काफी लंबे समय तक बाज नहीं आया। जर्मन नाजीवाद को छोड़कर दक्षिण अफ्रीका की इस नीति का दुनिया में और कोई उदाहरण नहीं दिखाई पड़ता। 1960 में पृथकतावादी एक विशाल जनसभा (रैली) को तितिर-बितर करने के लिए नरसंहार का आयोजन किया गया। इसके बाद दमन की अन्य अनेक कार्रवाइयाँ की गईं। 1960 के दशक की शुरूआत में पृथकतावाद विरोधी आंदोलन का हर नेता गिरफ्तार किया गया और उसे लंबे समय के कारावास की सजा सुनाकर जेल में डाल दिया गया। अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस ने कई दशकों तक पृथकतावाद-विरोधी तथा गोरों के अल्पमत शासन के विरूद्ध आंदोलन का नेतृत्व किया। 1955 में जनता द्वारा एक अधिवेशन आयोजित किया गया। उसमें ‘‘स्वतंत्रता का घोषणा-पत्र’’ स्वीकार किया गया। इस घोषणा पत्र में दक्षिण अफ्रीकी जनता के संघर्षों के मूल उद्देश्यों को दिया गया था। घोषणा पत्र में कहा गया था।
   ‘‘हम दक्षिण अफ्रीका के लोग अपने सभी देशवासियों को इस घोषणा द्वारा यह जताना चाहते हैं’’ -
   ‘‘कि दक्षिण अफ्रीका उन सबका है, जो यहाँ रहते हैं, चाहे वे गोरे हों अथवा काले और कोई भी सरकार इस पर अपना न्यायसंगत दावा पेश नहीं कर सकती जब तक वह सारी जन इच्छाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती,
   ‘‘कि इस देश के लोगों को उनके जन्मसिद्ध अधिकारों से वंचित किया गया है, उन्हें स्वतंत्रता और न्याय से वंचित किया गया है, उस सरकार द्वारा ऐसा किया गया हैं जो अन्याय और असमानता के ऊपर आधारित है,
   ‘‘कि जब तक देश की सारी जनता भाईचारे के साथ समान अधिकारों और अवसरों का उपयोग करते हुए नहीं रहती तब तक हमारा देश न तो सम्पन्न होगा और न ही स्वतंत्र माना जाएगा,
   ‘‘कि केवल लोकतांत्रिक राज्य, जिसका आधार संपूर्ण जन इच्छा है, बिना रंगभेद, नस्ल भेद, लिंगभेद तथा विश्वास भेद के जन्मसिद्ध अधिकारों को सुरक्षित रख सकता है,
   ‘‘और इसलिए हम अफ्रीका के लोग, जिसमें काले-गोरे सभी हैं, समान हैं, देशवासी हैं, भाई-भाई हैं, इस घोषणा-पत्र को स्वीकार करते हैं और हम इस बात की शपथ लेते हैं कि हम साथ-साथ प्रयास करेगें, इसके लिए अपनी पूरी ताकत और साहस का उपयोग करेंगे और इसे तब तक जारी रखेंगे जब तक यह शुरू हुए लोकतांत्रिक परिवर्तन अपने लक्ष्य तक नहीं जाते।’’
   अब तक अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस शांतिपूर्ण अहिंसक संघर्ष की नीति पर चलती रही है। पाश्विक हिंसा को देखते हुए (जिसके माध्यम से सभी विरोधों का दमन किया गया था) इसने सशस्त्र संघर्ष प्रारंभ करने का निर्णय किया। इसने अपने गुरिल्लों और सैनिकों को दक्षिण अफ्रीका तथा स्वतंत्र अफ्रीकी राज्यों में ही प्रशिक्षित किया। अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के कुछ बड़े नेता गिरफ्तारी से बच निकले। एक काफी शक्तिशाली भूमिगत आंदोलन खड़ा किया गया तथा इन लोगों ने तोड़फोड़ के कुछ अत्यंत जोखिम भरे काम किए। अफ्रीकी राज्यों ने अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस (ए. एन. सी.) को पूर्ण समर्थन दिया। गुट निरपेक्ष आंदोलन में शामिल देशों ने और समाजवादी देशों ने भी इस संघर्ष में अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस का पूरी तरह साथ दिया।
   दक्षिण अफ्रीका के गोरे शासक दुनिया में पूरी तरह अलग-थलग पड़ गए और देश के भीतर संघर्ष की ताकत बढ़ने लगी। इसलिए वे पृथकतावादी नीति को छोड़ने के लिए मजबूर होकर बातचीत की मेज पर बैठने के लिए तैयार हुए हैं। 26 साल के करीब जेल की यातना झेलने के बाद अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के उपाध्यक्ष नेलसन मण्डेला को 1989 में रिहा किया गया है। वे दक्षिण अफ्रीकी जनता के अपराजेय संघर्ष के प्रतीक बन चुके हैं। अक्टूबर 1990 में उनके भारत दौरे के समय उन्हें राष्ट्राध्यक्ष का सम्मान दिया गया। अंतर्राष्ट्रीय समझदारी के लिए उनको जवाहरलाल नेहरू पुरूस्कार से भी सम्मानित किया गया।
   अभी हाल में ही कुछ पृथकतावादी तत्वों को खत्म किया गया है, जैसे आम जनता के लिए बने स्थानों पर पृथकतावाद की समाप्ति की जा चुकी है लेकिन यह प्रथा जड़मूल से तब समाप्त होगी जब एक व्यक्ति और एक मत (वोट) का सिद्धांत स्वीकार कर लिया जाएगा।

जापान

  युद्ध में पराजय के बाद अमरीकी सेना का जापान पर कब्जा हो गया। जापानी राजनीतिक प्रणाली में कई तरह के सुधार आरंभ किए गए। उसकी अर्थव्यवस्था और समाजव्यवस्था में सुधारों का श्री गणेश किया गया। इससे युद्धोत्‍तर काल के जापानी विकास की नींव पड़ी। बड़े भू-स्वामियों की शक्ति खंडित कर दी गई। मजदूर संघों को अपना कामकाज करने की स्वतंत्रता दी गई। शिक्षा प्रणाली में सुधार किया गया, सैन्यवादी और संकीर्ण राष्ट्रवादी मूल्यों को सिखाने वाली शिक्षा पर रोक लगा दी गई। मई 1947 में एक नया संविधान लागू हुआ। इसको जापान पर कब्जा करने वाले अधिकारियों ने तैयार किया गया था। इस संविधान के जरिए राजतंत्र को बरकरार रखते हुए भी जापान में संसदीय प्रणाली की शुरूआत की गई और वयस्क मताधिकार का प्रावधान किया गया। सम्राट से सारे अधिकार छीन लिए गए, बस उसे राज्य का प्रतीक माना गया। नए जापानी संविधान में राष्ट्रीय नीति के रूप में युद्ध को तिलांजलि दे दी गई। इससे जापान के स्थाई सेना अथवा नौसेना रखने पर भी रोक लगी। 1952 में जापान पर संयुक्त राज्य अमरीका का कब्जा समाप्त हो गया यद्यपि संयुक्त राज्य अमरीका के पास एक सुरक्षा समझौते के तहत अपनी सेना को जापान में रखने का अधिकार बना रहा। देश पर रूढ़िवादी ‘‘लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी’’ का शासन चला आ रहा है। यद्यपि इसके प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार के अनेक मामलों से संबद्ध पाए गए, फिर भी यह पार्टी बार-बार सत्ता में वापस आती रही। दूसरी सर्वाधिक लोकप्रिय पार्टी सोशलिस्ट पार्टी है। यह पार्टी उद्योगों के राष्ट्रीयकरण की वकालत करती है और अमरीका के साथ हुए जापान के सुरक्षा समझौते को रद्द करने के पक्ष में है। इस कारण जापान अमरीकी गुट से जुड़ा हुआ है। जापानी कम्युनिस्ट पार्टी के अनुयाइयों की भी संख्या काफी अधिक है। ये दोनों पार्टियाँ जापान में किसी तरह के सैन्यवाद की पुनर्प्रतिष्ठा के विरोधी हैं। 1960 में जब इसका नवीकरण किया गया तब जापान में अमरीका के साथ सैनिक संधि का व्यापक विरोध हुआ था। इसके बाद भी इसका विरोध होता रहा है। हाल के वर्षों में जापान में कई दक्षिण पंथी गुट अस्तित्व में आए हैं जो सैनिक शक्ति के रूप में जापान की महानता की वकालत करते हैं। वे सैन्यवाद से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए मूल्यों में लोगों को दीक्षित करने की भी वकालत करते हैं।
   युद्ध के बाद के दशकों के दौरान जापान महान विश्व आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा है और अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में इसने अमरीका को चुनौती भी दी है। उसकी आर्थिक संवृद्धि को अकसर ‘‘चमत्कार’’ शब्द से संबोधित किया जाता है। उसके पास अधिकांश प्राकृतिक संसाधनों का अभाव है लेकिन प्रौद्योगिकी में उसने बहुत अधिक विकास किया है। प्रौद्योगिकी ही आज उसकी मुख्य पूँजी है। उत्पादन के कई क्षेत्रों में जहाँ ऊँचे किस्म की प्रौद्योगिकी की जरूरत पड़ती है, विश्व के हर देश से वह आगे निकल गया है। जापान की गिनती आज दुनिया की महानतम शक्तियों में होती है अतः अपने अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों में पश्चिम की सबसे ज्यादा विकसित पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाओं से उसका बहुत घनिष्ठ संबंध है। अपनी विदेश नीति में आमतौर पर वह संयुक्त राज्य अमरीका का पिछलग्गू रहा है 1970 के दशक के आरंभ में उसने चीन के साथ अपने संबंध सुधारने शुरू कर दिए, जो आधुनिक राष्ट्र के रूप में जापान के उभरने के बाद उसका मुख्य शिकार रहा है। उसने हाल में सोवियत संघ के साथ भी अपने संबंधों में सुधार के प्रयास आरंभ कर दिए हैं।

लैटिन अमरीका में बदलाव

  युद्ध के पहले वाली दिक्कतों का सामना अधिकांश लैटिन अमरीकी देश युद्ध के बाद भी करते रहे। (सरकार) मूलगामी आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन का भरोसा दिलाने वाली शासन व्यवस्था (सरकार) के अविर्भाव को अमरीका अपने लिए खतरा मानता था और इसके कारण वह लैटिन अमरीकी देशों के राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करता था। ये देश ज्यादातर उन्हीं समस्याओं से घिरे हुए थे जिनसे एशिया और अफ्रीका के विकासशील देश और ये राजनीतिक अस्थिरता के शिकार बने रहते थे। राजनीतिक अस्थिरता कई विकासशील देशों के राजनीतिक जीवन का सामान्य लक्षण बन चुका था। संयुक्त राज्य अमरीका के बहुत अधिक आर्थिक स्वार्थ लैटिन अमरीकी देशों से जुड़े हुए थे। कुछ देशों में तो संयुक्त राज्य अमरीका की कंपनियों का उनकी समूची अर्थव्यवस्था पर ही दबदबा था। अपना दबदबा कायम रखने के लिए अमरीकी सरकार की मदद से ये कंपनियाँ उन अलोकतांत्रिक सरकारों को प्रोत्साहन दिया करती थीं जिन सरकारों में सेना का अधिक प्रभाव होता था। लैटिन अमरीका में क्रांतिकारी सरकारों से जिस खतरे की कल्पना संयुक्त राज्य अमरीका किया करता था, उसके अलावा अमरीकी नीति में इन सरकारों को कम्युनिस्ट प्रेरित या कम्युनिस्टों के नियंत्रण में माना जाने लगा, इस नाते अमरीका की सुरक्षा के लिए खतरा समझा जाने लगा। कई मामलों में लैटिन अमरीका में अमरीका का हस्तक्षेप एकदम सीधा था अथवा सी. आई. ए. (अमरीका की खुफिया एजेंसी) द्वारा कम्युनिस्ट भय की चादर ओढ़ कर किया जाता था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद इस क्षेत्र में बहुत कम देश ऐसे हैं जहाँ लगातार चुनावों के जरिए सत्ता में आने वाली सरकारों का इतिहास मिलता हो।
   1940 के दशक के उत्‍तरार्द्ध से ही अधिकांश लैटिन अमरीकी देशों के राजनीतिक जीवन में वामपंथी प्रवृत्तियाँ अधिक ताकतवर हो गईं थीं। वे सरकार बनाने की स्थिति में थीं और उनके कारण मूलगामी सुधार शुरू किए गए थे। वे अलग-अलग अवधियों तक सरकार में टिकी रहती थीं और उनको सैनिक षड़यंत्र से ही सत्ता से अलग किया जाता था और इन सभी षड़यंत्रों में किसी न किसी रूप में अमरीका का हाथ होता था मैक्सिको और क्यूबा इस तख्ता पलट के सिर्फ दो अपवाद दिखते हैं। इन दोनों देशों में सत्ता को उखाड़ फेंकने में अमरीका को सफलता हाथ नहीं लगी। क्यूबा के विषय में शीत युद्ध के संदर्भ में हम पहले बता चुके हैं। सौ वर्षों से भी अधिक समय तक ग्वाटेमाला पर सैनिक तानाशाहों का शासन चला। पहली बार 1944 में स्वतंत्र चुनाव हुए तथा एक सुधारवादी सरकार सत्ता में आई 1950 से इस सरकार का नेतृत्व जैकोबो आर बेंज गुजमान ने किया। इस सरकार ने देश में कई सामाजिक और आर्थिक सुधारों का सूत्रपात किया तथा यूनाईटेड फ्रूट कंपनी की संपत्ति सरकारी कब्जे में ले ली। यह संयुक्त राज्य अमरीका की कंपनी थी जिसका ग्वाटेमाला की अर्थव्यवस्था पर काफी नियंत्रण था। इससे संयुक्त राज्य अमरीका की सरकार चौंक पड़ी। डलेस का विश्वास था कि आरबेंज की सरकार मुख्यतः कम्युनिस्ट सरकार है। 1954 में अमरीका के समर्थन से सेना ने धोखे से सत्ता को पलट दिया। लोगों के मन में अमरीका विरोधी भावना इतनी गहरी थी कि तत्कालीन उपराष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन 1958 में लैटिन अमरीकी यात्रा पर गए तो एक शहर से दूसरे शहर में क्रुद्ध और आक्रोश में डूबी और बहुधा खतरनाक भीड़ ने उनका स्वागत किया।
   1950 के दशक में लैटिन अमरीका में सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना क्यूबा की क्रांति थी जिसने पूरे क्षेत्र में मूलगामी और वामपंथी आंदोलनों को प्रेरित किया। पहली जनवरी 1959 को सैनिक तानाशाह बैतिस्ता देश से बाहर भाग गए। ये संयुक्त राज्य अमरीका के घनिष्ठ सहयोगी थे। क्यूबा में क्रांतिकारी आंदोलन के नेता फीदेल कास्त्रो ने वहाँ क्रांतिकारी सरकार गठित की। कास्त्रो का आंदोलन कम्युनिस्ट आंदोलन नहीं था लेकिन उनकी सरकार ने जब मूलगामी भूमि सुधार लागू करना शुरू किया और विदेशी कंपनियों की परिसंपत्ति का अधिग्रहण चालू किया तो संयुक्त राज्य अमरीका की सरकार इससे गुस्सा हो गई। संयुक्त राज्य अमरीका क्यूबा में पैदा की जाने वाली चीनी का मुख्य आयातक देश था। चीनी क्यूबा का प्रमुख उत्पाद था। इस आयात को अमरीका ने रोक दिया। धीरे-धीरे क्यूबा की सरकार ने सोवियत सरकार से घनिष्ठ संपर्क विकसित किया। कास्त्रो की हत्या कराने के सी. आई. ए. ने कई प्रयास (अमरीकी कांग्रेस के एक सदस्य ने इसका पता लगाया है और बताया है कि कास्त्रों की हत्या के 15 बार प्रयास किए गए थे) किए। इसी अध्याय में पहले पिग्स की खाड़ी के असफल नाटक और राष्ट्रपति केनेडी के शासन काल में प्रक्षेपास्त्र संकट की चर्चा की जा चुकी है। तीस साल से भी ज्यादा समय तक क्यूबा की क्रांति बची हुई है। इसने भयानक तूफान झेले हैं। यह आज भी लैटिन अमरीकी देशों को क्रांतिकारी चेतना प्रदान करने वाली प्रमुख शक्ति है।
   क्यूबा की क्रांति ने एक बहुत महान नेता पैदा किया जिसका जीवन बहुत अधिक प्रेरित और उत्साहित करने वाला था। उस नेता का नाम चे ग्वेरा था। वे अर्जेनटीना में पैदा हुए थे लेकिन 1956 में क्यूबा में फीदेल कास्त्रो के साथ आ गए। क्यूबा के क्रांतिकारी आंदोलन में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी। इस क्रांति की परिणति बतिस्ता की तानाशाही के खात्मे में हुई। क्यूबा की नई सरकार में वे मंत्री भी रहे लेकिन बोलिविया में क्रांति के आयोजन में मदद करने के उद्देश्य से उन्होंने 1956 में क्यूबा छोड़ दिया। बोलिविया की फौजी टुकड़ियों ने उनको पकड़कर मार डाला। लैटिन अमरीका के क्रांतिकारी युवकों और अन्य भागों के लोगों के लिए वे प्रेरणा के प्रमुख स्रोत बन गए।
   1970 में एक ऐसी घटना घटी जिससे सारी दुनिया सकते में आ गई। चीली में साल्वाडोर इलेंदे के नेतृत्व वाली सरकार का तख्ता पलट दिया गया। वे चीली की समाजवादी पार्टी के संस्थापकों में थे। 1970 में उनको चीली का राष्ट्रपति चुना गया था। लैटिन अमरीका में अन्य मूलगामी परिवर्तनवादी सरकारों की तरह (जो अतीत में सत्ता में आई थीं) एलेंदे ने भी भूमि सुधार और उद्योगों के राष्ट्रीयकरण जैसे मूलगामी सुधार शुरू किए। 11 सितंबर 1973 में जनरल पिनोचेट के नेतृत्व में एक सैनिक गुट ने अमरीकी खुफिया एजेंसी (सी. आई. ए.) की मदद से एलेंदे सरकार का तख्ता पलट दिया। एलेंदे राष्ट्रपति निवास में लड़ते हुए मारे गए। एक नृशंस और निरंकुश सैनिक सरकार ने सत्ता की बागडोर सम्हाली और अभी हाल के वर्षां तक चीली पर इसी सरकार का शासन था।
   जिन घटनाओं की ऊपर चर्चा की गई है, उनसे लैटिन अमरीका में बदलाव और विकास की प्रमुख प्रवृत्तियों का संकेत मिलता है। जिनकी ऊपर चर्चा की गई है, उनसे कहीं ज्यादा देशों में संयुक्त राज्य अमरीका ने हस्तक्षेप किया है। उदाहरण के रूप में इन देशों का नाम लिया जा सकता है - होंडुरास, पनामा, निकारागुआ, एल सल्वाडोर, ग्रेनेडा आदि। अनेक सैनिक क्रांतियाँ (सेना द्वारा गैर कानूनी तरीके से सत्ता पर कब्जा) हुई हैं। मुख्य रूप से इनका लक्ष्य जनता द्वारा चुनी हुई ऐसी सरकारें रही हैं। जिन्होंने मूलगामी सामाजिक और आर्थिक सुधार लागू करने की कोशिश की। बहरहाल, मूलगामी राजनीतिक आंदोलन मजबूत हुए हैं। लैटिन अमरीका में कैथोलिक मतानुयाई पादरियों का रूख काफी बदला है। यह परिवर्तन काफी महत्वपूर्ण है। सभी क्रांतिकारी विचारधाराओं और आंदोलनों के ये लोग परंपरागत विरोधी रहे हैं। चर्च और उसके पुरोहित दोनों जब सामाजिक और आर्थिक सुधारों के प्रति अधिक जिम्मेदार बन गए हैं। कई पादरी और पुरोहित क्रांतिकारी सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं।

गुट निरपेक्ष आंदोलन

  अंतर्राष्ट्रीय मामलों में गुट निरपेक्ष आंदोलन की भूमिका तथा इसके जन्म और विकास की चर्चा के संदर्भ पहले कई बार आ चुके हैं। इस आंदोलन का जन्म उस समय हुआ जब खास तौर से एशिया और अफ्रीका के देश पहली बार स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उभर रहे थे और अपनी स्वतंत्रता की हिफाजत करने में उनकी गहरी दिलचस्पी थी, दुनिया का आकार-प्रकार निर्धारित करने में स्वतंत्र भूमिका निभाना चाहते थे और साम्राज्यवाद को नष्ट करने की प्रक्रिया को और तेज करना चाहते थे। विश्व इतिहास के रंगमंच पर ऐसे समय में उनका उदय हुआ था जब पहले से विश्व शीत युद्ध के महासमुद्र में डूबा हुआ था, सैनिक गठबंधन हो रहे थे, विनाशकारी शस्त्रों की होड़ लगी थी। इससे इन देशों की आजादी को खतरा पैदा हो गया था और साथ ही विश्व मानवता को भी खतरा था। जिस विश्व अर्थव्यवस्था में उन्होंने अपने को पाया, वह पूरी तरह से असमानता और शोषण पर आधारित थी और उनके विकास की जरूरतों को तकाजा था कि विश्व की अर्थव्यवस्था में आधारभूत परिवर्तन किया जाए। इन्हीं परिस्थितियों में गुट निरपेक्ष आंदोलन का जन्म हुआ और उसने रूपाकार ग्रहण किया।
   औपचारिक रूप से गुट निरपेक्ष आंदोलन की स्थापना 1961 में तब हुई थी जब यूगोस्लाविया के बेलग्रेड नगर में इसमें शामिल देशों का पहला अधिवेशन हुआ था लेकिन इसके सूत्रों को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के आरंभिक वर्षां में खोजा जा सकता है। मार्च 1947 में दिल्ली में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं ने एशियाई देशों का एक अधिवेशन आयोजित किया। स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री का पद कुछ ही महीनों बाद जवाहर लाल नेहरू सम्हालने वाले थे, उन्होंने इस अधिवेशन में घोषणा की कि, ‘‘बहुत लंबे समय से यूरोप के राजदरबारों और कचहरियों में हम एशिया के लोग फरियादी के रूप में हाजिर होते रहे हैं। अब इसे अतीत की कहानी बनना होगा। अब हम अपने पैरों पर खड़े होने का प्रस्ताव कर रहे हैं और उन सभी लोगों के साथ सहयोग का प्रस्ताव कर रहे हैं, जो हमारे साथ सहयोग करने के लिए तैयार हैं, अब हम किसी दूसरे के हाथ का खिलौना नहीं बनना चाहते......। एशिया के देशों को दूसरे लोग अब बंधक के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकते। दुनिया की गतिविधियों में बाध्यतन उनकी अब अपनी नीतियाँ होंगी।’’ उन्होंने उन नए खतरों के प्रति सचेत किया जिससे दुनिया को भय था और कहा, ‘‘पश्चिम ने हमें......युद्ध में ढकेला है, संघर्ष में डाला है और इस समय भी, एक भयानक युद्ध के बाद, अगले युद्धों के बारे में लोग बात करते हैं, अणु युग के युद्ध के बारे में जो हमारे सामने है। इस अणु युग में एशिया को प्रभावी तरीके से शांति कायम रखने के लिए काम करना होगा।’’
   1940 के दशक के समाप्त होने तक पश्चिमी देशों के सैनिक संगठन ‘‘नाटो’’ (नार्थ एटलांटिक ट्रीटी आरगेनाइजेशन) की स्थापना हो चुकी थी तथा 1950 के दशक के शुरू में एशिया में सैनिक समझौते किए जाने लगे थे। शीत युद्ध को सारी दुनिया में फैलाया जा रहा था। इसकी वजह से तनाव और टकराव पैदा हो रहे थे। इस पृष्ठभूमि में चीन और भारत ने मिल कर ‘‘पंचशील’’ के सिद्धांतो का प्रतिपादन किया। इसका अर्थ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांत हैं। 1954 में भारत और चीन ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, उसकी प्रस्तावना में इन पाँचों सिद्धांतों का समावेश किया गया था। ये पाँच सिद्धांत गुट निरपेक्ष आंदोलन के अभिन्न अंग बने। 1950 के दशक के आरंभिक वर्षों में एशिया में कई प्रतिभाशाली महान नेता हुए। उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को समाप्त करने के लिए उन लोगों ने एशियाई और अफ्रीकी देशों में एकता कायम करनी चाही। उन्होंने अपने को शीत युद्ध के टकरावों से भी पृथक रखना चाहा। 17 से 24 अप्रैल के बीच 1955 में इंडोनेशिया के अहमद सुकर्ण ने बांडुंग में एशियाई और अफ्रीकी देशों के एक सम्मेलन की मेजबानी की। इसमें कुल मिला कर 29 एशियाई और अफ्रीकी देश शामिल हुए थे। इसमें भाग लेने वाले बड़े नेताओं में जवाहरलाल नेहरू, चीन के प्रधानमंत्री चाउ-एन-लाई तथा मिश्र के प्रधानमंत्री (बाद में राष्ट्रपति) अब्दुल गमाल नासिर मुख्य थे। यद्यपि इस सम्मेलन में कई देशों ने भाग लिया जैसे पाकिस्तान, ईरान, इराक, फिलीपाइंस, टर्की, थाईलैंड। ये सभी संयुक्त राज्य अमरीका द्वारा प्रायोजित सैनिक संगठनों के सदस्य थे। इस सम्मेलन में सर्वसम्मति से एक विज्ञप्ति स्वीकार की गई, उसमें उन विचारों को स्पष्ट रूप से रखा गया जिनमें गुट निरपेक्ष आंदोलन के कुछ आधारभूत सिद्धांत दिए गए हैं। गुट निरपेक्ष आंदोलन के इतिहास में बांडुंग सम्मेलन एक महत्वपूर्ण बिंदु माना गया है। एशिया तथा अफ्रीका के देशों का यह सबसे बड़ा सम्मेलन था। इसमें दुनिया की आधी आबादी के प्रतिनिधि मौजूद थे।
   1950 के दशक के मध्य से ही गुटनिरपेक्ष देशों के नेता विचार विमर्श के लिए बैठकों का आयोजन करने लगे थे। इसके बाद धीरे-धीरे यह विचार आया कि सभी गुट निरपेक्ष देशों का एक सम्मेलन आयोजित किया जाना चाहिए। 1960 का संयुक्त राष्ट्र संघ का अधिवेशन काफी ऐतिहासिक था। इस वर्ष अफ्रीका के सत्रह नव स्वतंत्र देश संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य बने थे। नव स्वतंत्र राष्ट्रों की सदस्यता से बढ़ी महासभा की संख्या के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ में महत्वपूर्ण बदलाव आया। यह सचमुच अंतर्राष्ट्रीय संगठन बन गया था। इसमें दुनिया के लगभग सभी देशों का समय बीतने के साथ प्रतिनिधित्व हो गया। ऐसे समय में जब उपनिवेशवाद की समाप्ति की प्रक्रिया तेज हो गई थी, इस प्रक्रिया को और तेज करने में संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो गई। 14 दिसंबर 1959 को उपनिवेशवादी देशों की जनता को स्वतंत्रता दिलाने के विषय में संयुक्त राष्ट्र संघ ने एक ऐतिहासिक घोषणा-पत्र स्वीकार किया। संयुक्त राष्ट्र संघ के इस ऐतिहासिक सत्र में पाँच गुट निरपेक्ष देशों के नेता उपस्थित थे। उनके नाम हैं - भारत के जवाहरलाल नेहरू, इंडोनेशिया के सुकर्ण, मिस्र के नासिर, यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो और घाना के क्वामें न्यूक्रूमा। अगले साल सभी गुट निरपेक्ष देशों का अशिवेशन बुलाने के लिए उन्होंने ऐतिहासिक निर्णय लिए।
   गुट निरपेक्ष देशों या राज्यों के प्रमुखों का पहला अधिवेशन 1 से 6 सितंबर 1961 में बेलग्रेड, यूगोस्लाविया में हुआ। इसके पूर्ण सदस्यों के रूप में 25 देशों ने इस अधिवेशन में भाग लिया। ये देश थे - अफगानिस्तान, अल्जीरिया, कंबोडिया, श्रीलंका, कांगो (अब जायरे), क्यूबा, साइप्रस, ईथोपिया, घाना, गीनी, भारत, इंडोनेशिया, इराक, लेबनान, माली, मोरक्को, नेपाल, साऊदी अरब, सोमालिया, सुडान, ट्यूनीशिया, यूनाईटेड अरब रिपब्लिक (तब के मिस्र तथा सीरिया को मिला कर), यमन तथा यूगोस्लाविया (अल्जीरिया अभी आजाद नहीं हुआ था लेकिन एफ. एल. एन. द्वारा बनाई गई अस्थाई सरकार को पूर्ण सदस्य के रूप में इसमें लिया गया था। बाद में इसमें स्वापो तथा पी. एल. ओ. को भी पूर्ण सदस्य के रूप में इसमें शामिल कर लिया गया।) इस अधिवेशन में एक घोषणा-पत्र स्वीकार किया गया। इसमें कहा गया था - ‘‘शीत युद्ध और संभावित महाविनाश का एकमात्र विकल्प शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांत हैं।’’ इसके बाद कहा गया कि स्थाई शांति केवल उस विश्व में मिल सकती हैं, जिस विश्व में उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद तथा नव उपनिवेशवाद को उसके सभी रूपों में जड़ से समाप्त कर दिया जाए।’’ इस सम्मेलन में सोवियत प्रधानमंत्री निकिता खुश्चेव और संयुक्त राज्य अमरीका के राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी को संबोधित करते हुए पत्र भी लिखे और उनसे बातचीत प्रारंभ करने के लिए आग्रह किया जिसका उद्देश्य युद्ध के खतरे को कम करना तथा शांति सुनिश्चित करना था।
   पहले ही अधिवेशन में गुट निरपेक्ष आंदोलन के मूलभूत उद्देश्यों के स्वरूप निर्धारित किए जा चुके थे। इनमें से कुछ उद्देश्यों को आगे चलकर थोड़े विस्तार से स्पष्ट किया गया और ज्यादा विशिष्ठ रूप दिया गया। सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्देश्यों में निम्नांकित बातें शामिल थीं - साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का अंत, अंतर्राष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और निरस्त्रीकरण को बढ़ावा देना, नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की रचना, नस्लवाद और नस्लवादी भेदभाव का खात्मा तथा सूचना साम्राज्यवाद का अंत करना।
   पिछले तीस वर्षों के दौरान गुट निरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देशों की संख्या 103 हो गई है। इनमें से तकरीबन हर देश संयुक्त राष्ट्र संघ का भी सदस्य है। इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ की कुल सदस्य संख्या का यह एक तिहाई है। अफ्रीकी एकता संगठन के घोषणा-पत्र में इसका एक सिद्धांत दिया गया है, ‘‘सभी गुटों के विषय में गुट निरपेक्षता की नीति की स्वीकृति’’ गुट निरपेक्ष आंदोलन के नौ शिखर सम्मेलन हो चुके हैं। उनका क्रम इस प्रकार है - बेलग्रेड़ (1961), काहिरा (1964), लुसाका (1970), अल्जीयर्स (1973), कोलंबो (1976), हवाना (1979), दिल्ली (1983), हरारे (1986) और बेओग्राद (1989)। अलजीयर्स में हुए चौथे शिखर सम्मेलन में एक संयोजन ब्यूरो बनाने का निर्णय लिया गया था। बाद में जा कर संयुक्त गतिविधियों में ताल मेल रखने का काम सौंपा गया था। इसके उद्देश्य इस प्रकार थे - उन कार्यक्रमों को लागू करना जिन्हें शिखर सम्मेलनों में स्वीकार किया गया है, संयुक्त राष्ट्र संघ में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के गुटों के मंत्रियों की बैठकों और सम्मेलनों में स्वीकृत प्रस्तावों को अमली जामा पहनाना तथा गुट निरपेक्ष देशों की अन्य बैठकों में लिए गए निर्णयों पर कार्रवाई करना।
   एक विश्व की रचना का स्वप्न गुट निरपेक्ष आंदोलन की गतिविधियों का प्रमुख योगदान है।