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1890 से 1918 तक विश्व का राजनीतिक परिदृश्य
उन्नीसवीं सदी के लगभग आखिरी दशक से लेकर 1914 तक, जब प्रथम विश्व युद्ध की शुरूआत हुई, विश्व पर यूरोप का दबदबा बना रहा। लेकिन इस बात के संकेत मिलने लग गए थे कि यूरोपीय प्रभुत्व के खात्मे की शुरूआत हो चुकी है। यूरोप के बाहर संयुक्त राज्य अमरीका और जापान का मुख्य शक्ति के रूप में उदय हो चुका था। उपनिवेशों के भीतर राष्ट्रीय आंदोलन उठ खड़े होने लगे थे। उपनिवेशों पर अधिकार जमाने के लिए यूरोप की साम्राज्यवादी ताकतों के बीच स्पर्धा और यूरोपीय मामलों को लेकर विभिन्न यूरोपीय राज्यों में परस्पर टकराव के चलते प्रथम विश्व युद्ध हुआ जो यूरोप के लिए अत्यंत विनाशकारी साबित हुआ। यूरोप के ही कई देशों में शक्तिशाली आंदोलनों का सूत्रपात हुआ। इन आंदोलनों का मकसद मौजूदा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना था। यहाँ तक कि युद्ध समाप्त होने से पहले ही यूरोप के सबसे बड़े देश रूस में एक सफल क्रांति हो चुकी थी। प्रथम विश्व युद्ध के 1918 में समाप्त होने के बाद जो दुनिया सामने आई, वह अपने तीन दशक पहले वाली दुनिया से बहुत भिन्न थी।
यूरोपयूरोप का प्रभुत्व और साम्राज्यवादी ताकतों की आपसी प्रतिस्पर्धा1870 के दशक के दौरान साम्राज्यवादी विस्तार का नया चरण शुरू हुआ। तब से लेकर 1914 तक एशिया और अफ्रीका के लगभग सभी हिस्से तथा विश्व के दूसरे क्षेत्रों के कुछ हिस्से किसी न किसी यूरोपीय साम्राज्यवादी ताकत के नियंत्रण में आ चुके थे। एशिया में भारत, मलेशिया, श्रीद्द लंका और बर्मा ब्रिटिश शासन के अधीन थे। हिंद चीन के अंतर्गत आने वाले देश फ्रांसीसी शासन के अंतर्गत थे और इण्डोनेशिया डचों के कब्जे में था। चीन पर किसी साम्राज्यवादी देश का प्रत्यक्ष शासन तो नहीं था लेकिन इसको विभिन्न देशों के प्रभाव क्षेत्रों में बाँट दिया गया था। इसकी हैसियत एक अंतर्राष्ट्रीय उपनिवेश जैसी हो गई थी। बॉक्सर विद्रोह के कारण चीन का विभाजन रूका था। यह विद्रोह 1889-90 में भड़का था। इस विद्रोह को अंग्रेजी, जर्मन, रूसी, फ्रांसीसी, जापानी और अमरीकी फौजों ने मिल कर दबाया था। इन फौजों ने बीजिंग पर अधिकार कर लिया था लेकिन चीन को विभाजित होने से बचा लिया था। 1907 में ईरान के तीन टुकड़े कर दिए गए थे। एक टुकड़े में इंग्लैंड का प्रभाव था, दूसरे क्षेत्र पर रूस का प्रभाव था और तीसरे हिस्से को रूस तथा ब्रिटेन दोनों के लिए खुला छोड़ दिया गया था। अफगानिस्तान पर भी एक सीमा तक ब्रिटेन का नियंत्रण था। मध्य एशिया रूसी साम्राज्य के अधीन आ चुका था। एशिया का एकमात्र स्वतंत्र देश जापान रह गया था। जापान ने चीन को 1895 में पराजित किया था तथा फारमोसा पर कब्जा कर लिया था और आने वाले वर्षों में उसने चीन पर भी अपना प्रभाव विस्तार किया तथा मंचूरिया के युद्ध में रूस को पराजित किया था। 1910 में उसने कोरिया पर भी कब्जा जमा लिया।इथयोपिया और लाइबेरिया को छोड़ कर समूचे अफ्रीकी महाद्वीप को यूरोपीय शक्तियों ने आपस में बाँट लिया था। 1876 में बेल्जियम के राजा लियोपोल्ड द्वितीय ने कमोबेश अपनी व्यक्तिगत संपित्त के रूप में कांगो पर कब्जा कर लिया था। 1908 में इसको बेल्जियन सरकार को सौंपा गया था। अफ्रीका में मिस्र, सूडान, रोडेशिया, यूगाण्डा, ब्रिटिश, पूर्वी अफ्रीकी, सिएरा, लियोन, गोल्ड कोस्ट (घाना), नाइजीरिया और दक्षिण अफ्रीका, ब्रिटिश साम्राज्य के हिस्से थे। फ्रांसीसियों ने अफ्रीका, ट्यूनीशिया, मोरक्को, सहारा, फ्रेंच कांगो, फ्रेंच गायना, सेनेगल, डाहोमी और मैडागास्कर को हथिया लिया था। जर्मनी ने जर्मन पूर्वी अफ्रीका, दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका, कैमरून और टोगोलैण्ड को अपने अधीन कर लिया था। इटली ने लीबिया और सोमाली लैण्ड को जीता था, पुर्तगाल ने अंगोला, मोजांबीक और पुर्तगाल गायना तथा स्पेन ने रियाडोजिनरो तथा स्पेनिश गायना को जीत कर अपने अधीन किया था। 1896 में अडोवा की प्रसिद्ध लड़ाई में इथयोपिया को जीतने की इटली की महत्वाकांक्षा को विफल कर दिया गया था। जब इथयोपिया की सेना से उसे मुँह की खानी पड़ी थी। शासन के अधीन रहने वाली जनसंख्या के लिहाज तथा क्षेत्र विस्तार के लिहाज से ब्रिटिश साम्राज्य सबसे बड़ा था। इस समय ब्रिटेन की जनसंख्या 4.5 करोड़ थी। लेकिन जिस भूभाग पर उसका औपनिवेशिक कब्जा था उसका क्षेत्रफल 2.3 करोड़ वर्ग किलोमीटर था तथा उसमें लगभग 40 करोड़ लोग रहते थे। जिस क्षेत्र पर फ्रांस का कब्जा था, उसका क्षेत्रफल लगभग एक करोड़ किलोमीटर था तथा इस क्षेत्र के निवासियों की कुल जनसंख्या तकरीबन 5 करोड़ थी, जबकि फ्रांस की अपनी आबादी 3.9 करोड़ थी। यूरोप का सारी दुनिया पर न सिर्फ राजनीतिक प्रभुत्व था, बल्कि उसका आर्थिक प्रभुत्व भी था। विश्व के लगभग 45 प्रतिशत व्यापार पर यूरोप के तीन देशों यानी फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी का कब्जा था। कारखाने में बने माल को खपाने के लिए विश्व का 60 प्रतिशत बाजार उनकी मुट्ठी में था। एशिया और अफ्रीका पर साम्राज्यवादी विजय की प्रक्रिया के साथ-साथ यूरोप की साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच आपसी विरोध और टकराव की प्रकिया भी प्रारंभ हुई। उपनिवेशों पर अधिकार जताने की प्रतियोगिता के कारण बहुधा युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो जाती थी। फिर भी आमतौर पर इनमें से अधिकांश झगड़ों को आपस में मिल-बैठ कर सुलझा लिया जाता था तथा युद्ध लड़ने की नौबत नहीं आ पाती थी। यूरोपीय शक्तियाँ अपने प्रतिस्पर्धा दावों को हल कर लिया करती थीं। यह समझौता कुछ लेकर और कुछ देकर कर लिया जाता था यानी कुछ भाग ले लिया जाता था और कुछ भाग दे दिया जाता था। एक उदाहरण लें, 1940 में परस्पर विरोधी दावों की लंबी अवधि के बाद, जिसके कारण ब्रिटेन और फ्रांस में टकराव की स्थिति पैदा हो गई थी, ब्रिटेन तथा फ्रांस ने आपस में गुप्त समझौता कर लिया जिसके कारण मिस्र में ब्रिटेन को खुली छूट मिली। इसके बदले मोरक्को फ्रांस को दिया जाना था। जब इसका पता जर्मनी को लगा तो उसने माँग की कि फ्रांस को मोरक्को पर अपना दावा छोड़ देना चाहिए। इसके बाद यूरोप में एक के बाद एक संकट की स्थितियाँ पैदा हुईं जिसमें युरोप युद्ध के कगार पर आ पहुँचा। अंततः मोरक्को का मुद्दा 1911 में तय हुआ जब फ्रांस अपने अधीन के कांगो क्षेत्र के एक हिस्से को जर्मनी को देने के लिए सहमत हुआ और जर्मनी ने फ्रांस को सूचित किया कि वह मोरक्को में जो कुछ चाहे, कर सकता है। इन संकटों को पैदा करने और हल करने में फ्रेंच, कांगो तथा मोरक्को की जनता का कोई दखल नहीं था जिनकी भूमि को लेकर सौदेबाजी चल रही थी। ‘‘भले मानुसों के समझौते‘‘ के बावजूद जिनसे उपनिवेशों पर कब्जा संबंधी विवाद सुलझाए गए, यूरोप की सरकारों का सैन्यीकरण बढ़ता गया। हर देश दूसरे देश को लेकर भय तथा शंका से ग्रस्त था और उसने अपनी सैनिक और नौसैनिक क्षमता के विस्तार की कोशिश की। लगातार हर देश की थल सेना और जल सेना का आकार बढ़ता चला गया। अधिकांश यूरोपीय देशों ने ऐसे नियम लागू किए जिनके चलते हर वयस्क नागरिक के लिए सैनिक प्रशिक्षण अनिवार्य बन गया। यूरोप क्रमशः शस्त्रागार में बदलता चला गया। वास्तविकता यह थी कि हर देश का यह दावा था कि शस्त्रास्त्र में उसकी बढ़ोत्तरी का शुद्ध उद्देश्य आत्मरक्षा था लेकिन दूसरा जो भी देश ऐसा कर रहा था वह आक्रमण के उद्देश्य से कर रहा था। ब्रिटेन ने जर्मनी के शक्तिशाली नौसैनिक निर्माण का यह कह कर विरोध किया था कि उसके लिए ऐसा करना विलासिता थी क्योंकि पहले से ही उसके पास एक शक्तिशाली थल सेना मौजूद थी। जर्मनी के सम्राट कैसर विलियम द्वितीय ने घोषणा की, ‘‘जर्मन बेड़े की तैयारी किसी देश के विरूद्ध नहीं है, वह इंग्लैंड के भी विरूद्ध नहीं है, बल्कि अपनी जरूरत के मुताबिक है...... हम अपने को फ्रांस, रूस और इंग्लैंड से भी सुरक्षित रखना चाहते हैं। काले लोगों के विरूद्ध गोरों का हर तरह से मैं पक्षपाती हूँ।‘‘ लेकिन अपनी नौसैनिक श्रेष्ठता को कायम रखने के लिए ब्रिटेन कृत संकल्प था। अपने साम्राज्य और वाणिज्यिक हितों की रक्षा के लिए भी वह दृढ़ निश्चय था तथा वह अपने आप को सुरक्षा की भावना प्रदान करना चाहता था। जिस व्यग्रता से यूरोप के विभिन्न देशों की सामरिक ताकत बढ़ रही थी और युद्ध की तैयारियाँ की जा रही थीं, उससे यह भावना काफी तेजी से बल पकड़ रही थी कि युद्ध अवश्यभावी है। युद्ध को तमाम घटनाओं की स्वाभाविक परिणति माना जाता था और यहाँ तक कि इसको एक प्रकार का गुण भी समझा जाता था। युद्ध की तैयारी के साथ-साथ उसका प्रचार भी किया जा रहा था। कुछ विचारक और राजनीतिज्ञ युद्ध को दैवी तत्व मानते थे और प्रगति के लिए इसको एक शर्त भी समझते थे। जब हम यूरोप की आर्थिक और सैनिक शक्ति की बात करते हैं तब यह बात याद रखने की है कि यह बात यूरोप के सभी देशों के बारे में सच नहीं है। 1914 में जब लड़ाई छिड़ी तो छोटे बड़े कुल मिला कर यूरोप में लगभग पच्चीस देश थे। ब्रिटेन, जर्मनी तथा फ्रांस इनमें सर्वाधिक औद्योगीकृत राष्ट्र थे, जबकि इबेरियन प्रायद्वीप में स्पेन और पुर्तगाल, बाल्कन राज्य जैसे अल्बानिया, सल्बिया तथा बल्गारिया, ग्रीस और पूर्वी यूरोप के देश मुख्य रूप से प्राक्-उद्योग की अवस्था वाले देश थे यद्यपि इनमें से कुछ ने उपनिवेशों पर भी अधिकार कर लिए थे। रूस की जनसंख्या यूरोप में सबसे अधिक थी और उसका साम्राज्य भी बड़ा था लेकिन वह भी मूलतः कृषि प्रधान देश था। वहाँ अभी औद्योगीकरण की शुरूआत ही हुई थी, वह भी शुरूआत दूसरे देशों के द्वारा पूँजी निवेश से हो सकी थी। राज्यों का आधार राष्ट्रीयताएँ भी नहीं थीं। एस्टोनिया के बाल्टिक लोग, लाटेविया और लिथुआनिया तथा फिनलैण्ड रूसी साम्राज्य के अंग थे। राज्य के रूप में पोडैण्ड का तो उस समय अस्तित्व ही नहीं था। इस एक हिस्सा रूसी साम्राज्य के अधीन था और दूसरा हिस्सा आस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य के कब्जे में था तथा इसका तीसरा हिस्सा जर्मनी के पास था। चैकोस्लोवाकिया भी आस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य का हिस्सा था, इसी प्रकार स्लाव जनता के और क्षेत्र भी इसी साम्राज्य के अंतर्गत थे (इसमें आज के यूगोस्लाविया के भी कुछ भाग थे)। आयरलैण्ड सदियों से ब्रिटिश उपनिवेश था। इन देशों की राजनीतिक प्रणालियाँ भी अलग-अलग थीं। इनमें से कुछ गणराज्य थे यद्यपि सारे गणतंत्रों का रूप लोकतांत्रिक नहीं था। कुछ में संवैधानिक राजशाही कायम थी और अलग-अलग देशों में राजाओं की शक्तियाँ एक जैसी नहीं थीं। बाकी में निरंकुश तंत्र कायम थे। यूरोप के भीतर टकरावयूरोपीय देशों का आपसी टकराव उपनिवेशों के सवाल तक ही सीमित नहीं था। यूरोपीय मामलों को लेकर भी उनमें आपस में विरोध और तनाव थे। ऊपर जिन पच्चीस यूरोपीय राज्यों की चर्चा की गई है, उनमें पाँच को ही शक्तिशाली राज्य माना जा सकता है। ये शक्तिशाली राज्य थे - ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, आस्ट्रिया-हंगरी और रूस। इनमें भी ब्रिटेन सबसे अधिक धनी और ताकतवर था। ब्रिटेन में संसदीय प्रणाली वाली सरकार थी यद्यपि वहाँ राजतंत्र को भी बरकरार रखा गया था। उन्नीसवीं शताब्दी में विभिन्न सुधार अधिनियमों के पारित किए जाने के बावजूद हाउस ऑफ कामन, जो ब्रिटेन की संसद थी तथा जिसके सदस्य जनता द्वारा चुने जाते थे (दूसरे सदन को हाउस ऑफ लार्ड्स कहते हैं जिसके सदस्य वंश पंरपरा के आधार पर मनोनीत होते थे), वास्तविक रूप में लोकतांत्रिक नहीं थी। सभी लोगों को मतदान का अधिकार नहीं था और स्त्रियों को तो मताधिकार अभी तक मिला ही नहीं था। ब्रिटेन जिन मुख्य समस्याओं का सामना कर रहा था उनमें आयरलैण्ड द्वारा होम रूल (आंतरिक स्वशासन) की माँग मुख्य थी। आयरलैण्ड में एक शक्तिशाली स्वतंत्रता आंदोलन धीरे-धीरे फलफूल रहा था, यद्यपि कुछ लोग इसके खिलाफ थे जिनमें अधिकांश वे थे जो इंग्लैंड और स्कॉटलैण्ड से जाकर वहाँ बस गए थे। यूरोपीय महाद्वीप में आर्थिक तथा सैनिक दोनों ही दृष्टियों से जर्मनी सबसे अधिक शक्तिशाली था और ब्रिटेन का मुख्य प्रतिद्वंदी था। वहाँ भी संसदीय प्रणाली वाली सरकार थी। यहाँ के राजा की शक्ति ब्रिटेन के राजा की तुलना में काफी अधिक मजबूत थी। पोलैण्ड और अलसेंस लोरिए के कुछ हिस्से जर्मनी के भूभाग के अंग थे। ये हिस्से जर्मनी ने 1870-71 में फ्रांस से युद्ध करके प्राप्त किए थे। फ्रांस यूरोप का तीसरा सर्वाधिक औद्योगीकृत देश था। यह 1871 से गणराज्य व्यवस्था के अंतर्गत था। फ्रांस उस दिन की फिराक में था जब वह जर्मनी से अपने अपमान का बदला लेता और अलसेंस लोरिए को वापस लेता। आस्ट्रिया-हंगरी में दुहरा राजतंत्र था, इसे हैप्सवर्ग साम्राज्य के नाम से जाना जाता था। आस्ट्रिया तथा हंगरी दो महत्वपूर्ण देश इस साम्राज्य में शामिल थे और फ्रांसिस जोसेफ एक साथ आस्ट्रिया का सम्राट और हंगरी का राजा था। राजनीतिक दृष्टि से आस्ट्रिया और हंगरी यूरोप के सर्वाधिक संकटग्रस्त राज्य थे। यूरोप के काफी बड़े भूभाग पर यह फैला हुआ था। इसके भू-भाग में आस्ट्रिया और हंगरी के अलावा इसके अंतर्गत चैकोस्लोवाकिया स्लेव क्षेत्र (जो बाद में चल कर यूगोस्लाविया बना) पोलैण्ड का कुछ हिस्सा, रूमानिया और यहाँ तक कि इटली का एक हिस्सा भी आता था। इन सभी क्षेत्रों में राष्ट्रवाद की लहर उठ रही थी जिसके चलते गहरे अंसतोष और परस्पर विभाजन की हालत पैदा हो गई थी। आस्ट्रिया-हंगरी में रूस और सर्बिया स्लाव जनता की राष्ट्रीय भावना को भड़का रहे थे इसलिए आस्ट्रिया-हंगरी और इन दोनों देशों में आपस में विरोध पैदा हो गया था। रूस यूरोप का सबसे बड़ा देश था और उसने बहुत विशाल साम्राज्य स्थापित कर लिया था। उसके इस विशाल साम्राज्य में यूरोप के बाल्टिक राज्य, फिनलैंड तथा पोलैण्ड का एक हिस्सा शामिल था, इसके अतिरिक्त उत्तरी और मध्य एशिया भी उसके साम्राज्य के अंग थे। वह एक पिछड़ा हुआ खेतिहर देश था जिसमें थोड़े बहुत उद्योग थे। ये उद्योग कुछ बड़े शहरों में केंद्रित थे। यहाँ की राजनीतिक व्यवस्था काफी पुरानी थी। उस पर जार के निरंकुश तंत्र का आधिपत्य था। उस समय रूसी सम्राटों को इसी नाम से पुकारा जाता था और 1905 तक उसके पास संसद का कोई ढाँचा भी नहीं बना था। 1905 की क्रांति के बाद वहाँ एक संसद बनाई गई जिसको ड्यूमा कहा जाता था लेकिन इसके पास कोई सत्ता नहीं थी। रूसी साम्राज्य के अंदर गैर रूसी जातियों (नेशनलिटीज) में अंसतोष गहराता जा रहा था। गैर रूसी जातियों में यह अंसतोष उनके जातीय दमन के कारण था और रूसी लोगों में दमनकारी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था के कारण। यूरोप का एक दूसरा देश इटली भी अपने को शक्तिशाली दिखाने का बहाना कर रहा था। उसकी औपनिवेशिक महत्वाकांक्षाएँ काफी ऊँची थीं लेकिन इसके उत्तरी इलाके को छोड़ शेष इलाका औद्योगिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ था।यूरोप में कुछ हद तक तनाव की वजह ऑटोमन साम्राज्य के टुकड़े होना भी था। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंम्भ में सारा का सारा बाल्कन प्रायद्वीप ऑटोमन साम्राज्य का अंग था। पूरी उन्नीसवीं सदी के दौरान ऑटोमन साम्राज्य और रूसी साम्राज्य के बीच युद्ध होते रहे। ऑटोमन साम्राज्य के भूभाग पर नियंत्रण करने के रूसी प्रयासों को यूरोप के दूसरे देश भी असफल करते रहे। इनमें ब्रिटेन, हंगरी-आस्ट्रिया और जर्मनी मुख्य थे। बीसवीं सदी के आरंभ होते-होते बाल्कन देशों पर ऑटोमन का शासन नहीं के बराबर था। सर्बिया, बल्गेरिया और अल्बानिया का स्वतंत्र राष्ट्रों के रूप में उदय हो चुका था। फिर भी ऑटोमन साम्राज्य के विभाजन से यूरोप की जातीय समस्या का समाधान नहीं हो सका। स्लाव जनता के हितों के रक्षक के रूप में सर्बिया का आविर्भाव हुआ था। इस जाति के अनेक लोग आस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य में रह रहे थे। बृहत्तर सर्बिया के निर्माण की अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए वह रूसी समर्थन पर निर्भर था जिसमें ऑटोमन साम्राज्य का बोस्निया तथा हर्जेगोविना शामिल था। ये दोनों आस्ट्रिया-हंगरी के अंग थे। इसके अतिरिक्त इसमें आस्ट्रिया-हंगरी का दक्षिण भाग भी शामिल था जहाँ स्लाव जाति के लोग रहते थे। यहाँ क्रोट, स्लोवनी और सर्ब जाति के लोग भी थे। इन क्षेत्रों में उसने असंतोष को पोत्साहित किया तथा आस्ट्रिया-हंगरी के विरूद्ध षड्यंत्र रचे। यह क्षेत्र यूरोप में दिनोंदिन बढ़ते हुए तनावों का स्रोत हो गया और अंततः इसी क्षेत्र में वह घटना भी घटी जिससे प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हुआ। 1908 में आस्ट्रिया-हंगरी ने बोस्निया और हर्जेगोविना को अपने में मिला लिया जो उसके प्रशासनिक नियंत्रण के अंतर्गत रखा गया था। इस मुद्दे पर सर्बिया चाहता था कि रूस आस्ट्रिया-हंगरी से युद्ध करे लेकिन युद्ध होने पर जर्मनी ने आस्ट्रिया-हंगरी के समर्थन की धमकी दी थी। इसके कारण रूस को आत्मसंयम बरतना पड़ा। सर्बिया के मन में 1912-19 में बाल्कन युद्ध के कारण आस्ट्रिया-हंगरी के प्रति कटुता और गहराई। कुछ बाल्कन राज्य आपस में संगठित हुए, इनमें सर्बिया भी शामिल था। इनकों रूस का समर्थन प्राप्त था। इनके संगठित होने का मकसद ऑटोमन से मैसेडोनिया को जीतना था। बहरहाल ऑटोमन लोगों की हार के बाद, जर्मनी तथा ब्रिटेन के समर्थन से अल्बानिया को स्वतंत्र राज्य बनाने में आस्ट्रिया-हंगरी सफल हुए जबकि सर्बिया को यह उम्मीद थी कि यह उसके राज्य का अंग बनेगा। इस पूरी अवधि के दौरान संधियों और गुप्त समझौतों पर हस्ताक्षर होते रहे और युद्ध की धमकियाँ जारी की जाती रहीं और वापस ली जाती रहीं, इसमें दलबंदी और पुनः दलबंदी होती रही। कोई किसी का स्थायी दोस्त नहीं था तथा कोई भी देश दूसरे देश के समर्थन पर निर्भर नहीं कर सकता था। यह भ्रम कि कौन किसका दोस्त है और कौन किसका दुश्मन, प्रथम महायुद्ध के आरंभ होने तक बना रहा और उस समय के तनाव का यह अतिरिक्त स्रोत था। क्योंकि बोस्निया और हर्जेगोविना के मुद्दे पर रूस ने युद्ध की धमकी दी थी। वास्तविकता यह थी कि पहले ही उसने आस्ट्रिया-हंगरी से गुप्त समझौता किया था। इस समझौते में उसने वायदा किया था कि यदि आस्ट्रिया-हंगरी, बोस्निया तथा हर्जेगोविना को हड़प लेते हैं तो उनकी इस योजना में रूस खलल नहीं डालेगा। इसके एवज में रूप के लिए भूमध्यसागर तक पहुँचने का रास्ता खुला रहेगा। बहरहाल इन अनिश्चितताओं के बावजूद बीसवीं सदी के पहले दशक में दो प्रतिद्वंदी गुट उभर कर सामने आए। पहले 1882 में तीन देशों-जर्मनी, आस्ट्रिया-हंगरी तथा इटली का गुट बन चुका था। यद्यपि 1882 के वर्षों बाद तक जर्मनी तथा आस्ट्रिया दोस्त बने रहे तथा 1890 के दशक में यह स्पष्ट हो गया था कि इस गुट के प्रति इटली की वफादरी अनिश्चय का शिकार है। रूस तथा फ्रांस ने 1894 में एक गुप्त समझौते पर हस्ताक्षर किया था जिसके चलते वे तीन देशों के बने गुट के विरूद्ध हो गए थे, खासतौर से वे जर्मनी तथा आस्ट्रिया-हंगरी के खिलाफ थे। फ्रांस और जर्मन लंबे समय तक एक दूसरे के दुश्मन थे और कभी-कभी तो उपनिवेशों के कारण इनमें आपस में लड़ाई की नौबत भी आई, लेकिन इन दोनों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह कोई औपचारिक समझौता न होकर मित्रवत् समझदारी की बात थी। इस गुप्त समझौते में इस आशय का एक अनुच्छेद रखा गया जिसमें माना गया कि फ्रांस मिश्र पर अपना दावा छोड़ देगा और इसके एवज में फ्रांस को यह छूट मिलेगी कि वह मोरक्को में जो चाहे सो करे। इस प्रक्रिया के दूसरे चरण में 1907 में ब्रिटेन तथा रूस के बीच एक समझौता हुआ यद्यपि इनके बीच काफी लंबे समय से शत्रुता चली आ रही थी। इस मित्रतापूर्ण समझौते का लक्ष्य ईरान को विभाजित करना था जिसकी चर्चा पहले की जा चुकी है। इसी के साथ तीन देशों का गुट अस्तित्व में आया जिसमें ब्रिटेन, रूस तथा फ्रांस शामिल थे। यह समझौता एक प्रकार से आपसी हित के लिए था, यह कोई औपचारिक गठबंधन या पारस्परिक समझदारी नहीं थी। यह सब कुछ इसके बावजूद चल रहा था कि यदि युद्ध आरंभ हुआ तो मित्रों की वफादारी संदेह के परे नहीं थी। इससे युद्ध की संभावना को बल मिला तथा एक देश का दूसरे के प्रति अविश्वास और बढ़ा। इस गठजोड़ से एक प्रकार से यह अपरिहार्य हो गया कि यदि लड़ाई छिड़ी तो यह स्थानीय अथवा एक या दो देशों के बीच तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि इसका रूप काफी व्यापक होगा। सामाजिक तनावराज्यों के बीच होने वाले टकरावों के अलावा राज्यों के अंदर भी गंभीर तनाव और समस्याएँ थीं। जातियों का सवाल, जिसका ऊपर संकेत किया गया है, तनाव का एकमात्र कारण नहीं था। पूँजीवाद के उदय के काल से होने वाले परिवर्तनो तथा औद्योगिक क्रांति के बाद के एक सौ वर्षों के दौरान हुए परिवर्तनों से विश्व में यूरोप का वर्चस्व संभव हुआ था। लेकिन समूचे यूरोप की सामाजिक व्यवस्था में भयानक असमानता साफ-साफ नजर आ रही थी। जिन देशों में बहुत बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण नहीं हुआ था, वहाँ की बहुसंख्यक खेतिहर जनता, पुरानी चाल पर यातना और दमन के नीचे जीवनयापन कर रही थी। जिन देशों में औद्योगीकरण हो चुका था और वे बड़े आर्थिक शक्ति का रूप ले चुके थे, उनकी सामाजिक व्यवस्था मजदूर जनता के खुले शोषण पर टिकी हुई थी। अधिकाधिक मात्रा में माल पैदा करने वाले उद्योगों के विकास के बावजूद विशाल जनसमूह गंदी बस्तियों में बहुत बरी हालत में रहता था। उनका जीवन आधी-भुखमरी वाला था तथा उनके सामने हमेशा इस बात का भय बना रहता था कि वे किसी भी समय अपने रोजगार से हाथ धो सकते हैं। दक्षिण अफ्रीका में 1899-1902 के दौरान चलने वाले बोवर्स युद्ध (डच उपनिवेशवासियों के विरूद्ध) में इंग्लैंड में तात्कालिक रूप से अतिरिक्त सैनिकों के भर्ती की जरूरत महसूस की गई। उस समय भर्ती केंद्र पर आए लोगों की बहुत बड़ी संख्या को इसलिए अयोग्य ठहराया गया कि वे अस्वस्थ और बीमार घोषित किए गए थे। वे अस्वस्थकर स्थितियों में गरीबी की जिंदगी बसर करने के कारण सैनिक बनने लायक नहीं पाए गए। औद्योगिक क्रांति और पूँजीवाद की कुछ सबसे खराब बुराइयों को कम करने की कोशिश की गई लेकिन उन्नीसवीं सदी के बीतने के बाद भी गरीबों और निचले तबके की जनता के जीवन स्तर में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हो सका। इस स्थिति पर बीसवीं सदी के एक ब्रिटिश इतिहासकार ने इस प्रकार टिप्पणी की है, ‘‘गरीब लोग बड़े नगरों और औद्योगिक कस्बों की गंदी बस्तियों में झुण्ड के झुण्ड पहुँचते थे। वे मानवता की श्रेणी में नीचे थे तथा उनके साथ वैसा ही व्यवहार भी किया जाता था। उनकी कीमत आवश्यक श्रम के भण्डार के रूप में आँकी जाती थी, वे आवश्यकता से अधिक संख्या में उपलब्ध थे किंतु सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के ये स्तंभ थे।‘‘समाजवादी आंदोलनट्रेड यूनियन आंदोलन तथा समाजवादी विचार और आंदोलनों के आविर्भाव का जिक्र पहले किया जा चुका है। उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों से ही यूरोप के मजदूरों में समाजवाद का यह दृष्टिकोण क्रमशः लोकप्रिय होता चला जा रहा था कि पूँजीवादी व्यवस्था शोषण पर टिकी है और इसका अंत होना चाहिए। प्रथम विश्व युद्ध के पहले के यूरोप में हड़तालों का जबर्दस्त दौर आया था। यूरोप के तकरीबन हर देश में समाजवादी दल बने थे और तेजी से उनकी बढ़ोत्तरी हो रही थी। 1914 तक यूरोप के विभिन्न देशों में मतदान करने वालों की संख्या में भारी वृद्धि हुई। 1914 में फ्रांस, जर्मनी तथा इटली की संसदों में समाजवादी पार्टियाँ सबसे बड़े दल के रूप में विद्यमान थीं।इस बात की चर्चा पहले की जा चुकी है कि 1889 में दूसरे अंतर्राष्ट्रीय (दूसरे इण्टरनेशनल) की स्थापना की जा चुकी थी। उसकी स्थापना वाली बैठक में जो निर्णय हुए थे, उनमें एक निर्णय यह भी था कि पहली मई को विश्व स्तर पर एक प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा। यह आयोजन इस तरह किया जाएगा कि दुनिया के हर देश के मजदूर अपनी-अपनी सरकारों से यह माँग करेंगे कि उनके काम करने की अवधि को आठ घण्टों तक सीमित किया जाए। तब से समूची दुनिया में मई दिवस मजदूर वर्ग तथा मजदूर एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है। समाजवाद के अर्थ और उसे प्राप्त करने के तरीकों के बारे में हर देश के समाजवादी आंदोलन और समाजवादी दलों में मतभेद थे। कुछ लोग मानते थे कि पूँजीवाद का अंत क्रांतिकारी संघर्षों के लिए शासक वर्ग को सत्ता से हटाकर ही हो सकता है जबकि कुछ अन्य समाजवादियों का विचार था कि मजदूर वर्ग के बढ़ते हुए प्रभाव के जरिए बिना क्रांति किए ही धीरे-धीरे पूँजीवाद का समाजवाद में रूपांतरण किया जा सकता है। दूसरे अंतर्राष्ट्रीय की नीतियों में भी इन मतभेदों की झलक मिलती है और इन मतभेदों के कारण समाजवादी आंदोलन आज भी विभाजित है। उपनिवेशवाद, सैन्यीकरण और युद्धदो प्रमुख मुद्दों को लेकर सभी समाजवादी पार्टियाँ तथा दूसरा अंतर्राष्ट्रीय चिंतित थे। ये मुद्दे थे, उपनिवेशों का मुद्दा और सैन्यीकरण तथा युद्ध। इन दोनों ही मुद्दों पर मतभेद थे यद्यपि इन मुद्दों के कुछ पहलुओं पर सभी समाजवादी एकमत थे। कुछ समाजवादी इस दृष्टिकोण की वकालत करते थे कि हर राष्ट्र की स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता समाजवाद की आधारमूल अवधारणा थी, इसलिए उपनिवेशवाद पूरी तरह समग्र रूप में अस्वीकार किया जाना चाहिए। दूसरे लोग पूँजीवादी औपनिवेशिक नीति की भर्त्सना करते थे लेकिन उनका मानना था कि समाजवादी शासन के अंतर्गत उपनिवेशवाद सभ्यता के प्रसार की रचनात्मक भूमिका अदा कर सकता है। इस दृष्टिकोण को समाजवादी आंदोलन में एक वर्ग का समर्थन प्राप्त था। इसके जरिए वे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अपनी-अपनी सरकार का समर्थन करते थे। ये मतभेद कई दशक तक चलते रहे तथा उपनिवेशवादी व्यवस्था के समाप्त हो जाने के बाद ही पूँजीवादी अथवा समाजवादी सरकार के अधीन उपनिवेशों को सभ्य बनाने की भूमिका की वकालत करने वालों को अपनी बात छोड़नी पड़ी।लेकिन इन मतभेदों के बावजूद साम्राज्यवादी देशों समेत यूरोप की सारी समाजवादी पार्टियाँ अपनी सरकारों की उपनिवेशवादी नीति से अपने को अलग मानतीं थीं। जर्मनी में 1907 में स्टुट गार्ट में हुए दूसरे अंतर्राष्ट्रीय की बैठक सर्वसम्मति से एक संकल्प पारित किया गया जिसके अंतर्गत समाजवादी पार्टी के सदस्यों को अपनी संसद में औपनिवेशिक अधीनता वाली जनता की लूट का विरोध करने के लिए प्रतिबद्ध किया गया तथा कहा गया कि वे उन सुधारों के लिए संघर्ष करेंगे जिनको लागू करने से उपनिवेशों की जनता की हालत बेहतर होगी, उनके अधिकारों की रक्षा होगी। वे उनको स्वतंत्र करने के लिए उन्हें हर तरह से शिक्षित करेंगे। स्वतंत्रता संग्राम के नेतागण प्रायः उपनिवेशवादी देशों की समाजवादी पार्टियों और नेताओं से घनिष्ठ संपर्क रखते थे। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के भीष्म पितामह दादा भाई नौरोजी दूसरे अंतर्राष्ट्रीय के एक अधिवेशन में शामिल हुए थे। वहाँ उनका तालियों की गड़गड़ाहट तथा लंबी हर्ष ध्वनि से स्वागत हुआ था। तालियों की गड़गड़ाहट कई मिनट तक चली। उस सत्र के अध्यक्ष ने वहाँ आए हुए प्रतिनिधियों से अनुरोध किया कि वे दादा भाई नौरोजी के वक्तव्य को अधिकाधिक आदर दें। वे अस्सी वर्ष के ऐसे वृद्ध व्यक्ति थे जिन्होंने अपने जीवन के पचपन वर्ष अपनी जनता की स्वतंत्रता और खुशहाली के लिए संघर्ष करने में गुजार दिए। मैडम कामा ने भारतीय स्वतंत्रता का झण्डा फहराया जो भारतीय क्रांतिकारी थीं। दूसरे अंतर्राष्ट्रीय के अधिवेशन के समय इस झण्डे की रूपरेखा उन्होंने खुद तैयार की थी। एक दम आरंभ से समाजवादी आंदोलन युद्ध को मौजूदा सामाजिक व्यवस्था की खामियों की अतिवादी अभिव्यक्ति मानता रहा है। वह यह भी मानता रहा है कि यह ऐसा बर्बर तरीका है जिसके जरिए विभिन्न देशों का शासक वर्ग अपनी अर्थिक तथा राजनीतिक शक्ति बढ़ाने की कोशिश करता रहा है। समाजवादी आंदोलन के प्रेरक आदेशों में एक आदर्श शांति और मानवीय भाईचारा कायम करना रहा है। बढ़ते सैन्यीकरण और युद्ध के खतरों के साथ समाजवादी पार्टियों तथा द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय ने इन मुद्दों को लेकर अपनी चिंता जताई। इस पूरे दौर में उनके महत्वपूर्ण कार्यों में एक काम यह सुनिश्चित करना था कि ‘दुनिया के मजदूरों को युद्ध रोकने के लिए कैसे एकजुट किया जाए‘। इस पर सभी समाजवादी पार्टियों की सहमति थी कि युद्ध रोकने के लिए हर संभव प्रयास किए जाने चाहिए। अपने-अपने देशों की संसद में हथियारों की दौड़ को रोकने तथा युद्ध के लिए पैसा मुहैया कराने के विरोध में मतदेने के लिए वे प्रतिबद्ध थे। कई समाजवादी नेताओं ने सुझाया कि युद्ध रोकने के लिए मजदूरों को आम हड़ताल करनी चाहिए। लेकिन ऐसा तब किया जाना चाहिए जब युद्ध भड़क उठे ताकि उसको शीघ्र समाप्त किया जा सके। ब्रिटेन के समाजवादी नेता केर हार्डी ने युद्ध रोकने के लिए हथियार उद्योग, परिवहन और खानों में हड़ताल करने की जोरदार वकालत की। दूसरे अंतर्राष्ट्रीय की स्टुट गार्ट कांग्रेस (1907) ने ‘सैन्यवाद और अंतर्राष्ट्रीय टकराव‘ विषय पर सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव स्वीकार किया। उस प्रस्ताव में कहा गया था कि युद्ध पूँजीवाद के चरित्र का अभिन्न अंग है और फिर कहा कि सैन्यवाद के विरूद्ध संघर्ष समाजवाद के लिए किए जाने वाले संघर्ष का अभिन्न हिस्सा है। इसने प्रतिज्ञा की कि संसद में समाजवादी पार्टियाँ तथा इनके प्रतिनिधि अपनी पूरी ताकत के साथ नौ सैनिक तथा थल सैनिक हथियारों के विरूद्ध लड़ेंगे..... और इन हथियारों के लिए जुटाए जाने वाले साधनों को अस्वीकार करेंगे। समाजवाद और राष्ट्रों की भाई-चारे की भावना से मजदूर नौजवानों को शिक्षित करने के लिए काम करना उनका कर्तव्य है.......। प्रस्ताव का अंत इन वाक्यों से हुआ था, ‘‘यदि युद्ध प्रारंभ होने का भय हो तो संबद्ध देश के मजदूर वर्ग तथा उनके संसद के प्रतिनिधियों का कर्तव्य है कि जिस भी माध्यम को वे सर्वाधिक कारगर समझें युद्ध को रोकने के लिए पूरी-पूरी कोशिश करें..।‘‘ ‘‘यदि किसी परिस्थितिवश युद्ध छिड़ ही जाए तो इसको यथाशीघ्र रोकने के लिए कोशिश करना उनका कर्तव्य है तथा युद्ध के कारण पैदा हुए अर्थिक और राजनीतिक संकट का उपयोग विराट जन समुदाय को आंदोलन में लाने के लिए किया जाना चाहिए ताकि पूँजीवाद के पतन की प्रक्रिया तेज की जा सके।‘‘ प्रस्ताव के जिस अंतिम हिस्से को ऊपर उद्धृत किया गया है, उसका मसौदा तीन समाजवादी नेताओं ने तैयार किया था। इसमें लेनिन और मार्टोव रूस के थे और रोजा लग्जमबर्ग जर्मनी की थीं। प्रस्ताव के साथ अपने निर्णय पर वे अंत तक डटे रहे। एक महान नेता आजीवन सैन्यवाद और युद्ध की पक्षधर ताकतों के साथ लड़ता रहा, उसका नाम ज्यों जोरेस था, वह फ्रांस का था। सैन्यवाद और युद्ध के विरूद्ध प्रचार करने के एवज में उसे फ्रांसीसी प्रतिशोधवादियों (रिवेंज सीकर्स) का कोपभाजन बनना पड़ा 1912 में बाल्कन युद्ध के दौरान जब लगता कि यूरोप में युद्ध के बादल घुमड़ रहे हैं, उसने यह घोषणा की, ‘‘सरकारों को यह याद रखना चाहिए कि जब वे युद्ध का इंद्रजाल रचती हैं, तो जनता को इस प्रकार का हिसाब किताब लगाने का न्योता देती हैं कि किसी क्रांति में उस युद्ध की तुलना में कम लोगों को अपने प्राण गँवाने पड़ेंगे जिसकी तैयारी में वे जुटे हुए हैं।‘‘ 28 जुलाई 1914 को आस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया। ब्रूसेल्स में दूसरे अंतर्राष्ट्रीय की बैठक बुलाई गई। इस बैठक में दुनिया के उन सब देशों के मजदूरों से इस बात का आह्वान किया गया जिनको युद्ध का खतरा था कि वे शांति सभाएँ आयोजित करें और इस के लिए काम करें कि आस्ट्रिया-हंगरी और सर्बिया के बीच समझौता हो जाए। इस बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि जर्मनी तथा फ्रांस के मजदूर अपनी-अपनी सरकारों पर इस बात के लिए अधिक दबाव डालेंगे कि उनकी सरकारें आस्ट्रिया को रोकें और फ्रांसीसी सरकार रूस से आग्रह करेगी कि वह इस लड़ाई से अपने को अलग रखे। ब्रूसेल्स में मजदूरों ने प्रदर्शन किया। इसमें उनका नारा था, ‘‘युद्ध के खिलाफ युद्ध‘‘। प्रदर्शनकारियों को संबोधित करने वाले नेताओं में फ्रांस के नेता जोरेस भी शामिल थे। 31 जुलाई को पेरिस वापस आने पर वे एक प्रतिनिधि मण्डल के साथ फ्रांसीसी सरकार को इस बात के लिए मनाने गए कि वह रूस पर दबाव डाले ताकि वह युद्ध के लिए लामबंदी न करे क्योंकि मैत्री संधि में रूस फ्रांस का सहयोगी था। प्रथम विश्व युद्ध प्रारंभ होने की संध्या पर एक कॉफी हाउस में गोली मार कर उसकी हत्या कर दी गई। और अंत से जब युद्ध शुरू हो गया, अधिकांश समाजवादी पार्टियों ने तय किया कि वे अपनी-अपनी सरकारों का समर्थन करेंगी। अपने-अपने देश के शासक वर्ग के साथ उन्होंने इसको आम मुद्दा माना, उन सरकारों के साथ जो इस युद्ध के लिए पूरी तरह जिम्मेदार थीं। इसका विरोध करने में तथा लोगों को इसके विरूद्ध विद्रोह के लिए खड़ा करने में उन्होंने अपने को असहाय पाया। जो युद्ध साम्राज्यवादियों की आपसी प्रतिद्वंदिता का नतीजा था तथा इससे साम्राज्यवादी शासक वर्ग के संकीर्ण स्वार्थ भर सधते थे, उसे कई समाजवादियों ने अपने-अपने राष्ट्रों के अस्तित्व की लड़ाई माना। इसी के साथ समाजवादी आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण चरण का अंत हो गया। अंतर्राष्ट्रीयतावाद शुरू से ही समाजवादी आंदोलन की विशेषता रही थी। इससे उसे जबर्दस्त नैतिक धक्का पहुँचा। सभी देशों के समाजवादी आंदोलन में फूट पड़ी और यह फूट रूसी क्रांति के बाद और गहराई। प्रथम विश्व युद्ध प्रारंभ होने के पहले के ढाई दशक का समय ऐसा था जिसमें यूरोप में समाजवादी आंदोलन काफी विकसित और शक्तिशाली हुआ। समाजवादी आंदोलन ने तत्कालीन यूरोपीय व्यवस्था को चुनौती दी। यह वही पूँजीवादी समाज व्यवस्था थी जो साम्राज्यवादी विजय और उपनिवेशों के शोषण, सैन्यवाद और युद्ध पर टिकी हुई थी। यूरोप भर में क्रांति का भय व्याप्त था, यद्यपि रूस को छोड़कर, जहाँ 1905 में क्रांति हुई और दबा दी गई और कहीं क्रांति नहीं हुई। ‘‘सच है कि कोई भी यूरोपीय सरकार युद्ध में कूदने से नहीं हिचकिचायी क्योंकि उनको भय था कि उनकी जनता हथियार उठाने से मना कर दे अथवा अपने हथियारों का वार वह अपनी सरकार पर ही न करे और उनकी यह सोच सही थी।‘‘ यह वक्तव्य एक इतिहासकार का है जो उस समय उत्पन्न यूरोपीय स्थिति का सार प्रस्तुत करता है। यह सिर्फ रूस पर लागू नहीं होता क्योंकि वहाँ के शासकों का अनुमान गलत साबित हुआ। संयुक्त राज्य अमरीका और जापानइस अवधि में दो देश प्रमुख शक्ति के रूप में उभरे, ये देश थे संयुक्त राज्य अमरीका और जापान।संयुक्त राज्य अमरीकाउत्तरी अमरीका के पूर्वी तट पर बसे तेरह उपनिवेशों को इंग्लैंड के चंगुल से जब मुक्ति मिली और संयुक्त राज्य अमरीका के रूप में जब उसका उदय हुआ उसके बाद के सौ वर्षों के दौरान वह देश भू-भाग की दृष्टि से वह आकार ग्रहण कर चुका था जो आज हमें दिखाई देता है। अमरीकी इंडियन जनजातियाँ अमरीका के पश्चिमी तटवर्ती इलाकों में रहती थीं। इन जातियों की कीमत पर अमरीका ने पश्चिमी तटवर्त्वी इलाकों तक अपना भू-भाग बढ़ाया। अमरीकी इण्डियन लोगों ने भू-भाग के हड़पने की कोशिश का प्रतिरोध किया लेकिन अंततः 1890 तक इस प्रतिरोध का अंत हो गया। दक्षिण डकोटा के ‘वुण्डेड नी‘ नामक स्थान में भयानक नर संहार हुआ। प्रतिरोध के अंत का कारण यह नर संहार ही था। फ्रांस और रूस से अमरीका ने क्रमशः लुसियाना और अलास्का का विस्तृत भू-भाग खरीद लिया और मैक्सिको से युद्ध करके अमरीका ने टैक्सास और कैलिफोर्निया पर कब्जा कर लिया। 1864 और 1865 के बीच वहाँ पर ग्रह युद्ध चला जब संयुक्त राज्य अमरीका के दक्षिणी राज्य उससे अलग हो गए। ये मुख्यतः कृषि पर निर्भर थे और यहाँ बागान थे। इनसे दास श्रमिक काम करते थे। गृह युद्ध में दक्षिणी राज्यों की हार के कारण संयुक्त राज्य अमरीका विभाजन से बच गया तथा दास प्रथा को समाप्त कर दिया गया।गृह युद्ध के खत्म होने के लगभग तीन दशक में ही संयुक्त राज्य अमरीका दुनिया की सबसे शक्तिशाली औद्योगिक शक्ति बन चुका था। उन्नीसवीं सदी के अंत में वह दुनिया के लोहे और इस्पात के कुल उत्पादन का एक तिहाई पैदा करने लगा था। उसने उद्योग की लगभग प्रत्येक शाखा में दुनिया के हर देश को पीछे छोड़ दिया था। उसने तकरीबन 3 लाख किलोमीटर रेल मार्ग का निर्माण किया था। यह समूचे यूरोप के कुल रेलमार्ग से भी अधिक था। वह तेल और प्राकृतिक गैस का काफी अधिक उत्पादन और उपभोग करता था, यह दुनिया के कुल गैस और तेल उत्पादन तथा उपभोग से कहीं ज्यादा था। काफी लंबी अवधि तक संयुक्त राज्य अमरीका को चकित करने वाली इस आर्थिक संवृद्धि की तरफ किसी देश का ध्यान ही नहीं गया। इसकी एक वजह तो यह थी कि अपने माल की खपत के लिए अमरीका के भीतर ही बहुत बड़ा बाजार उपलब्ध था। 1790 में संयुक्त राज्य अमरीका की आबादी चालीस लाख थी। 1910 में बढ़कर यह नौ करोड़ 20 लाख हो गई। उन्नीसवीं सदी और बीसवीं सदी के पहले दशक में लगभग दो करोड़ पचास लोग यूरोप से जाकर अमरीका में बसे थे। वैसे भी यूरोप और विश्व की घटनाओं में यहाँ के लोगों में दिलचस्पी बहुत कम थी। 1890 के दशक तक साम्राज्यवादी ताकत के रूप में संयुक्त राज्य अमरीका का उदय हो चुका था। 1889 में संयुक्त राज्य अमरीका की सीनेट के एक सदस्य ने कहा था, ‘‘आज हम उससे कहीं अधिक पैदा कर रहे हैं जितना हम खा सकते हैं, हमारा निर्माण हमारे उपयोग की जरूरतों से अधिक हो रहा है। इसलिए हमें अपने उत्पादों के लिए नए बाजार अवश्य तलाशने चाहिए, अपनी पूँजी के लिए नए पेशे और अपने मजदूरों के लिए नए काम भी खोजने चाहिए।‘‘ दूसरे सीनेट सदस्य ने तो चेतावनी दी थी कि संयुक्त राज्य अमरीका को इस दौड़ से अलग नहीं होना चाहिए। यूरोप के लोगों की तरह अमरीका के लोग भी इस प्रकार चर्चा करने लगे थे कि पिछड़े और असभ्य देशों को सभ्य बनाना अमरीका के लोगों का भी कर्तव्य है और कमजोर देशों पर शक्तिशाली देशों का प्रभुत्व कायम होना प्रकृति का नियम है। यहाँ तक कि इन बातों के पहले ही प्रशांत महासागर के क्षेत्र में संयुक्त राज्य अमरीका का विस्तार शुरू हो गया था। 1881 में कहा जाने लगा था कि हवाई द्वीप अमरीकी व्यवस्था के अंग हैं यद्यपि उनका विलय 1898 में हुआ था। 1880 के दशक में ही समाओं द्वीपों को लेकर संयुक्त राज्य अमरीका, ब्रिटेन तथा जर्मनी की आपसी प्रतिस्पर्धा से युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो गई थी। कुछ समय तक वहाँ तीनों देशों का नियंत्रण कायम रहा लेकिन 1899 में जर्मनी तथा संयुक्त राज्य अमरीका ने द्वीपों को आपस में बाँट लिया तथा ब्रिटेन को कहीं अन्यत्र जगह दी गई। 1893 में संयुक्त राज्य अमरीका ने अमरीकी महाद्वीप पर अपने प्रभुत्व की घोषणा कर दी। वेनेजुएला और ब्रिटिश गायना (अब सिर्फ गायना) के बीच भूभाग को लेकर हुए झगड़े के दौरान उसने ब्रिटेन को इस मामले को किसी न्यायाधिकरण को सौंपने के लिए मजबूर किया और इस बात की घोषणा की, ‘‘व्यवहारतः आज संयुक्त राज्य अमरीका इस महाद्वीप का प्रभुता संपन्न राज्य है। इसका आदेश यहाँ की जनता के लिए कानून है और इन्हीं तक इसका हस्तक्षेप सीमित है।‘‘ 1898 में क्यूबा को लेकर संयुक्त राज्य अमरीका का स्पेन से युद्ध हुआ जो प्यूरटो रिको समेत प्रशांत क्षैत्र में स्पेन का एकमात्र उपनिवेश था। दावा किया गया कि यह बड़ी प्यारी लड़ाई थी किंतु जिन लोगों ने इसमें भाग लिया उनके लिए तो यह भयंकर युद्ध था। संयुक्त राज्य अमरीका ने प्रशांत क्षेत्र के स्पेनिश उपनिवेश फिलीपाइन द्वीप पर आक्रमण कर दिया। स्पेन की इसमें हार हुई। प्यूरटो रिको और गायना (प्रशांत क्षेत्र के देश) संयुक्त राज्य अमरीका के नियंत्रण में आ गए। फिलीपाइन के लोगों को अपना शासन चलाने में अक्षम माना जाता था और संयुक्त राज्य अमरीका के राष्ट्रपति ने घोषणा की कि उन्हें ईश्वरीय आदेश मिला है और उन्होंने फिलिपाइन्स द्वीपों को हड़पने का निर्णय कर लिया। क्यूबा को किसी और देश से किसी प्रकार की संधि करने से मना किया गया था तथा वहाँ की स्वतंत्रता, लोगों की जिंदगी और संपित्त की रक्षा के उद्देश्य से क्यूबा में हस्तक्षेप के अधिकार को अपने पास सुरक्षित रखा। वह नाममात्र को आजाद था लेकिन यथार्थ में अमरीकी पिछलग्गू था। जब 1890 के दशक में यूरोपीय ताकतों ने चीन को विभाजित करने की तैयारी पूरी कर ली तब संयुक्त राज्य अमरीका को लगा कि कहीं उसे अलग-थलग न कर दिया जाए इसलिए उसने जो घोषणा की उसे ‘‘खुली नीति‘‘ (ओपेन डोर पॉलिसी) के नाम से जाना जाता है जिसका अर्थ यह था कि किसी भी देश के साथ चीन के मामले में भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए, उन क्षेत्रों में भी नहीं, जिन क्षेत्रों को यूरोपीय देश अपना प्रभाव क्षेत्र बताते हैं। जब बाक्सर का विद्रोह फूट पड़ा तो इसको दबाने के लिए तथा बीजिंग पर कब्जा करने के लिए संयुक्त राज्य अमरीका की फौजों ने यूरोप की फौजों का साथ दिया। बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों तक संयुक्त राज्य अमरीका को पूरा एहसास हो गया था कि वह विश्व शक्ति हो चुका है। अमरीकी व्यवहार में दूसरे देश की जनता के प्रति नस्लवाद की कुछ झलक भी दिखाई दे रही थी। तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट का मानना था कि प्रमुख रूप से श्वेत नस्ल की जातियाँ ‘सभ्य‘ थीं और जो गैरश्वेत थे वे प्रमुख रूप से असभ्य राष्ट्रों के लोग थे। उन्होंने अपनी विदेश नीति को खुद इन शब्दों में व्यक्त किया था - ‘‘वाणी में विनम्रता होनी चाहिए और हाथ में लाठी।’’ चीन के विषय में रूप की मंशा के प्रति उनके मन में चिंता थी इसलिए 1904 में जब जापानियों ने रूस के जहाजी बेड़ों पर हमला किया तो रूजवेल्ट काफी खुश हुए। बाद में रूसी-जापानी युद्ध को खत्म करने में उन्होंने मध्यस्थता की और जापान ने जो भू-भाग अपने कब्जे में कर लिया था उस पर जापानी आधिपत्य स्वीकारने के लिए रूस को मनाया। इस भू-भाग में कोरिया और दक्षिण मंचूरिया पर नियंत्रण तथा सखालिन द्वीप के एक भाग पर अधिकार था। पहले यह सभी रूस के अधीन थे। अमरीका ने जापान के साथ एक गुप्त समझौता भी किया। इस समझौते के कारण उसे उस क्षेत्र में मुक्त रूप से व्यापार करने की छूट मिल गई। जापान उपनिवेशवादी महत्वाकांक्षा को तृप्त करने की अमरीकी नीति अमरीका के लिए काफी महँगी साबित हुई क्योंकि आगे चलकर प्रशांत क्षेत्र में जापान अमरीका का मुख्य प्रतिद्वंदी हो गया। लैटिन अमरीका, अमरीकी दिलचस्पी का नया क्षेत्र बनने लगा था जिसके दरवाजे सिर्फ अमरीकी हस्तक्षेप के लिए खुले थे। 1904 में रूजवेल्ट ने घोषणा की कि संयुक्त राज्य अमरीका को न केवल अमरीकी उपमहाद्वीप में यूरोपीय हस्तक्षेप के विरोध का हक हासिल है बल्कि व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपने पड़ोसी देशों के आंतरिक मामलों में भी दखल देने का उसे अधिकार है। इसको मुनरो सिद्धांत के नए परिणाम के रूप में जाना जाता है। क्योंकि लगभग चालीस वर्षों तक संयुक्त राज्य अमरीका ने डोमिनिकन गणराज्य के सीमा शुल्क से प्राप्त राजस्व को अपने कब्जे में रखा। पनामा नहर के निर्माण को रूजवेल्ट की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है। कोलंबिया में पनामा नहर के निर्माण कार्य का 40% एक फ्रांसीसी कंपनी ने पूरा किया था। संयुक्त राज्य अमरीका ने इसका स्वामित्व खरीद लिया। लेकिन कोलंबिया को मान्य नहीं थीं। इस पर रूजवेल्ट ने कोलंबिया के क्षेत्र में नहर बनाने का अधिकार देने के लिए भुगतान की जो शर्तें अमरीका ने उसके सामने रखीं वह कोलंबिया के लोगों को ‘लुटेरा‘ और ‘ठग‘ की संज्ञा दी थी। एक अमरीकी उद्योगपति के धन की मदद से पनामा में ‘‘एक क्रांति‘‘ आयोजित की गई, अमरीकी फौजें शांति व्यवस्था कायम करने के बहाने से पनामा में उतारीं गईं (वास्तव में कोलंबिया को नकली क्रांति को दबाने से रोकने के मकसद से) और तीन दिनों के बाद पनामा को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता मिल गई। पनामा नहर के बारे में वहाँ की नई सरकार ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसकी शर्तें उन शर्तों की तुलना में काफी अधिक अमरीका के पक्ष में थीं जो पहले उसने कोलंबिया के सामने रखी थीं जिनको कोलंबिया ने अस्वीकार कर दिया था। 1914 में नहर खोली गई। इसी बीच 1906 में रूस-जापान युद्ध को समाप्त करने में रूज़वेल्ट की जो भूमिका थी उसके लिए उनको नोबल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया। विलियम हावर्ड टैफ्ट तथा वुडरो विल्सन के राष्ट्रपतित्व काल में भी लैटिन अमरीकी देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप की संयुक्त राज्य अमरीका की नीति जारी रही। लैटिन अमरीकी देशों और अन्यत्र भी अमरीकी निवेश को बढ़ावा देने तथा उस पर परोक्ष नियंत्रण रखने की टैफ्ट की नीति, जरूरत पड़ने पर सेना और जहाजी बेड़ों के हस्तक्षेप को नहीं बंद कर सकी यानी आवश्यकता पड़ने पर हस्तक्षेप चलता रहा। विल्सन के राष्ट्रपतित्व काल में मैक्सिको के प्रति संयुक्त राज्य अमरीका की नीति के कारण दोनों देशों के बीच लंबी दुश्मनी पैदा हो गई। 1910 में मैक्सिको के भ्रष्ट तानाशाह को वहाँ के एक लोकप्रिय नेता फ्रैंसिस्को मैडरो ने अपदस्थ कर दिया लेकिन संयुक्त राज्य अमरीका की सहमति से 1913 में एक दूसरे तानाशाह ने उसे पुनः सत्ताच्युत कर दिया और उसकी हत्या कर दी गई। कुछ दिनों के बाद इस तानाशाह को भी हटा दिया गया और मैक्सिको के आंतरिक मामलों में संयुक्त राज्य अमरीका का असफल हस्तक्षेप जारी रहा। जिस औद्योगिक विस्तार ने संयुक्त राज्य अमरीका को महत्वपूर्ण औद्योगिक शक्ति बनाया और जिसके तत्काल बाद अमरीका को विश्व शक्ति बनाना था, उसकी सहज परिणति भ्रष्टाचार, भयंकर शोषण, निर्मम तौर तरीके अपनाना तथा जनता के हितों के प्रति असम्मान का भाव प्रकट करना था। रेंलवे की सबसे बड़ी कंपनियों के मालिकों में से एक ने अपनी स्पष्ट भाषा में कहा था, ‘‘जनता जहन्नुम में जाए‘‘। अत्यंत निर्मम तौर तरीकों से कुछेक कंपनियों को नियंत्रित करने वाले कुछ व्यक्ति अपार आर्थिक शक्ति अपनी मुट्ठी में किए हुए हैं। प्रायः इस प्रकार की अपार संपित्त का एकत्र होना बताता है कि ऐसा नियमों का उल्लंघन करके और घूस के जरिए किया गया है। विशाल औद्योगिक साम्राज्य के मालिक से जब यह बात कही गई कि वह जो कुछ कर रहा है, वह गैर कानूनी है तो उसका कहना था, ‘‘मैं कानून-वानून की परवाह क्यों करने लगूँ ? क्या मेरे पास ताकत की कमी है ?‘‘ अमरीकी राजनीति में 1890 के दशक से ही कुछेक लोगों के हाथ में अपार आर्थिक शक्ति के केंद्रीयकरण को रोकने की जरूरत मुख्य मुद्दा बन गया था। इसके कारण प्रगतिवाद (प्रोग्रेसिविज्म) नाम का आंदोलन आरंभ हुआ था। पहले यूरोप के आम लोगों की हालत के बारे में और खास तौर पर उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों के बारे में जो कुछ कहा गया है, वह बात संयुक्त राज्य अमरीका के बारे में भी सच है। मजदूरों के काम करने और रहन-सहन की स्थिति बहुत खराब थी तथा अर्थव्यवस्था की प्रचण्ड संवृद्धि के बावजूद बेरोजगारी उनकी दिनचर्या की सामान्य विशेषता बनी हुई थी। हमेशा ही मजदूरों के सिर पर गरीबी के खतरे, अपनी नौकरी के खोने अथवा वेतन में कटौती की तलवार लटकती रहती थी। बाल श्रमिकों की संख्या प्रचण्ड रूप धारण किए हुए थी तथा कपड़ा मिलों में रात्रि में काम करने वाले बच्चों को जगाए रखने के लिए उनके मुँह पर ठंडा पानी फेंक दिया जाता था। कुछ उद्योगों में बालिग श्रमिकों को दिन में सोलह-सोलह घण्टे तक काम करना पड़ता था। कारखानों में काम करने वाले मजदूरों में लगभग 20 प्रतिशत महिलाएँ थीं। इनको पुरूषों की तुलना में बहुत कम मजदूरी दी जाती थी। औद्योगिक दुर्घटनाओं की रोकथाम पर बहुत कम ध्यान दिया जाता था और ये दुर्घटनाएँ अक्सर होती रहती थीं। संयुक्त राज्य अमरीका के मजदूरों ने अपने को संगठित करना शुरू किया और 1880 के दशक के बाद से अमरीका में हड़तालों का ज्वारसा उमड़ पड़ा इनमें से ज्यादातर हड़तालों को राज्य पुलिस और फौजों ने बड़ी बेरहमी से दबा दिया। इनका इस्तेमाल मजदूरों को आंतकित करने के लिए किया जाता था। उद्योगपति लोग किराए के संतरी रखा करते थे। इनका मकसद हड़तालों को तुड़वाना और मजदूरों को डराना-धमकाना हुआ करता था। पिंकर्टन डिटेक्टिव एजेंसी नाम की एक संस्था थी। इसका काम सुरक्षाकर्मी उपलब्ध कराना था। ये सुरक्षाकर्मी मजदूरों को डराने-धमकाने का काम करते थे। यह एजेंसी दशकों तक इस तरह की सेवाएँ उपलब्ध कराती रही। ट्रेड यूनियन नेताओं की हत्या आम बात थी। अमरीकी श्रमिक संघ (अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर) के नाम की संस्था का उदय इन्हीं दिनों हुआ। आठ घंटे काम के दिन की माँग मनवाने के लिए 1 मई 1886 को इस संगठन के आह्वान पर पूरे देश में हड़ताल और प्रदर्शन हुए। इस दिन शिकागो नगर के हेमार्केट स्क्वेयर में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलाईं जो लोग नगर के हड़ताली मजदूरों पर पुलिस द्वारा गोली चलाने के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे। इसमें चार मजदूर मारे गए। इसके पहले किसी ने पुलिस पर बम फेंका था। इस काण्ड में सात पुलिसकर्मी मारे गए थे। जिन लोगों ने बम फेंका उनको उकसाने के आरोप में आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इसको अमरीकी इतिहास में सर्वाधिक अन्यायपूर्ण मुकदमे की सुनवाई माना जाता है। इनमें से सात लोगों को मौत की सजा सुनाई गई थी। इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि दूसरे अंतर्राष्ट्रीय में आठ घण्टे के कार्य दिवस की माँग को लेकर प्रथम मई को माँग दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया जा चुका था। इस दिन को चुनने का कारण यही था कि यह दिन हेमार्केट स्क्वेयर, शिकागो की 1 मई 1886 की घटना से जुड़ा हुआ था। अमरीकी समाज की भयंकर असमानता, बाल श्रमिकों तथा महिलाओं के शोषण, थोड़े से लोगों के हाथ में संपित्त के बढ़ते हुए संकेंद्रण, भ्रष्ट उद्योगपतियों, बैंकपतियों राजनीतिकर्मियों तथा अधिकारियों के विरूद्ध अनेक अमरीकावासियों ने अपनी आवाज उठाई। लेखकों और पत्रकारों ने इन बातों के खिलाफ अत्यंत शक्तिशाली ढंग से लिखा। अमरीकी सरकार जिस साम्राज्यवादी नीति पर चल रही थी उसका भी जमकर विरोध हुआ। यूरोप के बाहर थोड़े बहुत जो भी समाजवादी दल गठित किए गए, वे सभी अमरीका में थे। 1901 में अमरीकी समाजवादी पार्टी का गठन किया गया। यूजीन वी. डेब्स इसके सबसे महत्वपूर्ण नेता थे। 1912 के अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में उनको लगभग दस लाख मतदाताओं ने अपने मत दिए थे। श्रमिकों का दूसरा महत्वपूर्ण संगठन विश्व औद्योगिक मजदूर संगठन (इंडस्ट्रियल वर्कर्स ऑफ दि वर्ल्ड) था। जब प्रथम विश्व युद्ध हो गया, राष्ट्रपति विल्सन के अनुसार विचार और कार्य दोनों ही दृष्टियों से संयुक्त राज्य अमरीका ने चाहा कि इसमें वह अपनी भूमिका को तटस्थ रखे। 1917 के अप्रैल में संयुक्त राज्य अमरीका ने युद्ध में कूदने का निर्णय लिया ताकि ‘युद्ध को खत्म किया जा सके‘ और ‘विश्व को लोकतंत्र के लिए सुरक्षित‘ बनाया जा सके। पहले यह बात कही जा चुकी है कि जब युद्ध शुरू हुआ तो यूरोप की समाजवादी पार्टियों ने अपनी-अपनी सरकारों को समर्थन देने का निर्णय किया। लेकिन अमरीकी समाजवादी पार्टी और इंडस्ट्रियल वर्कर्स ऑफ दि वर्ल्ड युद्ध का विरोध करने के वायदे पर डटे रहे। संयुक्त राज्य अमरीका की सरकार ने ऐसे कई कानून बना रखे थे जिनके अनुसार जनता द्वारा किसी भी प्रकार का युद्ध का विरोध, साजिश और तोड़फोड़ माना जाता था। युद्ध का विरोध करने के लिए कई अमरीकी लोगों को सजा दी गई। यूजीन डेब्स को दस वर्ष की कैद की सजा दी गई थी। संयुक्त राज्य अमरीका में ही इनके अलावा भी कई तरह के तनाव और संघर्ष थे, जिनमें कुछ तो इस समय भी बने हुए हैं। कुछ लोगों के हाथ में संपित्त के केंद्रीयकरण के अलावा अमरीकी जनता बहुत सी दूसरी दिक्कतों का शिकार रही औद्योगिक प्रगति होने का अर्थ आम जनता की संपन्नता और खुशहाली नहीं था। एक सौ से कुछ अधिक साल हुए होंगे कि उत्तरी अमरीका में रहने वाले अमरीकन इण्डियन लोगों की जमीन हड़प ली गई। उनकी जीवन पद्धति को भी नष्ट कर दिया गया। 1890 तक उनको पूरी तरह अधीन कर लिया गया था और गोरों ने उनके लिए जो कुछ छोड़ा था, उसको स्वीकार करने के अलावा उनके सामने कोई दूसरा रास्ता नहीं था। उन्नीसवीं शताब्दी के बाद से अमरीकी इतिहास में प्रमुख मुद्दों में एक मुद्दा काले लोगों की समता और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष रहा है। संयुक्त राज्य अमरीका के स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में संघीय सरकार के आविर्भाव के बाद लगभग 80 वर्षों तक दास प्रथा वहाँ चलती रही। 1860 में तीन करोड़ दस लाख की कुल आबादी में संयुक्त राज्य अमरीका के दक्षिणी राज्यों में दो लाख 25 हजार लोगों के पास लगभग 40 लाख दास थे। 1865 में ग्रह युद्ध के बाद दास प्रथा समाप्त कर दी गई। उसके बाद लगभग दस वर्षों तक दास रखने वाले भूतपूर्व दक्षिणी राज्यों पर काले लोगों को अधिकार दिलाने के प्रयास चलते रहे। 1868 में संयुक्त राज्य अमरीका में सभी को नागरिक अधिकार दिए गए चाहे वह वहाँ पैदा हुआ हो अथवा बाहर से आकर स्थाई रूप से बस गया हो और इन अधिकारों को कम नहीं किया जा सकता था। 1870 में वहाँ के संविधान में पंद्रहवाँ संशोधन पारित किया गया। इसमें इस बात को कानून बना दिया गया कि नागरिकों के मत देने के अधिकार को नस्ल, रंग अथवा पहले दास होने के कारण न तो कम किया जा सकता है न वोट देने से वंचित किया जा सकता है। पहले उत्तरी राज्यों में भी, जहाँ दास प्रथा नहीं थी, अधिकांश काले लोगों को किसी न किसी बहाने इस अधिकार से वंचित रखा जाता था। अब दक्षिणी राज्यों में भी सिर्फ काले ही नहीं, जो स्वतंत्र हो चुके थे, बल्कि गरीब लागों को भी मतदान का अधिकार दिया गया और उसे लागू भी किया गया। यह अवधि 1870 तक बनी रही, इसे पुनर्निर्माण काल कहा जाता है। कई अर्थों में ऐसा अवसर पहली बार आया था जब संयुक्त राज्य अमरीका में सच्ची लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम की गई थी। इस व्यवस्था का उस समय अंत हो गया जब दक्षिणी अमरीकी राज्यों में सत्ता पुनः भूतपूर्व दास स्वामियों के हाथ सौंप दी गई तथा वहाँ से संघीय सरकार की फौजी टुकड़ियों को वापस बुला लिया गया। इसके बाद वह काल शुरू हुआ जिसमें काले लोगों के कानूनी और राजनीतिक अधिकार छीन लिए गए तथा उनके खिलाफ नस्लवादी भेदभाव और दमन की पुरानी प्रथा फिर शुरू हो गई। बीसवीं सदी के शुरू के वर्षों तक आते-आते काले लोगों के कानूनी और राजनीतिक अधिकार छीन लिए गए तथा काले और गोरों के बीच पृथकतावादी कानूनों को सख्ती से लागू किया गया अर्थात् एक ही रेलगाड़ी के एक ही डिब्बे में काले और गोरे साथ-साथ यात्रा नहीं कर सकते थे, वे एक ही पार्क अथवा समुद्र तट पर नहीं जा सकते थे, एक ही रेस्त्रां में भोजन नहीं कर सकते थे, एक स्कूल में पढ़ नहीं सकते थे। एक ही सिनेमा हॉल यहाँ तक कि अस्पतालों में भी नहीं जा सकते थे। इस पृथकतावाद के साथ हिंसा की वारदातें भी जुड़ी हुई थीं। अनुमान लगाया गया है कि उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में हर साल लगभग 200 काले लोगों को गोरे लोगों की भीड़ गैर कानूनी तरीके से फांसी पर लटकाती थी। समाज में आर्थिक असमानता को जारी रखने के लिए नस्लवाद को हथियार बनाया गया। काले लोग अमरीकी समाज के आर्थिक दृष्टि से सबसे दबे-कुचले लोग थे। लेकिन अधिकांश गोरे भी गरीब थे और बेरहमी से उनका भी शोषण किया जाता था। नस्लवादी भावना को हवा देकर काले तथा गोरे लोगों को शोषण के विरूद्ध एक जुट होकर संघर्ष करने से रोका जाता था। इस भेदभाव के कारण काले लोगों को पूरे देश में यातना भुगतनी पड़ी और दक्षिण राज्य में तो यह सचमुच ही अधिक खराब और पाशविक रूप में प्रचलित थी। बीसवीं सदी के शुरू के वर्षों में नस्लवादी भेदभाव के खिलाफ विरोध जताने वाला एक शक्तिशाली आंदोलन उठ खड़ा हुआ। इस आंदोलन में डब्ल्यू. ई. बी. डु. बोई महत्वपूर्ण व्यक्तित्व बने रहे। 1909 में काले लोगों के उत्थान के लिए एक राष्ट्रीय संगठन बनाया गया (एन. ए. ए. सी. पी.)। बहुत से उन लोगों ने भी काले लोगों के संघर्ष का समर्थन किया जो नस्लवाद के खिलाफ थे। इसके बाद भी नस्लवाद और अमानवीय व्यवस्था के खात्मे में महत्वपूर्ण प्रगति होने में आधी सदी लग गई। यह बात पहले कही गई है कि उन यूरोपीय देशों में भी औरतों को मतदान करने के अधिकार से वंचित रखा गया था जहाँ लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम थी। यही स्थिति संयुक्त राज्य अमरीका में भी थी। उन्नीसवीं सदी के मध्य तक महिलाओं के माताधिकार के लिए आंदोलन प्रारंभ हो चुके थे तथा बीसवीं सदी के शुरू में यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया था। बहरहाल 1920 में आकर अमरीकी संविधान में महिलाओं को अपने मत के प्रयोग का अधिकार प्राप्त हुआ। जापानविदित है कि एशिया में जापान ही ऐसा देश था जो साम्राज्यवाद के चंगुल से मुक्त था। सदियों तक ‘शोगन‘ कहे जाने वाले फौजी जनरल लोगों के हाथ में जापान की असली सत्ता रहा करती थी और सम्राट देश का प्रतीकात्मक प्रधान होता था। लगभग दो सौ से अधिक सालों तक जापान शेष दुनिया से पूरी तरह अलग-थलग रहा है। कई बातों में जापान की सामाजिक व्यवस्था की तुलना सामंतवादी यूरोप की समाज व्यवस्था से की जा सकती है। उन्नीसवीं सदी के मध्य के आसपास अपनी स्वतंत्रता के प्रति खतरे के कारण जापान आधुनिक विश्व के प्रति सजग हुआ। कुछ ही दशकों में न केवल वह विदेशी प्रभुत्व के खतरे से बचने में सफल हुआ बल्कि अपने समाज के कुछ पहलुओं को आधुनिकीकरण की प्रक्रिया से गुजारने में भी सफल रहा। इसके कारण विश्व शक्ति के रूप में उठ खड़े होने में वह सक्षम बना। 1853 में कमाण्डर पेरी अमरीकी जहाजी बेड़े सहित वहाँ गए तथा जापान को उन्होंने अंतिम चेतावनी दी। उसमें कहा गया था, ‘‘हमारी वास्तविक जरूरतों का तकाजा है कि दुनिया के इस दूरवर्ती हिस्से में हम अपने वाणिज्यिक हितों की रक्षा करें तथा ऐसा करने के क्रम में कठोर से कठोर उपायों का इस्तेमाल करें और जो शक्तियाँ हमारी तुलना में कम सतर्क हैं, उनकी योजनाओं को विफल बनाएँ।‘‘ आठ महीनों के बाद जब वह और बड़े जहाजी बेड़े के साथ वापस आया तो जापान की सरकार ने अमरीका के साथ एक संधिपत्र पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत जापान के दो बंदरगाह अमरीकी जहाजों के लिए खोल दिए गए और जापान में थोड़ा बहुत व्यापार करने की छूट मिल गई। उसके बाद कुछ अन्य यूरोपीय देशों द्वारा इसी तरह के संधिपत्र पर हस्ताक्षर किए गए। 1863 तथा 1864 में अमरीकी और यूरोपीय बेड़ों ने दो जापानी शहरों पर गोलाबारी कर अपनी सैनिक श्रेष्ठता का परिचय दिया। 1868 में ‘‘शोगुन‘‘ का शासन समाप्त कर दिया गया तथा नए शासक और सलाहकार सामने आए। वे सम्राट के नाम पर शासन चलाते थे और सिद्धांत रूप में सम्राट का प्राधिकार फिर से स्थापित हो गया था। इस घटना को इतिहास में ‘मेजी पुनःस्थापन‘ कहा जाता है। मेजी नए सम्राट की उपाधि थी जिसके आधार पर यह नाम दिया गया था।मेजी पुनःस्थापना के बाद चार दशकों से भी कम समय में जापान की अर्थव्यवस्था और राजनीतिक संस्थाओं का रूपांतरण हो गया। जापान की सरकार ने भारी उद्योगों में जबर्दस्त रूप से पूँजी निवेश किया। इसके लिए भारी कर लगाकर तथा किसानों का भारी शोषण कर पैसा जमा किया गया था। इसके बाद ये उद्योग पूँजीपतियों को बेच दिए गए। इसके बाद उद्योग शुरू करने के लिए सरकार की मदद की जरूरत नहीं रह गई क्योंकि जापान के उद्योगपति अपने बलबूते पर उद्योग प्रारंभ करने में समर्थ हो चुके थे। औद्योगीकरण के पीछे-पीछे किसानों के दरिद्रीकरण की प्रक्रिया भी चलती रही। ये किसान अक्सर विद्रोह करते रहे। काफी बड़ी तादाद में वे लोग गाँव छोड़कर शहरों में आ गए। इससे उद्योगों को सस्ते दर पर मजदूर उपलब्ध हुए बीसवीं सदी के शुरूआती वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जापानी माल और विशेष रूप से सूती कपड़े यूरोपीय माल के साथ टक्कर लेने में सफल रहा। जापान में भयानक गरीबी के कारण जापान के अंदर वहाँ पर बने माल की खपत बहुत कम थी। 1889 में जापान को नया संविधान मिला। इसमें कार्यकारिणी के प्रधान के रूप में सम्राट को विशेष हैसियत हासिल थी। वही मंत्रियों को नियुक्त करता था। मंत्रिगण सम्राट के प्रति उत्तरदायी होते थे। लोगों का विश्वास था कि वह स्वर्ग से पृथ्वी पर भेजा गया है, दैवी गुण संपन्न और पवित्र होता है और प्रजा से श्रेष्ठ है। उसका सम्मान किया जाना चाहिए, वह अबाध्य भी होता है। संविधान में एक संसद का प्रावधान था। इसे डाएट (राजा की सभा) कहा जाता है। तीन प्रतिशत से भी कम जनता को मतदान का अधिकार प्राप्त था। डाएट की शक्तियाँ काफी सीमित थीं। मंत्रिगण इसके प्रति उत्तरदायी नहीं थे, यहाँ तक कि वित्तीय मामलों में इसकी शक्ति काफी सीमित थी। नई राजनीतिक व्यवस्था में सेना को बहुत अधिकार मिले हुए थे और धीरे-धीरे इसका डाएट पर पूरा वर्चस्व कायम हो गया। थल सेना तथा नौ सेना द्वारा नौ सैनिक अधिकारी और नौ सैनिक मंत्री नियुक्त किए जाते थे तथा मंत्रीपरिषद् का इस पर कोई नियंत्रण नहीं था। जो शिक्षा प्रणाली तैयार की गई, उसने बहुत थोड़े समय में विशाल जन समुदाय को साक्षर बना दिया। औद्योगीकरण के लिए जिस तकनीकी कौशल की जरूरत थी, साक्षरता के कारण उसमें दक्षता हासिल करने में सुविधा हुई। शिक्षा प्रणाली को सम्राट के प्रति भाक्तिभाव जगाने के लिए भी इस्तेमाल किया गया। अतिराष्ट्रवादी तथा उत्कृष्ट देश प्रेम की भावना को बढ़ावा देने के लिए इसे उपयोग में लाया गया। जापान में नागरिक स्वतंत्रता और मुक्त राजनीतिक संघर्षों की कमी थी। राजसत्ता को कुलीन तंत्र तथा राज्य के दमनकारी उपकरणों के जरिए नियंत्रित किया जाता था। मसलन प्रेस को नियंत्रित करने, जनसभाओं पर रोक लगाने तथा प्रदर्शनों को रोकने के लिए पुलिस को व्यापक अधिकार दिए गए थे। राजनीतिक विरोध बर्दाश्त नहीं किया जाता था। लेकिन कठोर प्रतिबंधों के बावजूद एशिया का पहला समाजवादी गुट जापान में ही बना था। 1890 के दशक तक जापान अपनी उपनिवेशवादी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के प्रयास में लग गया। इन महत्वाकांक्षाओं का प्रमुख मोहरा चीन था और इनका लक्ष्य पूर्वी एशिया में प्रभुत्व कायम करना था। बाद में जापान का उद्देश्य संपूर्ण एशिया तथा प्रशांत क्षेत्र में अपनी श्रेष्ठता स्थापित करना हो गया। अपनी सामरिक शक्ति को मजबूत करने के बाद जापान ने चीन से युद्ध किया और 1895 में उसे परास्त कर दिया। उसने फारमोसा को जापान में मिला लिया जो इसके पहले चीन का अंग था तथा इस बात के लिए उस पर दबाव डाला कि कोरिया को वह स्वतंत्र राष्ट्र माने। कोरिया पहले चीन राज्य के अंतर्गत था। 1905 में कोरिया जापान का संरक्षित राज्य बनाया गया तथा 1910 में इसका जापान में विलय कर लिया गया। 1899 में संयुक्त राज्य अमरीका तथा यूरोपीय देशों ने जापान को महाशक्ति के रूप में स्वीकार कर लिया था जब उन्होंने संधि में जापान द्वारा दिए गए विशेषाधिकार और सुविधाओं को छोड़ा। ये अधिकार और सुविधाएँ जापान ने विवशता और दबाव के अंतर्गत दिए थे। इस आशय की संधि जापान ने 1854 के बाद की थी। 1902 में आंग्ल-जापानी संधि पर हस्ताक्षर किए गए और जापान एशिया का पहला ऐसा देश था जिसको अन्य उपनिवेशवादियों के बराबर हैसियत मिली। ब्रिटेन ने इस संधि पत्र पर इसलिए हस्ताक्षर किए थे क्योंकि वह चीन में रूसी प्रभाव को रोकना चाहता था। रूस-जापान युद्ध (1904-05) के विषय में हम पहले बता चुके हैं कि उसमें रूस की पराजय हुई थी। मंचूरिया के दक्षिणी हिस्से को जापानी प्रभाव क्षेत्र की मान्यता मिली थी। सखालीन द्वीप के आधे हिस्से पर भी जापानी कब्जा हो गया तथा लियाओतुंग प्रायद्वीप भी उसके नियंत्रण में आ गया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जापान ने चीन को भी अपना संरक्षित राज्य बनाना चाहा था यद्यपि उसको इसमें सफलता हासिल नहीं हुई। लेकिन वह चीन तक अपना प्रभाव विस्तार करने में सफल रहा। यद्यपि जापान एशिया में साम्राज्यवादी नीतियाँ अख्तियार कर रहा था, महाशक्ति के रूप में उसके उदय से बहुत से एशियाई देशों में राष्ट्रवाद के विकास में तेजी आई। रूस के साथ उसकी लड़ाई से यह बात साबित हो गई कि एक गैर-श्वेत एशियाई देश प्रमुख यूरोपीय शक्ति को धूल चटा सकता है। इससे एशिया की जनता को अपनी पुरानी प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने में मदद मिली। संयुक्त राज्य अमरीका और जापान का अभ्युदय इस बात का सूचक था कि यूरोप की सर्वोच्चता बहुत दिनों तक कायम रहने वाली नहीं है। प्रथम विश्व युद्ध ने इसकी प्रक्रिया को और तेज कर दिया। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीकाजापानी, अमरीकी तथा यूरोपीय साम्राज्यवाद के संदर्भ में हम एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका की कुछ घटनाओं की चर्चा पहले ही कर चुके हैं। जब से साम्राज्यवादी देशों ने अपना परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष नियंत्रण कायम किया, उसी समय से उनको जनता के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था। जैसे-जैसे समय गुजरता गया, प्रतिरोध का पुराना स्वरूप राष्ट्रवादी आंदोलन का रूप अख्तियार करता गया। इसका लक्ष्य प्रत्यक्ष या परोक्ष विदेशी शासन को उखाड़ फेंकना था। इन लोगों ने अन्य राष्ट्रों के साथ अपनी बराबरी का दावा किया तथा आधुनिक पद्धति पर अपनी अर्थव्यवस्था के निर्माण का दावा किया। इसके साथ ही इस बात का भी निश्चय किया कि उनकी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था की रचना लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के सिद्धान्तों पर आधारित होनी चाहिए। इन राष्ट्रवादी आंदोलनों को अक्सर अपने ही देश की पुरानी राजनीतिक व्यवस्था के विरूद्ध लड़ना पड़ता था और उन तत्वों के खिलाफ भी संघर्ष चलाना पड़ता था जो देश की प्रगति में बाधक थे।भारतीय राष्ट्रवाद के उदय और उसकी मुख्य विशेषताओं से आप को पहले ही परिचित कराया जा चुका है। उपनिवेशों में शुरू होने वाले राष्ट्रवादी आंदोलनों में से यह भी एक प्रारंभिक आंदोलन था। बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों में एशिया के दूसरे हिस्सों में भी राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों की लहर उठने लगी थी, जैसे हिन्द चीन, इण्डोनेशिया, फिलीपाइन्स और ईरान में। ईरान में एक के बाद एक विद्रोह के बाद ईरान के शाह को मजबूर होकर ईरान को संवैधानिक राजतंत्र का रूप देना पड़ा जिसमें एक संसद की स्थापना की गई और उसे ‘मजलिस‘ कहा गया। लेकिन इसके तत्काल बाद ही ईरान के शाह ने विदेशी ताकतों, जैसे रूस, की मदद से अपनी राजतंत्रीय व्यवस्था को दुबारा स्थापित कर लिया और मजलिस को खत्म कर दिया गया। चीन में कई क्रांतिकारी संगठनों के आविर्भाव के रूप में लोगों की राष्ट्रीय जागृति को अभिव्यक्ति मिली। ये सब संगठन चीनी क्रांतिकारी लीग नाम से एक हुए। इस लीग के अध्यक्ष डा. सन यात-सेन थे। चीनी जनता की राष्ट्रीय जागृति तथा विभिन्न संगठनों के एकता में इनकी नेतृत्वकारी भूमिका थी। लीग के तीन मार्गदर्शक सिद्धांत थे। इनको सन-यात-सेन ने बनाया था। ये तीन सिद्धान्त थेः राष्ट्रवादी, लोकतंत्र और जीविका (अंतिम सिद्धांत को कभी-कभी समाजवाद के संदर्भ में याद किया जाता है)। निश्चित तौर पर इन शब्दों का मतलब था सत्रहवीं सदी के मध्य से चीन पर शासन कर रहे मांचू वंश का अंत, जनतांत्रिक गणराज्य की स्थापना और भूमि का समान वितरण। 1911 में सारा दक्षिण चीनी क्रांति की चपेट में आ गया और 1 जनवरी 1912 को चीन को गणराज्य घोषित किया गया तथा नानजिंग (नानकिंग) को इसकी राजधानी बनाया गया। डॉ. सन यात-सेन इस गणराज्य के राष्ट्रपति बनाए गए। इस बीच उत्तरी चीन को संवैधानिक राजतंत्र का रूप देने के लिए कुछ कदम उठाए गए थे तथा जनरल युवान सिहकाई को इसका प्रधानमंत्री बनाया गया था। उत्तरी चीन की सरकार (जिसकी राजधानी पीकिंग में थी) और दक्षिण चीन की सरकार (जिसका मुख्यालय नानकिंग में था) के बीच टकराव को टालने के लिए एक समझौता किया गया। मांचू वंश के शासक ने गद्दी छोड़ दी और इस तरह चीन में साम्राज्यवादी शासन का अंत हो गया। युवान सिह-काई को राष्ट्रपति के रूप में मान्यता मिली। उसे संसद की बैठक बुलाने का दायित्व सौंपा गया। विदेशी शक्तियों ने युवान सिह-काई का समर्थन किया। 1913 में उसने संसद की बैठक बुलाई लेकिन तत्काल उसने इसे बर्खास्त कर दिया। उसने अपने को सम्राट घोषित करने का सपना संजोया था। इसी बीच डॉ. सन यात-सेन ने कोमिन तांग बना लिया था जिसे राष्ट्रीय दल कहा जाता है। उन्होंने दूसरी क्रांति के लिए आह्वान किया। युवान कोमिन तांग के दमन में सफल रहा। इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया तथा डॉ. सन यात-सेन को निर्वासित कर दिया गया। 1916 में युवान की मृत्यु हो गई तथा चीन युद्ध सरदारों के अधीन हो गया। इन युद्ध सरदारों का चीन के विभिन्न भागों में कब्जा था। इनको विदेशी ताकतें वित्तीय मदद पहुँचा रही थीं। जब पहला विश्व युद्ध खत्म हो गया तब चीन में राष्ट्रीय तथा क्रांतिकारी आंदोलन ने नए चरण में प्रवेश किया। बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों तक आते-आते ऑटोमन साम्राज्य यूरोप का अपना सारा भू-भाग गँवा चुका था। उत्तरी अफ्रीका के उसके अधिकांश अधिकृत क्षेत्रों पर यूरोप की उपनिवेशवादी ताकतों का कब्जा हो चुका था। सीरिया, इराक, लेबनान, फिलिस्तीन और अरब जैसे पश्चिम एशिया के देशों में राष्ट्रवादी भावनाओं का ज्वार उठान पर था। टर्की के भीतर सुलतान के आतंक के विरोध में तथा टर्की को आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राज्य बनाने के लिए आंदोलन हो रहे थे। इस आंदोलन का नेतृत्व बुद्धिजीवी, सुधारक और सैनिक अधिकारी कर रहे थे, इनको ‘युवा तुर्क‘ के नाम से जाना जाता था। 1908 में विद्रोह के भय से सुलतान संविधान को पुनः लागू करने के लिए सहमत हो गया। यह संविधान 1876 में पहली बार लागू किया गया था। कुछ युवा तुर्क ऑटोमन साम्राज्य के अरबों को समान अधिकार देने के पक्ष में थे, इसके विपरीत कुछ अन्य लोग तुर्कों का वर्चस्व कायम रखना चाहते थे और यहाँ तक कि इसका विस्तार भी चाहते थे। अंततः उदारवादी युवा तुर्कों की असफलता के चलते टर्की को प्रथम विश्वयुद्ध में घसीट लिया गया। यह जर्मनी और आस्ट्रिया-हंगरी के पक्ष में युद्ध में कूदा था और अरब जगत में ऑटोमन विरोधी अरब राष्ट्रवादी भावनाओं को भड़काने में ब्रिटेन की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा को कामयाबी मिली। उत्तरी अफ्रीका के कुछ हिस्सों को छोड़ कर उन्नीसवीं सदी के अंत होने तक यूरोपीय शक्तियों ने अफ्रीका का बँटवारा कर लिया था। उत्तरी अफ्रीका के कुछ हिस्सों पर बीसवीं सदी के तीसरे दशक में यूरोपीय लोगों का कब्जा हुआ। लेकिन यूरोप की उपनिवेशवादी ताकतों को अफ्रीकी भू-भाग पर वास्तविक नियंत्रण करने में बहुत अधिक समय लग गया क्योंकि इसमें उनको प्रतिरोधों और विद्रोहों का सामना करना पड़ा। इनमें से कुछ विद्रोहों को दबाने में उपनिवेशवादी ताकतों को बहुत अधिक समय लगा। उदाहरण के लिए 1905-07 के दौरान जर्मनों द्वारा नियंत्रित पूर्वी अफ्रीका में माजी-माजी नाम का विद्रोह हुआ था। एशिया के बहुतेरे देशों के विपरीत प्रथम विश्व युद्ध के बाद ही अफ्रीका के अधिकांश भागों में आधुनिक राष्ट्रवादी आंदोलन प्रारंभ हुए। जब ये आंदोलन उठ खड़े हुए तो इनके पीछे प्रतिरोध और विद्रोह की सुदीर्घ परंपरा विद्यमान थी। लैटिन अमरीका में पुर्तगाली और स्पेनी साम्राज्यों के ध्वस्त होने की वजह से बीस स्वतंत्र राज्यों का आविर्भाव हो गया था। उन्नीसवीं सदी के अंत तक इनमें से अधिकांश राज्यों की अर्थव्यवस्था काफी पिछड़ी हुई थी। इनकी अर्थव्यवस्था मुख्यतः खेतीबाड़ी पर टिकी हुई थी। इनमें से अधिकांश देशों में कुलीन तंत्रों का शासन था और कोई ऐसी शक्तिशाली सरकार उभर कर सामने नहीं आई जो विदेशी आर्थिक प्रभुत्व का प्रतिरोध करती। विकास और कल्याणकारी कार्यों में इस्तेमाल होने की जगह इन देशों के संपन्न संसाधन यूरोपीय कंपनियों की झोली में डाल दिए जाते थे। बाद में क्रमशः ये संयुक्त राज्य अमरीका के बड़े-बड़े निगमों के पास पहुँचने लग गए थे। बागानों, खदानों, रेलमार्गों, जहाजरानी, बिजली, कहने का मतलब यह कि अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में, लैटिन अमरीका एक ‘‘अनौपचारिक साम्राज्य‘‘ बन गया था अर्थात् औपचारिक रूप से स्वतंत्र होकर भी उसकी साम्राज्य जैसी हालत थी। लैटिन अमरीका के ऊपर संयुक्त राज्य अमरीका के बढ़ते हुए नियंत्रण और प्रभुत्व की बात पहले कही जा चुकी है। अधिकांश लैटिन अमरीकी देशों की समाज व्यवस्थाओं में असमानता का बोलबाला था। कुछ देशों में फ्रांसीसी क्रांति की वजह से दास प्रथा खत्म की जा चुकी थी इसके बावजूद कुछ अन्य देशों में यह बनी हुई थी, यद्यपि संयुक्त राज्य अमरीका में दास प्रथा का उन्मूलन किया जा चुका था। मसलन, ब्राजील में दास प्रथा 1888 में आकर समाप्त की गई। लेकिन लंबी अवधि तक दास प्रथा के चलते रहने के बावजूद कुछ लैटिन अमरीकी देशों में उस तरह का नस्लवाद, नस्ल के आधार पर भेदभाव तथा पृथकतावाद नहीं था जो संयुक्त राज्य अमरीका में बीसवीं सदी में भी हमें देखने को मिलता है। बाद में पहुँचने वाले एशियाई आब्रजकों को छोड़कर लैटिन अमरीकी देशों की आबादी में जिन लोगों की हिस्सेदारी थी, वे इस प्रकार थे : यूरोपीय लोगों के वंशज उन काले लोगों के वंशज थे जिन्हें अफ्रीका से दास बनाकर लाया गया था, अमरीकी इंडियन लोग और आबादी का वह भाग जिसमें इन सबका मिला जुला रक्त था। लैटिन अमरीका की आधी से भी ज्यादा आबादी मिश्र रक्त वालों की थी। लेकिन अधिकांश देशों में, जहाँ काफी बड़ी आबादी अमरीकी इंडियन लोगों की थी, सत्ता पर श्वेतों के एक गुट का कब्जा था। इस प्रकार के देशों में पेरू इक्वेडर बोलिविया, कोलंबिया तथा बेनेजुएला का नाम मुख्य है। बड़ी-बड़ी भूसंपत्ति उन भूस्वामियों के कब्जे में थी जिन्हें अनुपस्थित भूस्वामी कहा जाता है तथा जो अपने हाथ से काम नहीं करते। अमरीकी इंडियन लोग भंयकर गरीबी की जिंदगी जीने के लिए अभिशप्त थे। मैक्सिको दूसरा लैटिन अमरीकी देश था जहाँ बहुसंख्यक आबादी अमरीकी इंडियन लोगों की थी। इस देश में संगठित जन आंदोलन उभरे। इन आंदोलनों में काफी बड़े पैमाने पर अमरीकी इंडियन लोगों की भागीदारी थी। सामाजिक असमानता की समाप्ति, भूमि का समान वितरण और आम जनता के सहयोग से राज्य व्यवस्था की रचना करना इन आंदोलनों का मकसद था। लेकिन मैक्सिको को राजनीतिक उथल-पुथल के लंबे दौर से गुजरना पड़ा। इस उथल-पुथल में अमरीकी हस्तक्षेप का दौर भी शामिल था। यह सब कुछ मैक्सिकी क्रांति के संपन्न होने के पहले हुआ। लोकतांत्रिक संस्थाओं की रचना और अर्थव्यवस्था के निर्माण के क्षेत्र में अर्जेंटिना ने थोड़ी प्रगति की। बेनोस एरेस नगर को लैटिन अमरीका का पेरिस माना जाता था। जिस समय प्रथम विश्व युद्ध हुआ, लैटिन अमरीका के कई हिस्सों में लोकतांत्रिक आंदोलन हो रहे थे। यद्यपि लैटिन अमरीकी देश लगभग एक शताब्दी से स्वतंत्र थे, फिर भी अंतर्राष्ट्रीय जीवन में उनकी गतिविधियाँ नगण्य थीं। यहाँ पर इन देशों की किसी प्रकार की अपनी स्वतंत्र भूमिका नहीं थी। इन देशों में नाममात्र का औद्योगीकरण हो पाया था, इसलिए इनकी स्थिति कच्चा माल मुहैया कराने वाले देशों की थी। अपने ताकतवर पड़ोसी देशों के फायदे के लिए इनमें से कुछ देशों को एक फसली अर्थव्यवस्था वाला देश बनाकर छोड़ दिया गया था। इससे उनकी स्वाधीनता और कम हुई। उत्तरी अमरीका तथा लैटिन अमरीका के बीच इतना जबर्दस्त अंतर था कि इस अंतर को लैटिन अमरीका के लोग अनदेखा नहीं कर सकते थे। लैटिन अमरीकी जनता की महत्वाकांक्षाएँ बढ़ती चली गईं, इसके साथ ही संयुक्त राज्य अमरीका के प्रति उनमें शत्रुभाव भी गहराता गया। इसको वे लोग उत्तर का भीमकाय साम्राज्य मानते थे। प्रथम विश्व युद्धउन्नीसवीं सदी के आखिरी दशक के बाद के यूरोपीय इतिहास की मुख्य विशेषताओं को संक्षेप में हम इन शब्दों में प्रस्तुत कर सकते हैं, मसलन उन दिनों साम्राज्यवादियों में आपसी प्रतिस्पर्धा थी। यूरोप के भीतर युद्धोन्माद, आपसी विरोध और टकराव की स्थितियाँ बढ़ोत्तरी पर थीं। विरोधी गुटों के बीच संधियाँ, सैन्यीकरण का बढ़ना और जोरशोर से युद्ध की तैयारी उस काल के यूरोप की खासियत थी। अनेक प्रकार के संकट पैदा हुए थे जिनको कम से कम अस्थायी रूप से ही सही हल किया गया था। यूरोप में तनाव की स्थिति के कारण लोग युद्ध को अवश्यंभावी मानने लगे थे। हर राज्य अपनी युद्ध योजना और रणनीतियों के साथ तैयार था। धीरे-धीरे यह बात भी साफ होती गई कि युद्ध एक बार शुरू हुआ तो इसको किसी एक देश या स्थान तक सीमित रखना संभव नहीं होगा। यह आम युद्ध (विश्व युद्ध) की शक्ल अख्तियार कर लेगा और हर देश इसकी लपेट में आ जाएगा।तात्कालिक अवसरजून 28, 1914 को सेराजेवो में आस्ट्रिया के राजसिंहासन के उत्तराधिकारी आर्कड्यूक फ्रैंसिस फर्डिनैण्ड तथा उनकी पत्नी की छलपूर्वक हत्या ने युद्ध की शुरूआत का तात्कालिक अवसर प्रदान किया। सराजेवो में कपटपूर्ण तरीके से हत्या की गई थी जो बोस्निया की राजधानी थी और जिसको कुछ ही वर्ष पहले आस्ट्रिया-हंगरी में मिलाया गया था। इस हत्या की योजना बनाने वाला एक गुप्त संगठन था। यह ‘‘काला हाथ‘‘ नाम से विख्यात था इसका नाम ‘‘एका या मौत‘‘ भी था। इसमें सर्बिया के अतिवादी राष्ट्रवादी लोग शामिल थे। सर्बिया के सभी लोगों को एक राज्य के रूप में ऐक्यबद्ध करना इनका मकसद था। आमतौर पर इतिहासकारों में इस बात पर सहमति है कि सर्बिया की सरकार को या कम से कम उसके प्रधानमंत्री को आर्कड्यूक की हत्या के षड्यन्त्र की जानकारी थी लेकिन इसको विफल करने के लिए उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया। इस हत्या के दुष्कर्म में सर्बिया की साझीदारी के प्रति यकीन जमने के बाद 23 जुलाई को आस्ट्रिया (आस्ट्रिया-हंगरी) ने 11 सूत्री माँग पत्र प्रस्तुत करते हुए सर्बिया को अंतिम रूप से चेतावनी दी। आस्ट्रिया को इन माँगों के पूरी होने की कोई उम्मीद नहीं थी, इसलिए बिना शर्त इनको पूरा करने के लिए उसने 48 घण्टे की मियाद भी तय कर दी। सर्बिया ने ज्यादातर माँगें तो मान लीं, लेकिन उसने सारी माँगे नहीं मानीं। पूरी माँगें मानने का अर्थ था सर्बिया द्वारा अपनी प्रभुसत्ता का पूर्ण रूप से त्याग। 25 जुलाई को सर्बिया ने जवाब दिया लेकिन आस्ट्रिया को इससे मनाया नहीं जा सका। सर्बिया को इस बात का पता था कि आस्ट्रिया नहीं मानेगा इसलिए उसने पहले से ही अपनी फौजों को हरकत में आने के लिए आदेश दे दिया था। आस्ट्रिया (आस्ट्रिया-हंगरी के लिए संक्षिप्त रूप) ने सर्बिया का जबाब अस्वीकार कर दिया और सर्बिया पर तत्काल आक्रमण के लिए अपनी फौजों को आदेश जारी किया। ‘‘अपने घर और अपने भू-भाग के स्थायी खतरे‘‘ को जड़ से समाप्त करने के लिए वह कृत संकल्प था। आस्ट्रिया के सम्राट ने इसे स्थायी खतरा कहा था जब उसने जर्मनी के सम्राट को पत्र लिखा था। 28 जुलाई को आस्ट्रिया ने सर्बिया के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। 29 जुलाई को आस्ट्रिया की सेना ने सर्बिया की राजधानी बेलग्रेड के ऊपर बम गिराए।सर्बिया और आस्ट्रिया के बीच युद्ध शुरू होने के बाद, पहले एक युद्ध और इसके बाद तीन और युद्ध शुरू हो गए। इनकी सेनाएँ एक दूसरे से जुड़ीं और इस प्रकार इसकी परिणति प्रथम विश्व युद्ध में हुई। आस्ट्रिया पर आक्रमण करने के लिए रूस ने अपनी फौजों को आदेश दे डाला ताकि आस्ट्रिया पर इस बात के लिए दबाव डाला जा सके कि वह सर्बिया के साथ युद्ध समाप्त कर दे। बाल्कन क्षेत्र में आस्ट्रिया के विस्तारवाद को रूस इजाजत नहीं दे सका था क्योंकि इस क्षेत्र को लेकर उसकी अपनी महत्वाकांक्षाएँ थीं। यदि सर्बिया की पराजय होती तो उसकी ये महत्वाकाक्षाएँ अधूरी रह जातीं। यदि रूस इस युद्ध में शामिल होता तो जर्मनी आस्ट्रिया की ओर से इसमें कूद पड़ता, इसलिए रूस ने जर्मनी के खिलाफ भी युद्ध की तैयारी की। जर्मनी को पूरा विश्वास था कि यदि रूस के साथ उसकी मुठभेड़ हुई तो फ्रांस रूस की तरफ से उसके विरूद्ध लड़ेगा। इन सब का मतलब था कि जर्मनी को दो मोर्चों पर युद्ध करना होगा, पश्चिम में फ्रांस के साथ और पूरब में रूस के साथ। जर्मनी ने योजना बनाई कि पहले वह अपनी अधिकांश फौजों को फ्रांसीसी सीमा पर लगाकर आननफानन में फ्रांस को शिकस्त देगा, इसके बाद फौजों को रूस के विरूद्ध लगाएगा क्योंकि रूस को एकाएक थोड़े समय में परास्त करना संभव नहीं था। इसलिए इस श्रंखला के दूसरे युद्ध में एक ओर तो आस्ट्रिया और जर्मनी थे तथा दूसरी ओर फ्रांस और रूस। ब्रिटिश लोगों की स्थिति अभी भी साफ नहीं थी क्योंकि युद्ध में कूदने के मुद्दे पर ब्रिटिश सरकार में मतभेद थे। मदद के लिए फ्रांसीसी अनुरोध को उसने माना और वादा किया कि जर्मन नौसैनिक आक्रमण से फ्रांस के उत्तरी तट की वह रक्षा करेगा। लेकिन इस बीच तटस्थ देश बेल्जियम पर जर्मनी ने आक्रमण कर दिया, इससे ब्रिटेन की अनिर्णय की स्थिति खत्म हो गई। इसके बाद जर्मनी और ब्रिटेन में युद्ध छिड़ गया। इस प्रकार पूर्ववर्ती वर्षों में जो प्रतिस्पर्धी गुट बने थे, वे हरकत में आ गए। इस त्रिपक्षीय गुट का सदस्य इटली इस मामले में इस आधार पर तटस्थ रहा कि जर्मनी कोई रक्षात्मक युद्ध नहीं लड़ रहा है। युद्ध का विस्तार क्षेत्रपहली अगस्त 1914 को जर्मनी ने रूस के खिलाफ युद्ध की घोषणा की तथा तीन अगस्त को फ्रांस के विरूद्ध। चार अगस्त को सुबह जर्मनी फौजों ने बेल्जियम में प्रवेश किया और इसी दिन ठीक मध्यरात्रि के समय ब्रिटेन ने जर्मनी के विरूद्ध युद्ध की घोषणा की। इस दौरान सर्बो-आस्ट्रिया युद्ध गौण लगने लगा जिसके चलते जर्मनी, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन युद्ध की लपेट में आए थे। 6 अगस्त तक आस्ट्रिया का रूस के साथ युद्ध नहीं छिड़ा था और 12 अगस्त तक ब्रिटेन और फ्रांस के साथ भी उसने युद्ध की शुरूआत नहीं की थी। दोनों पक्षों ने अधिक भू-भाग दिलाने का लालच देकर दूसरों को इसमें शरीक होने के लिए कहा और नतीजा यह हुआ कि बाद में इसमें और देश भी शरीक हो गए। अगस्त में जापान ने जर्मनी के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। जापान का ब्रिटेन से गठजोड़ हो गया लेकिन इसमें उसका मुख्य मकसद चीन में जर्मनी के कब्जे वाले भू-भाग और प्रशांत क्षेत्र को अपने नियंत्रण में करना था। पुर्तगाल को ब्रिटेन अक्सर अपना पुरान मित्र कहा करता था, वह भी युद्ध में कूद पड़ा। मई 1915 में इटली ने आस्ट्रिया के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। ब्रिटेन और फ्रांस ने आस्ट्रिया और तुर्की का भू-भाग उसे देने का वायदा किया था। बाद में रूमानिया और ग्रीस भी ब्रिटेन, फ्रांस और रूस के साथ आ गए। आगे चलकर अन्य देशों के साथ इन देशों को मित्र राष्ट्र (एलाइड पॉवर) कहा गया। अक्टूबर में बल्गेरिया भी जर्मनी और आस्ट्रिया के साथ आकर मिल गया। सर्बिया तथा ग्रीस के भू-भाग उसे देने का वायदा किया गया था। बल्गेरिया को कुछ तुर्की का हिस्सा भी दिया गया था। नवंबर में तुर्की ने रूस के विरूद्ध युद्ध का ऐलान कर दिया तथा जर्मनी और आस्ट्रिया की ओर से युद्ध में शामिल हो गया। ये देश, जर्मनी, आस्ट्रिया और उनके सहयोगी ‘केंद्रीय शक्ति‘ (सेंट्रल पॉवर) के नाम से जाने गए। विश्व के अन्य भागों के दूसरे देश भी इस युद्ध में शरीक हुए। मित्र राष्ट्रों की ओर 1917 में संयुक्त राज्य अमरीका इस लड़ाई में शामिल हुआ। कुल मिलाकर युद्ध में शामिल देशों की संख्या बढ़ते-बढ़ते सत्ताईस तक पहुँच गई। इसमें सभी महाद्वीपों के देश शामिल थे। इस प्रकार युद्ध का क्षेत्र व्यापक हो गया। लगभग 6 करोड़ 50 लाख लोगों (सैनिकों) को इसमें भाग लेना पड़ा। इनमें से 4 करोड़ 20 लाख फौजी मित्र राष्ट्रों ने एकत्र किए थे तथा 2 करोड़ 20 लाख केंद्रीय शक्ति (सेंट्रल पॉवर्स) ने संगठित किए थे।युद्ध का दौरइस युद्ध को प्रथम युद्ध के नाम से पुकारा जाता है और ठीक भी है क्योंकि यह दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लड़ा गया था। लड़ाई की गंभीरता तथा मौतों की संख्या को ध्यान में रखकर यदि इसके बारे में सोचें तो यूरोप की जमीन पर जो लड़ाइयाँ लड़ी गईं, दुनिया के अन्य भागों में हुई लड़ाइयाँ उनके सामने फीकी पड़ जाती हैं। यूरोप के पश्चिमी मोर्चे पर युद्ध का श्रीगणेश तब हुआ जब जर्मनी की सेना बेल्जियम को रौंदती हुई फ्रांस के दक्षिणी भाग में प्रवेश कर गई और सितंबर के शुरू तक पेरिस के एकदम पास पहुँच गई। इस बीच फ्रांसीसी सेना फ्रांस जर्मन सीमा की ओर बढ़ चुकी थी ताकि जर्मन सेना को अल्सकेस लोरा में प्रवेश करने से रोक सके। जर्मनी की सेना को उम्मीद थी कि वह फ्रांसीसी सेना को चारों तरफ से घेरने में सफल हो जाएगी और इस प्रकार उसे तत्काल विजय हासिल हो जाएगी। अल्सकेस लोरां में फ्रांसीसी सेना को पीछे ढकेल दिया गया लेकिन ब्रिटिश फौज सहित फ्रांस की फौजों से मुठभेड़ हो गई। जिस लड़ाई में दोनों तरफ की सेनाओं का सामना हुआ उसे मार्ने की लड़ाई के नाम से जाना जाता है ( यह लड़ाई मार्ने नदी के तट पर लड़ी गई इसलिए इसको यह नाम दिया गया)। जर्मनी की फौजों को पीछे हटना पड़ा तथा अस्ने नदी के किनारे उनको पनाह लेनी पड़ी। भयानक संघर्ष हुए लेकिन नवंबर के अंत में यह लड़ाई पश्चिमी मोर्चे पर ऐसे लंबे गतिरोध की अवस्था में पहुँच गई कि चार वर्षों तक इनमें से कोई एक पक्ष दूसरे को पराजित नहीं कर सका।दोनों ही ओर खाइयों की लंबी श्रंखला थी, कँटीले तारों की लंबी पंक्तियाँ थीं। ये दोनों ही चीजें स्विट्जरलैण्ड के साथ लगने वाली फ्रांस की दक्षिणी सीमा से लेकर उत्तर के फ्रांसीसी समुद्र तट तक बनाई गई थीं। इसके पीछे दो विरोधी पक्षों की सेनाएँ जमी हुई थीं। इनके पीछे रक्षा के लिए मशीनगन और राइफलें मौजूद थीं। इनमें से कोई भी एक पक्ष दूसरे की खाई व्यवस्था को भेदने में असफल रहा। तड़के सुबह हर पक्ष दूसरे पर चढ़ाई करता था लेकिन इसमें उसे सफलता तो नाममात्र ही मिलती थी। लेकिन मरने वालों की संख्या में दोनों तरफ तेजी से वृद्धि होती जा रही थी। इसमें सफलता हासिल करने के लिए 1915 में जर्मनी ने जहरीली गैस का उपयोग करना आरंभ किया और 1916 में टैंकों का उपयोग शुरू किया। ये टैंक अभी हाल में इसी काम के लिए बनाए गए थे। इन दोनों तरह के हथियारों के इस्तेमाल से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ा। दोनों ओर से जितने सैनिक मरते थे, उनकी जगह को भरने के लिए नई फौजी टुकड़ियाँ लाई जाती थीं। पूर्वी मोर्चे पर रूस को जर्मनी और आस्ट्रिया के विरूद्ध कुछ आरंभिक कामयाबी मिली। लेकिन यह फायदा बहुत कम समय के लिए मिला। 1915 में रूसी सेनाओं को जबर्दस्त मुँह की खानी पड़ी तथा ‘केंद्रीय शक्तियों‘ (सेंट्रल पॉवर्स) की फौजें रूसी साम्राज्य के अनेक इलाकों में प्रवेश कर गईं। 1916 में रूस ने एक और आक्रमण किया लेकिन उसको विफल कर दिया गया। अक्टूबर की रूसी क्रान्ति के बाद रूस युद्ध से अलग हो गया। 2 मार्च 1918 में रूस ने जर्मनी के साथ ब्रेस्ट-लिटोत्स्क की संधि पर हस्ताक्षर किए और शांति की कीमत के रूप में रूस का बहुत-सा भू-भाग जर्मनी को दे दिया। रूस ने 1 करोड़ 20 लाख लोगों को इस लड़ाई में झोंका था। इनमें से 10 लाख 70 हजार लोग मारे गए थे लगभग 50 लाख लोग घायल हुए थे और लगभग 20 लाख 50 हजार लोग या तो लापता हो गए या बंदी बनाए गए। इसी दौरान सर्बिया और रूमानिया ने समर्पण कर दिया था। यूरोप महाद्वीप के बाहर, पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में कुछ महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ लड़ी गईं। उत्तरी अफ्रीका तथा पश्चिम एशिया में मित्र राष्ट्रों के आधिपत्य के तथा प्रभाव के लिए जर्मनी और तुर्की का साथ होना खतरा बन गया। ब्रिटेन और फ्रांस ने मिलकर इनके विरूद्ध युद्ध किया और ऑटोमन साम्राज्य के अरब भू-भाग को अपने कब्जे में करने की कोशिश की। अरब राष्ट्रवादियों तथा दूसरे लोगों से उन्होंने संपर्क किया तथा तुर्क विरोधी अरब विद्रोहियों को भड़काया। एक ओर तो उन्होंने तुर्कों के शासन से अरबों को स्वतंत्र कराने का दिखावा किया और दूसरी ओर इंग्लैंड और फ्रांस ने आपस में एक गुप्त समझौता भी कर लिया। यह समझौता 1916 में किया गया और इसे साइके-पिकॉट समझौते के नाम से जाना जाता है। इस समझौते में ब्रिटेन और फ्रांस ने अरब देशों के आपस में बांट लेने का प्रावधान रखा था। 1917 में फिलिस्तीन में यहूदियों के लिए एक राष्ट्र राज्य बनाने का ब्रिटिश सरकार ने वचन दिया था। पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा एक दूसरे देश के बारे में दिए गए इस ‘‘वचन‘‘ के गंभीर परिणाम होने थे क्योंकि उस देश को इस काबिल भी नहीं समझा गया कि उससे इस मामले पर विचार-विमर्श किया जाए। युद्ध के दौरान पश्चिम एशिया में जहाँ-जहाँ जर्मन उपनिवेश थे उसे मित्र राष्ट्रों ने छीन कर अपने कब्जे में कर लिया। चीन में जर्मनी के प्रभाव वाले क्षेत्र पर नियंत्रण करके और चीन को इस बात के लिए मजबूर करके कि उसे और ज्यादा छूट मिले जापान को चीन में औपनिवेशिक फायदे हुए। जर्मनी के नियंत्रण वाले दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका पर दक्षिणी अफ्रीकी फौजों का कब्जा हो गया, टोगोलैंड को ब्रिटिश और फ्रांसीसी फौजों ने अपने कब्जे में कर लिया तथा कैमरून ब्रिटिश, फ्रांसीसी तथा बेल्जियन फौजों के नियंत्रण में आ गया। ब्रिटिश और जर्मन तथा जर्मन पूर्वी अफ्रीका के बीच संघर्ष युद्ध समाप्त होने तक जारी रहा। इस बीच यूरोप में सुस्ता-सुस्ता कर, थक-थक कर लड़ाई चलती रही। इसका मतलब यह था कि प्रत्येक पक्ष दूसरे पक्ष को थकाने की कोशिश में लगा हुआ था, इसके लिए ज्यादा से ज्यादा फौजें जमा की जा रहीं थीं और अधिकाधिक हथियारों का इस्तेमाल किया जा रहा था। इस थकाने वाले युद्ध के रूप में दो विध्वंसक लड़ाइयाँ लड़ी गईं। फरवरी 1916 में जर्मनी ने वर्डम के फ्रांसीसी सैनिक गढ़ पर जर्बदस्त धावा बोला। इसके उत्तर में फ्रांस ने इस युद्ध में हजारों-हजारों की संख्या में अपने सैनिकों को इस लड़ाई में झोंक दिया। इस भीषण लड़ाई से पहले से चला आ रहा गतिरोध तो दूर नहीं हो पाया लेकिन इसमें लगभग 7 लाख लोग या तो मारे गए अथवा घायल हुए। इसमें दोनों पक्ष की संख्या लगभग बराबर थी। दूसरा सोमे का युद्ध था। इसका नाम सोमे नदी के नाम पर पड़ा क्योंकि इसी के किनारे यह युद्ध लड़ा गया था। इसमें जिन मित्र राष्ट्रों ने भाग लिया उनमें ब्रिटिश सेना प्रमुख थी क्योंकि इसी सेना ने इस आक्रमण में प्रमुख भूमिका निभाई थी। इसके पहले ही दिन ब्रिटिश लोगों में से लगभग 60,000 ऐसे थे जो या तो मारे गए थे अथवा घायल हुए थे। नाकेबंदी की नीतियह एक तरह का संपूर्ण युद्ध बन चुका था। यह फौजों तक ही सीमित नहीं रह गया था। युद्ध में संलग्न प्रमुख देशों के सारे संसाधनों को इसमें झोंकना पड़ा था। युद्ध सामग्री और बढ़ती हुई मात्रा में हथियारों के उत्पादन की जरूरत पड़ी। इसका मतलब उत्पादन के ढाँचे में बदलाव था। हर आर्थिक गतिविधि को युद्ध की आवश्यकताओं के अधीन करना पड़ा। इस बात की भी जरूरत थी कि किसी भी प्रकार का सामान यानी भोजन, कच्चा माल, युद्ध सामग्री या कोई भी वस्तु किसी भी देश से शत्रु के देश में भेजी न जा सके। दोनों पक्ष सोचते थे, ऐसा करने से यानी आर्थिक नाकेबंदी से, लोग भूखे मरेंगे और आत्मसमर्पण करेंगे। ब्रिटिश लोगों ने जर्मनी की समुद्री नाकेबंदी की। यद्यपि दोनों देशों के जहाजी बेड़ों के बीच जमकर सिर्फ एक बार युद्ध हुआ और वह भी कोई निर्णायक नहीं साबित हुआ। लेकिन ब्रिटिश सेना को किसी प्रकार जर्मनी की नाकेबंदी करने में सफलता मिल गई। ब्रिटेन पहुँचने वाली भोजन सामग्री तथा अन्य आपूर्तियों को रोकने के लिए जर्मनी ने पनडुब्बियों का उपयोग शुरू किया। इसका उन्होंने नया-नया विकास किया था ताकि ब्रिटेन पहुँचने वाले तटस्थ देशों सहित अन्य सभी जहाजों को डुबाया जा सके। इसकी वजह से और साथ में कुछ अन्य कारण भी थे, संयुक्त राज्य अमरीका मित्र राष्ट्रों की ओर से इस युद्ध में कूद पड़ा।इस युद्ध में हवाई जहाजों का प्रयोग भी आरंभ हो गया। यद्यपि शहरों पर दोनों ओर से बम गिराए गए तथा दोनों पक्षों के हवाई जहाजों का हवा में भी युद्ध हुआ लेकिन युद्ध को निर्णायक बिंदु तक पहुँचाने में हवाई युद्ध की भूमिका नगण्य थी। युद्ध का अंतअक्टूबर क्रांति के बाद रूस ने अपने को इस युद्ध से अलग कर लिया था और जर्मनी के साथ अत्यंत अपमानजनक संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया था। लेकिन केंद्रीय शक्तियों और मित्र राष्ट्रों के बीच युद्ध का निर्णय तो कहीं और होना था, न कि पूर्वी मोर्चे पर। रूस के अलग हो जाने से मित्र राष्ट्रों को जो क्षति हुई, अमरीका के मित्र राष्ट्रों के पक्ष में युद्ध में कूदने से उसकी भरपाई नहीं हो सकी। युद्ध जब आरंभ हुआ तभी से संयुक्त राज्य अमरीका मित्र राष्ट्रों को रसद और हथियार मुहैया करा रहा था। इसी के चलते अमरीकी अर्थव्यवस्था को फलने-फूलने का अवसर मिला। अब केंद्रीय शक्तियों को परास्त करने के लिए संयुक्त राज्य अमरीका के विशाल आर्थिक संसाधनों और सेना को इस युद्ध में लगाना पड़ा। इस बीच सभी युद्धरत देशों के नागरिकों में और सैनिकों में भी धीरे-धीरे असंतोष पनप रहा था। युद्ध के खिलाफ प्रदर्शन और सैनिक विद्रोह हुए। रूस का सम्राट तो पहले ही सत्ताच्युत किया जा चुका था। ‘केन्द्रीय शक्ति‘ कहे जाने वाले देशों में असंतोष और ज्यादा व्यापक रूप धारण कर चुका था। आस्ट्रिया-हंगरी और जर्मनी में हड़तालों का सिलसिला अटूट रूप से चल रहा था। उनकी सेना और नौसेना एक के बाद एक सैनिक विद्रोह झेल रही थी। ‘‘अधीन राष्ट्रीयताओं‘‘ के सिपाही बहुत बड़े पैमाने पर सेना छोड़ कर भाग रहे थे और इनमें से कई तो मित्र राष्ट्रों की ओर से लड़ने लगे थे। लगभग 1918 के जुलाई महीने के मध्य तक युद्ध की हवा जर्मनी के खिलाफ चलने लगी। पश्चिमी मोर्चे पर जर्मनी ने एक के बाद एक जबर्दस्त प्रहार किया जिसमें मित्र राष्ट्रों के सैनिक बहुत बड़ी संख्या में मारे गए या हताहत हुए। लेकिन जुलाई में जर्मनी की इस बढ़त को रोक दिया गया तथा मित्र राष्ट्रों की फौजों ने जबर्दस्त जवाबी आक्रमण प्रारंभ किया। इसी बीच मित्र राष्ट्र की सेनाओं ने रूस में भी सैनिक हस्तक्षेप आरंभ किए। पूरब की ओर से हजारों की संख्या में जापानी सैनिकों ने साइबेरिया में प्रवेश किया। जबकि रूस में मित्र राष्ट्रों का हस्तक्षेप युद्ध के अंत तक चलता, इसके पहले ही केंद्रीय शक्तियों के पतन की शुरूआत हो चुकी थी। 29 सितंबर 1918 को बल्गेरिया ने आत्मसमर्पण कर दिया। अक्टूबर के अंत तक ऑटोमन साम्राज्य का अस्तित्व ही खत्म हो गया। 12 नवंबर को हैटिसबन के सम्राट ने अपनी गद्दी छोड़ दी। आस्ट्रिया-हंगरी की अधिकांश जातियाँ अपने को स्वतंत्र घोषित कर चुकी थीं जैसे, चेक, पोल, यूगोस्लाव तथा हंगारी लोग। अब जर्मनी अकेला बचा था और सितंबर के महीने में मित्र राष्ट्रों ने उस पर जबर्दस्त धावा बोला। 3 नवंबर को जर्मनी क्रांति की चपेट में आ गया, 9 नवंबर को जर्मनी के सम्राट ने अपनी गद्दी छोड़ दी और भागकर हालैंड चला गया। 10 नवंबर को जर्मनी को गणराज्य घोषित कर दिया गया। 11 नवंबर 1918 को जर्मनी की नई सरकार ने युद्ध विराम के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किया और उसी दिन 11 बजे प्रातः प्रथम विश्व युद्ध का अंत हुआ।मानव जीवन के विनाश की दृष्टि से इस युद्ध में जो क्षति हुई, वह भयानक थी। 6 करोड़ 50 लाख के करीब सिपाही इस महायुद्ध में झोंक दिए गए थे जिनमें लगभग 90 लाख मारे गए और 2 करोड़ 20 लाख के करीब हताहत हुए। इस विनाश लीला के वास्तविक स्वरूप और यूरोपीय समाजों पर इसके प्रभाव को समझने के लिए इस बात को याद रखना चाहिए कि मरने वालों अथवा जीवितों में या मानसिक अथवा शारीरिक रूप से आहतों में ज्यादातर लोग यूरोप की युवा पीढ़ी के खिलते हुए फूल थे। ये लोग 18 से 35 साल की आयुवर्ग के नौजवान लोग थे। एरिक मारिया रेमर्क को जर्मन फौज में जबरन भेजा गया था। उन्होंने बाद में इस विषय पर एक उपन्यास लिख कर प्रकाशित कराया। ‘‘आल क्वाएट ऑन दि वेस्टर्न फ्रंट‘‘ (पश्चिमी मोर्चे पर एकदम शांति है) नाम से इसका अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास के समर्पण पृष्ठ पर यह वक्तव्य दर्ज है : ‘‘यह पुस्तक न तो किसी पर आरोप लगाती है और न ही यह पाप की स्वीकृति है और साहसिक कथा तो इसे एक दम नहीं कहा जा सकता क्योंकि जो लोग मौत के सामने खड़े होते हैं, उनके लिए वह साहसिक कार्य नहीं होता। यह लोगों की एक पीढ़ी को यह बताने का प्रयास है कि हो सकता है कि वे इसके तोप के शोलों से बच गए हों, लेकिन युद्ध ने उन्हें भी नष्ट किया है।‘‘ रूसी क्रांतिरूसी क्रांति विश्व इतिहास के महत्व की दृष्टि से महान घटना थी। रूसी इतिहास के कुछ पहलुओं की बात हम पहले कर चुके हैं, जैसे रूसी औपनिवेशिक साम्राज्य की बात, कुलीन तंत्रीय राजनीतिक व्यवस्था की बात, पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था और जापान के हाथों उसकी पराजय की चर्चा भी की जा चुकी है। यूरोप के भीतर युद्ध के विषय में और विशेष रूप से बाल्कन प्रदेश के देशों के संदर्भ में हम पहले ही बता चुके हैं। उन्नीसवीं सदी में अनेक सुधार किए गए, क्रांतिकारी आंदोलन हुए। इनके जरिए रूस की किसान जनता का असंतोष अभिव्यक्त हुआ था। 1861 में सामंतशाही के खात्मे के बाद भी ये लोग कष्ट और यातना की जिंदगी जी रहे थे। बहुत बड़ी-बड़ी भूसंपत्तियाँ रूस के उच्च वर्ग (नोबिलिटी) तथा चर्च के पास थीं। लाखों की संख्या में ऐसे किसान थे जिनके पास जोतने-बोने के लिए अपनी जमीन ही नहीं थी। औद्योगीकरण की शुरूआत के साथ मजदूरों का एक नया वर्ग उभर कर सामने आया था। इस वर्ग की दशा भी बहुत दयनीय थी। एक ओर जहाँ रूस का आम आदमी वहाँ की मौजूदा व्यवस्था का स्पष्ट रूप से विरोधी था, वहीं मध्य वर्ग के लोग, बुद्धिजीवी लोग भी कुलीनतंत्रीय राजनीतिक व्यवस्था के विरोध में एकजुट हो गए थे। किसानों और मजदूरों के साथ ही बुद्धिजीवी लोग क्रमशः क्रांतिकारी आंदोलन में अधिकाधिक संख्या में शामिल होते चले जा रहे थे।उन्नीसवीं सदी के अंतिम ढाई दशकों के रूस में समाजवादी विचारों का प्रसार आरंभ हो गया था तथा कई समाजवादी संगठन बन चुके थे। 1898 में विभिन्न समाजवादी संगठन मिलकर एक हुए और उन्होंने ‘‘रूसी समाजवादी लोकतांत्रिक मजदूर दल‘‘ का गठन किया। इस दल या पार्टी में वाम पक्ष का नेतृत्व व्लादीमीर ईलिइच उत्यानोव कर रहे थे जिनको लोग लेनिन के नाम से जानते हैं। 1903 में इस गुट का दल में बहुमत हो गया और इनको बोल्शेविक (अधिसंख्यक) कहा जाने लगा। जो लोग अल्पमत में थे, वे मेनशेविक (अल्पसंख्यक) कहे जाने लगे। बोल्शेविकों ने अपना अंतिम लक्ष्य समाजवादी व्यवस्था कायम करना तय किया लेकिन उन्होंने अपना फौरी उद्देश्य इस प्रकार प्रस्ताविक किया : जार के कुलीन तंत्र का अंत, गणराज्य की स्थापना, रूसी साम्राज्य के गैर रूसी जातियों के दमन की समाप्ति तथा उनको आत्मनिर्णय का अधिकार देना, एक दिन में काम के आठ घंटे निर्धारित करना तथा भू-स्वामित्व की असमानता का उन्मूलन और सामंतों द्वारा किसानों के दमन का अंत करना। यह बात पहले कही जा चुकी है कि 1905 में रूस में एक क्रांति हुई थी जिसमें रूसी जार निकोलस द्वितीय को एक संसद गठित करने के लिए दबाव डाला गया था। इस संसद को ड्यूमा कहा जाता था। इसी के साथ उसे इस बात के लिए भी बाध्य किया गया कि वह जनता को कुछ जनतांत्रिक अधिकार दे। इसी दौरान मजदूरों के संगठन का एक नया रूप सामने आया था जिसे सोवियत (पंचायत) कहा जाता था। यह मजदूरों के प्रतिनिधियों का संगठन था और हड़तालों के संचालन के लिए बनाया गया था। इसके बाद किसानों की भी सोवियतें (पंचायतें) गठित की गईं, इसके बाद ही फौजी सिपाहियों की सोवियतों का गठन किया गया। इनका उभार समूचे रूस में हुआ। रूसी क्रांति के इतिहास में इन सोवियतों को काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी थी। 1905 में रूसी क्रांति के बाद भी वहाँ कुलीनतंत्र का शासन खत्म नहीं हो पाया। यद्यपि ड्यूमा का अस्तित्व तो बरकरार था लेकिन राजनीतिक सत्ता जार, कुलीन वर्ग तथा भ्रष्ट नौकरशाहों के हाथ में थी। रूस की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा उसे युद्ध में ले गई लेकिन रूसी शासन अक्षम और भ्रष्ट था, इसलिए आधुनिक पद्धति पर युद्ध को चलाने की क्षमता इसमें नहीं थी। रूस की मौजूदा व्यवस्था की खामियों का युद्ध के दौरान पर्दा फास हो गया। इससे कुलीनतंत्र का संकट और गहरा गया और इसके चलते अंततः इस व्यवस्था का पतन हो गया। एक करोड़ 20 लाख रूसी सैनिकों को हरकत में लाया गया था। उनके पास ठीक-ठाक हथियार नहीं थे और उनकी सेहत भी अपेक्षाकृत ठीक नहीं थी। इसमें 20 लाख तो मारे गए थे, 50 लाख घायल हुए थे और 20 लाख पचास हजार के लगभग या तो खो गए थे या बंदी बना लिए गए थे। पहले से ही खस्ता हाल रूसी व्यवस्था युद्ध के कारण और अधिक जर्जर हो गई। इससे और अशांति बढ़ी। इसके कारण चारों ओर भुखमरी की हालत उत्पन्न हो गई। यह स्थिति वहाँ की तत्कालीन राजधानी पेत्रोग्राद (पहले इसे सेंट पीट्स बर्ग कहा जाता था और बाद में यही लेनिनग्राद कहलाया) में भी होने जा रही थी जिसकी आबादी 20 लाख थी। रोटी की आपूर्ति में भारी कमी थी तथा इसको खरीदने के लिए लोगों को लंबी-लंबी कतारों में लगना पड़ता था। 1917 के एकदम शुरू से ही हड़तालों का ज्वार सा उमड़ पड़ा था जिसने आम हड़ताल का रूप धारण कर लिया था। युद्ध को खत्म करने तथा जार के शासन का अंत करने की माँग बढ़ने लगी और 12 मार्च को सेना की कई टुकड़ियों ने हड़ताली मजदूरों के साथ हड़ताल की, राजनीतिक बंदियों को रिहा करवाया तथा जार के जनरलों और मंत्रियों को कैद कर लिया। शाम होते-होते पेत्रोग्राद आंदोलनकारी मजदूरों और सैनिकों के कब्जे में आ चुका था। 12 मार्च 1917 की इन घटनाओं को फरवरी क्रांति कहा जाता है (क्योंकि पुराने रूसी पंचांग के मुताबिक उस दिन की तारीख 27 फरवरी थी)। जार उस समय राजधानी से बाहर था, उसने विद्रोहियों के दमन और ड्यूमा (संसद) को भंग करने का आदेश दिया लेकिन ड्यूमा ने सत्ता अपने हाथ में लेने का निर्णय लिया तथा 15 मार्च को ड्यूमा ने अस्थाई सरकार के गठन की घोषणा कर दी। इसी दिन जार को सत्ता छोड़ने के लिए दबाव डाला गया। इस प्रकार उसके कुलीनतंत्रीय शासन का अंत हो गया हालांकि कुछ महीनों के बाद सितंबर में रूस को गणतंत्र घोषित किया गया। सारी दुनिया में जार के कुलीनतंत्र के खात्मे का स्वागत हुआ। लेकिन जिन हालातों के चलते जार के शासन का अंत हुआ था, उनसे उत्पन्न किसी भी समस्या को यह अस्थाई सरकार हल नहीं कर सकी थी। युद्ध में भागीदारी की नीति बरकरार थी और भूमि समस्या को सुलझाने के लिए कुछ नहीं किया गया। अकेले बोल्शेविक पार्टी के पास ऐसे कार्यक्रम थे जो साफ थे। यह बात पहले कही जा चुकी है कि दूसरे अंतर्राष्ट्रीय (सेकण्ड इंटरनेशनल) के प्रस्तावों के प्रारूप का एक भाग दो रूसी समाजवादियों (लेनिन और मार्टोव) ने तैयार किया था जिसमें दुनिया के मजदूरों से युद्ध के बाद उत्पन्न संकट का उपयोग करने के लिए कहा गया था और कहा गया था कि जिस व्यवस्था ने युद्ध को जन्म दिया है, उसे उखाड़ फेंकना चाहिए। बोल्शेविक युद्ध का लगातार विरोध करते रहे। ड्यूमा (रूसी संसद) में बोल्शेविकों के पाँच सदस्य थे, जब युद्ध शुरू हुआ तो उन लोगों ने युद्ध की कलई खोली। उन्हें गिरफ्तार करके देश निकाला दिया गया। फरवरी में जब क्रांति हुई, उस समय लेनिन ज्यूरिख (स्विटजरलैण्ड) में थे। इसे उन्होंने पूरी सफलता के बजाए आरंभिक विजय कहा और ऐलान किया, ‘‘मजदूरों की सरकार ही जनता को युद्ध के दौरान शांति, रोटी और पूर्ण स्वतंत्रता दे सकती है, वह सरकार जो सर्वप्रथम खेत मजदूर और गरीब किसान जनता के विशाल बहुमत पर टिकी हो और दूसरे दुनिया के तमाम देशों के क्रांतिकारी मजदूरों से युद्ध में जिसका गठजोड़ हो।‘‘ फरवरी क्रांति के समय मजदूरों और सैनिकों के प्रतिनिधियों की एक सोवियत (पंचायत) पेत्रोग्राद में गठित की जा चुकी थी और तेजी से बदलती हुई परिस्थितियों में यह काफी शक्तिशाली हो गई थी। अप्रैल 1917 में लेनिन पेत्रोग्राद लौटे और उन्होंने जनता को संबोधित किया, ‘‘जनता को शांति की जरूरत है, जनता को रोटी चाहिए, जनता को भूमि चाहिए और ये लोग आपको युद्ध और भूख दे रहे हैं, रोटी नहीं, इन्होंने भूस्वामियों के हवाले सारी भूमि कर दी है।‘‘ अस्थाई सरकार को किसी भी प्रकार का समर्थन नहीं मिलना चाहिए, सारी सत्ता सोवियतों के हाथ में सौंपी जानी चाहिए। अस्थाई सरकार को एक और बात का भी भय था। अपनी तानाशाही कायम करने की कोशिश में जनरल कार्निलोव ने विद्रोह कर दिया था। लेकिन उनका यह प्रयास क्रांतिकारी सैनिकों और मजदूरों ने विफल कर दिया क्योंकि ये लोग क्रांति की रक्षा कर रहे थे। इस समय इस अस्थाई सरकार की बागडोर अलेक्जेंडर कारेन्स्की के हाथ में थी जो विचारों में उदार और लोकतांत्रिक मिजाज के थे। वह पुरानी सरकार द्वारा अपनाई गई युद्ध के आरंभ के समय की नीतियों से अलग हटकर कोई नीति निर्धारित नहीं कर सके। इस प्रकार वे एकदम प्रभावहीन साबित हुए। उनको कहीं से समर्थन भी नहीं मिल रहा था। अक्टूबर में बोल्शेविकों ने क्रांति की तैयारी बड़ी सावधानी से की। बड़े स्तर पर सोवियत मजदूरों तथा सैनिक प्रतिनिधियों की एक बैठक 25 अक्टूबर को आयोजित की गई। तय किया गया कि अस्थाई सरकार के विरूद्ध क्रांति का और इस बैठक का समय एक ही होगा। पेत्रोग्राद में तड़के विद्रोह आरंभ हुआ और कुछ ही समय में क्रांतिकारी सिपाहियों और मजदूरों ने वहाँ के हर महत्वपूर्ण ठिकानों पर अधिकार कर लिया। इसका नेतृत्व बोल्शेविकों ने किया। प्रातः काल 10 बजे लेनिन का ‘‘रूसी जनता के नाम‘‘ संदेश रेडियो पर प्रसारित किया गया। संदेश में कहा गया था, ‘‘अस्थाई सरकार को अपदस्थ कर दिया गया है.....। जिस उद्देश्य को लेकर जनता ने संघर्ष किया था, वह उद्देश्य सुरक्षित है। वह उद्देश्य था, अविलंब लोकतांत्रिक तरीके की शांति के लिए प्रस्ताव, भूमि पर जमींदार के मालिकाना अधिकार की समाप्ति, उत्पादन पर मजदूरों का नियंत्रण और सोवियत सत्ता की स्थापना। (पुराने रूसी पंचांग के अनुसार यह घटना 25 अक्टूबर को घटी थी, इसलिए इसको अक्टूबर क्रांति के नाम से पुकारा जाता है। वास्तव में यह घटना 7 नवंबर को घटी थी)। 10.40 बजे सायंकाल अखिल रूसी मजदूरों और सैनिकों के प्रतिनिधियों की बैठक प्रारंभ हुई और ठीक इसी समय विंटर पैलेस पर आक्रमण भी आरंभ हुआ। यह अस्थाई सरकार का मुख्यालय था। दूसरे दिन प्रातः 1.50 बजे (पुराने पंचांग के हिसाब से 26 अक्टूबर को) विंटर पैलेस पर कब्जा कर लिया गया और अस्थाई सरकार के प्रतिनिधियों को कैद कर लिया गया। लेकिन उस सरकार का प्रमुख कारेन्स्की किसी प्रकार बच निकला। 9.00 बजे सायं सोवियत कांग्रेस का दूसरा सत्र शुरू हुआ। अमरीकी पत्रकार जॉनरिड वहाँ मौजूद थे और इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी थे। उनके अनुसार‘‘ जब लेनिन बोलने के लिए उठे तो उनका लंबे समय तक करतल ध्वनि से स्वागत हुआ। जब करतल ध्वनि समाप्त हुई तो लेनिन ने बस इतना कहा, ‘‘अब हम समाजवादी व्यवस्था की रचना के लिए आगे बढेंगे।‘‘ सत्ता सँभालने के बाद नई सरकार ने शांति के विषय में एक प्रस्ताव स्वीकार किया (यह प्रस्ताव 11.00 बजे प्रातः काल स्वीकार किया गया)। बिना किसी प्रदेश को रूस में मिलाए या बिना किसी क्षतिपूर्ति के इसने शांति स्थापना के लिए अविलंब बातचीत करने का सरकार का संकल्प प्रस्ताविक किया। इस निर्णय में यह भी कहा गया था कि जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन के मजदूरों पर युद्ध की विभीषिका से मानवता को मुक्त करने का जो दायित्व सौंपा गया है, उसे वे समझेंगे और यह भी कहा गया था कि शांति स्थापना के लक्ष्य को सफल अंजाम देने में मदद के लिए ये मजदूर निर्णायक, उत्साहवर्धक अनवरत सक्रियता दर्शाएँगे। साथ ही वे शोषित मजदूर वर्ग को हर प्रकार की दासता और शोषण से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य की पूर्ति में सहयोग करेंगे। जैसा कि पहले ही बताया गया है कि रूस ने युद्ध से पहले ही अपना हाथ खींच लिया था यद्यपि इसके लिए उसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी। उसे अपने भू-भाग का हिस्सा खोना पड़ा था क्योंकि जर्मनी ने शांति-संधि की ऐसी ही शर्त रखी थी। लेनिन के नेतृत्व में क्रांतिकारी सरकार ने दूसरा महत्वपूर्ण कदम भूमि के बारे में उठाया था। भूमि के विषय में प्रस्ताव 27 अक्टूबर को प्रातः 2.00 बजे स्वीकार किया गया (9 नवंबर)। भूमि संबंधी इस आदेश में व्यक्तिगत भू-संपत्ति को खत्म कर दिया गया था और भूमि को सारे राष्ट्र की संपत्ति घोषित कर दिया गया था। इसके तुरंत बाद इसने इकतरफा घोषणा करते हुए जार द्वारा किए गए सभी गैर बराबरी वाले समझौते को अस्वीकार कर दिया। ये समझौते जार की सरकार ने चीन, इराक और अफगानिस्तान जैसे देशों पर थोप रखे थे। समस्त जनगण के लिए समानता और आत्मनिर्णय के अधिकार की घोषणा की गई। पेत्रोग्राद में जिस प्रकार की बगावत के चलते बोल्शेविक सरकार स्थापित हुई थी, उस तरह की बगावतें भूतपूर्व रूसी साम्राज्य के दूसरे हिस्सों में भी हुईं तथा 1918 की फरवरी तक नई सरकार ने समूचे देश पर अधिकार कर लिया था। लेकिन इसके तत्काल बाद रूस गृहयुद्ध में उलझ गया। पुरानी सत्ता के प्रति वफादारी रखने वाली शक्तियों ने अपने को संगठित किया (इन्हें श्वेत रूसी कहा जाता था) ताकि क्रांतिकारी सरकार का तख्ता पलटा जा सके। मित्र राष्ट्र यानी ब्रिटेन, फ्रांस संयुक्त राज्य अमरीका, जापान तथा अन्य कई देशों ने रूस को फिर से युद्ध में वापस लाने के लिए, उसके संसाधनों का लड़ाई में उपयोग करने के लिए तथा प्रतिक्रांतिकारियों को मदद देने के लिए वहाँ पर सैनिक हस्तक्षेप आरंभ कर दिया। 1920 में आकर गृह युद्ध तथा सैनिक हस्तक्षेप समाप्त हुआ। युद्ध के बाद सर्वप्रथम जारवंश का पतन हुआ। युद्ध समाप्त होने से पहले दो और सम्राज्यशाही वाले राजवंशों का पतन हुआ था, वे थे जर्मन और आस्ट्रियन राजवंश। रूसी क्रांति से देश के राजनीतिक जीवन में परिवर्तन भर नहीं हुआ बल्कि इसके कारण एक नई व्यवस्था की शुरूआत हुई जिसका इतिहास कोई और उदाहरण नहीं है। अक्टूबर क्रांति का महत्व रूस की सीमाओं के बहुत पार तक पहुँचा। बाद के विश्व इतिहास में सोवियत रूस, जिसे सोवियत समाजवादी गणराज्यों का संघ कहा गया, महत्वपूर्ण प्रभाव के रूप में सामने आया। | |||||||||
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