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पूर्वमध्यकाल में उत्तरी भारत - पाल, प्रतीहार एवं राष्ट्रकुट राजवंश
सन् 750 और 1000 ई. के बीच उत्तर तथा दक्षिण भारत में कई शक्तिशाली साम्राज्यों का उदय हुआ। नौवीं शताब्दी के मध्य तक पूर्वी और उत्तरी भारत में पाल साम्राज्य तथा दसवीं शताब्दी के मध्य तक पश्चिमी एवं ऊपरी गंगाघाटी में प्रतिहार साम्राज्य अत्यंत प्रभावशाली रहे। दक्षिण में राष्ट्रकूटों का प्रभाव बहुत व्यापक था और अनेक बार उन्होंने उत्तरी और दक्षिण भारत के क्षेत्रों पर भी नियंत्रण स्थापित किया। यद्यपि ये सभी साम्राज्य आपस में लड़ते रहते थे फिर भी इन्होंने एक बड़े भू-भाग पर स्थायी जीवन की परिस्थितियाँ कायम कीं और कला तथा साहित्य को संरक्षण प्रदान किया। इन तीनों में से राष्ट्रकूट साम्राज्य सबसे अधिक समय तक कायम रहा। यह न केवल उस काल का सबसे अधिक शक्तिशाली साम्राज्य था बल्कि इसने उत्तर और दक्षिण भारत में आर्थिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में उत्तर और दक्षिण के बीच सेतु का भी काम किया।
प्रभुत्व के लिए संघर्ष - पाल वंशहर्ष के समय ही कन्नौज का नियंत्रण उत्तरी भारत पर प्रभुत्व का प्रतीक माना जाता था। यह स्थान बाद में दिल्ली ने प्राप्त किया। वस्तुतः कन्नौज पर आधिपत्य होने से गंगाघाटी एवं इसमें उपलब्ध व्यापारिक एवं कृषि संबंधित समृद्ध संसाधनों पर नियंत्रण होने से कन्नौज के अतिरिक्त पाल और प्रतिहार राजाओं में बनारस से दक्षिणी बिहार तक के समृद्ध संसाधनों से युक्त क्षेत्र पर नियंत्रण एवं प्राचीन सभ्यता एवं अन्य केन्द्रों पर प्रभुत्व के लिए भी संघर्ष हुआ। प्रतिहारों का संघर्ष राष्ट्रकूटों के साथ भी हुआ।पाल साम्राज्य की स्थापना, सम्भवतः सन् 750 में, गोपाल द्वारा की गई थी। कुछ प्रमुख व्यक्तियों ने उस क्षेत्र में फैली अराजकता के कारण उसे राजा निर्वाचित किया था। सन् 770 में उसका पुत्र धर्मपाल उत्तराधिकारी बना जिसने सन् 810 तक शासन किया। धर्मपाल राष्ट्रकूट राजा धफ्रव द्वारा पराजित किया गया जिसने इसके पूर्व प्रतिहार राजा को पराजित किया था। लेकिन इन विजयों के उपरान्त राजा धफ्रव दक्षिण वापिस लौट गया इस कारण धर्मपाल को अपनी स्थिति सुदृढ़ करने में देर न लगी। धर्मपाल ने कन्नौज पर अधिकार कर एक शानदार दरबार का आयोजन किया जिसमें पंजाब, पूर्वी राजस्थान आदि के अधिनस्थ राजा उपस्थित हुए थे। लेकिन धर्मपाल कन्नौज के शासन को व्यवस्थित नहीं कर सका। प्रतिहार शक्ति नागभट्ट द्वितीय के अधीन पुनर्जीवित हुई। धर्मपाल कन्नौज से वापस लौटा किन्तु बिहार में मुंगेर के निकट पराजित हुआ। पाल और प्रतिहार राजाओं के बीच बिहार और आधुनिक पूर्वी उत्तर प्रदेश को लेकर बराबर संघर्ष बना रहा। फिर भी बंगाल के अतिरिक्त बिहार सबसे अधिक समय तक पाल शासकों के अधीन रहा। उत्तर में असफल होने के पश्चात् पाल शासकों ने अपनी शक्ति को दूसरी दिशाओं की ओर मोड़ दिया। धर्मपाल का पुत्र देवपाल सन् 810 में सिहासनारूढ़ हुआ। चालीस वर्षों तक राज्य पर उसने प्राग्ज्योतिषपुर (असम) और उड़ीसा के हिस्सों तक अपना अधिपत्य जमा लिया। सम्भवतः आधुनिक नेपाल का एक भाग भी पाल शासकों के आधिपत्य में आ गया था। इस प्रकार आठवीं शताब्दी के मध्य से लेकर नौवीं शताब्दी तक लगभग 100 वर्षों तक, पाल शासकों ने पूर्वी भारत पर अपना आधिपत्य कायम रखा। कुछ समय के लिए उनके आधिपत्य क्षेत्र का विस्तार वाराणसी तक हो गया था। नौवीं शताब्दी के मध्य में सुलेमान नामक एक अरबी व्यापारी ने भारत की यात्रा की थी। उसके द्वारा लिखे गये यात्रा वृतात में पाल शासकों के अधिक शक्तिशाली होने के तथ्य का प्रमाण मिलता है। उसने पाल साम्राज्य को ‘रूहमा’ (या धर्म, धर्मपाल का संक्षिप्त रूप) कहा है। उसके विवरण से पता चलता है कि पाल शासक अपने पड़ोसी प्रतिहारों तथा राष्ट्रकूटों से युद्ध करते अपने रहते थे, लेकिन उनकी सेनाएँ शत्रुओं की सेनाओं से बहुत अधिक थी। वह हमें बताता है कि पाल शासकों का पचास हजार हाथियों के साथ युद्ध में जाने का रिवाज था और दस से पन्द्रह हजार व्यक्ति उसकी सेना में कलफ करने और कपड़ा धोने के लिए नियुक्त किये गये थे। इस तथ्य से ही उनकी सेनाओं की विशालता का अनुमान लगाया जा सकता है। तिब्बती इतिवृत्तियों से भी पालवंश के बारे में पता चलता है कि यद्यपि इसकी रचना सत्रहवीं शताब्दी में हुई थी। इसके अनुसार पाल शासक बौद्ध धर्म और ज्ञान के बड़े संरक्षण थे। संपूर्ण पूर्वी दुनिया में प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय को धर्मपाल ने पुनर्जीवित किया था और उसके खर्च के लिए दो सौ गाँवों का अनुदान दिया गया था। विक्रमशिला विश्वविद्यालय की भी उसने स्थापना की थी जो प्रसिद्धि में नालंदा विश्वविद्यालय के पश्चात् द्वितीय स्थान पर था। यह मगध में गंगा के किनारे एक पहाड़ी के शिखर पर आनंददायक वातावरण में स्थित था। पाल वंशियों ने अनेक बौद्ध विहारों का निर्माण किया जिनमें बड़ी संख्या में बौद्ध भिक्षु निवास करते थे। पाल शासकों का तिब्बत के साथ निकट का सांस्कृतिक संबंध था। प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान संतरक्षित और दीपंकर (जो अतिशा के नाम से भी पुकारे जाते हैं) को तिब्बत आमंत्रित किया गया था। वहाँ जाकर उन्होंने बौद्ध धर्म के एक नवीन सम्प्रदाय को चलाया। अनेक तिब्बती बौद्ध धर्मालम्बी नालंदा और विक्रमशिला के विश्वविद्यालयों में अध्ययन के लिए आते थे। पाल राजाओं के दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ घनिष्ठ व्यापारिक एवं सांस्कृतिक संबंध थे। पाल राजाओं का दक्षिण पूर्व एशिया के साथ का व्यापार बड़ा लाभप्रद था। इससे पाल साम्राज्य अधिक समृद्ध बना। शक्तिशाली शैलेन्द्र वंश ने जो बौद्ध धर्म के विश्वास करता था, मलाया, जावा, सुमात्रा और निकटवर्ती प्रायद्वीपों पर शासन किया। उसने अनेक राजपूतों को पाल शासकों के राजदरबार में भेजा और नालंदा में एक बौद्ध मठ स्थापित करने की अनुमति माँगी। पाल नरेश देवपाल से इस मठ की सहायता के लिए पाँच गाँवों का अनुदान भी माँगा। पाल नरेश के द्वारा यह अनुरोध स्वीकार कर लिया गया। उपरोक्त उदाहरण से इन तीनों राज्यों के घनिष्ठ सम्बन्धों का पता चलता है। प्रतिहार वंशप्रतिहारों को गुर्जर प्रतिहार भी कहा जाता है। इसका कारण यह है कि उनकी उत्पत्ति गुजरात अथवा दक्षिण-पश्चिम राजस्थान से हुई थी। संभवतः प्रारम्भ में ये स्थानीय पदाधिकारी थे, लेकिन कालान्तर में उन्होंने मध्य और पूर्वी राजस्थान के कई क्षेत्रों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। सिन्ध की ओर से राजस्थान पर होने वाले अरब शासकों के आक्रमण को रोकने के कारण उनकी ख्याति में वृद्धि हुई। सन् 738 में गुजरात के चालुक्य राजाओं के द्वारा अरबों की निर्णायक पराजय हुई और वास्ताविक खतरे का अंत हो गया।संभवतः मालवा और गुजरात पर प्रभुत्व करना ही राष्ट्रकूटों का वास्तविक उद्देश्य था। प्रतिहार वंश और साम्राज्य का वास्तविक तथा सर्वश्रेष्ठ राजा भोज था। हमें उसके प्रारम्भिक जीवन तथा उसके सिंहासनारोहण काल के विषय में कम जानकारी है। इसने साम्राज्य का पुनर्निर्माण किया और सन् 836 के लगभग कन्नौज का उद्धार किया जो लगभग एक शताब्दी तक प्रतिहार साम्राज्य की राजधानी रही। भोज ने पूर्व दिशा की ओर साम्राज्य के विस्तार का प्रयास किया किन्तु वह पाल राजा धर्मपाल के द्वारा पराजित कर दिया गया। तब वह मध्य भारत, दक्षिण भारत तथा गुजरात की ओर अग्रसर हुआ। इस कारण उसका राष्ट्रकूटों के साथ फिर से और संघर्ष प्रारम्भ हो गया। नर्मदा तट पर एक भंयकर युद्ध हुआ और भोज मालवा के महत्वपूर्ण भाग और गुजरात के कुछ हिस्सों पर अपना अधिकार कायम कर सका। लेकिन वह उस दिशा में आगे नहीं बढ़ सका। इसलिए उसने पुनः अपना ध्यान उत्तर की ओर केन्द्रित किया। एक अभिलेख के अनुसार उसके राज्य का विस्तार सतलुज नदी के पूर्वी तट तक था। अरब यात्रियों का कथन है कि प्रतिहार शासकों के पास भारत में सर्वोत्तम अश्वारोही सैनिक थे। उन दिनों मध्य एशिया और अरब से घोड़ों का आयात भारतीय व्यापार का एक महत्वपूर्ण अंग था। देवपाल की मृत्यु के परिणामस्वरूप पाल साम्राज्य के दुर्बल हो जाने के कारण भोज पूर्व में भी अपने साम्राज्य का विस्तार कर सका। भोज का नाम दंतकथाओं में प्रसिद्ध है। संभवतः भोज के प्रारम्भिक जीवन के साहस पूर्ण कार्य, अपने खाये हुए साम्राज्य की क्रमशः पुनर्विजय और अंतिम रूप से कन्नौज की पुनः प्राप्ति ने सामयिक लोगों की कल्पना को प्रभावित किया। भोज विष्णु का पुजारी था और ‘आदिवराह’ की उपाधि उसने धारण की थी, जो उसके द्वारा चलाए गए कुछ सिक्कों में भी अंकित पायी गयी है। कुछ समय पश्चात् कन्नौज पर शासन करने वाले परमार वंशी राजा भोज और इस प्रतिहार वंशी राजा भोज में अन्तर स्पष्ट करने के लिए इसे कभी-कभी मिहिर भोज भी कहा जाता है। भोज की मृत्यु संभवतः सन् 885 के आसपास हुई थी। उसके बाद उसका पुत्र महेन्द्रपाल उत्तराधिकारी बना। महेन्द्रपाल ने भोज के साम्राज्य को कायम रखते हुए सन 908-909 के आसपास तक शासन किया और मगध तथा उत्तरी बंगाल तक इसका विस्तार किया। इसके प्रमाण कठियावाड़, पूर्वी पंजाब और अवध में भी पाए गए हैं। महेन्द्रपाल ने एक कश्मीरी राजा के साथ युद्ध किया लेकिन उससे पराजित होने के कारण उसे अपने पिता भोज द्वारा विजित पंजाब के कुछ क्षेत्रों को देना पड़ा था। इस प्रकार नौवीं शताब्दी के मध्य से दसवीं शताब्दी के मध्य तक प्रतिहारों ने लगभग एक शताब्दी तक उत्तर भारत पर शासन किया। बगदाद निवासी अल-मसूदी ने जो सन् 915-916 में गुजरात आया था, प्रतिहार राजाओं की बढ़ी हुई शक्ति, प्रतिष्ठा और साम्राज्य की विशालता का प्रमाण प्रस्तुत किया है। वह गुर्जर-प्रतिहार को अल-गुजर (गुर्जर का अपभ्रंश) और राजा को बौरा कहकर पुकारता है, जो संभवतः आदिवराह का अशुद्ध उच्चारण है। यह उपाधि राजा भोज की थी जिसका इस समय तक देहावसान हो चुका था। अल-मसूदी कहता है कि गुर्जर साम्राज्य में 18,00,000 गाँव, शहर और ग्रामीण क्षेत्र थे और यह लगभग दो हजार किलोमीटर लम्बा और इतना ही चोड़ा था। राजा की सेना के चार अंग थे। प्रत्येक अंग में 70,000 से 90,000 तक सैनिक थे। ‘‘उत्तर की सेना से वह मुल्तान और उसके अन्य मित्र मुसलमान शासकों के विरुद्ध युद्ध करता था।’’ दक्षिण की सेना राष्ट्रकूटों और पूर्व की सेना पाल नरेशों के विरुद्ध युद्ध करती थी। युद्ध हेतु उसके पास केवल दो हजार प्रशिक्षित हाथी थे लेकिन देश के किसी भी राजा की अपेक्षा उसके पास सर्वोत्कृष्ट अश्वारोही सेना थी। प्रतिहार राजा ज्ञान और साहित्य के संरक्षण थे। महान् कवि और नाटककार राजशेखर, भोज के पौत्र महिपाल के राजदरबार में रहता था। प्रतिहारों ने कन्नौज को सुरम्य भवनों और देवालयों से अलंकृत किया। आठवीं-नौंवीं शताब्दी में अनेक भारतीय विद्वान राजदूत बनकर बगदाद स्थित खलीफा राजदरबार में गये। इन विद्वानों ने अरबी दुनिया को भारतीय विज्ञान, विशेष रूप से गणित, बीजगणित और औषध विज्ञान से परिचित कराया। हम लोग उन राजाओं के नाम से अनभिज्ञ है जिन्होंने इन राजदूतों को भेजा था। प्रतिहार, सिन्ध के अरबी शासकों के विरुद्ध शत्रुता के लिए प्रख्यात थे। इसके अतिरिक्त ऐसा प्रतीत होता है कि इस अवधि में भारत और पश्चिम एशिया के मध्य विद्वानों का आवागमन एवं वस्तुओं का आदान-प्रदान जारी रहा। सन् 915-918 ई. के मध्य राष्ट्रकूट नरेश इन्द्र तृतीय ने पुनः कन्नौज पर आक्रमण किया तथा शहर को उजाड़ दिया। इससे प्रतिहार साम्राज्य निर्बल हो गया और संभवतः गुजरात राष्ट्रकूटों के हाथ से चला गया क्योंकि अस-मसूदी का कथन है कि प्रतिहार साम्राज्य की पहुँच सागर तक नहीं थी। गुजरात के हाथ से निकल जाने के कारण प्रतिहारों को और भी झटका पहुँचा क्योंकि गुजरात समुद्र के रास्ते होने वाले व्यापार का केन्द्र था साथ ही उत्तरी भारत से पश्चिम एशिया को भेजी जाने वाली वस्तुओं का प्रमुख निकास मार्ग भी था। सन् 963 में दूसरे राष्ट्रकूट राजा कृष्ण तृतीय ने उत्तरी भारत पर आक्रमण कर प्रतिहार राजा को पराजित किया। इसके पश्चात् शीघ्र ही प्रतिहार साम्राज्य का विघटन हो गया। राष्ट्रकूट वंशदक्षिण में राष्ट्रकूटों का शासन पाल और प्रतिहार वंशों के शासन के समकालीन था। यह एक अनोखा राजवंश था जिसने योद्धाओं और योग्य शासकों की लम्बी कतार खड़ी कर दी थी। इस साम्राज्य की दन्तिदुर्ग ने स्थापना की थी। इसने अपनी राजधानी मान्यखेत या मालखंड बनाई, जो आधुनिक शोलापुर के निकट है। राष्ट्रकूटों ने उत्तरी सौराष्ट्र के समग्र क्षेत्र को शीघ्र ही अपने अधिकार में कर लिया। जैसा कि हम पहले ही देख चुके हैं, मालवा और गुजरात के प्रभुत्व के लिए उन्होंने प्रतिहारों से भी युद्ध किया। यद्यपि उनके आक्रमण से राष्ट्रकूट साम्राज्य की सीमा का विस्तार गंगाघाटी तक नहीं हुआ तथापि उनकी ख्याति में चार चाँद लग गए और लूट में विपुल धन राशि मिली। राष्ट्रकूट बेंगी (आधुनिक आन्ध्र प्रदेश) के पूर्वी चालुक्यों, दक्षिण में कांची के पल्लवों और मदुरई के पाँडयों के विरुद्ध निरंतर युद्ध करते रहे। संभवतः राष्ट्रकूटों के सर्वश्रेष्ठ शासक थे - इन्द्र तृतीय (915-927 ई.) और कृष्ण तृतीय (939-965 ई.)। प्रतिहार शासक की पराजय और सन् 915 में कन्नौज की लूट के बाद इन्द्र तृतीय अपने समय का अत्यंत शक्तिशाली राजा हुआ। इसी समय भारत भ्रमण पर आए हुए अल-मसूदी के अनुसार राष्ट्रकूट राजा बलहारा या वल्भराज भारत का सर्वश्रेष्ठ राजा था। अधिकांश भारतीय राजाओं ने उसके आधिपत्य को स्वीकार किया था और उसके दूतों को सम्मान दिया था। उसके पास बहुत बड़ी सेना थी और असंख्य हाथी थे।कृष्ण तृतीय एक ओजस्वी राजा था, लेकिन उसने अपने पड़ोसियों के विरुद्ध युद्ध नीति अपनाकर उन्हें अपना विरोधी बना लिया। उसके विरुद्ध दक्षिण के चोल राजा को मुँह की खानी पड़ी और चोल साम्राज्य का उत्तरी भाग कृष्ण तृतीय के साम्राज्य में मिला लिया गया। इसके पश्चात् वह आगे बढ़कर रामेश्वरम् तक गया और उसने एक विजय स्तम्भ तथा देवालय की स्थापना की। मरणोत्परांत उसके समस्त विरोधी उसके उत्तराधिकारी के विरुद्ध एकजुट हो गए। राष्ट्रकूटों की राजधानी मालखंड सन् 927 में लूट ली गई और जला दी गयी। इस प्रकार राष्ट्रकूट साम्राज्य का अंत हो गया। राष्ट्रकूट शासन के दक्षिण में सौ वर्ष यानी दसवीं शताब्दी के अंत तक कायम रहा। राष्ट्रकूट शासकों में धार्मिक सहिष्णुता थी और उन्होंने न केवल शैव और वैष्णव बल्कि जैन मतावलम्बियों को भी संरक्षण प्रदान किया। नौवीं शताब्दी में राष्ट्रकूट राजाओं में से एक कृष्ण प्रथम ने प्रसिद्ध शिव मन्दिर का निर्माण किया था जो कि एक ही चट्टान से काट कर बनाया गया है। कहा जाता है कि उसका उत्तराधिकारी आमोघवर्ष जैन था, लेकिन उसने अन्य धर्मों को भी संरक्षण प्रदान किया था। राष्ट्रकूटों ने अपने राज्यों में मुसलमान व्यापारियों को बसने तथा इस्लाम के प्रचार की स्वीकृति दी थी। कहा जाता है कि राष्ट्रकूट साम्राज्य के अनेक तटवर्ती नगरों में मुसलमानों के अपने मुखिया थे और दैनिक प्रार्थना के लिए बडी मस्जिदें थीं। सहिष्णुता की इस नीति में वैदेशिक व्यापार को बढ़ावा दिया जिससे राष्ट्रकूट समृद्धशाली बने। राष्ट्रकूट राजा कला और साहित्य के महान संरक्षण थे। इनके राज दरबारों में न केवल संस्कृत के विद्वान बल्कि कवि तथा अन्य लोग भी थे जिन्होंने प्राकृत और अपभ्रंश में रचनाएँ की थी, जिनसे विविध आधुनिक भारतीय भाषाओं की उत्पत्ति हुई। अपभ्रंश के महान कवि स्वयंभू तथा उसका पुत्र संभवतः राष्ट्रकूटों के राजदरबार में रहते थे। नौवीं शताब्दी के राष्ट्रकूट नेता अमोघवर्ष को कन्नड़ में काव्य-शास्त्र पर प्रारम्भिक पुस्तक लिखने का गौरव प्राप्त है। राजनीतिक विचार और संगठनइन साम्राज्यों के प्रशासन का ढंग उत्तर में गुप्त साम्राज्य, हर्ष के साम्राज्य तथा दक्षिण में चालुक्यों के विचारों और परम्पराओं पर आधारित था। पहले की भाँति राजा में राज्य की सभी शक्तियाँ केन्द्रित थीं। यह प्रशासन का प्रधान होने के अतिरिक्त सशस्त्र सेना का प्रधान सेनापति था। उसका दरबार बहुत वैभवशाली था। महल के सामने की खुली समतल भूमि में अश्वारोही और पैदल सैनिक तैनात रहते थे। युद्ध में पकड़े गये हाथियों और घोड़ों की कवायद उसके सामने होती थी। शाही प्रतिहार उसके पास उपस्थित रहते थे जो नियमित रूप से राजा की प्रतीक्षा करने वाले सामंती सरदारों, सामंतों, राजदूतों और अन्य उच्च पदाधिकारियों के आने-जाने पर नियंत्रण रखते थे। राजा भी न्याय प्रदान करता था। राजदरबार न केवल राजनीतिक गतिविधियों और न्याय का ही केन्द्र था बल्कि सांस्कृतिक जीवन का भी केन्द्र था। नृत्यांगनाएँ और कुशल संगीतज्ञ भी वहाँ उपस्थित रहते थे। उत्सव के अवसर पर राजपरिवार की महिलाएँ भी राजदरबार में उपस्थित रहती थीं। अरबी लेखकों के अनुसार राष्ट्रकूट साम्राज्य में राजपरिवार की महिला मुखमंडल को ढकती नहीं थीं।साधारणतः राजा का पद वंशानुगत होता था। उस युग में असुरक्षा के कारण समसामयिक विचारकों ने राजा के प्रति पूर्ण निष्ठा और आज्ञाकारिता पर बल दिया था। राजाओं के बीच तथा राजाओं के सामन्तों के मध्य निरन्तर युद्ध होते रहते थे। राजा अपने राज्यों में कानून और व्यवस्था बनाये रखने का प्रयास करते थे। उनकी शक्ति असीमित और अनियन्त्रित नहीं थी। समसामयिक लेखक मेधातिथि का विचार है कि उन दिनों किसी व्यक्ति को चोरों और हत्यारों से लेकर अपने बचाव के लिए हथियार रखने का अधिकार था। उसके मतानुसार एक अन्यायी राजा का विरोध करना उचित था। इस प्रकार शाही अधिकारों और सुविधाओं के मुख्य विषय जिन्हें पुराणों ने अंतिम विचार के रूप में प्रतिपादित किया है, सबको शिरोधार्य न थे। उत्तराधिकार के नियम कठोर नहीं थे। लेकिन कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं कि जबकि अग्रज को अपने अनुजों से लोहा सेना पड़ा था तथा कभी-कभी उनसे मुँह की खानी पड़ती थी। इस प्रकार राष्ट्रकूट राजाओं में धफ्रव और गोविन्द चतुर्थ ने अपने अग्रजों को अपदस्थ किया था। कभी-कभी राजा अपने बड़े पुत्र या किसी अन्य प्रिय पुत्र को युवराज अथवा अपना उत्तराधिकारी मनोनीत कर दिया करते थे। ऐसी स्थिति में युवराज राजधानी में रहकर प्रशासन करने में राजा की सहायता करता था। छोटे राजकुमारों को कभी-कभी प्रान्तीय शासकों के रूप में नियुक्त किया जाता था। राजकुमारियों की नियुक्ति शायद ही कभी सरकारी पदों पर होती थी। किन्तु हमें एक ऐसा उदाहरण राष्ट्रकूट नरेश अमोघवर्ष की पुत्री राजकुमारी चन्द्रवल्लभी का मिलता है जिसने कुछ समय के लिए रायचूर के दोआब पर शासन किया था। सामान्यतः राजा को परामर्श देने के लिए कुछ मंत्री होते थे। मन्त्रियों का चुनाव राजा प्रमुख संभ्रांत परिवारों में से स्वयं करता था। इन मन्त्रियों का भी पद प्रायः वंशानुगत होता था। पाल राजाओं के अन्तर्गत एक ब्राह्मण परिवार के चार मुख्य व्यक्तियों ने मन्त्रियों के रूप में धर्मपाल और उसके उत्तराधिकारियों की लगातार सेवा की थी। ऐसी स्थिति में मंत्री कभी-कभी बहुत शक्तिशाली हो जाते थे। यद्यपि ऐसा प्रतीत होता है कि केन्द्रिय सरकार में कई विभाग होते थे, लेकिन उन विभागों की निश्चित संख्या और कार्यविधि की जानकारी प्राप्त नहीं है। पुरातात्विक अभिलेखों एवं साहित्यिक कृतियों से पता चलता है कि प्रायः सभी राज्यों में विदेश मन्त्री, राजस्व मंत्री, कोषाध्यक्ष, सेनाध्यक्ष, मुख्य न्यायधीश और पुरोहित होते थे। एक व्यक्ति एक से अधिक पदों को संभाल सकता था। मंत्रियों में भी एक मुख्य या प्रधानमन्त्री होता है जिस पर राजा अन्य मन्त्रियों से अधिक निर्भर रहता था। पुरोहित के अतिरिक्त सभी मन्त्रियों को आवश्यकता पड़ने पर सेना का नेतृत्व करने के लिए कहा जा सकता था। हमें अंतःपुर के लिए अधिकारी होने के बारे में भी सन्दर्भ प्राप्त होते हैं। चूँकि राजा सभी शक्तियों का स्रोत होता था, उसके अंतःपुर के कुछ अधिकारी बहुत शक्तिशाली हो जाते थे। सशस्त्र सेनाएँ रक्षा और साम्राज्य विस्तार के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती थीं। पहले ही हम अरबी यात्रियों के प्रमाणों को उद्धृत कर चुके हैं कि पाल प्रतिहार और राष्ट्रकूट राजाओं के पास विशाल और सुसंगठित पैदल और घुड़सवार सेनाएँ और बड़ी संख्या में काम आने वाले हाथी थे। हाथियों को शक्ति का प्रतीक माना जाता था और उनका बहुत महत्व था। पाल राजाओं द्वारा बहुत बड़ी संख्या में हाथी रखे जाते थे। राष्ट्रकूट और प्रतिहार राजाओं द्वारा अरब और पश्चिम मध्य-एशिया से क्रमशः समुद्री और स्थल मार्ग के जरिये भारी संख्या में घोड़ों का आयात किया जाता था। देश भर में प्रतिहार राजाओं की घुड़सवार सेना सर्वोत्तम मानी जाती थी। युद्ध में रथों का प्रयोग बंद हो गया था, अतः उनका उल्लेख नहीं मिलता है। कुछ राजाओं, विशेषकर राष्ट्रकूटों के पास बड़ी संख्या में किले थे। इनमें विशेष सेनाएँ और उनके निजी स्वाधीन सेनाध्यक्ष रहते थे। पैदल सेना नियमित, अनियमित तथा सामंती सरदारों द्वारा दिए गए सैनिकों से बनती थी। नियमित सेनाएँ बहुधा वंशानुगत होती थी और कभी-कभी भारत के विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त की जाती थीं। इस प्रकार, पाल राजाओं की पैदल सेना मालवा, खासा (असम), लाट (दक्षिण गुजरात) तथा कर्नाटक के सैनिकों से बनी होती थीं। पाल राजाओं और संभवतः राष्ट्रकूटों की अपनी नौसेनाएँ थीं। लेकिन उनकी शक्ति और संगठन के विषय में अधिक जानकारी नहीं है। साम्राज्य में दो प्रकार के क्षेत्र होते थे। एक वे जिन पर राजा का सीधा अधिकार होता था तथा दूसरे वे जिन पर सरदारों का शासन होता था। जहाँ तक आंतरिक मामलों का प्रश्न है, सामंती सरदार स्वाधीन थे। लेकिन उन पर अधिपति के प्रति आज्ञाकारिता निश्चित कर देना और सेना की आपूर्ति करने की नैतिक जिम्मेदारी थी। बुलाये जाने पर सामन्ती को अपना पुत्र दरबार में भेजना पड़ता था ताकि सरदार राजा के खिलाफ विद्रोह न कर सके। विशेष अवसरों पर सामन्ती सरदार को अधिपति के दरबार में उपस्थित होना पड़ता था और कभी-कभी अपनी पुत्रियों में से एक का ब्याह अधिपति या उसके पुत्रों में से किसी एक के साथ कर देना पड़ता था। परन्तु सामन्ती सरदार सदा स्वतन्त्र होने की अभिलाषा रखते थे। इसके चलते उनके तथा अधिपति के बीच कभी-कभी युद्ध होते रहते थे। इस प्रकार राष्ट्रकूटों को निरंतर बेंगी (आन्ध्र) और कर्नाटक के सामन्ती सरदारों के विरुद्ध, प्रतिहारों को मालवा के परमारों और बुंदेलखंड के चंदेलों के विरुद्ध लड़ना पड़ा था। पाल और प्रतिहार राजाओं का जिन क्षेत्रों पर सीधा अधिपत्य था वे भुक्ति (प्रान्तों) और मंडल या विषय (जिलों) में विभक्त थे। प्रांत के शासक उपरिक और विषय का प्रधान विषयपति कहलाते थे। उपरिक से भू-राजस्व एकत्र करने और सेना की सहायता से कानून तथा व्यवस्था बनाए रखने की आशा की जाती थी। विषयपति से भी अपने अधिकार-क्षेत्र में इसी प्रकार के कार्यों की अपेक्षा की जाती थी। इस अवधि में छोटे सरदारों की संख्या में अभिवृद्धि हुई जो सामन्त या भोगापति कहलाते थे। वे कुछ गाँवों पर शासन करते थे। ये विषयपति और छोटे सरदार आपस में एक दूसरे से मिलने के लिए अग्रसर हुए और कालान्तर में बिना भेदभाव किये दोनों के लिए सामन्त शब्द का व्यवहार किया जाने लगा। राष्ट्रकूट साम्राज्य में प्रत्यक्षतः प्रशासित क्षेत्रों को राष्ट्र (प्रान्त), विषय और भुक्ति भागों में विभाजित किया गया। राष्ट्र का प्रधान राष्ट्रपति कहलाता था और वह पाल तथा प्रतिहार के उपरिक जैसा ही कार्य करता था। विषय एक आधुनिक जिले की तरह था और भुक्ति उससे छोटी इकाई थी। पाल और प्रतिहार साम्राज्यों में विषय में छोटी इकाई पट्राला कहलाती थी। इन छोटी इकाईयों के सुनिश्चित कार्य की जानकारी नहीं है। ऐसा लगता है कि इनका मुख्य उद्देश्य भू-राजस्व वसूल करना और कुछ कानून तथा व्यवस्था बनाए रखना था। ऐसा प्रतीत होता है कि सभी अधिकारियों को वेतन के रूप में राजस्वकर मुक्त भूमि दी जाती थी। इससे उनके तथा वंशगत सरदारों और छोटे सामन्तों के बीच का अंतर कम हो जाता था। इसी प्रकार राष्ट्रपति प्रान्तीय अधिकारी सामन्ती राज्य के उपाधि तथा अधिकारों का उपयोग करते थे। इन क्षेत्रीय प्रभागों के नीचे ग्राम था। ग्राम प्रशासन की आधारभूत इकाई चलाता था। ग्राम प्रशासन गाँव का मुखिया चलाता था। ग्राम लेखपाल के पद प्रायः वंशानुगत होते थे। वेतन के रूप में वे राजस्वकर मुक्त भूमि पाते थे। मुखिया के कार्यों में गाँव के वयोवृद्ध जिन्हें ग्राम महाजन या ग्राम महत्तर कहा जाता था, सहायता करते थे। राष्ट्रकूटों के राज्य में खासकर कर्नाटक में ग्राम समितियाँ होती थी जो स्थानीय विद्यालयों, सरोवरों, देवालयों और सड़कों की व्यवस्था करती थीं। धरोहर के रूप में वे धन सम्पत्ति भी ले सकती थीं और उसकी व्यवस्था कर सकती थीं। ये उप-समितियाँ मुखियाँ को सहयोग करती थीं और उन्हें भू-राजस्व वसूली का एक भाग मिलता था। ये समितियाँ साधारण झगड़ों का भी निपटारा करती थीं। नगरों में भी इस प्रकार की समितियाँ थीं। इसमें व्यापार संघ के प्रधान भी सम्मिलित होते थे। नगर और उसके आस-पास के क्षेत्रों में कानून और व्यवस्था बनाए रखने का उत्तरदायित्व कोष्टपाल या कोतवाल पर था जिसका हवाला अनेक कहानियों के द्वारा मिलता है। इस काल की एक महत्वपूर्ण विशेषता दक्षिण में वंशानुगत राजस्व अधिकारियों का उदय था जिन्हें नाद-गवुण्ड या देश-ग्रामकूट कहा जाता था। ऐसा प्रतीत होता है कि इनके कार्य वैसे ही थे जो बाद में महाराष्ट्र के देशमुखों और देशपाण्डे लोगों को दिये गए थे। उत्तर भारत में छोटे सरदारों के विकास का महत्वपूर्ण प्रभाव समाज और राजनीति पर पड़ा जिसका उल्लेख अभी किया गया है। जैसे ही वंशानुगत तत्वों की शक्ति में वृद्धि हुई, ग्रामीण समितियाँ दुर्बल हो गयीं। इन वंशानुगत तत्वों पर केन्द्रिय प्रशासन को भी अपना प्रभुत्व और नियंत्रण रखना कठिन हो गया। उपरोक्त विचारधारा से स्पष्ट है कि सरकार सामन्तशाही हो गयी थी। इस काल की एक अन्य स्मरण रखने की बात राज्य और धर्म का संबंध है। इस काल के अनेक धर्मपरायण शासक शैव या वैष्णव सम्प्रदाय के अनुयायी थे या उन्होंने बौद्ध धर्म या जैन धर्म की शिक्षाओं का अनुसरण किया। उन्होंने ब्राह्मणों या बौद्ध विहारों या जैन मन्दिरों को यथोचित अनुदान दिया लेकिन, सामन्यतः उन्होंने सभी धर्मां को संरक्षण प्रदान किया और अपने धार्मिक विश्वासों के लिए किसी को भी उत्पीड़ित नहीं किया। राष्ट्रकूट राजाओं ने मुसलमानों का भी स्वागत किया और उन्हें अपने धर्म प्रचार करने की अनुमति दी। साधारणतः किसी भी राजा से धर्मशास्त्रों द्वारा निर्धारित आचार संहिता या रस्म-रिवाजों में हस्तक्षेप करने की आशा नहीं की जा सकती थी। लेकिन उसका सामान्य कर्तव्य ब्राह्मणों की रक्षा करना और समाज के चार विभागों या वर्णों की मर्यादा बनाए रखना होता था। इस संबंध में पुरोहित द्वारा राजा के पथ प्रदर्शन की आशा की जाती थी। लेकिन ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि पुरोहित राज्य के कार्यों में हस्तक्षेप करते थे या राजा पर उनका नियंत्रण था। इस काल में मेधातिथि ने सर्वप्रथम धर्मशास्त्र की व्याख्या की और कहा कि राजा का अधिकार धर्मशास्त्र के साथ-साथ वेद, अर्थशास्त्र या राजतन्त्र विज्ञान दोनों से लिया गया है। उसका नागरिक कर्तव्य या राजधर्म कौटिल्य अर्थशास्त्र पर आधारित होना चाहिए अर्थात् राजनीति शास्त्र के सिद्धान्तों पर। वस्तुतः इसका अर्थ यह है कि राजनीति शास्त्र और धर्म के तत्व सिद्धान्त अलग-अलग होते थे। धर्म राजा का व्यक्तिगत अनिवार्य कर्तव्य होता था। इस प्रकार राजा पर पुरोहित का नियंत्रण या धर्मशास्त्र का नियंत्रण नहीं होता था। इस अर्थ में राज्य मूलतः धर्म निरपेक्ष था। | |||||||||
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