सत्यमेव जयते gideonhistory.com
गुप्त काल में जन जीवन

प्रशासन-पद्धति

   मौर्यों के विपरीत गुप्त राजाओं ने महाराजाधिराज, परमभट्टारक आदि आडम्बर-पूर्ण उपाधियाँ धारण कीं। इससे यह संकेत मिलता है कि उन्होंने अपने साम्राज्य के भीतर छोट-छोटे राजाओं पर शासन किया। राजपद वंशगत था, परन्तु राजसत्ता ज्येष्ठाधिकार की अटल प्रथा के अभाव में सीमित थी। राजगद्दी हमेशा ज्येष्ठ पुत्र को ही नहीं मिलती थी। इससे अनिश्चितता की स्थिति उत्पन्न हो जाती थी, जिसका लाभ सामन्त और उच्चाधिकारी उठा सकते थे। गुप्त राजाओं ने ब्राह्मणों को उदारतापूर्वक दान दिए। ब्राह्मणों ने राजा की तुलना विभिन्न देवताओं से कर के नमक चुकाया। राजा को रक्षा और पालन करने वाले भगवान विष्णु के रूप में देखा जाने लगा, और राजसत्ता की देवी लक्ष्मी विष्णु की पत्नि के रूप में सिक्कों की पीठ पर सदा अंकित होती रही।
   गुप्त सेना का विस्तार ज्ञात नहीं है। लगता है, राजा एक स्थायी सेना रखता था और सामन्तों द्वारा समय-समय पर प्रदत्त सेनाएँ उसकी पूरक होती थीं। रथ के दिन लद चुके थे और अश्वसेना की महत्ता बढ़ गई थी। घोड़े पर सवार हो कर तीर चलाना एक अच्छा रण-कौशल था।
   गुप्त काल में भूमिसम्बन्धी करों की संख्या बढ़ गई, परन्तु वाणिज्य-करों की संख्या घटी। संभवतः राज्य उपज का चौथे भाग से लेकर छठे भाग तक कर के रूप में लेता था। इसके अतिरिक्त, जब भी राजकीय सेना गाँवों से गुजरती थी तो उसे खिलाना पिलाना स्थानीय प्रजा का कर्तव्य होता था। ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले राजकीय अधिकारी अपने निर्वाह के लिए किसानों से पशु, अन्न, खाट आदि वस्तुएँ लेते थे। मध्य और पश्चिम भारत में ग्रामवासियों से सरकारी सेना और अधिकारियों की सेवा के लिए बेगार (निःशुल्क श्रम) भी कराया जाता था जो विष्टि कहलाता था।
   पहले की अपेक्षा गुप्तकाल में न्याय-पद्धति अधिक विकसित थी। इस काल में अनेक विधि-ग्रन्थ संकलित किए गए। पहली बार दीवानी और फौजदारी कानून (व्यवहार-विधि और दण्ड-विधि) भली भाँति परिभाषित और पृथक्कृत हुए। चोरी और व्यभिचार फौजदारी कानून में आए और सम्पत्ति सम्बन्धी विविध विवाद दीवानी कानून में। उत्तराधिकार के बारे में विस्तृत नियम निर्धारित हुए। पहले की भाँति बहुत सारे नियमों का आधार वर्णभेद रहा। नियम-कानून बनाए रखना राजा का कर्तव्य था। राजा-न्याय निर्णय ब्राह्मण पुरोहितों की सहायता से करता था। शिल्पी, वणिक आदि के संगठनों (श्रेणिओं) पर उनके अपने ही नियम लागू होते थे। वैशाली से और इलाहाबाद के निकटवर्ती भीटा से प्राप्त सीलों से लक्षित होता है कि गुप्तकाल में श्रेणियाँ अच्छी अवस्था में चल रही थीं।
   गुप्तों का प्रशासन-तंत्र उतना लम्बा-चौड़ा नहीं था जितना मौर्यां का। गुप्त साम्राज्य के सबसे बड़े अधिकारी कुमारामात्य होते थे । उन्हें राजा उनके अपने प्रान्त में ही नियुक्त करता था। शायद वे नगद वेतन पाते थे। चूँकि गुप्त लोग शायद वैश्य थे, इसलिए प्रशासनिक पदों पर नियुक्ति केवल उच्च वर्णों तक सीमित नहीं थी। परन्तु अनेक पदों का प्रभार एक ही व्यक्ति के हाथ में सौंपा जाने लगा और पद वंशगत हो गए। सहज ही, इससे राजकीय नियन्त्रण शिथिल हो गया।
   गुप्त राजाओं ने प्रान्तीय और स्थानीय शासन की पद्धति चलाई। राज्य कई भुक्तियों अर्थात् प्रान्तों में विभाजित था और हर भुक्ति एक-एक उपरिक के प्रभार में रहती थी। भुक्तियाँ कई विषयों अर्थात् जिलों में विभाजित थी। हर विषय का प्रभारी विषयपति होता था। पूर्वी भारत में विषय वीथियों में बँटे थे और वीथियाँ ग्रामों में विभाजित थीं।
   गुप्त काल में गाँव का मुखिया अधिक महत्वपूर्ण हो गया। वह ग्रामश्रेष्ठों की सहायता से गाँव का काम-काज देखता था। ग्रामों और छोटे-छोटे शहरों के प्रशासन से प्रमुख स्थानीय लोग जुड़े हुए थे। उनकी अनुमति के बिना जमीन की खरीद-बिक्री नहीं हो सकती थी।
   नगर के प्रशासन में व्यवसायियों के संगठनों की अच्छी साझेदारी रहती थी। वैशाली से प्राप्त सीलों से प्रकट होता है कि शिल्पी, वणिक् और लिपिक एक ही संस्था में काम करते थे और इस हैसियत से वे स्पष्टतः नगर के कार्यों का संचालन करते थे। उत्तरी बंगाल (बाडला देश) के कोटिवर्ष विषय की प्रशासनिक परिषद् में मुख्यक वणिक्, मुख्य व्यापारी और मुख्य शिल्पी शामिल थे। भूमि के हस्तांतरण में उनकी सम्मति आवश्यक समझी जाती थी। शिल्पियों और वणिकों के अपने अलग-अलग संघटन (श्रेणियाँ) थे। भीटा और वैशाली के शिल्पियों और वणिकों की अलग-अलग श्रेणियाँ हमें ज्ञात हैं। मालवा के मंदसौर में रेशम बुनकरों की अपनी खास श्रेणियाँ थीं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बुलन्दशहर जिले व इन्दौर में तेलियों की अपनी श्रेणियाँ थीं। ऐसा प्रतीत होता है कि इन श्रेणियों को, खासकर वणिकों को श्रेणियों को कई खास छूटों की सुविधा दी गई थी। हरहालात में, ये श्रेणियाँ अपने सदस्यों के मामले देखती थीं और श्रेणी के नियम कानून और परम्परा का उल्लंघन करने वालों को सजा दे सकती थीं।
   उपयुक्त प्रशासन-पद्धति केवल उत्तरी बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश में तथा मध्य प्रदेश के कुछ संलग्न क्षेत्रों में ही लागू थी जहाँ गुप्त राजा अपने अधिकारियों की सहायता से प्रत्यक्ष शासन करते थे। साम्राज्य के अधिकार भाग सामन्तों या मंडलेश्वरों के हाथ में थे, जिनमें से अनेकों को समुद्रगुप्त ने अपने अधीन कर लिया था। साम्राज्य के सीमावर्ती सामन्तों को तीन जिम्मेवारियाँ पूरी करनी होती थीं। वे सम्राट के दरबार में स्वयं उपस्थित होकर सम्मान निवेदन करते, नजराना चढ़ाते और विवाहार्थ अपनी पुत्री समर्पित करते थे। लगता है कि इसके बदले उन्हें अपने क्षेत्र पर अधिकार का शासन-पत्र (सनद) मिलता था। गरूड़ छाप वाली राजकीय मुहर जिन शासन-पत्रों पर है वे सामन्तों के जारी किए गए प्रतीत होते हैं। इस प्रकार मध्य प्रदेश में और अन्यत्र गुप्तों के कई सामन्त राज करते थे। अधीनता की स्थिति ने इन राजाओं को सामन्त बना दिया था।
   गुप्तकाल में उभरा दूसरा महत्वपूर्ण सामन्तिक लक्षण है पुरोहितों और प्रशासकों को क्षेत्र-विशेष में कर-ग्रहण और शासन करने की रियायत कर दिया जाना, जिसे ग्रामदान कहते हैं। इस प्रथा का आरम्भ दकन में सातवाहनों ने किया और गुप्तकाल में, खास कर मध्य प्रदेश में, तो यह सामान्य परिपाटी बन गई। धर्माचायो को कर-मुक्त भूमि दान में दी जाती थी और उन्हें वैसे सभी कर उगाहने का अधिकार भी दे दिया जाता, जो कर अन्यथा राजकोष में जाते। जो ग्राम दे दिए जाते थे उनमें राजा के अधिकारियों और अमलों को प्रवेश करने का हक नहीं रहता था। हिताधिकारी वहाँ के अपराधकर्मियों को सजा भी दे सकता था।
   गुप्त काल में अधिकारियों को वेतन का भुगतान जमीन देकर किया जाता था कि नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। स्वर्णमुद्रा की बहुतायत से लक्षित होता है कि ऊँचे अधिकारियों को नगद वेतन देने की परिपाटी चलती रही, किन्तु उनमें से कुछ न कुछ अधिकारी अपना पावना भूमि के जरिए भी प्राप्त करते थे।
   चूँकि साम्राज्य के प्रशासन सम्बन्धी बहुत सारे काम सामन्तों और हिताधिकारियों के हाथों ही सम्पन्न हो जाते थे, इसलिए मौर्यां की भाँति गुप्तों को आधिक अधिकारी वर्ग रखने की आवश्यकता नहीं रही। बहुत अधिक अधिकारी रखना इसलिए भी अनावश्यक हो गया होगा क्योंकि मौर्य राज्य की भाँति गुप्त राज्य बड़े पैमाने पर आर्थिक कार्यकलाप में संलग्न नहीं था। ग्राम और नगर के प्रशासन में शिल्पियों, वणिकों, श्रेष्ठियों आदि के भाग लेने से अधिकारियों का लम्बा तांता आवश्यक न रह गया। गुप्तों का मौर्यों की भाँति न लम्बा-चौड़ा प्रशासन-तंत्र था और न उन्हें उसकी आवश्यकता ही थी। कई दृष्टियों से गुप्तों की राजनीतिक प्रणाली में सामन्ती रंग दिखाई देता है।

व्यापार और कृषिमूलक अर्थव्यवस्था की प्रवृत्तियाँ

   गुप्त कालीन आर्थिक जीवन की कुछ झलम हमें फा-हियान से मिलती है जो गुप्त साम्राज्य के विभिन्न भागों में घूमा था। अन्य बातों के अलावा, वह बताता है कि मगध नगरों और धनवानों से भरा-पूरा था और धनी लोग बौद्ध धर्म का सम्पोषण करते थे और उसके लिए दान देते थे।
   प्राचीन भारत के गुप्त राजाओं ने सबसे अधिक स्वर्णमुद्राएँ जारी कीं, जो उनके अभिलेखों में दीनार कहीं गई हैं। नियन्त्रित आकार और भार वाली ये स्वर्ण-मुद्राएँ अनेक प्रकारों और उप प्रकारों में पायी जाती हैं। इन पर गुप्त राजाओं के स्पष्ट चित्र हैं और इनसे उनकी युद्धप्रियता और कलाप्रियता का संकेत मिलता है। यद्धपि स्वर्णांश में ये मुद्राएँ उतनी शुद्ध नहीं हैं जितनी कुषाण-मुद्राएँ, तथापि ये न केवल सेना और प्रशासन के अधिकारियों को वेतन चुकाने में, अपितु भूमि की खरीद-बिक्री सम्बन्धी आवश्यकता की पूर्ति में भी सहायक हुई। गुजरात-विजय के बाद गुप्त राजाओं ने बड़ी संख्या में चाँदी के सिक्के भी जारी किए, जो केवल स्थानीय लेन-देन के लिए अभिप्रेत थे, क्येंकि पश्चिमी क्षत्रपों के यहाँ चाँदी के सिक्कों का महत्वपूर्ण स्थान था। कुषाणों के विपरीत, गुप्तों के ताँबे के सिक्के बहुत ही कम मिलते हैं। इससे यह प्रकट होता है कि जन-सामान्य में मुद्रा का प्रयोग जितना कुषाणों के समय होता था उतना अब नहीं रहा।
   पूर्व काल की तुलना में, दूर व्यापारी में हृस दिखाई देता है। 550 ई. तक भारत पूर्वी रोमन साम्राज्य के साथ कुछ-कुछ व्यापार करता रहा, जहाँ वह रेशम भेजता था। 550 ई. के आसपास पूर्वी रोमन साम्राज्य के लोगों ने चीनियों से रेशम पैदा करने की कला सीख ली। इससे भारत के निर्यात-व्यापार पर बुरा असर पड़ा। छठी सदी का मध्य आते-आते ही भारतीय रेशम की माँग विदेश में कमजोर पड़ गई थी। पाँचवीं सदी के मध्य में रेशम बुनकरों की एक श्रेणी पश्चिम भारत स्थित अपने मूल निवास स्थान लाट देश को छोड़कर मंदसोर चली गई और वहाँ उन बुनकरों ने अपना मूल व्यवसाय छोड़कर अन्य व्यवसायों को अपना लिया।
   एक असाधारण गतिविधि जो गुप्त काल में, विशेषतः मध्य देश में हुई वह भी स्थानीय किसानों के हित के विरूद्ध ब्राह्मणों की जमींदारी की स्थापना। ब्राह्मण पुरोहितों को दान में जो भूमि दी जाने लगी उससे अवश्य की बहुत सी परती जमीन आबाद हुई। लेकिन ये हिताधिकारी वर्ग स्थानीय कबायली किसानों के मत्थे पर ऊपर से लाद दिये गए, जिसके परिणामस्वरूप उन किसानों की हैसियत और भी नीचे गिर गई। मध्य और पश्चिम भारत में किसानों से बेगार भी लिया जाने लगा। दूसरी ओर, मध्य भारत के कबायली इलाकों में ब्राह्मण हिताधिकारियों ने बहुत सारी परती जमीन को आबाद कराया और खेती की अच्छी जानकारी प्रचलित की।

सामाजिक गतिविधि

   ब्राह्मणों को बड़े पैमाने पर ग्राम-दान दिया जाना इस बात को द्योतक है कि ब्राह्मणों की श्रेष्ठता गुप्तकाल में भी रही। ब्राह्मण गुप्तवंशियों को क्षत्रिय मानने लगे जबकि वे मूलतः वैश्य थे। ब्राह्मणों ने गुप्तराजाओं को देवताओं के गुणों से अलंकृत रूप में चित्रित किया। इससे गुप्त राजाओं की हैसियत धर्मशास्त्र-सम्मत हो गई और वे ब्राह्मणप्रधान वर्णव्यवस्था के परम प्रतिपालक हो गए। भारी संख्या में मिले ग्राम-दानों के फलस्वरूप ब्राह्मणों ने खूब धन-संचय किया। इस प्रकार ब्राह्मणों ने बहुत से विशेषाधिकार अर्जित किए जो लगभग पाँचवीं सदी ई. में रचित नारद स्मृति में गिनाए गए हैं।
   वर्ण अगणित जातियों-उपजातियों में बँट गए। इसके दो कारण हुए, भारी संख्या में विदेशों से आए लोग भारतीय समाज में घुल-मिल गए और उन विदेशियों का हर समूह एक-एक खास हिन्दू जाति समझा जाने लगा। चूँकि विदेशी लोग विजेता के रूप में आए इसलिए समाज में उन्हें क्षत्रिय का स्थान मिला। हूण लोग जो पाँचवीं सदी का अन्त होते-होते आए अन्ततः राजपूतों के छत्तीस कुलों में से एक कुल के मान लिए गए। आज भी कुछ राजपूत हूण उपाधि धारण किए हुए हैं। जातियों की संख्या बढ़ने का दूसरा कारण था ग्राम-दान की प्रक्रिया में बहुत से कबायली लोगों का हिन्दू समाज में समा जाना। कबायली सरदार लोग उच्च कुल के माने गए। किन्तु उनके सामान्य स्वजनों को नीच कुल का माना गया और हर कबीला अपने नए जीवन में एक न एक जाति कि रूप में अवतीर्ण हुआ। यह प्रक्रिया किसी न किसी रूप में आज तक चालू है।
   इस काल में शूद्रों की स्थिति सुधरी। अब उन्हें रामायण, महाभारत और पुराण सुनने का अधिकार मिल गया। वे अब कृष्ण नामक एक नए देवता की पूजा भी कर सकते थे। उन्हें कुछ गृह्य संस्कारों या घरेलू अनुष्ठानों का भी अधिकार मिला। इन कर्मों में अवश्य ही पुरोहितों को दक्षिणा प्राप्त होती थी। ये सभी शूद्रों की आर्थिक स्थिति में हुए सुधार के ही चमत्कार थे। सातवीं सदी से लेकर उनकी पहचान मुख्यतः कृषक के रूप में होने लगी, जबकि पूर्व काल में उनका दर्शन अपने ऊपर के तीनों वर्णों के वास्ते खटने वाले सेवक, दास और कृषि-मजदूर के रूप में ही होता है।
   परन्तु आलोच्य काल में अछूतों की संख्या में वृद्धि हुई, विशेष कर चण्डालों की संख्या में। चाण्डाल समाज में बहुत ही पहले ईसा-पूर्व पाँचवीं सदी से ही दिखाई देते हैं। ईसा की पाँचवीं सदी में आकर उनकी संख्या इतनी बढ़ गई और उनकी अपात्रताएँ इतनी प्रखर हो गईं कि उनकी ओर चीनी यात्री फा-हियान की दृष्टि बरबस खिंच गई जिसने लिखा है कि गाँव के बाहर ही बसते थे और माँस का व्यवसाय करते थे, जब कभी वे नगर में प्रवेश करते, उच्च वर्ण के लोग उनसे दूर ही रहते क्योंकि माना जाता था कि उनके स्पर्श से सड़क अपवित्र हो जाती है।
   गुप्त काल में शूद्रों की भाँति स्त्रियों को भी रामायाण, महाभारत और पुराण सुनने का अधिकार प्राप्त हुआ और उकने लिए कृष्ण का पूजन विहित किया गया। लेकिन गुप्त-पूर्व काल और गुप्त काल में भी उच्च वर्णों की स्त्रियों में अपना स्वतंत्र जीवन निर्वाह का जरिया रखना अनुमत नहीं था। निचले दो वर्णों की स्त्रियाँ अपने जीवन-निर्वाह के लिए अर्जन कर सकती थीं, इतने से ही उन्हें बहुत कुछ स्वतंत्रता मिल गई, पर उच्च वर्णों की स्त्रियाँ इस स्वतंत्रता से वंचित थीं। इसमें तर्क यह दिया गया है कि चूँकि वैश्य और शूद्र स्त्रियाँ खेती का काम और घरेलू काम करती हैं इसलिए उन्हें पति की पराधीनता नहीं रहती है। गुप्त काल के विपरीत, इस काल में उच्च वर्णों के लोग अधिक से अधिक जमीन अर्जित करते गए, जिससे उनमें अधिक से अधिक पत्नी रखने और अधिक से अधिक सम्पत्ति बटोरने की प्रवृत्ति आई। पितृतन्त्रात्मक व्यवस्था में वे पत्नी को निजी सम्पत्ति समझने लगे, यहाँ तक कि पत्नि से मृत्यु में भी साथ देने की आशा करने लगे। पति के मरने पर उसकी पत्नी का पति की चिता में आत्मदाह करने का पहला उदाहरण गुप्तकाल में ही 510 ई. में मिलता है। फिर भी, गुप्तोत्तर काल की कुछ स्मृतियों में कहा गया है कि यदि पति खो जाए, मर जाए, नपुंसक हो जाए, संन्यास ले ले या पतित (जातिबाह्य) हो जाए तो स्त्री पुनर्विवाह कर सकती है।
   उच्च वर्णों की स्त्रियों की पराधीनता का मुख्य कारण यह था कि वे अपने जीवन-निर्वाह के लिए पूर्णतः अपने-अपने पतियों पर आश्रित रहती थीं। उन्हें स्वामित्वाधिकार नहीं था। लेकिन सबसे पुरानी स्मृतियों में भी यह कहा गया है कि विवाह के समय वधू को भेंट के रूप में माँ-बाप द्वारा दिए गए भूषण, अलंकरण, वस्त्र आदि सामान स्त्री धन होते हैं। गुप्त काल और गुप्तोत्तर काल की स्मृतियों में तो इन भेंटों का दायरा काफी बढ़ाया गया है। उनके अनुसार, विवाह आदि के समय न केवल वधू के माता-पिता से बल्कि सास-ससुर से भी वधु को जो कुछ उपहार मिलता है वह स्त्रीधन होता है। छठी सदी के एक स्मृतिकार कात्यायन का कहना है कि स्त्री अपने स्त्रीधन के साथ अपनी अचल सम्पत्ति को भी बेच सकती है और गिरवी रख सकती है। इससे यह बात साफ-साफ निकलती है कि कात्यायन के अनुसार जमीन में स्त्रियों को हिस्सा मिलता था, परन्तु भारत के पितृतन्त्रात्मक समाज में बेटी को अचल सम्पत्ति का उत्तराधिकार सामान्यतः नहीं मिलता है।

बौद्ध धर्म का पतन

   गुप्तकाल में बौद्ध धर्म को राजाश्रय मिलना समाप्त हो गया। फा-हियान ऐसी धारणा देता है कि बौद्ध धर्म बहुत समुन्नत स्थिति में था। लेकिन यथार्थ में इस धर्म का जो उत्कर्ष अशोक और कनिष्क के दिनों में था वह गुप्त काल में नहीं रहा। खासकर मगध में तो इसके बुरे दिन आए।

भागवत सम्प्रदाय का उद्भव और विकास

   भागवत धर्म का केन्द्र बिन्दु भगवत् या विष्णु की पूजा है। इसका उद्भव मौर्योत्तर काल में हुआ। वैदिक काल में विष्णु एक गौण देवता था। वह सूर्य का प्रतिरूप था और उर्वरता-पन्थ का देवता भी। ईसा-पूर्व दूसरी सदी में आकर वह नारायण नामक एक देवता से अभिन्न हो गया और नारायण-विष्णु कहलाने लगा। नारायण मूलतः एक अवैदिक कबायली देवता था। वह भगवत् कहलाता था, और उसका उपासक भागवत। वह देवता कबायली सरदार का दिव्य प्रतिरूप समझा जाता था। जिस प्रकार कबायली सरदार स्वजनों से भेंट पाता था और उसे हिस्सा लगाकर उन्हीं स्वजों के बीच बाँट देता था, उसकी प्रकार माना जाता था कि नारायण भग अर्थात् हिस्सा या भाग्य अपने भक्तों के बीच उनकी भक्ति के अनुसार बाँटता है। जब विष्णु और नारायण दोनों एक हो गए तब दोनों के उपासक भी धर्म की एक ही छत्र-छाया में आ गए। पहला वेदमूलक देवता था तो दूसरा अवैदिक। लेकिन ये दोनों संस्कृतियाँ, ये दोनों प्रकार के लोग और ये दोनों देवता सभी आपस में घुल-मिल गए।
   आगे-चलकर विष्णु पश्चिमी भारत के निवासी वृष्णि-कुल के एक पौराणिक महापुरूष से अभिन्न हो गया, जो कृष्ण वासुदेव कहलाता था। इस कृष्ण की विष्णु से अभिन्नता दिखाने के उद्देश्य से महान् गाथाकाव्य महाभारत को नया रूप दिया गया। 200 ई. पू. में आते-आते उपासकों की ये तीनों धाराएँ और उनके तीनों उपास्य देव मिलते-मिलते एक हो गए। भागवत या वैष्णम् सम्प्रदाय का उद्भव इसी का परिणाम है।
   भागवत सम्प्रदाय के मुख्य तत्व हैं भक्ति और अहिंसा। भक्ति का अर्थ है प्रेममय निष्ठा का निवेदन। यह एक प्रकार की वही निष्ठा है जो कबीले के लोग अपने सरदार के प्रति रखते हैं या प्रजा राजा के प्रति रखती है। अहिंसा अर्थात् किसी जीव का वध नहीं करना, कृषक समाज के लिए अनुकूल थी तथा विष्णु से जुड़ी प्राणदायिनी उर्वरता के पन्थ से भी मेल खाती थी। लोग विष्णु की प्रतिमा की पूजा करते थे और जौ (अक्षत ?), तिल आदि चढ़ाते थे। जीव-हत्या से घृणा के कारण बहुत से उपासकों ने माँस-मछली खाना छोड़ दिया।
   यह नया धर्म परम उदार था। सहज ही इसने विदेशियों को भी अपनी ओर खींच लिया। यह शिल्पियों और वणिकों को भी भाया, जो सातवाहनों और कुषाणों के काल में प्रबल हो चुके थे। कृष्ण ने भगवत्गीता में घोषणा की है कि जन्मतः अपवित्र स्त्री, वैश्य और शूद्र भी उसकी शरण में आ सकते हैं। इस धार्मिक ग्रन्थ में वैष्णम धर्म का प्रतिपादन किया गया है। विष्णुपुराण में और कुछ-कुछ विष्णुस्मृति में भी इस सम्प्रदाय का प्रतिपादन है।
   गुप्तकाल में आकर भागवत या वैष्णव सम्प्रदाय ने महायान बौद्ध धर्म को दबा दिया। इसमें अवतारवाद का उपदेश है। इतिहास विष्णु के दस अवतारों के चक्र के रूप में प्रतिपादित है। यह माना जाता है कि जब-जब सामाजिक व्यवस्था संकटापन्न हो जाती है तब-तब विष्णु उपयुक्त रूप में अवतार लेकर उसे बचाता है। विष्णु का हर अवतार धर्म के उद्धार के लिए आवश्यक माना जाता है और धर्म का अर्थ है राज्य द्वारा संरक्षित वर्ण-विभागमूलक समाज और पितृतन्त्रात्मक परिवार की संस्था।
   छठी सदी में आकर विष्णु की गणना शिव और ब्रह्मा के साथ त्रिदेव में होने लगी। फिर भी वह अपने आप में एक प्रमुख देवता रहा। छठी सदी के बाद उसकी पूजा से मिलने वाले पुण्यफलों के प्रचारार्थ बहुत सी पुस्तकें लिखी गईं जिनमें सबसे ऊपर स्थान है भागवतपुराण का। इस पुराण की कथा का प्रवचन पुरोहित लोग कई दिनों में सम्पन्न करते थे। मध्य काल में पूर्वी भारत में जहाँ-तहाँ भगवत-घर स्थापित हुए वहाँ विष्णु की पूजा और उनकी लीलाओं का कीर्तन होता था। विष्णु के उपासकों के लिए विष्णुसहस्त्रनाम आदि बहुत से स्तोत्र लिखे गए।
   गुप्तवंश के कुछ राजा शिव के उपासक हुए, जो संहार या प्रलय के देवता हैं। लेकिन शिव का उत्कर्ष बाद में हुआ और गुप्त शासन की आरम्भिक अवस्था में शिव उतने महत्वपूर्ण नहीं लगते हैं जितने विष्णु।
   गुप्तकाल से मूर्ति-पूजा हिन्दू धर्म का एक सामान्य लक्षण हो गई। अनेक त्यौहार मनाए जाने लगे। विभिन्न वर्गों के लोगों में जो कृषि संबंधी त्यौहार चलते थे उन्हें भी धार्मिक रूपरंग दे दिया गया और वे पुरोहितों की आय के अच्छे साधन बन गए।
   गुप्तवंशी राजाओं ने विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों के प्रति सहनशीलता का मार्ग अपनाया। हम बौद्ध और जैन धर्म के अनुयायियों को सताए जाने का एक भी उदाहरण नहीं पाते हैं। इसका एक और कारण बौद्ध धर्म के रंग-ढंग में हुआ परिवर्तन भी था, जिसके क्रम में हिन्दू धर्म के बहुत से तत्व बौद्ध धर्म में अपना लिए गए थे।

कलाएँ

   गुप्त काल प्राचीन भारत का स्वर्ण-युग कहा जाता है। ऐसा कहना आर्थिक क्षेत्र में गलत भी हो सकता है, क्योंकि इस काल में उत्तर भारत में कई नगरों का पतन हुआ। लेकिन गुप्तों के पास सोना भारी मात्रा में था। चाहे वह किसी भी स्रोत से आया हो और उन्होंने सबसे अधिक स्वर्णमुद्राएँ जारी कीं। अमीर और रईस लोग अपनी आय का कुछ भाग कला और साहित्य की साधना में लगे लोगों के भरण-पोषण में लगाने में समर्थ थे। समुद्रगुप्त और चन्द्रगुप्त द्वितीय कला और साहित्य दोनों के सम्पोषक हुए। समुद्रगुप्त को अपने सिक्के पर वीणा बजाते हुए दिखाया गया है और चन्द्रगुप्त का दरबार नवरत्न अर्थात् नौ बड़े-बड़े विद्वानों से अलंकृत था।
   प्राचीन भारत में कला अधिकतर धर्म से अनुरंजित थी। प्राचीन भारत की धर्मनिरपेक्ष कला के अवशेष बहुत कम है। मौर्य काल और मौर्यात्तर काल में कला को बौद्ध धर्म से खूब ही बढ़ावा मिला। फलस्वरूप पत्थर के बड़े-बड़े स्तम्भ खड़े किए गए, चट्टानों को काट-काट कर सुन्दर गुहाएँ बनाई गईं और ऊँचे-ऊँचे स्तूप खड़े किए गए। स्तूप बुद्धसम्बन्धी पुरावशेषों पर निर्मित गोलाकार आधारों पर टिकी गुम्बदनुमा प्रस्तर-संरचना को कहते हैं। बुद्ध की अनगिनत प्रतिमाएँ बनाई गईं।
   गुप्त काल में बनी दो मीटर से भी ऊँची बुद्ध की एक कांस्यमूर्ति भागलपुर के निकट सुल्तान गंज में पाई गई है। फा-हियान ने 25 मीटर से भी अधिक ऊँची बुद्ध की एक ताम्रमूर्ति देखी थी लेकिन उसका अब पता नहीं है। गुप्तकाल में सारनाथ और मथुरा में बुद्ध की सुन्दर प्रतिमाएँ बनीं। लेकिन गुप्त कालीन बौद्ध कला का उत्कृष्टता नमूना है अजन्ता की चित्रावली। यद्यपि इस चित्रावली में ईसा की पहली सदी से लेकर सातवीं सदी तक के चित्र शामिल हैं, फिर भी अधिकतर गुप्तकालीन ही हैं। इन चित्रों में गौतम बुद्ध और उनके पिछले जन्मों की विभिन्न घटनाएँ चित्रित हैं। ये चित्र वास्तविक जैसे सजीव और सहज लगते हैं और आश्चर्य यह है कि चौदह सौ वर्ष के बाद भी उनके रंगो की चमक ज्यों की त्यों है। यह भी ज्ञातव्य है कि गुप्त राजा अजन्ता चित्रकारों के संरक्षक थे।
   चूँकि गुप्तवंशी राजा हिन्दू धर्म के सम्पोषक थे, इसलिए पहली बार हम गुप्त काल में ही विष्णु, शिव, तथा अन्य हिन्दू देवताओं की प्रतिमा पाते हैं। कई स्थानों में हम सम्पूर्ण देवमंडल पाते हैं जहाँ मध्य में मुख्य देवता है और चारों ओर उसके परिचर और गौण देवता एक ही पट्ट पर विराजमान हैं। मुख्य देवता का आकार बड़ा रहता है, पर उसके परिचर तथा गौण देवता छोटे पैमाने पर उतारे गए रहते हैं। यह एक स्पष्ट सामाजिक विभेद तथा अनुक्रम प्रदर्शित करता है।
   वास्तुकला में गुप्त काल पिछड़ा था। वास्तुकला के नाम पर हमें ईंट के बने कुछ मन्दिर उत्तर प्रदेश में मिले हैं। एक पत्थर का मन्दिर भी मिला है। यहाँ कानपुर के भीटरगाँव, गाजीपुर के भितरी और झाँसी के देवगण के ईंट के मन्दिर भी उल्लेखनीय हैं। नालन्दा का बौद्ध महाविहार पाँचवीं सदी में बना और इसकी सबसे पहले की संरचना, जो ईंट की है, गुप्तकाल में बनी है।

साहित्य

   गुप्तकाल लौकिक साहित्य की सर्जना के लिए स्मरणीय है। भास के तेरह नाटक इसी काल के हैं। शूद्रक का लिखा नाटक मृच्छकटिक या माटी की खिलौना-गाड़ी, जिसमें एक निर्धन ब्राह्मण के साथ एक वेश्या का प्रेम वर्णित है, प्राचीन नाटकों में उत्कृष्टतम कोटि का माना जाता है। परन्तु जिसको लेकर गुप्त काल का सबसे ऊँचा नाम है वह है कालिदास की कृति। कालीदास का अभिज्ञानशाकुन्तल विश्व की एक सौ उत्कृष्टतम साहित्यिक कृतियों में एक है। इसमें राजा दुश्यन्त और शकुन्तला के प्रेम की कथा चित्रित है, जिनका पुत्र भरत एक नामी राजा हुआ। शाकुन्तल प्रथम भारतीय रचना है जिसका अनुवाद यूरोपीय भाषाओं में हुआ। ऐसी दूसरी रचना है भगवद्गीता। भारत में गुप्त काल में लिखे नाटकों के बारे में दो बातें उल्लेखनीय हैं। पहली बात यह है कि ये सभी नाटक सुखान्त हैं। दुखान्त नाटक एक भी नहीं मिलता। दूसरी बात यह है कि उच्च वर्गों और निम्न वर्गां के लोग भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोलते हैं। इन नाटकों में स्त्री और शूद्र प्राकृत बोलते हैं जब कि भद्रजन संस्कृत।
   इस काल में धार्मिक साहित्य की रचना में भी भारी वृद्धि देखी जाती है। इस काल की अधिकांश रचनाओं में प्रबल धार्मिक रूझान है। दो महान गाथाकाव्य रामायण और महाभारत ईसा की चौथी सदी में आकर लगभग पूरे हो चुके थे। रामायण में राम की कथा है, जिन्हें उनके पिता दशरथ ने उनकी सौतेली माँ कैकई की साजिशों के कारण चौदह वर्षों के लिए निष्कासित कर दिया था। वह निष्ठापूर्वक पिता की आज्ञा मानकर वन में रहने लगे जहाँ उनकी पत्नि सीता को लंकेश्वर रावण ने हर लिया। अन्त में राम ने अपने भाई लक्ष्मण की सहायता से रावण को मारा और सीता को वापस ले आए। इस कहानी में दो आधारभूत नैतिक तत्व हैं। पहला यह कि इसमें परिवार रूपी संस्था का आदर्श दिखाया गया है, जिसमें किसी भी परिस्थिति में पुत्र को पिता की आज्ञा और छोटे भाई को बड़े भाई की आज्ञा माननी होती है और स्त्री को पति के प्रति निष्ठा रखनी ही होती है। दूसरा यह कि रावण बुराई के और राम भलाई के प्रतीक हैं, अन्त में असत् पर सत् की और कुव्यवस्था पर सुव्यवस्था की जीत होती है। महाभारत की मुख्य कथा की अपेक्षा राम की कथा कहीं अधिक सामाजिक और धार्मिक प्रभाव डाल सकी। रामायण के अनेकानेक रूप-रूपान्तर भारतीय भाषाओं में तथा दक्षिण-पूर्व भारत की भाषाओं में पाए जाते हैं।
   महाभारत सार रूप में चचेरे भाईयों के दो समूह कौरवों और पाण्डवों के आपसी झगड़े की कहानी है जो बताती है कि राजसत्ता स्वजनों के प्राण से भी अधिक प्यारी होती है। यद्यपि पाण्डव धृतराष्ट्र द्वारा छोड़े गए राज्य के उत्तराधिकारी थे, तथापि कौरवों ने सुई की नोंक भर भी जमीन देने से इंकार कर दिया। फलतः कृष्ण को साथ लाए पाण्डवों और कौरवों के बीच लम्बी बन्धुघाती लड़ाई हुई। अन्त में कौरवों को हरा कर पाण्डव विजयी हुए। इसमें भी दुष्ट शक्ति पर इष्ट शक्ति की विजय दिखाई देती है। भगवद्गीता महाभारत का एक महत्वपूर्ण अंश है। इसमें यह शिक्षा दी गई है कि वर्ण और जाति के अनुसार जिसका जो कर्तव्य निर्धारित है उसे उस कर्तव्य का पालन हर हालत में किसी प्रतिफल की कामना के बिना करना चाहिए।
   पुराण उपर्युक्त दोनों महाकाव्यों के ढर्रे पर ही लिखे गए हैं। इनमें जो अधिक पूर्व के हैं, उनका अन्तिम संकलन-सम्पादन गुप्तकाल में हुआ। ये मिथकों, आख्यानों और प्रवचनों से भरे हैं। इनका उद्देश्य सामान्य लोगों को शिक्षा और बुद्धिविवेक देना था। इस काल में बहुत सी स्मृतियाँ भी लिखी गईं जिनमें सामाजिक और धार्मिक नियम कानून पद्य में बाँधकर संकलिन किए गए हैं। स्मृतियों पर टीकाएँ लिखने की अवस्था गुप्तकाल के बाद आई।
   गुप्त काल में पाणिनि और पतंजलि के ग्रन्थों के आधार पर संस्कृत व्याकरण का भी विकास हुआ। यह काल विशेष रूप से स्मरणीय है अमरकोश को लेकर, जिसका संकलन चन्द्रगुप्त द्वितीय की सभा के नवरत्नों में एक अमरसिंह ने किया है। प्राचीन रीति से संस्कृत पढ़ने वाले छात्र को यह शब्दकोश रटा दिया जाता है। कुल मिलाकर शिष्ट साहित्य के इतिहास में गुप्त काल एक उज्जवल अध्याय है। इस काल में इस एक जटिल अलंकारिक शैली का विकास हुआ, जो पुराने सरल संस्कृत साहित्य की शैली से भिन्न थी। जब हम इस काल में आगे की ओर बढ़ते हैं तो गद्य की अपेक्षा पद्य पर अधिक जोर पाते हैं। कुछ टीका ग्रन्थ भी मिलते हैं। संस्कृत निःसन्देह गुप्त राजाओं की शासकीय भाषा थी। यों तो ब्राह्मण धर्म विषयक साहित्य की बहुतायत है, फिर भी इस काल में पहली बार धर्मनिरपेक्ष साहित्य की बहुत सी रचनाएँ पाई जाती हैं।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी

   गणित के क्षेत्र में इस काल का एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है आर्यभटीय। इसके रचियता आर्यभट्ट पाटलिपुत्र के रहने वाले थे। प्रतीत होता है कि गणित के ये विद्वान विविध प्रकार की गणना में पारंगत थे। इलाहाबाद जिले में मिले 448 ई. के एक गुप्त अभिलेख से लक्षित होता है कि ईसा की पाँचवीं सदी के आरम्भ में भारत में दाशमिक पद्धति ज्ञात थी। खगोलशास्त्र में रोमकसिद्धान्त नामक एक पुस्तक रची गई। इसके नाम से ही अनुमान किया जा सकता है कि इस पर यूनानी चिन्तनों का प्रभाव था।
   गुप्तकालीन शिल्पकारों ने अपना चमत्कार अपनी लौह और कांस्य कृतियों में दिखाया है। हम बुद्ध की नाना तरह की अनेकों कांस्यमूर्तियाँ जानते हैं, जिनका निर्माण बड़े पैमाने पर शुरू हो गया था, क्योंकि जब तक धातु के बारे में तकनीकी जानकारी उन्नत अवस्था में पहुँच गई थी। लोहे की वस्तुओं के बारे में सबसे अच्छा उदाहरण वह लौह-स्तम्भ है जो दिल्ली के पास महरौली में स्थित है। इसका निर्माण ईसा की चौथी सदी में हुआ और तबसे 15 सौ वर्षों के बीत जाने पर भी इसे जंग नहीं छू पाई है - जो शिल्पकार के तकनीकी के कौशल का महान प्रमाण-पत्र है। इस प्रकार का लौहस्तम्भ सौ बरस पहले पश्चिम के किसी भी ढलाई-घर में बनाना सम्भव नहीं है। दुख की बात है कि बाद के शिल्पकार इस ज्ञान को और आगे बढ़ा नहीं सके।