सत्यमेव जयते gideonhistory.com
भारत का मध्‍य एशिया से सम्‍पर्क
  लगभग 200 ई. पू. से जो काल आरम्भ होता है, उसमें मौर्य साम्राज्य जैसा कोई बड़ा साम्राज्य नहीं दिखाई देता है, पर उस काल का उत्कर्ष है मध्य एशिया और भारत के बीच घनिष्ठ और व्यापक सम्पर्कों को लेकर। पूर्वी भारत, मध्य भारत और दकन में मौर्यों के स्थान पर कई स्थानीय शासक सत्ता में आए, जैसे शुंग, कण्व ओर सातवाहन। पश्चिमोत्तर भारत में मौर्यों के स्थान पर मध्य एशिया से आकर जमे कई राजवंशों ने अपना आसन जमाया।

हिन्द यूनानी

  लगभग 200 ई. पू. से बार-बार हमले होने लगे। सर्वप्रथम यूनानियों ने हिन्दूकुश पार किया। वे उत्तर अफगानिस्तान के अन्तर्गत वक्षु (ओक्सस) नदी के दक्षिण बैक्ट्रिया में राज करते थे। आक्रमणकारी एक के बाद एक आते रहे, परन्तु उनमें से कुछ ने एक ही समय समानान्तर शासन किया। आक्रमण का एक महत्वपूर्ण कारण था सिल्यूकी साम्राज्य की कमजोरी। इस साम्राज्य की स्थापना बैक्ट्रिया में और ईरान से संलग्न पार्थिया नामक क्षेत्र में हुई थी। शकों के बढ़ते हुए दबाव के कारण परवर्ती यूनानी शासक इस क्षेत्र में अपनी सत्ता जमाए रखने में असमर्थ हो गए। उधर चीन में महादीवार के बन जाने से शक लोग चीन की सीमाओं से भगा दिए गए। इसलिए उन्होंने अपना मुँह पडोसी यूनानियों और पार्थियनों की ओर घुमाया। शकों से दबकर बैक्ट्रियाई यूनानी भारत पर चढ़ाई करने के लिए मजबूर हो गए। अशोक के उत्तराधिकारी इतने कमजोर ठहरे कि वे इस काल में आई बाहरी आक्रमणों की लहर को रोक नहीं सके।
   भारत पर आक्रमण सबसे पहले उन यूनानियों ने किए, जो हिन्द-यूनानी या बैक्ट्रियाई यूनानी कहलाते हैं। ईसा पूर्व दूसरी सदी के आरम्भ में हिन्द यूनानियों ने पश्चिमोत्तर भारत के एक विशाल क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। यह क्षेत्र सिकन्दर द्वारा जीते गए क्षेत्र से भी बड़ा था। कहा जाता है कि वे अयोध्या और पाटलिपुत्र तक चढ़ आए थे। परन्तु वे लोग भारत में मिलजुल कर शासन कायम नहीं कर सके। दो यूनानी राजवंशों ने एक ही समय में पश्चिमोत्तर भारत में सामानान्तर शासन किया। सब से अधिक विख्यात हिन्द यूनानी शासक हुआ मिनान्दर (165-145 ई. पू.)। वह मिलिन्द नाम से भी जाना जाता है। उसकी राजधानी पंजाब में शाकल (आधुनिक सियालकोट) में थी और उसने गंगा यमुना दोआब पर आक्रमण किया। उसे नागसेन ने बौद्ध धर्म की दीक्षा दी। नागार्जुन इस नागसेन का ही नामान्तर है। मिनान्दर ने नागसेन से बौद्ध धर्म पर अनेक प्रश्न पूछे। ये प्रश्न और नागसेन द्वारा दिये गये उनके उत्तर एक पुस्तक के रूप में संगृहीत हैं जिसका नाम है मिलिन्दपंहो अर्थात् मिलिन्द के प्रश्न।
   भारत के इतिहास में हिन्द-बैक्ट्रियाई शासन का महत्व इसलिए है कि यूनानी शासकों ने भारी संख्या में सिक्के जारी किए। हिन्द-यूनानी भारत के पहले शासक हुए जिनके जारी किए हुए सिक्कों के बारे में निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि सिक्के किन-किन राजाओं के हैं। पूर्व की आहत मुद्राओं के बारे में ऐसी बात नहीं है, उनका सम्बन्ध किसी राजवंशों से निश्चयपूर्वक जोड़ना सम्भव नहीं है। सबसे पहले भारत में हिन्द-यूनानियों ने ही सोने के सिक्के जारी किए, जिन की मात्रा कुषाणों के शासन में बढ़ी। हिन्द यूनानी शासकों ने भारत के पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त में यूनान की प्राचीन कला चलाई जिसे हेलेनिस्टिक आर्ट कहते हैं। यह कला सिकन्दर की मृत्यु के बाद विजित गैर-यूनानियों के साथ यूनानियों के सम्पर्क से उदित हुई थी। भारत में गन्धार कला इसका उत्तम उदाहरण है।

शक

   यूनानियों के बाद शक आए। यूनानियों ने भारत के जितने भाग पर कब्जा किया था उससे कहीं अधिक भाग पर शकों ने किया। शकों की पाँच शाखाएँ थीं और हर शाखा की राजधानी भारत और अफगानिस्तान में अलग-अलग भागों में थीं। शकों की एक शाखा अफगानिस्तान में बस गई। दूसरी शाखा पंजाब में बसी जिसकी राजधानी तक्षशिला हुई। तीसरी शाखा मथुरा में बसी, जहाँ उसने लगभग दो सदियों तक राज किया। चौथी शाखा ने अपनी सत्ता पश्चिम भारत में जमाई, जहाँ उसने ईसा की चौथी सदी के आरम्भ तक शासन किया। शकों की पाँचवीं शाखा ने ऊपरी दकन पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया।
   शकों को न तो भारत के शासकों का और न जनता का ही प्रतिरोध झेलना पड़ा। कहा जाता है कि लगभग 58 ई. पू. में उज्जैन में एक राजा हुआ। उसने शकों से युद्ध किया, उन्हें पराजित किया और अपने ही समय में उन्हें बाहर खदेड़ देने में सफल हो गया। वह अपने को विक्रमादित्य कहता था। विक्रम संवत् नाम का एक नया संवत् 57 ई. पू. में शकों पर विजय से आरम्भ हुआ। तब से विक्रमादित्य एक स्पृहणीय उपाधि हो गया, ऊँची प्रतिष्ठा और सत्ता का प्रतीक बन गया। जिस-किसी ने भी कोई महान पराक्रम किया उसने इस उपाधि को उसी तरह धारण कर लिया जिस तरह रोम के सम्राट अपनी अतुल शक्ति और पराक्रम जताने के लिए “सीजर” की उपाधि लगा लेते थे। इस प्रथा का परिणाम यह हुआ कि भारतीय इतिहास में विक्रमादित्यों की संख्या 14 तक पहुँच गई है। गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय सबसे अधिक विख्यात विक्रमादित्य था। भारतीय राजाओं को यह उपाधि इतनी भाई कि इसकी परम्परा, खासकर पश्चिमी भारत और पश्चिमी दकन में, ईसा की बारहवीं सदी तक चलती रही।
   यद्यपि शकों ने देश के कई भागों में अपना-अपना राज्य स्थापित किया, तथापि उनमें जिन्होंने पश्चिम में राज्य स्थापित किया, वे ही कुछ लम्बे अरसे तक यानी लगभग चार सदियों तक राज करते रहे। वे गुजरात में चल रहे समुद्री व्यापार से लाभान्वित हुए और भारी संख्या में चाँदी के सिक्के चलाए। सबसे अधिक विख्यात शक शासक रूद्रदामन् प्रथम (130-150 ई.) हुआ। उसका शासन न केवल सिन्ध में, बल्कि कोंकण, नर्मदा घाटी, मालवा, काठियावाड़ और गुजरात के एक बड़े भाग में भी था। वह इतिहास में इसलिए प्रसिद्ध है कि उसने कठियावाड़ के अर्धशुष्क क्षेत्र के मशहूर झील सुदर्शन सर का जीर्णोद्धार किया। यह झील बहुत पुराने समय मौर्य काल की है और दीर्घ काल से सिंचाई के काम में आती रही है।
   रूद्रदामन् संस्कृत का बड़ा प्रेमी था भारत में आकर बसा एक विदेशी होते हुए भी उसने ही सबसे पहले विशुद्ध संस्कृत भाषा में लम्बा अभिलेख जारी किया। पूर्व के जो भी लम्बे अभिलेख इस देश में पाए गए हैं, सभी प्राकृत भाषा में रचित हैं।

पार्थियाई या पह्लव

  पश्चिमोत्तर भारत में शकों के आधिपत्य के बाद पार्थियाई लोगों का आधिपत्य हुआ। प्राचीन भारत के अनेक संस्कृत ग्रन्थों में इन दोनों जनों के एक साथ उल्लेख शकपह्लव के रूप में मिलते हैं। वास्तव में ये दोनों कुछ समय इस देश में समानान्तर शासन करते रहे। पार्थियाई लोगों का मूल वासस्थान ईरान में था, जहाँ से वे भारत की ओर चले। यूनानियों और शकों के विपरीत, वे ईसा की पहली सदी में पश्चिमोत्तर भारत के एक छोटे से भाग पर ही सत्ता जमा सके। सबसे प्रसिद्ध पार्थियाई राजा हुआ गोन्दोफिर्नस। कहा जाता है कि उसके शासन काल में सेंट टामस ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए भारत आया था। अपने से पहले के शकों की तरह पार्थियाई लोग भी भारतीय राजतन्त्र के और समाज के अंग बन गए।

कुषाण

   पार्थियाइयों के बाद कुषाण आए, जो यूची और तोखारी भी कहलाते हैं। यूची नामक एक कबीला जो पाँच कुलों में बँट गया था, कुषाण उन्हीं में एक कुल के थे। वे उत्तरी मध्य एशिया के हरित मैदानों के खानाबदोश लोग थे और चीन के पड़ोस में रहते थे। कुषाणों ने पहले बैक्ट्रिया और उत्तरी अफगानिस्तान पर कब्जा किया और वहाँ से शकों को भगा दिया। धीरे-धीरे वे काबुल घाटी की ओर बढ़े और हिन्दूकुश पार करके गन्धार पर कब्जा किया और वहाँ यूनानियों और पार्थियाइयों को अपदस्त कर सत्ता जमाई। अन्ततः उन्होंने निम्न सिन्धु घाटी पर तथा गंगा मैदान के अधिकतर हिस्से पर भी अधिकार कर लिया। उनका साम्राज्य आम्दरिया (ओक्सस) से गंगा तक, मध्य एशिया के खुरासान से उत्तर प्रदेश के वाराणसी तक फैल गया। कुषाणों ने सोवियत गणरज्य में शामिल मध्य एशिया का अच्छा-खासा भाग, ईरान का एक हिस्सा, अफगानिस्तान का कुछ अंश, लगभग पूरा पाकिस्तान और लगभग समूचा उत्तर भारत, इन सारे भू-भागों को एक शासन के साये में कर दिया। इससे नाना प्रकार के लोगों और संस्कृतियों के आपस में घुल-मिल जाने का विलक्षण अवसर मिला और इस संमिलन की प्रक्रिया ने एक नए प्रकार की संस्कृति को जन्म दिया जो आज के पाँच देशों में फैली हुई हैं।
   हम कुषाणों के दो राजवंश पाते हैं जो एक के बाद एक आए। पहले राजवंश की स्थापना कडफिस नामक सरदारों के एक घराने ने की। उसका शासन 50 ई. से 28 वर्षो तक चला। इस में दो राजा हुए। पहला हुआ कडफिस प्रथम, जिसने हिन्दूकुश के दक्षिण में सिक्के चलाए। उसने रोमन सिक्कों की नकल करके ताँबे के सिक्का ढलवाये। दूसरा राजा हुआ, कडफिस द्वितीय। उसने बड़ी संख्या में स्वर्णमुदाएँ जारी कीं और अपना राज्य सिन्धु नदी के पूरब में फैलाया।
   कडफिस राजवंश के बाद कनिष्क राजवंश आया। इस वंश के राजाओं ने ऊपरी भारत और निम्न सिन्धु घाटी में अपना प्रभुत्व फैलाया। आरम्भिक कुषाणा राजाओं ने बड़ी संख्या में स्वर्ण मुदाएँ जारी कीं। उनकी स्वर्णमुदाएँ धातु की शुद्धता में गुप्त स्वर्णमुद्राओं से उत्कृष्ट हैं। उनकी स्वर्णमुद्राएँ तो मुख्यतः सिन्धु के पश्चिम में ही पाई गई हैं, पर उनके अभिलेख न केवल पश्चिमोत्तर भारत और सिन्धु में ही, बल्कि मथुरा, श्रावस्ती, कौशाम्बी और वाराणसी तक बिखरे मिले हैं। इससे सिद्ध होता है कि उन्होंने गंगा के मैदानों के अधिकतर भाग को अपने कब्जे में किया। मथुरा में जो कुषाण के सिक्के, अभिलेख, संरचनाएँ और मूर्तियाँ मिली हैं उनसे प्रकट होता है कि मथुरा भारत में कुषाणों की द्वितीय राजधानी थी। पहली राजधानी पुरूषपुर या पेशावर में थी, जहाँ कनिष्क ने एक मठ और एक विशाल स्तूप का निर्माण कराया। इस स्तूप को देखकर विदेशी यात्री चकित रह जाते हैं।
   कनिष्क सर्वाधिक विख्यात कुषाण शासक था। यद्यपि लगता है कि उसे भारत की सीमाओं के बाहर चीनियों से हार खानी पड़ी, लेकिन इतिहास में दो कारणों से उसका नाम है। पहला, उसने 78 ई. में एक संवत् चलाया जो शक संवत् कहलाता है और भारत सरकार द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। दूसरा, उसने बौद्ध धर्म का मुक्त हृदय से सम्पोषण-संरक्षण किया। उसने कश्मीर में बौद्धों का एक सम्मेलन आयोजित किया जिसमें बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय को अन्तिम रूप दिया गया। कनिष्क कला और संस्कृत साहित्य का भी महान् संरक्षक था।
   कनिष्क के उत्तराधिकारी लोग पश्चिमोत्तर भारत पर लगभग 230 ई. तक राज करते रहे और उनमें कुछ ने तो शुद्ध भारतीय नाम धारण कर लिए, जैसे वासुदेव।
   ईरान में उठ खड़ी हुई सासानी शक्ति ने ईसा की तीसरी सदी के मध्य में अफगानिस्तान और सिन्धु के पश्चिम के क्षेत्र कुषाण साम्राज्य से छीन कर अपने कब्जे में कर लिए, पर भारत में कुषाणों के रजवाड़े लगभग सौ वर्षों तक बने रहे। लगता है कि कुषाणों का अधिकार काबुल घाटी, कपिशा, बैक्ट्रिया, ख्वारिज्म और सोग्दियाना (अर्थात् बोखारा और समरकन्द) में ईसा की तीसरी-चौथी सदी में भी कायम रहा। इन क्षेत्रों में अनेक कुषाण मुद्राएँ, अभिलेख और मृन्मूतिकाएँ पाई गई हैं। खासकर ख्वारिज्म के टोपरक-काला नामक स्थान में एक विशाल कुषाण प्रासाद खुदाई में निकला है जो तीसरी-चौथी सदियों का है। इसमें एक प्रशासनिक अभिलेखागार था जहाँ आरामाइक लिपि और ख्वारिज्मी भाषा में लिखे पुरालेख और दस्तावेज रखे हुए थे।
मध्य एशिया से सम्पर्कों के प्रभाव

भवन और मृद्भांड

   शक-कुषाण अवस्था में भवन-निर्माण के कार्यों में उल्लेखनीय प्रगति हुई। उत्खननों में संरचना के कई स्तर मिले हैं। उत्तर भारत के विविध स्थलों पर तो कभी-कभी आधे दर्जन से भी अधिक स्तर हैं। इनमें पकी इंर्टों का प्रयोग फर्श बनाने में किया गया है, खपरों (टाइलों) का प्रयोग फर्श और छत दोनों में किया गया है। लेकिन सुर्खी और खपरा शायद बाहर से अपनाई गई वस्तु नहीं थे। इस काल की एक विशेषता ईंटों के कुओं का निर्माण भी है। इसका अपना खास मृद्भांड है लाल बर्तन, जो सादा भी है और पालिशदार भी और बनावट में मध्यम से उत्तम तक। असाधारण बर्तन है फुहारों और टोंटियों वाले पात्र। इन बर्तनों में सोवियत मध्य एशिया में इसी काल के कुषाण स्तरों में पाए गए सूक्षम बनावट वाले मृद्भांडों से समानता है। इस प्रकार के लाल पालिशदार मृदभांड बनाने की कला मध्य एशिया में सुविदित थी और ऐसे मृद्भांड फरगाना जैसे क्षेत्रों में भी मिलते हैं जो क्षेत्र कुषाण सांस्कृतिक अंचल के भीतर पड़ते हैं।

उत्कृष्ट अश्वारोही सेना

   शकों और कुषाणों ने भारतीय संस्कृति में नए-नए उपादान जोड़कर इसे अपार समृद्ध बनाया। वे सदा के लिए भारतवासी हो गए और अपने को भारतीय संस्कृति की धारा में पूर्णतः लीन कर दिया। उनके अपने पास लिपि, लिखित भाषा और कोई सुव्यवस्थित धर्म नहीं थे, इसलिए उन्होंने संस्कृति के इन उपादानों को भारत से लिया। वे भारतीय समाज के अभिन्न अंग हो गए और इस समाज को उन्होंने बहुत कुछ दिया। उन्होंने बड़े पैमाने पर उत्तम अश्वारोही सेना और अश्वारोहण की परम्परा चलाई। उन्होंने लगाम और जीन का प्रयोग प्रचलित किया, जो हमें ईसा की दूसरी और तीसरी सदियों की बौद्ध मूर्तियों में दिखाई देते हैं। शक और कुषाण विलक्षण अश्वारोही थे। अफगानिस्तान के बोगराम में जो कुषाण काल की मिट्टी की पकी घुड़सवार की मूर्तिकाएँ मिली हैं उन से घुड़सवारी में उनकी गहरी दिलचस्पी जाहिर होती है। इन विदेशी घुड़सवारों में कई सुदृढ़ कवच लगाए भालों और बर्छियों से लड़ाई करते दिखाए गए हैं। वे रस्सी का बना एक प्रकार का अंगूठा-रकाब भी लगाते थे जिससे उन्हें चाल में सुविधा होती थी। शकों और कुषाणों ने पगड़ी, ट्यूनिक (कुरती), पाजामा और भारी लम्बे कोट चलाए। आज भी अफगान और पंजाबी लोग पगड़ी लगाते हैं और शेरवानी लम्बे कोट का ही बदला रूप है। मध्य एशिया वालों ने यहाँ टोपी, शिरस्त्राण और बूट चलाए जिनका इस्तेमाल योद्धा लोग करते थे। इन्हीं श्रेष्ठताओं की बदौलत उन्होंने ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत में अपने विरोधियों का सफाया किया। बाद में जब यह सैनिक कौशल देश में फैल गया तब अधीनस्थ राजाओं ने अपने पिछले विजेताओं के विरूद्ध इसका अच्छा इस्तेमाल किया।

व्यापार

   विदेशियों के आने से मध्य एशिया और भारत के बीच घने सम्पर्क स्थापित हुए। परिणामस्वरूप भारत को मध्य एशिया के अल्ताई पहाड़ों से भारी मात्रा में सोना प्राप्त हुआ। भारत को रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार के जरिए भी सोना मिला होगा। कुषाणों ने रेशम के उस प्रख्यात मार्ग पर नियन्त्रण कर लिया जो चीन से चलकर कुषाण साम्राज्य में शामिल मध्य एशिया और अफगानिस्तान से गुजरते हुए ईरन जाता था और पूर्वी भूमध्यसागरीय अंचल में रोमन साम्राज्य के अन्तर्गत पश्चिम एशिया जाता था। यह रेशम मार्ग कुषाण का एक बड़ा आय-स्रोत था और वे इस मार्ग पर व्यापारियों से उगाही गई चुंगी की बदौलत ही एक विशाल और समृद्ध साम्राज्य स्थापित कर सके। यह उल्लेखनीय है कि भारत में बड़े पैमाने पर सोने का सिक्का चलाने वाले प्रथम शासक कुषाण ही थे।

राज्य व्यवस्था

   मध्य एशियाई विजेताओं ने अनगिनत छोटे-छोटे देशी राजाओं पर अपना शासन भार लाद दिया। इससे एक प्रकार की सामन्ती व्यवस्था उदित हुई। कुषाण राजाओं ने महाराजाधिराज की गौरवपूर्ण उपाधि धारण की जिसका आशय यह निकलता था कि वे अनेकानेक छोटे-छोटे राजाओं के राजा हैं।
   शकों और कुषाणों ने इस भावना को उछाला कि राजा देवता का अवतार होता है। कुषाण राजा देवपुत्र कहलाते थे। यह उपाधि कुषाणों ने चीनियों से ली, जो अपने राजा को स्वर्ग का पुत्र कहते थे। भारत में इसका प्रयोग स्वभावतः राजसत्ता को मान्यता प्रदान कराने के लिए किया गया होगा। हिन्दू स्मृतिकार मनु ने कहा है कि राजा बच्चा ही क्यों न हो उसका आदर करना चाहिए, क्योंकि वह मानव रूप धारण करके शासन करने वाला देवता होता है।
   कुषाणों ने राज्य-शासन में क्षत्रप प्रणाली चलाई। साम्राज्य अनेक क्षत्रपियों (उपराज्यों) में बाँट दिया गया और हरेक क्षत्रपी एक-एक क्षत्रप के शासन में छोड़ दिया गया। कुछ अनोखी प्रथाएँ भी चालू की गईं, जैसे दो आनुवंशिक राजाओं का संयुक्त शासन, एक ही समय में एक ही राज्य पर दो राजाओं का शासन, आदि। हम पिता और पुत्र दोनों को एक ही समय संयुक्त रूप से शासन करते पाते हैं। इस प्रकार प्रतीत होता है कि इन शासकों के अधीन केन्द्रीकरण कम था।
   यूनानियों ने सेनानी-शासन (मिलिटरी गवर्नरशिप) की परिपाटी भी चलाई। वे इसके लिए शासक सेनानियों की नियुक्ति करते थे जो यूनानी भाषा में स्त्रातिगोस कहलाते थे। शासक सेनानियों की आवश्यकता विजित प्रजा पर नए राजाओं का प्रभाव जमाने के लिए होती थी।

भारतीय समाज में नए तत्व

  यूनानी, शक, पार्थियन और कुषाण सभी भारत में अपनी-अपनी पहचान अन्ततः खो बैठे। शनैः शनैः वे पूरे भारतीय बन गए। चूँकि उनमें अधिकतर विजेता के रूप में आए इसलिए वे भारतीय समाज में योद्धाओं के वर्ग में अर्थात् क्षत्रिय वर्ग में समाविष्ट हुए। हिन्दू समाज में उनके प्रवेश की व्याख्या एक अद्भुत ढंग से की गई है। स्मृतिकार मनु ने कहा है कि अपने कर्तव्यों से च्युत हुए अधम क्षत्रिय ही शक और पार्थिव हुए। दूसरे शब्दों में, उन्हें द्वितीय श्रेणी के क्षत्रिय का स्थान मिला। भारतीय समाज में विदेशियों का आत्मसात्करण जितना अधिक मौर्योत्तर काल में हुआ उतना प्राचीन भारत के इतिहास में और किसी भी काल में नहीं हुआ।

धार्मिक विकास

   कई विदेशी शासक वैष्णव सम्प्रदाय में आ गए, अर्थात् जगत का पालन करने वाले विष्णु के उपासक बन गए। यूनानी राजदूत हिलियोदोरस ने मध्य प्रदेश स्थित विदिशा (आज के विदिशा जिले का मुख्यालय) में ईसा-पूर्व लगभग दूसरी सदी के मध्य में विष्णु की आराधाना के लिए स्तम्भ बनवाया।
   कुछ अन्य शासकों ने बौद्ध धर्म को अपनाया प्रख्यात यूनानी राजा मिनान्दर बौद्ध हो गया। बौद्धाचार्य नागसेन उर्फ नागार्जुन के साथ हुआ उसका प्रश्नोत्तर मौर्यात्तर काल के बौद्धिक इतिहास का एक अच्छा स्रोत है। कुषाण शासक शिव और बुद्ध दोनों के उपासक थे और तदनुसार कुषाण मुद्राओं पर हम इन दोनों देवताओं के चित्र पाते हैं। कई कुषाण शासक वैष्णव हो गए। इस कोटि में निश्चित रूप से कुषाण शासक वासुदेव आता है जिसका नाम ही विष्णु के अवतार कृष्ण का पर्यायवाची है।

बौद्ध महायान सम्प्रदाय का उद्भव

  मौर्योंत्तर काल में भारतीय धर्म में बहुत परिवर्तन हुए। इसके दो प्रमुख कारण थे - व्यापारियों और शिल्पियों के कार्यकलाप में असाधारण तेजी का आना और मध्य एशिया से भारी संख्या में नए-नए लोगों का आना। इसका विशेष प्रभाव बौद्ध धर्म पर पड़ा। नगरों में व्यापारियों और शिल्पियों का जमाव बढ़ता गया और बौद्ध भिक्षु एवं भिक्षुणियाँ उन व्यापारियों और शिल्पियों से नकद दान लेने का लोभ दबा नहीं पाए। इसीलिए तो आन्ध्र प्रदेश के नागार्जुन कोंडा के मठ-क्षेत्रों में भारी मात्रा में सिक्के मिले हैं। और बौद्धों ने उन विदेशियों का भी स्वागत किया जो माँस खाते थे। इन सबों का अर्थ यह हुआ कि तपस्वी की तरह जीने वाले भिक्षुओं और भिक्षुणियों के दैनिक जीवन के नियमों में ढिलाई आई। अब वे सोना-चाँदी छूने लगे, माँस खाने लगे और उत्तम कपड़े पहनने लगे। अनुशासन इतना शिथिल हो गया कि कुछ भिक्षु संघ को छोड़कर गृहस्थ जीवन में लौट आए। बौद्ध धर्म का यह नया रूप महायान कहलाने लगा। अपने पुराने प्यूरिटन रूप में, बौद्ध धर्म में बुद्ध से संबंधित कुछ वस्तुओं की उनके प्रतीक रूप में पूजा की जाती थी। ईस्वी सन् के आरम्भ से उन वस्तुओं की जगह बुद्ध की प्रतिमा आ गई। बौद्ध धर्म में मूर्ति-पूजा का आरम्भ होने से मूर्तिपूजा हिन्दुओं में भी खूब चल पड़ी। महायान का उदय होने पर बौद्ध धर्म का पुराना प्यूरिटन सम्प्रदाय हीनयान कहलाने लगा।
   सौभाग्यवश कनिष्क महायान का महान् संरक्षक हो गया। उसने कश्मीर में बौद्धों की एक परिषद् आयोजित की। पार्षदों ने 3,00,000 शब्दों में एक ग्रन्थ की रचना की जिसमें तीनों पिटकों या बौद्ध साहित्य की पिटारियों की पूरी तरह व्याख्या की गई। कनिष्क ने इस ग्रन्थ को लाल ताम्रपत्रों पर खुदवाया, उन ताम्रपत्रों को एक प्रस्तर-पात्र में रखा और उसके ऊपर एक स्तूप बनवा दिया। यदि यह प्राचीन कथा सही हो तो ताम्रपत्रों सहित इस स्तूप का पता चलने पर बौद्ध धर्मग्रन्थ और सिद्धान्तों पर नया प्रकाश पड़ सकता है। कनिष्क ने बुद्ध के स्मारक स्वरूप और भी अनेक स्तूप खड़े किए।

कला की गान्धार और मथुरा शैली

  विदेशी राजा भारतीय कला और साहित्य के उत्साही संरक्षक हो गए और उन्होंने वही उमंग दिखाई जो नया धर्म अपनाने वालों में होती है। कुषाण साम्राज्य ने विभिन्न शैलियों और देशों में प्रशिक्षित राजमिस्त्रियों और अन्य कारीगरों को इकट्ठा किया। इस से कला की कई नई शैलियाँ विकसित हुईं, जैसे गान्धार और मथुरा शैली। मध्य एशिया से जो मूर्तिशिल्प की कृतियाँ प्राप्त हुई हैं उनमें बौद्ध धर्म के प्रभाव की छाया में स्थानीय और भारतीय दोनों लक्षण पाए जाते हैं।
   भारतीय शिल्पकारों का, विशेषकर भारत के पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त गन्धार में, मध्य एशियाई, यूनानी और रोमन शिल्पिकारों के साथ सम्पर्क हुआ। इससे एक नई शैली की कला का उदय हुआ, जिसमें बुद्ध की प्रतिमाएँ यूनान और रोम की मिश्रित शैली में बनाई गईं। बुद्ध के बाल यूनान-रोम शैली में आ गए।
   गान्धार कला का प्रभाव मथुरा में भी पहुँचा, हालाँकि वह मूलतः देशी कला का केन्द्र था। मथुरा में बुद्ध की विलक्षण प्रतिमाएँ बनीं, परन्तु इसकी ख्याति कनिष्क की शिरोहीन खड़ी विख्यात मूर्ति को लेकर भी है, जिसके निचले भाग में कनिष्क का नाम खुदा है। यहाँ वर्धमान महावीर की भी कई प्रस्तरमूर्तियाँ बनीं। इसकी गुप्त-पूर्व मूर्तियों और अभिलेखों में कृष्ण उपेक्षित हैं, जबकि मथुरा इनका जन्म स्थान और बाल-लीला-भूमि मानी जाती है। कला की मथुरा शैली ईसा सन् की आरम्भिक सदियों में विकसित हुई, और लाल बलुआ पत्थर की इसकी कृतियाँ मथुरा के बाहर भी पाई जाती हैं। सम्प्रति मथुरा संग्रहालय में कुषाण कालीन मूर्तियों का भारत भर में सबसे अधिक संग्रह है।
   इसी काल में विन्ध्य से दक्षिण अनेक स्थानों में सुन्दर-सुन्दर कलाकृतियाँ पाई जाती हैं। महाराष्ट्र में चट्टानों को काट-काट कर सुन्दर-सुन्दर बौद्ध गुफाएँ बनाई गईं। आन्ध प्रदेश में, नागार्जुनकोण्डा और अमरावती बौद्ध कला के महान् केन्द्र हो गए, जहाँ बुद्ध के जीवन की कथाएँ अनगिनत पट्टों पर चित्रित की गई हैं। बौद्ध धर्म से संबंधित सबसे पुराने पट्टचित्र गया, साँची और भरहुत में पाए जाते हैं, जो ईसा-पूर्व दूसरी सदी के हैं। परन्तु हम मूर्तिकला का और भी विकास ईस्वी सन् की आरम्भिक सदियों में पाते हैं।

साहित्य और विद्या

   विदेशी राजाओं ने संस्कृत-साहित्य का संरक्षण-सम्पोषण किया। काव्य-शैली का पहला नमूना रूद्रदामन् का काठियावाड़ अभिलेख है जिसका समय लगभग 150 ई. है। इसके बाद से अभिलेख प्रांजल संस्कृत भाषा में लिखे जाने लगे हैं। फिर भी अभिलेखों की रचना प्राकृत भाषा में करने की परिपाटी ईसा की चौथी सदी या उसके आगे तक चलती रही।
   लगता है कि अश्वघोष जैसे कुछ महान् साहित्यकारों को कुषाणों का सम्पोषण प्राप्त था। अश्वघोष ने बुद्ध की जीवनी बुद्धचरित के नाम से लिखी। उसने सौन्दरनन्द नामक काव्य भी लिखा जो संस्कृत काव्य का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
   महायान बौद्ध सम्प्रदाय की प्रगति के फलस्वरूप अनगिनत अवदानों की रचना हुई। कई अवदान बौद्धों की मिश्रित संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं। अवदानों का अन्यतम उद्देश्य लोगों को महायान के उपदेशों से अवगत कराना है। इस कोटि की प्रमुख कृतियाँ हैं - महावस्तु और दिव्यावदान।
   विदेशियों ने परदे का प्रचलन आरम्भ कर भारतीय नाट्यकला के विकास में भी योगदान दिया। चूँकि परदा यूनानियों की देन था इसलिए वह यवनिका के नाम से विदित हुआ। यवनिका शब्द यवन शब्द से बना है, जो यूनानी शब्द आयोजियन (यूनानियों की एक शाखा जिससे प्राचीन भारत के लोग परिचित थे) का संस्कृत प्रतिरूप है। आरम्भ में यवन शब्द का प्रयोग यूनान के निवासियों के अर्थ में होता था, पर बाद में सभी प्रकार के विदेशियों के लिए इस शब्द का प्रयोग होने लगा।
   धार्मिकेतर साहित्य का सबसे अच्छा उदाहरण है - वात्स्यायन का कामसूत्र। इसका काल ईसा की तीसरी सदी माना जाता है। यह रतिशास्त्र या कामशास्त्र की प्राचीनतम पुस्तक है जिसमें रति और प्रीति का विवेचन किया गया है। इसमें एक नगरक या नगरजीवी पुरूष का जीवन चित्रित किया गया है, जो नगर जीवन के विकास-काल में रहा हो।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी

   मौर्योत्तर काल में यूनानियों के सम्पर्क से खगोल और ज्योतिष शास्त्र में खूब उन्नति हुई। संस्कृत ग्रन्थों में हमें ग्रह-नक्षत्रों के संचार संबंधी बहुत सारे यूनानी शब्द मिलते हैं। भारतीय ज्योतिष यूनानी चिन्तनों से प्रभावित हुआ। यूनानी होरोस्कोप शब्द संस्कृत में होराशास्त्र हो गया जिसका अर्थ संस्कृत में फलित ज्योतिषशास्त्र होता है। यूनान के सिक्के, जो आकृति में और छाप में उत्कृष्ट हैं, वस्तुतः आहत् मुद्राओं के ही सुधरे रूप हैं। यूनानी शब्द द्रक्म (Drachm) भारत में द्रम्भ हो गया। बदले में, यूनानी शासकों ने ब्राह्मीलिपि चलाई और अपने सिक्कों पर कई भारतीय मोटिफ (रूपांक) चलाए। कुत्ते, मवेशी, मसाले और हाथी दाँत की वस्तुएँ यूनानी लोग यहाँ से बाहर भेजते थे। उन्होंने भारत से कोई दस्तकारी सीखी या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है।
   फिर भी भारतीयों ने यूनानियों से चिकित्साशास्त्र, वनस्पतिशास्त्र और रसायनशास्त्र में कोई महत्वपूर्ण चीज नहीं प्राप्त की। इन तीनों शास्त्रों का विवेचन चरक और सुश्रुत ने किया है। चरकसंहिता में उन अनगिनत वनस्पतियों के नाम है जिनसे रोग की चिकित्सा के लिए दवाएँ बनाई जाती थीं। पौधों को कूटने और मिश्रित करने की जो प्रक्रियाएँ बतलाई गई हैं उनसे हमें मालूम होता है कि प्राचीन भारत में रसायनशास्त्र का ज्ञान काफी विकसित था। रोगों के इलाज में प्राचीन भारतीय वैद्य लोग मुख्यतः पौधों पर ही निर्भर थे, जिन्हें संस्कृत में औषधि कहते हैं और इससे बनी दवा औषध कहलाती है।
   प्रौद्योगिकी अर्थात् टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी लगता है भारतीयों का मध्य एशियाई लोगों के सम्पर्क से लाभ हुआ है। कनिष्क को पतलून और लम्बे जूतों में चित्रित किया गया है। चेमड़े के जूते बनाने का प्रचलन भारत में सम्भवतः इसी काल में आरम्भ हुआ। भारत में चले ताँबे के कुषाण कालीन सिक्के रोमन सिक्कों की नकल थे। इसी तरह भारत में कुषाणों ने जो सोने के सिक्के ढलवाए वे रोमन स्वर्णमुद्राओं की नकल थे। जानकारी मिलती है कि भारतीय और रोमन राजाओं की बीच दो राजदूतों का आदान-प्रदान हुआ था। सनृ 27-28 ई. में रोमन सम्राट ऑगस्टस और सन् 110-120 ई. में रोमन सम्राट ट्राजन के दरबार में भारत से राजदूत भेजे गए थे। इस प्रकार भारत के साथ रोम के सम्पर्क से प्रौद्योगिकी में नए-नए तरीके विकसित हुए होंगे। इस काल में शीशे के काम पर विदेशी विचारों और तरीकों का विशेष रूप से प्रभाव पड़ा। प्राचीन भारत में किसी भी अन्य काल में शीशे के काम में ऐसी प्रगति नहीं हुई जैसी इस काल में।