सत्यमेव जयते gideonhistory.com
मध्‍यकालीन भारत की विरासत
   आठवीं शताब्दी के आरंभ से 17वीं शताब्दी के अंत तक के हजार वर्षों के काल में देश के राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए और कुछ हद तक सामाजिक जीवन पद्धतियों में भी बदलाव आया।
   जाति प्रथा के समक्ष इस्लाम की ओर से उपस्थित जबरदस्त चुनौती और वर्णाश्रम धर्म की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध राजपूत शासकों की राजनीतिक शक्ति के अवसान के बावजूद सामाजिक जीवन में इस प्रथा का वर्चस्व कायम रहा। नाथपंथी योगियों और भक्त संतों ने जाति प्रथा की तीव्र आलोचना की, परन्तु वे उसको कहीं से कमजोर नहीं कर पाए। कालांतर से एक प्रकार के मूक समझौते की स्थिति उत्पन्न हो गई। अब कुछ खास अपवादों को छोड़कर संतों ने रोजमर्रा के जीवन या लौकिक जीवन के संदर्भ में जाति प्रथा की आलोचना करना छोड़ दिया और उधर ब्राह्मणों ने संतों द्वारा सभी जातियों के लिए विशेष रूप से शूद्रों के लिए मोक्ष के मार्ग के रूप में भक्ति की हिमायत को अनुमोदन की दृष्टि से देखना आरंभ कर दिया। तथापि ब्राह्मण अपने लिए विशेष स्थिति का दावा करते रहे और इस स्थिति में धर्मोपदेश करने और शिक्षा देने के अधिकार का भी समावेश था।
   जातीय व्यवस्था के अंदर ही नई जातियों और उपजातियों का उदय हुआ। यह कुछ तो हिंदू धर्म में कबायिली समूहों के समाहार का परिणाम था और कुछ नए व्यवसायिक समूहों के विकास का। इसके अलावा स्थानीय और क्षेत्रीय भावनाओं से भी नई जातियों-उपजातियों का जन्म हुआ। साथ ही उन जातियों की वर्णगत स्थिति में उनकी आर्थिक तथा राजनीतिक शक्ति के अनुसार उतार-चढ़ाव आते रहे। इस संदर्भ में राजपूतों, मराठों और खत्रियों का उल्लेख किया जा सकता है।
   भक्त और सूफी संतों ने धीरे-धीरे हिन्दू धर्म तथा इस्लाम के मूलभूत सिद्धांतों की बेहतर समझ पैदा की और यह दर्शाया कि दोनों में काफी कुछ समानता है। इससे पारस्परिक सद्भावना और सहिष्णुता की भावना की अभिवृद्धि हुई, यद्यपि संकीर्ण और असहिष्णु दृष्टिकोण की हिमायत करने वाली ताकतों के पैर मजबूती से जमे रहे और कभी-कभी उन्होंने राज्य की नीतियों को भी प्रभावित किया। लेकिन कुल मिलाकर ऐसे अवसर कम ही आए।
   धर्म विषयक औपचारिक विधि-विधानों की अपेक्षा उसके आस्था पक्ष पर जोर देकर भक्त तथा सूफी संतों ने धर्म के प्रति लोगों के दृष्टिकोण में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन संपादित किया। उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं और साहित्य के विकास में भी योगदान दिया। परन्तु जीवन के धार्मिक तथा आध्यात्मिक पक्षों के प्रति आत्यंतिक लगाव के कारण तर्क और बुद्धि पर आधारित ज्ञान की अभिवृद्धि में, खास तौर से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास में बाधा पड़ी।
   कुल मिलाकर स्त्रियों की अवस्था में गिरावट आई। पर्दा-प्रथा अधिक व्यापक हुई। हिंदू स्त्रियाँ मुसलमान स्त्रियों की तरह पुनर्विवाह या पिता की संपत्ति में हिस्से का दावा नहीं कर सकती थीं। बल्कि सच तो यह है कि इन अधिकारों से मुसलमान स्त्रियाँ भी अधिकाधिक वंचित ही होती चली गईं।
   जहाँ तक राजनीतिक तथा आर्थिक क्षेत्रों का संबंध है, इस काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना यह थी कि तुर्कां ने देश का प्रशासनिक और राजनीतिक एकीकरण संपादित किया और बाद में मुगलों ने उसे पुख्ता बनाया। यद्यपि तुर्क तथा मुगल शासन प्रणाली मुख्य रूप से उत्‍तरी भारत तक सीमित रही तथापि उसने अप्रत्यक्ष रूप से देश के दूसरे भागों को भी प्रभावित किया। चाँदी के अच्छे ढले सिक्कों के प्रचलन, सड़कों और सरायों के विकास तथा नागरिक जीवन के प्रति अधिक लगाव का सीधा प्रभाव व्यापार और हस्तशिल्पों के विकास पर पड़ा और व्यापार तथा हस्तकलायें सत्रहवीं सदी में अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गई। मुगलों के अधीन राजनीतिक एकीकरण के साथ ही एक एकीकृत शासक वर्ग की सृष्टि करने का भी प्रयत्न किया गया जिसमें हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल थे। परन्तु यह शासक वर्ग मुख्य रूप से कुलीनवर्गीय बना रहा और निचले वर्गों के प्रतिभाशाली लोगों का इसमें बहुत कम प्रवेश हो पाया। मुगल सरदारों का वर्ग राजा पर निर्भर नौकरशाही के रूप में संगठित था। तथापि इसकी आय का मुख्य जरिया भूमि थी जिस पर भूस्वामी किसान खेती करते थे। किसानों से भू-राजस्व की उगाही के लिए सरदार लोग कुछ तो अपनी-अपनी सैनिक टुकड़ियों पर निर्भर थे और कुछ जमींदारों की शक्ति पर। भूराजस्व की उगाही में जमींदारों से मिलने वाले समर्थन के बदले राज्य उनके अधिकारों तथा विशेषाधिकारों को सुरक्षा प्रदान करता था। इसीलिए बहुत से इतिहासकार कहते हैं कि मध्यकालीन भारत में राज्य तत्वतः सामंती बना रहा।
   तुर्कों का एक महत्वपूर्ण योगदान यह था कि तेरहवीं और चौदहवीं सदियों में उन्होंने मंगोल हमलों से भारत की रक्षा की। बाद में 200 वर्षों तक मुगलों ने भारत की उत्‍तर-पश्चिम सीमा को विदेशी आक्रमणों से सुरक्षित रखा। इस उद्देश्य से वे मध्य और पश्चिम एशिया की राजनीति पर बराबर नजर रखते रहे और कभी-कभी उन्होंने उसमें सक्रिय भूमिका भी निभाई।
   भारत मसालों के देश के रूप में प्रसिद्ध था एवं पूर्व अफ्रीका सहित पूर्वी दुनिया का कपड़ों का कारखाना माना जाता था। इन कारणों से यूरोपीय राष्ट्रों ने उसके साथ सीधा व्यापारिक संबंध स्थापित करने की कोशिश की। व्यापार की समृद्धि ने यूरोपीय राष्ट्रों की धन की भूख को और तेज कर दिया और साथ ही उनके आर्थिक एवं प्रौद्योगिकीय विकास को उत्‍तेजन दिया। चूँकि उसके पास मध्य और दक्षिण अफ्रीका से प्राप्त सोने और चाँदी के अलावा ऐसा कोई माल नहीं था जिसकी पूर्वी दुनिया को उसके बदले में दे सकें, इसलिए अपनी-अपनी सरकारों के समर्थन से यूरोपीय व्यापारियों ने भारत के आंतरिक व्यापार में प्रवेश करने की कोशिश की। कई अवसरों पर उन्होंने भारतीय प्रदेशों पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयत्न भी किया ताकि उनसे होने वाली आमदनी से वे भारतीय माल खरीद सकें। जब तक मुगल साम्राज्य शक्तिशाली रहा, उनका यह उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। परन्तु मुगल साम्राज्य के पतन और नादिरशाह तथा बाद में अफगानों के भारत में प्रवेश जैसी राजनीतिक घटनाओं के फलस्वरूप और साथ ही अपने तीव्र आर्थिक विकास के कारण यूरोपीय राष्ट्र भारत में तथा कई अन्य एशियाई देशों में अपना प्रभुत्व स्थापित करने में कामयाब हो गए।
   इतिहासकारों ने मुगल साम्राज्य के पतन और अवसान के कारण बताने की कोशिश तो की है, परन्तु बहुत से अन्य एशियाई राष्ट्रों के साथ-साथ भारत आर्थिक और वैज्ञानिक क्षेत्रों में यूरोपीय राष्ट्रों की तरह तेजी से विकास क्यों नहीं कर सका, इसके कारणों के और भी विशद अध्ययन और छानबीन की जरूरत है। तुर्क और मुगल शासक वर्गों की समुद्र से संबंध की कोई परम्परा नहीं थी। मुगलों को विदेश व्यापार के महत्व की प्रतीति तो शीघ्र ही हो गई और इसलिए उन्होंने यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों को संरक्षण और समर्थन भी दिया, परन्तु राष्ट्र के आर्थिक विकास में नौसैनिक शक्ति की अहमियत की समझ उसमें नहीं थी।
   भारत का नौसैनिक क्षेत्र में पिछड़ा होना विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उसके पिछड़ेपन का सूचक था। जिस यांत्रिक घड़ी के कारण गतिकी के क्षेत्र में तमाम यूरोपीय आविष्कारों का समायोजन संभव हो सका वह भी सत्रहवीं सदी तक भारत में नहीं बनाई जाती थी। तोपखाने के क्षेत्र में तो यूरोपीयों की श्रेष्ठता भारतीय बेझिझक स्वीकार करते थे। जहाज-निर्माण जैसे जिस क्षेत्रों में भारतीय शिल्पी यूरोपीयों के कौशल की नकल करने में अच्छी कामयाबी दिखा रहे थे उन क्षेत्रों में भी उन्होंने किसी प्रकार की मौलिक उद्भावना की प्रवृत्ति का कोई परिचय नहीं दिया। इस संदर्भ में शासक वर्ग के रवैये, जिसका जिक्र हम ऊपर कर चुके हैं, के अलावा सामाजिक संरचना, ऐतिहासिक परंपराओं और विभिन्न वर्गों के दृष्टिकोणों का अपना महत्व था। अतीत में अर्जित ज्ञान के अध्ययन पर जरूरत से ज्यादा जोर दिया जाता था। ब्राह्मणों और मुल्लाओं को ज्ञान का धारीदार माना जाता था और जो कुछ वे सिखाते-पढ़ाते थे उसे लोग श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे। अकबर ने लौकिक अभिरूचि के आर्थिक वैज्ञानिक विषयों का समावेश करके पाठ्यक्रम का आधुनिकीकरण करने की कोशिश की, लेकिन इन्हीं लोगों के दबाव के कारण उसकी कोशिशें नाकाम हो गई। विडंबना यह थी कि भारतीय कारीगरों का कौशल और बड़ी संख्या में उनकी उपलब्धता यांत्रिकी शक्ति के विकास और उत्पादक उद्यमों में उसके प्रयोग के प्रयत्न के मार्ग में बाधक सिद्ध हुई। परन्तु अपने को दुनिया से काटकर रखने की संकीर्ण वृत्ति तथा रूढ़िवादिता को बढ़ावा देने में जाति प्रथा का प्रभाव आज भी एक विवाद का विषय बना हुआ है।
   इस प्रकार भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दुनिया से पिछड़ गया और इस स्थिति की ओर से मुगल शासक वर्ग की आँखें बिल्कुल बंद रहीं। राजनीतिक एकीकरण क विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक समाहार भी होता रहा। भारतीय समाज दुनिया के उन चंद समाजों में से था जिन्होंने नस्ल, धर्म और भाषा की विविधता के बावजूद न्यूनाधिक एकीकृत संस्कृति का विकास किया। इस एकीकृत संस्कृति की अभिव्यक्ति रचनात्मक प्रवृत्ति के उद्दाम विस्फोट के रूप में हुई जिसके कारण सत्रहवीं सदी भारतीय इतिहास का दूसरा स्वर्ण युग बन गई है। दक्षिण में चोलों की परंपराओं का पोषण वियजनगर राज्य ने किया। बहमनी राज्य तथा उसके भग्नावशेष पर उदित होने वाले राज्यों ने भी विभिन्न क्षेत्रों में संस्कृति के विकास में योगदान दिया। विभिन्न क्षेत्रीय राज्यों में पंद्रहवीं सदी में जो सांस्कृतिक प्रगति हुई थी उसके कुछ तत्वों का समाहार भी मुगलों द्वारा विकसित संस्कृति में हुआ। परन्तु इस एकीकृत संस्कृति पर दो धर्मां के कट्टरवादी तत्वों का और साथ ही शासक वर्गों के विभिन्न हिस्सों के स्पर्धाशील और परस्पर विरोधी हितों का भी दबाव पड़ा। इसके बावजूद यह एकीकृत संस्कृति कुल मिलाकर उन्नीसवीं सदी के मध्य तक कायम रही। यह उन संतों, विद्वानों तथा प्रबुद्ध शासकों के लिए मामूली श्रेय की बात नहीं है जिन्होंने इस संस्कृति को रंग-रूप देने में योगदान किया।
   इस काल में प्रचुर आर्थिक विकास और प्रगति भी हुई। व्यापार और वस्तु निर्माण का विस्तार हुआ और खेती-बाड़ी में भी सुधार हुए और उसका फैलाव बढ़ा। परन्तु अलग-अलग क्षेत्रों और काल के अलग-अलग दौरों में इस विकास का रूप असमान रहा। गंगा घाटी के अलावा, जहाँ मुगल शासक साम्राज्य की राजस्विक आय का एक खासा बड़ा भाग खर्च करते थे, इस काल में जो अन्य क्षेत्र तेजी से विकसित हुए थे वे थे गुजरात, कोरोमंडल तट और बंगाल। शायद यह एक संयोग है कि यही वे क्षेत्र हैं जो आधुनिक काल में, खासकर स्वतंत्रता के बाद के काल में, भारत के आर्थिक विकास में सबसे आगे रहे हैं।
   यदि मुगल साम्राज्य कायम रहता तो क्या भारत आर्थिक दृष्टि से प्रगति करता रहता क्या वह अपने बलबूते पर औद्योगिक क्रांति भी संपादित कर सकता था ? मुगल साम्राज्य के पतन के बावजूद अठारहवीं सदी में व्यापार और वस्तु निर्माण का विस्तार होता रहा, परन्तु यूरोप की तुलना में भारत न केवल विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में, बल्कि अन्य मामलों में भी पिछड़ा ही रहा। उदाहरण के लिए माल का ज्यादातर निर्माण छोटे पैमाने पर ही किया जाता रहा, मशीनों का कोई इस्तेमाल नहीं किया गया और कारीगर सरल से औजारों से ही काम करते रहे। नतीजा यह हुआ कि कोई कारीगर चाहे जितना भी कुशल रहा हो उसकी उत्पादक क्षमता निम्न कोटि की ही रही। पश्चिम की तरह यहाँ के कारीगर तरक्की करके व्यापारी और उद्यमी नहीं बन सके, जिसके दो कारण थे। एक कारण तो जातिवाद की जकड़ थी और दूसरा यह कि ज्यादातर कारीगरों को पास पूँजी के नाम पर कुछ नहीं था। यह पैसे के सर्वथा असमान वितरण का द्योतक था और इसके फलस्वरूप घरेलू बाजार संकुचित रह गया। सत्रहवीं और अठारहवीं सदियों में ‘ददनी’ प्रथा का चलन हुआ, जिसके अनुसार देशी-विदेशी दोनों व्यापारी कारीगरों को काम करने के लिए थोड़ी बहुत पूँजी दे दिया करते थे और जब वे माल तैयार कर लेते थे तो उनसे ले लेते थे। इससे कारीगर इन लोगों के और भी मोहताज हो गए।
   इन्हीं परिस्थितियों में अंग्रेजों ने भारत को जीतने और उसे एक उपनिवेश बना देने में कामयाबी हासिल की और अब भारत पूर्व का कारखाना होने के बजाय पश्चिम के लिए कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता बन गया।