सत्यमेव जयते gideonhistory.com
दक्षिण भारत में राज्‍यों के निर्माण

नई अवस्था

   लगभग 300 ई. से 750 ई. तक का काल विन्ध्य से दक्षिण के प्रदेशों में द्वितीय ऐतिहासिक अवस्था का काल है। इस काल में प्रथम ऐतिहासिक अवस्था (लगभग ईसा-पूर्व 200 से 300 ई. तक) में शुरू हुई कई प्रक्रियाएँ चालू रहीं, किन्तु कुछ ऐसे लक्षण भी दिखाई देते हैं जो उन दिनों खास महत्व के नहीं प्रतीत होते थे। प्रथम अवस्था में हम दकन पर सातवाहनों के, तथा तमिलनाडु के दक्षिणी जिलों पर तमिल राज्यों के बढ़ते हुए प्रभुत्व पाते हैं। उस काल में उत्तरी तमिलनाडु, दक्षिणी कर्नाटक, महाराष्ट्र का एक भाग तथा गोदावरी-महानदी, दोआब अपने क्षेत्रों से बाहर स्थापित राजनैतिक प्रभुसत्ता को सकारते थे। उनके अपने राज्य नहीं थे। अब इन क्षेत्रों में तथा विदर्भ में भी 300 ई. से 600 ई. के बीच लगभग आधे दर्जन राज्य उदित हुए जिनका पता हमें दानपत्रों से चला है। कालक्रमेण, सातवीं सदी के आरम्भ तक कांची के पल्लव, बादामी के चालुक्य और मदुरा के पांड्य ये तीनों प्रमुख राज्यों के रूप में उदित हुए। प्रथम ऐतिहासिक अवस्था के लक्षण थे विविध शिल्पों का उद्भव, विदेशी व्यापार, सिक्कों का व्यापक प्रचलन और बड़ी संख्या में नगरों का उदय। द्वितीय अवस्था में आकर व्यापार, नगर और सिक्के तीनों का हृास प्रतीत होता है। ब्राह्मणों को कर-मुक्त भूमि का दान भारी संख्या में दिखाई देता है, जो इस अवस्था का विभेदक लक्षण है। भूमिदानों से यह सिद्ध होता है कि अनेक नए-नए क्षेत्र खेती में और लोगों को बसाने में लगाए गए। अतः इस काल में कृषि अर्थ-व्यवस्था में कहीं अधिक विस्तार हुआ।
   इस अवस्था में हम ब्राह्मण-धर्म की जययात्रा भी देखते हैं। प्रथम अवस्था में हमें आन्ध्र और महाराष्ट्र दोनों प्रदेशों में बड़े-बड़े बौद्ध स्मारक मिलते हैं। कई गुहा-अभिलेख शायद इस बात का संकते देते है कि जैन धर्म और बौद्ध धर्म भी तमिलनाडु के दक्षिणी जिलो में फैले थे। लेकिन अब जैन धर्म सिमटकर कर्नाटक में ही रह गया, सामान्यतः सारे उपमहाद्वीप में राजाओं द्वारा किए गए वैदिक यज्ञों के उदाहरण भारी संख्या में पाते हैं। इस अवस्था में तमिलनाडु में पल्लवों और कर्नाटक में बादामी के चालुक्यों के शासन में शिव और विष्णु के प्रस्तर-मन्दिरों का निर्माण भी आरम्भ हुआ। द्वितीय अवस्था में प्रवेश करते ही दक्षिण भारत महापाषाण देश नहीं रह गया और इस अवस्था का अन्त आते-आते हमें ऐसी गतिविधि दिखाई देने लगती है जिसने इसे मन्दिरों का देश बना दिया।
   शासकवर्ग और साक्षार वर्ग की भाषा में परिवर्तन आया। अगर आन्ध्र और कर्नाटक में पाए गए अशोक के अभिलेख छोड़ भी दिए जाएँ तो ईसा-पूर्व दूसरी सदी और ईसा की तीसरी सदी के बीच के पुरालेख लगभग सभी प्राकृत भाषा में है। तमिलनाडु में मिले ब्राह्मी अभिलेख में भी प्राकृत के शब्द हैं। किन्तु लगभग 400 ई. से इस प्रायद्वीप में संस्कृत शासन की भाषा हो गई और अधिकांश शासनपत्र (सनद) संस्कृत में ही मिलते हैं।

दकन और दक्षिण भारत के राज्य

   उत्तरी महाराष्ट्र और विदर्भ (बरार) में सातवाहनों के स्थान पर एक स्थानीय शक्ति वाकाटकों ने प्रभुत्व जमाया। वाकाटकों ने, जो स्वयं ब्राह्मण थे, ब्राह्मणों को खूब भूमिदान दिए। इन दोनों के प्रमाण रूवरूप उनके द्वारा जारी किए गए ताम्रपत्र भारी संख्या में मिले हैं। इन्हीं ताम्रपत्रों से वाकाटक प्रकाश में आए। वे ब्राह्मण-धर्म के महान पक्षधर थे। उन्होंने अनेकों वैदिक यज्ञ किए। उनका राजनैतिक इतिहास जितना दक्षिण भारत के लिए महत्वपूर्ण है उससे अधिक उत्तर भारत के लिए है। यह बताया जा चुका है कि कैसे चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपनी बेटी प्रभावती का विवाह वाकाटक राज-परिवार में कराया और उस राजघराने की सहायता से ईसा की चौथी सदी के अन्तिम चरण में शक क्षत्रपों से गुजरात और उससे संलग्न पश्चिमी भारत के हिस्से जीत लिए। परन्तु सांस्कृतिक विषय में वाकाटक राज्य ने ब्राह्मण धर्म के आदर्शों और सामाजिक संस्थाओं को दक्षिण की ओर बढ़ाने में सेतु का काम किया।
   वाकाटकों के बाद चालुक्य सत्ता में आए। उन्होंने 757 ई. तक लगभग दो सौ वर्ष दकन और दक्षिणी भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उसके बाद उन्हीं के सामन्त राष्ट्रकूटों ने उन्हें अपदस्थ कर दिया। चालुक्य लोग अपने को ब्रह्मा, मनु या चन्द्र के वंशज मानते थे। उन्हें इस बात का गर्व था कि उन्हीं के पूर्वजों ने अयोध्या में राज किया। परन्तु इसका उद्देश्य सिर्फ मान्यता और प्रतिष्ठता अर्जित करना था। वास्तव में प्रतीत होता है कि वे किसी स्थानीय कन्नड़ जाति के थे, जो ब्राह्मणों के आर्शीवाद से क्षत्रियों की पंक्ति में बैठा दिए गए थे।
   चालुक्यों ने छठी सदी के आरम्भ में पश्चिमी दकन में अपना राज्य कायम किया। अपनी राजधानी उन्होंने वातापी (आधुनिक बादामी) में बनाई जो बीजापुर जिले में कर्नाटक का एक भाग है। बाद में वे कई स्वतंत्र राजघरानों में बँट गए, परन्तु उनका मुख्य घराना वातापी में दो सौ वर्षों तक राज करता रहा। इस काल में दक्षिण में कोई भी अन्य शक्ति उतनी महत्वपूर्ण नहीं हुई जितना बादामी का चालुक्य राज्य। यह स्थिति तब तक बनी रही जब हम उत्तर मध्य काल में विजयनगर पहुँचते हैं।
   प्रायद्वीप के पूर्वी भाग में सातवाहन वंश के खण्डर पर कृष्णा गुंटूर क्षेत्र में इक्ष्वाकुओं का उदय हुआ। लगता है कि वे कोई स्थानीय कबीला थे और अपने वंश की प्राचीनता दिखाने के लिए उन्होंने अपने वंश का नामकरण “इक्ष्वाकु” कर लिया। वे नागार्जुनकोण्डा और धरणीकोण्डा में अनेक स्मारक छोड़ गए हैं। उन्होंने कृष्णा-गुंटूर क्षेत्र में भूमिदान की प्रथा चलाई। वहां उनकी अनेक ताम्रपत्र-सनदें पाई गई हैं।
   इक्ष्वाकुओं को अपदस्था कर उनकी जगह पर पल्लव आए। पल्लव शब्द का अर्थ है लता और यह शब्द टोंडाई का रूपान्तरण है जो लता का ही वाचक है। संभवतः पल्लव एक स्थानीय कबीला थे जिन्होंने टोंडाईनाडु अर्थात् लताओं के देश में अपनी सत्ता स्थापित की। लेकिन उन्हें पूरा-पूरा सभ्य और ग्राह्य बनने में कुछ समय लगा, क्योंकि तमिल भाषा में पल्लव शब्द का अर्थ डाकू होता है। पल्लवों का अधिकार दक्षिणी आन्ध्र और उत्तरी तमिलनाडु दोनों पर था। उन्होंने अपनी राजधानी कांची (आधुनिक कांजीवरम्) में बनाई जो उन दिनों मन्दिरों और वैदिक विद्या का नगर बन गया था।
   पल्लव वंशियों का आरम्भ में कदम्बों से संघर्ष हुआ, जिन्होंने चौथी सदी में उत्तरी कर्नाटक और कोंकण में अपनी सत्ता कायम की थी। वे ब्राह्मण होने का दावा करते थे। उन्होंने अपने बंधु-बांधवों को उदारतापूर्वक पुरस्कृत किया।
   कादम्ब राज्य की स्थापना मयूरशर्मन् ने की। कहा जाता है कि वह पढ़ने के लिए कांची आया, पर वह अपमान के साथ वहां से निकाल दिया गया। इस अपमान से दुखी होकर कदम्ब के सरदार ने जंगल में अपना शिविर बनाया और संभवतः जंगली कबीलों की सहायता से पल्लवों को हराया। अन्ततः पल्लवों ने हार का बदला लिया, परन्तु फिर भी मयूरशर्मन् को औपचारिक रूप से राजचिह्न देकर उन्होंने कदम्बों की राजसत्ता को मान्यता दे दी। कहा जाता है कि मयूरशर्मन् ने अठारह अश्वमेघ यज्ञ किए और ब्राह्मणों को असंख्य गाँव दान में दिए। कदम्बों ने अपनी राजधानी कर्नाटक के उत्तरी केनरा जिले में वैजयन्ती या बनवासी में बनाई।
   गंग पल्लवों के एक और महत्वपूर्ण समसामयिक थे। उन्होंने चौथी सदी के आसपास दक्षिण कर्नाटक में अपना शासन कायम किया। उनका राज्य पूरब में पल्लवों के राज्य और पश्चिम में कदम्बों के राज्य के बीच में था। वे पश्चिमी गंग या मैसूर के गंग कहलाते हैं, क्योंकि पूर्वी गंग इनसे भिन्न थे जो पाँचवीं सदी से कलिंग में शासन करते थे। अधिकांश काल में, पश्चिमी गंग पल्लवों के सामन्त रहे। उनकी सबसे पहले की राजधानी कोलार में थी, जहां सोने की खान होने के कारण इस राजवंश का उत्थान आसान हुआ होगा।
   पश्चिमी गंग राजाओं ने भूमिदान अधिकतर जैनों को दिया। कदम्ब राजाओं ने भी जैनों को दान दिया, पर वे ब्राह्मणों की ओर अधिक झुके थे। पल्लवों ने बहुत सारे कर मुक्त ग्रामदान अधिकांश ब्राह्मणों को दिए। हमें आरम्भिक पल्लवों के 16 भूमिदानपत्र मिले हैं। उनमें से कुछ जो अधिक पुराने लगते हैं पत्थर पर प्राकृत भाषा में खुदे हैं, लेकिन अधिकांश संस्कृत भाषा में ताम्रपत्रों पर खुदे हैं, जो गाँव ब्राह्मणों को दिए गए हैं वे राज्य को मिलने वाले सभी करों से और बेगार (श्रमकर) से मुक्त हैं। इसका अर्थ हुआ कि ये सभी पावने दानग्राही ब्राह्मण अपने भोग के लिए वसूल सकते थे। चौथी सदी के पल्लव दानपत्रों में तो ब्राह्मणों को दी जाने वाली विभुक्तियों की संख्या 18 तक पहुँचा दी गई हैं। वे भूमिकर चुकाए बिना, बेगार दिए बिना, नगर के राजकीय अधिकारियों को रसद पहुँचाए बिना और राजकीय सिपाहियों और एजेंटो द्वारा किसी हस्तक्षेप के बिना दान की सम्पत्ति का भोग कर सकते थे।
   पल्लव, कदम्ब, बादामी के चालुक्य और उनके अन्य समसामयिक शासक वैदिक यज्ञ के प्रबल समर्थक थे । उन्होंने अश्वमेध और वाजपेय यज्ञ किए, जिससे न केवल उनकी राजा की हैसियत को वैद्यता मिली, बल्कि पुरोहित वर्ग की आय में काफी वृद्धि भी हुई। इस प्रकार ब्राह्मण किसानों के बूते पर एक सम्पन्न वर्ग में आ गए, क्योंकि एक ओर वे किसानों से सीधे कर वसूलते थे और दूसरी ओर प्रजा से राजा द्वारा वसूले गए राजस्व की राशि में से भी दान-दक्षिण के रूप में अच्छा-खास अंश प्राप्त कर लेते थे।
   यद्यपि 300 ई. और 750 ई. के बीच की अवधि इस प्रायद्वीप में राज्य के गठन और कृषि-विस्तार के लिए अत्यन्त ही महत्वपूर्ण रही, फिर भी इस विषय में बहुत कम जानकारी मिलती है कि चोल, चेर और पांड्य राज्यों के पतन के बाद इस प्रायद्वीप के छोर भाग में क्या हाल हुआ। एकमात्र महत्वपूर्ण घटना है छठी सदी में कालाभ्रों के नेतृत्व में हुआ विद्रोह। इसका असर पल्लवों पर तथा उनके समकालीन पड़ोसियों पर पड़ा। कालाभ्रों को दुष्ट राजा कहा गया है। उन्होंने अनेकानेक राजाओं को उखाड़ फेंका और तमिलनाडु पर अपना कब्जा जमा लिया। उन्होंने बहुत-सारे गाँवों से ब्राह्मणों को मिले ब्रह्मदेय अधिकारों को खत्म कर दिया। लगता है कि कालाभ्र बौद्ध धर्म के अनुयायी थे, क्योंकि उन्होंने बौद्ध विहारों का सम्पोषण किया था। कालाभ्रों का विद्राह इतना हो गया था कि उसको पांड्यों, पल्लवों और बादामी के चालुक्यों के संयुक्त प्रयास से ही दबाया जा सकता था। ऐसा कहा जाता है कि कालाभ्रों ने चोल, पांड्य और चेर राजाओं को बन्दी बना लिया। इस सबों से यही प्रकट होता है कि इस विद्रोह ने विशाल रूप धारण कर लिया था, और तमिल देश के बाहर इसका असर पहुँचा। दान में दी गई भूमि पर ब्राह्मणों के अधिकार को खत्म करने वाले कालाभ्रों के विरूद्ध इन राजाओं के एकजुट होने का अर्थ यह है कि विद्रोह दक्षिण भारत के तत्कालीन सामाजिक और राजनैतिक व्यस्था के खिलाफ उठा था।
   इसलिए प्रतीत होता है कि 300 ई. से 500 ई. के बीच ब्राह्मणों को कुछ भूमिदान सुदूर दक्षिण के राजाओं ने दिए थे। संगम ग्रन्थों में आया है कि राजा वीरता के लिए योद्धाओं को गाँव देते थे। लगता है, भूमिदानों के फलस्वरूप न केवल पल्लवों के शासन में तीसरी सदी के अन्त में दक्षिण आन्ध्र और उत्तरी तमिलनाडु में ही, बल्कि सुदूर दक्षिण के कुछ अज्ञातनामा राजाओं के राज्य में भी कृषि-विस्तार को बढ़ावा मिला होगा।

पल्लवों और चालुक्यों के बीच संघर्ष

   छठी सदी से आठवीं सदी तक प्रायद्वीपीय भारत के राजनैतिक इतिहास का मुख्य आकर्षण, वह संघर्ष है जो कांची के पल्लवों और बादामी के चालुक्यों के बीच प्रभुसत्ता को लेकर चलता रहा। इस संघर्ष में एक कमजोर तीसरे के रूप में पांड्य भी उलझ गए थे जिनका राज्य तमिलनाडु और तिन्नेवली जिले में था। यद्यपि पल्लव और चालुक्य दोनों ब्राह्मण-धर्म के समर्थक थे और दोनों ने वैदिक यज्ञ किए और ब्राह्मणों को दान दिया, तथापि दोनों के बीच लूटपाप प्रतिष्ठा और क्षेत्रीय संसाधनों को लेकर झगड़े हुए। दोनों ने कृष्णा और तुंगभद्रा के दोआब पर प्रभुत्व जमाने की कोशिश की। उत्तर मध्य काल में यह दोआब विजयनगर और बहमनी राज्यों के बीच झगड़े का कारण बन गया। बार-बार पल्लव राजाओं ने तुंगभद्रा नदी पार करने की कोशिश की, जो नदी अनेक राज्यों और सुदर दक्षिण के बीच प्राकृतिक ऐतिहासिक सीमा थी। यह संघर्ष कभी इस करवट कभी उस करवट करते लंबी अवधि तक चलता रहा।
   इस लम्बे संघर्ष के क्रम में पहली महत्वपूर्ण घटना परम प्रसिद्ध चालुक्य राजा पुलकेशिन् द्वितीय (609-642) के शासनकाल में घटी। उसके बारे में जानकारी उसके ऐहोल अभिलेख से मिलती है, जिसमें उसके दरबारी कवि रविकीर्ति द्वारा रचित उसकी प्रशस्ति (गुणवर्णन) उत्कीर्ण है। यह प्रशस्ति उस काल की काव्य-कला का एक उत्कृष्ट नमूना है और अतिरंजनों के बावजूद पुलकेशिन् की जीवनी जानने का एक मूल्यवान स्रोत है। उसने कदम्बों की राजधानी वनवासी को उखाड़ फेंका और कर्नाटक के गंग वंशियों को अपनी प्रभुसत्ता स्वीकार करने को मजबूर किया। नर्मदा के किनारे हर्ष की सेना को हराकर उसके दकन की ओर बढ़ने से रोक दिया। पल्लवों के साथ लड़ते-लड़ते वह पल्लव राजधानी के पास तक पहुँच गया, परन्तु पल्लवों ने पुलकेशिन् द्वितीय को अपना उत्तरी प्रान्त देकर उसके साथ संधि कर ली। पुलकेशिन् द्वितीय 610 ई. के आसपास कृष्णा और गोदावरी का दोआब पल्लवों से छीन लिया। यह दोआब वेंगी प्रान्त के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहाँ पर मुख्य राजवंश की एक शाखा स्थापित की गई जो वेंगी का पूर्वी चालुक्य राजवंश कहलाने लगी। परन्तु पल्लवों के राज्य पर पुलकेशिन् का दूसरा हमला विफल रहा और पल्लव राजा नरसिंहवर्मन (630-668 ई.) ने चालुक्य राजधानी वातापी पर लगभग 642 ई. में कब्जा कर लिया। उस समय पल्लवों से युद्ध करते हुए पुलकेशिन द्वितीय शायद मारा गया। नरसिंहवर्मन ने वातापीकोण्डा अर्थात् वातापी-विजेता की उपाधि धारण की। कहा जाता है कि उसने चोलों, चेरों, पांड्यों और कालाभ्रों को भी पराजित किया। सातवीं सदी के अन्तिम भाग में इस संघर्ष में एक ठहराव सा आ गया, लेकिन आठवीं सदी के पूवार्द्ध में यह संघर्ष फिर जाग उठा। कहा जाता है कि चालुक्य राजा विक्रमादित्य द्वितीय (733-745 ई.) ने कांची को तीन बार रौंदा। उसने 740 ई. में पल्लवों को पूरी तरह पराजित कर दिया। उसकी विजय ने सुदूर दक्षिण में पल्लवों के प्रभुत्व को समाप्त कर दिया, यद्यपि वह राजवंश उसके बाद सौ वर्ष तक वर्तमान रहा। लेकिन चालुक्य राजा पल्लवों पर अपनी विजय का फल अधिक दिनों तक भोग नहीं पाए, क्योंकि 757 ई. में राष्ट्र-कूटों ने पल्लवों का प्रभुत्व समाप्त कर दिया।

मन्दिर

   यज्ञानुष्ठानों के अलावा, ब्रह्मा, विष्णु और शिव की पूजा लोकप्रिय होती गई। विष्णु और शिव तो और भी अधिक पूजित होने लगे। सातवीं सदी से वैष्णवप्रवर आल्वार सन्तों ने वैष्णव सम्प्रदाय को फैलाया तो नयन्नार सन्तों ने शैव सम्प्रदाय को। इस प्रकार सातवीं सदी से लेकर दक्षिण भारत के लोगो के धार्मिक जीवन में भक्ति-मार्ग प्रमुख हो गया, तथा आल्वारों और नयन्नारों ने इस मार्ग को फैलाने में बड़ा योगदान किया।
   पल्लव राजाओं ने सातवीं और आठवीं सदियों में अपने आराध्य देवताओं की प्रतिमा स्थापित करने के लिए बहुत सारे प्रस्तर मन्दिर बनवाए। इनमें सबसे प्रसिद्ध हैं सात रथ-मन्दिर जो मद्रास से 65 किलोमीटर दूर महाबलिपुरम् में पाए गए हैं। इनका निर्माण सातवीं सदी में नरसिंहवर्मन ने कराया था, जिसने प्रसिद्ध बन्दरगाह शहर बलिराजपुरम् या मामल्लपुरम की स्थापना की। यह नगर एक तट-मन्दिर के लिए भी प्रसिद्ध है जो किसी चट्टान को काटकर नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र संरचना के रूप में खड़ा किया गया है। इसके अतिरिक्त, पल्लव राजाओं ने अपनी राजधानी कांची में भी ऐसे कई संरचनात्मक मन्दिर बनवाए। आठवीं सदी में बना कैलाशनाथ मन्दिर इसका अच्छा उदाहरण है। बादामी के चालुक्य राजाओं ने भी 610 ई. और उसके बाद ऐहोल में अनेक मन्दिर बनवाए। ऐहोल में तो मन्दिरों की संख्या 70 तक पहुँच गई। मन्दिर-निर्माण का काम बगल के बादामी और पट्टडकल नगरों में भी जारी रहा। पट्टडकल में सातवीं-आठवीं सदी में बने दस मन्दिर हैं। इनमें सबसे अधिक प्रसिद्ध है पापनाथ मन्दिर (लगभग 680 ई.) और विरूपाक्ष मन्दिर (लगभग 740 ई.)। पहला मन्दिर लम्बाई में तो 30 मीटर है, पर उसका बुर्ज दक्षिणात्य शैली में बौना व नीचा है। दूसरा पूर्णतः दक्षिण की शैली में बना है और उसका शिखर बहुत ही ऊँचा, आयताकार और मंजिलों वाला है। उसकी दीवारें रामायण के दृश्यों वाली सुन्दर-सुन्दर मूर्तियों से सजी हैं।
   यह ज्ञात नहीं है कि इन आरम्भकालिक मन्दिरों का रखरखाव कैसे होता था। आठवीं सदी के बाद से मन्दिरों को भूमिदान देने की प्रथा दक्षिण भारत में खूब चल पड़ी और प्रायः भूमिदान दीवारों पर अभिलिखित कर दिए जाते थे। परन्तु लगता है कि मन्दिरों का निर्माण और अनुपोषण राजा द्वारा प्रजा से वसूले गए करों से होता था। कर्नाटक में कुछ मन्दिर जैन व्यापारियों ने चालुक्यों के शासनकाल में बनवाए। यद्यपि आम लोग धान और ताड़ी चढ़ाकर अपने ग्राम देवताओं की पूजा किया करते थे, तथापि वे समाज में प्रतिष्ठा पाने और अपना धार्मिक तृष्णा बुझाने के लिए इन मन्दिरों में भी चढ़ावा समर्पित करते होंगे।

किसानों पर कर-भार

   युद्ध के लिए, कला और साहित्य के विकास के लिए, धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए और प्रशासन-तंत्र चलाने के लिए अपार संसाधनों की आवश्यकता होती थी। कहना न होगा कि ये संसाधन किसानों को ही जुटाने पड़ते थे। कृषक-समुदायों पर पड़े कर-भार का स्वरूप पल्लव राज्य में भी करीब-करीब वैसा ही था जैसा वाकाटक राज्य में। भले ही वाकाटक राज्य विदर्भ और महाराष्ट्र में था जबकि पल्लव राज्य दक्षिण आन्ध्र और उत्तर तमिलनाडु में। उपज के एक हिस्से के रूप में लिए जाने वाले भूमि-कर के अतिरिक्त राजा अन्न और स्वर्ण के रूप में नजराना ले सकता था तथा गुड़, मदिरा जैसी वस्तु निकालने के लिए ताड़ आदि पेड़ों से रस निकलवा सकता था। बेशक, गाँव की सारी खानें और छिपे खजाने (निखात निधि) राजा के होते थे। इसके अलावा, फूल और दूध तथा लकड़ी और घास बिना मूल्य देने तथा बोझ ढोने के लिए भी गाँव वाले बाध्य होते थे। राजा को विष्टि अर्थात् बेगा (मुफ्त में खटाने) का भी अधिकार था।
   जब कभी राजा के अधिकारी कर वसूल करने या अपराधियों को सजा देने के लिए गाँवों में पहुँचते थे या सैनिक अभियान के क्रम में गाँव होकर गुजरते थे, तब गाँव के लोगों को बहुत कुछ करना पड़ता था। उन्हें गाड़ियों के लिए बैल, सोने के लिए खाट, रसोई बनाने के लिए ईंधन, चूल्हा और बर्तन तथा टहल के लिए चाकर देने पड़ते थे।
   लगानों की इस पूरी सूची से प्रकट होता है कि राजा किसानों से उसके श्रम और उपज का बड़ा भाग लगान के तौर पर वसूल लेता था। इनमें से अधिकांश लगान चौथी सदी से ब्राह्मणों को दी जाने वाली 18 प्रकार की छूटों में शामिल हैं। बाद में तो किसानों पर और भी कई तरह के लगान थोपे जाने लगे। 

ग्रामीण विस्तार

   गाँव के लोगों पर राजा द्वारा लगाए गए इतने-सारे लगान इस बात के द्योतक हैं कि किसानों में इनके चुकाने की क्षमता अवश्य रही होगी। जब तक कृषि-उत्पादन में वृद्धि न हुई हो तब तक इनकी वसूली सम्भव न होती । इसी काल में हमें विन्ध्य पार क्षेत्रों में नए-नए राज्य खड़े हुए दिखाई देते हैं। हरेक राज्य के अधीन कई सामन्ती राज्य थे, जो एक बड़े राज्य के तहत छोटे राज्य की तरह चलते थे। ऐसे हर राज्य को, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, खुदसर हो या सामन्त, अपनी सेना चाहिए, अपनी कर-व्यवस्था चाहिए, अपना प्रशासन तन्त्र चाहिए और काफी संख्या में पुरोहित और अन्य समर्थक वर्ग चाहिए। इसके लिए हर राज्य को संसाधन की आवश्यकता थी जो ग्रामीण पृष्ठभूमि से ही प्राप्त हो सकता था। अतः ग्रामीण आबादी के विस्तार या मौजूदा गाँवों में कृषि उत्पादन में वृद्धि हुए बिना नए-नए राज्यों का उद्भव नहीं हो सकता था। लगता है कि कबायली क्षेत्रों में ब्राह्मणों को भूमि दी गई और कबायली किसानों ने पशुपालन की उपयोगिता और खेती के उन्न्त तरीके उन ब्राह्मणों से सीखे। कुछ इलाकों में जन-शक्ति की कमी थी। ऐसे क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को चलाते रहने के उद्देश्य से कुछ बटाईदार और बुनकर लोग भी ब्राह्मणों के जिम्मे लगा दिए गए, जैसा कि एक आरम्भिक पल्लव दानपत्र से मालूम होता है। इसलिए खेती के नए तरीके फैलाने और ग्रामीण आबादी को बढ़ाने में ब्राह्मणों को दिए गए भूमि दानों की भूमिका महत्वपूर्ण रही।
   इस काल में दक्षिण भारत में तीन प्रकार के गाँव दिखाई देते हैं -उर, सभा और नगरम। उर गाँव का एक प्रचलित प्रकार था जिसमें किसान जातियों के लोग बसते थे और भूमि पर उन लोगों का शायद सामुदायिक स्वत्व होता था। ऐसे गाँव में ग्रामप्रधान का कर्तव्य होता था कि गाँव वालों से कर की वसूली करके उनकी ओर से चुकाए। ऐसे गाँव अधिकतर दक्षिण तमिलनाडु में पाए जाते थे। सभा कोटि के गाँव में ब्रह्मदेय अर्थात् ब्राह्मणों को दिए गए गाँव और अग्रहार गाँव आते थे। अग्रहार गाँवों में भूमि पर तो दानग्राही ब्राहाणों का व्यक्तिगत स्वत्व होता था, पर उनके काम-काज सामूहिक होते थे। नगरम कोटि का गाँव वह होता था जहाँ व्यापारियों और वणिकों का मिला जुला वास होता था और उन्हीं का दबदबा रहता था। ऐसे गाँव संभवतः इसलिए बसे क्योंकि व्यापार में गिरावट आयी और वणिक लोग गाँवों की ओर चल पड़े। चालुक्य क्षेत्रों में गाँव की कार्य-व्यवस्था गाँव के श्रेष्ठजन करते थे जो महाजन कहलाते थे। कुल मिलाकर 300 से 750 ई. की अवधि में हम ग्रामीण विस्तार, ग्रामीण संघटन और भूमि के अच्छे उपयोग की अच्छी झलक पाते है।

सामाजिक ढाँचा

   हम इस काल में विकसित सामाजिक ढाँचे की एक स्थूल रूपरेखा प्रस्तुत कर सकते हैं। समाज पर राजाओं और पुरोहितों का दबदबा था। राजा लोग ब्राह्मण या क्षत्रिय होने का दावा करते थे, जबकि उनमें कई स्थानीय जातियों के सरदार थे जिन्हें ब्राह्मणों ने दान पाकर द्वितीय वर्ण का दर्जा दे दिया था। पुराहितों ने उन राजाओं की प्रतिष्ठाजनक वंशावलियाँ गढ़ी और उनका मूल प्राचीन सूर्य और चन्द्र वंशों से जोड़ा। इस तरह नए शासकों ने प्रजा की नजर में राजा के रूप में अपनी मान्यता स्थापित की। पुरोहितों में अधिकांश ब्राह्मण ही थे, हालांकि जैन और बौद्ध भिक्षुओं को भी इसी में स्थान मिलना चाहिए। इस अवस्था में पुरोहितों ने भूमिदान के बल पर अपना प्रभाव और प्रभुत्व जमाया। राजाओं और पुरोहितों के नीचे किसान आते थे, जो अनेकानेक कृषक जातियों में बँटे थे। इनमें अधिकांश जातियाँ वर्ण-व्यवस्था में शूद्र मानी जाती थीं। यदि किसान या शिल्पी लोग उत्पादन-कर्म में, सेवा-कर्म में, या दायित्व चुकाने में चूकते थे तो इसे धर्म अर्थात् परम्परागत सामान्य नियम से विचलन माना जाता था। ऐसी ही स्थिति को कलियुग कहा गया है। राजा का कर्तव्य होता था कि वह धर्म की रक्षा करें अर्थात् इस तरह की गड़बड़ी न होने दे और शान्तिपूर्ण व्यवस्था बनाए रखे, जिसमें राजाओं और पुरोहितों का कल्याण निहित रहता था। इसीलिए वाकाटक, पल्लव, कदम्ब और पश्चिमी गंग राजाओं ने धर्ममहाराज की उपाधि धारण की। पल्लव राज्य के वास्तविक संस्थापक सिंहवर्मन के विषय में कहा गया है कि कलियुग के दुर्गुणों से ग्रस्त धर्म का उन्होंने उद्धार किया। स्पष्टतः इसका इशारा कालाभ्र के दमन की ओर है जिसने पारम्परिक समाज-व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया था।