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दक्षिण भारत में मुगल साम्राज्‍य का विस्‍तार
   हम पहले एक अध्याय में उल्लेख कर चुके हैं कि बहमनी साम्राज्य के विघटन के बाद अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुण्डा नामक तीन शक्तिशाली राज्य उभरे और उन्होंने मिलकर 1565 में तालिकोट के निकट बन्नीहट्टी की लड़ाई में विजयनगर को बुरी तरह पराजित किया। विजय के पश्चात् इन राज्यों में पुराने तौर-तरीके अपना लिए। अहमदनगर और बीजापुर दोनों ने शोलापुर के उपजाऊ और समृद्ध क्षेत्र पर अपना-अपना दावा किया। युद्ध और विवाह सम्बन्ध दोनों में से कोई भी इस समस्या को सुलझाने में सहायक नहीं हुआ। दोनों राज्यों की महत्वाकांक्षा बीदर को हस्तगत करने की थी। अहमदनगर अपने उत्तर में स्थित बरार को भी हथियाना चाहता था। वस्तुतः बहमनी सुल्तानों के वंशज निजामशाहियों ने दकन में अपनी सर्वोपरिता का नहीं तो कम से कम बेहतर स्थिति का दावा अवश्य आरम्भ किया। उनके क्षेत्रीय दावे का विरोध न केवल बीजापुर ने बल्कि गुजरात के सुल्तानों ने भी किया, जिनकी नजर बरार के साथ-साथ समृद्ध कोंकण प्रदेश पर भी थी। गुजरात के सुल्तानों ने अहमदनगर के विरुद्ध बरार को सक्रिय सहायता दी और दकन में शक्ति सन्तुलन को बनाये रखने के लिए अहमदनगर से युद्ध भी किया। बीजापुर और गोलकुण्डा में भी नालदुर्ग के लिए संघर्ष हुआ।
   1572 में मुगलों द्वारा गुजरात विजय से एक नयी परिस्थिति उत्पन्न हो गई। गुजरात विजय वस्तुतः मुगलों द्वारा दकन विजय की पूर्व-पीठिका हो सकती थी। लेकिन अकबर कहीं और व्यस्त था। अतः इस मौके पर दकन में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता था। अहमदनगर ने इस मौके का लाभ उठाकर बरार पर अपना अधिकार कर लिया। वस्तुतः अहमदनगर और बीजापुर ने एक समझौता कर लिया जिसके अन्तर्गत बीजापुर को दक्षिण में अपने राज्य का विस्तार करने की छूट मिल गई और अहमदनगर ने बरार को रौंद डाला। गोलकुण्डा भी विजयनगर साम्राज्य के क्षेत्र में अपनी सीमाओं का विस्तार करना चाहता था। इस प्रकार सभी दक्कनी राज्य विस्तारवादी थे।
   इस नवीन परिस्थिति की एक अन्य विशेषता दकन की राजनीति में मराठों के महत्व में वृद्धि थी। जैसा कि हम देख चुके हैं, बहमनी शासकों ने हमेशा मराठा सेनाओं को सहायक सेना के रूप में रखा था। इसे बारगीर (या सामान्यतः बारगी) कहा जाता था। स्थानीय स्तर पर राजस्व व्यवस्था का कार्य ब्राह्मणों के हाथ में सन्निहित था। मोरे, निम्बालकर, घाटगे जैसे कुछ पुराने मराठा वंशों ने बहमनी सुल्तानों की सेना में रहकर मनसब और जागीरें भी प्राप्त की थीं। इनमें से अधिकांश शक्तिशाली जमींदार थे। जिन्हें दकन में देशमुख कहा जाता था। परन्तु उनमें कोई भी राजपूतों की भाँति स्वतन्त्र शासक नहीं था और न किसी के पास राज्य था। दूसरे वे किसी कुल विशेष के प्रमुख भी नहीं थे, जिसकी सहायता व शक्ति पर वे निर्भर रह सकते। इस प्रकार अधिकांश मराठा सरदार सैनिक साहसिक मात्र थे, जो परिस्थिति के अनुसार अपनी स्वामीभक्ति बदल सकते थे। स्वतन्त्र व विशाल रियासतों का तथा कुल की शक्ति व सहायता के अभाव होने पर भी मराठा दकन के जमींदारों की रीढ़ थे और उनकी स्थिति पर भारत के अधिकांश क्षेत्रों के राजपूतों के समान थी। सोलहवीं शताब्दी के मध्य में दकनी राज्यों ने मराठों को अपनी ओर मिलाने की निश्चिय नीति अपनाई। दकन के तीनों बड़े राज्यों ने मराठा सरदारों को नौकरी और बड़े पद दिये। बीजापुर का इब्राहिम आदिलशाह जो 1555 में गद्दी पर बैठा था, इस नीति को अपनाने वालों में अग्रणी था। कहा जाता है कि उसके पास 30000 मराठों की सहायक (बारगी) सेना थी, पर वह राजस्व के मामलों में मराठों को हर स्तर पर छूट दिया करता था। इस नीति के अन्तर्गत पुराने वंशों पर कृपा दृष्टि रखने के अतिरिक्त नये वंशों को भी बढ़ावा दिया गया। ये नये वंश पहले जिनका वंशगत नाम घोरपड़े था (डफले अथवा चह्वान) आदि थे। राजनयिक वार्ताओं में मराठों, ब्राह्मणों की सेवाएँ भी नियमित रूप से ली गई थी। उदाहरण के लिए अहमदनगर के सुल्तान ने कणकोजी नरसी नामक ब्राह्मण को पेशवा की उपाधि दी। अहमदनगर और गोलकुण्डा में भी मराठों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
   अतः यह स्पष्ट है कि स्थानीय जमींदार वर्ग और लड़ाकू जातियों के साथ मित्रता की नीति अकबर-कालीन मुगल साम्राजय से बहुत पहले दकन को सल्तनतों ने अपना ली थी।

दकन में मुगलों का बढ़ाव

   उत्तर भारत में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर लेने के पश्चात् दकन की ओर कदम बढ़ाना मुगलों के लिए स्वाभाविक था। यद्यपि विंध्याचल उत्तर और दक्षिण की सीमा-रेखा था, परन्तु यह अलंघ्य-अवरोध नहीं था। यात्री, व्यापारी, तीर्थ यात्री और घुमक्कड़ साधू सदा से इसे पार कर आते-जाते रहे थे तथा दक्षिण और उत्तर को जहाँ की संस्कृतियों की अपनी-अपनी विशिष्टताएँ थीं, एक संस्कृति सूत्र में बाँधते रहे थे। तुगलक शासकों द्वारा दकन विजय तथा उत्तर और दक्षिण के मध्य आवागमन के साधन सुगम हो जाने के कारण दोनों क्षेत्रों में व्यापारिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध दृढ़तर हो गए थे। दिल्ली सल्तनत के पतन के पश्चात् बहुत से सूफी सन्त नौकरी की तलाश में और अन्य बहुत से व्यक्ति बहमनी सुल्तानों के दरबार मे पहुँचे थे। राजनीतिक दृष्टि से भी उत्तर और दक्षिण अलग नहीं थे। जैसा कि हम देख चुके हैं कि पश्चिम में गुजरात और मालवा तथा पूर्व में उड़ीसा राज्य दकन की राजनीति में निरन्तर रुचि रखते रहे थे। अतः यह स्वाभाविक था कि सातवें और आठवें दशक के प्रारम्भ में मालवा और गुजरात को जीतने के पश्चात् मुगल भी दकन की राजनीति में रुचि दिखाते। 1756 में मुगल सेना ने खानदेश पर आक्रमण किया और वहाँ के शासक को समर्पण के लिए विवश कर दिया। किन्तु अकबर अधिक महत्वपूर्ण कारणों से अपना ध्यान इस ओर केन्द्रित न कर सका। 1586 से 1598 तक बारह वर्षों तक अकबर उत्तर-पश्चिम की स्थिति का अध्ययन करने के लिए लाहौर में रहा। इसी बीच दकन की परिस्थितियाँ बिगड़ती चली गईं।
   दकन राजनीति का जलता कुण्ड था। विभिन्न दकनी राज्यों के बीच लड़ाई एक आम बात थी। एक शासक की मृत्यु विभिन्न गुटों के सदस्यों के बीच संघर्ष का कारण बन जाती थी। प्रत्येक दल शासक निर्माता की भूमिका निभाना चाहता था। इन परिस्थितियों में दक्कनियों और नवागन्तुकों (अफ्रीकी अथवा गरीब) के बीच संघर्ष खुले रूप से होता था। दक्कनियों में भी हब्शी (अबीसीनियायी अथवा अफ्रीकी) और अफ़गान दो वर्ग बन गये थे। इन वर्गों और दलों का दकन की जनता के साथ सांस्कृतिक स्तर पर कोई सम्पर्क नहीं था। दकन की सैन्य और राजनीतिक प्रणाली में मराठों का विलयन, जो बहुत पहले प्रारम्भ हो चुका था और आगे नहीं बढ़ा। अतः शासकों और अमीरों के प्रति जनता की स्वामीभक्ति बहुत कम थी।
   दलगत संघर्षों और मतभेदों के कारण परिस्थिति और भी बिगड़ गई। सत्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ईरान में नये राजवंश सफवियों के अन्तर्गत शिया मत राजधर्म बन गया था। शिया सम्प्रदाय का बहुत समय से दमन किया जाता रहा था और अब उत्साह की पहली लहर में इस सम्प्रदाय के लोगों को अपने पूर्व विरोधियों से बदला लेने का मौका मिला। परिणामतः बहुत से महत्वपूर्ण परिवारों ने वहाँ से भाग कर अकबर के दरबार में शरण ली जो शियाओं और सुन्नियों में कोई विभेद नहीं करता था। कुछ दकनी राज्यों ने भी शिया मत को राजधर्म के रूप में स्वीकार किया। गोलकुण्डा इनमें से प्रमुख था। बीजापुर और अहमदनगर में भी शिया शक्तिशाली थे, किन्तु उनका पलड़ा कभी-कभी भारी होता था। इससे दलगत संघर्ष और उग्र होता गया।
   दकन में महदवी सिद्धान्तों का भी व्यापक प्रसार हुआ। मुसलमानों का विश्वास था कि प्रत्येक युग में पैगम्बर के परिवार से एक व्यक्ति प्रकट होगा और धर्म को दृढ़ करेगा और न्याय को विजय दिलायेगा। ऐसा व्यक्ति महदी कहलाता था। हालाँकि संसार के विभिन्न भागों में अलग-अलग कालों में महदी प्रकट हो चुके थे, किन्तु सौलहवीं शताब्दी के अन्त में इस्लाम के एक युग की सम्भावित समाप्ति ने इस्लामी दुनिया में अनेक आशाएँ उत्पन्न कर दी थीं। भारत में, पन्द्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में जौनपुर में उत्पन्न सैयद मुहम्मद ने महदी होने का दावा किया। सैयद मुहम्मद ने भारत और इस्लामी दुनिया का भ्रमण किया और लोगों में काफी उत्साह पैदा किया। दकन सहित अपने देश भर में अपने दायरे स्थापित किए। दकन में उसके विचारों का तेजी से प्रसार हुआ। परम्परावादी तत्व महदवी सम्प्रदाय के उतने ही तीव्र विरोधी थे, जितने कि शिया सम्प्रदाय के। हालाँकि दोनों के बीच कोई प्रेम-भाव समाप्त नहीं हुआ था। अकबर ने इसी संन्दर्भ में सुलह-कुल का सिद्धान्त प्रचारित किया। उसे इस बात का भय था कि दकन के सम्प्रदायगत संघर्षों का सीधा प्रभाव मुगल साम्राज्य पर पड़ेगा।
   अकबर को पुर्तगालियों की बढ़ती शक्ति का भी खतरा था। पुर्तगाली मक्का जाने वाले हज यात्रियों के कार्यों में हस्तक्षेप करते थे। इसमें वे शाही परिवारों की स्त्रियों को भी नहीं छोड़ते थे। वे अपनी सीमाओं में धौंस से काम लेते थे, जो अकबर को पसन्द नहीं था। पुर्तगाली मुख्य भूमि पर निरन्तर अपना प्रभाव बढ़ाने के चक्कर में थे और यहाँ तक कि उन्होंने सूरत पर भी हाथ डाला, जिसे एक मुगल सेनापति ने समय पर पहुँचकर बचा लिया। अतः अकबर ने स्पष्ट रूप से यह अनुभव किया कि मुगल साम्राज्य के निरीक्षण में दकनी रियासतों की सम्मिलित शक्ति यदि पुर्तगालियों के खतरे को पूरी तरह समाप्त नहीं भी कर सकेगी, तो उसे कम अवश्य कर देगी।
   इन्हीं कारकों के कारण अकबर दकनी राजनीति में भाग लेने के लिए विवश हुआ।

बरार, अहमदनगर और खानदेश विजय

   अकबर ने पूरे देश पर अपने प्रभुत्व का दावा किया था। अतः वह चाहता था कि राजपूतों की भाँति दकनी राज्य भी उसकी प्रभुत्ता को स्वीकार करें। उसने पहले भी कई दूत इस प्रयत्न में दकनी राज्यों को भेजे थे कि वे उसकी शक्ति को स्वीकार कर उससे मित्रता करें लेकिन उसका अपेक्षित परिणाम नहीं निकला। यह स्पष्ट था कि जब तक मुगल उन पर सैनिक दबाव न डालें, दकनी राज्य मुगल प्रभुत्व को स्वीकार करने वाले नहीं थे।
   1591 में अकबर ने कूटनीतिक स्तर पर कार्यवाही प्रारम्भ की तथा अनेक प्रत्येक दकनी राज्य में दूत भेजे और उनसे मुगल प्रभुत्ता स्वीकार करने को कहा। जैसी कि आशा की जाती थी, किसी भी राज्य ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। केवल खानदेश ही इसका अपवाद रहा क्योंकि वह मुगल साम्राज्य के एकदम निकट स्थित था और मुगलों का सामना कर पाने की स्थिति में नहीं था। अहमदनगर के सुल्तान बुरहान ने मुग़ल दूत के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया, अन्य राज्यों ने केवल मित्रता के वायदे किए। ऐसा प्रतीत होता था कि अकबर दकन के मामले में कोई निश्चित कदम उठाना चाहता है। 1595 में बुरहान की मृत्यु के बाद छिड़े निजामशाही सरदारों के आपसी संघर्ष ने अकबर को आवश्यक अवसर प्रदान कर दिया। वहाँ अलग-अलग दलों द्वारा समर्थित चार लोग उत्तराधिकारी का दावा कर रहे थे। सबसे मजबूत दावा मृतक सुल्तान के पुत्र बहादुर का था। बीजापुर का सुल्तान इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय भी उसका समर्थन करना चाहता था। बुरहान की बहन चाँदबीबी इब्राहिम के चाचा और बीजापुर के भूतपूर्व सुल्तान की विधवा थी। वह बहुत ही योग्य स्त्री थी और उसने आदिलशाह के वयस्क होने के दस साल तक शासन भार सम्भाला था। वह मातमपुर्सी के लिए अहमदनगर गई थी और वहाँ उसने अपने भतीजे के दावे का जोरदार समर्थन किया। इसी पृष्ठभूमि में विरोधी दल के अमीरों (दक्कनियों) ने मुगलों को हस्तक्षेप के लिए आमन्त्रित किया। इसके बाद जो संघर्ष हुआ, वह वास्तव में अहमदनगर पर प्रभुत्व के लिए मुगलों और बीजापुर के मध्य संघर्ष था।
   मुगल आक्रमण का नेतृत्व गुजरात के सूबेदार शाहजादे मुराद और अब्दुर्रहीम खान-ए-खानाँ ने किया। खानदेश के सुल्तान को सहयोग करने को कहा गया। अहमदनगर के अमीरों में आपस में फूट होने के कारण राजधानी तक मुगलों को बहुत कम विरोधों का सामना करना पड़ा। चाँदबीबी ने तरुण सुल्तान बहादुर के साथ स्वयं को किले के अदर बंद कर लिया। चार महीनों के घेर के बाद दोनों पक्षों में समझौता हुआ। इस बीच चाँदबीबी ने बहुत साहस का परिचय दिया था। समझौते के अनुसार बरार मुगलों के प्रभुत्व में आ गया और शेष क्षेत्र पर बहादुर का दावा मान लिया गया। मुगलों का प्रभुत्व भी स्वीकार कर लिया गया। वह समझौता 1596 में हुआ।
   बरार के मुगल साम्राज्य में विलयन ने दकनी राज्यों को सावधान कर दिया। उन्होंने अनुभव किया कि बरार के मिल जाने से दकन में मुगलों के पैर जम जायेंगे और वे कभी भी अपने कदम आगे बढ़ा सकेंगे। यह भय कारणहीन नहीं था। अतः वे अहमदनगर के पक्ष में हो गए और मुगलों द्वारा बरार के विलयन में अवरोध उत्पन्न करने लगे। शीघ्र ही एक बीजापुरी सेनापति के नेतृत्व में बीजापुर, गोलकुण्डा और अहमदनगर की संयुक्त व विशाल सेना ने बरार पर आक्रमण कर दिया। 1597 में हुई एक जबरदस्त लड़ाई में मुगल सेना ने अपने से तीन गुनी दकनी सेना को पराजित कर दिया। बीजापुर और गोलकुण्डा की सेनाएँ पीछे हट गयीं और चाँदबीबी स्थिति का सामना करने के लिए अकेली रह गई। हालाँकि चाँदबीबी 1596 की संधि का पालन करना चाहती थी। लेकिन वहाँ अपने उन अमीरों पर अंकुश नहीं लगा सकी, जो मुगलों को त्रस्त करने के उद्देश्य से उन पर बराबर आक्रमण कर रहे थे। इसका परिणाम यह हुआ कि मुगलों ने अहमदनगर के किले पर दोबारा घेरा डाल दिया। कहीं से भी सहायता न मिलने के कारण चाँदबीबी ने मुगलों से समझौते की बातचीत शुरु की लेकिन विरोधी दलों ने उस पर विश्वासघात का आरोप लगाकर उसकी हत्या कर दी। इस प्रकार दकन की राजनीति के एक सर्वाधिक रोमांचक व्यक्तित्व का अन्त हो गया। इसके बाद मुगलों ने अहमदनगर पर आक्रमण करके उस पर विजय प्राप्त कर ली। तरुण सुल्तान बहादुर को ग्वालियर के किले में भेज दिया गया। बालाघाट को भी साम्राज्य में मिला दिया गया और अहमदनगर में मुगल छावनी डाल दी गई। यह घटना 1600 में घटी।
   अहमदनगर की पराजय और बहादुर निजामशाह के बन्दी बना लिये जाने से दकन में अकबर की समस्याएँ समाप्त नहीं हो गईं। क्योंकि वहाँ अब कोई ऐसा निजामशाही शहजादा, अमीर शेष नहीं था जिसके पास पर्याप्त समर्थन हो और जो अकबर के साथ समझौते की बातचीत कर सके। साथ ही मुगल उस समय अहमदनगर तक बढ़ने या राज्य के शेष इलाकों पर कब्जा करने के लिये विशेष उत्सुक नहीं थे। मुगल अमीरों के आपसी झड़पों से स्थिति और भी उलझ गई।
   स्थिति का मौके पर अध्ययन करने के लिये अकबर पहले मालवा और फिर खानदेश की ओर बढ़ा। वहाँ उसे पता लगा कि खानदेश के सुलतान ने अपनी सीमा से होकर अहमदगनर जाते हुए शहजादे दानियाल का उचित सम्मान नहीं किया था। अकबर खानदेश में स्थित असीरगढ़ के किले पर भी अपना अधिकार करना चाहता था क्योंकि वह दकन का सुदृढ़तम किला माना जाता था। किले पर मजबूत घेरा और सेना फैलने की स्थिति में खानदेश का सुल्तान बाहर आया और उसने सर्मपण कर दिया (1601)। खानदेश को मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया।
   इसी बीच शहजादा दानियाल ने, जो अकबर का छोटा पुत्र था, वह जिसके हाथों में स्थित तमाम मुगल सेनाओं का नेतृत्व सन्निहित था, मुर्तजा, निजामशाह के साथ एक सन्धि की। मुर्तजा, निजामशाह को अहमदनगर के पतन के पश्चात् निजामशाही अमीरों के एक दल द्वारा सुल्तान घोषित किया गया था। सन्धि की शर्तां के अनुसार बालाघाट तथा तेलंगाना के कुछ भाग मुगलों को सौंप दिये गये व राज्य का शेष भाग इस शर्त पर मुर्तजा निजामशाह के हाथों में रहने दिया कि कभी विद्रोह नहीं करेगा। यह घटना 1601 की है।
   असीरगढ़ पर आक्रमण करने के पश्चात् अकबर शहजादा सलीम के विद्रोह से निपटने के लिये उत्तर की ओर वापिस लौंट गया। यद्यपि खानदेश, बरार व बालाघाट की विजय तथा अहमदगनर के किले पर नियन्त्रण कोई मामूली उपलब्धि नहीं थी, फिर भी अभी मुगलों के सम्मुख दकन में अपनी स्थिति मज़बूत करने का महत्वपूर्ण कार्य बाकी था। अकबर को पूरा आभास था कि बीजापुर से किसी प्रकार का समझौता किये बिना दकन की समस्या का कोई स्थाई हल नहीं निकाला जा सकता। इसीलिये उसने इब्राहिम आदिलशाह को आश्वस्त करने के उद्देश्य से उसके पास दूत भेजे। सुल्तान ने अपनी पुत्री के साथ शहजादा दानियाल के विवाह का प्रस्ताव रखा जो स्वीकार कर लिया गया। विवाह के फौरन बाद ही शहजादा दानियाल की अधिक मदिरापान के कारण मृत्यु हो गई (1620)। अतः दकन की परिस्थिति अस्पष्ट रही और अकबर के उत्तराधिकारी जहाँगीर को उससे निपटना पड़ा।

मलिक अम्बर का उदय तथा स्थिति दृढ़ करने के मुगल प्रयत्नों की असफलता

   अहमदनगर के पतन और मुगलों द्वारा बहादुर निजामशाह को बन्दी बनाये जाने के बाद इस बात की पूरी संभावना थी कि अहमदनगर राज्य के टुकड़े हो जाते और पड़ोसी रियासतें उन्हें हस्तगत कर लेतीं, किन्तु मलिक अम्बर के रूप में एक योग्य व्यक्ति के उदय की वजह से ऐसा नहीं हुआ। मलिक अम्बर एक अबीसीनियायी था और उसका जन्म इथियोपिया में हुआ था। उसके प्रारम्भिक जीवन की विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है। ऐसा अनुमान है कि उसके निर्धन माता-पिता ने उसे बगदाद के गुलाम-बाजार में बेच दिया था। बाद में उसे किसी व्यापारी ने खरीद लिया और उसे दकन ले आया, जहाँ की समृद्धि उस काल में बहुत लोगों को आकर्षित करती थी। मलिक अम्बर ने मुर्तजा निजामशाह के प्रभावशाली अमीर चगेजखाँ के यहाँ काफी तरक्की की थी। जब मुगलों ने अहमदनगर पर आक्रमण किया, तो मलिक अम्बर अपना भाग्य आजमाने के लिए बीजापुर चला गया। लेकिन जल्दी ही वह वापस आ गया और चाँदबीबी के विरोधी हब्शी (अबीसीनियायी) दल में सम्मिलित हो गया। अहमदनगर के पतन के बाद मलिक अम्बर ने एक निजामशाही शहजादे को ढूँढ़ निकाला और बीजापुर के सुलतान की मदद से उसे मुर्तजा निजामशाह द्वितीय के नाम से गद्दी पर बिठा दिया। वह स्वयं उसका पेशवा बन गया। पेशवा का पद अहमदनगर राज्य में पहले से प्रचलित था। मलिक अम्बर ने काफी बड़ी संख्या में मराठा सेना (बारगी) इकट्ठी कर ली। मराठे तेज शक्ति वाले थे और दुश्मन की रसद काटने में काफी होशियार थे। यह गुरिल्ला युद्ध-प्रणाली दकन के मराठों के लिए परम्परागत थी, लेकिन मुगल इससे अपरिचित थे। मराठों की सहायता से मलिक अम्बर ने मुगलों को बरार, अहमदनगर और बालाघाट में अपनी स्थिति सुदृढ़ करना कठिन कर दिया।
   उस समय दकन में मुगलों का सेनापति अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना था, जो एक दूरदर्शी और होशियार राजनीतिज्ञ तथा योग्य सैनिक था। उसने 1601 में तेलंगाना को नादेर नामक स्थान पर मलिक अम्बर को बुरी तरह पराजित किया। किन्तु उसने मलिक अम्बर के साथ मित्रता के सम्बन्ध रखने का निर्णय किया, क्योंकि वह समझता था कि शेष निजामशाही क्षेत्र में स्थायित्व की स्थिति बने रहना ही उचित है। दूसरी ओर मलिक अम्बर ने भी खान-ए-खाना के साथ मित्रता करना बेहतर समझा, क्योंकि उससे इसे अपने आन्तरिक विरोधियों से निपटने का अवसर मिल सकता था। किन्तु अकबर की मृत्यु के बाद मुगल अमीरों के पारस्परिक मतभेद के कारण दकन में मुगलों की स्थिती कमजोर हो जाने से मलिक अम्बर ने बरार, बालाघाट और अहमदनगर से मुगलों को खदेड़ने के लिए जोरदार आक्रमण किया। उसके इस प्रयत्न में बीजापुर के सुल्तान इब्राहिम आदिलशाह ने सहायता की क्योंकि वह चाहता था कि अहमदनगर, बीजापुर और मुगलों के बीच निजामशाही राज्य मध्यवर्ती राज्य बना रहे। उसने मलिक अम्बर को उसके परिवार में रहने, खजाना इकट्ठा करने और भोजन सामग्री रखने के लिए तेलंगाना में कंधार का शक्तिशाली किला दिया। उसने उसकी मदद के लिए 10000 घुड़सवार भी भेजे जिनका व्यय पूरा करने के लिए एक क्षेत्र भी सुरक्षित कर दिया गया। इस समझौते को मलिक अम्बर तथा बीजापुर के प्रमुख इथियोपियाई सरदार की बेटी के विवाह से और भी दृढ़ बनाया गया। यह विवाह 1609 में बड़ी धूम-धाम से हुआ। आदिलशाह ने वधू को बहुत दहेज दिया और 80000 रूपये केवल आतिशबाजी में खर्च किए।
   बीजापुर की सहायता से शक्ति बल बढ़ा कर और मराठों की सक्रिय सहायता से अम्बर ने शीघ्र ही खान-ए-खाना को बुरहानपुर तक खदेड़ दिया। अकबर द्वारा दकन के विजित प्रदेश इस प्रकार 1610 तक मुगलों के हाथों से छिन गये। यद्यपि जहाँगीर ने शहजादा परवेज को एक बड़ी सेना देकर दकन भेजा था पर वह मलिक अम्बर की चुनौती का सामना नहीं कर सका। यहाँ तक कि अहमदनगर भी उनके हाथ से निकल गया और शहजादा परवेज को अम्बर के साथ अपमानजनक समझौता करने के लिए विवश होना पड़ा।
   मलिक अम्बर इस प्रकार बराबर अपने उद्देश्यों में सफलता प्राप्त करता रहा। वस्तुतः जब तक उसे मराठों और अन्य दकनी राजनीतिक तत्वों का सहयोग प्राप्त था तब तक मुगल दकन में अपना प्रभुत्व स्थापित करने में समर्थ नहीं हो सकते थे। लेकिन धीरे-धीरे मलिक अम्बर उद्धत होने लगा। परिणामतः उसके मित्र उससे दूर हो गये। अब्दर्रहीम खान-ए-खाना तब तक पुनः दकन का वायसराय नियुक्त हो चुका था। उसने इस स्थिति का लाभ उठाया और कई महविया सरदारों तथा जगदेव राय, बाबाजी काटे, उदाजी राम जैसे कई मराठा सरदारों को अपनी ओर मिला लिया। जहाँगीर स्वयं मराठों के महत्व के प्रति पूरी तहर से सजग था। उसने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ‘‘मराठे सख्त जान है और मुल्क में विरोध का केन्द्र है।’’ मराठा सरदारों की मदद से खान-ए-खाना ने 1616 में अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुण्डा की संयुक्त सेना को पूरी तरह पराजित किया। मुगलों ने निजामशाही की नयी राजधानी खिरकी पर अधिकार कर लिया और वहाँ से जाने से पहले प्रत्येक इमारत जला डाली। इस पराजय ने मुगलों के विरुद्ध दकनी संघ को हिला दिया। परन्तु मलिक अम्बर ने अपने प्रयत्नों में ढील नही आने दी। खान-ए-खाना की विजय को पूर्ण करने के लिए जहाँगीर ने अपने पुत्र शहजादा खुर्रम (बाद में शाहजहाँ) के सेनापतित्व में बहुत बड़ी सेना भेजी और स्वयं सहायता पहुँचाने के लिए मांडू आ (1618) गया। इस खतरे को देखते हुए अम्बर को समर्पण करना पड़ा। इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण तथ्य है कि सन्धि में जहाँगीर ने अम्बर द्वारा जीते गये प्रदेशों तक अपना दावा नहीं किया। कुछ विद्वान इसका कारण जहाँगीर की सैनिक-कमजोरी मानते हैं। किन्तु वास्तविकता यह नहीं है। ऐसा जहाँगीर द्वारा सोच समझ कर किया गया था। वस्तुतः जहाँगीर दकन में मुगल उत्तरदायित्व को बढ़ाना या दकन के मामलों मे बहुत गहराई से उलझना नहीं चाहता था। साथ ही उसे यह आशा थी कि उसकी उदारता से दकनी राज्यों को निःसंशय होने का अवसर मिलेगा और वे मुगलों के साथ मित्रता पूर्वक रह सकेंगे। अपनी इस नीति का पालन करते हुए ही जहाँगीर ने बीजापुर को अपने पक्ष में करने का प्रयत्न किया। आदिलशाह को उसने एक उदार फरमान भेजा, जिसमें जहाँगीर ने उसे ‘बेटा’ कहकर सम्बोधित किया था।
   इन पराजयों के बावजूद मलिक अम्बर मुगलों के विरुद्ध दकनी-विरोध का नेतृत्व करता रहा। और दकन में शान्ति स्थापित नहीं हो पायी। परन्तु दो वर्ष के पश्चात् दकनी सेनाओं की मुगलों के हाथों गम्भीर पराजय हुई। अम्बर को मुगलों के सब क्षेत्र लौटाने पड़े और उसके पास का 14 कोस का क्षेत्र भी देना पड़ा। दकनी राज्यों को पचास लाख रूपये हर्जाने के रूप में भी देने पड़े। इस विजय का श्रेय शहजादा खुर्रम को दिया गया।
   पहली पराजय के तत्काल बाद इस दूसरी पराजय ने मुगलों के खिलाफ दकनी सल्तनतों के संगठन को तोड़ कर रख दिया। उनमें पुरानी शत्रुताएँ फिर से उभर आईं। मलिक अम्बर ने शोलापुर को पुनः प्राप्त करने के लिए बीजापुर के विरुद्ध कई अभियान छेड़े। शोलापुर दोनों राज्यों के बीच संघर्ष का कारण था। अम्बर द्रुत गति से बीजापुर की राजधानी पहुँचा तथा इब्राहिम आदिलशाह द्वारा बनवायी नयी राजधानी नौरसपुर को जला डाला। आदिलशाह किले में शरण लेने को विवश हो गया। यह अम्बर की शक्ति की चरम-सीमा थी।
   यद्यपि मलिक अम्बर में उल्लेखनीय सैनिक कौशल शक्ति और इच्छाशक्ति थी, किन्तु उसकी उपलब्धियाँ स्थायी सिद्ध न हो सकीं। क्योंकि मुगलों के साथ वह मिलकर नहीं रह सका था वह ऐसा करना ही नहीं चाहता था। अम्बर के उदय से एक महत्वपूर्ण तथ्य उभर कर आया कि दकन के राजनीतिक क्रिया-कलापों में मराठों के महत्व को अब स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जाने लगा। मलिक अम्बर के नेतृत्व में सफलता पाने के बाद मराठों में इतना आत्मविश्वास उत्पन्न हो गया कि कालान्तर में वे स्वतन्त्र व महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे।
   मलिक अम्बर एक कुशल प्रशासक था। उसने भू-राजस्व की टोडरमल की प्रणाली को लागू करके निजामशाही रियासत के प्रशासन में सुधार करने का प्रयत्न किया। उसने भूमि को ठेके (इजारा) पर देने की पुरानी प्रथा को समाप्त कर दिया क्योंकि वह किसानों के विनाश का कारण बनती थी। इसके स्थान पर उसने जब्ती-प्रणाली को लागू किया।
   1622 के बाद जब जहाँगीर के विरुद्ध शहजादा शाहजहाँ के विद्रोह के कारण दकन में अव्यवस्था हुई, तो मलिक अम्बर ने मुगलों के हाथों हारे हुए बहुत से क्षेत्र फिर से जीत लिए। इस प्रकार दकन में मुगलों की स्थिति को सुदृढ़ करने के जहाँगीर के प्रयत्न विफल हो गये। किन्तु मुगलों के साथ पुनः शत्रुता प्रारम्भ करने से अहमदनगर को कोई विशेष लाभ हुए या नहीं इसमें संशय है, किन्तु संघर्ष का प्रारम्भ होने से ऐसी स्थिति अवश्य उत्पन्न हो गई कि शाहजहाँ के सम्मुख अहमद नगर के स्वतन्त्र अस्तित्व को मिटाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रह गया। 1626 में 80 वर्ष की परिपक्व आयु में मलिक अम्बर की तो मृत्यु हो गयी। किन्तु उसकी शत्रुता की परम्परा के दुष्परिणाम उसके उत्तराधिकारियों को भोगने पड़े।

अहमद नगर का विनाश तथा बीजापुर और गोलकुण्डा द्वारा मुगल प्रभुत्व स्वीकार करना

   शाहजहाँ 1627 में गद्दी पर बैठा। दकन के विरुद्ध दो अभियानों का नेतृत्व करने तथा पिता से विद्रोह के समय वहाँ काफी समय व्यतीत करने के कारण शाहजहाँ को दकन और उसकी राजनीति का पर्याप्त व्यक्तिगत अनुभव था।
   बादशाह के रूप में शाहजहाँ का पहला काम निजामशाही सुलतान द्वारा छीने गए दकनी प्रदेशों को वापस लेना था। इस काम के लिए उसने पुराने और अनुभवी अमीर खान-ए-जहाँ लोदी को नियुक्त किया, किन्तु खान-ए-जहाँ के अपने प्रयास में असफल होने पर उसे वापस दरबार में बुला लिया गया। लेकिन उसने जल्दी ही विद्रोह कर दिया और निजामशाह से मिल गया। निजामशाह ने उसे बरार और बालाघाट के शेष क्षेत्रों में मुगलों को खदेड़ने को नियुक्त कर दिया। एक प्रमुख मुगल अमीर को इस प्रकार शरण देना एक ऐसी चुनौती थी, जिसे शाहजहाँ नजर अन्दाज नहीं कर सकता था। यह स्पष्ट था कि मलिक अम्बर मृत्यु के बाद भी बरार और बालाघाट पर मुगल प्रभुत्व को अस्वीकार करने की नीति निजामशाही शासक ने छोड़ी नहीं थी। अतः शाहजहाँ इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि दकन में मुगलों के लिए तब तक शान्ति सम्भव नहीं है, जब तक अहमदनगर का स्वतन्त्र अस्तित्व बना हुआ है, यह निर्णय अकबर और जहाँगीर की नीति से एकदम अलग था। फिर भी, शाहजहाँ की इच्छा दकन में आवश्यकता से अधिक विस्तार करने की नहीं थी। अतः उसने बीजापुर के सुलतान को यह प्रस्ताव भेजा कि यदि वह अहमदनगर के विरुद्ध आक्रमण में मुगलों का सहयोग करें तो राज्य का एक-तिहाई भाग उसे दिया जायेगा। शाहजहाँ की यह-चतुर चाल थी, जिसका मन्तव्य अहमदनगर को कूटनीतिक और सैनिक स्तर पर अकेला करना था। उसने मुगलों की सेना में सम्मिलित कराने के लिए मराठा सरदारों के पास भी टोह लेने के लिए व्यक्ति भेजे।
   शाहजहाँ को अपने प्रयत्नों में प्रारंभिक सफलता मिली। मलिक अम्बर ने अपने अभियानों के दौरान कुछ महत्वपूर्ण बीजापुरी अमीरों की हत्या कर दी थी। आदिलशाह भी मलिक अम्बर द्वारा नौरसपुर को जलाने और शोलापुर को छीन लेने के अपमान से जल रहा था। अतः उसने शाहजहाँ का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और निजामशाही सीमा पर मुगलों की सहायता के लिए सेना तैनात कर दी। लगभग इसी समय एक महत्वपूर्ण मराठा सरदार जाघवराव को मुगलों के साथ षड़यन्त्र करने का आरोप लगाकर कपट से मार डाला गया। जाघव, जहाँगीर के समय मुगलों के साथ मिल गया था, लेकिन बाद में निजामशाह की सेवा में चला गया था। जाघव की हत्या के परिणाम स्वरूप उसका दामाद शाहजी भोंसले (शिवाजी का पिता) अपने सम्बन्धियों के साथ मुगलों से मिल गया। शाहजहाँ ने उसे पंचहजारी का मनसब दिया और उसे पूना क्षेत्र में जागीर दी। कई और महत्वपूर्ण मराठा सरदार भी शाहजहाँ के पक्ष में हो गये।
   1629 में शाहजहाँ ने अहमदनगर के विरुद्ध विशाल सेनाएँ भेजी। उनमें से एक को बालाघाट क्षेत्र में पश्चिम से आक्रमण करना था और दूसरी को तेलंगाना क्षेत्र में पूर्व से। उसकी गतिविधियों में सामन्जस्य बनाये रखने के लिए शाहजहाँ स्वयं बुरहानपुर चला गया। भारी दबाव डालकर अहमदनगर राज्य का बड़ा हिस्सा मुगल अधिकार में ले लिया गया। राज्य की एक बाहरी चौकी परेण्डा पर घेरा डाल दिया गया। अब निजामशाह ने आदिलशाह के पास करुण संदेश भेजा और कहा कि राज्य का अधिकांश भाग पहले ही मुगल अधिकार में है, अगर परेण्डा का भी पतन हो गया तो उसके साथ सम्भवतः निजामशाही वंश का भी अन्त हो जायेगा। साथ उसने यह चेतावनी भी दी कि अहमदनगर के बाद बीजापर की बारी आयेगी। बीजापुर के दरबार में अमीरों का एक शक्तिशाली दल अहमदनगर में मुगलों के तेजी से बढ़ने के कारण चिन्तित था। वास्तव में सीमा पर तैनात बीजापुरी सेनाएँ मूक दर्शक की भाँति सारी घटनाएँ देखती रही थीं। उन्होंने मुगलों की युद्ध की कार्यवाही में सक्रिय भाग नहीं लिया था। दूसरी ओर मुगलों से सन्धि के अनुसार अहमदनगर के जीते हुए क्षेत्रों का एक तिहाई क्षेत्र आदिलशाह को देने से इन्कार कर दिया था। परिणामतः आदिलशाह ने पासा पलटा और निजामशाह की सहायता करने का निर्णय कर लिया। निजामशाह ने उसे शोलापुर लौटा देने का वायदा किया था। राजनीतिक परिस्थितियों के इस परिवर्तन से विवश होकर मुगलों ने परेण्डा का घेरा उठा लिया और पीछे हट गये। किन्तु तभी अहमदनगर की आन्तरिक स्थिति मुगलों के हक में हो गयी। मलिक अम्बर के पुत्र फतहखाँ को निजामशाह ने कुछ समय के पूर्व ही इस आशा से पेशवा नियुक्त किया था कि वह शाहजहाँ को शान्ति की सन्धि के लिए प्रेरित कर लेगा। लेकिन फतहखाँ ने शाहजहाँ से समझौता कर लिया और उसके कहने पर उसने निजामशाह की हत्या कर दी और एक कठपुतली को गद्दी पर बिठा दिया। उसने मुगल बादशाह के नाम से खुतवा भी पढ़ा और सिक्का भी चलाया। इनाम के रूप में फतहखाँ को मुगल सेवा में ले लिया गया और उसे पूना के निकट वहीं जागीर प्रदान कर दी गई जो पहले शाहजी की दी गई थी। इसके परिणामस्वरूप शाहजी ने मुगलों का पक्ष छोड़ दिया। यह घटना 1632 में घटी।
   फतहखाँ के समर्पण के बाद शाहजहाँ ने महावतखाँ को दकन का वायसराय नियुक्त कर दिया और स्वयं आगरा लौट गया। बीजापुर और स्थानीय निजामशाही सरदारों के संयुक्त विरोध के कारण महावतखाँ ने स्वयं को बहुत कठिन परिस्थितियों से घिरा पाया। परेण्डा बीजापुर को समर्पण कर दिया। बीजापुर ने दौलताबाद के किले पर अधिकार करने की भरसक चेष्टा की। इसके लिए बीजापुर ने फतहखाँ को भी किले के समर्पण के बदले एक विशाल धनराशी देने का लालच दिया और अन्य स्थानों पर भी मुगलों को अपना अधिकार बनाये रखना दुष्कर हो गया।
   अतः यह स्पष्ट है कि मुगल और बीजापुर वास्तव में क्षत-विक्षत अहमदनगर पर अपना अधिकार करने के लिए संघर्षरत थे। आदिलशाह ने 1633 में दौलताबाद में समर्पण करवाने तथा वहाँ की सेना को रसद पहुँचाने के लिए रदौंलाखाँ और मुरारी पंडित के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी। शाहजी को भी मुगलों को परेशान करने तथा उनकी रसद काटने के लिए बीजापुर की सेवा में से लिया गया था। परन्तु बीजापुरी सेनाओं और शाहजी की सम्मिलित शक्ति सफल नहीं हो सकी। महावतखाँ ने दौलताबाद के एकदम निकट पहुँच कर घेरा डाल दिया और वहाँ की सेना को समर्पण करने पर विवश कर दिया। निजामशाह को ग्वालियर की जेल में भेज दिया गया। इस प्रकार निजामशाही वंश का अंत हुआ। लेकिन इससे भी मुगलों की समस्याएँ हल नहीं हो पाईं। मलिक अम्बर का अनुसरण करते हुए शाहजी ने एक निजामशाही शहजादे को ढूँढ़ लिया और उसे सुलतान बना दिया। आदिलशाह ने सात से आठ हजार घुड़सवारों की सेना शाहजी की सहायता के लिए भेजी और अनेक निजामशाही अमीरों को अपने किले शाहजी को समर्पित करने के लिए प्रेरित किया। अनेक बिखरे हुए निजामशाही सिपाही शाहजी की सेना में आ गये और उनकी सेना बीस हजार घुड़सवारों तक पहुँच गई। इस सेना की सहायता से उसने मुगलों को काफी परेशान किया और अहमदनगर राज्य के बहुत से भागों पर अधिकार कर लिया।
   इसके बाद शाहजहाँ ने दकन की समस्या पर व्यक्तिगत ध्यान देने का निर्णय ले लिया। उसने यह समझ लिया कि दकन की समस्या की पेचीदगी के मूल में बीजापुर है। अतः उसने बीजापुर को वश में करने के उपाय प्रारम्भ किये। इसीलिए उसने एक बड़ी सेना बाजीपुर पर आक्रमण करने के लिये रवाना की और साथ ही आदिलशाह के पास इस टोह के लिए भी दूत भेजे कि पुरानी संधि को लागू करके अहमदनगर राज्य को बीजापुर और मुगल में विभाजित कर लिया जाए।
   दण्ड-भेद की इस नीति तथा शाहजहाँ के दकन की ओर कूच से बीजापुर की नीति में एक और परिवर्तन हुआ। मुरारी पंडित सहित मुगल विरोधी दल के नेताओं को अपदस्थ करके मार डाला गया और शाहजहाँ के साथ एक नयी सन्धि या अहदनामा पर हस्ताक्षर किये गये। इस सन्धि के अनुसार आदिलशाह ने मुगलों के प्रभुत्व को स्वीकार कर लिया और बीस लाख रूपयों का हर्जाना देना भी स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही उसने गोलकुण्डा के कार्यों में भी हस्तक्षेप न करना स्वीकार किया, जो मुगलों की सुरक्षा में था। यह भी तय किया गया कि बीजापुर और गोलकुण्डा के बीच सभी भावी विवाद शाहजहाँ की मध्यस्थता से हल होंगे। आदिलशाह ने यह भी मंजूर किया कि शाहजी को काबू करने के लिए वह मुगलों के साथ मिलकर कार्यवाही करेगा और शाहजी द्वारा बीजापुर की सेवा में आना स्वीकार कर लेने पर उसे मुगल सीमा से दूर दक्षिण में तैनात करेगा। इन सबके बदले में बीस लाख हून (लगभग अस्सी लाख रूपये) सालाना की आय वाला अहमदनगर का एक भाग बीजापुर को दे दिया गया। शाहजहाँ ने सन्धि की अटूटता का विश्वास दिलाने के लिए आदिलशाह के पास अपनी हथेली की छाप लगा कर प्रतिज्ञा करते हुए एक फरमान भी भेजा।
   शाहजहाँ ने गोलकुण्डा के साथ भी एक सन्धि करके दकन के मामलों पर समझौते को अन्तिम रूप दिया। गोलकुण्डा के सुल्तान ने खुतबे से ईरान के शाह का नाम हटा कर शाहजहाँ का नाम सम्मिलित करना स्वीकार कर लिया। कुतुबशाह ने मुगल बादशाह के प्रति वफादार रहने का वचन दिया। इसके बदले चार लाख हूनों का वह कर, जो पहले गोलकुण्डा बीजापुर को देता था, माफ कर दिया गया। सुरक्षा के बदले मुगल बादशाह को दो लाख हून सालाना देने की व्यवस्था रखी गयी।
   बीजापुर और गोलकुण्डा से 1636 की ये सन्धियाँ राजनीतिक दृष्टि से दूरदर्शिता पूर्ण थीं। वस्तुतः इसके माध्यम से शाहजहाँ ने अकबर के अन्तिम लक्ष्यों को पूर्ण किया। देश के एक कोने से दूसरे कोने तक मुगलों की आधीनता स्वीकार कर ली गयी थी। मुगलों के साथ शान्ति सन्धि ने दकनी राज्यों को दक्षिण की ओर अपने विस्तार का और अगले दो दशकों में उन्हें अपनी शक्ति और समृद्धि की चरम सीमा तक पहुँचने का अवसर प्रदान किया।
   1636 की सन्धि के बाद के दशक में बीजापुर और गोलकुण्डा ने कृष्णा नदी से तंजौर और उससे भी आगे के समृद्ध और उपजाऊ क्षेत्र को रौंद डाला। इस क्षेत्र में कई छोटी-छोटी स्वतन्त्र हिन्दू रियासतें थीं। जिनमें से बहुत नाममात्र को ही विजयनगर के भूतपूर्व राजा रायल के प्रति वफादार थी, जैसे तंजौर, मदुरई और जिंजी के नायकों की रियासतें। इन रियासतों के विरुद्ध बीजापुर और गोलकुण्डा ने लगातार कई आक्रमण किए। शाहजहाँ की मध्यस्थता से उन्होंने यह समझौता कर लिया कि विजित प्रदेश और लूट को दो और एक के अनुपात से विभाजित कर लिया जायेगा। दो-तिहाई बीजापुर का भाग था और एक तिहाई गोलकुण्डा का। इन दोनों के मध्य अनेक झगड़ों के बावजूद दक्षिण में विजयों का क्रम जारी रहा। इस प्रकार बहुत कम समय में ही इन दोनों राज्यों का क्षेत्रफल दुगने से भी अधिक हो गया और ये अपनी शक्ति और समृद्धि की चरम सीमा पर पहुँच गए। यदि ये शासक जीते हुए प्रदेशों में अपनी स्थिति मजबूत बनाये रख सकते, तो दकन में एक लम्बा शान्ति काल स्थापित हो सकता था। दुर्भाग्य से तेजी से हुए विस्तार के कारण इन दोनों रियासतों में बचा-खुचा पारस्परिक सामन्जस्य भी समाप्त हो गया। बीजापुर के महत्वाकांक्षी सरदार शाहजी और उसके पुत्र शिवाजी ने तथा गोलकुण्डा में प्रमुख अमीर मीर जुमला ने अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र बनाने शुरू कर दिए। मुगलों ने भी देखा कि दकन में शक्ति-संतुलन बिगड़ गया है। अतः उन्होंने भी विस्तारवादी कार्यवाही के समय कृपापूर्वक तटस्थ बने रहने की कीमत माँगी। 1656 में मुहम्मद आदिलशाह की मृत्यु और दकन में औरंगजेब के मुगल वायसराय बन कर आ जाने से ये परिस्थितियाँ पूरी तरह से उभर कर आ गयीं। इन परिस्थितियों का विवेचन एक अलग अध्याय में किया जायेगा।

दकनी राज्यों का सांस्कृतिक योगदान

   सांस्कृतिक दृष्टि से दकनी राज्यों के कई योगदान हैं। अली आदिलशाह (मृत्यु 1580) हिन्दू और मुसलमान सन्तों से चर्चाएँ करना पसन्द करता था। उसे ‘सूफी’ के रूप में जाना जाता था। उसने अपने दरबार में अकबर से कहीं पहले कैथोलिक ईसाई धर्म-प्रचारकों को आमन्त्रित किया था। उसके पास बहुत समृद्ध पुस्तकालय था, जिसमें उसने संस्कृत के प्रसिद्ध व्याकरण शास्त्री वामन पंडित को नियुक्त किया था। संस्कृत और मराठी को संरक्षण देने की परम्परा का पालन उसके उत्तराधिकारियों ने भी किया।
   अली आदिलशाह का उत्तराधिकारी इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय (1580-1627) केवल नौ वर्ष की अवस्था में गद्दी पर बैठा। वह निर्धनों का बहुत ख्याल रखता था और उसे ‘‘अबला बाबा’’ अर्थात् ‘‘निर्धनों का मित्र’’ कहा जाता था। संगीत में उसकी गहरी रुचि थी। उसने रागों पर आधारित गीतों की एक पुस्तक ‘‘किताब-ए-नौरस’’ लिखी थी। उसने एक नये नगर का निर्माण करवाया, जिसका नाम नौरसपुर रखा गया। अनेक संगीतकारों को वहाँ बसने के लिए आमन्त्रित किया गया। अपने गीतों में उसने बार-बार संगीत और ज्ञान की देवी सरस्वती की वन्दना की है। अपने उदार दृष्टिकोण के कारण वह ‘जगत गुरु’’ कहलाता था। उसने हिन्दू सन्तों और मन्दिरों सहित सभी को संरक्षण दिया। उसने विठोबा की भक्ति के केन्द्र पण्धारपुर को भी दान दिया। यह महाराष्ट्र में भक्ति-आंदोलन का केन्द्र बना। इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय की उदार सहिष्णुता की नीति का पालन उसके उत्तराधिकारी करते रहे। अहमदनगर राज्य में मराठा वंशों द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का उल्लेख पहले ही किया जा चुका है। कुतुबशाह ने भी हिन्दू और मुसलमान दोनों की सेना, प्रशासन और राजनयनिक सेवाओं में समान रूप से सेवाएँ लीं। इब्राहीम कुतुबशाह (मृत्यु 1580) के शासनकाल में मुराहरी राव रियासत के पेशवा पद तक पहुँचा। पेशवा का पद मीर जुमला अथवा वजीर के पद से नीचे का था। वंश के प्रारंभ होने के समय से ही नायकवाड़ी तत्व, जो सैनिक और जमींदार थे, रियासत में प्रभावशाली थे। 1672 से 1687 तक, तब तक कि रियासत का मुगल साम्राज्य में विलयन नहीं हो गया, अहमदनगर के प्रशासनिकऔर कार्यकलापों पर मदन्ना और अखन्ना नामक दो भाईयों का प्रभाव था।
   गोलकुण्डा साहित्यकारों का बौद्धिक क्रीड़ा स्थल था। अकबर का समकालीन सुलतान मुहम्मद कुली कुतुबशाह साहित्य और स्थापत्य कला में बहुत रुचि रखता था। सुलतान न केवल कलाओं और साहित्य का संरक्षण करना था, बल्कि स्वयं भी अच्छा कवि था। वह दकनी उर्दू, फारसी और तेलुगू में काव्य रचना करता था। उसने पीछे एक वृहद् दीवान छोड़ा। वह पहला व्यक्ति था जिसने काव्य में धर्म-निरपेक्ष विषयों की बात उठाई। खुदा और हजरत की प्रशंसा के अतिरिक्त उसने प्रकृति, प्रेम और तत्कालीन सामाजिक जीवन पर भी लिखा। उर्दू के दक्कनी रूप का विकास इस काल की महत्वपूर्ण घटना है। मुहम्मद कुली कुतुबशाह के उत्‍तराधिकारियों तथा अनेक कवियों ने उर्दू को साहित्यिक भाषा के रूप में अपनाया। इन कवियों ने शैली, मुहावरे, कथ्य और शब्दों के लिए फारसी के साथ-साथ हिन्दी और तेलुगू को आधार बनाया। बीजापुर में भी उर्दू को संरक्षण प्रदान किया गया। सत्रहवीं शताब्दी के मध्य के राजकवि नुसरअली ने कनकपुर के शासक राजकुमार मनोहर पर एक प्रेम काव्य की रचना की। अठारहवीं शताब्दी में उर्दू दकन के अतिरिक्त उत्तर में भी लोकप्रिय हो गई। स्थापत्य के क्षेत्र में कुली कुतुबशाह ने अनेक इमारतों का निर्माण करवाया। इनमें से सर्वाधिक प्रसिद्ध इमारत चार मीनार है। यह इमारत कुली कुतुबशाह द्वारा निर्मित नये नगर हैदराबाद के बीचो-बीच बनायी गई थी। इसका निर्माण 1591-92 से पूरा हुआ था। इस इमारत में चार दिशाओं में चार ऊँची-ऊँची मेहराबें हैं। इसकी मुख्य सुन्दरता 48 मीटर ऊँची चार मंजिलों वाली चार मीनारें हैं। मेहरबों की दोहरी दीवारों पर महीन मीनाकारी की गई हैं। बीजापुर के शासकों ने स्थापत्य कला का स्तर निरन्तर ऊँचा रखा। उस काल की सर्वाधिक प्रसिद्ध बीजापुरी इमारतें इब्राहिम रोजा और गोल गुम्बज है। इब्राहिम रोजा, इब्राहिम आदिलशाह का मकबरा है और स्थापत्य कला का शानदार नमूना है। गोल गुम्बद का निर्माण 1660 में शुरू हुआ था। यह संसार का सबसे बड़ा गुम्बद है। इसके अनुपातों में संगति है। विशाल गुम्बद को समनुपातिक रखने के लिए उसके चार कोनों पर ऊँची शुंडाकार मीनारें बनाई गयी हैं। कहा जाता है कि मुख्य कक्ष के एक कोने में की गई फुसफुसाहट दूसरे कोने में साफ-साफ सुनाई देती है।
   अतः यह स्पष्ट हैं कि दकनी राज्यों ने साम्प्रदायिक सामन्जस्य के स्तर को बनाये रखने में सफलता प्राप्त की और संगीत, साहित्य और स्थापत्य के क्षेत्रों में भी काफी योगदान दिया।