| |||||||||
|
मुगल वंश की स्थापना - बाबर, हुमायूं एवं शेरशाह
मध्य एशिया और बाबरपन्द्रहवीं शताब्दी में मध्य और पश्चिम एशिया में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। चौदहवीं शताब्दी में मंगोल साम्राज्य के विघटन के पश्चात् तैमूर ने ईरान और तूरान को फिर से एक शासन के अन्तर्गत संगठित किया। तैमूर का साम्राज्य वोलगा नदी के निचले हिस्से से सिन्धु नदी तक फैला हुआ था और उसमें एशिया माइनर (आधुनिक तुर्की), ईरान मावराउन्नहर (ट्रांसआक्सियाना) अफगानिस्तान और पंजाब का एक भाग शामिल था। 1404 में तैमूर की मृत्यु हो गई लेकिन उसके पोते शाहरुख मिर्जा ने साम्राज्य के अधिकांश भाग पर अपना अधिकार बनाये रखा। उसने कलाओं और साहित्य को संरक्षण दिया। उसके समय में समरकन्द और हिरात पश्चिम एशिया के सांस्कृतिक केन्द्र बन गए थे। समरकन्द्र के प्रत्येक शासक की इस्लामी दुनिया में भारी प्रतिष्ठा थी। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में तैमूर के वंशजों की शक्ति में तेजी से हृास आया। जिसका कारण मुख्यतः उनकी साम्राज्य विभाजन की परम्परा थी। इस प्रक्रिया के दौरान उनके विशाल साम्राजय का स्थान बहुत-सी नई रियासतों ने ले लिया, जो आपस में लड़ती रहती थीं। तैमूर वंशजों की शक्तिहीनता का लाभ उठाकर दो नई शक्तियाँ राजनीतिक क्षितिज पर उभर कर आईं। उत्तर की ओर से मंगोलों की एक शाखा उजबेक जाति ने मावराउन्नहर (ट्रांसआक्सियाना) में अपने पैर जमाना प्रारम्भ कर दिया। उजबेको ने इस्लाम धर्म अपना लिया था, किन्तु तैमूर वंशी अभी भी उनको असभ्य बर्बर ही मानते थे। उधर मध्य एशिया के पश्चिम में ईरान में सफवी वंश की नींव पड़ी। सफवी वंश परम्परा का विकास संतों के एक विशिष्ट सम्प्रदाय से हुआ था और वे अपने को पैगम्बर का वंशज मानते थे। वे शिया मत के अनुयायी थे और शिया मत का पालन न करने वाले लोगों पर अत्याचार करते थे। दूसरी ओर उजबेक सुन्नी मत के अनुयायी थे। साम्प्रदायिक मतभेद के कारण इन दोनों शक्तियों के मध्य का संघर्ष और भी उग्र हो गया। उधर ईरान के पश्चिम में उसमानी (आटोमन) तुर्कों की शक्ति में वृद्धि हो रही थी। ये पूर्वी यूरोप के अतिरिक्त इराक और ईरान पर अपना अधिपत्य जमाना चाहते थे।इस प्रकार सौलहवीं शताब्दी में एशिया में तीन बड़ी साम्राज्य शक्तियों के बीच संघर्ष की भूमिका तैयार हो गई। 1494 में मावराउन्नहर की एक छोटी-सी रियासत फरगना का बाबर उत्तराधिकारी बना। उजबेक खतरे से बेखबर होकर तैमूर राजकुमार आपस में लड़ रहे थे। बाबर ने भी अपने चाचा से समरकन्द छीनना चाहा। उसने दो बार उस शहर को फतह किया, लेकिन दोनों ही बार उसे जल्दी ही छोड़ना भी पड़ा। दूसरी बार उजबेक शासक शैबानी खान को समरकन्द से बाबर को खदेड़ने के लिये आमंत्रित किया गया था। उसने बाबर को हराकर समरकंद पर अपना अधिकार कर लिया। शीघ्र ही उसने उस क्षेत्र के अन्य तैमूर वंशीयों की सल्तनतों को भी जीत लिया इससे बाबर को काबुल की ओर बढ़ने के लिए बाध्य होना पड़ा और उसने 1504 में उस पर अधिकार कर लिया। उसके बाद 14 वर्ष तक वह इस अवसर की तलाश में रहा कि उजबेकों को हरा कर वह अपनी मातृभूमि पर पुनः अधिकार कर सके। उसने अपने चाचा, हिरात के शासक को अपनी ओर मिलाना चाहा, लेकिन इस कार्य में वह सफल नहीं हुआ। शैबानी खान ने अन्ततः हिरात पर भी अधिकार कर लिया। इससे सफवीयों से उसका सीधा संघर्ष उत्पन्न हो गया क्योंकि वे भी हिरात और उसके आस-पास के प्रदेशों पर जिसे तत्कालीन लेखकों ने खुरासान कहा है, अपना दावा करते थे। 1510 की प्रसिद्ध लड़ाई में ईरान में शाह इस्माइल ने शैबानी को हरा कर मार डाला। इसी समय बाबर ने समरकन्द जीतने का एक प्रयत्न और किया। ईरानी सेना की सहायता से वह समरकन्द पर अपना अधिकार स्थापित करने में सफल हुआ, लेकिन जल्दी ही ईरानी सेनापतियों के व्यवहार के कारण रोष से भर गया क्यांकि वे उसे ईरानी-साम्राज्य का एक अधिनस्थ राज्य ही मानने को तैयार थे, स्वतन्त्र शासक नहीं। इसी बीच उजबेक भी अपनी हार से उभर गये। बाबर को इस बार भी समरकन्द से खदेड़ दिया गया और उसे काबुल लौटना पड़ा। स्वयं शाहे ईरान शाह इस्माइल को भी उस्मानी साम्राज्य के साथ हुई प्रसिद्ध लड़ाई में हार का सामना करना पड़ा। इस प्रकार उजबेक मावरा उन्नहर के निर्विरोध स्वामी हो गए। इन घटनाओं के कारण ही अन्ततः बाबर ने भारत की ओर रुख किया। भारत-विजयबाबर ने लिखा है कि काबुल पर अधिकार से लेकर पानीपत की विजय तक उसने हिन्दुस्तान को जीतने का विचार कभी भी नहीं त्यागा। लेकिन भारत विजय की आशंका ‘‘कभी अपने बेगों की ओर से आशंका के कारण वह कभी अपने भाईयों से मतभेद के कारण’’ पूरी न हो सकी। मध्य एशिया के कई अन्य आक्रमणकारियों की भाँति बाबर भी अपार धन राशि के कारण इसकी ओर आकर्षित हुआ था। भारत सोने की खान था। बाबर के पूर्वज तैमूर यहाँ से अपार धन दौलत और बड़ी संख्या में कुशल शिल्पी ले जाने के अतिरिक्त, जिन्होंने बाद में उसके एशिया-साम्राजय को सुदृढ़ करने और उसकी राजधानी को सुन्दर बनाने में योगदान दिया, पंजाब के एक भाग को अपने कब्जे में कर लिया था। ये भाग अनेक पीढ़ियों तक तैमूर के वंशजों के अधीन रहे थे। जब बाबर ने अफगानिस्तान पर विजय प्राप्त की तो उसने इन क्षेत्रों पर भी अपना कानूनी अधिकार समझा।काबुल की सीमित आय भी पंजाब स्थित परगनों को विजित करने का एक कारण थी। उसका (बाबर) राज्य बदखशां, कंधार और काबुल पर था, जिनसे सेना की अनिवार्यताएँ पूरी करने के लिए पर्याप्त आय भी नहीं होती थी। वस्तुतः कुछ सीमा प्रान्तों पर सेना बनाये रखने में और प्रशासन के काम में होने वाला व्यय आमदनी से ज्यादा था। सीमित आय साधनों के कारण ही बाबर अपने बेगों और परिवार वालों के लिए अधिक चीजें उपलब्ध नहीं कर सकता था। उसे काबुल पर उजबेक आक्रमण का भी भय था। वह भारत को बढ़िया शरण-स्थल समझता था। उसकी दृष्टि में उजबेकों के विरुद्ध अभियानों को संचालित करने के लिए भी यह अच्छा स्थल था। उत्तर-पश्चिम भारत की राजनीतिक स्थिति ने बाबर को भारत आने का अवसर प्रदान किया। 1517 में सिकन्दर लोदी की मृत्यु हो गई थी और इब्राहिम लोदी गद्दी पर बैठा था। इब्राहिम के एक केन्द्राभिमुख विशाल साम्राज्य स्थापित करने के प्रयत्नों ने अफगानों और राजपूतों दोनों को सावधान कर दिया था। अफगान सरदारों में सर्वाधिक शक्तिशाली सरदार दौलतखाँ लोदी था, जो पंजाब का हाकिम था पर वास्तव में लगभग स्वतन्त्र था। दौलताखाँ ने अपने बेटे को इब्राहिम लोदी के दरबार में उपहार देकर उसे मनाने का प्रयत्न किया। साथ ही साथ वह भीरा का सीमान्त प्रदेश जीत कर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश में भी लगा रहा। 1518-19 में बाबर ने भीरा के शक्तिशाली किले को जीत लिया। फिर उसने दौलतखाँ और इब्राहिम लोदी को पत्र और मौखिक सन्देश भेज कर यह माँग की कि जो प्रदेश तुर्कों के हैं, वे उसे लोटा दिए जाएँ। लेकिन दौलतखाँ ने बाबर के दूत को लाहौर में अटका लिया। वह न स्वयं उससे मिला और न उसे इब्राहिम लोदी के पास जाने दिया। जब बाबर काबुल लौट गया तो दौलतखाँ ने भीरा से उसके प्रतिनिधियों को निकाल बाहर किया। 1520-21 तक बाबर ने एक बार फिर सिन्धु नदी पार की और आसानी से भीरा और सियालकोट पर कब्जा कर लिया। ये दोनों स्थान भारत के लिए प्रवेश द्वार थे। लाहौर पर भी अधिकार कर लिया गया। वह सम्भवतः और आगे बढ़ता, लेकिन तभी उसे कन्धार में विद्रोह का समाचार मिला। वह उल्टे पाँव लौट गया और डेढ़ साल के घेरे के बाद कन्धार को जीत लिया। उधर से निश्चिंत होकर बाबर की निगाहें फिर भारत की ओर उठीं। इसी समय के लगभग बाबर के पास दौलतखाँ लोदी के पुत्र दिलावरखाँ के नेतृत्व में दूत पहुँचे। उन्होंने बाबर को भारत आने का नियन्त्रण दिया और यह सुझाव दिया कि चूँकि इब्राहिम लोदी अत्याचारी है और उसके सरदारों का समर्थन अब उसे प्राप्त नहीं है, इसीलिए उसे अपदस्थ करके बाबर राजा बने। इस बात की सम्भावना भी है कि राणा सांगा का दूत भी इसी समय भारत आक्रमण का निमन्त्रण लेकर उसके पास पहुँचा। इन दूतों के पहुँचने पर बाबर को लगा कि यदि हिन्दुस्तान को नहीं, तो सारे पंजाब को जीतने का उचित अवसर आ गया है। 1525 में जब बाबर पेशावर में था उसे खबर मिली कि दौलतखाँ लोदी ने फिर से अपना पलड़ा बदल लिया है। उसने 30000-40000 सिपाहियों को इक्ट्ठा कर लिया था और बाबर की सेनाओं को सियालकोट से खदेड़ने के बाद लाहौर की ओर बढ़ रहा था। बाबर से सामना होने पर दौलताखाँ लोदी की सेना तितर-बितर हो गई। दौलतखाँ ने आत्मसमर्पण कर दिया और बाबर ने उसे माफी दे दी। इस प्रकार सिन्धु घाटी पार करने के तीन सप्ताह बाद ही पंजाब पर बाबर का अधिकार हो गया। पानीपत की लड़ाई (20 अप्रैल, 1526)उक्त परिस्थितियों में दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के साथ संघर्ष अवश्यम्भावी था। बाबर इसके लिए तैयार था और उसने दिल्ली की ओर बढ़ना शुरू किया। इब्राहिम लोदी ने पानीपत में एक लाख सैनिकों और एक हजार हाथियों को लेकर बाबर का सामना किया। किन्तु इब्राहिम की सेना में लड़ाकू सैनिकों की संख्या वास्तव में काफी कम रही होगी। क्योंकि हिन्दुस्तानी सेना में एक बड़ी संख्या सेवकों की होती थी। इसके विपरीत बाबर के सैनिकों की संख्या आरम्भ में, जब उसने सिन्धु नदी को पार किया था, केवल 12000 ही थी। किन्तु पंजाब में बड़ी संख्या में सैनिकों और सरदारों के उसके पक्ष में मिल जाने से उसके सैनिकों की संख्या बहुत बढ़ गई थी। फिर भी बाबर की सेना की संख्या इब्राहिम की सेना के अनुपात में कम थी। बाबर ने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए अपनी सेना के एक अंश को पानीपत शहर में, जहाँ मकानों की संख्या काफी अधिक थी, टिका दिया तथा दूसरे अंश की सुरक्षा उसने खाई खोद कर उस पर पेड़ों की डालियाँ डाल कर की। सामने गाडियों की कतार खड़ी करके सुरक्षात्मक दीवार बना ली गई। इस प्रकार उसने अपनी स्थिति काफी मजबूत बना ली। दो गाड़ियों के बीच उसने ऐसी संरचना बनवायी, जिसपर सिपाही अपनी तोपें रखकर चला सकते थे। बाबर इस विधि को उस्मानी (रूमी) विधि कहता है क्योंकि इसका प्रयोग उस्मानियों ने ईरान के शाह इस्माइल के विरुद्ध हुई प्रसिद्ध लड़ाई में किया था। बाबर ने दो अच्छे निशानेबाज तोपचियों, उस्ताद अली और मुस्तफा की सेवाएँ भी प्राप्त कर ली थीं। भारत में बारूद का प्रयोग धीरे-धीरे होना शुरू हुआ। बाबर कहता है, कि इसका प्रयोग सबसे पहले उसने भीरा के किले पर आक्रमण के समय किया था। ऐसा अनुमान है कि बारूद से भारतीयों का परिचय तो था, लेकिन प्रयोग बाबर के आक्रमण के साथ ही आरम्भ हुआ।बाबर की सुदृढ़ रक्षा-पंक्ति से इब्राहिम लोदी अनभिज्ञ था। उसने सोचा कि अन्य मध्य एशियाई सेनानियों की तरह बाबर भी आवश्यकतानुसार तेजी से आगे बढ़ने या पीछे हटने की युद्ध नीति अपनायेगा। सात या आठ दिन तक छुटपुट झड़पों के बाद इब्राहिम लोदी की सेना अन्तिम युद्ध के लिए मैदान में आ गई। बाबर की रक्षा व्यवस्था की सुदृढ़ता देखकर लोदी के सैनिक हिचके। इब्राहिम लोदी अभी अपनी सेना को फिर से संगठित ही कर रहा था कि बाबर की सेना के पार्श्व वाले दोनों अंगों ने चक्कर लगाकर उसकी सेना पर पीछे और आगे से आक्रमण कर दिया। सामने की ओर बाबर के तोपचियों ने अच्छी निशानेबाजी की लेकिन बाबर अपनी विजय का अधिकांश श्रेय अपने तीरअन्दाजों को देता है। यह आश्चर्य की बात है कि वह इब्राहिम के हाथियों का उल्लेख नहीं के बराबर करता है। यह स्पष्ट है कि इब्राहिम को उनके इस्तेमाल का अवसर ही नहीं मिला। प्रारम्भिक धक्कों के बावजूद इब्राहिम की सेना वीरता से लड़ी। दो या तीन घंटों तक युद्ध होता रहा। इब्राहिम 5,000-6,000 सैनिकों के साथ अन्त तक लड़ता रहा। अनुमान है, कि इब्राहिम के अतिरिक्त उसके 15,000 से अधिक सैनिक इस लड़ाई में मारे गये। पानीपत की लड़ाई भारतीय इतिहास में एक निर्णायक लड़ाई मानी जाती है। इसमें लोदियों की कमर टूट गई और दिल्ली और आगरा तक का सारा प्रदेश बाबर के अधीन हो गया। इब्राहिम लोदी द्वारा आगरा में एकत्र खजाना अधिकार में आ जाने से बाबर की आर्थिक कठिनाइयाँ भी दूर हो गईं। जौनपुर तक का समृद्ध क्षेत्र भी बाबर के सामने प्रशस्त था। लेकिन इस क्षेत्र पर अपना अधिकार सुदृढ़ करने से पहले उसे दो कड़ी लड़ाईयाँ लड़नी पड़ी - एक मेवाड़ के विरुद्ध और दूसरी पूर्वी अफगानों के विरुद्ध। इस दृष्टिकोण से देखा जाये तो पानीपत की लड़ाई राजनीतिक क्षेत्र में इतनी निर्णायक नहीं थी जितनी कि समझी जाती है। इसका वास्ताविक महत्व इस बात में हैं कि इसने उत्तर भारत पर आधिपत्य के लिए संघर्ष के एक नए युग का सूत्रपात किया। पानीपत की लड़ाई में विजय प्राप्त करने के पश्चात् बाबर के सामने बहुत सी कठिनाईयाँ आईं। उसके बहुत से बेग भारत में लम्बे समय तक अभियान के लिए तैयार नहीं थे। गरमी का मौसम आते ही उनकी आशंका बढ़ने लगी। वे अपने घरों से दूर एक अनजाने और शत्रु देश में थे। बाबर कहता है कि भारत के लोगों ने ‘खासी’ शत्रुता निभाई, उन्होंने मुगल सेनाओं के आने पर गाँव खाली कर दिए निःसन्देह तैमूर द्वारा नगरों और गाँवों की लूटपाट और कत्लेआम उनकी याद में ताज़ा थे। बाबर यह बात जानता था कि भारतीय साधन ही उसे एक दृढ़ साम्राज्य बनाने में मदद दे सकते हैं और उनके बेगों को भी संतुष्ट कर सकते हैं। ‘‘काबुल की गरीबी हमारे लिए फिर नहीं’’ वह अपनी डायरी में लिखता है। इसलिए उसने दृढ़ता से काम लिया और भारत में रहने की अपनी इच्छा जाहिर कर दी और उन बेगों को छुट्टी दे दी जो काबुल लौटना चाहते थे। इससे उसका रास्ता साफ हो गया। लेकिन इससे राणा सांगा से भी उसकी शत्रुता हो गयी, जिसने उससे दो-दो हाथ करने के लिए तैयारियाँ शुरू कर दीं। खानवा की लड़ाईपूर्वी राजस्थान और मालवा पर आधिपत्य के लिए राणा सांगा और इब्राहिम लोदी के बीच बढ़ते संघर्ष का संकेत पहले ही किया जा चुका है। मालवा के महमूद ख़लजी को हराने के बाद राणा सांगा का प्रभाव धीरे-धीरे आगरा के निकट एक छोटी-सी नदी पीलिया खार तक बढ़ गया था। सिन्धु-गंगा घाटी में बाबर द्वारा साम्राजय की स्थापना से राणा सांगा को खतरा बढ़ गया। सांगा ने बाबर को भारत से खदेड़ने या कम से कम उसे पंजाब तक सीमित रखने के लिए तैयारियाँ शुरू कर दीं।बाबर ने राणा सांगा पर संधि तोड़ने का आरोप लगाया है। वह कहता है कि राणा सांगा ने मुझे हिन्दुस्तान आने को न्योता दिया और इब्राहिम लोदी के खिलाफ मेरा साथ देने का वायदा किया लेकिन जब मैं दिल्ली और आगरा फतह कर रहा था तो उसने पाँव भी नहीं हिलाये। इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि राणा सांगा ने बाबर के साथ क्या समझौता किया था। सम्भव है कि उसने एक लम्बी लड़ाई की कल्पना की थी, जिसका फायदा उठाकर वह उन प्रदेशों पर अपना अधिकार स्थापित करना चाहता था जिन पर उसकी निगाह थी या उसने यह सोचा हो कि दिल्ली को रौंद कर वह लोदियों की शक्ति को क्षीण करके बाबर भी तैमूर की भाँति लौट जायेगा। बाबर के भारत में ही रुक जाने के निर्णय ने परिस्थिति को पूरी तरह बदल दिया। इब्राहिम लोदी के छोटे भाई महमूद लोदी सहित अनेक अफगानों ने यह सोच कर राणा सांगा का साथ दिया कि अगर वह जीत गया, तो शायद उन्हें दिल्ली की गद्दी वापस मिल जायेगी। मेवात के शासक इसनखाँ मेवाती ने भी राणा सांगा का पक्ष लिया। लगभग सभी बड़ी राजपूत रियासतों ने राणा की सेवा में अपनी अपनी सेना भेजीं। प्रतिद्वन्दी राणा की वीरता की प्रसिद्धि तथा उसकी प्रारम्भिक सफलताओं के कारण बाबर के सिपाहियों का मनोबल गिर गया। उनमें फिर से साहस का संचार करने के लिए बाबर ने राणा सांगा के खिलाफ ‘‘जिहाद’’ का नारा दिया। लड़ाई से पहले की शाम उसने अपने आप को सच्चा मुसलमान सिद्ध करने के लिए शराब के घड़े उलट दिए और सुराहियाँ फोड़ दी। उसने अपने राज्य में शराब की खरीद-फरोख पर रोक लगा दी और मुसलमानों पर से सीमा कर हटा लिए। बाबर ने बहुत सावधानी से रणस्थली का चुनाव किया और आगरा से चालीस किलोमीटर दूर खानवा पहुँच गया। पानीपत की तरह ही उसने बाहरी पक्ति में गाड़ियाँ लगवा कर और उसके साथ खाई खोद कर दुहरी सुरक्षा पद्धति अपनायी। इन तीन पहियों वाली गाड़ियों की पंक्ति में बीच-बीच में बन्दूकचियों के आगे बढ़ने और गोलियाँ चलाने के लिये स्थान छोड़ दिया गया। खानवा की लड़ाई (1527) में जबर्दस्त संघर्ष हुआ। बाबर के अनुसार राणा सांगा की सेना में 2,00,000 से भी अधिक सैनिक थे। इनमें 10,0000 अफगान घुड़सवार और इतनी ही संख्या में हसन खान मेवाती के सिपाही थे। सम्भव है कि अन्य स्थानों की भाँति ही इस युद्ध में भी राणा की सेना के विषय में काफी अतिशयोक्ति हो, किन्तु इसमें सन्देह नहीं कि बाबर की सेना राणा की अपेक्षा छोटी थी। सांगा ने बाबर की दहिनी सेना पर कड़ा आक्रमण किया और उसे लगभग भेद दिया। लेकिन बाबर के तोपखाने ने काफी सैनिक मार गिराये और सांगा को खदेड़ दिया। इसी अवसर पर बाबर ने केन्द्र स्थित सैनिकों को जो गाड़ियों के पीछे छिपे हुए थे, आक्रमण करने की आज्ञा दी। जंजीरों से गाड़ियों से बँधे तोपखाने को भी आगे बढ़ाया गया। इस प्रकार राणा सांगा की सेना बीच मे घिर गई और बहुत से सैनिक मारे गये। सांगा की पराजय हुई। राणा सांगा बच कर भाग निकला। वह बाबर के साथ संघर्ष जारी रखना चाहता था। परन्तु उसके सामन्तों ने ही उसे जहर दे दिया जो इस मार्ग को खतरनाक और आत्मघातक समझते थे। इस प्रकार राजस्थान के महानतम योद्धा का अन्त हुआ। सांगा की मृत्यु के साथ ही आगरा तक विस्तृत संयुक्त राजस्थान के लक्ष्य को बहुत धक्का पहुँचा। खानवा की लड़ाई से दिल्ली-आगरा में बाबर की स्थिति सुदृढ़ हो गई। आगरा पूर्व में ग्वालियर और धौलपुर जैसे किलों की श्रंखला जीत कर बाबर ने अपनी स्थिति और भी मजबूत कर ली। उसने हसनखाँ मेवाती से अलवर का बहुत बड़ा भाग भी छीन लिया। फिर उसने मालवा-स्थित चन्देरी के मेदिनी राय के विरुद्ध अभियान छेड़ा। वहाँ के राजपूत सैनिकों ने रक्त की अन्तिम बूंद रहने तक बाबर का सामना किया व उनकी स्त्रियों ने जौहर कर लिया। तभी उसका किले पर अधिकार स्थापित हो पाया। पूर्वी-उत्तर प्रदेश में अफगानों की हलचल की खबर मिलने के कारण बाबर को इस क्षेत्र में अपने अभियान को सीमित करना पड़ा। अफगानअफगान यद्यपि हार गये थे, लेकिन उन्होंने मुगल शासन को स्वीकार नहीं किया था। पूर्वी उत्तर प्रदेश अब भी अफगान सरदारों के हाथ में था जिन्होंने बाबर की आधीनता को स्वीकार तो कर लिया था, लेकिन उसे कभी भी उखाड़ फेंकने को तैयार थे। अफगान सरदारों को बंगाल के सुल्तान नुसरत शाह का समर्थन प्राप्त था, जो इब्राहिम लोदी का दामाद था। अफगान सरदारों ने कई बार पूर्वी उत्तर-प्रदेश से मुगल कर्मचारियों को निकाल बाहर किया था और स्वयं कन्नौज पहुँच गए थे। परन्तु उनकी सबसे बड़ी कमजोरी सर्वमान्य नेता का अभाव थी। कुछ समय पश्चात् इब्राहिम लोदी का भाई महमूद लोदी जो खानवा में बाबर से लड़ चुका था, अफगानों के निमन्त्रण पर बिहार पहुँचा। अफगानों ने उसे अपना सुल्तान मान लिया और उसके नेतृत्व में संगठित होने लगे।यह ऐसा खतरा था, जिसको बाबर नजर अन्दाज नहीं कर सकता था। अतः 1529 के शुरू में उसने आगरा से पूर्व की ओर प्रत्थान किया। बनारस के निकट गंगा पार करके घाघरा नदी के निकट उसने अफगानों और बंगाल के नुसरत शाह की सम्मिलित सेना का सामना किया। हालाँकि बाबर ने नदी को पार कर लिया और अफगान तथा बंगाली सेनाओं को लौटने पर मजबूत कर दिया, किन्तु यह निर्णायक युद्ध सिद्ध हुआ। मध्य एशिया की स्थिति से परेशान और बीमार बाबर ने अफगानों के साथ समझौता करने का निर्णय कर लिया। उसने बिहार पर अपने आधिपत्य का एक अस्पष्ट सा दावा किया, लेकिन अधिकांश भाग अफगान सरदारों के हाथों में ही छोड़ दिया। उसके बाद बाबर आगरा लौट गया। कुछ समय बाद, जब वह काबुल जा रहा था, लाहौर के निकट उसकी मृत्यु हो गई। बाबर के भारत आगमन का महत्वबाबर का भारत-आगमन अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण था। कुषाण साम्राज्य के पतन के बाद पहली बार उत्तरी भारतीय सम्राज्य के काबुल और कन्धार सम्मिलित हुए थे। भारत पर होने वाले आक्रमणों का संचालन इन्हीं स्थानों से होता था। अतः उन पर अधिकार करके बाबर और उसके उत्तराधिकारियों ने भारत को 200 वर्षों के लिए विदेशी आक्रमणों से सुरक्षा प्रदान की। काबुल और कन्धार पर अधिकार विदेश व्यापार की दृष्टि से भी लाभप्रद सिद्ध हुआ। क्योंकि पूर्व में चीन तथा पश्चिम में भूमध्य सागरीय बंदरगाहों को जाने वाले कारवाँ अपनी यात्रा यहीं से प्रारम्भ करते थे। अतः आर्थिक दृष्टि से भी इन स्थानों की अति महत्ता थी। एशिया पार के विशाल व्यापार में भारत भी एक बड़ा हिस्सा ले सकता था।बाबर ने उत्तर भारत में लोदियों और सांगा के नेतृत्व में संयुक्त राजपूत शक्ति को समाप्त करके इस क्षेत्र के शक्ति-सन्तुलन को भंग कर दिया। पूरे भारत में एक साम्राज्य स्थापित करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम था। लेकिन इस स्वप्न को साकार करने से पूर्व बहुत सी शर्तें पूरी करनी शेष थीं। बाबर ने भारत में एक नयी युद्ध-पद्धति की शुरूआत की। यद्यपि बाबर से पहले भी भारतीय गोला-बारूद से परिचित थे, लेकिन बाबर ने ही यह प्रदर्शित किया कि तोपखाने और घुड़सेना का कुशल संयुक्त-संचालन कितनी सफलता प्राप्त करा सकता है। उसकी विजयों ने भारत में बारूद और तोपखाने के प्रयोग को शीघ्र ही लोकप्रिय बना दिया। बारूद और तोपखाने का प्रयोग मँहगा पड़ता था। अतः उससे केवल वही शासक लाभान्वित हुए जो विशेष सामर्थ्यवान थे। इससे कालान्तर में बड़े-बड़े राज्यों की स्थापना के दौर का प्रारम्भ हुआ। अपनी नई सैनिक पद्धति और व्यक्तिगत व्यवहार से बाबर ने राजपद की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित किया, जो फिरोज तुगलक की मृत्यु के बाद कम हो गयी थी। हालाँकि सिकन्दर लोदी और इब्राहिम लोदी ने राजा के सम्मान को फिर से स्थापित करने का प्रयत्न किया था, लेकिन अफगानों की जातीय स्वतन्त्रता और बराबरी की भावनाओं के कारण उन्हें आंशिक सफलता ही प्राप्त हुई थी। बाबर एशिया के दो महान योद्धाओं तैमूर और चंगेज का वंशज था। इसलिए उनके सरदार उससे बराबरी की माँग नहीं कर सकते थे और न ही उसकी गद्दी पर नजर डाल सकते थे। उसकी स्थिति को चुनौती कोई तैमूरवंशी राजकुमार ही दे सकता था। बाबर ने अपने बेगों के बीच अपने व्यक्तिगत गुणों के बल पर अपना स्थान बनाया। वह हमेशा अपने सिपाहियों के साथ कठिनाइयाँ झेलने को तैयार रहता था। एक बार कड़कती सर्दी में बाबर काबुल लौट रहा था। बफ्र इतनी ज्यादा थी कि घोड़े उसमें धँस रहे थे। घोड़ों के लिए रास्ता बनाने के लिए सिपाहियों को बफ्र हटानी पड़ रही थी। बिना किसी हिचकिटाहट के बाबर ने उनके साथ बफ्र तोड़ने का काम शुरू कर दिया। वह कहता है कि ‘‘हर कदम पर बफ्र कमर या छाती तक ऊँची थी। कुछ ही कदम चल कर आगे के आदमी थक जाते थे और उनका स्थान दूसरे ले लेते थे। जब 10-15 या 20 आदमी बफ्र को अच्छी तरह दबा देते थे, तभी घोड़ा उस पर से गुजर सकता था।‘‘ बाबर को काम करता देख कर उसके बेग भी बर्फ हटाने के लिए आ जुटे। बाबर शराब और अच्छे संगीत का शौकीन था और स्वयं भी अच्छा व खुश मिजाज साथी सिद्ध होता था। साथ ही वह बहुत अनुशासन प्रिय और कार्य लेने में कड़ा था। वह अपने बेगों का बहुत ध्यान रखता था और अगर वे स्वामीभक्त हो तो उनकी कई गलतियाँ भी माफ कर देने के लिए तैयार रहता था। अफगान और भारतीय सरदारों के प्रति भी उसका यही दृष्टिकोण था। लेकिन, उसमें क्रूरता की प्रवृत्ति मौजूद थी, जो सम्भवतः उसे अपने पूर्वजों से विरासत में मिली थी। उसने कई अवसरों पर अपने विरोधियों के सिरों के अम्बार लगवा दिये थे। किन्तु व्यक्तिगत क्रूरता के इस प्रकार के तथा अन्य उदाहरणों की समीक्षा बाबर के समय तथा तत्कालीन मूल्यों के संदर्भ में ही करनी चाहिए। हालाँकि बाबर एक कट्टर सुन्नी था, लेकिन वह धर्मान्ध नहीं था और न ही केवल उद्देश्यों से प्रेरित होकर काम करता रहा था। जब ईरान और तूरान में शियाओं और सुन्नियों के बीच तीव्र संघर्ष की स्थिति थी उसका दरबार इस प्रकार के धार्मिक विवादों और साम्प्रदायिक झगड़ों से मुक्त था। इसमें सन्देह नहीं था कि उसने सांगा के विरुद्ध ‘‘जिहाद’’ का एलान किया था और जीत के बाद ‘‘गाजी’’ की उपाधि भी धारण की थी, लेकिन उसके कारण स्पष्टतः राजनीतिक थे। युद्धों का समय होते हुए भी, मन्दिरों को तोड़ने के उदाहरण उसके संदर्भ में बहुत कम हैं। बाबर अरबी और फारसी का अच्छा ज्ञाता था। उसे तुर्की साहित्य के दो सर्वाधिक प्रसिद्ध लेखकों में से एक माना जाता है। तुर्की उसकी मातृभाषा थी। गद्य लेखक के रूप में उसका कोई सानी नहीं था। उसकी आत्मकथा तुज्क-ए-बाबरी का विश्व साहित्य के क्लासिक ग्रन्थों में स्थान है। उसकी अन्य रचनाओं में एक मसनवी और एक प्रसिद्ध रचना का तुर्की-अनुवाद है। उसका तत्कालीन प्रसिद्ध कवियों और कलाकारों से सम्पर्क था और उनकी रचनाओं के विषय में उसने अपनी जीवनी में लिखा है कि वह गहन प्रकृति-प्रेमी था। उसने भारतीय पशु-पक्षियों और प्रकृति का काफी विस्तार में वर्णन किया है। उद्यानो की संरचना और वास्तुकला के सम्बन्ध में भी उसने नई परम्परा कायम की। उसके उद्यानों में बहते पानी की व्यवस्था होती थी। बाबर ने राज्य की एक नयी अवधारणा प्रस्तुत की, जो शासक के सम्मान और शक्ति पर आधारित थी, जिसमें धार्मिक और साम्प्रदायिक मदान्धता का अभाव था तथा संस्कृति और ललित कलाओं की उन्नति व पोषण की पूरी व्यवस्था थी। इस प्रकार उसने अपने उत्तराधिकारियों के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत करके उनका मार्गदर्शन किया हुमायूँ की गुजरात-विजय और शेरशाह के साथ संघर्षहुमायूँ दिसम्बर 1530 में 23 वर्ष की अल्पायु में बाबर की गद्दी पर बैठा। उसके सम्मुख बाबर से विरासत में मिली अनेक समस्याएँ थीं। प्रशासन अभी सुगठित नहीं हुआ था। आर्थिक स्थिति भी डाँवाडोल थी। अफगानों को पूरी तरह दबाया नहीं जा सकता था और वे अब भी मुगलों को भारत से खदेड़ने के सपने देखते थे। अंत में पिता की मृत्यु के बाद पुत्रों में राज्य बाँटने की तैमूरी परम्परा की समस्या थी। बाबर ने हुमायूँ को भाईयों से नर्मी से पेश आने की सलाह दी थी, लेकिन वह नये-नये स्थापित मुगल साम्राज्य को विभाजित किये जाने के पक्ष में नहीं था। क्योंकि इसके भयंकर परिणाम हो सकते थे।जब हुमायूँ आगरा में गद्दी पर बैठा, साम्राज्य में काबुल और कंधार सम्मिलित थे और हिन्दूकुश पर्वत के पार बदख्शां पर भी मुगलों का ढीला-सा आधिपत्य था। काबुल और कन्धार हुमायूँ के छोटे भाई कामरान के शासन में थे। यह स्वाभाविक था कि वे उसी के अधिकार में रहते। लेकिन कामरान इन गरीबी से ग्रस्त इलाकों पर आधिपत्य मात्र से ही संतुष्ट नहीं था। उसने लाहौर और मुल्तान की ओर बढ़कर उन पर उन पर अधिकार कर लिया। हुमायूँ कहीं और व्यस्त था। फिर वह गृह-युद्ध प्रारम्भ भी नहीं करना चाहता था। इसलिए उसके पास इस स्थिति को स्वीकार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। कमरान ने हुमायूँ की प्रभुसत्ता मान ली और आवश्यकता पड़ने पर उसकी मदद करने का वायदा किया। कामरान के इस कृत्य में यह भय उत्पन्न हो गया कि हुमायूँ के दूसरे भाई भी अवसर मिलने पर वहीं कुछ कर सकते हैं। किन्तु पंजाब और मुल्तान कामरान को देने का तत्काल एक लाभ हुमायूँ को अवश्य हुआ। वह पश्चिम की ओर से निश्चित हो गया और पूर्व की ओर अपना ध्यान केन्द्रीत करने का उसे अवसर मिला। इन समस्याओं के अतिरिक्त हुमायूँ को पूर्व के अफगानों की बढ़ती हुई शक्ति और गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह की विजयों, दोनों से निपटना था। प्रारंभ में हुमायूँ ने यह सोचा था कि दोनों में से अफगान खतरा ज्यादा गम्भीर है। 1532 में दौराह पर उसने अफगान सेनाओं को पराजित किया और जौनपुर को अपने अधिकार में ले लिया। अफगान सेनाओं ने पहले बिहार जीत लिया था। इस सफलता के बाद हुमायूँ ने चुनार पर घेरा डाल दिया। आगरा से पूर्व की ओर जाने वाले स्थलों और जल मार्गों पर इस शक्तिशाली किले का अधिकार था और इस पूर्वी भारत के प्रवेश द्वार के रूप में प्रसिद्ध था। कुछ समय पूर्व ही इस पर शेरखाँ नाम के अफगान सरदार का अधिकार हुआ था। शेरखाँ अफगान सरदारों में सबसे ज्यादा शक्तिशाली बन चुका था। चुनार पर चार महीने के घेरे के बाद शेरखाँ ने हुमायूँ को क़िले का अधिकार अपने पास रखने के लिए मना लिया। बदले में उसने मुगलों का वफादार रहने का वचन दिया और अपने एक पुत्र को बन्धक के रूप में हुमायूँ के साथ भेज दिया। हुमायूँ ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया, क्योंकि वह जल्दी ही आगरा लौट जाना चाहता था। गुजरात के बहादुरशाह की बढ़ती शक्ति और आगरा के समीपवर्ती इलाकों पर उसकी गतिविधियों के कारण वह चिन्तित हो उठा था। वह किसी अमीर के नेतृत्व में चुनार पर घेरा डाले रहने के पक्ष में नहीं था, क्योंकि इसके कारण उसे अर्थ सेना को दो भागों में विभक्त करना होता। बहादुरशाह, जो हुमायूँ की ही आयु का था, एक योग्य और महत्वाकांक्षी शासक था। वह 1526 में गद्दी पर बैठा था और उसने मालवा पर आक्रमण करके उसे जीत लिया था। उसके बाद उसने अपना ध्यान राजस्थान की ओर केन्द्रित किया और चित्तौड़ पर घेरा डाला दिया। जल्दी ही उसने राजपूत सैनिकों की मिट्टी पलीत कर दी। बाद की किवदंतियों के अनुसार सांगा कि विधवा रानी कर्णावती ने हुमायूँ के पास राखी भेजी और उसकी मदद माँगी और हुमायूँ ने मदद करना स्वीकार कर लिया। किन्तु इस घटना का किसी समसामायिक स्रोत में उल्लेख नहीं किया गया है। अतः इस कहानी को सच नहीं माना जा सकता है लेकिन यह एक वास्तविकता है कि हुमायूँ परिस्थिति पर नजर रखने के लिए आगरा से ग्वालियर आ गया। मुगल हस्तक्षेप के भय के कारण बहादुरशाह ने राणा से संधि कर ली और काफी धन-दौलत लेकर किला उसके हाथों में छोड़ दिया। अगले डेढ़ साल हुमायूँ दिल्ली के निकट दीनपनाह नाम का नया शहर बनवाने में व्यस्त रहा। इस दौरान उसने भव्य भोजों और उत्सवों का आयोजन किया। इन कार्यों में मूल्यवान समय व्यर्थ करने का दोष हुमायूँ पर लगाया जाता है। इस बीच पूर्व में शेरशाह अपनी शक्ति बढ़ाने में व्यस्त था। यह भी कहा जाता है कि हुमायूँ अफीम का आदी होने के कारण आलसी हो गया था। लेकिन इनमें से किसी भी दोषारोपण का कोई विशेष आधार नहीं है। बाबर शराब छोड़ने के बाद अफीम लेता रहा था। हुमायूँ शराब के बदले में या उसके साथ कभी-कभी अफीम खाता था। अनेक सरदार भी ऐसा करते थे। लेकिन बाबर या हुमायूँ में से कोई भी अफीम का आदी नहीं था। दीनपनाह के निर्माण का उद्देश्य मित्र और शत्रु दोनों को प्रभावित करना था। बहादुरशाह की ओर से आगरे पर खतरा पैदा होने की स्थिति में वह नया शहर दूसरी राजधानी के रूप में भी काम आ सकता था। बहादुरशाह ने इस बीच अजमेर को जीत लिया था और पूर्वी राजस्थान को रौंद डाला था। बहादुरशाह ने हुमायूँ को और भी कड़ी चुनौती दी। वह यह कि उसने अपने दरबार में उन सब लोगों को शरण दी जो मुगलों से भयभीत थे या उनसे घृणा करते थे। यही नहीं बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर पुनः आक्रमण कर दिया था। साथ ही साथ उसने इब्राहिम लोदी के चेचेरे भाई तातारखाँ को सैनिकों व हथियारों से सहायता प्रदान की। ताकि वह 40,000 की फौज लेकर आगरा पर आक्रमण कर सके। उत्तर और पूर्व में भी हुमायूँ का ध्यान बँटाने की योजना थी। तातारखाँ की चुनौती को हुमायूँ ने जल्दी ही समाप्त कर दिया। मुगल सेना के आते ही अफगान सेना तितर-बितर हो गई। तातारखाँ की छोटी सी सेना हार गई और तातारखाँ स्वयं मारा गया। बहादुरशाह की ओर से खतरे को हमेशा के लिए खत्म करने का दृढ़ निश्चय करके हुमायूँ ने मालवा पर आक्रमण कर दिया। इस संघर्ष में हुमायूँ ने उल्लेखनीय साहस व सैनिक प्रतिभा का परिचय दिया। बहादुरशाह मुगलों का सामना करने का साहस न कर सका। उसे न केवल अपने द्वारा अधिकृत चित्तौड़ से हटना पड़ा बल्कि वह अपने मोर्चा बन्द कैम्प से भी पीछे हटने के लिये विवश हुआ। अपना तोपखाना नष्ट करके वह माण्डू की ओर भागा, किन्तु उसका बहुमूल्य साजसामान पीछे ही छूट गया। हुमायूँ तेजी से उसका पीछा कर रहा था। वह माण्डू के किले पर किसी विशेष प्रतिरोध का सामना किये बिना ही अधिकार करने में सफल हुआ। बहादुरशाह माण्डू से चम्पानेर भाग गया किन्तु हुमायूँ के नेतृत्व में एक छोटे से दल ने एक दुर्गम्य स्थान से किले की दीवार फाँदने में सफलता प्राप्त की। किले की दीवार फाँद कर किले में प्रवेश करने वाला वह इक्तालीसवाँ व्यक्ति था। बहादुरशाह वहाँ से अहमदाबाद और अन्ततः कठियावाड़ भागने के लिये विवश हुआ। इस प्रकार मालवा व गुजरात के समृद्ध क्षेत्र हुमायूँ के अधिकार में आ गये। इसके अतिरिक्त माण्डू व चम्पानेर के किलों में गुजराती शासकों का विशाल खजाना भी हुमायूँ के हाथ लगा। मालवा और गुजरात पर जिस तेजी से अधिकार हुआ था, उतनी ही जल्दी हाथ से निकला भी गये थे। जीत के बाद हुमायूँ ने इन राज्यों को अपने छोटे भाई असकरी के सेनापतित्व में छोड़ दिया और स्वयं माण्डू चला गया। माण्डू केन्द्र में भी था और वहाँ की जलवायु भी अच्छी थी। मुगल साम्राज्य के सामने सबसे बड़ी समस्या जनता के गुजराती शासन के प्रति लगाव के कारण उत्पन्न हुई। असकरी अनुभवहीन था और उसके मुगल सरदारों में परस्पर मतभेद था। जन-विद्रोहों, बहादुरशाही सरदारों की सैनिक कार्यवाही और बहादुरशाह द्वारा शीघ्रता से शक्ति के पुनर्गठन से असकरी घबरा गया। वह चम्पानेर की ओर लौटा लेकिन उसे किले से कोई सहायता नहीं मिली क्योंकि किले के सेनापति को उसके इरादों पर सन्देह था। वह माण्डू जाकर हुमायूँ के सामने नहीं पड़ना चाहता था, अतः उसने आगरा लौटने का निर्णय किया। उसके इस कृत्य से सन्देह पैदा हुआ कि वह आगरा पहुँचकर हुमायूँ को अपदस्थ करने का प्रयास कर सकता है या अपने लिए अलग हिस्सा लेने का षड़यंत्र रच सकता है। हुमायूँ कोई ऐसा मौका नहीं देना चाहता था, इसलिए उसने मालवा छोड़ दिया और तेजी से असकरी के पीछे कूच कर दिया। उसने राजस्थान में असकरी को जा पकड़ा। दोनों भाईयों में बातचीत हुई और वे आगरा लौट गये। इस बीच गुजरात और मालवा दोनों हाथ से निकल गये। गुजरात अभियान पूरी तरह असफल नहीं रहा। हालाँकि इससे मुग़ल साम्राज्य की सीमाओं में विस्तार तो नहीं हुआ, लेकिन बहादुरशाह की ओर से मुगलों को खतरा हमेशा के लिए खत्म हो गया। हुमायूँ अपनी सारी शक्ति शेरखान और अफगानों के विरुद्ध संघर्ष में लगा चुका था। गुजरात की ओर बचा खुचा खतरा भी पुर्तगाली जहाज पर हुए झगड़ों में बहादुरशाह की मृत्यु से समाप्त हो गया। शेरखाँआगरा में हुमायूँ की अनुपस्थिति के दौरान (फरवरी, 1535 से फरवरी 1537 तक) शेरखाँ ने अपनी स्थिति और मजबूत कर ली थी। वह बिहार का निर्विरोध स्वामी बन चुका था। नजदीक और दूर के अफगान उसके नेतृत्व में इकट्ठे हो गये थे। हालाँकि वह अब भी मुगलों के प्रति वफादारी की बात करता था, लेकिन मुगलों को भारत से निकालने के लिए एक सुव्यवस्थित योजना बनायी थी। बहादुरशाह से उसका गहरा सम्पर्क था। बहादुरशाह ने हथियार और धन आदि से उसकी बहुत सहायता भी की थी। इन स्रोतों के उपलब्ध हो जाने से वह एक कुशल और वृहद् सेना एकत्र कर लेने में सफल हुआ। उसके पास 1200 हाथी भी थे। हुमायूँ के आगरा लौटने के कुछ ही दिन बाद शेरखाँ ने अपनी सेना का उपयोग बंगाल के सुल्तान को हराने में किया था और उसे 1,30,000 दीनार (स्वर्ण मुद्रा) देने के लिए विवश किया था।एक नयी सेना को लैस करके हुमायूँ ने वर्ष के अन्त में चुनार को घेर लिया। हुमायूँ ने सोचा था कि ऐसे शक्तिशाली किले को शत्रु के अधिकार में छोड़ना उचित नहीं होगा क्योंकि इससे उसकी रसद के मार्ग को खतरा हो सकता था। लेकिन अफगानों ने दृढ़ता से किले की रक्षा की। कुशल तोपची रूमी खान के प्रयत्नों के बावजूद हुमायूँ को चुनार का किला जीतने में छः महीने लग गये। इसी दौरान शेरखाँ ने धोखे से रोहतास के शक्तिशाली किले पर अधिकार कर लिया। वहाँ वह अपने परिवार को सुरक्षित छोड़ सकता था। उसने बंगाल पर दुबारा आक्रमण किया और उसकी राजधानी गौंड पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार शेरखाँ ने हुमायूँ को पूरी तरह से मात दे दी। हुमायूँ को यह अनुभव कर लेना चाहिए था कि अधिक सावधानी से तैयारी के बिना वह शेरखाँ को सैनिक-चुनौती का सामना करने की स्थिति में नहीं हो सकता। लेकिन वह तत्कालीन सैनिक और राजनीतिक स्थिति नहीं समझ सका। गौड़ पर अपनी विजय के बाद शेरखाँ ने हुमायूँ के पास प्रस्ताव भेजा कि यदि बंगाल पर उसका अधिकार बने रहने दिया जाए, तो वह बिहार उसे सांप देगा और दस लाख सालाना कर देगा। यह स्पष्ट नहीं है कि इस प्रस्ताव के सिलसिले में शेरखाँ कितना ईमानदार था। लेकिन हुमायूँ बंगाल को शेरखाँ के पास रहने देने के लिए तैयार नहीं था। बंगाल सोने का देश था, उद्योगों में उन्नत था और विदेश व्यापार का केन्द्र था। साथ ही बंगाल का सुल्तान जो घायल अवस्था में हुमायूँ की छावनी में पहुँच गया था, का कहना था कि शेरखाँ का विरोध अब भी जारी है। इन सब कारणों से हुमायूँ ने शेरखाँ का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया और बंगाल पर चढ़ाई करने का निर्णय लिया। बंगाल का सुल्तान अपने घावों के कारण जल्दी ही मर गया। अतः हुमायूँ को अकेले ही बंगाल पर चढ़ाई करनी पड़ी। हुमायूँ का बंगाल अभियान उद्देश्यहीन था और वह उस विनाश की पूर्वपीठिका थी, जो उसकी सेना में लगभग एक वर्ष बाद चौसा में हुआ। शेरखाँ बंगाल छोड़कर दक्षिण बिहार में पहुँच गया था। उसने बिना किसी प्रतिरोध के हुमायूँ को बंगाल की ओर बढ़ने दिया तथा हुमायूँ के रसद लाने ले जाने के मार्ग को काट दिया, जिससे वह बंगाल में ही फँसा रहे। गौंड पहुँच कर हुमायूँ ने तुरन्त कानून और व्यवस्था स्थापित करने का प्रयत्न किया। लेकिन इससे उसकी कोई भी समस्या हल नहीं हुई। उसके भाई हिंदाल द्वारा आगरा में अपनी ताजपोशी का प्रयास करने के कारण स्थिति और बिगड़ गई। इस कारण से और शेरखाँ की गतिविधियों के कारण हुमायूँ आगरा से रसद और समाचारों से पूरी तरह कट गया। गौंड में तीन या चार महीने रुकने के बाद हुमायूँ ने आगरा की ओर प्रस्थान किया। उसने पीछे सेना की एक टुकड़ी छोड़ दी अमीरों में असन्तोष की स्थिति, वर्षा ऋतु और लूटपाट के लिए किए गए अफगानों के निरन्तर आक्रमणों के बावजूद हुमायूँ अपनी सेना को बनारस के निकट चौसा तक बिना किसी नुकसान के लाने में सफल हुआ। यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी, जिसका श्रेय हुमायूँ को मिलना चाहिए। इसी बीच कामरान हिंदाल का विद्रोह कुचलने के लिए लाहौर से आगरा की ओर बढ़ आया था। कामरान हालाँकि हुमायूँ के प्रति निष्ठाहीन नहीं था, लेकिन फिर भी उसने हुमायूँ की कुमुक नहीं भेजी। ऐसा करने से शक्ति सन्तुलन का पलड़ा मुगलों की ओर झुक सकता था। इन हताशाओं के बावजूद हुमायूँ को शेरखाँ के विरुद्ध अपनी सफलता पर विश्वास था। वह इस बात को भूल गया कि उसका सामना उस अफगान सेना से है, जो एक साल पहले की सेना से सर्वथा भिन्न थी। उसने सर्वश्रेष्ठ अफगान सेनापति के नेतृत्व में लड़ाईयों का अनुभव और आत्म-विश्वास प्राप्त किया था। शेरखाँ कि ओर से शान्ति के एक प्रस्ताव से धोखा खा कर हुमायूँ कर्मनाशा नदी के पूर्वी किनारे पर आ गया और इस प्रकार उसने यहाँ उपस्थित अफगान घुड़सवारों को आक्रमण करने का पूरा मौका दे दिया। हुमायूँ ने इस अवसर पर न केवल निम्न कोटि की राजनीतिक सूझबूझ का वरन् निम्न कोटि के सेनापतित्व का भी परिचय दिया। उसने गलत मैदान चुना और शेरखाँ को अपनी असावधानी से फायदा उठाने का मौका दिया। हुमायूँ एक भिश्ती की मदद से नदी तैर कर बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचा सका। शेरखाँ के हाथ बहुत सी सम्पत्ति आई। लगभग 7,000 मुगल सैनिक और बड़े अमीर मारे गये। चौसा की पराजय (मार्च 1539) के बाद केवल तैमूर वंशी राजकुमारों और अमीरों में पूर्ण एकता ही मुगलों को बचा सकती थी। कामरान की 10,000 सैनिकों की लड़ाकू फौज आगरा में उपस्थित थी। लेकिन वह इसकी सेवाएँ हुमायूँ को अर्पित करने को तैयार नहीं था क्योंकि हुमायूँ के नेतृत्व में उसका विश्वास नहीं रह गया था। दूसरी ओर हुमायूँ भी सेनाओं को कामरान के नेतृत्व में छोड़ने को तैयार नहीं था, क्योंकि उसे भय था कि कहीं वह स्वयं सत्ता हथियाने में उनका प्रयोग न कर ले। दोनों भइयों में शक बढ़ता रहा। अन्ततः कामरान ने अपनी सेना सहित लाहौर लौटने का निर्णय कर लिया। हुमायूँ द्वारा आगरा जल्दबाजी इक्ट्ठी की गई सेना के मुकाबले में कमजोर थी, लेकिन कन्नौज की लड़ाई (मई 1540) भयंकर थी। हुमायूँ के दोनों छोटे भाई असकरी और हिंदाल वीरतापूर्वक लड़े, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। कन्नौज की लड़ाई शेरखाँ और मुगलों के बीच निर्णायक सिद्ध हुई। हुमायूँ अब राज्यविहिन राजकुमार था क्योंकि काबुल और कन्धार कामरान के पास ही रहे। वह अगले ढाई वर्ष तक सिन्ध और उसके पड़ोसी राज्यों मे घूमता रहा और साम्राज्य को पुनः प्राप्त करने के लिए योजनाएँ बनाता रहा, लेकिन न तो सिन्ध का शासक ही इस कार्य में उसकी मदद करने को तैयार था और न ही मारवाड़ का शक्तिशाली शासक मालदेव। उसके अपने भाईयों के विरुद्ध हो जाने के पश्चात् स्थिति और भी बिगड़ गई। उन्होंने हुमायूँ को मरवा डालने या कैद करने के प्रयत्न भी किये। हुमायूँ ने इन सब परीक्षाओं और कठिनाईयों का सामना धैर्य और साहस से किया। इसी काल में हुमायूँ के चरित्र की दृढ़ता का पूरा प्रदर्शन हुआ। अन्ततः हुमायूँ ने ईरानी शासक के दरबार में शरण ली और 1545 में उसी की सहायता से काबुल और कन्धार को फिर से जीत लिया। उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि शेरखाँ के विरुद्ध हुमायूँ की असफलता का सबसे बड़ा कारण उसके द्वारा अफगान शक्ति को समझ पाने की असमर्थता थी। उत्तर-भारत में अनेकानेक अफगान जातियाँ फैली हुई थीं। वे कभी भी किसी योग्य नेता के नेतृत्व में एकत्र होकर चुनौती दे सकती थी। स्थानीय शासकों और जमींदारों को अपनी ओर मिलाये बिना मुगल संख्या में अफगानों से कम ही रहते। प्रारम्भ में हुमायूँ के प्रति उसके भाई पूरी तरह वफादार रहे। उनके बीच वास्तविक मतभेद शेरखाँ की विजयों के बाद ही पैदा हुआ। कुछ इतिहासकारों ने हुमायूँ के अपने भाईयों के साथ मतभेदों और उसके चरित्र सम्बन्धी दोषों को अनुचित रूप से बढ़ा-चढ़ाकर कहा है। बाबर की भाँति ओजपूर्ण न होते हुई भी हुमायूँ अविवेक से आयोजित बंगाल अभियान के पूर्व एक अच्छा सेनापति और राजनीतिज्ञ सिद्ध हुआ था। शेरखाँ के साथ हुई दोनों लड़ाइयों में शेरखाँ ने अपने आपको कुशल सेनापति सिद्ध किया था। हुमायूँ का जीवन रोमांचक था। वह समृद्ध से कंगाल हुआ और फिर कंगाली से समृद्ध हुआ। 1555 में सूर साम्राज्य के विघटन के बाद वह दिल्ली पर फिर से अधिकार करने में सफल हुआ। लेकिन वह अपनी विजय के फल का आनन्द उठाने के लिए अधिक समय जीवित नहीं रहा। दिल्ली में अपने किले के पुस्तकालय की इमारत की पहली मंजिल से गिर जाने के कारण उसकी मृत्यु हो गई। उसकी प्रिय बेगम ने किले के निकट ही उसकी याद में बहुत सुन्दर मकबरा बनवाया। यह इमारत उत्तर भारत के स्थापत्य में नई शैली के सूत्रपात की द्योतक है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसका संगमरमर से निर्मित गुम्बद है। शेरशाह और सूर साम्राज्य (1540-55)शेरशाह 67 वर्ष की वृद्धावस्था में दिल्ली की गद्दी पर बैठा। उसके प्रारम्भिक जीवन के बारे में विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है। उसका वास्तविक नाम फरीद था और उसका पिता जौनपुर में एक छोटा जमींदार था। फरीद ने पिता की जागीर की देखभाल करते हुए काफी प्रशासनिक अनुभव प्राप्त किया। इब्राहिम लोदी की मृत्यु और अफगानों की स्थिति संकटपूर्ण हो जाने पर वह एक शक्तिशाली अफगान सरदार के रूप में उभरा व कालान्तर में उनका नेतृत्व अपने हाथ में संभाला। शेरखाँ की उपाधि उसे उसके संरक्षक ने एक शेर मारने पर दी थी। जल्दी ही शेरखाँ बिहार के शासक का दाहिना हाथ बन गया। वह वास्तव में बिहार का बेताज बादशाह था। ये सब घटनाएँ बाबर की मृत्यु के पूर्व की है। इस प्रकार शेरखाँ ने अचानक ही महत्व नहीं प्राप्त कर लिया था। शेरशाह ने शासक के रूप में जिस सशक्त साम्राज्य पर राज किया वह मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के पश्चात् उत्तरी भारत में पहली बार स्थापित हुआ था। उसका राज्य सिन्धु नदी से कश्मीर सहित बंगाल तक फैला हुआ था। पश्चिम में उसने मालवा और लगभग सारा राजस्थान जीत लिया था। उस समय मालवा कमजोर और बिखरा हुआ था अतः विरोध कर पाने की स्थिति में नहीं था। लेकिन राजस्थान में स्थिति भिन्न थी। मालदेव ने जो 1532 में गद्दी पर बैठा था उसने शीघ्र ही सारे पश्चिमी और उत्तरी राजस्थान को अपने अधिकार में कर लिया था। शेरशाह और हुमायूँ के बीच संघर्ष के समय उसने अपनी सीमाओं का और भी विस्तार कर लिया था। जैसलमेर के भट्टियों की मदद से उसने अजमेर को भी जीत लिया। इन विजयों के दौरान उसका संघर्ष मेवाड़ व इस क्षेत्र के अन्य शासकों से हुआ। हाल ही में उसने बीकानेर पर विजय प्राप्त की थी। लड़ाई में बीकानेर का शासक वीरतापूर्वक लड़ते हुए मारा गया। उसके लड़के कल्याण दास और भीम शेरशाह की शरण में पहुँचे। कई अन्य लोग भी शेरशाह के दरबार में पहुँचे। इनमें मालदेव के सम्बन्धी मेड़ता के बीरम देव भी थे, जिन्हें उसने उनकी जागीर से बेदखल कर दिया था। इस प्रकार वही स्थिति उत्पन्न हो गई, जो बाबर और राणा सांगा के समक्ष थी। मालदेव द्वारा राजस्थान में एक केन्द्रीकृत शासन की स्थापना के प्रयत्न को दिल्ली और आगरा के सुल्तान द्वारा खतरा समझा जाना अवश्यभावी था। मालदेव के पास एक सशक्त सेना थी व तत्कालीन विश्वास के अनुसार उसके पास 50,000 सिपाही थे, लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि मालदेव की नजर दिल्ली या आगरा पर थी। पूर्व संघर्षों की भाँति इस बार भी दोनों पक्षों के बीच संघर्ष का कारण सैनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र पूर्वी राजस्थान पर आधिपत्य था।1544 में अजमेर और जौधपुर के बीच सेमल नामक स्थान पर राजपूत और अफगान फौजों के बीच संघर्ष हुआ। लगभग एक महीना इंतजार करने के बाद मालदेव अचानक ही जोधपुर की ओर लौट गया। तत्कालीन लेखकों के अनुसार ऐसा शेरशाह की चतुराई के कारण ही संभव हुआ था। उसने उस क्षेत्र के राजपूत सेनापतियों को कुछ पत्र लिख कर मालदेव के पड़ाव के पास डलवा दिये ताकि मालदेव के मन में उनकी स्वामिभक्ति के प्रति सन्देह उत्पन्न हो जाए। चाल काम कर गयी मालदेव को अपनी गलती जब पता चली तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कुछ राजपूत सरदारों ने पीछे लौटने से इन्कार कर दिया। उन्होंने 10,000 सैनिकों की छोटी सी सेना लेकर शेरशाह की सेना के केन्द्रीय भाग पर आक्रमण कर दिया और उसकी सेना में भगदड़ मचा दी। किन्तु अफगान सेना में सैनिक अधिक होने के कारण व तोपखाना बेहतर होने के कारण स्थिति पर शीघ्र ही काबू पा लिया गया तथा राजपूतों के आक्रमणों को रोक दिया गया। राजपूत सेना पराजित हो गई। सेमल की लड़ाई ने राजस्थान के भाग्य का निर्धारण कर दिया। इसके बाद शेरशाह ने अजमेर और जोधपुर पर घेरा डाल दिया और उन्हें जीत कर मालदेव को रेगिस्तान की ओर खदेड़ दिया। अब उसने अपना ध्यान मेवाड़ की ओर केन्द्रीत किया वहाँ का राणा मुकाबला करने की स्थिति में नहीं था। उसने चित्तौड़ के किले की चाबियाँ शेरशाह के पास भिजवा दी। शेरशाह ने अपनी चौकियाँ आबू पर्वत तक स्थापित कर ली थी। इस प्रकार दस महीने की छोटी सी अवधि में ही शेरशाह ने लगभग सारे राजस्थान को जीत लिया। उसका अन्तिम अभियान कालिंजर के किले के विरुद्ध था। यह किला बहुत मजबूत था और बुंदेलखण्ड का द्वार था। घेरे के दौरान एक तोप फट गई, जिससे शेरशाह गम्भीर रूप से घायल हो गया। वह किले पर फतह का समाचार सुनने के बाद मौत की नींद सो गया। शेरशाह के बाद उसका दूसरा पुत्र इस्लामशाह गद्दी पर बैठा और उसने 1553 तक राज किया। इस्लामशाह एक योग्य शासक और सेनापति था, लेकिन उसकी अधिकांश शक्ति अपने भाईयों और कई अफगान सरदारों के विद्रोह के दमन और मुगलों के आक्रमण का निरन्तर खतरा बने रहने के कारण इस्लामशाह अपने साम्राज्य का विस्तार नहीं कर सका। युवावस्था में ही उसकी मृत्यु हो जाने के कारण उसके उत्तराधिकारियों में गृह-युद्ध छिड़ गया। इससे हुमायूँ को भारत के साम्राज्य को पुनः हासिल करने का अवसर मिल गया, जिसकी वह प्रतिक्षा कर रहा था। 1555 की दो जबरदस्त लड़ाईयों में उसने अफगानों को पराजित कर दिया और दिल्ली तथा आगरा को फिर से जीत लिया। शेरशाह का योगदानबाबर और हुमायूँ का शासन काल वस्तुतः एक अन्तराल है। शेरशाह के मुख्य योगदानों में से एक यह है कि उसने अपने सम्पूर्ण साम्राज्य में कानून और व्यवस्था को फिर से स्थापित किया। वह चोरों, डाकुओं और उन जमींदारों से सख्ती से पेश आया, जो भू-राजस्व देने से या सरकार के आदेश मानने से इन्कार करते थे। शेरशाह का इतिहासकार अब्बासखाँ सरवानी के विवरण से ज्ञात होता है कि जमींदार इतना डर गये थे कि कोई उसके खिलाफ विद्रोह का झंडा उठाना नहीं चाहता था और न किसी की यह हिम्मत पड़ती थी कि अपनी जागीर से गुजरने वाले राहगीरों को परेशान करे।शेरशाह ने व्यापार की उन्नति और आवागमन के साधनों की व्यवस्था में सुधार की ओर बहुत ध्यान दिया। शेरशाह ने पुरानी शाही सड़क, जिसे ग्रांड ट्रंक रोड कहा जाता है, की मरम्मत करवाई। यह सड़क सिन्धु नदी से बंगाल के सोना गाँव को जोड़ती थी। उसने आगरा से जोधपुर और चित्तौड़ तक की सड़क का निर्माण करवाया और उसे गुजरात के बन्दरगाहों से जुड़ी सड़कों से मिलाया। उसने लाहौर से मुल्तान तक तीसरी सड़क का निर्माण करवाया। मुल्तान उस समय पश्चिम और मध्य एशिया की ओर जाने वाले कारवाओं के पड़ाव का केन्द्र था। यात्रियों की सुविधा के लिए शेरशाह ने इन सड़कों पर प्रत्येक दो कोस (लगभग आठ किलोमीटर) पर सरायों का निर्माण करवाया। सराय में यात्रियों के रहने-खाने तथा सामान सुरक्षित रखने की व्यवस्था होती थी। इन सरायों में हिन्दुओं और मुसलमानों के रहने के लिए अलग-अलग व्यवस्था होती थी। हिन्दू यात्रियों के भोजन और रहने की व्यवस्था तथा उनके घोड़ों के लिए दाने आदि का प्रबन्ध करने के लिए ब्राह्मणों की नियुक्ति होती थी। अब्बासखाँ कहता है कि इन सरायों में यह नियम था कि वहाँ जो भी आता था, उसे सरकार की ओर से उसके पद के अनुरूप भोजन और जानवरों को दाना-पानी मिलता था। इन सरायों के आसपास गाँव बसाने का प्रयत्न किया गया और कुछ जमीन सरायों का खर्च पूरा करने के लिए अलग कर दी गई। प्रत्येक सराय में एक शहना (सुरक्षा अधिकारी) के अधीन कुछ चौकीदार होते थे। कहा जाता है कि शेरशाह ने कुल 1700 सरायों का निर्माण करवाया। इनमें से कुछ अब भी अवशिष्ट है, जिससे पता चलता है कि वे कितनी मजबूती से बनायी गई थी। उसकी सड़कों और सरायों को साम्राज्य की धमनियाँ कहा जाता था। उनसे देश में व्यापार की उन्नति में सहायता मिली। बहुत सी सरायों के आसपास कस्बे विकसित हो गये, जहाँ किसान अपनी उपज बेचने के लिए आते थे। सरायों को डाक-चौकियों के पड़ाव के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता था। डाक-चौकियों की व्यवस्था के विषय में एक पूर्व अध्याय में चर्चा की जा चुकी है। इनके माध्यम से शेरशाह को अपने विशाल साम्राज्य की घटनाओं की जानकारी मिलती रहती थी। शेरशाह ने व्यापार और वाणिज्य की उन्नति के लिये कुछ अन्य सुधार लागू किये इनमें सबसे महत्वपूर्ण सीमा शुल्क के क्षेत्र में हैं। उसके विशाल साम्राजय में चुंगी केवल दो स्थानों पर ही देनी होती थी। बंगाल में उत्पादित या बाहर से आयातित वस्तुओं पर बंगाल बिहार सीमा स्थित सीकरीगली नामक स्थान पर चुंगी लगती थी, जबकि पश्चिम या मध्य एशिया में आने वाली वस्तुओं पर व्यापारियों को केवल सिन्धु नदी पर चुंगी अदा करनी होती थी। इन स्थानों के अतिरिक्त अन्य कही सड़कों, जलमार्गों या नगरों में, चुंगी वसूल करने की किसी को आज्ञा नहीं थी। दूसरी बार चुंगी केवल माल की बिक्री के अवसर पर ही अदा की जाती थी। शेरशाह ने अपने हाकिमों और आमिलों को इस बात का आदेश दिया कि वे लोगों व यात्रियों और व्यापारियों से अच्छा व्यवहार करें और उन्हें किसी तरह की हानि न पहुँचावे। अगर किसी व्यापारी की मृत्यु हो जाती थी, तो उसके सामान को लावारिस मान कर जब्त नहीं किया जा सकता था। शेरशाह ने शेख नजामी का सूत्र दिया था ‘‘यदि तुम्हारे देश में किसी व्यापारी की मृत्यु होती है तो उसकी सम्पत्ति को हाथ लगाना विश्वासघात होगा।’’ किसी व्यापारी को यदि मार्ग में कोई नुकसान होता था, तो शेरशाह गाँव के मुखिया (मुकद्दम) या जमींदार को उत्तरादायी ठहराता था। व्यापारियों के सामान चोरी हो जाने पर मुकद्दम या जमींदार को चोरों या लुटेरों के अड्डों का पता बताना पड़ता था। उसमें असफल रहने पर स्वयं वह सजा भुगतनी पड़ती थी, जो चोरों या लुटेरों को मिल सकती थी। मार्गों पर हत्या की वारदात हो जाने पर भी यही कानून लागू होता था। अपराधी के स्थान पर निरपराध को उत्तरादायी ठहराना बर्बर कानून अवश्य था, लेकिन लगता है कि इसका काफी प्रभाव पड़ा। अब्बास सरवानी की चित्रमय भाषा में ‘एक जर्जर बूढ़ी औरत भी अपने सिर पर जेवरात की टोकरी रख कर यात्रा पर जा सकती थी और शेरशाह की सजा के डर के कारण कोई चोर या लुटेरा उसके नजदीक नहीं जा सकता था।’’ शेरशाह के मुद्रा सुधारों में भी व्यापार और शिल्पों की उन्नति में सहायता मिली। उसने खोट मिले मिश्रित धातुओं के सिक्कों के स्थान पर सोने, चाँदी और ताँबे के बढ़िया मानक सिक्के ढलवाये। उसका चाँदी का रूपया इतना प्रमाणिक था कि वह शताब्दियों बाद तक मानक सिक्के के रूप में प्रचलित रहा। मानक बाटों और मापों को सम्पूर्ण साम्राज्य में लागू करने का उसका प्रयत्न भी व्यापार की वृद्धि में बहुत सहायक सिद्ध हुआ। शेरशाह ने सल्तनतकाल से चली आ रही प्रशासकीय इकाईयों में कोई परिवर्तन नहीं किया। परगने के अन्तर्गत कुछ गाँव होते थे। परगना एक सिकदार के अधीन होता था। सिकदार का काम कानून और व्यवस्था तथा सामान्य प्रशासन का कार्य देखना था। मुंसिफ या आमिल भी उसके आधीन होता था। जिसका कार्य भू-राजस्व इकट्ठा करना होता था, लेखा फारसी तथा स्थानीय भाषाओं में दोनों में रखा जाता था। परगने के ऊपर शिक अथवा सरकार होता था, जिसकी देखभाल शिकदर-ए-शिकदारान और मुंसिफ-ए-मुंसिफान करते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि केवल अधिकारियों के पदनाम ही नये थे, क्योंकि परगना और सरकार दोनों ही प्रशासनिक इकाइयाँ पहले के समय से ही विद्यमान थीं। कई सरकारों को मिलकार सूबे का निर्माण होता था, परन्तु शेरशाह के समय के प्रान्तीय प्रशासन की पद्धति के विषय में कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है। ऐसा लगता है कि कई इलाकों में हाकिम अत्यन्त शक्तिशाली व सर्वाधिकार सम्पन्न थे। बंगाल जैसे कुछ इलाकों में वास्तविक सत्ता कबीलाई सरदारों के हाथों में सन्निहित थी तथा सूबे के हाकिम का उन पर केवल नाम मात्र का प्रभुत्व रहता था। वस्तुतः शेरशाह ने सल्तनत काल से चली आ रही केन्द्रीय प्रशासन व्यवस्था को ही बनाये रखा। परन्तु, इस विषय में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। शेरशाह वजीरों के हाथ में अधिकार सौंपने में विश्वास नहीं रखता था। वह सुबह से देर रात तक राज्य के कार्यों में व्यस्त रहता था और कड़ा परिश्रम करता था। वह प्रजा की हालत जानने के लिए अक्सर देश का भ्रमण करता था। लेकिन कोई व्यक्ति, चाहे वह कितना ही परिश्रमी क्यों न हो, भारत जैसे बृहद देश के क्रिया-कलापों को अकेला नहीं संभाल सकता था। शेरशाह द्वारा प्रशासन की अति केन्द्रीयकृत पद्धति अपनाने व अधिकांश अधिकार अपने हाथ में रखने की प्रवृत्ति की कमजोरियाँ उसकी मृत्यु के बाद उभर कर आईं। शेरशाह ने भू-राजस्व प्रणाली, सेना और न्याय पर बहुत ध्यान दिया। अपने पिता की जागीर का काम अनेक वर्षों तक संभालने और फिर बिहार के शासन की देख-भाल करने के कारण शेरशाह भू-राजस्व प्रणाली के प्रत्येक स्तर के कार्य से भली-भाँति परिचित था। कुछ योग्य प्रशासकों की मदद से उसने सारी प्राणाली को पुनर्व्यवस्थित किया। अब उपज की मात्रा का अनुमान नहीं लगाया जाता था, न ही उपज को खेतों या खालिहानों में हिस्सों में बाँटा जाता था। शेरशाह ने बुआई के अन्तर्गत आने वाली भूमि की पैमाइश कराने पर जोर दिया। दरों की एक प्रणाली (जिसे रय कहा जाता था) निकाली गई, जिसके अन्तर्गत उपज की अलग-अलग किस्मों पर राज्य के भाग की दर अलग-अलग होती थी। उसके बाद अलग-अलग क्षेत्रों में बाजार भावों के अनुसार उस भाग की कीमत तय की जाती थी। राज्य का भाग एक-तिहाई होता था। भूमि को भी उत्तम, मध्यम और निम्न कोटियों में बाँटा जाता था। उनकी औसत उपज का हिसाब लगा कर उसका एक तिहाई भाग राजस्व के रूप में लिया जाता था। यद्यपि वह राज्य कर का भुगतान नकदी में चाहता था परन्तु यह कास्तकारों पर निर्भर करता था कि वे कर नकद दें या अनाज के रूप में दें। बुआई का क्षेत्रफल, फसल की किस्म और किसान द्वारा देय कर एक पट्टे पर लिख लिया जाता था और किसान को उसकी सूचना दे दी जाती थी। किसी को किसान से नियत कर अधिक लेने का अधिकार नहीं था। नाप-जोख करने वाले दलों के सदस्यों का मेहनता भी निर्धारित होता था। अकाल व अन्य प्राकृतिक विपदाओं का मुकाबला करने के लिए प्रति बीघा ढाई सेर अनाज अतिरिक्त कर के रूप में लिया जाता था। शेरशाह काश्तकारों के कल्याण का बहुत ख्याल रखता था कि काश्ताकार निर्दोष हैं, वे अधिकारियों के आगे झुक जाते हैं और अगर मैं उन पर जुल्म करुँ तो ये अपने गाँव छोड़ कर चले जाएँगे, देश बर्बाद और वीरान हो जायेगा और दोबारा समृद्ध होने के लिए उसे बहुत लम्बा वक्त लगेगा। उस काल में खेती योग्य बहुत भूमि उपलब्ध थी और जुल्म होने पर काश्तकारों द्वारा गाँव छोड़कर चले जाना एक बहुत बड़ा खतरा था और इस स्थिति के कारण ही शासकों द्वारा काश्तकारों का शोषण करने पर एक अंकुश रहता था। शेरशाह ने अपने विशाल साम्राज्य की सुरक्षा के लिए एक मजबूत सेना तैयार की। उसने कबीलाई सरदारों के नेतृत्व में राज्य की सेवा के लिये निश्चित मात्रा में सैनिक उपलब्ध कराने की पद्धति को समाप्त कर दिया और चरित्र-पुष्टि के आधार पर सैनिकों की सीधी भर्ती शुरू कर दी। हर सैनिक का हुलिया (चेहरा) दर्ज होता था, उसके घोड़ों पर शाही निशान दागा जाता था। ताकि घटिया नस्ल के घोड़े से उसे बदला न जा सके । संभवतः घोड़ों को दागने की परम्परा शेरशाह ने अलाउद्दीन खलजी से अपनायी, जिसने सैनिक-सुधारों के अन्तर्गत इस विधि को शुरू किया था। शेरशाह की अपनी सेना में 1,50,000 पैदल सिपाही, 25,000 घुड़सवार जो धनुषों से लैस होते थे, 5000 हाथी और एक तोपखाना था। उसने साम्राज्य के विभिन्न भागों में छावनियाँ बनवाई और प्रत्येक में एक मजबूत सैन्य टुकड़ी को तैनात किया। शेरशाह न्याय पर बहुत बल देता था। वह कहा करता था कि ‘‘न्याय सबसे बढ़िया धार्मिक कार्य है और इसे काफिर और मुसलमान राजा समान रूप से स्वीकार करते हैं।’’ वह जुल्म करने वालों को कभी क्षमा नहीं करता था, चाहे वे बड़े सरदार या अपनी जाति के लोग या निकट सम्बन्धी ही क्यों न हों। कानूनी व्यवस्था के लिए विभिन्न स्थानों पर काजियों की नियुक्ति की जाती थी, लेकिन पहले की भाँति गाँव पंचायतें और जमींदार भी स्थानीय स्तर पर दीवानी और फौजदारी मुकदमों की सुनवाई करते थे। न्याय व्यवस्था करने के लिए शेरशाह के पुत्र और उत्तराधिकारी इस्लामशाह ने एक और बड़ा कदम उठाया। इस्लामशाह ने कानून को लिखित रूप देकर इस्लामी कानूनी की व्याख्याओं के लिए कुछ विशेष व्यक्तियों पर निर्भर रहने की आवश्यकता को समाप्त कर दिया। इस्लामशाह ने सरदारों के अधिकारों और विशेषाधिकारों को भी कम करने का प्रयास किया और उसने सैनिकों को नकद वेतन देने की परम्परा भी आरम्भ की, लेकिन उसकी मृत्यु के साथ ही उसकी अधिकांश व्यवस्थाएँ लुप्त हो गईं। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि शेरशाह का व्यक्तित्व असाधारण था। उसने पाँच साल के शासन की छोटी सी अवधि में प्रशासन की सुदृढ़ प्रणाली स्थापित की। वह महान भवन-निर्माता भी था। सहसाराम स्थित शेरशाह का मकबरा, जो उसने अपने जीवन काल में निर्मित करवाया था, स्थापत्य कला का एक शानदार नमूना है। इसे पूर्वकालीन स्थापत्य शैली की पराकष्ठा तथा नवीन शैली के प्रारम्भ का द्योतक माना जाता है। शेरशाह ने दिल्ली के निकट यमुना के किनारे एक नया शहर भी बनवाया। इसमें अब केवल पुराना किला और उसके अन्दर बनी एक सुन्दर मस्जिद ही शेष है। शेरशाह विद्वानों को भी संरक्षण देता था। मलिक मुहम्मद जायसी के ‘‘पद्मावत’’ जैसी हिन्दी की श्रेष्ठ रचनाएँ उसी के शासनकाल में लिखी गईं। शेरशाह में धार्मिक मदान्धता नहीं थी। उसकी सामाजिक और आर्थिक नीतियाँ इसका प्रमाण हैं। शेरशाह और उसके पुत्र इस्लामशाह में से कोई भी उल्माओं पर निर्भर नहीं रहता था, यद्यपि वे उनका बहुत आदर करते थे। कभी-कभी राजनीतिक कार्यों को न्यायसंगत ठहराने के लिए धार्मिक नारे दिये जाते थे। जैसा कि मालवा के शासक के सिलसिले में किया गया। शपथ पर विश्वास करके मालवा के रायसेन के किले से बाहर आने पर पूरनमल और उनके साथियों का धोखे से वध कर दिया गया। इसके लिए उल्माओं ने यह स्पष्टीकरण दिया कि काफिरों के साथ विश्वास बनाये रखना जरूरी नहीं है और यह भी कि पूरनमल ने मुसलमान स्त्रियों और पुरुषों पर जुल्म किया था। अतः उसके साथ विश्वासघात करना कोई गलत कार्य नहीं है। इस प्रकार के उदारहण विरले ही हैं। लेकिन शेरशाह ने कोई नयी उदार नीति नहीं शुरू की। हिन्दुओं से जजिया लिया जाता रहा और उसके सरदारों में लगभग सभी अफगान थे। इस प्रकार सूरों के अधीन राज्य रक्त और जाति पर आधारित अफगान संस्था ही रहा। अकबर के उदय के बाद ही इसमें मूलभूत परिवर्तन हुए। | |||||||||
| |||||||||