सत्यमेव जयते gideonhistory.com
मुगल कालीन आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति

आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति

   17वीं शताब्दी के अन्त तक मुगल साम्राज्य अपने विस्तार के चर्मोत्कर्ष पर पहुँच गया था। इस काल में इसे कई राजनीतिक और प्रशासनिक समस्याओं का सामाना करना पड़ा जिनमें से कुछ की चर्चा हम पहले ही कर चुके हैं। आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में अकबर के शासन काल से लेकर 17वीं शताब्दी के अन्त के समय को हमें एक काल ही समझना चाहिए, क्योंकि इस दौरान कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं हुये थे। इसके बावजूद इस काल में महत्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक प्रगति हुई जिसका हम विश्लेषण करेंगे।

जीवन स्तर, ग्रामीण जीवन

जन साधारण

   इस काल में बहुत से यूरोपीय व्यापारी भारत आये इनमें से बहुत से लोगों ने देश की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का ब्यौरा दिया है। आमतौर से इन्होंने एक ओर तो भारत की संपत्ति और समृद्धता तथा शासक वर्ग के शानोशौकत के जीवन पर बल दिया है और दूसरी ओर जन साधारण जैसे किसानों, दस्तकारों और श्रमिकों के गरीबी भरे जीवन का चित्रण किया है। यहाँ सामान्य आदमी कितना कम कपड़ा पहनते थे, इस बात ने बाबर का भी ध्यान आकर्षित किया था। उसने कहा कि ‘‘यहाँ किसान तथा निम्न वर्ग के लोग करीब-करीब नंगे रहते हैं।’’ इसके बाद वह उस लंगोट का वर्णन करता है जो पुरुष पहनते थे तथा महिलाओं की साड़ियों का भी वर्णन करता है।
   बाबर द्वारा प्रस्तुत चित्रण की बाद में आये विदेशी यात्रियों ने भी पुष्टि की है। राल्फफ़िच, जो सोलहवीं शताब्दी के अन्त में भारत आया था, ने कहा है कि ‘‘बनारस में पुरुष कमर से लिपटे कपड़े को छोड़कर नंगे ही रहते हैं।’’ दिलेत ने लिखा है कि श्रमिकों के पास जाड़े में अपने को गरम रखने के लिए पूरे कपड़े नहीं थे लेकिन फिच के अनुसार ‘‘जाड़े में, जो हमारे लिए मई के समान है, लोग सूती रुई भरी पोशाक (मिरजई) और रुई के टोपे पहनते हैं।
   ऐसी ही टिप्पणियाँ जूतों के कम प्रयोग के बारे में मिलती हैं। निकितिन के अनुसार दकन के लोग नंगे पाँव ही रहते थे। आधुनिक लेखक मोरलैण्ड ने कहा है कि बंगाल को छोड़कर नर्मदा नदी के उत्तर में उसने कहीं भी जूतों की चर्चा नहीं सुनी। उसके अनुसार इसका कारण चमड़े का मँहगा होना था।
   जहाँ तक मकान और फर्नीचर का सवाल है, इसके बारे में कहने को कुछ भी नहीं है। मिट्टी के वह घर जिनमें गाँव के लोग रहते थे आजकल के घरों से भिन्न नहीं थे। फर्नीचर के नाम पर उनके पास चारपाई और बाँस की चटाइयों के अलावा शायद ही और कुछ होता था। बर्तन मिट्टी के होते थे जो गाँव का कुम्हार बनाता था। ताँबे तथा अन्य धातुओं के बर्तन मँहगे थे और साधारणतः गरीब इसका इस्तेमाल नहीं करते थे।
   खाद्य पदार्थों में चावल, बाजरा और दाल (जिसे पेलसेती और दिलेत खिचड़ी पुकारते हैं) प्रमुख थे। बंगाल तथा तटवर्ती प्रदेशों में मुख्य खाद्य पदार्थ मछली तथा प्रायद्वीप के दक्षिण में माँस था। उत्तर भारत में गेहूँ तथा मोटे अनाज की चपातियों के साथ दाल तथा हरी सब्जी अधिक चलती थी। कहा जाता है कि आम आदमी का मुख्य भोजन शाम को होता था और दिन में वह भुनी हुई दाल या कोई अनाज चबा कर गुजारा करता था। खाद्यानों की अपेक्षा घी-तेल अधिक सस्ता था और गरीबों के भोजन का प्रमुख हिस्सा था। परन्तु चीनी तथा नमक थोड़े मँहगे होते थे।
   इस प्रकार यद्यपि आम आदमी के पास पहनने के कपड़ों की कमी थी और जूते काफी मँहगे थे लेकिन वे खाते अच्छा थे। अधिक चरागाह उपलब्ध होने के कारण वे अधिक संख्या में गाय, भैंस रख सकते थे जिससे दूध तथा दुग्ध पदार्थ अधिक मात्रा में मिल जाते थे।
   जीवन स्तर अंततः आय और वेतनों पर ही निर्भर करता था। वास्तविक मूल्यों के आधार पर किसानों की आय का अनुमान लगाना कठिन था क्योंकि गाँव में मुद्रा का आदान-प्रदान बहुत कम होता था। गाँव के दस्तकारों को उनका परिश्रमिक परम्परागत पदार्थो के रूप में मिलता था। किसानों की भूमि की औसत मिल्कियत का भी अनुमान लगाना कठिन था। हमें जो आंकड़े प्राप्त है, उनसे लगता है कि गाँव में बड़ी असमानता थी। ऐसे किसान जिनके पास अपने हल या बैल नहीं थे, वे अधिकतर उच्च वर्ग के जमींदारों की भूमि पर खेती करते थे और अपना निर्वाह कर पाते थे। भूमिहीन किसान और श्रमिक प्रायः मनुष्यों के उस वर्ग से सम्बन्ध रखते थे जिन्हें ‘‘अछूत’’ या ‘‘कमीन’’ समझा जाता था। जब भी अकाल पड़ता था और अकाल अक्सर पड़ता था - ऐसे किसान तथा ग्रामीण दस्तकारों को सबसे अधिक कष्ट भोगना पड़ता था। ऐसे किसान जो अपनी भूमि पर खेती करते थे उन्हें खुदकाश्त कहा जाता था। ये बँध-बँधाये दरों पर लगान अदा करते थे। इनमें से कुछ के पास कई हल और बैल होते थे जो वे किराये पर गरीब किसानों अर्थात् मुजारिआन को देते थे जो साधारणतः अधिक दर पर मालगुजारी चुकाते थे।
   इस प्रकार ग्रामीण समाज में बहुत अधिक असमानतायें थीं। खुदकाश्त, जो अपने को गाँव का मूल निवासी समझते थे, उनका संबंध प्रायः किसी एक प्रभावशाली जाति या जातियों से था। इन जातियों का ग्रामीण समाज पर केवल प्रभाव ही नहीं था बल्कि वे गरीब या कमजोर वर्गों का शोषण भी करते थे। दूसरी ओर खुदकाश्त किसानों का जमींदारों द्वारा शोषण होता था।
   अनुमान लगाया जाता है कि 17वीं शताब्दी के आरम्भ में भारत की आबादी लगभग साढ़े बारह करोड़ थी। इस हिसाब से खेती योग्य भूमि बड़ी मात्रा में उपलब्ध रही होगी और यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सामाजिक बन्धनों में रहते हुए और जहाँ तक किसी किसान के साधन तथा पारिवारिक परिस्थितियाँ अनुमति देती थीं, वह उतनी ही भूमि को जोत-बो लेता होगा। एशिया और अफ्रीका के देशों के विपरीत भारत की अर्थव्यवस्था काफी हद तक बहुमुखी थी क्योंकि यहाँ गेहूँ, चावल, चना, जौ, दालें, बाजरा आदि की फसलें होती थीं। इनके अतिरिक्त कपास, नील, चेय (लाल रंग), गन्ना, सरसों आदि की भी पैदावार होती थी जिनसे स्थानीय स्तर पर विभिन्न प्रकार की चीजें बना ली जाती थी। किन्तु इन फसलों पर अधिक दर पर मालगुजारी और वो भी नकद अदा करनी होती थी। इसीलिए इन्हें प्रायः नकदी फसलें या उत्तम फसलें कहा जाता है। कीमतों को दृष्टि में रखकर किसान एक चीज की फसल को छोड़ कर दूसरी फसलें उगाने लगता था। यही नहीं बल्कि अगर वह लाभ देखता था तो नई फसलें पैदा करने का भी इच्छुक होता था इसलिए हम देखेंगे कि 17वीं शताब्दी में दो नई फसलों अर्थात् तम्बाकू और जुआर की भी वृद्धि हो गयी। बंगाल में रेशम और टस्सर की पैदावार में इस काल में इतनी वृद्धि हो गयी कि अब चीन से रेशम के आयात की कोई आवश्यकता नहीं रही। 18वीं शताब्दी में आलू और लाल मिर्च की पैदावार भी आरम्भ हो गयी। जहाँ तक पैदावार की मात्रा का प्रश्न है यह उल्लेखनीय है कि ग्रामीण क्षेत्र 17वीं शताब्दी में नगरों की बढ़ती हुई आबादी के उपभोग के लिए खाद्य पदार्थ उपलब्ध करा देता था। इस काल में भारत पड़ोस के कुछ देशों को विशेष रूप से चावल और चीनी जैसे खाद्य पदार्थों का निर्यात करता था। इसके अतिरिक्त सूती कपड़े बनाने के उद्योग में विस्तार के लिए आवश्यक कच्चा माल भी ग्रामीण क्षेत्र से उपलब्ध होता था। खेती के विस्तार और इसमें बेहतरी के लिए मुगल राज्य किसानों को बढ़ावा देता था और तकावी भी देता था। लेकिन खेती में विस्तार और पैदावार में बढ़ोत्तरी क्षेत्रीय स्तर पर प्रयत्न और साहसपूर्ण पहल करने तथा रूपया लगाये बिना सम्भव नहीं था।
   इस प्रकार हम देखेंगे कि भारतीय किसान इतना रूढ़िवादी या परिवर्तन में रुकावट डालने वाला नहीं था जैसा कि प्रायः उसे प्रस्तुत किया गया है। यद्यपि खेती की कोई नई तकनीकें नहीं प्रचलित हुईं फिर भी भारतीय कृषि काफी समृद्ध थी और इस काल में वस्तुओं के निर्माण के क्षेत्र और व्यापार के विकास में इसकी निश्चित भूमिका थी।
   मध्य युग में किसान को उसकी जमीन से उस समय तक वंचित नहीं किया जाता था जब तक वह लगान देता रहता था। वह अपनी जमीन किसी खरीददार को बेच सकता था। यदि बिरादरी कोई आपत्ति नहीं उठाये। उसके बाद मिल्कियत उसके बच्चों को मिल जाती थी। यद्यपि राज्य द्वारा निर्धारित लगान काफी और कभी-कभी तो कुल पैदावार का आधा हिस्सा होता था। ऐसा विश्वास करने का कोई कारण नहीं है कि लगान चुकाने के बाद औसत किसान के पास केवल गुजारे लायक ही बचता हो और उसके पास जमीन को ज्यादा उपजाऊ बनाने और खेती योग्य भूमि के विस्तार में जुटाने के लिए कोई राशि न बचती हो। यद्यपि किसानों का जीवन कठिन था, उसके पास खाने और अपनी साधारण आवश्यकताओं को पूरा करने के पर्याप्त साधन होते थे। उसका रहन-सहन कुछ हद तक बदलते मौसम और कुछ हद तक रीति-रीवाजों तथा परम्पराओं - जिनमें से मेलों, तीर्थ यात्राओं, उत्सवों आदि का अपना स्थान था, द्वारा निर्धारित होता था किन्तु भूमिहीन किसानों और दस्तकारों और निचली श्रेणी के काम करने वालों की दशा और भी अधिक दयनीय रही होगी। जहाँ तक शहरों का सवाल है वहाँ सबसे बड़ा वर्ग गरीबों का ही था जिसमें दस्तकार, नौकर तथा गुलाम, सिपाही, हाथ का काम करने वाले आदि शामिल थे।
   यूरोपीय यात्रियों के अनुसार सबसे निम्नस्तर के नौकर का वेतन दो रूपये महीने से भी कम था। पैदल-सैनिक तथा अन्य छोटे वर्ग के अधिकतर लोग तीन रूपये महीने से भी कम पर नौकरी शुरू करते थे। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि आदमी अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकता था। 20वीं शताब्दी के आरम्भ के लेखक मोरलैण्ड के अनुसार श्रमिकों की वास्तविक आय से 20वीं शताब्दी तक बहुत कम अन्तर आया था, उन्हें सन्तुलित आहार तो मिल जाता था लेकिन कपड़े और चीनी आदि मँहगे होने के कारण उसे उपलब्ध नहीं हो सकते थे। इससे मोरलैण्ड ने यह निष्कर्ष निकाला कि अंग्रेजों के शासनकाल में भारतीयों की स्थिति और खराब नहीं हुई थी। लेकिन इस विषय में विस्तृत परिपेक्ष्य में देखना पड़ेगा। एक ओर जब यूरोप के लोगों की सम्पत्ति और वास्तविक आय बढ़ रही थी, अंग्रेजों के शासनकाल में भारतीयों का जीवन स्तर अगर गिरा नहीं तो जड़भूत अवश्य हो गया था। लेकिन इस विषय पर विस्तृत चर्चा हम आधुनिक काल से संबंधित खण्ड में करेंगे।

शासक वर्ग - उमरा और जमींदार

   मध्य युग में शासक वर्ग में उमरा और जमींदार शामिल थे। आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से विशेषाधिकार वर्ग मुगल उमरा तथा मनसबदारों का बना था। सैद्धान्तिक रूप से मुगल अमीर (मनसबदार) वर्ग के दरबाजे हर आदमी के लिए खुले थे पर वास्तव में उच्च घरानों को चाहे, वे भारतीयों हो या विदेशी, विशेष सुविधा थी। अधिकतर मुगल उमरा मुगलों के स्वदेश, तूरान और ताजिकिस्तान, खुरास्थान, ईरान आदि क्षेत्रों से आये थे। बाबर स्वयं एक तुर्क था, लेकिन मुगल शासकों ने कभी संकीर्ण जातिवाद की नीति नहीं अपनायी। बाबर ने प्रमुख अफगान सरदारों को अपने पक्ष में करने की चेष्टा की, पर उन्होंने शीघ्र ही उसका साथ छोड़ दिया। बिहार तथा बंगाल में मुगलों तथा अफगानों के बीच संघर्ष अकबर के शासन काल तक चला। लेकिन जहाँगीर के समय से मनसबदारों में अफगानों को भी शामिल किया जाने लगा। भारतीय मुसलमानों, जिन्हें शेखजादा या हिन्दुस्तानी कहा जाता था, को भी यह पद मिलने लगे।
   अकबर के समय से अमीर वर्ग के लिए हिन्दुओं की भी भर्ती होने लगी। इनमें सबसे बड़ा वर्ग राजपूतों का था। राजपूतों में भी कछवाहा प्रमुख थे। आधुनिक गणना के अनुसार 1594 में अकबर के शासन काल में हिन्दू उमरा का अनुपात केवल सोलह प्रतिशत था। लेकिन इन आंकड़ों से हिन्दुओं की स्थिति अथवा उनके प्रभाव का सही-सही अन्दाज नहीं लगाया जा सकता। राजा मानसिंह तथा राजा बीरबल, दोनों अकबर के खास मित्रों में से थे और कर प्रशासन के क्षेत्र में राजा टोडरमल का बहुत प्रभाव एवं सम्मान था। अमीर वर्ग में सम्मिलित किए गये राजपूत या तो वंशगत राजा थे या फिर किसी राजा से सम्बन्धित उच्च खानदान के थे। इस प्रकार अमीर वर्ग में उनके शामिल होने से इस वर्ग का अभिजात्य और बढ़ गया था। इसके बावजूद उच्च वर्ग में साधारण आदमियों द्वारा नाम कमाने और आगे बढ़ने की गुंजाइश थी।
   जहाँगीर तथा शाहजहाँ के शासन काल में अमीर वर्ग में काफी स्थिरता आई। इन दोनों सम्राटों ने अमीर वर्ग के संगठन (मनसबदारी व्यवस्था), पदोन्निति के नियमों, अनुशासन तथा राजकीय सेवा के योग्य व्यक्तियों की भर्ती की ओर काफी ध्यान दिया।
   जैसा हम देख चुके हैं कि मुगल मनसबदारों के वेतन किसी भी दृष्टि से बहुत ऊँचे थे। इसके साथ-साथ धर्म के मामलों में मुगल सम्राटों की सहिष्णुता की नीति तथा भारत में राजनीतिक स्थिरता के कारण कई योग्य विदेशी मुगल दरबार की तरफ आकर्षित हुए। इस प्रकार दूसरे देशों से भारत की ओर बुद्धिजीवियों और योग्य व्यक्तियों की निकासी हुई।
   भारत में ईरानी, तूरानी तथा कई अन्य विदेशियों के मुगल दरबार में आने के बारे में फ्रांसीसी यात्री बर्नियर ने लिखा है कि मुगल मनसबदारों का वर्ग उन विदेशियों का था जिन्होंने एक-दूसरे को राज दरबार में आने को प्रेरित किया था। आधुनिक अध्ययन ने इस कथन को गलत साबित कर दिया है। योग्य व्यक्तियों का भारत आना जारी रहा और इनमें से कई राज दरबार में ऊँचे पदों पर पहुँच गये थे। ये सब भारत में ही बस गये और यहीं पर अपना स्थायी निवास कायम किया। इस प्रकार पहले के युग की तरह मध्य युग में भी भारत में कई विदेशियों का बसना जारी रहा। ये विदेशी शीघ्र ही भारतीय समाज और संस्कृति में समा गये पर साथ ही उन्होंने अपनी कुछ विशेषतायें भी कायम रखीं। इस से भारत में संस्कृतियों की अनेकता तथा अभिन्नता कायम हुई जो इस देश की प्रमुख विशेषता रही है। जहाँगीर और शाहजहाँ के शासनकाल में अधिकतर मनसबदार ऐसे थे, जिनका जन्म भारत में ही हुआ था। साथ ही साथ अमीर वर्ग में अफगानों भारतीय मुसलमानों (हिन्दुस्तानियों) तथा हिन्दुओं का अनुपात बढ़ता गया। हिन्दुओं का एक नया वर्ग जो इस अवधि में अमीर वर्ग में शामिल हुआ, वह मराठों का था। जहाँगीर पहला मुगल सम्राट था जिसने इस बात का अनुभव किया कि दकन के मामलों में मराठे बहुत महत्वपूर्ण थे और उसने उन्हें अपने पक्ष में जीतने की चेष्टा की। शाहजहाँ ने भी इस नीति को जारी रखा। शाहजहाँ के दरबार में मराठा मनसबदारों में शिवाजी का पिता शाहजी था। यद्यपि उसने शीघ्र ही मुगलों का साथ छोड़ दिया। औरंगजेब ने भी कई मराठों तथा दकनी मुसलमानों को दरबार में रखा। मुगल तथा मराठों के संबंधों की चर्चा हम बाद के खंड में करेंगे लेकिन यह बात ध्यान देने योग्य है कि शाहजहाँ के शासन काल में हिन्दू मनसबदारों का अनुपात लगभग चौबीस प्रतिशत था जबकि औरंगजेब के शासन काल के उत्तरार्द्ध में यह अनुपात तैंतीस प्रतिशत हो गया। साथ में हिन्दू मनसबदारों की कुल संख्या डेढ़ गुनी से भी अधिक हो गयी। हिन्दू मनसबदारों में आधी से अधिक संख्या मराठों की थी।
   यद्यपि मुगल मनसबदारों को बहुत वेतन मिलता था, उनका खर्च भी काफी अधिक था। हर मनसबदार बड़ी संख्या में नौकर-चाकर, घोड़े-हाथी तथा आवागमन के लिए विभिन्न प्रकार के साधन रखता था। इनमें से कईयों के पास बड़े-बड़े हरम थे। उस काल में यह किसी अमीर आदमी के लिए सामान्य बात समझी जाती थी। मनसबदार शान-ओ-शौकत में मुगल सम्राट की नकल करने की चेष्टा करते थे। ये फलदार पेड़ों और फब्बारों के सजे बागों से घिरे भव्य महलों में रहते थे। ये अच्छे से अच्छे कपड़े पहनते थे। खाने-पीने पर भी इनका खर्च बहुत अधिक था। एक वृतान्त के अनुसार अकबर के हर भोजन के लिए चालीस प्रकार के व्यंजन तैयार किए जाते थे। फलों पर भी इनका काफी खर्च होता था और कई पसन्दीदा फल तो समरकन्द तथा बुखारा से मँगवाये जाते थे। बफ्र जिसे विलासिता का साधन माना जाता था, उसका इस्तेमाल उच्च वर्ग के लोग सारे साल करते थे। एक अन्य मँहगा साधन मर्द और औरत दोनों के गहने और हीरे जवाहररात थे। जहाँगीर ने एक प्रथा चलाई थी जिसके अनुसार पुरुषों का कान छिदवा कर मूल्यवान रत्न पहनना फैशन बन गया था। कुछ हद तक मूल्यवान रत्नों को आपातकाल में सुरक्षा का साधन भी समझा जाता था। बड़े खर्चे का एक और कारण वह प्रथा थी, जिस के अनुसार अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार उच्च वर्ग के लोगों को सम्राट को नजराना पेश करना पड़ता था। बदले में सम्राट भी अपने मनसबदारों को उपहार देता था।
   यद्यपि बचाने के स्थान पर खर्च करना ही इस समय की सबसे बड़ी विशेषता थी क्योंकि केवल कुछ ही मनसबदार ऐसे थे जो कर्ज से मुक्त रहते थे और अपनी सन्तान के लिए बड़ी धनराशि छोड़ जाते थे, फिर भी मनसबदारों ने, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, अर्थव्यवस्था की उन्नति में भाग लिया जो कई दिशाओं में दिखाई देता है। बहुत से मनसबदारों ने जमीन खरीदी या उन्हें सम्राट ने उन स्थानों पर उपहार में भूमि दी जहाँ वे बसना चाहते थे और अपना निवास समझते थे। इन स्थानों पर उन्होंन बाग लगवाये या मंडियाँ बनवायीं जिनसे उन्हें क्रय और विक्रय में भी आय हो सकती थी। वे व्यापारियों को ब्याज पर रूपया भी देते थे या कभी-कभी व्यापारियों के नाम से या उनकी साझेदारी में व्यापार में भाग लेते थे। अपने ऐतिहासिक ग्रन्थ में अबुल फजल ने मनसबदारों को यह मशावरा दिया कि वे ‘‘थोड़ा पैसा नफा कमाने के लिए व्यापार में लगायें और लाभदायक प्रतिष्ठानों में व्यस्त हो’’। बावजूद इसके कि इस्लामी कानून सूद खोरी की निन्दा करता है, अबुल फजल ने मनसबदारों से अनुग्रह किया कि वे ब्याज पर पैसा लगा सकते हैं। इस उदाहरण से हमें समसामयिक मूल्यों का संकेत मिलता है।
   ये अनुमान लगाना कोई आसान काम नहीं कि इस समय की व्यापारिक गतिविधियों में मनसबदारों का कितना वास्तविक भाग था। कभी-कभी कुछ मनसबदार, यहाँ तक कि शहजादे भी, अपनी हैसियत का दुरुपयोग करके कुछ वस्तुओं का सारा क्रय और विक्रय अपने हाथ में ले लेते थे या दस्तकारों को और व्यापारियों को अपनी सेवाएँ और वस्तुओं को सस्ता देने पर विवश करते थे। लेकिन ऐसे उदाहरण इतने अधिक नहीं थे कि जिनसे व्यापार, वाणिज्य और दस्तकारों का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होता। 1614 में सूरत में एक अंग्रेज फेकटर ने यह टिप्पणी की कि व्यापारी छोटे-बड़े सभी तरह के हैं। शाही परिवार के सदस्य जिसमें शहजादे, शहजादियाँ और रानियाँ शामिल थे, अपने माल के लदवाने के लिए विदेशी व्यापारियों को किराया देते और यहाँ तक कि व्यापार के लिए उनके पास अपने जहाज भी होते थे। औरंगजेब के शासन काल का एक प्रतिष्ठित मनसबदार मीर जुमला कई जहाजों के एक बेड़े का मालिक था। ये जहाज ईरान, अरब और दक्षिण पूर्व के देशों से बड़े पैमाने पर व्यापार के काम करते थे। वाणिज्य से पैसा कमाने का लोभ इस हद तक पहुँच गया था कि औरंगजेब का प्रमुख काजी भी व्यापारिक प्रतिष्ठिनों का मालिक था। यह बात उसने सम्राट से छिपाने की चेष्टा भी की थी।
   इस प्रकार मुगल मनसबदार वर्ग की कई असाधारण विशेषताएँ थीं। प्रायः नसल की बुनियादों पर बँटा होने के बावजूद यह आपस में जुड़ा हुआ शासक वर्ग था जिसमें विभिन्न क्षेत्रों और धर्मों का प्रतिनिधित्व था और जिसने चित्रकारों, संगीतज्ञों, फारसी और हिन्दी कवियों और विद्वानों को आश्रय देकर मिली-जुली अर्थात् गंगा-जमुना संस्कृति को उन्नति देने का प्रयास किया, बावजूद इसके कि इस वर्ग का स्वरूप सामंतवादी था, क्योंकि इसकी आय का मुख्य स्रोत भूमि था फिर भी इसमें दफ्तरी हुकूमत की कई विशेषताएँ मौजूद थीं। इसका रुख वाणिज्य और पैसा कमाने की ओर भी था। अतः मुगल राज्य और शासक वर्ग भारत की आर्थिक उन्नति में बाधा नहीं बने। हमें इस तरह के सोच विचार में पड़ने की जरूरत नहीं है कि यह उन्नति एवं अपने बल पर भारत को पूँजीवाद के मार्ग पर ले जा सकती थी। हमें तो विशेष रूप से इस बात से सरोकर है कि भारत में क्या उन्नति हुई और किस दिशा में हुई।
   17वीं शताब्दी के दौरान मनसबदारों की बढ़ती संख्या, समाज के विभिन्न वर्गों में तनाव तथा जागीरदारी व्यवस्था में गड़बड़ी से औरंगजेब तथा उसके उत्तराधिकारियों के शासन काल के दौरान मनसबदारों के अनुशासन तथा उनकी व्यवस्था पर गम्भीर प्रभाव पड़े। उनमें से कुछ बातां की हम आगे के एक अध्याय में विस्तार से चर्चा करेंगे।

जमींदार और ग्रामीण उच्च वर्ग

   अबुलफज़ल तथा अन्य समसामयिक लेखकों की कृतियों से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत में भूमि पर निजी मिल्कियत की प्रथा बड़ी पुरानी थी। भूमि की मिल्कियत मुख्यतः उत्तराधिकार के नियमों पर निर्भर थी लेकिन भूमि की मिल्कियत के नये नियम सदा ही बनते थे। परम्परा के अनुसार जो पहली बार जमीन को जोतता-बोता था उसी को उसका मालिक समझा जाता था। मध्ययुग में काफी बड़ी मात्रा में बंजर जमीन उपलब्ध थी और उत्साही व्यक्तियों के लिए एक नया गाँव बसा लेना कोई कठिन काम नहीं था। गाँव के आस-पास पड़ी खाली जमीन पर खेती करना और उस जमीन का मालिक बन जाना भी कठिन नहीं था। जमीनों की मिल्कियत के अलावा, जिन पर वह खेती करते थे, कई जमींदारों को गाँवों से लगान प्राप्त करने का वंशगत अधिकार भी था। इसे उसका तआल्लुका या उसकी जमींदारी कहा जाता था। लगान इकट्ठा करने के लिए जमींदारों को कुल लगान का कुल हिस्सा मिलता था जो कुछ क्षेत्रों में तो पच्चीस प्रतिशत तक पहुँच जाता था। जमींदार अपनी जमींदारी में शामिल समस्त भूमि का मालिक नहीं था। वह किसान जो वास्तविकता में जमीन पर खेती करते थे, उन्हें जमीन से उन समय तक नहीं निकाला जा सकता था जब तक वह उसका लगान देते रहें। इस प्रकार जमीन पर जमींदारों तथा किसानों का अपना-अपना वंशगत अधिकार हो जाता था।
   जमींदारों के ऊपर राजा लोग थे, जिन्हें कहीं छोटे और कहीं बड़े इलाकों पर आधिपत्य प्राप्त था और जिन्हें कुछ हद तक आन्तरिक स्वतन्त्रता प्राप्त थी। फारसी लेखकों ने इन राजाओं को भी इनके अधीन हैसियत बताने के लिए जमींदार कहा है। लेकिन इनकी स्थिति जमींदारों से जिनका काम वह लगान उगाहना था, ऊँची थी। इस प्रकार हम देखते हैं कि मध्ययुगीन समाज, जिसमें ग्रामीण समाज भी शामिल था ऊपर से नीचे तक विभिन्न वर्गों में बँटा हुआ था।
   जमींदारों के पास अपनी सशस्त्र सेना होती थी और ये आमतौर पर किलों तथा गढ़ियों में रहते थे जो शरण स्थल के साथ-साथ इनकी हैसियत का भी प्रतीक होते थे। जमींदारों की सेना कुल मिलाकर काफी बड़ी हो जाती थी। आईने अकबर जिसका लेखक अबुलफज़ल था, के अनुसार अकबर के राज्य के राज्य में इनके पास 384,558 सवार, 427,757 प्यादे, 1,863 हाथी तथा 4,260 तोपें थीं। लेकिन जमींदार एक जगह नहीं रहते थे इसलिए सारी सेना को किसी भी एक स्थान पर इकट्ठा करना असम्भव था। शायद इस संख्या में निम्नस्तर के राजाओं की सैनिक शक्ति भी शामिल थी।
   आमतौर पर जमींदारों का उनकी जमींदारों में बसे किसानों के साथ जाति, कुल अथवा कबाईली संबंध होता था। उनको भूमि की उपजाऊ शक्ति के बारे में काफी स्थानीय सूचना भी रहती थी। इस प्रकार जमींदार संख्या से तथा अन्य दृष्टि से एक शक्तिशाली वर्ग बन गया था। जो विभिन्न नामों, जैसे देशमुख, पाटिल, नायक आदि से देश के हर हिस्से में पाये जाते थे। इसलिए किसी भी केन्द्रीय शासन के लिए उनकी उपेक्षा करना या उनकी दुश्मनी मोल लेना आसान नहीं था।
   इन जमींदारों के जीवन स्तर के बारे में कुछ कहना कठिन है। मनसबदारी की तुलना में इनकी आय सीमित थी। इनमें से छोटे जमींदार कमोवेश किसान की तरह ही रहते थे। लेकिन बड़े जमींदारों का रहन-सहन छोटे राजाओं अथवा मनसबदारों की तरह होता था। अधिकतर जमींदार गाँव में रहते थे और यह एक प्रकार से बिखरे और फैले हुए स्थानीय उच्च वर्ग के सदस्य माने जाते थे।
   यह कहना सही नहीं होगा कि जमींदार केवल जमीन पर अधिकार जमाने के लिए लड़ते रहते थे और जिस क्षेत्र में उनका आधिपत्य था वहाँ किसानों का शोषण करते थे। बहुत से जमींदारों का अपनी जमींदारी में बसी कृषक जातियों से जो जमीन की मालिक भी थीं, जाति और बिरादरी का निकट संबंध होता था। इन जमींदारों ने केवल सामाजिक स्तर ही तय नहीं किया बल्कि इन्होंने नये गाँव बसाने के लिए सरमाया भी लगाया और संगठन भी प्रदान किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने खेती का विस्तार किया और इसमें बेहतरी पैदा की। किन्तु इन दिशाओं में इनके प्रयास किस सीमा तक किए गये इसका विस्तारपूर्वक अध्ययन अभी होना बाकी है।

मध्य वर्ग

   इस विषय पर बहुत चर्चा हुई है कि क्या मध्य युगीन भारत में मध्य वर्ग मौजूदा था या नहीं। फ्रांसीसी यात्री बर्नियर ने कहा है कि भारत में कोई ‘‘मध्य दशा’’ नहीं थी, या तो व्यक्ति बहुत ज्यादा अमीर था या बहुत गरीब। लेकिन इस कथन से सहमत होना संभव नहीं। मध्य वर्ग का अर्थ है व्यापारी या दुकानदार। भारत में अमीर व्यापारियों या सौदागरों का एक बडा वर्ग मौजूद था। इनमें से कुछ तो अपने समय के विश्व के सबसे अमीर सौदागरों में गिने जाते थे। इस सौदागरों को परम्परा के आधार पर कुछ अधिकार भी प्राप्त थे, जैसे जानो-माल की सुरक्षा का अधिकार लेकिन उन्हें किसी कस्बे के प्रशासन का अधिकार नहीं था। यूरोप में सौदागरों को ऐसे अधिकार विशेष परिस्थितियों में प्राप्त हुये थे। हालाँकि वहाँ भी जब कभी शक्तिशाली क्षेत्रीय राज्य स्थापित होते थे तो यह अधिकार घट जाते थे जैसा कि फ्रांस और ब्रिटेन में हुआ।
   यदि मध्य वर्ग से तात्पर्य समाज के वे अंग हैं जिनका जीवन स्तर अमीरों और गरीबों के बीच में था तो मुगल भारत में ऐसे कई सामाजिक अंग मिलेंगे। इनमें छोटे स्तर के मनसबदार, छोटे-छोटे दुकानदार और उस्ताद, दस्तकारों का एक छोटा किन्तु महत्वपूर्ण वर्ग सम्मिलित था। इसमें व्यावसायिक वर्ग भी शामिल थे, जेसे हकीम, प्रतिष्ठित संगीतज्ञ और कलाकार, इतिहासकार विद्वान, काजी और उलमा तथा छोटे स्तर के सरकारी कर्मचारियों का विशाल वर्ग जो व्यापक एवं बढ़ती हुई मुगल प्रशासनिक मशीन को चला रहा था। छोटे स्तर के सरकारी अफसरों को तो नकद वेतन मिलता था और वे अपनी आय से घूस द्वारा वृद्धि कर लेते थे लेकिन ऐसे लोगों को जैसे विद्वान, प्रतिभावन धार्मिक नेता आदि को भरण-पोषण के लिए दान में जमीन मिलती थी। ऐसे अनुदानों को मुगलों के समय में मदद-ए-मआश तथा राजस्थान में शासन कहा जाता था। मुगल सम्राट अतिरिक्त क्षेत्रीय शासक और जमींदार और मनसबदार भी ऐसे अनुदान प्रदान करते थे। नये शासक के आने पर इन अनुदानों के लिए नई स्वीकृति लेना अनिवार्य थी, इसके बावजूद व्यवहारिक रूप से यह मौरूसी बन गये। वह वर्ग प्रायः ग्रामीण उच्च वर्ग का भाग बन गये जो गाँव और कस्बे के मध्य कड़ी समान था। लेखक, इतिहासकार और उलमा प्रायः एक ही वर्ग से संबंधित थे। मध्य वर्ग से कोई एक अलग वर्ग नहीं बना क्योंकि विभिन्न सामाजिक कक्षों में विभिन्न हित थे। इसके अतिरिक्त उनका संबंध विभिन्न धार्मिक दलों और जातियों से था।

वाणिज्य तथा व्यापार का संगठन

   भारत में व्यापारिक वर्ग काफी संख्या में थे। यह पूरे देश में फैले हुए थे और बहुत संगठित तथा व्यावसायिक थे। इनमें से कुछ दूर-दूर तक विभिन्न क्षेत्रों के मध्य थोक का व्यापार करते थे तथा कुछ क्षेत्रीय स्तर ‘खुदरा’ व्यापार में विशेषता रखते थे। थोक व्यापारियों को ‘सेठ कुहरा या मोदी’ कहते थे तथा खुदरा व्यापारियों को व्यापारी अथवा ‘बानिक’ पुकारा जाता था। ‘खुदरा’ व्यापार के अतिरिक्त बानिक गाँव और कस्बों में अपने गुमाश्ते रखते थे जिनकी सहायता से वे अनाज और नकदी फसलें खरीदते थे। इनके अलावा बंजारों का एक वर्ग था, जो माल लाया ले जाया करता था। बंजारे दूर-दूर तक जाया करते थे और कभी-कभी उनके साथ अनाज, दालें, घी, नमक आदि से लदे हजारों बैल चलते थे। ज्यादा मँहगी वस्तुएँ जैसे सूती-रेशमी कपड़े आदि को खच्चरों तथा गाड़ियों पर लाया जाता था। नदी परिवहन, सड़क परिवहन की अपेक्षा सस्ता था, इसलिए आज की अपेक्षा मध्ययुग में नदी मार्ग से और समुद्रतट के साथ-साथ किश्तियों के माध्यम से व्यापार अधिक उन्नतिशील था। खाद्य पदार्थों और सूती कपड़ों की बहुत बड़ी मात्रा इस काल के अन्तर-क्षेत्रीय व्यापार के सर्व प्रमुख तत्व थे। बंगाल चीनी और चावल तथा बढ़िया मलमल और रेशम का निर्यात करता था। कोरोमंडल का तट सूती कपड़ों की पैदावार का केन्द्र बन गया था और यहाँ से गुजरात तक समुद्र तक के साथ-साथ दकन से होते हुए बड़े पैमाने पर व्यापार होता था। गुजरात विदेशी माल के लिए प्रवेश द्वार था। यहाँ से उत्तरी भारत को सूती कपड़ा और ‘पटोला’ (रेशमी कपड़ा) भेजा जाता था जहाँ बुरहानपुर और आगरा व्यापार के दो मुख्य केन्द्र थे। यहाँ बंगाल से अनाज और रेशमी कपड़ा आता था और मालाबार से काली मिर्च आती थी। जहाँ बुरहानपुर और आगरा दो मुख्य केन्द्र थे। उत्तरी भारत की विलासिता की वस्तुएँ और नील तथा अनाज का आयात करता था। हस्तकला से निर्मित वस्तुओं का एक और केन्द्र लाहौर था। लाहौर कश्मीर से बनी विलासियता की वस्तुओं, जैसे शाल, कालीन का वितरण केन्द्र था। पंजाब और सिन्ध में निर्मित वस्तुएँ सिन्ध नदी के माध्यम से समुद्रतट तक पहुँचती थीं। लाहौर एक ओर तो व्यापार की दृष्टि से काबुल और कन्धार से जुड़ा था तो दूसरी ओर दिल्ली और आगरा से भी जुड़ा हुआ था।
   इस तरह हम देखेंगे कि भारत की अन्तर्क्षेत्रीय व्यापार में केवल विलासिता की वस्तुएँ ही नहीं थीं। वस्तुओं के एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए एक जाल बिछा हुआ था जिसके द्वारा थोक व्यापारी ‘गुमाश्तों’ और ‘दलालों’ के माध्यम से क्षेत्रीय और स्थानीय स्तरों पर ‘खुदरा’ व्यापारी से जुड़े हुए थे। 17वीं शताब्दी में गुजरात में आने वाले डच और अंग्रेज व्यापारियों ने भारतीय व्यापारियों को सतर्क और चौकन्ना पाया। भीतर की सूचना प्राप्त करने के लिए कड़ा मुकाबला होता था और देश के किसी भाग से जब किन्हीं वस्तुओं की माँग होती थी तो उसे तुरंत पूरा कर दिया जाता था।
   ऐसी वित्तीय व्यवस्था की उन्नति से जिसके अन्तर्गत देश के एक भाग से दूसरे भाग तक पैसा पहुँचाना सरल हो गया था, वस्तुओं के लाने से जाने में सुविधा पैदा हुई। यह काम ‘हुण्डी’ के माध्यम से होता था। हुण्डी वह चिट्टी थी जिसका भुगतान कुछ समय बाद थोड़ी कटौती करके किया जाता था। कभी-कभी हुण्डी में बीमा भी शामिल होता था जो वस्तुओं के मूल्य, उनके पहुँचने के ठिकाने एवं परिवहन (सड़क, नदी या समुद्र) आदि के आधार पर किया जाता था। सर्राफ, जो रूपये के लेन-देन के विशेषज्ञ थे, हुण्डी का काम भी करते थे इस प्रकार सराफ निजी बैंक की हैसियत से भी काम करते थे अर्थात् वे मनसबदारों का पैसा साई (ब्याना) के तौर पर रखते थे एवं इसे उधार पर देते थे। हुण्डी की सहायता से वे साख बनाते थे जिससे पैसा घूमता रहता था। क्योंकि व्यापारी अपने लक्ष्य तक पहुँचा कर अपनी वस्तुएँ बेचकर ही अपनी हुण्डी का भुगतान ले सकता था। इसलिए पैसे का आवागमन जिसमें खतरे बहुत थे, कम किया जा सकता था। विशेष रूप से जब कि विरजी बोहरा जैसे धनी व्यापारियों ने भारत के विभिन्न भागों और पश्चिमी एशिया में ऐजेन्सियाँ स्थापित कर ली थीं।
   भारत में व्यापारी समुदाय का किसी एक जाति या धर्म से संबंध नहीं था। गुजरात के व्यापारियों में हिन्दू, जैन और मुसलमान, जिनमें ज्यादातर बोहरे थे, शामिल थे। राजस्थान में ओसवाल, महेश्वरी अग्रवाल मारवाड़ी कहलाये जाने लगे। मध्य एशिया से थल व्यापार, मुल्तानियों, अफगानों और खत्रियों के हाथ में था। 18वीं शताब्दी में मारवाड़ी महाराष्ट्र और बंगाल में भी फैल गए। दक्षिणी भारत के व्यापारी समुदायों में कोरोमण्डल तट के चेट्टी और मालाबार के हिन्दुस्तानी और अरब मुस्लिम व्यापारी सर्वप्रमुख थे।
   भारत के व्यापारी समुदाय में, विशेष रूप से बन्दरगाहों से जुड़े कस्बों में कुछ ऐसे धनी व्यापारी थे जिनकी तुलना जहाँ तक संपत्ति और शक्ति का प्रश्न है, यूरोपीय व्यापारी राजकुमारों से की जा सकती है। विरजी बोहरा कई दशकों तक सूरत व्यापार पर छाया हुआ था। उसके पास कई बड़े-बड़े जहाज थे और वह अपने समय के सबसे अधिक धनी लोगों में गिना जाता था। अब्दुल गफूर बोहरा ने 1718 में अपनी मौत के समय 55 लाख रूपया नकद और जायदाद के रूप में छोड़ा। इसी प्रकार कोरोमण्डल तट के मेले चेट्टी, काशीविरन्ना और संका, रामा चेट्टी बहुत मालदार व्यापारी थे। जिनका भारत में और विदेशों से भी बड़े पैमाने पर व्यापार होता था। आगरा, दिल्ली, बालासोर (उड़ीसा) तथा बंगाल में भी कई धनी व्यापारी थे। इनमें से कुछ व्यापारी, विशेष रूप से जो समुद्र तट पर स्थित कस्बों में रहते थे, बड़ी शानो-शौकत से रहते थे तथा अपने रहन-सहन में मनसबदारों की नकल करते थे।
   यूरोपीय यात्रियों ने आगरा तथा दिल्ली में रहने वाले धनी व्यापारियों के भव्य और बड़े मकानों की चर्चा की है लेकिन दूसरी ओर व्यापारी अपनी दुकानों पर बने घरों में रहते थे। फ्रांसीसी यात्री बार्नियर के अनुसार व्यापारी चेष्टा करते थे कि वे गरीब दिखें, क्योंकि उन्हें यह डर लगा रहता था कि कहीं उनकी संपत्ति न छीन ली जाये लेकिन यह बात इसलिए गलत लगती है कि शेरशाह के बाद से सम्राटों ने व्यापारियों की संपत्ति की सुरक्षा के लिए कई कानून बनाये। शेरशाह के कानून तो काफी प्रसिद्ध हैं। जहाँगीर के बनाये कानूनों में एक प्रावधान यह भी था कि ‘यदि कोई व्यक्ति, चाहे वह मुस्लिम हो या गैर मुस्लिम, मरता है तो उसकी सारी जायदाद उनके उत्तराधिकारी को दी जानी चाहिए और उसमें किसी को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। अगर उसका कोई उत्‍तराधिकारी नहीं हो तो उस सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए विशेष अधिकारी और संरक्षक नियुक्त किए जाने चाहिए ताकि उस सम्पत्ति को वैध मदों पर खर्च किया जा सके, जैसे मस्जिदों और सरायां का निर्माण, टूटे हुये पुलों की मरम्मत तथा कुँओं की खुदाई तक। लेकिन व्यापारियों को हताहत करने के लिए स्थानीय अफसर किसी भी समय अपनी ताकत का दुरुपयोग कर सकते थे।
   इसके बावजूद भी व्यापारियों का किसी हद तक दमन होता था, साधरणतः उनकी जायदाद को खतरा नहीं होता था। आवागमन के साधन सस्ते थे और उनकी जरूरतों के लिए काफी थे। हालाँकि यूरोपीय व्यापारियों ने सड़क मार्ग पर सुरक्षा के अभाव की शिकायत की है लेकिन बात इसके विपरीत थी अर्थात् सड़क मार्गों पर सुरक्षा संतोषजनक थी और खतरे से बचाव के लिए बीमे की सुविधा मौजूद थी। राज्य के प्रमुख बड़े मार्गों पर हर पाँच कोस के बाद एक सराय थी और यात्रा के साधन भी मौजूद थे, इसलिए हम कह सकते हैं कि भारत में यह सुविधा भी उतनी ही अच्छी थी जितनी उस समय के यूरोप में थी। इस सब के बावजूद व्यापार और व्यापारियों का सामाजिक स्तर निम्न ही समझा जाता रहा। यह विषय विवादपूर्ण है कि राजनैतिक प्रक्रिया में व्यापारियों का प्रभाव था या नहीं। राजनैतिक क्षेत्रों में भारत के व्यापारी उस समय प्रभाव डालते थे जब उनके हित सामने आते थे। इस प्रकार व्यापारियों में हर बिरादरी का एक नेता या ‘‘नगर सेठ’’ होता था जो उनकी ओर से स्थानीय अफसरों से मामला निपटाता था। अहमदाबाद और दूसरे स्थानों पर व्यापारियों द्वारा की गई हड़तालों के भी उदाहरण मिलते हैं, जिनके द्वारा उन्होंने अपने दृष्टिकोण पर भी जोर दिया। हम यह भी देख चुके हैं कि मुगल शाही परिवार के सदस्य और मीर जुमला जैसे प्रमुख मनसबदार भी व्यापार में भाग लेते थे।
   इस प्रकार हम देखते हैं कि मुगल शासक वर्ग देश और व्यापारिक वर्गां के व्यवसायिक हितों की सुरक्षा और व्यापार से अलग नहीं था। यह जरूर है कि ब्रिटेन, फ्रांस और होलैण्ड जैसे यूरोपीय राज्यों के विपरीत व्यापारिक हितों को प्रोत्साहित करने में यह बहुत सक्रिय नहीं था।
   17वीं शताब्दी में व्यापार और वाणिज्य के विकास के लिए कई कारण उत्तरदायी थे। एक मुख्य कारण मुगल शासन के अधीन देश की राजनैतिक एकता और दूर-दराज तक शान्ति और कानून की व्यवस्था की स्थापना था। मुगलों ने सड़क मार्गों और सरायों के निर्माण की ओर ध्यान दिया जिससे संचार में सुविधा पैदा हुई। साम्राज्य में किसी भी वस्तु के आयात के लिए समान कर निर्धारित किए गए। सड़क शुल्क या ‘‘राहदारी’’ को अवैध घोषित कर दिया लेकिन कुछ स्थानीय राजाओं ने यह शुल्क जारी रखा। मुगलों ने शुद्ध चाँदी के रूपयों का चलन आरम्भ किया जिसकी सारे भारत में ही नहीं वरन् विदेशों में भी मान्यता थी और इससे भारत के व्यापार को और भी बढ़ावा मिला।
   मुगलों की कुछ नीतियों से भी अर्थव्यवस्था के व्यावसीयकरण अथवा मुद्रा पर आधारित अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिला। स्थायी सैनिक तथा प्रशासनिक अधिकारियों (मनसबदारी को छोड़कर) नकद वेतन दिया जाता था, ‘‘जब्ती’’ प्रथा के अन्तर्गत लगान निर्धारित किया जाता था जिसकी अदायगी नकद होती थी। ऐसी स्थिति में भी जब किसानों की लगान चुकाने के अन्य तरीके, जैसे लगान को अनाज के रूप में चुकाना, चुनने का अधिकार दिया जाता था, राज्य का हिस्सा अनाज व्यापारियों की मदद से गाँव में ही बेच दिया जाता था। अनुमान लगाया जा सकता है कि गाँव की उपज का बीस प्रतिशत बिकने के लिए बाजार में आता था। यह यात्रा इस प्रकार काफी बड़ी थी। अनाज मंडियों के बढ़ने से छोटे-छोटे कस्बे बसने गये। मनसबदारों द्वारा विलासिता की वस्तुओं की माँग से हस्तकला को बढ़ावा मिला और उनसे कस्बों का भी विकास हुआ।
   16वीं शताब्दी में देश में कई बड़े-बड़े कस्बों का विकास भी हो चुका था। राल्फफिच, जो अकबर के शासन काल में भारत आया था, के अनुसार आगरा तथा फतेहपुर सीकरी दोनों ही लंदन से बड़े थे। मोनसरेट, जो एक जेसुइट पादरी था और अकबर के दरबार में आया था, के अनुसार लाहौर, यूरोप तथा एशिया के किसी भी शहर से कम नहीं था। हाल के एक अध्ययन से यह मालूम हुआ है कि 17वीं शताब्दी में आगरा का दुगने से भी ज्यादा विस्तार हो गया था। बर्नियर 17वीं शताब्दी के मध्य में लिखता है कि दिल्ली पैरिस से कम नहीं थी और आगरा तो दिल्ली से भी बड़ा था। इस काल में पश्चिम में अहमदनगर तथा बुरहानपुर, उत्‍तर-पश्चिम में मुलतान और पूर्व में पटना, राजमहल और ढाका विकास के बाद काफी बड़े कस्बे हो गये थे। इसके अतिरिक्त अहमदाबाद भी बड़ा शहर था तथा लंदन और उसके उपनगरों जितना बड़ा था। पटना की आबादी दो लाख थी जो उस समय काफी बड़ी समझी जाती थी। यह सभी कस्बे केवल प्रशासनिक केन्द्र ही नहीं थे बल्कि व्यापार और वस्तु निर्माण के केन्द्र भी बन गये थे।
   ग्रामीण पैदावार में ज्यादा हिस्सा, जो मुद्रा में बदल जाता था, वसूल करने की मुगलों की क्षमता और इस मुद्रा के मनसबदारों के पास जमा होने के कारण विलासिता की तमाम वस्तुओं की माँग काफी बढ़ गयी जिनमें मकान, सराय और बावली आदि के बनाने के सामान भी शामिल थे। इस मामले में सरकारी हस्तक्षेप से जो प्रत्यक्ष परिणाम सामने आया उसका एक उदाहरण तो हथियारों, जिनमें हर प्रकार की बंदूकें, तोपें तथा फौजी लिबास आदि शामिल हैं, के निर्माण में वृद्धि हुई और दूसरा उदाहरण जहाजों के निर्माण में वृद्धि है। अकबर और औरंगजेब दोनों ही हर प्रकार की बंदूकें बनाने, जिनमें आसानी से इधर-उधर ले जाने वाली बंदूकें भी शामिल थीं, में गहरी दिलचस्वी रखते थे। उन्होंने इनके निर्माण में बेहतरी पैदा करने के लिए भी कदम उठाये। भारत की लोहे की तलवारों की भारत से बाहर भी माँग थी। 1651 में शाहजहाँ ने समुद्री जहाजों के निर्माण का कार्यक्रम शुरू किया और पश्चिमी एशिया तक समुद्र मार्ग द्वारा जाने के लिए चार से छः तक जहाज बने। एक वर्ष बाद छः समुद्री जहाज आवागमन के लिए पानी में उतार दिये गये। यह धनी व्यापारियों और मनसबदारों के जहाज निर्माण कार्यक्रम का एक भाग था। परिणामस्वरूप भारतीय जहाज बेड़े में शीघ्र ही यूरोपीय नमूने के आधार पर जहाज बनने लगे और पश्चिम एशिया तक माल ले जाने के लिए किराये में कमी आ गई।

विदेशी व्यापार और यूरोपीय व्यापारी

   हम पहले ही इस बात का उल्लेख कर चुके हैं कि भारत में ऐसे बहुत से बन्दरगाह और कस्बे थे, जहाँ से संसार के विभिन्न देशों से व्यापार होता था। भारत दक्षिणी-पूर्वी एवं पश्चिमी एशिया के कई देशों को चीनी, चावल आदि जैसे खाद्य पदार्थ ही नहीं भेजता था, बल्कि इस क्षेत्र के व्यापार में भारत के सूती कपड़े की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका थी जैसा कि एक अंग्रेज ऐजेन्ट ने देखा, ‘‘अदन से (मलाया में) अचिन तक हर व्यक्ति सर से पाँव तक भारत के सूती कपड़े पहने थे। इस वक्तव्य में थोड़ी अतिशयोक्ति है (क्योंकि मिश्र और उस्मानी सुल्तान आधीन तुर्की में भी कपास की पैदावार होती थी और सूती कपड़ा निर्यात किया जाता था) किन्तु बुनियादी तौर पर यह सही है। यही कारण है कि भारत (चीन को छोड़कर) समस्त एशिया के लिए वास्तविकता में कारखाना बन गया था। भारत को केवल कुछ धातुओं के आयात की आवश्यकता थी जैसे टिन और ताँबा (टिन की जरूरत काँसा बनाने के लिये थी) जिनकी पैदावार काफी नहीं थी। इसके अतिरिक्त भारत खाने और औषधियों के कुछ मसाले, जंगी घोड़े और विलासिता की वस्तुएँ (जैसे हाथी दाँत की बनी वस्तुएँ) भी आयात करता था। सोने और चाँदी के आयात से व्यापार में भारतीय व्यापार के पक्ष में संतुलन पैदा हुआ। भारत के विदेशी व्यापार के विकास के फलस्वरूप 17वीं शताब्दी में भारत में सोने और चाँदी का आयात इतना बढ़ गया कि बर्नियर को इस तरह टिप्पणी करनी पड़ी कि ‘‘विश्व के प्रत्येक भाग में चक्कर काटने के बाद सोना और चाँदी अन्त में भारत में जो सोने और चाँदी के दलदल है, दफन हो जाता है।’’ यह वक्तव्य भी अतिश्योक्तिपूर्ण है क्योंकि उन दिनों प्रत्येक देश सोने और चाँदी को अपने कब्जे में रखने का प्रयत्न करता था लेकिन इसमें सफलता केवल भारत और चीन ही को मिल पायी जिसका कारण उनकी अर्थव्यवस्था का फैलाव और उनकी आत्मनिर्भरता थी। हम पहले ही बता चुके हैं कि 15वीं शताब्दी के अंत में पुर्तगालियों का भारत में आगमन हो चुका था। 17वीं शताब्दी में व्यापार के उद्देश्य से कई दूसरे यूरोपीय व्यापारी, जैसे डच, अंग्रेज और बाद में फ्रांसीसी भारत आये। वह व्यापारिक प्रतिष्ठान, कृषि और वस्तु निर्माण में तीव्र वृद्धि से विस्तार के फलस्वरूप, यूरोपीय अर्थव्यवस्था के विकास का प्रत्यक्ष परिणाम था।
   16वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पुर्तगाल की सत्ता का पतन आरम्भ हो गया था। पुर्तगालियों के दृढ़ विरोध के बावजूद डच 1606 में गोलकुण्डा के शासक के फरमान पर स्वयं को मछलीपट्टम में स्थापित करने में सफल हो गए। धीरे-धीरे उन्होंने गरम-मसालों के लिए मशहूर जावा तथा सुमात्रा द्वीपों तक अपना प्रभाव बढ़ा लिया जिससे 1610 तक गरम-मसालों के व्यापार में वे सबसे आगे बढ़ गए। डच व्यापारी आए तो मुख्य रूप से मसालों के व्यापार के लिए किन्तु उन्हें शीघ्र ही पता चल गया कि मसाले अधिकतर भारतीय कपड़े के बदले ही मिल सकते थे। कोरोमण्डल तट पर तैयार कपड़ें की दक्षिण-पूर्व एशिया में सबसे अधिक माँग थी और इसे वहाँ तक ढोकर ले जाना भी सस्ता पड़ता था। अतः उन्होंने मछलीपट्टम से दक्षिण की ओर कोरोमण्डल तट पर अपनी गतिविधियाँ बढ़ा दी और स्थानीय शासक की स्वीकृति लेकर यहाँ अपना मुख्यालय स्थापित कर लिया।
   डच व्यापारियों की तरह अंग्रेज भी इस तट पर मसालों के व्यापार के लिए आए थे लेकिन तब तक डच अधिक शक्तिशाली हो गए थे और जावा-सुमात्रा में पूरी तरह जम गए थे। उनके विरोध से बाध्य होकर अंग्रेजों को अपना ध्यान भारत में केन्द्रीत करना पड़ा। सूरत के पास एक पुर्तगाली बेड़े को पराजित करके वे 1612 में वहाँ एक फैक्टरी स्थापित करने में सफल हो ही गए। इसकी पुष्टि 1618 में सर थामसरो की मदद से मिले जहाँगीर के एक फरमान से हो गई। शीघ्र ही अंग्रेजों की देखादेखी डच ने भी सूरत में एक फैक्टरी स्थापित कर ली।
   अंग्रेजों ने शीघ्र ही भारत में कपड़े के निर्यात केन्द्र रूप में गुजरात के महत्व को भाप लिया था। अंग्रेजों ने लाल सागर तथा फारस की खाड़ी के बन्दरगाहों के साथ होने वाले भारत के व्यापार में जबरदस्ती प्रवेश करने की चेष्टा की। 1622 में ईरानी सैनिकों की मदद से उन्होंने फारस की खाड़ी में पुर्तगाली अड्डे ओरमुज पर कब्जा कर लिया।
   इस प्रकार 17वीं शताब्दी के पहले चतुर्थांश तक भारतीय व्यापार पर पुर्तगालियों का एकाधिकार हमेशा के लिए समाप्त हो गया था और उसका स्थान डच और अंग्रेजों ने ले लिया था। पुर्तगाली अब गोआ तथा दमन ड्यू तक ही सीमित रह गये थे और भारतीय व्यापार में उनका हिस्सा बराबर घटता रहा और 17वीं शताब्दी के अन्त तक यह बिल्कुल महत्वहीन हो गया।
   हाल के अध्ययन में यह बात सामने आयी है कि समुद्र में अपने आधिपत्य के बावजूद यूरोपीय भारतीय व्यापारियों को एशियायी व्यापार से निकालने में कभी सफल नहीं हो सके। वास्तविकता तो वह है कि गुजरात, कोरोमण्डल या बंगाल अर्थात् भारत के किसी भी क्षेत्र में यूरोपीय व्यापारी कंपनियों का हिस्सा भारत के विदेशी व्यापार के मुकाबले में बहुत मामूली मात्रा में था। भारतीय व्यापारी क्यों आगे थे इसके कई कारण थे। एक कारण तो यह था कि भारतीय व्यापारी कपड़े के व्यापार के मामले में देशी और विदेशी दोनों बाजारों के बारे में ज्यादा जानकारी रखते थे। इसके अतिरिक्त भारतीय दस से पाँच प्रतिशत तक के मुनाफे पर व्यापार के लिए तैयार थे। इसके विपरीत डच कम से कम चालीस से पचास प्रतिशत तक के मुनाफे पर ही व्यापार कर सकते थे। क्योंकि इसके बिना वे फैक्टियों, जंगी जहाजों आदि पर होने वाले खर्चें को पूरा नहीं कर सकते थे। अंग्रेजों का रवैया कुछ ऐसा ही रहा होगा। डच और अंग्रेज यह समझते थे कि मुगल सरकार और भारतीय व्यापारियों के सहयोग के बिना वे भारत में व्यापार तो क्या फैक्ट्री में सेवा करने वाले अपने लोगों का पेट भी नहीं भर सकते। इन कारणों ने और यात्रा पर आने वाले खर्चें को कम करने के लिए उन्होंने किराया लेकर अपने जहाजों में भारतीय व्यापारियों का माल भी लादना शुरू कर दिया। भारतीय व्यापारियों को इसमें कोई दुविधा नहीं थी, क्योंकि उनके माल का आवागमन सुरक्षित हो गया। साथ ही भारत में भी जहाज निर्माण में वृद्धि होती रही। जैसा कि सूरत के उदाहरण से मालूम होता है, जहाँ शताब्दी के मध्य तक पचास जहाज थे, जिनमें से कई बहुत अच्छे बने थे और शताब्दी के अंत में इनकी संख्या बढ़ कर 120 हो गयी। भारत के विदेशी व्यापार और वस्तुनिर्माण में वृद्धि का यह एक और प्रमाण था।
   एशियाई व्यापार में हिस्सेदार होने के आलावा अंग्रेज बराबर ऐसी चीजों की खोज में रहते थे जो भारत से यूरोप निर्यात की जा सकें। सबसे पहले तो निर्यात की मुख्य चीज नील थी, जो ऊनी कपड़ों को रंगने के काम आती थी। सबसे अच्छा नील गुजरात में सरखेज तथा आगरा के निकट ब्याना में पैदा होता था। शीघ्र ही अंग्रेजों ने भारत से कपड़े, जिसे वे केलीको कहते थे, का निर्यात आरम्भ कर दिया। पहले-पहल तो गुजरात में तैयार कपड़ा ही निर्यात के लिए काफी था पर जैसे-जैसे माँग बढ़ती गयी, अंग्रेजों ने आगरा तथा उसके आस-पास बने कपड़े की ओर भी ध्यान दिया। लेकिन अब यह भी काफी नहीं था इसलिए अब कोरोमण्डल में तैयार कपड़े का निर्यात किया जाने लगा। 1640 तक कोरोमण्डल से गुजरात जितना ही कपड़ा निर्यात होने लगा और 1660 तक गुजरात से तिगुना। मछलीपट्टम तथा फोर्टसेंट जॉर्ज, जो बाद में मद्रास बना, इस व्यापार के मुख्य केन्द्र थे।
   इस नये निर्यात में अंग्रेजों के अलावा अब डच भी हिस्सा लेने लगे और कोरोमण्डल से कपड़ा और नील निर्यात करने लगे।
   अंग्रेजों ने सिन्धु नदी के मुहाने पर बसे लहरी बन्दर का भी व्यापार के लिए विकास किया क्योंकि यहाँ नदी मार्ग से लाहौर और मुल्तान की चीजें लाई जा सकती थी, पर यहाँ का व्यापार गुजरात के व्यापार जितना महात्वपूर्ण नहीं था। इससे अधिक महत्वपूर्ण बंगाल तथा उड़ीसा के व्यापार को बढ़ाने के उनके प्रयास थे। लेकिन पुर्तगालियों और माघ समुद्री डाकुओं के कारण यहाँ का विकास धीमा ही रहा। लेकिन 1650 तक अंग्रेज हुगली तथा उड़ीसा में बालासोर में स्थापित होने में सफल हो गये और वहाँ के कपड़े के अलावा रेशम तथा चीनी का निर्यात करने लगे। एक अन्य वस्तु जिसका निर्यात बढ़ता गया, वह शोरा था, जो यूरोप में बारूद बनाने वाले माल की कमी को पूरा करने के अलावा यूरोप जाने वाले जहाजों को सीधा तथा सन्तुलित रखने के लिए उनकी पेंदी भारी करने के काम करता था। सबसे अच्छी किस्म का शोरा बिहार में मिलता था। पूर्वी क्षेत्रों से निर्यात बढ़ता गया और शताब्दी के अंत तक यहाँ से होने वाले निर्यात का मूल्य कोरोमण्डल के बराबर का हो गया।
   इस प्रकार अंग्रेज और डच कम्पनियों ने भारत की वस्तुओं के लिए नये बाजारों की खोज की। 17वीं शताब्दी के अन्तिम चतुर्थांश तक इग्लैण्ड में भारतीय कपड़े की माँग इतनी बढ़ गई कि एक अंग्रेज ने लिखा कि ‘‘हमारी महिलाओं के लिए कपड़ों तथा घर के फर्नीचर के लिए जो भी ऊन या रेशम इस्तेमाल होता था, वह करीब-करीब सब भारतीय व्यापार से उपलब्ध होता था’’। 1701 में प्रदर्शनों के कारण ईरान, चीन और भारत से आने वाले सभी रंगीन अथवा छपे कपड़े पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया लेकिन इसका और ऐसे कानूनों का भी जिनमें कड़े दण्ड की व्यवस्था थी, कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। 1701 में तो छपे कपड़े के स्थान पर भारत के सफेद कपड़े के थानों की संख्या साढ़े नौ लाख थी लेकिन 1719 में बढ़कर कर यह संख्या बीस लाख तक पहुँच गईं।
   भारत के विदेशी व्यापार की वृद्धि, देश में बाहर से आने वाले सोने और चाँदी की रेलपेल और तेजी से बढ़ते हुए यूरोपीय बाजारों से भारत के बहुत अधिक जुड़ जाने के कई महत्वपूर्ण परिणाम सामने आये। भारतीय अर्थव्यवस्था में वृद्धि तो हुई।
   लेकिन देश में सोना और चाँदी तो और भी तेजी से आने लगा। परिणामस्वरूप सत्रहवीं शताब्दी के पूवार्द्ध में कीमतें लगभग दुगनी हो गयीं। कीमतों में इस वृद्धि से समाज के विभिन्न वर्गों पर क्या प्रभाव पड़ा इस पर अभी विस्तार पूर्वक काम करने की जरूरत है। किन्तु शायद यह तो कहा जा सकता है कि इससे गाँव के पुराने और परम्परागत बन्धन कमजोर हुए और मनसबदार वर्ग ज्यादा पैसे का लोभी और लालची हो गया।
   दूसरे यह कि यूरोपीय राष्ट्रों ने भारत को निर्यात होने वाले सोने-चाँदी के स्थान पर दूसरे तरीके सोचने आरंभ किए। एक उपाय जो उन्होंने सोचा वह यह था कि गरम-मसाले के व्यापार पर आधिपत्य जमाकर एशियाई व्यापार के क्षेत्र में प्रवेश किया जाये और कपड़े के भारतीय व्यापार पर कब्जा किया जाये। लेकिन जैसा कि हम देखेंगे कि इस दिशा में उन्हें बहुत कम सफलता मिली। अतः उन्होंने भारत और इसके पड़ोस में साम्राज्य हथियाने की कोशिशें आरम्भ कीं ताकि यहाँ के शुल्कों से यह यूरोप में आयात होने वाले चीजों की कीमत निकाल सकें। डच ने जावा और सुमात्रा पर कब्जा कर लिया किन्तु असल समस्या तो उन सब के लिए भारत था। अंग्रेज और फ्रांसीसियों में भारत पर कब्जा जमाने के लिए मुकाबला रहा लेकिन वे उस समय तक सफलता प्राप्त नहीं कर सकते थे जब तक कि भारत, पहले मुगल शासक के आधीन और बाद में प्रांतीय सूबेदारों के आधीन मजबूत और संयुक्त था। वे केवल उसी सूरत में सफल हो सकते थे, जब यहाँ के राज्य आन्तरिक और बाहरी कारणों से कमजोर न हो जाये। इन प्रक्रिया का अध्ययन बाद में होगा।