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दिल्ली सल्तनत - खिलजी वंश एवं तुगलक वंश

खलजी तथा तुगलक वंश

   सन् 1286 में बलबन के मरणोपरान्त दिल्ली में पुनः कुछ समय के लिये अराजकता फैल गयी। बलबन द्वारा चुना गया उसका उत्तराधिकारी शहजादा मुहम्मद पहले ही मंगोलों के साथ युद्ध करते हुए मारा गया था। बलबन के दूसरे पुत्र बुगरा खाँ को मलिकों ने दिल्ली के सिंहासन के उत्तरादायित्व को संभालने के लिये आमंत्रित किया था। लेकिन उसने बंगाल और बिहार पर ही शासन करना पसंद किया। इसलिये बलबन के एक पौत्र को सिंहासन पर बैठा दिया गया। लेकिन अल्पवयस्क और अनुभवहीन होने के कारण वह स्थिति को संभाल नहीं सका। तुर्की मलिक चाहते थे कि राज्य के उच्च पदों पर उन्हीं की नियुक्ति हो पर इस बात को लेकर शेष लोगों के मन में क्षोभ था। खलजियों जैसे अनेक गैर-तुर्क जो गोरियों के आक्रमण के समय भारत आये थे, उन्हें दिल्ली में कभी भी यथोचित सम्मान नहीं मिला। केवल बंगाल में उन्हें बढ़ने का अवसर हाथ लगा। सैनिक के रूप में भी उन्हें नौकरी मिली। अन्य को मंगोलों का सामना करने के लिये उत्तर-पश्चिम में तैनात किया गया। कालान्तर में अनेक भारतीय मुसलमानों को अमीर की श्रेणी में रखा गया। उच्च पदों से वंचित रहने का भी उन्हें भारी दुख था। इसका अनुमान इमादुद्दीन रैहान के मामले से लगाया जा सकता है। जिसे बलबन ने विरूद्ध खड़ा कर दिया गया था। बलबन ने स्वयं नासिरुद्दीन महमूद के पुत्रों को हटाकर सिंहासन प्राप्त किया था। इससे यह प्रमाणित होता हो गया है कि कोई भी योग्य सेना अधिकारी का मलिक सेना से पर्याप्त मदद मिलने पर स्थायी राजवंश के उत्तराधिकारियों को हटा कर स्वयं सिंहासन पर बैठ सकता था।

ख़लजीवंश (1290-1320)

   इन्हीं कारणों से जलालुद्दीन के नेतृत्व में कुछ खलजी सरदार सन् 1290 में बलबन के अयोग्य उत्तराधिकारियों को सिंहासन से वंचित करने में सफल हुए। जलालुद्दीन खलजी ने उत्तर-पश्चिम के सैनिक अभियानों का नेतृत्व किया था और मंगोलों के विरूद्ध युद्ध में सफल रहा था। गैर तुर्की मलिकों ने ख़लजियों के इस विद्रोह का स्वागत किया। खलजियों ने तुर्कों को उच्च पदों से वंचित नहीं किया लेकिन ख़लजियों को शासनाधिकार मिलने से उच्च पदों के लिए तुर्कों का एकाधिकार समाप्त हो गया।
   जाललुद्दीन ख़लजी ने केवल छह वर्षों तक शासन किया। इस अल्पकालीन शासन के दौरान जलालुद्दीन ख़लजी ने बलबन के कठोर शासन में नरमी लाने का प्रयास किया। वह दिल्ली सल्तनत का प्रथम शासक था, जिसने अपने विचारों को स्पष्ट रूप से सामने रखा कि राज्य का आधार प्रजा का समर्थन होना चाहिए। चूँकि भारत की अधिकांश जनता हिन्दू थी, अतः सही अर्थों में यहाँ कोई भी राज्य इस्लामी राज्य नहीं हो सकता था। सहिष्णुता और सरल दण्ड विधान की नीति अपना कर उसने मलिक वर्ग का समर्थन प्राप्त करने की चेष्टा की। फिर भी अनेक लोगों ने जिनमें उनके समर्थक भी सम्मिलित थे, इस नीति को कमजोर समझा और उसे समयानुकूल नहीं माना। दिल्ली सल्तनत को बहुत से आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं का सामना करना पड़ा। जिसके कारण वह असुरक्षित थी। जलालुद्दीन की नीति को अलाउद्दीन ने बिल्कुल बदल डाला और जिन्होंने उसका विरोध करने का साहस किया उन्हें कठोर दण्ड दिया।
   अलाउद्दीन ख़लजी (1290-1314 ई.) ने जलालुद्दीन खलजी (जो रिश्ते में उसका चाचा और ससुर लगता था) की निर्दयता से हत्या कर गद्दी प्राप्त की। अवध के बाली के रूप में अलाउद्दीन ने दक्षिण में देवगिरी पर आक्रमण कर अपार सम्पत्ति इकट्ठा कर ली थी। इस खजाने पर कब्जा करने की अभिलाषा से जलालुद्दीन अपने भतीजे के पास इलाहबाद के निकट कड़ा नामक स्थान पर गया था। अपनी अधिकांश सेना को पीछे छोड़ कर मात्र कुछ समर्थकों के साथ ही गंगा नदी पार कर वह भतीजे से मिलने गया ताकि अलाउद्दीन उससे डर कर नौ दो ग्यारह न हो जाये। अपने चाचा को मौत के घाट उतार अलाउद्दीन ने सोने को पानी की तरह बहाकर अधिकांश मलिकों और सैनिकों को अपने वश में कर लिया। इसके बावजूद कुछ समय तक अलाउद्दीन को कुछ असंतुष्ट मलिकों तथा अपने रिश्तेदारों के विद्रोह का सामना करना पड़ा। अपने विरोधियों को आतंकित करने के लिये अलाउद्दीन ने बहुत कड़ाई और निष्ठुरता से काम लिया। अधिकांश मलिक जो धन के लोभ से उसकी ओर चले आये थे या तो मार दिये गए या सेवा-मुक्त कर दिये गये और उनकी सम्पत्ति जब्त कर ली गयी। अपने विद्रोही रिश्तेदारों के साथ भी वह बड़ी निर्दयता से पेश आया। जलाउद्दीन के काल में लगभग दो हजार मंगोल इस्लाम धर्म को स्वीकार कर दिल्ली के निकट बस गये थे। अलाउद्दीन ने बड़े पैमाने पर उन्हें मौत के घाट उतार दिया, क्योंकि उन मंगोलों ने अलाउद्दीन के विरूद्ध विद्रोह किया था और गुजरात की लूट का एक बड़ा हिस्सा माँग रहे थे। अलाउद्दीन ने इन विद्रोहियों की पत्नियों और बच्चों को भी कठोर दंड दिया। इतिहासकार बरनी के अनुसार यह एक नया काम था जिसे अलाउद्दीन के उत्‍तराधिकारियों ने जारी रखा। अलाउद्दीन ने मलिकों को अपने विरुद्ध षड़यंत्र रचने पर रोक लगाने के लिए कई कानून बनाएँ। सुल्तान की अनुमति के बिना वे प्रतिभोज, उत्सव या विवाह नहीं कर सकते थे। उत्सव पर आयोजित प्रतिभोजों को हतोत्साहित करने के लिए उसने मदिरापान और मादक द्रव्यों के सेवन पर प्रतिबन्ध लगा दिया। मलिकों की कथनी और करनी की सूचना प्राप्त करने के लिये उसने गुप्त विभाग का गठन किया।
   इन कठोर उपायों से अलाउद्दीन ख़लजी ने मलिकों को दबा दिया और उन्हें पूर्णतया सुल्तान का आज्ञाकारी बना दिया। इसके बाद उसके जीवन काल में कोई विद्रोह नहीं हुआ। लेकिन आगे चलकर यह तरीका उसके वंश के लिये हानिकारक सिद्ध हुआ। पुराना मलिक वर्ग नष्ट कर दिया गया। नये मलिक वर्ग को यह बताया गया कि चाहे जो कोई भी व्यक्ति दिल्ली की गद्दी पर बैठे, उसे वे स्वीकार करें। सन् 1316 में अलाउद्दीन ख़लजी की मृत्यु के उपरान्त यह बिल्कुल स्पष्ट हो गया। उसके कृपापात्र मलिक काफूर ने उसके अन्य पुत्रों को बंदी या अँधा बनाकर उसके अल्प वयस्क पुत्र को सिंहासन पर बैठा दिया। लेकिन मलिकों ने उसका कोई विरोध नहीं किया। इसके पश्चात् शीघ्र ही महल-रक्षकों ने काफूर को मार डाला और अलाउद्दीन का दूसरा पुत्र मुबारकशाह सिंहासन पर बैठा लेकिन धीरे-धीरे समस्त शक्तियाँ खुसरो नामक वज़ीर के हाथों में चली गयी जो हिन्दू से मुसलमान बन गया था। कुछ समय के पश्चात् मुबारकशाह का वध कर खुसरो गद्दी पर बैठा। यद्यपि समकालीन इतिहासकारों ने खुसरो को इस्लाम विरोधी बताया है और उसे हर प्रकार के अपराध के लिये दोषी ठहराया है, किन्तु वास्तविकता यह है कि खुसरो पूर्ववर्ती सुल्तानों की तुलना में उतना बुरा नहीं था। इसके विरुद्ध मुसलमान मलिकों या दिल्ली की जनता ने खुला विद्रोह नहीं किया। दिल्ली के प्रसिद्ध सूफी संत निजामुद्दीन औलिया ने भी खुसरो के उपहार को स्वीकार कर, उसे मान्यता प्रदान की। इसके सकारात्मक पक्ष भी हैं। इसके सिद्ध होता है कि दिल्ली और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों के मुसलमान उन दिनों धार्मिक कारणों से अप्रभावित थे और पारिवारिक या जातिगत पृष्ठभूमि का ख्याल किये बिना किसी की आज्ञा का पालन करने के लिए तैयार थे। इससे मलिक वर्ग के सामाजिक आधार को और विस्तृत करने में सहायता मिली। फिर भी सन् 1320 में गयासुद्दीन तुगलक के नेतृत्व में कुछ अधिकारियों ने विद्रोह का झंडा खड़ा किया। एक खुला विद्रोह छिड़ गया। राजधानी दिल्ली के बाहर एक धनघोर बुद्ध में खुसरो पराजित हुआ और मारा गया।

तुगलक वंश (1320-1412 ई.)

   गयासुद्दीन तुगलक ने एक नये वंश की स्थापना की। उसने सन् 1412 तक शासन किया। तुगलक वंश में तीन सुयोग्य शासक हुए - गयासुद्दीन, उसका पुत्र मुहम्मद बिन तुगलक (1324-1351) और उसका भतीजा फीरोज तुगलक (1351-1388 ई.)। इनमें से प्रथम दो शासकों ने लगभग संपूर्ण देश पर शासन किया। फीरोज तुगलक का साम्राज्य छोटा था, तो भी वह लगभग उतना ही बड़ा था जितने पर अलाउद्दीन ख़लजी ने शासन किया था। फीरोज के मरणोपरान्त दिल्ली सल्तनत विघटित हो गया और उत्तर भारत कई छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया। यद्यपि तुगलक शासकों ने सन् 1412 ई. तक शासन किया तथापि सन् 1398 में तैमूर द्वारा दिल्ली पर आक्रमण को तुगलक साम्राज्य का अंत माना जा सकता है।
   अब हम अलाउद्दीन ख़लजी के काल से दिल्ली सल्तनत के असाधारण विस्तार, सल्तनत कालीन अनेक आन्तरिक सुधार तथा राज्य के पतन के कारणों का अध्ययन करेंगे।

दिल्ली सल्तनत का विस्तार

   हम देख चुके हैं कि किस प्रकार अजमेर तथा इसके निकटवर्ती क्षेत्रों सहित पूर्वी राजस्थान दिल्ली सल्तनत के अधीन हो गया था, यद्यपि बलबन के काल से ही सबसे शक्तिशाली राजपूत रणथम्भौर इसके अधिकार के बाहर चला गया था। जलालुद्दीन ने रणथम्भौर पर आक्रमण तो किया, लेकिन उसने पाया कि यह कार्य उसके लिये बहुत कठिन था। इस प्रकार दक्षिण तथा पश्चिम राजस्थान दिल्ली सल्तनत के नियंत्रण के बाहर ही रहे। अलाउद्दीन के सत्ता में आने के साथ ही नयी परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं। पच्चीस वर्षों के भीतर दिल्ली सल्तनत की सेनाओं ने न केवल गुजरात और मालवा पर अधिकार किया और राजस्थान के अधिकांश राजाओं को परास्त किया बल्कि दक्षिण भारत में दक्कन और मदुरई तक के क्षेत्रों को भी जीता। कालान्तर में इस विस्तृत क्षेत्र को सीधे दिल्ली प्रशासन के अधीन रखने का प्रयास किया गया। विस्तार की नयी नीति का प्रारम्भ अलाउद्दीन ख़लजी ने किया और उसके उत्तराधिकारियों ने भी इस नीति को जारी रखा। मुहम्मद बिन तुगलक के काल में यह नीति चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई।
   इसके पूर्व हम देख चुके हैं कि विस्तारवादी नीति को पुनः कार्यान्वित करने हेतु दिल्ली सल्तनत किस प्रकार धीरे-धीरे प्रवृत्त हो रही थी। इस अवधि में मालवा, गुजरात और देवगिरि पर राजपूत वंशों का शासन था, जिनमें से अधिकतर तेरहवीं शताब्दी के अंत और तेरहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में अस्तित्व में आये। गंगा घाटी में तुर्की शासन की स्थापना के बावजूद इन राजवंशों ने आपस में लड़कर संपूर्ण क्षेत्र पर अधिकार करने की पुरानी प्रवृत्ति को बनाये रखा। उनमें से प्रत्येक ने सम्पूर्ण क्षेत्र पर आधिपत्य जमाने के लिए संघर्ष किया। यहाँ तक कि इल्तुतमिश के शासन काल में जब तुर्कों ने गुजरात पर आक्रमण किया तब मालवा और देवगिरि दोनों के शासकों ने गुजरात पर दक्षिण की ओर से धावा बोल दिया। मराठों के क्षेत्र में देवगिरि के शासक, तेलंगाना क्षेत्र में स्थित बारंगल और कर्नाटक क्षेत्र में स्थित होयसलों के साथ निरंतर संघर्ष करते रहे। उधर होयसल शासन अपने पड़ोसियों, मावार (तमिल क्षेत्र) के पांडयों के साथ युद्धरत थे। इस आपसी संघर्षों से मालवा और गुजरात पर विजय पाना आसान हो गया और आक्रमणकारियों का और आगे दक्षिण की ओर बढ़ने के लिये हौसला बुलंद हो गया।

गुजरात तथा मालवा

   मालवा और गुजरात पर तुर्कों के आक्रमण के कई महात्वपूर्ण कारण थे। ये क्षेत्र न केवल घनी आबादी युक्त और उर्वर थे बल्कि पश्चिमी तट के बन्दरगाहों और गंगाघाटी के व्यापार मार्ग पर इनका पूर्ण नियंत्रण था। इन बन्दरगाहों के द्वारा विदेश व्यापार से इस क्षेत्र के शासकों ने बहुत सा सोना और चाँदी एकत्र कर लिया था। दिल्ली के सुल्तानों का गुजरात पर आधिपत्य का दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह था कि वे इस मार्ग से अपनी सेना के लिये घोड़े प्राप्त कर सकते थे। मध्य और पश्चिम एशिया में मंगोलों के उदय और दिल्ली के शासकों के साथ उसके संघर्ष के कारण इस क्षेत्र से दिल्ली के लिये अच्छे किस्म के घोड़ों की आपूर्ति करना कठिन हो गया था। आठवीं और बाहरवीं शताब्दी के बीच पश्चिम तट के बन्दरगाहों के रास्ते से आयात की जाने वाली वस्तुओं में अरबी, इराकी और तुर्की घोड़ों की प्रधानता थी।
   सन् 1299 के प्रारम्भ में राजस्थान के मार्ग से गुजरात पर विजय प्राप्त करने के लिये अलाउद्दीन के दो सेनाध्यक्षों के नेतृत्व में एक सेना आगे बढ़ी। रास्ते में उन्होंने जैसलमेर पर भी आक्रमण किया और जीत लिया। गुजरात का शासक रायकर्ण इस अचानक आक्रमण से घबराकर बिना युद्ध किए, भाग खड़ा हुआ। गुजरात के मुख्य शहरों, जिनमें अन्हिलवाड़ा भी एक था, के प्राचीन सुन्दर भवनों और मन्दिरों को लूट लिया गया। सोमनाथ का प्रसिद्ध मन्दिर जिसका पुनर्निर्माण बारहवीं शताब्दी में हुआ था, वह भी लूट लिया गया। बहुत बड़ी संख्या में लूट का माल एकत्र किया गया। खम्भात के धनाढ्य मुसलमान व्यापारियों को भी छोड़ा नहीं गया। यह वही स्थान था जहाँ मलिक काफूर पकड़ा गया, जिसने बाद में दक्षिण भारत की विजय का नेतृत्व किया था। उसे अलाउद्दीन को भेंट किया गया। शीघ्र ही उन्नति करता हुआ वह अलाउद्दीन के आदर का पात्र बन गया।
   गुजरात अब दिल्ली सल्तनत के अधीन था। जिस शीघ्रता और आसानी से गुजरात जीता गया था, इससे ज्ञात होता है कि गुजरात का शासक अपनी प्रजा के बीच लोकप्रिय नहीं था। ऐसा प्रतीत होता है कि उसके एक मंत्री ने जिससे उसकी अनबन हो गयी थी, अलाउद्दीन के पास गुजरात पर आक्रमण करने का प्रस्ताव रखा और उसकी सहायता भी की। इसके अतिरिक्त गुजरात की सेना भी अच्छी तरह प्रशिक्षित नहीं रही होगी और प्रशासन भी शिथिल रहा होगा। देवगिरि के राजा राम चन्द्र की सहायता से, रायकर्ण दक्षिण गुजरात के भाग पर अपना अधिकार बनाये रख सका। जैसा कि आगे देखेंगे, इस प्रकार दिल्ली तथा देवगिरि के यादवों के मध्य झगड़े का एक और कारण पैदा हो गया।

राजस्थान

   गुजरात विजयोपरान्त अलाउद्दीन ने राजस्थान के प्रशासन को संगठित करने की ओर अपना ध्यान लगाया। इसमें रणथम्भौर ने सर्वप्रथम उसके ध्यान को आकार्षित किया जिस पर पृथ्वीराज चौहान के वंशजों का शासन था। वहाँ के शासक हमीर देव ने अपने पड़ोसियों के विरुद्ध युद्ध अभियान छेड़ रखा था। इन्हें इस बात का श्रेय प्राप्त है कि धार के राजा भोज तथा मेवाड़ के राणा को उन्होंने पराजित किया था। लेकिन इन्हीं विजयों के कारण उसका सर्वनाश भी हुआ। गुजरात अभियान के बाद दिल्ली लौटते समय मंगोल सैनिकों में लूट की संपत्ति के बँटवारे को लेकर झगड़ा हुआ और मंगोल सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। बड़े पैमाने पर हत्या के बाद विद्रोह दबा दिया गया। इन विद्रोहियों में से दो मंगोल सैनिकों ने भाग कर रणथम्भौर में शरण ली। अलाउद्दीन ने हमीर देव के पास इन मंगोलों को मार देने अथवा अपने राज्य से निकलने का संदेश भेजा था। लेकिन हमीर देव ने शरणागत के विरुद्ध कारवाई करना अपनी शान के विरुद्ध समझा। इसके अतिरिक्त उसे अपने किलों और सैन्य शक्ति पर पूर्ण भरोसा भी था। अतः अलाउद्दीन के पास उसने अपमानजनक उत्तर भेज दिया अपनी शक्ति के विषय में उसका अनुमान गलत नहीं था क्योंकि राजस्थान में रणथम्भौर का किला अपनी मजबूती के लिये विख्यात था और इसके विरुद्ध जलाउद्दीन का अभियान भी विफल रहा। अलाउद्दीन ने अपने एक प्रसिद्ध सेनाध्यक्ष के नेतृत्व में रणथम्भौर के विरुद्ध एक सेना भेजी। हमीर देव ने उसे पराजित किया और क्षति भी पहुँचाई। अंत में रणथम्भौर के विरुद्ध अलाउद्दीन को ही कूच करना पड़ा। प्रसिद्ध कवि अमीर खुसरो भी इस अभियान में अलाउद्दीन के साथ थे, जिन्होंने किले का संजीव चित्र खींचा है और उसकी लागत को बताया है। अलाउद्दीन द्वारा तीन माह की लगातार घेरे बंदी के कारण रणथम्भौर की महिलाओं ने चिता पर चढ़कर भयानक जौहरव्रत का पालन किया। सभी पुरुष किले के बाहर आकर जीवन की अन्तिम साँस तक लड़ते रहे। समसामयिक लेखकों द्वारा जौहरव्रत का यह पहला विवरण मिलता है। राजपूतों के साथ जूझते हुए सभी मंगोल भी मारे गए। यह घटना सन् 1301 की है।
   अलाउद्दीन ने पुनः अपनी दृष्टि चित्तौड़ की ओर फेरी जो राजस्थान में रणथम्भौर के पश्चात् सबसे शक्तिशाली किला था। इसलिये इस पर विजय पाना अलाउद्दीन ख़लजी के लिये आवश्यक हो गया। इस के अतिरिक्त, मेवाड़ के शासक रतन सिंह ने अलाउद्दीन की सेना को गुजरात जाते समय मेवाड़ क्षेत्र से होकर जाने की अनुमति प्रदान नहीं की थी। इससे भी अलाउद्दीन आग बबूला था। अजमेर और मालवा जाने के लिये चितौड़ का भी एक महत्वपूर्ण स्थान था। अलाउद्दीन द्वारा चित्तौड़ पर आक्रमण करने के संबंध में एक दंतकथा प्रचलित है। कहा जाता है कि अलाउद्दीन ने रत्नसेन सिंह की सुन्दर रानी पद्मिनी को प्राप्त करने के लोभ में आक्रमण किया था। बहुतेरे आधुनिक इतिहासकार इस दंतकथा को इसीलिये सत्य नहीं मानते हैं क्योंकि सौ वर्षों के बाद पहली बार इस घटना का उल्लेख किया गया है। इस कथा में पद्मिनी श्रीलंका (सिंहल द्वीप) की राजकुमारी बतायी गयी है। रत्नसेन सिंह सात समुद्रपार कर अनेक साहसिक कार्यों को सम्पन्न करते हुए उसे चित्तौड़ लाया है, जो असम्भव प्रतीत होता है। पद्मिनी की दंतकथा इस घटना का एक अंग है।
   अलाउद्दीन ने गुप्त रूप से चित्तौड़ को घेर लिया। साहस पूर्व सामना करते हुए कई महीने तक घेरे बंदी के पश्चात् अलाउद्दीन ने सन् 1303 में किले पर धावा बोल दिया। राजपूत स्त्रियों ने जौहर व्रत का पालन किया और अधिकांश वीर पुरुष युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि रत्नसेन सिंह जीवित पकड़ लिया गया और उसे बंदी के रूप में कुछ समय तक रखा गया। अलाउद्दीन के अल्पवयस्क पुत्र खिज्र खाँ को चित्तौड़ का शासक बनाया गया और मुसलमानों की एक सेना किले में नियुक्त की गई। कुछ समय के पश्चात् किले का भार रत्नसेन सिंह के एक रिश्तेदार को सौंप दिया गया।
   अलाउद्दीन ने जालौर पर भी विजय प्राप्त की जो गुजरात के रास्ते में पड़ता था लगभग समस्त राजस्थान के राज्यों को उसने अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिये बाध्य किया। फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि उसने राजपूत राज्यों पर प्रत्यक्ष शासन लादने की कोशिश नहीं की। राजपूत राजाओं को अपने राज्यों पर शासन करने की अनुमति दे दी गयी थी, किन्तु उन्हें नियमित रूप से कर देना पड़ता था और सुल्तान की आज्ञा का पालन करना पड़ता था। अजमेर, नागौर आदि जैसे कुछ प्रमुख नगरों में मुसलमान फौजियों को नियुक्त कर दिया गया था। इस प्रकार राजस्थान को पूर्णतः अधीन कर लिया गया था।

दक्कन और दक्षिण भारत

   राजस्थान पर अपना प्रभुत्व पूरी तरह कायम करने के पहले ही अलाउद्दीन ने मालवा पर कब्जा कर लिया, जो अमीर खुसरो के अनुसार इतना विशाल था कि विद्वान भूगोल शास्त्री भी उसकी सीमाओं का निर्धारण नहीं कर सकते थे। राजस्थान के विपरीत अलाउद्दीन ने मालवा पर प्रत्यक्ष रूप से शासन करने के लिये अपना एक प्रतिनिधि नियुक्त किया।
   सन् 1306-1307 में अलाउद्दीन ने दो अभियानों की योजना बनाई, पहला अभियान था रायकर्ण के विरुद्ध जो गुजरात से निष्काषित होने के पश्चात् मालवा की सीमा पर स्थित बागलाना पर अपना अधिकार जमाए हुए था। रायकर्ण ने वीरता के साथ युद्ध किया पर वह अधिक समय तक टिक न सका। दूसरा अभियान देवगिरि के राजा रामचन्द्र के विरुद्ध था जिसने रायकर्ण की सहायता की थी। पहले के एक अभियान में राय रामचन्द्र ने दिल्ली को वार्षिक कर देने का वादा किया था। नियमित रूप से कर न चुकाने के कारण उसे बाकी कर का भुगतान करना था। द्वितीय सेना के नेतृत्व का भार अलाउद्दीन के गुलाम मलिक काफूर को दिया गया था। राय रामचन्द्र ने काफूर के सम्मुख, आत्मसमर्पण कर दिया। काफूर, ने उसके साथ मर्यादित ढंग से व्यवहार किया और उसे दिल्ली ले गया, जहाँ उसे कुछ समय बाद ‘‘राय राया’’ की उपाधि प्रदान की गयी और उसका राज्य उसे लौटा दिया गया। इसके अतिरिक्त राय रामचन्द्र को एक लाख टंका के साथ शासन के प्रतीक के रूप में सुनहरे रंग की छतरी प्रदान की गई। गुजरात का जिला भी उसे दिया गया। उसने अपनी एक पुत्री की शादी अलाउद्दीन से कर दी। राय रामचंद्र के साथ मैत्री से अलाउद्दीन को दक्षिण के अभियानों में बहुत सहायता मिली।
   सन् 1309 और 1311 के बीच मलिक काफूर ने दक्षिण भारत में दो अभियानों का नेतृत्व किया। पहला अभियान तेलंगाना क्षेत्र के बारंगल और दूसरा द्वारसमुद्र और मावर (आधुनिक कर्नाटक और तमिल क्षेत्र के मदुरई) के विरुद्ध थे। इन अभियानों की विजय के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है, क्योंकि समकालीन लेखक इनसे बड़े प्रभावित हुए थे। सुप्रसिद्ध दरबारी अमीर खुसरो ने इन घटनाओं को लिपिबद्ध किया है। इन आक्रमणों से दिल्ली के शासकों की निर्भीकता, आत्म विश्वास और साहसिक मनोवृत्ति की झलक मिलती है। प्रथम बार मुसलमानों की सेना दक्षिण में मदुरई तक प्रवेश कर गयी और अपने साथ अपरिमित सम्पत्ति लूटकर लायी। इन अभियानों से दक्षिण की परिस्थितियों के विषय में तो सुस्पष्ट जानकारी मिली, लेकिन भौगोलिक दृष्टिकोण से कोई नयी जानकारी हासिल न हो सकी। दक्षिण भारत के व्यापारिक मार्गों की जानकारी पहले से ही थी। काफूर की सेना जब मावर स्थित पाटन में पहुँची तो वहाँ उन्हें व्यापारियों की एक स्थायी बस्ती मिली। वहाँ के शासकों की सेना में मुसलमान सैनिक का दल होता था। इन अभियानों से जनता की नजरों में काफूर की प्रतिष्ठा बढ़ गयी और अलाउद्दीन ने उसे साम्राज्य का मलिकनायब (प्रतिशासक) नियुक्त किया। इन अभियानों के राजनीतिक प्रभाव सीमित थे। काफूर, बारंगल और द्वारसमुद्र के शासकों को शांति के लिये समझौता करने, अपने समस्त कोष और हाथियों को समर्पित करने और वार्षिक कर देने हेतु मजबूर करने में सफल हो गया। लेकिन इसे यह अच्छी तरह ज्ञात था कि इन वार्षिक करों की वसूली के लिये प्रत्येक वर्ष अभियान छेड़ने की आवश्यकता होगी। मावर के संबंध में यह औपचारिकता भी नहीं निभाई गयी। वहाँ के राजा घमासान युद्ध से दूर रहे। काफूर जितनी लूटमार कर सकता था, करी। उसने कई वैभवशाली मन्दिरों को जिसमें चिदम्बरम् (मद्रास के निकट) का मन्दिर भी शामिल था, लूटा। लेकिन उसे तमिल सेना को पराजित किये बिना ही दिल्ली वापस लौटना पड़ा।
   अलाउद्दीन की मृत्यु के उपरान्त पैदा हुए सभी व्यवधानों के साथ ही साथ, पन्द्रह वर्ष के अंदर ही उपयफ्रक्त वर्णित सभी राज्यों का नामोनिशान मिट गया और उनके क्षेत्र सीधे दिल्ली प्रशासन के अधीन हो गए। अलाउद्दीन स्वयं दक्षिण के राज्यों पर प्रत्यक्ष शासन के पक्ष में नहीं था। फिर भी इस नीति का परिवर्तन उसके जीवन काल में ही आरम्भ हुआ। दिल्ली के प्रति सदा निष्ठावान बने रहने वाले राय रामचन्द्र की मृत्यु सन् 1315 में हो गयी और उसके पुत्र ने दिल्ली शासन के बोझ को अपने कंधे से उतार फेंका। मलिक काफूर शीघ्र सेना लेकर वहाँ पहुँचा और विद्रोह को कुचल कर इस क्षेत्र के शासन को अपने हाथों में ले लिया। फिर भी दूरवर्ती क्षेत्रों ने अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी तथा कुछ अन्य राय वंशजों के अधीन रहे।
   सिंहासनारोहण के उपरान्त मुबारक शाह ने देवगिरि को पुनः जीत लिया और एक मुसलमान शासक को वहाँ नियुक्त कर दिया। उसने बांरगल पर भी आक्रमण किया और वहाँ के शासक को एक जिला तथा चालीस हजार सोने की ईंटों का वार्षिक कर देने पर मजबूर किया। सुल्तान के खुसरो खाँ नामक एक गुलाम ने मावर पर आक्रमण कर समृद्धशाली पाटन शहर को लूटा। लेकिन इस क्षेत्र में उसकी कोई स्थायी विजय नहीं हुई।
   सन् 1320 में गयासुद्दीन तुग़लक सिंहासन पर बैठा। उसने एक सबल प्रगतिशील विस्तार की नीति को जीवित रखा। सुल्तान के पुत्र मुहम्मद बिन तुग़लक को इसी उद्देश्य से देवगिरि का शासक बनाया गया। यह बहाना बनाकर कि बारंगल के शासक ने निश्चित कर नहीं चुकाया है, मुहम्मद बिन तुगलक ने पुनः बारंगल को घेर लिया। सर्वप्रथम उसे पराजय का मुख देखना पड़ा। अचानक एक अफवाह फैली की दिल्ली का सुल्तान इस दुनिया में नहीं रहा। इससे दिल्ली की सेना अव्यवस्थित हो गयी। इसका लाभ उठाकर बारंगल की रक्षक सेना टूट पड़ी, जिससे तुगलक की सेना को भारी क्षति पहुँची। मुहम्मद बिन तुगलक को देवगिरि लौट कर जाना पड़ा। अपनी सेना को पुनर्गठित करके उसने पुनः आक्रमण किया और इस बार राय के प्रति किसी प्रकार की दया नहीं दिखायी गई। इसके साथ ही मावर को भी जीत कर साम्राज्य में मिला लिया गया। इसके पश्चात् मुहम्मद बिन तुगलक ने उड़ीसा पर आक्रमण किया और लूट की सम्पत्ति के साथ दिल्ली पहुँचा। दूसरे वर्ष उसने बंगाल को पराजित किया जो बलबन की मृत्यु के समय से ही स्वतन्त्र हो गया था।
   इस प्रकार सन् 1324 तक दिल्ली सल्तनत का अधिकार मदुरई तक हो गया। इस क्षेत्र के अन्तिम हिन्दू राज्य, दक्षिण कर्नाटक के काम्पिली को भी सन् 1328 में अधिकार में कर लिया गया। मुहम्मद बिन तुगलक के एक विद्रोही रिश्तेदार को यहाँ शरण मिली थी। अतः इसका बहाना बनाकर काम्पिली पर आक्रमण किया गया था। सुदूर दक्षिण तथा पूर्व तक, जिसमें उड़ीसा शामिल था, अचानक दिल्ली सल्तनत के विस्तार से विचित्र प्रशासनिक तथा आर्थिक समस्याएँ उठ खड़ी हुई जिनका सामना मुहम्मद बिन तुगलक को करना पड़ा। अब हम इन समस्याओं के निराकरण के लिये उसके द्वारा किये गये प्रयत्नों तथा शासन पर इन समस्याओं के प्रभाव का अध्ययन करेंगे।

आन्तरिक सुधार और प्रयोग

   अलाउद्दीन ख़लजी के सिंहासनारोहण होने तक दिल्ली सल्तनत का प्रभुत्व ऊपरी गंगा-घाटी और पूर्वी राजस्थान तक पूर्ण रूप से स्थापित हो चुका था। इससे सुल्तानों को इतना साहस और संयम मिला कि वे राज्य के प्रशासन को बेहतर बनाने और सेना को सशक्त करने, भू-राजस्व प्रणाली को पुनर्व्यवस्थित करने और तीव्रगति से विकसित होने वाले नगरों को जनता की भलाई के लिये नए प्रयोग कर सकें। यद्यपि सभी उपाय सफल नहीं हुए किन्तु उनसे परम्परा से हटकर चलने की दिशा में प्रयास हुआ। अनुभवहीनता अच्छी तरह जानकारी के अभाव या निहित स्वार्थों से विरोध के कारण इनमें से कुछ प्रयोग असफल रहे। तुर्की राज्य का अब केवल युद्ध, कानून और व्यवस्था से ही संबंध नहीं रह गया बल्कि इन राज्यों में स्थायित्व आ गया था।

अलाउद्दीन का बाजार नियंत्रण और कृषि संबंधी नीति

   समसामयिकों के लिये अलाउद्दीन का बाजार नियंत्रण संसार के बड़े आश्चर्यों में से एक था। चित्तौड़ विजय से लौटने के बाद अलाउद्दीन ने आदेश जारी कर खाद्य पदार्थ, चीनी और तेल से लेकर सुई तथा आयात किये गये कीमती वस्त्रों से लेकर घोड़ों, पशु, गुलाम लड़के और लड़कियों का मूल्य निर्धारित करने का प्रयास किया। इसके लिये उसने दिल्ली में तीन बाजारों की स्थापना की। इनमें से एक बाजार खाद्य पदार्थों, दूसरा बहुमूल्य वस्त्र तथा तीसरा घोड़ों, गुलामों और पशुओं के लिये था। प्रत्येक बाजार के लिये एक पंजिका रखता था तथा दुकानदारों और वस्तुओं के मूल्यों पर सख्त नियंत्रण रखता था। कीमतों, विशेषकर खाद्यान्न की कीमतों पर नियंत्रण मध्ययुगीन शासकों के लिये सदैव चिन्ता का कारण बना रहा क्योंकि नगरों में सस्ते भोज्य पदार्थों की आपूर्ति के बिना वहाँ के नागरिकों और वहाँ पर तैनात सैनिकों का सहयोग प्राप्त करना संभव न था। बाजार नियंत्रण के लिये अलाउद्दीन के पास कुछ विशेष कारण थे। दिल्ली पर मंगोलों के आक्रमण को रोकने के लिये एक बहुत बड़ी सेना की अतिआवश्यकता थी। बिना मूल्यों को कम किये तथा तनख्वाह कम दिये, सेना रखना संभव नहीं था, क्योंकि बड़ी सेना उसके कोष को शीघ्र ही खाली कर सकती थी। अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिये अलाउद्दीन ने विशिष्ट मार्ग अपनाया। निरंतर सस्ते खाद्यान्नों की आपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिये उसने घोषणा की कि दोआब, जिसका क्षेत्र यमुना नदी के निकट मेरठ तथा इलाहबाद के पास कड़ा की सीमा तक फैला है, भू-राजस्व सीधे राज्य को दिया जायेगा अर्थात् इस क्षेत्र के गाँव किसी को इक्ता में नहीं दिये जाएँगे। बाद में भू-राजस्व बढ़ाकर उपज का आधा भाग कर दिया गया। यह एक भारी शुल्क था। स्थिति का सामना करने के लिये अलाउद्दीन ने कुछ उपाय अपनाये, जिनका उल्लेख बाद में किया जाएगा। राज्य द्वारा खाद्यान्नों की माँग बढ़ा दी गयी। किसानों ने राज्य के भू-राजस्व नकद देकर अनुगृहित किया। किसानों को अपना उत्पादन कम कीमत पर बंजारों के हाथ बेचने के लिये बाध्य होना पड़ा जो उन्हें ढोकर नगरों को ले जाया करते थे और निश्चित मूल्य पर बेचा करते थे। कोई भी वस्तु गुप्त रूप से संचय न हो, इसका पता लगाने के लिये बंजार पंजीकृत किये गये थे और कोई भी नियम भंग होने पर उनके एजेंटों और परिवार के सदस्यों को सामूहिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जाता था। कुशल नियंत्रण के लिये राज्य द्वारा माल गोदाम स्थापित किये गये थे। उनमें खाद्यान्न संग्रह किये जाते थे और जब कभी अकाल का भय या आपूर्ति में कमी होती थी, तो उन्हें खोल दिया जाता था। वह हर समय हर प्रकार की सूचना से अपने को अवगत रखता था। यदि कोई दुकानदार वस्तुओं की कीमत ज्यादा लेता या खोटे बाटों का प्रयोग कर माप-तोल में कम देता तो उसे बड़े कठिन दंड दिये जाते थे। बरनी कहता है कि अकाल के समय भी मूल्यों में एक पैसे की वृद्धि नहीं होती थी। इस प्रकार गेहूँ साढ़े सात, जीतल, जौ चार और अच्छे किस्म का चावल पाँच जीतल प्रतिमन के भाव से बिकते थे। बरनी के अनुसार अनाज मंडियों में मूल्यों पर नियंत्रण इस युग के लिये आश्चर्यजनक घटना थी। सुल्तान के लिये घोड़ों के मूल्यों पर नियंत्रण महत्वपूर्ण था, क्योंकि सेना को उचित मूल्य पर अच्छे घोड़े न मिलने से उनकी कार्य क्षमता बनायी नहीं रखी जा सकती थी। गुजरात विजय के फलस्वरूप घोड़ों की आपूर्ति में वृद्धि हुई। केवल राज्य को ही अच्छे घोड़े दिये जाते थे। अलाउद्दीन ने प्रथम श्रेणी के घोड़ों का मूल्य 100 से 120 टंके निर्धारित किया था। बीस से पच्चीस टंका मूल्य वाले टट्टू सेना के योग्य नहीं थे।
   गाय-बैलों के अतिरिक्त गुलामों के मूल्यों पर कड़ा नियंत्रण रखा जाता था। बरनी ने इन मूल्यों का विस्तृत विवरण दिया है। इससे पता चलता है कि मध्यकालीन भारत में गुलामी को स्वीकार करना एक साधारण बात थी। अन्य वस्तुओं, विशेषकर कीमती वस्त्रों इत्यादि के मूल्यों का नियंत्रण सुल्तान के लिये अनिवार्य नहीं था। फिर भी इनके मूल्य भी निर्धारित थे, संभवतः इसलिये कि इनके ऊँचे मूल्यों का अन्य वस्तुओं के मूल्यों पर प्रभाव न पड़े या शासक वर्ग को प्रसन्न करने के लिये यह किया गया हो। ऐसा कहा जाता है कि मुल्तानी व्यापारियों को बढ़िया किस्म के वस्त्रों को देश के विभिन्न भागों से दिल्ली लाने के लिए भारी अग्रिम धनराशि दी जाती थी। इसके परिणामस्वरूप मूल्य की दृष्टि से दिल्ली बढ़िया वस्त्रों के लिये सबसे बड़ा बाजार बन गया। ख़रीदने के विचार से सब ओर से व्यापारी दिल्ली जमा होते और वस्त्र खरीद कर अन्य जगहों में ऊँचे मूल्यों पर बेचते थे।
   भू-राजस्व की नकद वसूली से अलाउद्दीन को अपने सैनिकों को नकद वेतन देने में सुविधा हुई। सल्तनत में वह पहला सुल्तान था, जिसने पहली बार ऐसा किया था। उसके समय में घुड़सवार सैनिक को वार्षिक 238 टंके या प्रतिमाह 20 टंके दिये जाते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि घुड़सवार सैनिक इसी धनराशि से अपना तथा अपने घोड़े और साज सामानों का ख़र्च चलाते थे। फिर भी यह वेतन कम नहीं था क्योंकि अकबर के काल में जबकि वस्तुओं की कीमत बहुत ऊँची थी एक मुगल घुड़सवार सैनिक को लगभग 20 रूपये प्रतिमाह वेतन मिलता था। वास्तव में तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी में अश्वारोही सैनिक सज्जन माने जाते थे और वह ऐसे ही वेतन की आशा रखते थे जिससे उनका निर्वाह हो जाय। इस दृष्टिकोण ने अलाउद्दीन द्वारा निर्धारित वेतन कम था, अतः बाजार पर नियंत्रण आवश्यक था।
   इतिहासकार बरनी का मत है कि हिन्दुओं को सजा देना अलाउद्दीन के बाजार नियंत्रण का मुख्य उद्देश्य था क्योंकि अधिकांश व्यापारी हिन्दू थे। वे ही खाद्यान्न और अन्य वस्तुओं की मुनाफाखोरी करते थे। किन्तु दूसरी ओर पश्चिम और मध्य एशिया के स्थलमार्ग द्वारा होने वाला व्यापार खुरासानी और मुल्तानी लोगों के हाथों में था, जिनमें से अधिकतर मुसलमान थे। अतः अलाउद्दीन के मूल्य निर्धारण ने इन वर्गों को भी प्रभावित किया, जिसका उल्लेख बरनी ने नहीं किया है।
   यह स्पष्ट नहीं है कि बाजार के नियम केवल दिल्ली में ही लागू थे या साम्राज्य के अन्य नगरों में भी। बरनी के अनुसार तो जो नियम दिल्ली में लागू होते थे, उनका पालन अन्य नगरों में भी किया जाता था, जो भी हो कम से कम सेना केवल दिल्ली में ही नहीं, अन्य नगरों में भी स्थित थी। इस विषय में पर्याप्त सूचना नहीं है, तो भी यह स्पष्ट है कि हिन्दू तथा मुसलमान व्यापारियों की शिकायतें और काफी असंतोष के बावजूद हर धर्म के न केवल सैनिकों वरन् सभी नागरिकों को भी मूल्यों के नियंत्रण और खाद्यान्न तथा अन्य वस्तुओं से सस्ता होने से लाभ पहुँचा होगा।
   बाजार नियंत्रण के अतिरिक्त भू-राजस्व प्रशासन के क्षेत्र में भी अलाउद्दीन द्वारा महत्वपूर्ण कदम उठाए गये। वह पहला सुल्तान था जिसने दोआब में काश्त के अन्तर्गत आने वाली भूमि की पैमाइश के पश्चात् भू-राजस्व निश्चित करने पर बल दिया। इसमें यह अर्थ निहित था कि धनी और शक्तिशाली ग्रामीण जिनके पास अधिक भूमि थी, गरीबों पर भू-राजस्व के बोझ को नहीं डाल सकते थे। अलाउद्दीन चाहता था कि अन्य लोगों की तरह इस क्षेत्र के खुत और मुकद्दम जमींदार भी भू-राजस्व दें। इस प्रकार उन्हें अन्य गैर-कानूनी करों से जो वे उगाह लेते थे, हाथ धोना पड़ा। बरनी ने इसका सजीव चित्रण किया है। खुत और मुकद्दम सुसज्जित घोड़ों पर सवारी नहीं कर सकते थे और न ही वे पान ही खा सकते थे। वे इनते निर्बल हो गये थे कि उनकी पत्नियों को मुसलमानों के घरों में जाकर काम करना पड़ता था। आय के आधार पर भू-राजस्व की प्रत्यक्ष वसूली तभी सफल हो सकती थी जबकि आमिल और अन्य स्थानीय पदाधिकारी ईमानदार होते। अलाउद्दीन उन तत्वों को आराम से रहने के लिए भरपूर वेतन देता था लेकिन उसने इस पर बल दिया कि उनके हिसाब-किताब की जाँच पड़ताल कड़ाई से की जाए। हमें इस बात का पता चलता है कि छोटे-छोटे अपराधों पर आमिलों को पीटा जाता और उन्हें कैद की सजा दी जाती थी।
   बर्नी कहता है कि उनका जीवन इतना असुरक्षित हो गया था कि कोई भी अपनी पुत्री का विवाह उनसे करने के लिए इच्छुक नहीं था। इसमें संदेह नहीं है कि इन विवरणों में अतिशयोक्ति है क्योंकि आजकल की तरह उस समय भी सरकारी पद बड़े सम्मान जनक समझे जाते थे। सरकारी पदों पर काम करने वाले लोगों को चाहे हिन्दू हो या मुसलमान विवाह के लिये उत्सुकता पूर्वक ढूँढा जाता था।
   यद्यपि बरनी के विवरण से ऐसा प्रतीत होता है कि ऊपर दिये गये सभी उपाय पूर्णतः हिन्दुओं के विरुद्ध ही रचे गये थे। लेकिन यह स्पष्ट होता है कि इनका प्रधान लक्ष्य केवल हिन्दू कृषक ही नहीं बल्कि ग्रामों के विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के लोग भी थे। अलाउद्दीन की कृषि संबंधी नीति कठोर थी। अतः साधारण कृषक भी इससे प्रभावित रहे होंगे। लेकिन यह नीति इतनी कठोर नहीं थी जिसके कारण लोग बगावत कर बैठे या गाँव छोड़कर भाग खड़े हों।
   अलाउद्दीन की मृत्यु के साथ ही उसके बाजार नियंत्रण नियमों का अंत हो गया लेकिन इससे अनेक लाभ भी हुए। बरनी ने कहा कि बाजारों के नियमों ने अलाउद्दीन को एक विशाल कुशल घुड़सवार सेना तैयार करने में सहायता की। जिसके फलस्वरूप वह बाद में होने वाले मुगलों के आक्रमणों को उनके सैनिकों की हत्या कर सिंध नदी के उस पार खदेड़ देने में सफल हो सका। अलाउद्दीन खलजी का भू-राजस्व सुधार, ग्रामीण क्षेत्रों के साथ निकट का संबंध स्थापित करने की ओर एक महत्वपूर्ण कदम था। इन सुधारों के कुछ उपायों को उसके उत्तराधिकारियों ने जारी रखा और बाद में ये शेरशाह और अकबर के कृषि सुधारों का आधार बने।

मुहम्मद बिन तुगलक के प्रयोग

   अलाउद्दीन के पश्चात् मुहम्मद तुगलक को उसके साहसिक प्रयोगों और कृषि में रुचि लेने के कारण अधिक स्मरण किया जाता है। कुछ अंश तक मुहम्मद बिन तुगलक अपने युग का सबसे उल्लेखनीय शासक था। उसने धर्म और दर्शन का गहन अध्ययन किया था। वह आलोचनात्मक प्रवृत्ति और उदारचित वाला व्यक्ति था। वह न केवल मुसलमान आध्यात्मवादियों के साथ बल्कि हिन्दू योगियों और जिनप्रभा सूरी जैसे जैन महात्माओं के साथ तर्क-वितर्क कर सकता था। अनेक कट्टरपंथी मुस्लिम विद्वानों को उसकी बातें पसंद नहीं थीं। उन्होंने उस पर बुद्धिवादी होने का दोषारोपण किया अर्थात् वह धार्मिक मान्यताओं को केवल विश्वास के आधार पर स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं था। बिना खानदान की परवाह किये वह उच्च पदों पर योग्यता के आधार पर लोगों की नियुक्ति करने के लिये तैयार रहता था। दुर्भाग्यवश वह चिड़चिड़ा और अधीर स्वाभाव का था। इसीलिए उसके अनेक प्रयोग असफल रहे और उसे ‘‘अभागा आदर्शवादी’’ कहा जाता है।
   मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल का आरम्भ अशुभ मुहूर्त में हुआ। सुल्तान ग़यासुद्दीन तु़गलक बंगाल की सफलता पूर्वक विजय कर के लौट रहा था। सुल्तान के स्वागतार्थ के लिये मुहम्मद बिन तुगलक ने शीघ्र लकड़ी का एक पंडाल तैयार करने का आदेश दिया। उसके स्वागत में जब युद्ध बंदी हाथियों के परेड का प्रदर्शन हो रहा था कि जल्दबाजी में तैयार किया गया पंडाल ढह गया और सुल्तान वहीं ढेर हो गया। इससे कई तरह की अफवाहें फैल गईं जैसे कि मुहम्मद बिन तुगलक ने अपने पिता की हत्या करने की योजना बनायी थी। सुल्तान पर खुदा का कहर और दिल्ली के प्रसिद्ध संत शेखनिजामुद्दीन औलिया का अभिशाप था, जिन्हें उसने दंडित करने की धमकी दी थी।
   राजधानी परिवर्तन मुहम्मद बिन तुग़लक का सबसे विवादास्पद निर्णय था। सिंहासनारोहण के तुरन्त बाद वह अपनी राजधानी दिल्ली से हटाकर सुदूर दक्षिण स्थित देवगिरि ले गया। जैसा कि देख चुके हैं कि देवगिरि दक्षिण भारत में मुसलमानों के शासन विस्तार का आधार रहा। युवराज के रूप में स्वयं मुहम्मद बिन तुगलक कुछ वर्षों तक वहाँ रहा। उन दिनों सम्पूर्ण दक्षिण भारत को सीधे दिल्ली प्रशासन के अधीन लाने के प्रयास से एक गंभीर राजनीतिक कठिनाई आ खड़ी हुई थी। उस क्षेत्र के लोग हठी थे। वे इस शासन को विदेशी शासन मानते थे। कुछ मुसलमान सरदारों ने तो मौके का लाभ उठाकर अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी थी। इनमें से सबसे खतरनाक विद्रोह मुहम्मद बिन तुगलक के संबंधी गुरशास्प का था जिसके विरुद्ध स्वयं सुल्तान लड़ने गया था। ऐसा प्रतीत होता है कि दक्षिण भारत पर प्रभावशाली ढंग से शासन करने के लिए वह देवगिरि को दूसरी राजधानी बनाना चाहता था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये उसने अनेक पदाधिकारियों, सूफी संतों के साथ अन्य प्रधान लोगों को देवगिरि जाने का आदेश दिया। देवगिरि का नाम बदल कर उसने दौलताबाद रखा। दिल्ली के बाकी लोगों को वहाँ ले जाने के लिये कोई चेष्टा नहीं की गई। सुल्तान की अनुपस्थिति में भी दिल्ली एक विशाल घनी आबादी वाला शहर बना रहा। इसका प्रमाण यह है कि सुल्तान जब देवगिरि में था, तब भी दिल्ली में सिक्के ढाले जाते थे। मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली से दौलताबाद तक एक सड़क का निर्माण कराया था। यात्रियों की सुविधा के लिये उसने धर्मशालाएँ बनवायी थीं। दिल्ली से दौलताबाद की दूरी डेढ़ हजार किलोमीटर से अधिक थी। चूँकि राजधानी परिवर्तन की चेष्टा ग्रीष्म ऋतु में की गई अतः गर्मी और मार्ग की कठिनाईयों के कारण लोगों की मृत्यु हो गई। उनमें से अनेक लोग जो दौलताबाद पहुँचे उन्हें गृहवियोग सताने लगा क्योंकि उनमें से कुछ लोग कई पुश्तों से दिल्ली में रहते आ रहे थे, उनके मन में घर की याद बनी रही। इसीलिये उनके मन में भारी असंतोष था। दो वर्षों के बाद मुहम्मद बिन तुगलक ने दौलताबाद का परित्याग करने का निश्चय किया, विशेषकर इसलिये कि अब उसने अनुभव किया कि जिस प्रकार वह दिल्ली से दक्षिण भारत को नियंत्रित नहीं रख सकता, उसी प्रकार दौलताबाद से उत्तर भारत को नियंत्रण में नहीं रखा जा सकता था।
   यद्यपि देवगिरि को दूसरी राजधानी बनाने का प्रयास विफल हो गया, लेकिन वहाँ आने-जाने से कुछ अच्छे परिणाम भी निकले। आवागमन के साधनों को विकसित करने में उत्तर और दक्षिण भारत एक-दूसरे के बहुत निकट आ गये। धार्मिक संत तथा अन्य बहुतेरे लोग जो दौलताबाद पहुँच गये थे, वहीं बस गये। उन्होंने उत्तर भारत में तुर्कों द्वारा लाए गये सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक विचारों का प्रसार दक्षिण भारत में भी किया। इसके परिणामस्वरूप दक्षिण भारत के अतिरिक्त उत्तर और दक्षिण भारत में भी सांस्कृतिक विचारों के आदान-प्रदान की नयी प्रक्रिया आरंभ हुई।
   इसी समय मुहम्मद बिन तुगलक ने एक अन्य महत्वपूर्ण कदम उठाया, वह था प्रतीक मुद्रा का प्रचलन। मुद्रा विनिमय का एक माध्यम मात्र है। आज विश्व के सभी देशों में प्रतीक मुद्रा के रूप में साधारणतः कागजी मुद्रा का प्रचलन है, ताकि उन्हें स्वर्ण और चाँदी की पूर्ति पर निर्भर न रहना पड़े। चौदहवीं शताब्दी में विश्व में चाँदी की कमी हो गयी थी। इसके अतिरिक्त चीन में कुबलाई खाँ का प्रतीक-मुद्रा का प्रयोग पूर्ण रूप से सफल रहा। ईरान के एक मंगोल शासक ने भी इसका प्रयोग किया था। मुहम्मद बिन तुगलक ने चाँदी के एक टंके के बराबर काँसे की मुद्रा चलाने का निश्चय किया था। इस सिक्के के नमूने भारत के विभिन्न भागों में पाए गये और संग्रहालयों में भी देखे जा सकते हैं। भारत में प्रतीक-मुद्रा प्रचलित करने के विचार बिल्कुल नया था और व्यापारियों तथा जन साधारण को इसकी स्वीकृति के लिये राजी करना कठिन था। फिर भी मुहम्मद बिन तुगलक इस कार्य में सफल हो सकता था यदि सरकार लोगों को नकली सिक्के ढालने से रोक सकती। सरकार ऐसा नहीं कर सकी और बाजार में नये सिक्कों का भारी अवमूल्यन हो गया। अन्त में मुहम्मद बिन तुग़लक ने प्रतीक मुद्रा को वापस लेने का निश्चय किया। उसने कांस्य सिक्कों के बदले में चाँदी के सिक्के देना मंजूर किया। इस प्रकार बहुत से लोगों ने कास्य सिक्कों को बदल लिया। लेकिन नकली सिक्के जो परखने पर घटिया किस्म के निकले उन्हें बदला नहीं जा सका। उसके फलस्वरूप किले के बाहर सिक्कों का ढेर लग गया। बरनी कहता है कि सिक्के अनेक वर्षों तक वहाँ पड़े रहे।
   इन दो प्रयोगों के असफल होने से सुल्तान की मानहानि हुई और आर्थिक क्षति भी पहुँची। फिर भी सरकार ने इस क्षति की पूर्ति कर ली।
   मोरक्को का यात्री इब्नेबतूता जो सन् 1333 में दिल्ली आया था, उसे कहीं भी इन प्रयोगों के परिणाम देखने को नहीं मिले। सीमाओं की सुरक्षा करना मुहम्मद बिन तुगलक के लिये एक विकट समस्या थी। प्रशासन में, विशेष रूप से राजस्व प्रशासन और उसके रिश्तेदारों के साथ ही साथ अमीरों ने भी गंभीर समस्याएँ खड़ी कीं।
   पहले के एक अध्याय में हम देख चुके हैं कि पंजाब में मंगोलों की शक्ति के निरन्तर विकास तथा दिल्ली पर अनेक हमलों के कारण दिल्ली सल्तनत के लिये गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई थी। यद्यपि मंगोल इस समय तक अपने आंतरिक मतभेदों के कारण निर्बल हो चुके थे। वे अभी भी इतने शक्तिशाली थे कि इन्हें पंजाब और दिल्ली के निकट के क्षेत्रों के लिये संकट माना जा सकता था। मुहम्मद तुगलक के शासन काल के प्रारम्भिक वर्षों में तार्माशिरिन के नेतृत्व में मंगोलों ने सिंध पर आक्रमण कर दिया था और उसकी एक सेना दिल्ली से 65 किलोमीटर दूर मेरठ तक पहुँच गई थी। मुहम्मद बिन तुगलक ने मंगोलों को न केवल झेलम के निकट पराजित किया, बल्कि उसने कालानौर और सिंध के उस पार पेशावर को भी कुछ समय तक अपने अधिकार में रखा। इससे प्रकट होता है कि दिल्ली के सुल्तान अब ऐसी स्थिति में थे कि वे मंगोलों का पता लगाकर उनके विरुद्ध आक्रमण कर सकते थे। देवगिरि से लौटने के पश्चात् सुल्तान ने गजनी और अफगानिस्तान को अधिकार में लाने के उद्देश्य से एक विशाल सेना खड़ी की। बरनी कहता है कि सुल्तान का उद्देश्य खुरासान और इराक को अपने अधिकार में लाना था। मुहम्मद बिन तुगलक के सही उद्देश्य का पता लगाने का कोई साधन नहीं है। हो सकता है कि उसका उद्देश्य ‘‘वैज्ञानिक सीमा’’ यानि हिन्दुकुश और कंधार तक के क्षेत्र को अपने अधिकार में लाना रहा हो। मुहम्मद बिन तुगलक ने सोचा कि मंगोलों को मध्य एशिया से भगाने का एक अच्छा अवसर है क्योंकि हो सकता है कि बहुतेरे युवराजों और अन्य लोगों ने मध्य एशिया से भाग कर दिल्ली में शरण ली हो। एक वर्ष बाद प्रतीक मुद्रा की असफलता के साथ ही सेना भंग कर दी गयीं। इसी बीच मध्य एशिया की स्थिति तेजी से बदल गयी। कुछ समय के बाद तैमूर ने निश्चित समय पर सभी क्षेत्रों को अपने अधिकार में कर लिया और भारत के लिये यह एक नया खतरा बन गया।
   खुरासान योजना के परिणामों को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर नहीं कहना चाहिए या इसके साथ कराचिल अभियान का कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। हिमालय के कुमाऊँ पहाड़ियों में स्थित कराचिल का आक्रमण चीनी आक्रमण को रोकने के लिये किया गया था। कुछ सफलता के पश्चात् आतिथ्य स्वीकार कर सैनिक सुदूर के क्षेत्रों में चले गये और उन्हें भयंकर विपत्ति का सामना करना पड़ा। कहा जाता है कि दस हजार सैनिकों में से केवल दस लोग जीवित लौटे। ऐसा प्रतीत होता है कि पहाड़ी राजा ने दिल्ली सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर ली। इस घटना को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर व्यक्त किया गया है। बाद में मुहम्मद तुगलक ने कांगड़ा की पहाड़ियों पर भी आक्रमण किया। इस प्रकार पहाड़ी क्षेत्र पूर्ण सुरक्षित हो गये।
   मुहम्मद तुगलक ने कृषि की उन्नति के लिये अनेक उपाय किये। इसमें से अधिकांश दोआब के क्षेत्र में प्रयोग किये गये। मुहम्मद तु़गलक ने खुतों और मुकद्दमों (गाँवों के मुखिया) के पदों को घटाकर साधारण किसान बनाने की अलाउद्दीन की नीति को नापसंद किया। लेकिन वह राज्य को भू-राजस्व का पर्याप्त हिस्सा दिलाना चाहता था। इसके लिए उसने जो उपाय किया था, उसके दूरगामी प्रभाव थे, जो उसके बाद में भयंकर रूप से असफल रहे। यह कहना कठिन है कि उसके द्वारा किये गये उपाय उसकी गलत योजना के कारण या उसके अनुभवहीन अधिकारियों के गलत ढंग से लागू करने के कारण असफल रहे।
   मुहम्मद तुगलक के शासन काल के प्रारंभ से ही दोआब के कृषकों में भारी असंतोष था। इसके चलते कृषकों ने गाँव का परित्याग कर दिया। तुगलक ने भी उन्हें बंदी बनाने और सजा देने के लिए कठोर उपाय किये। इतिहासकारों का विचार है कि अधिक कर लगाने के कारण ही अशांति हुई। उपज के आधे अंश पर ही राज्य का अधिकार रहा है, जैसे कि अलाउद्दीन के काल में था। कर मनमाने ढंग से लगाए जाते थे न कि वास्तविक उपज के आधार पर। उपज का नकद मूल्य भी मनमाने ढंग से तय किया जाता था। लगातार बारह वर्षों तक भयानक दुर्भिक्ष पड़ने के कारण वह क्षेत्र उजड़ गया और स्थिति बदत्‍तर हो गई। पशु और बीज खरीदने के लिए अग्रिम धनराशि देने के प्रयास भी बहुत देर से किये गये। दिल्ली और उसके आस-पास इतने अधिक लोग मरे कि महामारी फैल गई। सुल्तान ने दिल्ली छोड़ दी और स्वर्गद्वारी नामक शिविर में लगभग ढाई वर्षों तक निवास किया जो दिल्ली से लगभग एक सौ किलोमीटर दूर कन्नौज के निकट गंगा तट पर था। दिल्ली लौटने के पश्चात् मुहम्मद तुगलक ने दोआब में कृषि के विस्तार और उन्नति के लिए एक योजना आरंभ की। उसने दीवान-ए-अमीर-ए-कोही नामक एक अलग विभाग स्थापित किया। इस क्षेत्र को विकास खंडों में विभाजित किया गया। प्रत्येक विकास खंड का एक अधिकारी होता था, जिसका काम कृषि विस्तार और कृषकों को ऋण देना और जौ की जगह उत्तम श्रेणी का गेहूँ, गेहूँ की जगह ईख, ईख के बदले अंगूर और खजूर आदि की खेती करने के लिए प्रोत्साहित करना था। योजना बहुत अंश में असफल रही, क्योंकि इस काम के लिये जो अधिकारी नियुक्त किये गये थे वे अनुभव हीन और बेईमान निकले। योजना के लिये ऋण के रूप में अग्रिम धनराशि दी गयी थी, उसे वापस लिया नहीं जा सका। सभी के लिये यह सौभाग्य की बात थी कि इसी बीच मुहम्मद तुगलक दुनिया से चल वसा और फीरोज ने सबसे ऋण माफ कर दिये। लेकिन कृषि विस्तार और उन्नति की नीति जो मुहम्मद तुगलक ने अपनायी थी वह जारी रही। फीरोज ने और बाद में अकबर ने भी इसे बड़े उत्साह के साथ अपनाया।
   अमीर वर्ग की समस्या मुहम्मद तुगलक की दूसरी समस्या थी। चिहिल-गनी तुर्कों के पतन और ख़लजियों के उदय के साथ-साथ मुसलमानों की विभिन्न जातियों में से, जिनमें धर्म परिवर्तन करने वाले भारतीय मुसलमान भी थे, अमीर वर्ग का चयन किया गया। इस संबंध में मुहम्मद तुगलक ने और आगे कदम बढ़ाया। मुहम्मद तुगलक ने उन लोगों को भी जो अमीर घराने के न थे, न केवल स्वागत किया बल्कि उन्हें महत्वपूर्ण पदों पर भी नियुक्त किया। इसमें से अधिकांश इस्लाम धर्म स्वीकार करने वालों के वंशज थे और कुछ हिन्दू भी। ऐसा कोई कारण नहीं था, जिससे यह विश्वास किया जा सके कि ये लोग अशिक्षित थे या अपने कार्यों में अकुशल थे। लेकिन जो पुराने अमीर घराने के पदाधिकारियों के वंशज थे, इससे अप्रसन्न थे। इतिहासकार बरनी ने इसी को मुख्य बिन्दु बनाकर मुहम्मद तुगलक की भर्त्सना की है। विदेशी जो एक बड़ी संख्या में दरबार में आये थे, मुहम्मद तुगलक ने उनका स्वागत किया और उन्हें अमीर वर्ग में स्थान दिया।
   इस प्रकार हम देखते हैं कि मुहम्मद तुगलक का अमीर वर्ग विभिन्न वर्गों के लोगों के समिश्रण से बना था। उनके बीच आपस में न तो कोई लगाव की भावना विकसित हो सकी और न ही वे सुल्तान के प्रति निष्ठावान ही थे। दूसरी ओर साम्राज्य की अत्यधिक विशालता के कारण विद्रोहियों को इस बात के लिये उपयुक्त अवसर मिल गया कि वे अपना स्वतन्त्र प्रभुत्व कायम करने का प्रयास कर सकें। मुहम्मद तुगलक के उग्र और चिड़चिड़े स्वभाव के कारण तथा संदेहात्मक विरोधियों या विश्वासघातियों को कठोर दंड देने की उसकी प्रवृत्ति के कारण भी इसे और बढ़ावा मिला। इस प्रकार मुहम्मद बिन तुगलक के काल में एक तरफ जहाँ दिल्ली सल्तनत के पराकाष्ठा पर पहुँचने का संकेत मिल रहा था वहीं दूसरी ओर विघटन के आरंभ की प्रक्रिया भी दिखायी दे रही थी।

दिल्ली सल्तनत का विघटन और पतन

   फीरोज तथा उसके उत्तराधिकारी मुहम्मद तुगलक के शासन काल के उत्तरार्द्ध साम्राज्य के विभिन्न भागों में बराबर विद्रोह हुए। दूरवर्ती क्षेत्रों में निवास करने वाले विशेषकर महत्वाकांक्षी सरदारों के लिये विद्रोह करना कोई नयी बातें नहीं हैं। अधिकांश मामलों में केन्द्रीय सेना और निष्ठावान सरदारों की सहायता से सुल्तान विद्रोहियों को दबाने में सफल होते थे। मुहम्मद तुगलक को अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों - बंगाल, माबर (तमिलनाडु), वारंगल, कापिली (कर्नाटक), पश्चिम बंगाल, अवध, गुजरात और सिंध में बारी-बारी से विद्रोह होने लगे। मुहम्मद बिन तुगलक पूर्ण रूप से किसी पर विश्वास नहीं कर सकता था। इसलिये वह विद्रोहों को दबाने के लिये देश के एक भाग से दूसरे भाग तक दौड़ धूप करता रहा। इससे उसकी सेना थक गई। दक्षिण भारत के विद्रोह सबसे गंभीर थे। सर्वप्रथम इस क्षेत्र में स्थानीय शासकों ने विद्रोहों को संगठित किया। सुल्तान शीघ्र दक्षिण भारत पहुँचा। कुछ ही समय के बाद उसकी सेना में प्लेग फैल गया। कहा जाता है कि प्लेग से उसकी दो-तिहाई सेना इस दुनिया से कूच कर गयी। इस प्रकार से मुहम्मद तु़गलक संभल न सका। दक्षिण भारत से सुल्तान के लौटने के शीघ्र बाद वहाँ एक दूसरा विद्रोह हुआ, जिसका नेतृत्व हरिहर और बुक्का नामक दो भाईयों ने किया था। उन्होंने एक राज्य की स्थापना की, जिसका विस्तार धीरे-धीरे होता गया। यह विजयनगर राज्य था, जिसने शीघ्र समस्त दक्षिण भारत को अपना अंग बना लिया। दकन में ही विजयनगर के उत्तर दिशा में कुछ विदेशी सरदारों ने दौलताबाद के निकट एक राज्य की स्थापना की, जो बहमनी साम्राज्य के रूप में विकसित हुआ। हम इन दोनों असाधारण साम्राज्यों की विशेषताओं का वर्णन बाद के अध्याय में करेंगे। बंगाल भी अब स्वाधीन हो गया। बहुत प्रयास के बाद मुहम्मद तुगलक अवध, गुजरात और सिन्ध के विद्रोहों को दबाने में सफल रहा। मुहम्मद तुगलक जब सिन्ध में था, उसकी मृत्यु हो गयी और फीरोज उसका उत्तराधिकारी बना।
   मुहम्मद तुगलक की नीति ने अमीरों के अतिरिक्त सेना में भी गहरा असंतोष फैला दिया था। उसने प्रभावशाली मुसलमान अध्यात्मवादियों और सूफी संतों से भी टक्कर ली थी। लेकिन मुहम्मद तुगलक की लोक प्रियता का वर्णन बढ़ा-चढ़ा कर नहीं करना चाहिए। जब कभी वह लम्बे समय तक राजधानी से दूर रहता था, दिल्ली, पंजाब तथा उत्तर भारत में साम्राज्य के अन्य भागों में प्रशासन का कार्य सामान्य रूप से चलता था।
   फीरोज तुगलक को गद्दी पर बैठने के बाद मुख्य रूप से दिल्ली सल्तनत के विघटन को रोकने की समस्या का सामना करना पड़ा। उसने अमीरों, अध्यात्मवादियों और सेना को शांत करने की नीति अपनायी और उन्हीं क्षेत्रों को अपने अधिकार में रखा जिन पर केन्द्र से सुविधापूर्वक नियंत्रण रखा जा सकता। अतः उसने दक्षिण भारत और दक्कन पर अपने अधिकार को पुनः स्थापित करने का प्रयास नहीं किया। उसने बंगाल के विरुद्ध दो युद्धों का नेतृत्व किया, लेकिन दोनों में असफल रहा। इस प्रकार बंगाल दिल्ली सल्तनत के हाथ से निकल गया। फिर भी सल्तनत उतनी ही बड़ी रही जिनती की अलाउद्दीन के शासन काल के प्रारम्भिक दिनों में थी। फीरोज ने जाजनगर (उड़ीसा) के शासक के विरुद्ध भी एक अभियान छेड़ा। उसने पंजाब की पहाड़ियों में स्थित कांगड़ा के विरुद्ध भी एक अभियान छेड़ा। विद्रोहियों से निपटने के लिए उसने गुजरात और थट्टा के विरूद्ध लंबा अभियान चलाया। यद्यपि विद्रोही कुचल दिये गये पर कच्छ के रण में मार्ग भूलने के कारण सेना को भारी विपत्ति का सामना करना पड़ा।
   फीरोज एक विख्यात सेनापति नहीं था। लेकिन उसके शासन काल में शांति बनी रही और विकास हुआ। उसने आदेश दिया था कि जब भी किसी सरदार की मृत्यु हो जाए तो उसके पद और इक्ता पर उसके पुत्र का अधिकार होना चाहिए और यदि पुत्र न हो तो दामाद और दामाद भी न हो तो गुलाम का अधिकार होना चाहिए। लेखपरिक्षण के समय इक्ता संबंधी कोई बकाया सरदार और पदाधिकारियों के पास यदि रह जाये तो उन्हें यंत्रणा न देने का नियम बनाया। इससे सरदार बड़े प्रसन्न हुए और यह एक महत्पूर्ण कारण था, जिससे गुजरात और थट्टा के अतिरिक्त कहीं भी विद्रोह नहीं हुआ। फिर भी पदाधिकारियों का चयन इक्ता को वंशानुगत बनाने की नीति से आगे चलकर नुकसान अवश्य होना था। इस सीमित दायरे से बाहर निकलकर योग्य सैनिकों के चुनाव की उम्मीद कम हो गयी और सुल्तान को भी कुछ ही लोगों पर ही निर्भर रहना पड़ा।
   फीरोज ने वंशानुगत सिद्धांत को सेना में भी लागू कर दिया। शांतिकाल में पुराने सैनिक अपने बदले में अपने पुत्रों और दमादों और उनके न होने पर अपने गुलामों को भी सैनिक सेवा के लिए भेज सकते थे। सैनिकों को नकद वेतन के बदले में भू-राजस्व वाले गाँव दिये जाते थे। इस का अर्थ यह था कि या तो सैनिकों को भू-राजस्व वसूल करने के लिये सेना से अनुपस्थित हो कर स्वयं जाना पड़ता था या फिर मध्यस्थ की सहायता लेनी पड़ती थी, जो उन्हें लगान का आधा या एक तिहाई भाग ही देता था। इस प्रकार सैनिक अंत में लाभान्वित न हो सके। इस प्रकार संपूर्ण सैनिक प्रशासन ढीला पड़ गया और लिपिकों को रिश्वत देकर सैनिक बेकार घोड़ों की गणना करवाने लगे। गलत प्रकार की उदारता दिखाते हुए सुल्तान ने एक बार स्वयं गणना करने वाले लिपिक को रिश्वत देने के लिये एक सैनिक को धन दिया था।
   फीरोज ने अपने को सच्चा मुसलमान शासक और अपने राज्य को सही अर्थों में इस्लामी राज्य बताकर अध्यात्मवादियों का समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया। वस्तुतः इल्तुतमिश के सुल्तान बनने के बाद से ही राज्य तथा गैर-मुसलमानों के प्रति अपनायी जाने वाली नीति को लेकर सुल्तानों तथा कट्टर अध्यात्मवादियों के बीच संघर्ष चल रहा था। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, इल्तुतमिश विशेषकर अलाउद्दीन और मुहम्मद तुगलक के काल में तुर्कीं शासकों ने अध्यात्मवादियों को राज्य की नीति निर्धारण का आदेश नहीं दिया था। जब कभी उन्हें अवसर मिला उन्होनें हिन्दुओं के विरुद्ध जिहाद का नारा लगाया। अध्यात्मवादियों को संतुष्ट करने के लिये उनमें से कुछ को ऊँचे पद प्रदान किये गये। न्यायपालिका और शिक्षा व्यवस्था वस्तुतः अध्यात्मवादियों के हाथ में थी।
   बाहरी साज-समान और दिखावा के होते हुए भी फीरोज ने अनिवार्य रूप से अपने पूर्ववर्ती सुल्तानों की नीति का अनुसरण किया। ऐसा विश्वास करने का कोई कारण नहीं है कि उसने अध्यात्मवादियों को राज्य की नीति निर्धारण की अनुमति दी हो। लेकिन उसने अध्यात्मवादियों को अनेक सुविधायें दी थीं। ऐसे रीति-रिवाजों को जिन्हें अध्यात्मवादी गैर-इस्लामी समझते थे, बंद कराने का प्रयास किया। इस प्रकार उसने घर के बाहर पीरों के मजार पर जाकर महिलाओं द्वारा पूजा करने के रिवाज को बंद करा दिया। उसने अनेक मुसलमानों के सम्प्रदायों के विरुद्ध अभियान चलाया जिन्हें अध्यात्मवादियों ने धर्म विरोधी बताया। फीरोज के काल से ही जजिया एक अलग कर बना दिया गया। इसके पूर्व यह भू-राजस्व का एक अंग था। फीरोज ने ब्राह्मणों को जजिया से मुक्त करने से इंकार कर दिया। शरीअत के अनुसार केवल महिलाएँ, बच्चे, अपंग और ऐसे लोग जिनके पास जीवन-यापन के साधन नहीं थे, वे ही इससे मुक्त हो सकते थे। इससे भी बुरा तब हुआ कि उसने मुसलमानों के बीच धर्म प्रचार करते हुए एक ब्राह्मण को जीवित जला दिया क्योंकि ऐसा करने शरीअत के विरुद्ध था। इसी कारण उसने राजमहल के सुन्दर भित्ति-चित्रों को मिटा देने का भी आदेश दिया।
   फीरोज तुगलक के ये संकीर्ण दृष्टिकोण निश्चित रूप से हानिकारक थे। उन्हीं दिनों फीरोज तुगलक ने हिन्दू विचारों और रीति-रिवाजों को अच्छी तरह समझने के लिये संस्कृत के धार्मिक ग्रन्थों को फारसी में अनुवाद कराया। उसके काल में संगीत, चिकित्सा तथा गणित के संस्कृत ग्रन्थों को फारसी में अनूदित कराया गया।
   फीरोज ने मनुष्य की भलाई के लिये भी कुछ काम किये। उसने अमानवीय घृणास्पद सजाओं को जैसे चोरी के लिये हाथ, पैर, नाक आदि काट लिया जाना बंद करा दिया। निर्धनों को चिकित्सा के लिये उसने चिकित्सालय बनवाये। कोतवालों से बेरोजगारों की नामवली तैयार करायी और निर्धनों की पुत्रियों की शादी के लिये दहेज भी दिया। लेकिन यह बहुत संभव है कि उसने ये कदम विशेष उन मुसलमान परिवारों की सहायता के लिये किया हो जिन पर बुरे दिन आ गए थे। इससे मध्यकालीन भारत राज्य की सीमित प्रकृति का पता चलता है। फीरोज ने इस बात पर बल दिया कि राज्य केवल सजा देने और कर वसूलने के लिये ही नहीं है, बल्कि यह एक कल्याणकारी संस्था भी है। मध्यकाल के संदर्भ में यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि कल्याणकारी सिद्धान्तों पर बल देना एक महत्वपूर्ण बात थी और फीरोज को इसका श्रेय मिलना चाहिए।
   फीरोज देश के आर्थिक विकास में बहुत रुचि रखता था। उसने सार्वजनिक निर्माण विभाग का गठन किया जो भवन निर्माण से संबंधित कार्यक्रमों की देखभाल करता था। फीरोज ने कुछ नहरों की खुदायी करायी और पुरानी नहरों की मरम्मत करायी। उस समय ही सबसे लम्बी नहर लगभग दौ सौ किलोमीटर की थी जो संतलुज नदी को मिलाकर हाँसी तक जाती थी। एक दूसरी नहर यमुना नदी से निकलती थी। ये तथा अन्य नहरें सिंचाई और फीरोज द्वारा निर्मित कुछ नये नगरों तक पानी पहुँचाने के उद्देश्य से बनवायी गयी थीं। इन नगरों में से हिसारे-फीरोज या हिसार (आधुनिक हरियाणा में) और फीरोजाबाद (आधुनिक उत्तर प्रदेश में) आज भी विद्यमान हैं।
   इन नहरों से कृषि का विस्तार अवश्य हुआ होगा क्योंकि यह बताया गया है कि फीरोज ने इन क्षेत्रों में दस प्रतिशत अतिरिक्त उपकर बढ़ा दिया था। ये क्षेत्र अधिकांशतः आधुनिक हरियाणा में थे। इसके अतिरिक्त फीरोज ने कृषकों पर लगे अनेक उपकरों को समाप्त या कम करने का प्रयास किया। इस प्रकार घरों और पशुओं पर लगाया गये उपकर समाप्त कर दिये गए।
   मुख्य रूप से अंगूरों और खरबूजों को उपजाने के लिये फीरोज ने दिल्ली के निकट बारह सौ उद्यानों का निर्माण कराया। कहा जाता है कि इसके फलस्वरूप दिल्ली में अँगूर का भाव गिर गया।
   फीरोज का दूसरा कार्य आर्थिक के साथ-साथ राजनीतिक महत्व का भी था। उसने अपने अधिकारियों को आदेश दिया कि जब कभी वे किसी स्थान पर आक्रमण करें तो सुन्दर और ऊँचे खानदान के लड़कों को चुनकर गुलाम बनाने के लिये सुल्तान के पास भेज दें। इस प्रकार फ़ीरोज ने धीरे-धीरे लगभग 18,000 गुलामों को एकत्र कर लिया। इनमें से कुछ को विविध शिल्पकलाओं के लिये प्रशिक्षित किया गया और उन्हें शाही कारखानों में नियुक्त किया गया। उसने अन्य लोगों को मिला-जुलाकर एक सैन्य दल तैयार किया जो सीधे सुल्तान के अधीन था और उसे पूर्ण आशा थी कि वह सैन्य दल सुल्तान के प्रति निष्ठावान होगा। यह कोई नयी नीति नहीं थी। जैसा कि हम देख चुके हैं कि प्रारम्भिक भारतीय सुल्तानों ने गुलामों को सेना में भर्ती करने की रीति का अनुसरण किया था। लेकिन अनुभव यह बताता है कि ये गुलाम उन सुल्तानों के उत्तराधिकारियों के प्रति निष्ठावान नहीं रहते थे। अपने स्वार्थ के लिये वे शीघ्र सरदारों से अलग होकर दल बना लेते थे।
   सन् 1388 में जब फीरोज का देहान्त हो गया था। हर सुल्तान के मरने पर राजनीतिक गड़बड़ होती थी, इस समय भी गंभीर राजनीतिक और प्रशासनिक समस्याएँ उठ खड़ी हुईं। सुल्तान तथा सरदारों के बीच सत्ता के लिये संघर्ष पुनः आरम्भ हो गया। स्थानीय जमींदारों और राजाओं ने स्थिति का लाभ उठाकर स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी। इस स्थिति में एक नयी बात थी कि फीरोज के गुलामों ने भी अपने प्रतिनिधि को सिंहासन पर बैठा देने के लिये हस्तक्षेप आरम्भ कर दिया। उनकी मदद से फीरोज का पुत्र सुल्तान मुहम्मद अपनी स्थिति मजबूत करने में सफल हो गया। लेकिन सत्ता की बागडोर संभालने के पश्चात् उसने सबसे पहले इन्हीं गुलामों को मौत के घाट उतारकर, बंदी बनाकर या शेष को तितर-बितर कर उनकी शक्ति को समाप्त कर दिया। फिर भी न तो वह और न उसका उत्तराधिकारी नासिरुद्दीन मुहम्मद ही जिसमें 1394 से 1412 ई. तक शासन किया महत्वाकांक्षी सरदारों और विद्रोही राजाओं पर नियंत्रण रखने में सफल हो सके। संभवतः इसके मुख्य कारण फीरोज के सुधार थे, जिनके चलते सरदार बड़े शक्तिशाली बन गये और सेना अयोग्य बन गयी। प्रान्तीय बाली स्वतन्त्र हो गये और दिल्ली के सुल्तान का राज्य वस्तुतः दिल्ली के आस-पास के क्षेत्रों तक सीमित रहा, जैसा कि किसी बुद्धिमान व्यक्ति ने कहा है कि ‘दुनिया का मालिक अल्लाह का साम्राज्य (दिल्ली के सुल्तानों की उपाधि) दिल्ली से पालम तक विस्तृत हैं।’’
   तैमूर के आक्रमण (1398 ई.) ने दिल्ली सल्तनत की दुर्बलता को और बदत्तर बना दिया। तैमूर मंगोल था। वह अपने को चंगेज का वंशज कहता था। सन् 1370 से उसने अपना विजय अभियान आरम्भ किया और सीरिया से मावराउन्नहर तथा दक्षिण रूस से लेकर सिन्ध तक के समस्त क्षेत्र को धीरे-धीरे अपने अधिकार में कर लिया। उसने लूटमार के विचार से भारत पर आक्रमण किया। वह दिल्ली के सुल्तानों द्वारा 200 वर्षों की जमा की हुई धनराशि को लूटना चाहता था। दिल्ली सल्तनत के पतन के बाद उसका मुकाबला करने वाला भी कोई नहीं था। तैमूर की सेना ने दिल्ली के रास्ते में आने वाले अनेक नगरों को निर्दयता के साथ लूटा और तबाह किया। दिल्ली में प्रवेश कर उसने यहाँ भी निर्दयता से लूटमार मचायी। बड़ी संख्या में हिन्दू और मुसलमान लोग इसके अतिरिक्त स्त्रियों और बच्चों को भी अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा।
   तैमूर के आक्रमण ने पुनः भारत के दुर्बल शासन के खतरे को उजागर किया। इसके परिणाम स्वरूप सोना, चाँदी जवाहरात आदि की एक बड़ी धनराशि भारत के बाहर चली गयी। तैमूर बड़ी संख्या में कारीगरों, राज मिस्त्रियों पत्थर काटने वाले तथा बढ़ईयों आदि को भी अपने साथ लेता गया। उनमें से कुछ लोगों ने उसकी राजधानी समरकंद में अनेक सुन्दर भवनों के निर्माण में मदद की। लेकिन भारत की राजनीति पर तैमूर के आक्रमण का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। यद्यपि तुगलक वंश का शासन सन् 1412 तक चला किन्तु तैमूर के आक्रमण से यह स्पष्ट हो गया है कि दिल्ली सल्तनत के शक्तिशाली शासकों के काल की अंत हो गया।
   दिल्ली सल्तनत के विघटन के लिये किसी एक शासक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। हम देख चुके हैं कि मध्य काल में कुछ समस्याएँ बनी रही, जिनमें शासक और सरदारों का संबंध स्थानीय जमींदारों और शासकों का संघर्ष, क्षेत्रीय विजय भौगोलिक कारण आदि थे। व्यक्तिगत रूप से शासकों ने इन समस्याओं का सामना करने का प्रयास किया। लेकिन उनमें से कोई भी समस्या के स्थायी समाधान के लिए समाज में मूलभूत परिवर्तन की स्थिति में नहीं था। इस प्रकार विघटनकारी तत्व छिपे रहते थे और केन्द्रीय प्रशासन में किसी प्रकार की कमजोरी पाकर ये अपने प्रभुत्व और स्वतन्त्रता की घोषणा करने के लिए तैयार रहते थे। गयासुद्दीन और मुहम्मद तुगलक के साम्राज्य विस्तार की नीति से उत्पन्न विघटनकारी तत्वों को रोकने में फीरोज सफल हुआ। उसने अमीरों और सैनिकों को प्रसन्न करने के लिये लगातार कई सुधार किये जिससे केन्द्रीय शासन प्रणाली कमजोर हो गयी।
   भारत में सन् 1200 से 1400 के बीच शासन व्यवस्था, लोगों के रहन-सहन, कला और वास्तुकला की अनेक नयी विशेषताएँ दिखायी पड़ी। इनका अध्ययन हम अगले अध्याय में करेंगे।