सत्यमेव जयते gideonhistory.com
दिल्ली सल्तनत - गुलाम वंश

मम्लूक सुल्तान

   उन कारणों के विषय में हम पिछले अध्याय में पढ़ चुके हैं, जिनके फलस्वरूप तुर्कों ने पंजाब और मुल्तान से लेकर गंगाघाटी तक के बिहार तथा बंगाल के कुछ क्षेत्रों का विस्तार करने में सफलता पायी थी। तुर्क आक्रमणकारियों द्वारा शासित राज्य को दिल्ली सल्तनत के नाम से पुकारा जाता है। लगभग सौ वर्षों तक इन तुर्कों को अपने राज्य की सुरक्षा हेतु विदेशी आक्रमणों, तुर्की अमीरों के आंतरिक विरोधों तथा विजित राजपूत शासकों और सरदारों द्वारा पुनः अपने राज्य को वापस लेने और तुर्कों को बाहर निकाल देने के प्रयासों का सामना करना पड़ा। तुर्की शासकों को इन बाधाओं पर विजय पाने में सफलता मिली। तेरहवीं शताब्दी के अंत तक इन्होंने न केवल मालवा और गुजरात को अपने अधिकार में कर लिया वरन् दकन और दक्षिण भारत तक पहुँच गए। इस प्रकार सौ वर्षों के अन्दर उत्तर भारत में तुर्की साम्राज्य की स्थापना का प्रभाव पड़ा। इसके फलस्वरूप संपूर्ण भारत में समाज, प्रशासन और सांस्कृतिक जीवन में दूरगामी परिवर्तन हुए।

शक्तिशाली राजतंत्र की स्थापना के लिए संघर्ष

   सन् 1206 में तुर्की गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक, मुइज्जुद्दीन (मुहम्मद गौरी) का उत्तराधिकारी बना। तराइन के युद्ध के उपरान्त कुतुबुद्दीन ने भारत में तुर्की सल्तनत के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान किया था। मुइज्जुद्दीन का ही एक दूसरा गुलाम यल्दोज गजनी का उत्तराधिकारी बना। गजनी के शासक के लूट में यल्दोज ने दिल्ली पर भी अपने आधिपत्य का दावा किया। ऐबक ने इसे अस्वीकार कर दिया और इसी समय से दिल्ली सल्तनत ने गजनी से अपना संबंध तोड़ लिया। भारत के लिये यह सौभाग्य की बात थी क्योंकि इस प्रकार वह मध्य एशिया की राजनीति से अलग रहा। इससे भारत के बाहर के देशों पर निर्भर हुए बिना दिल्ली सल्तनत को स्वतन्त्र रूप से विकास करने का अवसर मिला।

इल्तुतमिश (1210-1236 ई.)

   सन् 1210 में चौगान (पोलो) खेलते समय घोड़े से गिरने के कारण ऐबक की मृत्यु हो गयी। ऐबक का दामाद इल्तुतमिश उसका उत्तराधिकारी बना। किन्तु सिंहासन पर बैठने के पूर्व उसे ऐबक के पुत्र से युद्ध कर उसे पराजित करना पड़ा था। इस प्रकार प्रारम्भ में ही पिता के बाद पुत्र के उत्तराधिकार के वंशानुगत सिद्धान्त पर रोक लग गई थी।
   इल्तुतमिश को निश्चित रूप से तुर्कों द्वारा उत्तर भारत की विजयों का वास्ताविक संगठनकर्ता माना जा सकता है। इसके सिंहासनारोहरण के समय अलीमर्दान खाँ ने अपने को बंगाल और बिहार का शासक घोषित किया था। ऐबक के गुलाम कुबाचा ने भी अपने को मुल्तान का स्वतन्त्र शासक घोषित किया और लाहौर तथा पंजाब के अमीरों को जीत लिया। सर्वप्रथम दिल्ली के निकट भी इल्तुतमिश के साथी अमीरों ने उसके प्रभुत्व को स्वीकार करने में आनाकानी की। राजपूतों ने स्वतन्त्रता के लिए परिस्थितियों का लाभ उठाया। इस प्रकार कालिंजर, ग्वालियर और पूर्वी राजस्थान के राजाओं ने जिसमें अजमेर और बयाना भी सम्मिलित थे, तुर्की प्रशासन के जुए को कंधे से उतार फेंका।
   अपने शासन के प्रारम्भिक वर्षों में इल्तुतमिश ने उत्तर-पश्चिम की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया। ख्वारिजम शाह की गजनी विजय के साथ ही दिल्ली सल्तनत के लिये एक नया खतरा उत्पन्न हो गया। इस समय मध्य एशिया में ख्वारिजम साम्राज्य सबसे शक्तिशाली राज्य था। इसकी पूर्वी सीमा सिन्ध नदी तक फैली हुई थी। इस खतरे को टालने के लिये इल्तुतमिश ने लाहौर की ओर कदम बढ़ाया और उसे जीत लिया। सन् 1220 में मंगोलों ने ख्वारिजम साम्राज्य को नष्ट कर दिया। इन्होंने इतिहास में सर्वशक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना की, जो अपने चरमोत्कर्ष काल में चीन से लेकर भूमध्य सागर तथा कैस्पियन सागर से लेकर जक्सारटेस नदी तक विस्तृत था। भारत के लिये मंगोलों द्वारा उत्पन्न खतरे और दिल्ली सल्तनत पर उसके प्रभाव की विवेचना आगामी परिच्छेद में की जायेगी। मंगोल जब दूसरी तरफ व्यस्त थे, इल्तुतमिश ने मुल्तान तथा उच्च से कुबाचा को निकाल बाहर किया। इस प्रकार दिल्ली सल्तनत की सीमाएँ पुनः एक बार सिन्ध नदी तक पहुँच गई।
   पश्चिमी में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर इल्तुतमिश ने अन्य क्षेत्रों की ओर अपनी दृष्टि घुमायी। बंगाल और बिहार में इबाज नामक एक व्यक्ति ने सुल्तान ग्यासुद्दीन की उपाधि धारण कर अपने को स्वतन्त्र घोषित कर दिया।
   इबाज एक उदार और योग्य शासक था। उसने अनेक सार्वजनिक निर्माण कार्य किये थे। उसने अपने पड़ोसियों के क्षेत्रों पर आक्रमण किया। फिर भी पश्चिम बंगाल में सेन और उड़ीसा तथा कामरूप (असम) में हिन्दू राजाओं का शासन बना रहा। सन् 1226-1227 में इल्तुतमिश के पुत्र ने लखनौती के निकट इबाज को पराजित किया और जान से मार डाला। एक बार पुनः बंगाल और बिहार दिल्ली के आधीन हो गये। लेकिन इन पर प्रभुत्व कायम रखना कठिन था और इन्होंने बार-बार दिल्ली को चुनौती दी।
   लगभग इसी समय इल्तुतमिश ने ग्वालियर और बयाना को पुनः प्राप्त करने के लिए कदम उठाए। अजमेर और नागौर इसी के अधिकार में रहे। उसने रणथम्भौर और जालौर के विरुद्ध आक्रमण किया और उन पर पुनः अपना अधिकार स्थापित कर लिया। उसने मेवाड़ की राजधानी नगदा (उदयपुर से लगभग 22 किलोमीटर दूर) पर भी आक्रमण किया। लेकिन राणा की सहायता के लिये आयी हुई गुजरात की सेना के पहुँचने पर उसे पीछे हटाना पड़ा। बदले की भावना से इल्तुतमिश ने गुजरात के चालुक्यों के राजा के विरुद्ध एक सेना भेजी, लेकिन वह सेना खदेड़ दी गयी और उसे हानि उठानी पड़ी।

रज़िया (1236-1239 ई.)

   अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में इल्तुतमिश उत्तराधिकार की समस्या को लेकर चिन्तित था। वह अपने जीवित पुत्रों में से किसी को भी सिंहासन पर बैठने के योग्य नहीं समझता था। उसने बहुत सोच-विचार कर अंत में अपनी पुत्री रजिया को अपने उत्तराधिकार के लिये निश्चित किया। उसने अपने अमीरों तथा उलेमाओं को इस बात के लिये राजी किया। यद्यपि महिलाओं ने रानियों के रूप में प्राचीन ईरान और मिश्र में शासन किया था और नाबालिग राजकुमारों के शासन काल में भी राज्य का कारोबार संभाला था, तथापि पुत्रों के रहते हुए एक औरत को राजसिंहासन के लिये मनोनीत करना एक नया कदम था। अपने अधिकार को दृढ़तापूर्वक स्थापित कराने के लिये रजिया को न केवल अपने भाइयों, बल्कि शक्तिशाली तुर्की अमीरों का भी सामना करना पड़ा। वह केवल तीन वर्षों तक शासन कर सकी। यद्यपि उसने थोड़े समय तक ही शासन किया, उसके शासन की कई विशेषताएँ थीं। रजिया के शासन के प्रारम्भ में ही इसके और तुर्की सरदारों, जिन्हें ‘‘चहलगानी या चालीसा‘‘ कहा जाता था, के मध्य संघर्ष हुआ। इल्तुतमिश अपने इन सरदारों का बड़ा सम्मान करता था। उसके मरणोपरान्त ये सरदार अहंकर और शक्ति के नशे में चूर होकर सिंहासन पर एक कठपुतली शासक को बैठाना चाहते थे जिन्हें वे वश में रख सकें। उन्हें इस बात का शीघ्र ही पता चल गया कि रजिया औरत होते हुए भी उनके हाथों का खिलौना बनने के लिये तैयार नहीं थी। उसने महिलाओं की वेश भूषा को छोड़ दिया और बिना बुर्का डाले, दरबार में बैठकें करने लगी। वह शिकार भी करती तथा युद्ध में सेना का नेतृत्व भी। गैर-तुर्कों को प्रतिष्ठित करने तथा अपना एक अलग दल तैयार करने के लिए उसके प्रयास को तुर्क सरदार बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। उन्होंने रज़िया पर नारी मर्यादा का उल्लंघन और अबीसिनीया के अमीर याकूत खाँ से प्रेम करने का आरोप लगाया। प्रान्तों के अमीरों ने उसके विरुद्ध एक शक्तिशाली सैन्य दल तैयार किया। लाहौर में विद्रोह हुआ जिसे कुचलने के लिए उसने स्वयं चढ़ाई की और गवर्नर को हथियार डालने पर मजबूर किया। सरहिन्द के रास्ते ही में विद्रोह हुआ और इसमें याकूत मारा गया। रज़िया बंदी बना ली गई। रज़िया ने भटिंडा के गवर्नर से विवाह कर लिया। अब अलतूज और रज़िया ने मिलकर दिल्ली पर चढ़ाई की यद्यपि उसने बहादुरी से युद्ध किया, लेकिन पराजित हुई। वह दोनों भागकर जब एक वन में सो रहे थे तो डाकुओं ने उनकी हत्या कर दी।

बलबन का युग (1246-1284 ई.)

   तुर्क सरदारों और राजतंत्र के बीच संघर्ष चलता रहा। उलूम खाँ नामक एक तुर्क सरदार ने जो आगे चलकर इतिहास ने बलबन के नाम से जाना जाता है, धीरे-धीरे समस्त शक्ति अनौपचारिक रूप से हथिया ली और अंत में सन् 1265 में वह स्वयं सिंहासन पर बैठ गया। इससे पहले बलबन ने इल्तुतमिश के छोटे पुत्र नासिरूद्दीन मुहम्मद के नायब अथवा प्रतिनिधि के रूप में काम किया। जिसे बलबन ने सन् 1246 में सिंहासन पर बैठने में सहायता की थी। बलबन ने अपनी एक पुत्री की शादी युवा सुल्तान से कर अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली थी। बलबन के बढ़ते हुए प्रभुत्व से उन तुर्की सरदारों की आशाओं पर पानी फिर गया जो नासिरूद्दीन मुहम्मद के युवा और अनुभवहीन होने का लाभ उठाकर शासन में अपनी शक्ति और प्रभाव को पूर्वव्त बनाए रखना चाहते थे। अतः उन्होंने सन् 1260 में एक षड़यंत्र रचकर बलबन को अपदस्थ करा दिया। बलबन की जगह इमाद्द्वीन रैहान नामक एक भारतीय मुसलमान की नियुक्ति हुई। तुर्क सरदार समस्त शक्ति और प्रभुत्व को अपने हाथों में रखना चाहते थे। उन्होंने रैहान की नियुक्ति पर अपनी सहमति दी। कारण यह था कि वे इस बात पर एकमत नहीं थे कि बलबन का स्थान कौन ले। बलबन ने सुल्तान की इच्छानुसार पद त्याग दिया। किन्तु सावधानी से वह अपना दल तैयार करने लगा। अपनी बर्खास्तगी के दो वर्षों के अन्दर उसने अनेक विरोधियों को मित्र बना लिया। बलबन ने अब अपने को सैन्य बल परीक्षा के लिये तैयार कर लिया। ऐसा प्रतीत होता है कि पंजाब के एक बड़े भाग को अधिकार में कर लेने वाले मुगलों से भी उसने अपना संबंध स्थापित कर लिया था। सुल्तान महमूद ने बलबन के दल की श्रेष्ठता के आगे घुटने टेक दिये और रैहान को बर्खास्त कर दिया। कुछ समय के पश्चात् रैहान पराजित हुआ और मार डाला गया। बलबन ने उचित-अनुचित तरीकों से अपने अन्य प्रतिद्वन्दियों से भी मुक्ति पायी। अब वह इतना आगे बढ़ गया कि उसने राजसी चिन्ह छत्र को भी ग्रहण कर लिया। किन्तु इनता होते हुए भी संभवतः तुर्की सरदारों के मनोभावों को भांपकर वह राजसिंहासन पर नहीं बैठा। सन् 1256 में सुल्तान महमूद दुनिया से चल बसा। कुछ इतिहासकारों का मत है कि अपनी गद्दी को निष्कंटक बनाने के लिये बलबन ने युवा राजा को विष दे दिया और उसके पुत्रों को भी मार डाला। बनबन के तरीके अवांछनीय थे। लेकिन इसमें सन्देह नहीं है कि उसके सिंहासन पर बैठने के साथ ही एक शक्तिशाली केन्द्रित शासन का युग शुरू हुआ।
   बलबन इस बात को मानता था कि आंतरिक और बाह्य संकट का सामना करने का एकमात्र उपाय सम्राट की प्रतिष्ठा और शक्ति को बढ़ाना है। इसके लिये वह निरंतर प्रयत्नशील रहा। इस युग में यह विश्वास था कि कुलीन घरानों और प्राचीन वंशों के व्यक्तियों को ही प्रभुत्व और शक्ति का अधिकार था। अतः बलबन ने अपने को कथाओं में प्रसिद्ध तुर्की योद्धा अफरासियाब का वंशज घोषित कर अपने दावे को मजबूत बनाने का प्रयास किया था। अपनी कुलीनता के दावे को और मजबूत करने के लिये उसने अपने को तुर्की अमीरों के नेता के रूप में प्रदर्शित किया। उसने कुलीन परिवार के सदस्यों को ही शासन के उच्च पदों के लिये स्वीकार किया। वस्तुतः इसका यह अर्थ था कि भारतीय मुसलमान शासन में शक्ति और प्रभुत्व के पदों से वंचित रह जाते थे। बलबन कभी-कभी बेवकूफी की स्थिति तक पहुँच जाता था। उदाहरणार्थ उसने एक बड़े व्यापारी से मिलना इसलिये अस्वीकार कर दिया, क्योंकि वह उच्च कुल का नहीं था। इतिहासकार बरनी ने जो स्वयं तुर्की अमीरों का बड़ा समर्थक था, बलबन के मुख से कहलवाया है - ‘‘जब कभी मैं अकुलीन अधम व्यक्ति को देखता हूँ, मेरी आँखें जल उठती हैं और मेरा हाथ तलवार की मूठ तक (उसे मारने के लिये) पहुँच जाता है’’। हमें इस बात का पता नहीं है कि वस्तुतः बलबन ने इन शब्दों को कहा है या नहीं, लेकिन इनसे गैर-तुर्कों के प्रति उसके दृष्टिकोण का पता चलता है।
   अपने को तुर्की अमीरों के नेता के रूप में प्रदर्शित करते हुये भी बलबन अपनी शक्ति में किसी को यहाँ तक कि परिवार के सदस्यों को भी साझेदार बनाने के लिये तैयार नहीं था। उसकी तानाशाही इस हद तक पहुँच गयी थी कि वह अपने समर्थकों में से किसी से भी आलोचना सुनना नहीं चाहता था। बलबन का मुख्य कार्य चहलगानी अर्थात् तुर्की सरदारों की शक्ति भंग कर सम्राट की शक्ति और प्रतिष्ठा को बढ़ाना था। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिये उसने अपने रिश्तेदार शेर खाँ को विष देकर मार डालने में भी संकोच नहीं किया। इसी समय उसने जनता के विश्वास को प्राप्त करने के लिये न्याय देने में किसी का थोड़ा भी पक्षपात नहीं किया। अपने अधिकार की अवेहलना करने वाले राज्य के बड़ी से बड़ी हस्तीवाले व्यक्ति को भी वह नहीं छोड़ता था। इस प्रकार अपने निजी गुलामों से अमानुषिक व्यवहार करने पर बदायूँ और अवध के हाकिमों के पिताओं को ऐसी कठोर सजा दी, जो दूसरी के लिये उदाहरण का काम कर सके। अपने को राज्य की सभी प्रकार की सूचना से अवगत रखने के लिये उसने प्रत्येक विभाग में गुप्तचरों को नियुक्त किया था। आन्तरिक उपद्रवों तथा पंजाब में जमे हुए मंगोलों का जो दिल्ली सल्तनत के लिये गंभीर खतरा बने हुए थे, मुकाबला करने के लिये उसने एक शक्तिशाली केन्द्रीय सेना का संगठन किया। इसके लिये उसने एक सैन्य विभाग ‘दीवाने अर्ज़’ को पुनर्गठित किया और ऐसे सैनिकों को जो सेना के योग्य नहीं रह गये थे, पेंशन देकर सेवा मुक्त कर दिया। इन सैनिकों में से अधिक तुर्क थे, जो इल्तुतमिश के समय भारत आये थे। उन्होंने बलबन के इस निर्णय के विरुद्ध आवाज उठायी, लेकिन बलबन टस से मस नहीं हुआ।
   इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद से ही दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों तथा दोआब में कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ गयी थी और लुटेरों तथा डकैतों के उत्पात के कारण पूर्वी क्षेत्रों से संपर्क स्थापित करना बहुत कठिन हो गया था। कुछ राजपूत जमीदारों ने इस क्षेत्र में किले बनवा लिये थे। यह प्रशासन के लिये चुनौती थी। दिल्ली के निकटवर्ती सघन जंगलों में लुटेरों को शरण मिली। मेवातियों का साहस इतना बढ़ गया कि वे दिल्ली के आसपास के लोगों को लूटने लगे। उन तत्वों से निपटने के लिये बलबन ने ‘रक्त और लौह’ की नीति अपनायी। दिल्ली के आसपास के लुटेरों को ढूँढ़कर निर्दयतापूर्वक मार डाला गया। बदायूँ के आसपास के क्षेत्रों में राजपूतों के किले नष्ट कर दिये गये। साथ ही वहाँ की जनता को दबाने के लिये बड़े पैमाने पर हत्या की गई। वन काट दिये गए। प्रशासन के विरुद्ध सिर उठाने वाले राजपूत जम़ीदारों से निपटने के लिये तथा सड़कों की सुरक्षा के लिये अफगान सैनिकों के नये गाँव बसाये गये।
   इस कठोर तरीकों से बलबन ने स्थिति पर काबू पा लिया। अपनी शक्ति तथा प्रशासनिक कार्यों से जनता को प्रभावित करने के लिये उसने अपने दरबार की ज्ञान-शक्ति को बढ़ाया। जब कभी वह बाहर जाता, एक बड़ी संख्या में अंगरक्षक नंगी तलवार लिये उसे चारों तरफ से घेरे रहते थे। उसने दरबार में हँसी-मजाक बिल्कुल बंद कर दिया। उसने शराब छोड़ दी, ताकि कोई भी उसे चंचल अथवा विचलित अवस्था में न देख सके। यह सिद्ध करने के लिये कि कोई भी अमीर उसकी बराबरी नहीं कर सकता, उसने सिज़दा और पावोस (सम्राट के सम्मुख झुककर उसके पैरों को चुम्बन करना) की प्रथा को अपने दरबार में चालू करा जो मूलतः ईरानी थी और जिन्हें गैर-इस्लामी समझा जाता था। इसके बावजूद किसी में उसका विरोध करने का साहस नहीं था, क्योंकि ऐसे समय में जबकि मध्य और पश्चिम एशिया में मंगोलों के आक्रमण से अधिकांश इस्लामी साम्राज्य समाप्त हो चुके थे, बलबन और दिल्ली सल्तनत को अकेले इस्लाम के नेता के रूप में देखा जाने लगा था।
   सन् 1286 में बलबन का देहांत हो गया। निस्सन्देह वह दिल्ली सल्तनत और विशेष रूप से प्रशासनिक ढाँचे और संस्थाओं के निर्माताओं में से प्रमुख था। सम्राट के अधिकारों पर दृढ़ बना रहकर बलबन ने दिल्ली सल्तनत की शक्ति को मजबूत किया। लेकिन तब भी वह उत्तर भारत की मंगोलों के आक्रमणों से पूरी तरह रक्षा नहीं कर सका। इसके अतिरिक्त गैर-तुर्कों को ऊँचे पदों से वंचित कर तथा प्रशासन को संकीर्ण बनाकर उसने अनेक लोगों को असंतुष्ट किया। इसी कारण नये प्रकार के उपद्रवों और गड़बड़ियों का प्रारम्भ हुआ।

मंगोलों का खतरा और उत्तर-पश्चिम सीमा की समस्या

   भारत अपनी प्राकृतिक सीमाओं के कारण अपने इतिहास के अधिकांश काल में बाह्य आक्रमणों से सुरक्षित रहा। भारत केवल अपनी उत्तर-पश्चिम सीमाओं की ओर से असुरक्षित रहा। जैसा कि हम देख चुके हैं कि इस क्षेत्र के पहाड़ी दर्रों से होकर हूणों, सीथियनों आदि प्रारंभिक आक्रमणकारियों की तरह तुर्कों ने भी भारत में प्रवेश किया और यहाँ अपना सम्राज्य स्थापित कर लिया। इन पहाड़ी क्षेत्रों की आकृति ही ऐसी है, कि किसी भी आक्रमणकारी को पंजाब और सिन्ध की उर्वर घाटियों तक पहुँचने से रोकने के लिये गजनी होते हुए काबुल से कंधार तक के विस्तृत क्षेत्र पर नियंत्रण आवश्यक था। शासकों के लिये हिन्दुकुश के निकट के क्षेत्र पर नियंत्रण और भी आवश्यक था क्योंकि मध्य एशिया से सेना और सैन्य सामग्री भेजने का यह मुख्य मार्ग था।
   पश्चिम एशिया की अनिश्चित स्थिति के कारण दिल्ली सल्तनत के शासकों को उन सीमावर्ती क्षेत्रों पर नियंत्रण रखना संभव न हो सका जो भारत के लिये सदा खतरा बने रहे।
   ख़्वारिज्मी साम्राज्य के उदय होने के साथ काबुल, कंधार और गजनी पर से गोरियों का आधिपत्य समाप्त हो गया था और ख्वारिज्मी साम्राज्य की सीमा सिन्धु नदी तक पहुँच गयी थी। ऐसा प्रतीत होता था कि उत्‍तर भारत पर आधिपत्य जमाने के लिये ख़्वारिज्मी शासकों और ऐबक के उत्तराधिकारियों के मध्य युद्ध छिड़ने ही वाला था कि ठीक उसी समय एक और बड़ा खतरा दिखाई दिया। वह था, मंगोलों का नायक चंगेज खाँ जो अपने ‘ईश्वरीय अभिशाप’ कहलाने में गर्व का अनुभव करता था। सन् 1220 में मंगोलों ने ख़्वारिज्मी साम्राज्य का अंत कर दिया। उन्होंने सर दरिया से केस्पियन सागर और गजनी से इराक तक फलते-फूलते शहरों और गाँवों को निष्ठुरता से लूटा और विध्वंस किया और कभी-कभी तो बड़े पैमाने पर हत्या करने से भी नहीं चूके। अनेक तुर्की सैनिक अपनी जीवन रक्षा के लिये मंगोलों से जा मिले। मंगोलों ने जानबूझकर युद्ध में आतंक को एक शस्त्र बनाया। जहाँ कहीं भी आत्मसमर्पण प्रतिरोध के बाद होता वहाँ के सभी सैनिकों और बड़ी संख्या में उनके सरदारों को मौत के घाट उतार दिया जाता था। उनकी औरतों और बच्चों को गुलाम बनाकर बेच दिया जाता था। असैनिक लोगों की भी माफ नहीं किया जाता था। उनमें से शिल्पकारों को मंगोल सेना के लिये चुन लिया जाता और अन्य हष्ट-पुष्ट लोगों से नगरों पर आक्रमण करने के समय बेगार ली जाती थी। इससे इस क्षेत्र के लोगों के आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में भारी गिरावट आती थी। लेकिन आगे चलकर मंगोलों द्वारा इस क्षेत्र में शान्ति, कानून और व्यवस्था स्थापित करने तथा चीन से लेकर भूमध्य सागर तट तक के व्यापार मार्ग को सुरक्षित बनाने से पुनरुत्थान की प्रक्रिया का आरम्भ हुआ। किन्तु ईरान, तूरान और इराक को प्राचीन समृद्धि प्राप्त करने में सदियाँ लग गईं। इसी बीच मंगोलों के आक्रमण के अनेक अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़े। इस क्षेत्र के बहुत से राजकुमार तथा बड़ी संख्या में विद्वान, धर्मशास्त्री तथा अन्य योग्य व्यक्तियों जो सभ्य परिवार के थे, आकर दिल्ली में शरण ली। प्रायः एक मात्र मुसलमानी राज्य होने के नाते दिल्ली का महत्व बढ़ गया। एक तरफ तो विभिन्न वर्गों के नये शासकों ने इस्लामी एकता पर बल दिया। और दूसरी ओर तुर्क आक्रमणकारियों, जो स्वदेश छोड़कर आए थे और जिन्हें अपने पुराने देश से कोई नई सैनिक सहायता न मिली, उन्हें शीघ्रातिशीघ्र अपने को भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढालना पड़ गया।
   आरम्भ में सन् 1221 से भारत को मंगोलों से खतरा उत्पन्न हो गया था। ख़्वारिज्मी शासक की पराजय के बाद चंगेज खाँ ने उत्तराधिकारी राजकुमार जलालुद्दीन का पीछा किया। सिन्ध नदी के तट पर जलालुद्दीन ने मंगोलों का वीरता के साथ सामना किया। पराजय के उपरान्त उसने अपने घोड़े को नदी में डाल दिया और नदी पार कर भारत पहुँचा। चंगेज खाँ तीन माह तक सिन्ध नदी के आसपास घूमता रहा, तदुपरान्त उसने निश्चय किया कि वह भारत पर आक्रमण करने के बजाय ख़्वारिज्मी सम्राज्य के शेष भागों को जीतेगा। यह कहना कठिन है कि यदि चंगेज ने भारत पर आक्रमण करने का निश्चय किया होता तो उसके क्या परिणाम होते। भारत में तुर्की राज्य अभी भी अत्यन्त निर्बल तथा असंगठित था। संभवतः भारत को भी बड़े पैमाने पर हत्या तथा विनाश लीला देखनी पड़ती जिसके समक्ष तुर्कों का प्रारम्भिक अत्याचार मामूली लगता। उस समय दिल्ली का शासक इल्तुतमिश था। उसने मंगोलों के आक्रमण के खतरे से मुक्ति पाने के लिये राजनीतिक स्तर पर जलालुद्दीन को शरण देने से इंकार कर दिया। जलालुद्दीन ने कुछ समय झेलम और सिन्ध नदी के क्षेत्रों के बीच अज्ञातवास किया। उसके बाद मंगोलों ने लगातार आक्रमण किये और सिन्ध नदी, भारत और पश्चिमी सीमा नहीं रह गई थी। लाहौर और मुल्तान इल्तुतमिश और उसके प्रतिद्वन्दियों यल्दोज और कुबाजा के बीच झगड़े को जड़ बने रहे। यल्दोज और कुबाचा ने लाहौर के लिये लड़-झगड़कर अपने को निर्बल बना दिया। अंत में इल्तुतमिश लाहौर और मुल्तान दोनों को अपने अधिकार में लाने में सफल हुआ और इस प्रकार मंगोलों के विरुद्ध फिर से एक शक्तिशाली सुरक्षा-सीमा बना सका।
   सन् 1226 ई. में चंगेज खाँ की मौत के पश्चात् शक्तिशाली मंगोल साम्राज्य उसके पुत्रों के बीच विभाजित हो गया। इस काल में बाटूखान के नेतृत्व में मंगोलों ने रूस को जीता।
   सन् 1240 तक मंगोलों ने भारत में अपना अनाधिकार प्रवेश बंद कर दिया था। इसका प्रमुख कारण था कि मंगोल इराक और सीरिया के दमन में तल्लीन थे। इससे दिल्ली के सुल्तानों को दम लेने के लिये कुछ समय मिल गया जिससे उन्होंने भारत में राज्य व्यवस्था को मजबूत बनाया और एक शक्तिशाली सेना को भी संगठित किया।
   सन् 1241 में हेरात, गोर, गजनी और तुखारिस्तान में मंगोल सेनाओं का अध्यक्ष तैर बहादुर लाहौर के निकट पहुँच गया। विशेष अनुरोध के बावजूद दिल्ली से सहायता न मिलने पर वहाँ का प्रशासक, नगर छोड़कर भाग गया। मंगोलों ने लाहौर में सेना की नियुक्ति नहीं की, लेकिन दिल्ली पहुँचने के मार्ग को साफ करने के उद्देश्य से लाहौर की सेना को नष्ट कर दिया और नगर को प्रायः जनशून्य बना दिया। सन् 1245 में मंगोलों ने मुल्तान को घेर लिया लेकिन बलवन ने शीघ्र पहुँचकर स्थिति पर काबू पा लिया। बलवन जब रेहान के नेतृत्व में अपने विरोधियों का सामना करने में व्यस्त था, मंगोलों को लाहौर पर आधिपत्य जमाने और उसे अपने काबू में रखने का अवसर हाथ लगा। उस समय कुछ तुर्क अमीर, यहाँ तक कि मुल्तान के शासक शेर खाँ ने भी मंगोलों का साथ दिया। यद्यपि बलवन ने मंगोलों का डटकर सामना किया पर दिल्ली की सीमा रावी और सतलुज नदियों को मध्य से धीरे-धीरे घटकर व्यास नदी तक सीमित हो गई।
   बलबन को शासक के रूप में इसी परिस्थिति का सामना करना पड़ा। बलबन ने बल और कूटनीति दोनों से काम लिया। उसने भटिण्डा, सुनाम और समाना के किलों की मरम्मत कराई और मंगोलों को व्यास नदी पार करने से रोकने के लिए वहाँ एक शक्तिशाली सेना तैनात की। वह स्वयं दिल्ली ही रहा और सीमा की यथाशक्ति निगरानी रखने के उद्देश्य से राजधानी से दूर सैनिक अभियान नहीं किये। साथ ही उसने हलाकू, जो ईरान और निकटवर्ती क्षेत्रों का मंगोल शासक था, के पास अपने चतुर राजदूतों को भेजा। हलाकू के राजदूत जब दिल्ली पहुँचे तो बलवन ने बड़े सम्मान के साथ उनका स्वागत किया। बलबन पंजाब के प्रायः समस्त क्षेत्र को चुपचाप मंगोलों के अधिकार में छोड़ने के लिए तैयार हो गया। मंगोलों ने अपनी ओर से दिल्ली पर कोई आक्रमण नहीं किया। किन्तु सीमा अनिश्चित ही रही और मंगोलों को रोक रखने के उद्देश्य से बलबन को लगभग प्रत्येक वर्ष सैनिक अभियान छेड़ना पड़ा। अंत में वह मुल्तान को छीन लेने में सफल हो गया और उसने अपने सबसे बड़े पुत्र शाहजादा महमूद को वहाँ का हाकिम बना दिया। किन्तु मुल्तान व्यास सीमा की सुरक्षा करते समय एक मुठभेड़ में बलबन का उत्तराधिकारी शाहजादा महमूद मारा गया।
   यद्यपि सन् 1286 में बलबन की मृत्यु हुई फिर भी उसके द्वारा स्थापित युद्धनीति और कूटनीति दिल्ली सल्तनत में बनी रही। सन् 1292 में हलाकू का पोता अब्दुल्ला डेढ़ लाख घोड़ों के साथ दिल्ली की ओर अग्रसर हुआ तो जलालुद्दीन ख़लजी ने उसे बलबन द्वारा निर्धारित भंटिडा, सुनाम आदि सीमा रेखा पर पराजित कर दिया। इस पराजय से मंगोलों के आत्मविश्वास को भारी धक्का लगा। उन्होंने संधि के लिए आग्रह किया। इसके परिणामस्वरूप चार हजार मंगोलों ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया और भारतीय राजाओं के पक्ष में आकर वे दिल्ली के निकट बस गये।
   मध्य एशिया की राजनीति फिर बदलने के कारण मंगोलों ने पंजाब से आगे बढ़कर दिल्ली पर आक्रमण करना चाहा। ईरान के इल मंगोल खाँ ने दिल्ली के सुल्तानों के साथ मैत्री संबंध बनाए रखा था। मावराउन्नहार के मंगोल शासक पूर्व में उसके प्रतिद्वन्दी थे। मावराउन्नहार का शासक देवा खाँ जब ईरान के इल खाँ के विरुद्ध असफल हो गया, तो उसने भारत पर अधिकार जमाने का प्रयास किया। सन् 1297 से दिल्ली की सुरक्षा सीमा वाले किलों के विरुद्ध उसने लगातार अभियान आरम्भ किये। सन् 1299 में उसके पुत्र कुतलुग ख्वाजा के नेतृत्व में दो लाख सैनिक दिल्ली के निकट पहुँचकर मंगोलों ने दिल्ली और उसके निकटवर्ती क्षेत्र के बीच के संपर्क साधनों को काट डाला। यह पहला अवसर था जबकि मंगोलों ने दिल्ली पर कब्जा करने के लिये गंभीर अभियान चलाया। अलाउद्दीन ख़लजी उन दिनों दिल्ली का सुल्तान था। उसने दिल्ली के बाहर मंगोलों का सामना करने का निश्चय किया। मंगोलों के साथ कुछ युद्धों में भारतीय सेना विजयी रही पर एक अलग युद्ध में प्रसिद्ध सेनापति जफर खाँ को जान से हाथ धोना पड़ा। कुछ समय के पश्चात् बड़ी लड़ाई का खतरा मोल लिये बिना मंगोल लौट गये। सन् 1303 में एक लाख बीस हजार सैनिकों के साथ मंगोल पुनः दिल्ली के पास पहुँचे। अलाउद्दीन ख़लजी उन दिनों राजपूताना में चित्तौड़ के विरुद्ध अभियान चला रहा था। सूचना मिलते ही अलाउद्दीन शीघ्र लौट आया और दिल्ली के निकट अपनी नयी राजधानी सीरी में रहकर उसने किलाबंदी की। दोनों सेनाएँ दो महीने तक आमने-सामने अपने शिविरों में डटी रहीं। इस अवधि में दिल्ली के नागरिकों को अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। प्रतिदिन छोटी-छोटी लड़ाइयाँ होती रहीं। अंत में मंगोल पुनः खाली हाथ लौट गये।
   दिल्ली पर मंगोलों के इन दो आक्रमणों ने सिद्ध कर दिया कि दिल्ली के सुल्तान मंगोलों से टक्कर ले सकते हैं। यह एक ऐसा कार्य था जिसमें मध्य या पश्चिम एशिया के शासक पूरी तरह असफल रहे थे। साथ ही दिल्ली के सुल्तानों के लिये यह एक बड़ी चेतावनी भी थी। आलउद्दीन ने अब एक बड़ी कुशल सेना खड़ी करने के लिये ठोस कदम उठाये और व्यास नदी के निकट के किलों का जीर्णोद्धार कराया। इस प्रकार वह इस योग्य हो गया कि आगामी वर्षों में मंगोल सैनिकों को हराकर बड़ी संख्या में उनकी हत्या करके उनके संभावित आक्रमणों को विफल कर सके। सन् 1306 में मावराउन्नहर के मंगोल शासक देवा खाँ की मृत्यु हो गयी। उसकी मृत्यु के साथ ही वहाँ अराजकता फैल गयी और गृह युद्ध छिड़ गया। भारत पर मंगोल आक्रमणों का भय वक्ती तौर पर टल गया। बाद में तैमूर ने भारत पर फिर आक्रमण किया। मंगोलों के बीच फैली अराजकता का लाभ उठाकर दिल्ली के शासकों ने पुनः लाहौर पर फिर कब्जा कर लिया और कालान्तर में अपने आधिपत्य का विस्तार झेलम के पार नमक की पहाड़ियों तक कर लिया।
   इस प्रकार हम देखते हैं कि पूरी तेरहवीं शताब्दी में उत्तर-पश्चिम से दिल्ली सल्तनत को भयंकर खतरे का सामना करना पड़ा। यद्यपि मंगोल लगभग समस्त पंजाब को धीरे-धीरे अपने अधिकार में लाने में सफल हुए साथ ही दिल्ली के लिए खतरा बने रहे लेकिन तुर्की शासकों की दृढ़ता, शक्ति और कूटनीति के कारण यह खतरा टल गया और बाद में उन्होंने पंजाब को पुनः प्राप्त कर लिया। मंगोलों द्वारा दिल्ली सल्तनत पर भयंकर खतरा उत्पन्न होने से सल्तनत की आंतरिक समस्याओं पर भारी असर पड़ा।

आंतरिक विद्रोह तथा दिल्ली सल्तनत का क्षेत्रीय एकीकरण

   इल्वरी तुर्की (जिन्हें कभी-कभी मम्लूक या गुलाम शासक भी कहा जाता है) के शासन काल में दिल्ली के सुल्तानों को न केवल विदेशी आक्रमणों बल्कि आंतरिक विद्रोहों का भी समाना करना पड़ा। इनमें से कुछ विद्रोहों का नेतृत्व उन महात्वाकांक्षी मुसलमान सरदारों ने किया जो स्वतन्त्र होना चाहते थे और कुछ का उन राजपूत राजाओं और जमींदारों ने जो अपने क्षेत्रों को तुर्क आक्रमणकारियों से वापस लेने के इच्छुक थे अथवा तुर्क शासकों की कठिनाईयों का लाभ उठाकर अपने निर्बल पड़ोसी राज्यों को हड़पना चाहते थे। इस प्रकार ये राजा और जमींदार न केवल तुर्कों के ही विरुद्ध थे वरन् आपस में भी सदा लड़ते रहते थे। ये आतंरिक विद्रोह अपने स्वरूप और उद्देश्यों को मिलाकर तुर्की के विरुद्ध हिन्दू प्रतिरोध कहना न्यायसंगत नहीं था। भारत एक विशाल देश था और भौगोलिक कारकों से पूरे देश पर पूरी तरह से एक केन्द्र से शासन करना कठिन था। इसलिए प्रान्तीय गवर्नरों को काफी हद तक स्वतन्त्रता देनी पड़ती थी। इस कारण से तथा प्रान्तीयता की प्रबल भावनाओं से प्रेरित होकर प्रांतीय गवर्नर दिल्ली प्रशासन के विरुद्ध थे और अपने को स्वतन्त्र घोषित करने की सदैव आकांक्षा रखते थे। प्रान्तीय शासकों को मालूम था कि दिल्ली के प्रतिरोध में उन्हें स्थानीय राजाओं का सहयोग मिलेगा।
   दिल्ली के सुल्तानों के विरुद्ध सभी विद्रोहों की सूची तैयार करना जरूरी नहीं है। भारत का पूर्वी क्षेत्र जिसमें बंगाल और बिहार सम्मिलित थे दिल्ली से अपना तिरहुत (उत्तरी बंगाल), बंग (पूर्वी बंगाल) और कामरूप (असम) दिल्ली की अधीनता का जुआ उतार फेंकना चाहते थे। हम पहले देख चुके हैं कि ख़लजी सरदार मुहम्मद बिन बख़्तियार ख़लजी किस प्रकार नदिया के सेन राजा लक्ष्मण सेन को सिंहासन पर से हटाने में सफल हुआ। कुछ गड़बड़ी के बाद ईबाज नामक एवं व्यक्ति ने सुल्तान गयासुद्दीन की उपाधि धारण कर स्वतन्त्र शासक के रूप में शासन करना आरम्भ किया। उत्तर पश्चिम क्षेत्र में इल्तुतमिश की व्यस्तता का लाभ उठाकर उसने अपने प्रभुत्व का विस्तार बिहार तक कर लिया तथा जाजनगर (उड़ीसा) के शासकों से कर लेना आरम्भ कर दिया।
   सन् 1225 में इल्तुतमिश जब उधर से मुक्त हुआ तो ईबाज के विरुद्ध उसने अभियान छेड़ दिया। ईबाज़ ने सर्वप्रथम आत्मसमर्पण किया लेकिन इल्तुतमिश ज्यों ही लौटा उसने पुनः अपने को स्वतन्त्र घोषित कर दिया। इल्तुतमिश का पुत्र जो अवध का बाली था, उसने ईबाज़ को एक युद्ध में पराजित किया और मार डाला। सन् 1230 में जब तक इल्तुतमिश ने दूसरा अभियान न छेड़ा तब तक इस क्षेत्र में अराजकता बनी रही।
   इल्तुतमिश के मरणोपरान्त बंगाल के शासक सुविधा के अनुसार कभी तो अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर देते थे और कभी दिल्ली की अधीनता स्वीकार कर लेते थे। इस अवधि में बिहार प्रायः लखनौती के अधिकार में रहा। बंगाल के शासकों ने अवध और कड़ा मानिकपुर आदि को जो अवध और बिहार के बीच में थे अपने अधिकार में लाने का प्रयास किया, पर असफल रहे। उन्होंने अपने साम्राज्य का विस्तार राधा (दक्षिण बंगाल) उड़ीसा और कामरूप (असम) तक करने की चेष्टा की। इन संघर्षों में उड़ीसा तथा असम के शासक डटे रहे। सन् 1244 में उड़ीसा के शासक ने मुसलमानों की सेना को लखनौती के निकट बुरी तरह पराजित किया। बाद में उड़ीसा की राजधानी जाजनगर के विरुद्ध भी मुसलमानों का अभियान असफल रहा। इससे पता चलता है कि लखनौती के स्वतन्त्र मुसलमान शासकों में निकटवर्ती हिन्दू क्षेत्रों को अपने अधिकार में लाने की क्षमता नहीं थी।
   बलबन के रूप में एक शक्तिशाली शासक को पाकर दिल्ली पुनः बिहार और बंगाल को अपने नियंत्रण में लाने के लिये आतुर हो उठी। अब दिल्ली शासन के प्रति औपचारिक निष्ठा पर्याप्त नहीं रही। तुगरिल ने पहले बलबन की अधीनता स्वीकार कर ली थी, पर पुनः उसने अपने को स्वतन्त्र घोषित कर दिया, तो बलबन ने उसे पकड़ लिया। बलबन ने तुगरिल परिवार के सदस्यों तथा उसके समर्थकों को कठोर दंड दिया। बलबन के नेतृत्व में यह एक मात्र लम्बा अभियान था जो वर्षों तक चला।
   फिर भी बंगाल दिल्ली के अधीन बहुत दिनों तक नहीं रहा। बंगाल का बाली बुगरा खाँ अपने पिता बलबन की मृत्यु के पश्चात् भी उसी क्षेत्र पर शासन करना चाहता था। वह दिल्ली के सिंहासन के लिए अपने जीवन को खतरे में डालना नहीं चाहता था। अंतः उससे अपने को स्वतन्त्र घोषित कर दिया और वहाँ एक वंश की स्थापना की जिसने बंगाल पर अगले चालीस वर्षां तक शासन किया। इस प्रकार तेरहवीं शताब्दी में एक लम्बी अवधि तक बंगाल और बिहार दिल्ली के अधिकार से बाहर रहे। पंजाब का अधिकांश भाग भी मंगोलों के अधिकार में था। तुर्की शासक गंगा के दोआब में भी पूर्णतः सुरक्षित नहीं थे। गंगा पार कटेहरिया की राजधानी अहिछत्र के राजपूतों का भी उन्हें भय था। यदा-कदा वे बदायूँ जिले पर आक्रमण किया करते थे। अंत में सिंहासन पर बैठने के बाद बलबन एक विशाल सेना के साथ आया और बड़े पैमाने पर उसने लूट मचायी और हत्याएँ कीं। सम्पूर्ण जिला मनुष्यों से खाली हो गया। वहाँ के जंगलों को साफ किया गया और सड़कें बनायी गयीं। बर्नी लिखता है कि उस दिन से बरान, अमरोहा, सम्भल और कटेहर (आधुनिक पश्चिमी उ. प्र.) के इक्ते सुरक्षित हो गए और लोग सदा के लिये परेशानी से मुक्त हो गये।
   दिल्ली सल्तनत की दक्षिणी और पश्चिमी सीमाएँ भी सुरक्षित नहीं थी। समस्याएँ दोहरी थीं। ऐबक के नेतृत्व में तुर्कों ने तिजारा (अलवर), बयाना, ग्वालियर, कालिंजर आदि के किलों पर अधिकार जमा लिया। उन्होंने पूर्वी राजस्थान में रणथम्भौर, नागौर, अजमेर और जालौर के निकट नदौल के क्षेत्रों तक अधिकार जमा लिया। इनमें से अधिकांश क्षेत्र भूतपूर्व चौहान साम्राज्य के अंग थे और अभी भी यहाँ चौहान परिवार के लोग शासन करते थे। इस प्रकार इनके विरुद्ध ऐबक का आक्रमण चौहान साम्राज्य के विरुद्ध चलाए गये अभियान का एक अंग था। इस काल में मालवा और गुजरात तक पहुँचना तो दूर रहा, पूर्वी राजस्थान में जीति गई भूमि तथा दिल्ली और गंगा क्षेत्र को बचाते हुए किलों पर भी अधिकार बनाए रखना कठिन हो गया।
   उत्तर-पश्चिम में इल्तुतमिश के लगे रहने का लाभ उठाकर राजपूत शासकों ने कालिंजर, ग्वालियर और बयाना को पुनः प्राप्त कर लिया। रणथम्भौर, जालौर तथा अन्य अनेक राज्यों ने तुर्की आधिपत्य को अस्वीकार किया। इन क्षेत्रों को पुनः अपनी अधीनता में लाने के लिये इल्तुतमिश ने सन् 1226 से सैनिक कार्रवाई आरम्भ की। सर्वप्रथम उसने रणथम्भौर को घेर लिया और तुर्कों की अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। गुजरात जाते समय उसने जालौर पर भी आधिपत्य जमा लिया। इल्तुतमिश का गुजरात और मालवा पर आधिपत्य जमाने के प्रयत्न भी असफल रहे। गुजरात के चालुक्यों ने इल्तुतमिश के आक्रमण को विफल कर दिया। मालवा के परमार तुर्कों के लिये बहुत शक्तिशाली थे। फिर भी इल्तुतमिश ने मालवा पर आक्रमण किया और उज्जैन तथा रायसिना को लूटा। उसके एक सेना नायक ने भी बूंदी पर आक्रमण किया। पूर्व में इल्तुतमिश ने बयाना और ग्वालियर को पुनः प्राप्त कर लिया लेकिन बुदेलखंड के राजपूतों के विरुद्ध वह अधिक आगे नहीं बढ़ सका।
   इल्तुतमिश की मृत्यु से जो अराजकता फैली उससे पूर्वी राजपूताना पर तुर्की आधिपत्य पुनः डगमगा गया। अनेक राजपूत राजाओं ने तुर्की आधिपत्य को उखाड़ फेंका। ग्वालियर के किले से भी तुर्कों को हाथ धोना पड़ा। मेवात में जमे भट्टी राजपूतों ने बयाना को वापस ले लिया और दिल्ली के बाहरी क्षेत्रों तक अपना प्रभाव कायम कर लिया। लेकिन अजमेर और नागौर तुर्कों के अधिकार में रहे। बलबन का रणथम्भौर जीतने और ग्वालियर को पुनः प्राप्त करने का प्रयास विफल हो गया। तथापि उसने मेवात को इस तरह सख्ती के साथ कुचल डाला कि दिल्ली मेवातियों के आक्रमण से लगभग सौ वर्षों तक सुरक्षित रही। अजमेर और नागौर दिल्ली सल्तनत के सुदृढ़ अधिकार में रहने लगे। इस प्रकार बलबन ने अपनी व्यस्तता के बावजूद भी पूर्वी राजस्थान में तुर्की शासन को संगठित किया। राजपूत राजाओं के बीच आपसी संघर्षों से भी तुर्कों को सहायता मिली। राजपूत उनके विरुद्ध प्रभावशाली संगठन नहीं बना सके।
   एक शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना, मंगोल आक्रमणकारियों के विरुद्ध सफलता, गंगा-दोआब क्षेत्र में स्थायी शासन की स्थापना और पूर्वी राजस्थान पर नियंत्रण दिल्ली सल्तनत की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ थीं। इनसे दिल्ली सल्तनत का पश्चिमी भारत और दकन में विस्तार के लिये मार्ग प्रशस्त हो गया।