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दिल्ली सल्तनत काल में भारत की सांस्कृतिक स्थिति
तेरहवीं शताब्दी के आरम्भ में दिल्ली-सल्तनत की स्थापना एक नये युग के सूत्रपात की द्योतक है। भारत में आने वाले तुर्क आक्रमणकारी किसी भी अर्थों में बर्बर नहीं थे। वे लोग नवीं और दसवीं शताब्दी में मध्य एशिया से पश्चिम एशिया में जा बसे थे। उन्होंने वहाँ पहुँच कर उसी प्रकार इस्लाम स्वीकार कर लिया जिस प्रकार उससे पहले मध्य एशिया के आक्रमणकारियों ने बौद्ध धर्म और हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया था। उन्होंने शीघ्र ही इस क्षेत्र की संस्कृति को आत्मसात कर लिया। इस समय अरबी-फारसी, संस्कृति, जिसका प्रसार मोरक्को व स्पेन से ईरान तक के सम्पूर्ण इस्लामी क्षेत्र पर छाया हुआ था। अपनी उन्नति के चरम शिखर पर भी इस क्षेत्र के निवासियों ने विज्ञान नौचालन विद्या तथा साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। भारत में आने के समय तक तुर्कों की न केवल इस्लाम में आस्था परिपक्व हो चुकी थी, वरन् प्रशासन कला और स्थापत्य कला के क्षेत्र में भी उनके सिद्धान्त निर्धारित हो चुके थे। भारत में तुर्कों का सम्पर्क ऐसे लोगों से हुआ, जिनके धार्मिक विचार उनसे भिन्न थे। कला, साहित्य तथा वास्तुकला आदि के क्षेत्र में भी उनकी सुविकसित परम्पराएँ थीं। भारतीयों के साथ तुर्कों के समागम के परिणामस्वरूप, कालान्तर में, इन क्षेत्रों में नयी व समृद्ध परम्पराएँ विकसित हुईं। किन्तु, यह प्रक्रिया लम्बी और उतार-चढ़ाव से भरी हुई थी। वस्तुतः जब दो पक्षों के विचारों और धारणाओं का आधार सशक्त होता है, तो उस दशा में भ्रान्ति और टकराव की सम्भावना बराबर बनी रहती है। किन्तु दोनों ही वर्गों में परस्पर सामन्जस्य स्थापित करने के लिये महत्वपूर्ण प्रयास भी हुए। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप कला, स्थापत्य, संगीत साहित्य और यहाँ तक कि रीति-रीवाजों, कर्म-काण्ड और धार्मिक विश्वासों तथा विज्ञान तकनीकी विकास के क्षेत्र में भी विलयन की प्रक्रिया का जन्म हुआ। किन्तु संघर्ष तथा टकराव की भावना भी दोनों ही समुदायों में विद्यमान रही। इस प्रकार विलयन और संघर्ष की ये प्रक्रियाएँ एक-दूसरे के समानान्तर चलती रहीं। इसीलिये विलयन के क्षेत्र में इतने उतार चढ़ाव आये। सांस्कृतिक सामन्जस्य किसी क्षेत्र में कम था और किसी में अधिक। देशकाल की परिस्थितियों के अनुरूप सामन्जस्य भी भिन्न-भिन्न स्तर पर हुआ।
स्थापत्य कलानये शासकों की पहली जरूरत रहने के लिये मकानों और अपने अनुयायियों के लिए पूजा के स्थानों की थी। पूजा के स्थान उपलब्ध करने के लिए उन्होंने पहले से विद्यमान मन्दिरों और इमारतों को मस्जिदों में परिवर्तित किया। इसके उदाहरण दिल्ली की कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद, जो कुतुब मीनार के पास है और अजमेर स्थित अढ़ाही दिन का झोपड़ा नामक इमारत है। कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद पहले एक जैन मन्दिर थी, जिसे कालान्तर में विष्णु मन्दिर में परिवर्तित किया गया था तथा अढ़ाही दिन का झोपड़ा अपने पूर्व रूप में एक मठ था। तुर्कों द्वारा दिल्ली में प्रारम्भ में केवल तीन मेहराबों का निर्माण किया गया। इनका निर्माण उपासना गृह (गर्भ गृह) को गिराकर उसके सामने के हिस्से में किया गया था। इन मेहराबों में विस्तृत व महीन पच्चीकारी की गई थी। इन के अलंकरण की एक विशिष्ट शैली है। इनमें किसी मानव या पशु की आकृति नहीं है क्योंकि ऐसा करना गैर-इस्लामी माना जाता था। इसके स्थान पर उसमें बेल-बूटे और कुरान की आयतें उत्कीर्ण की गईं, जो परस्पर अर्न्तजटित हैं। लेकिन जल्दी ही तुर्कों ने अपनी नयी इमारतें बनानी शुरू कर दीं। इस काम के लिए उन्होंने स्थानीय पत्थर काटने वालों और राजगीरों आदि शिल्पकारों का प्रयोग किया। ये शिल्पी अपने काम के लिए प्रसिद्ध थे। बाद में पश्चिम एशिया से कुछ अनुभवी स्थापत्य-शिल्पी भारत आये। तुर्कियों ने अपनी इमारतों में मेहराबों और गुबंदों का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया है। मेहराब तथा गुम्बद दोनों का ही स्थापत्य-शिल्प तुर्कों या अरबों की ईजाद नहीं है। वस्तुतः इस शिल्प को अरबों ने बिजेन्टाइन साम्राज्य के माध्यम से रोम से ग्रहण किया था, फिर उसका विकास करके उन्होंने इस शिल्प को अपनी रंगत दे दी थी।मेहराब और गुम्बदों के इस्तेमाल के कई लाभ थे। गुम्बद से गगन रेखा की भव्यता बढ़ जाती थी। जैसे-जैसे स्थापत्य शिल्पियों का अनुभव और आत्मविश्वास बढ़ा, वैसे-वैसे गुंबदों की ऊँचाई बढ़ती गई। वर्गाकार इमारतों पर गोल गुम्बद बनाने व उन्हें और ऊँचा बनाने के कई प्रयोग किये गये व इस प्रकार कई बड़ी-बड़ी भव्य इमारतों का निर्माण हुआ। मेहराबों और गुम्बदों के निर्माण का एक लाभ यह हुआ कि अब स्तम्भों के निर्माण की आवश्यकता नहीं रह गई। भारतीय स्थापत्य शिल्प में स्तम्भों का निर्माण बड़े-बड़े कक्षों में छत को आधार देने के उद्देश्य से किया जाता था। गुम्बद निर्माण की तकनीक के प्रयोग से बिना स्तम्भों के ही छत टिकी रहती थी। स्तम्भों की आड़ में रहने के कारण कक्ष का पूरा दृश्य साफ दिखाई पड़ता था। मस्जिदों तथा राजप्रासादों में बड़े-बड़े कक्षों की व्यवस्था का महत्व अधिक था। इन मेहराबों और गुम्बदों के निर्माण के लिए मजबूत सीमेन्ट की जरूरत थी। इसके बिना पत्थर नहीं जोड़े जा सके थे। तुर्क अपनी इमारतों में बढ़िया किस्म का चूना इस्तेमाल करते थे। इस प्रकार तुर्कों के भारत-आगमन के साथ उत्तर भारत में नयी स्थापत्य शैलियों और बढ़िया किस्म के चूने का इस्तेमाल शुरू हुआ। मेहराब और गुम्बदों का निर्माण भारतीय पहले से जानते थे, लेकिन उनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर नहीं होता था। इसके अतिरिक्त मेहराब बनाने का सही वैज्ञानिक तरीका कभी-कभी ही अपनाया जाता था। मेहराब बनाने का भारतीय तरीका-अन्तर कम करते हुए एक के बाद दूसरा पत्थर वहाँ तक जमाते जाने का था, जब तक कि ऊपर एक सिल या नुकीला पत्थर जमाया जा सके। तुर्क शासकों ने गुम्बद और मेहराब तथा शिल्प (सिल) और शहतीर दोनों विधियों का प्रयोग किया। अलंकरण के क्षेत्र में तुर्क मानव और पशु आकृतियों का चित्रण नहीं करते थे। इसके स्थान पर ज्यामितीय और फूलों के नमूने बनाने थे और उनके साथ कुरान की आयतें उत्कीर्ण करते थे। इस प्रकार अरबी लिपि भी कला का नमूना बन गई। अलंकरण की यह संयुक्त-विधि ‘‘अरबस्क’ कहलाती है। वे बहुधा हिन्दू-अलंकरण के नमूने भी अपनाते थे, जैसे घंटियों के नमूने, बेल के नमूने, स्वास्तिक, कमल आदि। इस प्रकार भारतीयों की तरह, तुर्क भी अलंकरण के प्रति गहरी रुचि रखते थे। इस कार्य के लिए संगतराशी के भारतीय कौशल का उन्होंने पूरा उपयोग किया इल्तुतमिश के छोटे मकबरे (दिल्ली में कुतुबमीनार के निकट) पर इतना महीन काम किया गया कि एक इंच खाली जगह भी नहीं छोड़ी गई। तुर्कों ने लाल पत्थर का प्रयोग करके अपनी इमारतों को और भी खूबसूरत बनाने की कोशिश की। लाल रंग को और भी प्रभावोत्पादक बनाने के लिए अलंकरण में पीला पत्थर और संगमरमर का भी इस्तेमाल होता था। तुर्कों की भव्य इमारत तेरहवीं शताब्दी में निर्मित कुतुबमीनार है। यह मीनार मूल रूप से 71.4 मीटर ऊँची थी और दिल्ली-निवासियों के प्रिय सूफी संत कुतुबद्दीन बख्तियार काकी की स्मृति में इल्तुतमिश ने बनवायी थी। स्तम्भ बनवाने की परम्परा भारत और पश्चिम एशिया दोनों स्थानों पर मिलती है, तथापि कुतुबमीनार कई दृष्टियों से अलग थी। इसकी प्रभावोत्पादकता इस बात में है कि इसमें छज्जें हैं, किन्तु वे मुख्य स्तम्भ से जुड़े हुए हैं। दीवारों में और ऊपर की मंजिलों में लाल और सफेद पत्थर का और संगमरमर का प्रयोग है। इसको देखकर पसलीदार इमारत का अभास होता है। खलजी काल में अनेक इमारतों का निर्माण हुआ। अलाउद्दीन ने सीरी में अपनी राजधानी बनायी, जो कुतुब से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर है। दुर्भाग्य से इस शहर का अब कुछ भी शेष नहीं है। अलाउद्दीन की योजना कुतुब से दोगुनी ऊँचाई का मीनार बनाने की थी, लेकिन उसको पूरा करने से पहले ही उसकी मृत्यु हो गई। उसने कुतुब के साथ एक प्रवेश द्वार का निर्माण करवाया। यह अलाई दरवाजा कहलाता है और इसकी मेहराबों में अद्भुत संतुलन है। इस पर एक गुम्बद भी है। जिसके निर्माण में पहली बार सही व वैज्ञानिक विधि का प्रयोग किया गया था। अतः यह स्पष्ट है कि उस काल तक भारतीय कारीगारों ने मेहराब और गुम्बद बनाने की वैज्ञानिक विधि को आत्मसात कर लिया था। तुगलक काल में भी, जो कि दिल्ली सल्तन के चरमोत्कर्ष का काल भी है और उसके विघटन का पहला बिन्दु भी, अनेक इमारतों का निर्माण हुआ। गयासुद्दीन और मुहम्मद तुगलक ने तुगलकाबाद में अनेक महलों और किलों का निर्माण करवाया। यमुना के जल को रोककर उसके चारों ओर एक विशाल झील का निर्माण किया गया। गयासुद्दीन का मकबरा एक नयी स्थापत्य शैली की ओर संकेत करता है। एक अच्छी गगन रेखा व ऊँचाई का आभास देने के लिए इमारत को एक ऊँचे चबूतरे पर बनाया गया और उसके ऊपर संगमरमर का गुम्बद बनाया गया। तुगलक स्थापत्य शैली की एक महत्वपूर्ण विशेषता ढलुवा दीवार हैं, इसे ‘‘सलामी’’ कहा जाता है। इस निर्माण शैली के प्रयोग से इमारत के मजबूत और ठोस होने का आभास मिलता है। लेकिन फिरोज तुगलक द्वारा बनवायी गयी इमारतों में ‘‘सलामी’’ का प्रयोग नहीं मिलता। तुगलक स्थापत्य की दूसरी विशेषता मेहराब द्वारा प्रकोष्ठ, लिन्टल और शहतीर के सिद्धान्तों का सायास प्रयोग है। फिरोज तुगलक की इमारतों में उस शैली का प्रयोग बहुतायात से मिलता है। हौज खास इस शैली का उदाहरण है। इसे आमोद-प्रमोद के लिए बनवाया गया था और जिसके चारों ओर विकास झील थी। इसकी एक मंजिल में यदि मेहराबों का प्रयोग है, तो दूसरी में शहतीरों और लिंटस का। फिरोज के नये किले की जिसे अब कोटला कहा जाता है, की कुछ इमारतों में भी इस शैली का प्रयोग हुआ है। तुगलक शासक अपनी इमारतों में मँहगा लाल पत्थर इस्तेमाल नहीं करते थे, बल्कि वे सस्ता आसानी से उपलब्ध मटमौला पत्थर लगाते थे। इस प्रकार के पत्थर को तराशना आसान नहीं था, इसलिए तुगलक-कालीन इमारतों में बहुत कम अलंकरण मिलता है। लेकिन फिरोज की सभी इमारतों में अलंकरण के लिए कमल के नमूने का प्रयोग हुआ है। इस काल में अनेक सुन्दर मस्जिदों का भी निर्माण हुआ यहाँ उन सब का वर्णन करना संभव नहीं है। किन्तु एक तथ्य उल्लेखनीय है कि भारत में उस काल तक स्थापत्य की एक स्वतन्त्र शैली का विकास हो चुका था। जिसमें स्थानीय शिल्प और तुर्क शिल्प का मिश्रण था। लोदियों ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया। उनकी इमारतों में मेहराब तथा शहतीर और लिंटन, दोनों का प्रयोग हुआ है। इसमें राजस्थानी गुजराती शैली के छज्जों, मण्डपों और गुफाओं के प्रतीकों का प्रयोग भी मिलता है। लोदियों ने एक और शैली का भी प्रयोग किया। वह भी इमारतों को विशेषतः मकबरों को ऊँचे चबूतरों पर बनाया ताकि वे बड़ी और ऊँची लगें। कुछ मकबरे उद्यानों के मध्य में बनाये गये हैं। दिल्ली में लोदी उद्यान इसका सुन्दर उदाहरण है। कुछ मकबरे अष्टकोणी बनाये गये। इनमें से कुछ विशेषताओं को बाद में मुगलों ने भी अपनाया। शहजहाँ द्वारा निर्मित ताज महल में इस शैली का चरम विकास परिलक्षित किया जा सकता है। दिल्ली सल्तनत का विघटन होने के समय तक भारत के अनेक भागों में फैले राज्यों में अपनी-अपनी विशिष्ट स्थापत्य शैलियों का विकास भी हो चुका था। इसमें से अधिकांश पर स्थानीय शैलियों की स्पष्ट छाप है। जैसा कि हम देख चुके हैं कि बंगाल, गुजरात, मालवा और दक्षिण इत्यादि में ऐसा ही हुआ। इस प्रकार चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दी में देश के विभिन्न भागों में स्वतन्त्र शैलियों का विकास हुआ तथा अनेकानेक इमारतों का निर्माण हुआ। तुगलकों के शासन काल में दिल्ली में विकसित स्थापत्य शैली को विभिन्न क्षेत्रीय राज्यों में अपनाया गया और उसमें परिवर्तन भी किए गए। धार्मिक विचार और विश्वासउत्तर-भारत में जब तुर्कों ने अपना साम्राज्य स्थापित किया, तब इस्लाम भारत के लिए नया नहीं था। सिन्ध और पंजाब में इस्लाम का प्रभाव क्रमशः आठवीं व दसवीं शताब्दी में ही स्थापित हो गया था। अरब यात्री भी आठवीं व दसवीं शताब्दी के बीच केरल में बस गये थे। उस काल में अरब यात्री और सूफ़ी सारे देश में भ्रमण करते थे। पश्चिम-एशिया के लोग भी अल्बेरूनी की पुस्तक, किताब-उल-हिन्द और अन्य पुस्तकों के माध्यम से हिन्दू दर्शन और विश्वासों से परिचित हो चुके थे। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, उस समय तक बौद्ध लोक कथाओं, भारतीय आख्यान तथा उपदेशप्रद पशुकथाएँ, ज्योतिष शास्त्र और चिकित्सा शास्त्र पर अनेक ग्रन्थों का अरबी में अनुवाद हो चुका था। भारतीय योगियों की यात्राएँ भी उनके क्षेत्र में हुई थीं। इस्लाम पर बौद्ध-दर्शन और वेदान्त का प्रभाव विद्वानों के लिए वाद-विवाद का विषय रहा है। अफगानिस्तान और मध्य एशिया के कुछ हिस्सों में...... विशेष रूप से प्राचीन व्यापार मार्गों के आस-पास बौद्ध विहारों, स्तूपों और बुद्ध मूर्तियों के भग्नावशेष किसी समय में बौद्ध प्रभाव की ओर व्यापकता का संकेत करते हैं कि इस्लाम पर भारतीय दर्शन के प्रभाव की यात्रा के बारे में अनुमान कर पाना कठिन है। लेकिन इस बात में कोई सन्देह नहीं है कि इस्लाम के विकास काल में उस पर यूनानी और भारतीय दर्शनों का अलग-अलग अनुपातों में निश्चित प्रभाव पड़ा था। इन विचारों ने सूफी मत के विकास की पृष्ठ भूमि तैयार की। बारहवीं शताब्दी के बाद भारत में पाँव जमाने के पश्चात् सूफी मत ने हिन्दू और मुसलमानों के लिए सामान्य मंच उपलब्ध कराया। लेकिन कुछ विद्वानों का मत है कि यौगिक क्रियाओं सहित अनेक कर्मकाण्डों को आरम्भिक सूफियों द्वारा अपने तंत्र में सम्मिलित करने के बावजूद उनके सैद्धान्तिक आदर्शों का आधार मूलतः इस्लाम ही रहा।सूफी मतइस्लामी इतिहास में दसवीं शताब्दी का अनेक कारणों से महत्व है। इसी समय अब्बासी खिलाफत के अवशेषों से तुर्कों का उदय हुआ और इसी काल में दर्शन और विश्वासों में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। दर्शन के क्षेत्र में इस समय मुताजिल, अथवा तर्क बुद्धिवादी दर्शन का आधिपत्य समाप्त हुआ और पुरातनवादी विचारधारा का जन्म हुआ जो कुरान और हदीस (हजरत मुहम्मद और उनके सहयोंगियों की परम्परा) पर आधारित थीं। इसी समय सूफी रहस्यवाद का जन्म हुआ। तर्क बुद्धिधारियों पर संशयवाद और नास्तिकता फैलाने का आरोप लगाया गया। विशेष रूप से तर्क दिया गया कि अद्वैतवादी दर्शन, जो ईश्वर और उसकी सृष्टि के मूल रूप से एक होने की बात करता है, इसलिए धर्मद्रोही है क्योंकि इससे सृष्टा और सृष्टि के मध्य का भेद समाप्त हो जाता है।‘परम्परावादियों’ की रचनाएँ इस्लामी कानून की चार विचारधाराओं में बँट गईं। इसमें से हनफी विचारधारा सबसे अधिक उदारवादी थी। इसे ही पूर्वी तुर्कों ने अपनाया और ये पूर्वी तुर्क ही कालान्तर में भारत आये। रहस्यवादियों का जन्म इस्लाम के अन्तर्गत बहुत पहले हो गया था। यही बाद में सूफी कहलाये। इनमें से अधिकांश ऐसे थे, जो महान भक्त थे और समृद्धि के भोंडे प्रदर्शन और इस्लामी साम्राज्य की स्थापना के बाद उत्पन्न नैतिक पतन के कारण दुखी थे। अतः इन सूफियों को राज्य से कोई सरोकर नहीं था। बाद में भी उनमें यह परम्परा जारी रही। महिला रहस्यवादी रबिया (मृत्यु दसवीं शताब्दी) जैसे प्रारम्भिक सूफियों ने ईश्वर और व्यक्ति के बीच प्रेम सम्बन्ध पर बहुत बल दिया। किन्तु उनकी सर्वेश्वरवादी दृष्टि के कारण उनमें और परम्परावादी तत्वों के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई। इन परम्परावादियों ने अफवाहों के बल पर मन्सूर को फाँसी लगवा दी। इसके बावजूद मुस्लिम जनता में रहस्यवादी विचारों का प्रसार बढ़ता रहा। अल-गज्जाली (मृत्यु 1127) ने, जिसे परम्परावादी तत्व और सूफी दोनों ही सम्मान की दृष्टि से देखते थे, रहस्यवाद और इस्लामी परम्परावाद के बीच मेल कराने का प्रयत्न किया। इसमें वह काफी सफल हुआ। उसने यह कहकर कि ईश्वर और उसके गुणों का ज्ञान तर्क से न होकर आत्मज्ञान से ही हो सकता है, तर्कबुद्धिवादी दर्शन को एक और धक्का पहुँचाया। इस प्रकार, दैवी पुस्तक कुरान रहस्यवादियों के लिए महत्वपूर्ण रही। इसी समय के आस-पास सूफी बारह वर्गों अथवा सिलसिलों में विभाजित हो गये। प्रत्येक ‘सिलसिला’’ का एक नेता होता था जो प्रमुख रहस्यवादी होता था और अपने शिष्यों के साथ ‘‘खानकाह’’ अर्थात् आश्रम में रहता था। सूफी विचारधारा में गुरु (पीर) और शिष्य (मुरीद) के बीच सम्बन्ध का महत्व बहुत अधिक था। प्रत्येक पीर अपना उत्तराधिकारी (वलि) नियुक्त करता था, जो उसके बाद काम को आगे बढ़ता था। कुछ विद्वान कभी-कभी सूफियों की आश्रम व्यवस्था, पश्चाताप, व्रत और प्राणायाम जैसी क्रियाओं के स्रोत, बौद्ध और हिन्दू यौगिक पद्धति में ढूँढ़ते हैं। इस्लाम के उदय से पूर्व बौद्ध धर्म मध्य एशिया में फैला हुआ था और बुद्ध के सन्त होने की कथाएँ इस्लामी कथाओं में भी सम्मिलित हो गई थीं। इस्लाम के उदय के पश्चात् भी योगी पश्चिमी एशिया में जाते रहे। संस्कृत की योग पर पुस्तक ‘‘अमृतकुण्ड’’ का फारसी में अनुवाद भी हुआ। अतः यह स्पष्ट है कि हिन्दू और बौद्ध कर्मकाण्डों और रीतियों को सूफियों ने भारत आने से पहले ही आत्मसात् कर लिया था। लेकिन यह विवाद का विषय ही है कि क्या बौद्ध कर्मकाण्डों और विशेष रूप से वेदान्त दर्शन ने सूफी मत को अधिक प्रभवित किया है। दर्शन की उत्पत्ति का मूल बिन्दु खोजना बहुत कठिन होता है। सूफी सन्त और कई आधुनिक विचारक सूफी दर्शन का मूल ‘‘कुरान’’ में ही ढूँढ़ते हैं। महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि दर्शनों का मूल कहाँ है, बल्कि यह कि सूफियों तथा हिन्दू योगियों और रहस्यवादियों के बीच प्रकृति, ईश्वर, आत्मा और पदार्थ के सम्बन्ध में विचारों में काफी समानता है और यही बात पारम्परिक सहनशीलता और एक-दूसरे के सिद्धान्तों को समझ सकने की बात को स्थापित करती है। सूफी मत के मानवतावाद को तत्कालीन प्रसिद्ध फारसी शायर, सनाइ ने बहुत सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया है - ‘‘आस्तिकता और नास्तिकता दोनों उसकी ओर दौड़ रहे हैं और (एक साथ) उद्घोषणा करते हैं ‘‘वह एक है, कोई नहीं बाँटता उसका राज्य।‘‘ सूफी सिलसिलें मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित है - पहला है ‘‘बा-शरा’’ अर्थात् वे जो इस्लामी-विधान (शरा) को मानकर चलते हैं और दूसरा ‘बे-शरा’’ अर्थात् वे जो (शरा) से बँधे हुए नहीं हैं। भारत में दोनों सिलसिले मिलते हैं। ‘‘बे-शरा’’ अधिकतर घुमक्कड़ सूफी सन्त ही होते थे। यद्यपि इन सूफी सन्तों ने अपने मत नहीं चलाये, किन्तु उनमें कुछ जनता में प्रसिद्ध हो गये और उन्हें हिन्दू और मुसलमान दोनों समान रूप से आदर देते थे। चिश्ती और सुहरवर्दी सिलसिले‘‘बा-शरा’’ सिलसिलों में से केवल दो ही उत्तर भारत में अधिक प्रचलित हुए और तेरहवीं तथा चौदहवीं शताब्दी में उनके अनुयायियों की संख्या भी बहुत बढ़ी। ये दो सिलसिले थे चिश्ती और सुहरवर्दी। चिश्ती सिलसिले की भारत में स्थापना ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती ने की थी, जो 1192 में पृथ्वीराज चौहान की पराजय और मृत्यु के कुछ समय बाद भारत आये थे। कुछ समय तो लाहौर और दिल्ली में रहने के बाद वे अजमेर जाकर बस गये, जो उस समय एक महत्वपूर्ण राजनीतिक केन्द्र था और जहाँ मुसलमान काफी संख्या में थे। उनकी गतिविधियों का कोई प्रामाणिक अभिलेख उपलब्ध नहीं है। उन्होने कोई पुस्तक नहीं लिखी। किन्तु ऐसा लगता है कि उनके उत्तराधिकारियों के साथ-साथ उनकी प्रसिद्धि भी बढ़ती गई। शेख मुइनुद्दीन (मृत्यु 1235) के श्ष्यि थे बख्तियार काकी और उनके शिष्य हुए फरीद-उद-दीन गज-ए-शकर। फरीद-उद-दीन ने हाँसी (आधुनिक हरियाणा) और अजोधन (आधुनिक पंजाब) को अपना कार्य क्षेत्र बनाया। उनका दिल्ली में भी बहुत मान था। वे जब भी दिल्ली आते थे, लोग बहुत बड़ी संख्या में उनकी सेवा में उपस्थित होते थे। उनका दृष्टिकोण इतना विशाल और मानवीय था कि उनका कुछ काव्य बाद में सिक्खों और धर्म-ग्रन्थ ‘‘आदिग्रन्थ’’ में भी सम्मिलित किया गया। चिश्ती सन्तों में सबसे प्रसिद्ध सन्त हुए है। निजामुद्दीन औलिया और नसीरुद्दीन चिराग-ए-दिल्ली। ये सन्त जनता के निम्न वर्गों से जिनमें हिन्दू भी शामिल थे, मुक्त रूप से मिलते-जुलते थे। उनका जीवन बहुत पवित्र और सीधा-साधा था और वे लोगों से उनकी जुबान हिन्दवी या हिन्दी मे बातचीत करते थे। वे धर्म-परिवर्तन कराने में विश्वास नहीं रखते थे, यद्यपि बाद में बहुत से परिवारों और वर्गों ने इन सन्तों की सद्भावना के कारण धर्म परिवर्तन कर लिया था। सूफी सन्तों ने अपने प्रवचनों में ईश्वर की निकटता का अभास उत्पन्न करने के लिए गीत-संगीत की पद्धति अपनायी, जिसे ‘समा’ कहा जाता है। इससे वे और प्रसिद्ध हुए। इसके अतिरिक्त वे अक्सर प्रवचन देने के लिए हिन्दी काव्य का प्रयोग करते थे, ताकि श्रोताओं पर अधिक प्रभाव पड़े। निजामुद्दीन औलिया ने योग की प्राणयाम की पद्धति इस हद तक अपनायी कि उसे योगी सिद्ध कहने लगे।चौदहवीं शताब्दी के मध्य में नसीरुद्दीन चिराग-ए-दिल्ली की मृत्यु के पश्चात् चिश्ती दिल्ली में उतने प्रभावशाली नहीं रहे। परिणामतः चिश्ती सन्त इधर-उधर फैल गये और पूर्वी और दक्षिणी भारत में अपना सन्देश फैलाने लगे। सुहरवर्दी सिलसिला भी उसी समय भारत में प्रचलित हुआ। लेकिन उसका कार्यक्षेत्र मुख्यतः पंजाब और मुल्तान रहा। इस मत के सर्वाधिक प्रसिद्ध सन्त शेख शहाबुद्दीन सुहरवर्दी और हमीद-उद-दीन नागौरी हुए हैं। चिश्तियों की भाँति सुहरवर्दी सन्त फक्कड़ जीवन व्यतीत करने में विश्वास नहीं करते थे। वे राज्य की सेवा स्वीकार करते थे। उनमें से कुछ धर्म-विभाग के उच्च पदाधिकारी भी थे। जबकि चिश्ती शासन की राजनीति से दूर रहते थे और शासकों और सरकारों की संगति से बचते थे। परन्तु दोनों ने ही जनता के सिलसिलों में विभिन्न वर्गों में जनमत बनाकर उनमें एक साथ रहने की भावना उत्पन्न करके शासकों की सहायता की। भक्ति आन्दोलनतुर्कों के भारत आगमन से काफी पहले से ही यहाँ एक भक्ति-आन्दोलन चल रहा था, जिसने भक्ति और ईश्वर के बीच रहस्यवादी सम्बन्ध को बल देने का प्रयत्न किया था। यद्यपि भक्ति के बीज वेदों में ही ढूँढे जा सकते हैं। किन्तु प्रारंभ में इस पर इतना बल नहीं दिया गया था। ऐसा प्रतीत होता है कि बौद्ध मत के प्रसार के समान्तर ही व्यक्तिगत ईश्वर की उपासना के विचार की उत्पत्ति हुई है। ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों में महायान बौद्धों ने बुद्ध के अवलोकित रूप की पूजा प्रारंभ कर दी थी। विष्णु पूजा का प्रचलन भी इसके साथ-साथ हुआ। गुप्त काल में ‘‘रामायण’’ और ‘‘महाभारत’’ जैसी पवित्र-पुस्तकों को फिर से लिखा गया तो ज्ञान और कर्म के साथ-साथ मुक्ति को भी शक्ति का एक मार्ग स्वीकार कर लिया गया।परन्तु भक्ति आन्दोलन का वास्तविक अर्थों में विकास सातवीं से बारहवीं शताब्दी के मध्य दक्षिण भारत में ही हुआ। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, शैव नयनार और वैष्णव अलवार जैनियों और बौद्धों के अपरिग्रह को अस्वीकार कर ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत भक्ति को ही मुक्ति का मार्ग बताते थे। वे वर्ण और जाति-भेद को भी अस्वीकार करते थे। उन्होंने प्रेम और व्यक्तिगत ईश्वर-भक्ति का संदेश समस्त दक्षिण भारत में स्थानीय भाषाओं का प्रयोग करके पहुँचाया। यद्यपि दक्षिण और उत्तर भारत के मध्य सम्पर्क के अनेक सूत्र थे, फिर भी दक्षिण से उत्तर भारत तक भक्ति-आन्दोलन के प्रसार मे काफी समय लगा। यह आश्चर्यजनक है कि जिन कारणों से नयनार और अलवार भक्त दक्षिण में जल्दी ही प्रसिद्ध हो गये, उन्हीं कारणों से अन्य क्षेत्रों में उनकी प्रसिद्धि सीमित रहीं, इसका कारण उनके द्वारा स्थानीय भाषाओं में काव्य-रचना करना और उपदेश देना था। उस काल तक संस्कृत ही विचार सम्प्रेषण का माध्यम थी। उत्तर में सन्त और विचारक दोनों ही भक्ति-दर्शन लाये। इनमें कुछ का उल्लेख करना उचित होगा। महाराष्ट्र के सन्त नामदेव चौदहवीं शताब्दी के पूर्वान्ह में हुए थे और रामानन्द का समय चौदहवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध और पन्द्रहवीं शताब्दी के पहले 25 वर्षों तक माना जाता है। नामदेव एक दर्जी था और सन्त बनने से पहले डाकाजनी करता था। उसका काव्य, जो मराठी भाषा में है, ईश्वर के प्रति गहरे प्रेम और भक्ति को व्यक्त करता है। कहा जाता है कि नामदेव ने दूर-दूर तक यात्रा की थी और दिल्ली में सूफी सन्तों के साथ विचार-विमर्श किया था। रामानन्द रामानुज के शिष्य थे। उनका जन्म प्रयाग (इलाहाबाद) में हुआ था और वे प्रयाग तथा बनारस में रहते थे। उन्होंने विष्णु के स्थान पर राम की भक्ति आरंभ की। इसके अतिरिक्त उन्होंने चारों वर्णों को भक्ति का उपदेश दिया और निम्न वर्ण के लोगों के साथ खान-पान पर निषेध का विरोध किया। उनके शिष्यों में सब जातियों के लोग थे। इनमें अनेक शूद्र भी थे। इनके शिष्यों में से रविदास चमार थे, कबीर जुलाहे थे, सेना नाई थे और सधना कसाई थे। नामदेव भी शिष्यों के चुनाव में उदारता से काम लेते थे। इन सन्तों द्वारा फैलाये गये बीज उपजाऊ भूमि पर पड़े थे। राजपूत राजाओं की पराजय और तुर्कों की सल्तनत स्थापित हो जाने के बाद ब्राह्मणों का आदर और उनकी शक्ति कम हो गई थी। परिणामतः नाथ पंथ जैसे आन्दोलन, जो वर्ण-व्यवस्था और ब्राह्मणों के श्रेष्ठत्व को चुनौती देते थे, पनपने लगे और उन्हें लोकप्रियता मिली। इन आन्दोलनों की विचार धारा सूफी सन्तों द्वारा प्रचारित इस्लाम में समानता और भ्रातृत्व के विचारों के समान्तर थे। जन सामान्य धर्म प्राचीन रूप से संतुष्ट नहीं था। वे ऐसा धर्म चाहते थे जो उनके तर्क और भावना दोनों पर खरे उतरे। इन्हीं कारणों से पन्द्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में उत्तर भारत में भक्ति-आन्दोलन लोकप्रिय होता चला गया। जो लोग तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के तीव्र आलोचक थे और हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षपाती थे उनमें से कबीर और नानक का योगदान सबसे अधिक है। कबीर के जन्म और बचपन के विषय में निश्चय से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। लोक श्रुतियों के अनुसर वे एक विधवा ब्राह्मणी के पुत्र थे, जिसने उन्हें तालाब पर छोड़ दिया था और उनका पालन-पोषण एक जुलाहे ने किया। उसने अपने पालक का व्यवसाय सीख लिया। लेकिन अपने काशी-प्रवास के दौरान कबीर हिन्दू और मुस्लिम सन्तों के सम्पर्क में आये। कबीर ईश्वर के एक होने पर बल देते हैं। ईश्वर को उन्होंने राम, हरि, गोविन्द, अल्लाह, साँईं, साहिब आदि अनेक नामों से पुकारा है। उन्होंने मूर्ति-पूजा, तीर्थ यात्रा, पवित्र नदी स्नान, नमाज जैसे कर्मकाण्डों का तीव्र विरोध किया। वे साधु जीवन अपनाने के लिए गृहस्थी की सामान्य जीवन पद्धति त्यागने को भी अनावश्यक मानते थे। यद्यपि कबीर यौगिक क्रियाओं से परिचित थे, फिर भी वे हठयोग और पुस्तकीय ज्ञान को वास्तविक ज्ञान के लिए आवश्यक नहीं समझते थे। आधुनिक इतिहासकार डॉ. ताराचन्द्र कहते हैं कि ‘‘कबीर का लक्ष्य प्रेम के धर्म का प्रचार था, जो सब वर्णों और जातियों में एकता स्थापित कर सकें। उन्होंने हिन्दू और इस्लाम, दोनों धर्मों के उन तत्वों को अस्वीकार किया जो इस भावना के विरोधी थे, और जो व्यक्ति के वास्तविक आध्यात्मिक मंगल में महत्वपूर्ण नहीं रहे थे।’’ सिक्ख धर्म के प्रणेता गुरु नानक 1469 में रावी तट पर स्थित तलवंडी (जिसे अब ननकाना साहिब कहा जाता है) के एक खत्री परिवार में पैदा हुए थे, उनका विवाह बाल्यावस्था में ही हो गया था और उन्हें पिता के व्यवसाय लेखा-जोखा तैयार करने में प्रशिक्षित करने के लिए फारसी की शिक्षा दी गई थी। किन्तु नानक का झुकाव अध्यात्मवाद की ओर था और उन्हें साधु-सन्तों की संगति अच्छी लगती थी। कुछ समय बाद उन्हें अध्यात्मिक दृष्टि मिली और उन्होंने सन्यास ग्रहण कर लिया। वे काव्य रचना करते थे और रबाब के संगीत के साथ गाया करते थे। सारंगी उनका स्वामीभक्त शिष्य मरदाना बजाया करता था। कहा जाता है कि नानक ने सारे भारत और दक्षिण में श्रीलंका तथा पश्चिमी में मक्का और मदीना का भ्रमण किया। बड़ी संख्या में लोग उनकी ओर आकृष्ट हुए और 1538 में उनकी मृत्यु से पूर्व ही उनका नाम दूर-दूर तक फैल गया। कबीर की भाँति नानक ने भी एकेश्वरवाद पर बल दिया और कहा कि उसके स्मरण और उसके प्रति भक्ति और प्रेम से ही मुक्ति सम्भव है, इसके लिए वर्ण, जाति और वर्ग का कोई भेद नहीं है। लेकिन, नानक ईश्वर की निकटता प्राप्त करने के लिए व्यवहार और चरित्र की पवित्रता पर बहुत बल देते थे। मार्ग दर्शन के लिए वे गुरु की अनिवार्यता को भी पहली शर्त मानते थे। कबीर की भाँति वे भी मूर्ति पूजा, तीर्थ यात्रा और धार्मिक आडम्बरों के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने मध्यम मार्ग अपनाने पर बल दिया, जिस पर चल कर गृहस्थ धर्म का पालन भी हो सकता है और आध्यात्मिक जीवन की अपनाया जा सकता है। नानक का लक्ष्य किसी नये धर्म की स्थापना करना नहीं था। उनका उदारवादी दृष्टि कोण शान्ति, सद्भावना और भाईचारा स्थापित करने व इस प्रकार हिन्दू और मुसलमानों के बीच खाई पाटने का लक्ष्य लेकर था। यही उद्देश्य कबीर का भी था। विद्वानों ने इस विषय में अनेक विचार प्रस्तुत किए हैं कि उनके विचारों का हिन्दू और मुसलमानों पर काफी प्रभाव पड़ा। इस बात के लिए तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं कि धर्म का पुराना स्वरूप लगभग अपरिवर्तित रहा। न ही वर्ण व्यवस्था को तोड़ा जा सका। फिर धीरे-धीरे कबीर का नाम एक नये पंथ में सिमट कर रह गया। लेकिन कबीर और नानक के लक्ष्यों की महानता को एक उदार दृष्टि से देखना चाहिए। उन्होंने एक ऐसा जनमत तैयार किया, जो शताब्दियों तक काम करता रहा। यह भली-भाँति विदित है कि अकबर की धार्मिक और राजनीतिक नीतियों में इन दो महान सन्तों के उपदेशों को लक्षित किया जा सकता है। इन नीतियों पर चलने वला अकबर अकेला ही नहीं था। लेकिन, हमें यह आशा भी नहीं करनी चाहिए, कि दोनों मुख्य धर्मों हिन्दू और इस्लाम के परम्परावादी तत्वों ने बिना किसी संघर्ष के हथियार डाल दिये होंगे। जैसा कि हम आगे देखेंगे यह पराम्परावादी तत्व पुराने विश्वासों की आड़ में बचाव के लिए एकत्रित हुए और नयी चुनौतियों का सामना करने के लिए उन्होंने उसे नया स्वर दिया। इन दो विरोधी धाराओं, जिनमें से एक उदार और असाम्प्रदायिक थी और दूसरी पुरातन पंथी और परम्परावादी के बीच का संघर्ष सोलहवीं, सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दियों में बुद्धिवादी और धार्मिक मतभेदों के केन्द्र में रहा। इसी अविरल संघर्ष से यह पता चलता है कि जिन विचारों और अवधारणाओं का नानक, कबीर और उन्हीं के समान अन्य विचारकों ने जनता में प्रचार किया उनका महत्व किसी भी दृष्टि से कम नहीं है। जन सामान्य की विचार धाराओं पर उनका महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। वैष्णव आन्दोलनकबीर और नानक के नेतृत्व में असाम्प्रदायिक आन्दोलन के अतिरिक्त उत्तर भारत में विष्णु के दो अवतारों राम और कृष्ण के प्रति भक्ति-भावना को लेकर भक्ति-आन्दोलन भी चला। कृष्ण की बाल-लीला और गोकुल की गोपियों और विशेषतः राधा के साथ रासलीला भक्त-कवियों की काव्य रचना का विषय बन गया। ये भक्त कवि 15वीं और 16वीं शताब्दी के आरम्भ में हुए। इसे आत्मा और परमात्मा के बीच प्रेम के अनेक रूपों के प्रतीक के रूप में उन्होंने प्रयुक्त किया। प्रारम्भिक सूफियों की भाँति ही चैतन्य ने संगीत मण्डलियाँ जोड़ीं और कीर्तन को आध्यात्मिक अनुभूति के लिए प्रयुक्त किया। जिसमें ईश्वर का नाम लेने से वाह्य संसार की सुध नहीं रहती और इस प्रकार ईश्वर की जिसे वे हरि कहते थे, उपस्थिति का आनन्द उठाया जा सकता है। यह उपासना सभी के द्वारा सम्भव है व जाति और वर्ण के भेद के परे है। गुजरात के नरसिंह मेहता, राजस्थान की मीरा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सूरदास और बंगाल तथा उड़ीसा के चैतन्य की रचनाओं में गायात्मकता तथा प्रेम की उन अद्भूत ऊँचाईयों को परिलक्षित किया जा सकता है जहाँ किसी प्रकार का बन्धन नहीं था और जो वर्ण और जाति की सीमाओं से परे था। इन सन्तों के पक्ष में जाति और धर्म का भेदभाव नहीं था। यह तथ्य विशेष रूप से चैतन्य के जीवन से स्पष्ट होता है। चैतन्य का जन्म नदिया में हुआ था। वहीं उनकी शिक्षा हुई। नदिया उस समय वेदान्तिक तर्कवाद का प्रमुख केन्द्र था लेकिन 22 साल की आयु में चैतन्य की जीवन की धारा बदल गई। वे गया गये थे और वहीं उन्होंने एक वैरागी से कृष्ण-भक्ति की दीक्षा ली। वे ईश्वर भक्ति के गहरे नशे में खो गये और निरन्तर कृष्ण का नाम जपने लगे। चैतन्य ने भारत की विस्तृत यात्रा की। वे वृन्दावन भी गये जहाँ उन्होंने कृष्ण भक्ति सम्प्रदाय को पुनर्स्थापित किया। उनका अधिकांश जीवन गया में ही व्यतीत हुआ। उनका जनता पर विशेष रूप से पूर्वी भारत में असाधारण प्रभाव था और उनके असंख्य अनुयायी थे। इनमें मुसलमान और निम्न जातियों के लोग भी शामिल थे। चैतन्य ने धार्मिक ग्रन्थों तथा मूर्तिपूजा का विरोध नहीं किया किन्तु उनको परम्परावादी नहीं माना जा सकता। उपरोक्त सभी भक्त कवि मानवतावादी थे तथा उन्होंने हिन्दू धर्म में रहकर ही अपना प्रचार किया। उनके दार्शनिक सिद्धान्त वेदान्त के अद्धैतवाद की ही शाखाएँ थीं, जो ईश्वर और उसकी सृष्टि को एक होने पर ही बल देता है। वेदान्त दर्शन पर अनेक विचारकों ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए थे, किन्तु भक्त कवियों को सबसे अधिक प्रभावित करने वाले वैदान्तिक संभवतः बल्लभ थे। बल्लभ तेलंग ब्राह्मम थे, उनका समय पन्द्रहवीं शताब्दी का अन्त और सोलहवीं शताब्दी का प्रारंभ माना जाता है।इन भक्त-कवियों का दृष्टिकोण मानवीय था। उन्होंने उदारतम मानवीय भावनाओं पर बल दिया। ये भावनाएँ थीं प्रत्येक रूप में प्रेम और सुन्दरता। अन्य असाम्प्रदायिकों की भाँति ये भक्ति-कवि भी वर्ण व्यवस्था को भेदने में असफल रहे। फिर भी, वे उसे कुछ ढीला करने में सफल हुए, जिससे एकता के लिए एक आधार तैयार हुआ, जिसे बहुत से लोग समझ सकते थे। भक्त-कवियों के मूल सिद्धान्तों को उस काल के सूफी कवियों और सन्तों ने काफी सीमा तक अभिव्यक्त किया है। पन्द्रहवी शताब्दी में महान अरब दार्शनिक इब्नेअल् अरबी के अद्धैतवादी विचार अनेक भारतीयों में प्रचलित हुए। परम्परावादी तत्वों में अरबी का घोर विरोध किया था और उसके अनुयायियों को इसलिए पीड़ित किया था क्योंकि अरबी ने कहा था कि सब जीव मूल रूप से एक हैं और प्रत्येक दैवी-पदार्थ इच्छा का परिणाम है। अतः उनके विचार में, सब धर्म समान हैं। अरबों की जीव-एकत्व का सिद्धान्त जिसे तौहीद-ए-वजूदी कहा जाता है, भारत में लोकप्रियता प्राप्त करता गया और अकबर से पहले ही वह सूफी मत की आधारशिला बन गया था। हिन्दू सन्तों और योगियों के साथ सम्पर्क के कारण सर्वेश्वरवाद का यह सिद्धान्त इसके लोकप्रिय होने में और भी सहायक हुआ। भारतीय सूफियों ने संस्कृत और हिन्दी में रूचि ली और उनमें से कुछ ने हिन्दी काव्य रचना भी की। मलिक मुहम्मद जायसी इसके उदाहरण हैं। वैष्णव सनतों के हिन्दी में लिखे भक्ति गीतों ने सूफियों को फारसी काव्य से ज्यादा प्रभावित किया। हिन्दी गीतों का प्रयोग इतना लोकप्रिय हो गया कि एक प्रमुख सूफी अब्दुल वहीद बिल-ग्रामी ने तो ‘‘हकायके-ए-हिन्दी’’ नाम की एक टीका लिखी जिसमें उसने ‘कृष्ण’, ‘मुरली’, ‘गोपी’, ‘राधा’, ‘यमुना’ आदि शब्दों को सूफियों की रहस्यवादी भाषा में समझने का प्रयत्न किया है। इस प्रकार पन्द्रहवीं शताब्दी और सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में भक्ति और सूफी कवियों ने प्रशंसनीय तरीके से एक ऐसा सामान्य मंच तैयार किया, जिस पर अनेक धर्मों, वर्णों और जातियों के लोग मिल सकते थे और एक-दूसरे को समझ सकते थे। अकबर के सिद्धान्तों और सब धर्मों की एकता या तौहीब के विचार की यही अनिवार्य पृष्ठभूमि थी। साहित्य और ललित कलाएँ (संस्कृत-साहित्य)इस काल में संस्कृत उच्च-विचारों के सम्प्रेषण और साहित्य का माध्यम बनी रही। वस्तुतः संस्कृत ग्रन्थों की विभिन्न विधाओं में विपुल मात्रा में रचना हुई। इन रचनाओं की संख्या सम्भवतः पूर्व कालों से भी अधिक थी। शंकराचार्य के अनुसरण में अद्वैत दर्शन पर रामानुज, माधव, वल्लभ इत्यादि की रचनाएँ प्रकाश में आती रहीं। उनके विचारों का जिस तेजी से प्रसार हुआ और उन पर देश के विभिन्न भागों में व्यापक रूप से विवेचना हुई, उससे यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि संस्कृत की उस काल में महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। मुस्लिम क्षेत्रों सहित देश के विभिन्न भागों में अनेक विशेष विद्यालय और अकादमियाँ थीं। इन विद्यालयों और अकादमियों के कामों में हस्तक्षेप नहीं किया जाता था, अतः वे पल्लवित होती रहीं। वास्तव में उनमें से अनेक ने कागज के आविष्कार का लाभ उठाया और अनेक प्राचीन ग्रन्थों का पुनरुत्पादन और प्रसार किया। यही कारण है कि ‘‘रामायण’’ और ‘‘महाभारत’’ के कई प्राचीनतम उपलब्ध संस्करण ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी के हैं।दर्शन शास्त्र के अतिरिक्त काव्य-नाट्य कला, चिकित्सा शास्त्र, ज्योतिष शास्त्र, संगीत आदि के क्षेत्र में भी रचनाएँ होती रहीं। बारहवीं से सोलहवीं शताब्दियों के बीच अनेक टीकाएँ और धर्मशास्त्र-सार लिखे गये। विज्ञानेश्वर का महान ‘‘मिताक्षर’’ भी, जो हिन्दू न्याय शास्त्र की दो प्रमुख विचारधाराओं में से एक है, बारहवीं शताब्दी से पहले का नहीं है। एक अन्य व्याख्याकार बिहार के चण्देश्वर हुए हैं, जो चौदहवीं शताब्दी के हैं। उस काल में अधिकांश ग्रन्थों की रचना दक्षिण में हुई। उसके बाद बंगाल, मिथिला और पश्चिम भारत का क्रम आता है। उस कार्य को हिन्दू शासकों का संरक्षण मिला। जैनों ने भी संस्कृत के विकास में योगदान दिया। हेमचन्द्र सूरि उनमें प्रमुख हैं। यह आश्चर्य का विषय है कि इन रचनाकारों ने अधिकांशतः भारत में मुसलमानों की उपस्थिति पर कोई ध्यान नहीं दिया। इस्लामी ग्रन्थों या फारसी साहित्य को संस्कृत में अनुदित करने का कोई प्रयास नहीं किया गया इस सम्बन्ध में संभवतः प्रसिद्ध फारसी-कवि जामी द्वारा रचित युसुफ और जुलेखा की प्रेम-कथा का अनुवाद ही अपवाद है। ऐसा वस्तुतः भारतीयों के संकीर्ण दृष्टिकोण के कारण ही था। जिसका उल्लेख अल्बेरुनी के द्वारा पहले ही किया जा चुका है। वास्तविकता का सामना करने के कारण ही उस काल का अधिकांश साहित्य पुनरावृत्ति है और उसमें नयी दृष्टि या मौलिकता का अभाव है। अरबी और फारसीहालाँकि मुसलमानों का अधिकांश साहित्य अरबी में लिखा गया था, जो पैगम्बर की भाषा थी और स्पेन से बगदाद तक साहित्य की भाषा भी थी, लेकिन भारत आने वाले तुर्कों पर फारसी भाषा का प्रभाव बड़ा गहरा था। फारसी दसवीं शताब्दी से ही मध्य एशिया की साहित्यिक और प्रशासकीय भाषा बन गयी थी। भारत में अरबी भाषा का प्रयोग इस्लामी विद्वानों और दार्शनिकों के छोटे से वर्ग तक ही सीमित रहा क्योंकि उस विषय का अधिकांश साहित्य अरबी में ही था। धीरे-धीरे इस्लामी विधान फारसी में भी तैयार किए गए। उसमें भारतीय विद्वानों की भी मदद ली गई। उनमें से अधिकांश व प्रसिद्ध सार फिरोज तुगलक के शासन काल में तैयार हुए। परन्तु अरबी में भी सार लिखे जाते रहे। उनमें से सबसे प्रसिद्ध ‘‘फतवा-ए-आलमगिरी’’ है, जो औरंगजेब के शासनकाल में विधिवेत्ताओं के एक दल ने तैयार किया था।दसवीं शताब्दी में तुर्कों के भारत-आगमन के साथ ही एक नयी भाषा फारसी आई। इसी समय ईरान और मध्य एशिया में फारसी का पुनरुत्थान शुरु हुआ था। फिरदौसी और सादी जैसे फारसी के महानतम कवियों का रचनाकाल दसवीं और चौदहवीं शताब्दी के मध्य ही है। तुर्कों ने शुरु से ही साहित्य और प्रशासन के लिए फारसी का इस्तेमाल किया। इस प्रकार, फ़ारसी के विकास के लिए लाहौर पहला केन्द्र बना। भारत में फारसी लेखकों की कुछ रचनाएँ ही अब उपलब्ध हैं। मसूद साद सलमान जैसे लेखकों की रचनाओं में हमें लाहौर के प्रति प्रेम और लगाव मिलता है। इस काल के सबसे अधिक उल्लेखनीय फारसी लेखक अमीर खुसरो हैं। पटियाली (पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बदायूँ के पास) में 1252 में जन्में अमीर खुसरो को भारतीय होने पर गर्व था। वह कहता है कि, ‘‘मैंने दो कारणों से हिन्दुस्तान की प्रशंसा की है। पहला कारण है हिन्दुस्तान मेरी जन्म भूमि और हमारा देश है। देश को प्यार करना महत्तवपूर्ण कर्तव्य है.......हिन्दुस्तान जन्नत की तरह है। इसकी आबोहवा खुरासान से भी बेहतर है....... सारा साल हराभरा और फूलों से भरा रहता है... यहाँ के ब्राह्मण अरस्तू की तरह विद्वान हैं और प्रत्येक क्षेत्र में अनेक विद्वान हैं..........‘‘ भारत के प्रति खुसरो का प्रेम इस बात की ओर संकेत करता है कि तुर्की शासक-वर्ग विदेशी शासक के रूप में व्यवहार करना नहीं चाहता था और उनके तथा भारतीयों के बीच एक सांस्कृतिक आदान-प्रदान की भूमि तैयार हो चुकी थी। खुसरो ने अनेक काव्यों की रचना की, जिनमें ऐतिहासिक प्रेमाख्यान भी है। उसने सभी काव्य शैलियों को लेकर प्रयोग किया और एक नयी फारसी शैली का निर्माण किया जो बाद में सबक-ए-हिन्दी या भारतीय शैली कहलायी। खुसरों ने हिन्दी भाषाओं की प्रशंसा की है। उसकी कुछ मुक्तक हिन्दी कविताएँ मिलती हैं, लेकिन हिन्दी काव्य ‘‘खालिक-बारी’’ जिसे खुसरो द्वारा रचित कहा जाता है, उसी नाम के परवर्ती किसी कवि की रचना जान पड़ती है। वह एक प्रवीण संगीतज्ञ भी था और धार्मिक संगीत सभाओं (समा) में भाग लेता था। इन सभाओं का आयोजन प्रसिद्ध सूफी सन्त निजामुद्दीन औलिया करते थे। कहा जाता है कि खुसरो ने अपने पीर निजामुद्दीन औलिया की मृत्यु (1325) का समाचार जानने के दूसरे ही दिन प्राण त्याग दिए। उसे उसी स्थान पर दफनाया गया। इस काल में भारत में काव्य के अलावा फारसी में इतिहास-लेखन की एक विशिष्ट शैली का भी विकास हुआ। इस काल में सर्वाधिक प्रसिद्ध इतिहासकार जियाउद्दीन बर्नी, अफीफ और इसामी हुए हैं। फारसी भाषा के माध्यम से भारत मध्य एशिया और ईरान के साथ घनिष्ट सांस्कृतिक सम्बन्ध बना सका। धीरे-धीरे फारसी सिफ्र प्रशासन और राजनयिक भाषा ही नहीं बनी रही बल्कि उच्च वर्गों और उनके मातहतों की भाषा बन गई। पहले यह उत्तर भारत में प्रशासकीय भाषा बनी। दिल्ली सल्तनत के विस्तार के साथ दक्षिण भारत में तथा देश के विभिन्न भागों में एवं मुस्लिम शासन स्थापित होने पर सारे देश में प्रशासकीय भाषा के रूप में प्रचलित हो गई। इस प्रकार संस्कृत और फारसी मुख्य रूप से सम्पर्क-भाषाओं का कार्य करती रही। साथ ही राजनीति, धर्म, दर्शन और साहित्य रचना का कार्य भी उन भाषाओं में होता रहा। पहले दोनों के मध्य बहुत आदान-प्रदान था। जिया नक्शबी (मृत्यु 1350) पहला व्यक्ति था जिसने संस्कृत कथाओं की एक श्रंखला का फारसी में अनुवाद किया था, जिसके अन्तर्गत एक तोता एक ऐसी विरहिणी नायिका को कहानी सुनाता है, जिसका पति यात्रा पर गया था। यह पुस्तक ‘‘तूती नामा’’ जिसकी रचना मुहम्मद तुगलक के समय हुई थी, बहुत लोकप्रिय हुई और फारसी से उसका तुर्की और अनेक यूरोपीय भाषाओं में भी अनुवाद हुआ। उसने प्राचीन भारतीय काम शास्त्र पर पुस्तक ‘कोक शास्त्र’ को भी फारसी में अनुदित किया। बाद में फिरोज शाह के समय में चिकित्सा और संगीत शास्त्र पर संस्कृत की पुस्तकों का फ़ारसी में अनुवाद हुआ। कश्मीर के सुल्तान जैन-उल्-आबेदीन ने प्रसिद्ध इतिहास-पुस्तक ‘‘राजतरंगिणी’’ तथा ‘‘महाभारत’’ का फारसी में अनुवाद करवाया। उसके संकेत पर चिकित्सा तथा संगीत शास्त्र पर भी संस्कृत पुस्तकों का अनुवाद किया गया। क्षेत्रीय भाषाएँइस काल में अनेक क्षेत्रीय भाषाओं में भी उच्च कोटि की रचनाएँ लिखी गईं। इनमें से कुछ भाषाओं, जैसे हिन्द, बंगाली और मराठी की उत्पत्ति आठवीं शताब्दी में हुई थी। तमिल आदि कुछ भाषाएँ अधिक प्राचीन है। चौहदहवीं शताब्दी के कवि अमीर खुसरो ने क्षेत्रीय भाषाओं का महत्व बताते हुए कहा था कि ‘‘ये जुबानें रोजमर्रा की जिन्दगी में बहुत लम्बे वक्त से इस्तेमाल की जाती रही हैं।’’इन भाषाओं का विकास और साहित्यिक भाषाओं के रूप में उनका प्रयोग मध्यकाल की विशेषता है। इसके कई कारण हैं। सम्भवतः ब्राह्मणों का महत्व कम हो जाने के कारण संस्कृत का महत्व भी कम हो गया था। भक्त-कवियों, द्वारा जन भाषा का प्रयोग निःसन्देह इन भाषाओं के विकास में महत्वपूर्ण कारण था। वस्तुतः देश के अनेक हिस्सों में सन्तों ने इन भाषाओं को साहित्यिक भाषा के रूप में ढालने का काम किया था। ऐसा लगता है कि तुर्की शासन की स्थापना के पूर्व के काल में कई क्षेत्रीय राज्यों में संस्कृत के साथ-साथ तमिल, कन्नड़, मराठी आदि का प्रयोग प्रशासन में किया जाता रहा होगा। यह परम्परा तुर्की शासन में भी चलती रही क्योंकि हिन्दी जानने वाले राजस्व लेखाकारों की दिल्ली सल्तनत में नियुक्ति के संकेत मिलते हैं। बाद में भी, दिल्ली सल्तनत के विघटन के उपरान्त हिन्दी फारसी के साथ-साथ कई क्षेत्रीय भाषाएँ राज्यों मे प्रशासकीय मामलात में प्रयुक्त होती रहीं। इसी प्रकार दक्षिण में विजयनगर साम्राज्य के संरक्षण में तेलुगू साहित्य पनपा। बहमनी साम्राज्य में मराठी प्रशासन की एक भाषा रही और बाद में बीजापुर के दरबार की भाषा बनी। इन भाषाओं का समुचित विकास हो जाने के पश्चात् कुछ मुस्लिम शासकों ने भी इन्हें साहित्य-रचना के लिए संरक्षण दिया। उदाहरण के लिए बंगाल के नुसरत शाह ने ‘‘महाभारत’’ और ‘‘रामायण’’ का बंगाली भाषा में अनुवाद करवाया। उसी के संरक्षण में मलधर बसु ने ‘भागवत्’ का बंगाली में अनुवाद किया। नुसरत शाह द्वारा बंगाली कवियों को सरंक्षण देने के विषय में भी उल्लेख किया जा चुका है। सूफी संतों द्वारा अपनी संगीत-सभाओं ‘‘समा’‘ में हिन्दी भक्ति काव्य के प्रयोग की चर्चा भी की जा चुकी है। जौनपुर के मलिक मुहम्मद जायसी जैसे सूफी सन्तों ने हिन्दी में काव्य-रचना की और सूफी सिद्धांतों को इस रूप में प्रस्तुत किया कि सामान्य जनता उन्हें समझ सके। इन सूफी कवियों ने फारसी की मसनवी शैली को लोकप्रिय बनाया। ललित कलाएँपारस्परिक समझ और एकीकरण की प्रवृत्तियाँ केवल धार्मिक विश्वासों और कर्मकाण्डों, सभापत्य और साहित्य में ही नहीं मिलती, वरन् ललित कलाओं के क्षेत्रों विशेषतः संगीत में भी मिलती हैं। जब तुर्क भारत आये तो अपने साथ ईरान और मध्य एशिया में पल्लवित समृद्ध अरबी संगीत परम्परा भी लाये। उनके पास कई नये बाद्य थे, जैसे रबाब और सारंगी और उनकी एक विशिष्ट संगीत पद्धति थी। सम्भवतः बगदाद के खलीफा के दरबार में भारतीय संगीत और संगीतकारों ने वहाँ के संगीत के विकास पर अपना प्रभाव छोड़ा था। लेकिन दोनों के बीच विधिवत सम्पर्क सल्तनत के अन्तर्गत ही स्थापित हुआ। हम अमीर खुसरो का उल्लेख पहले ही कर चुके हैं। खुसरो को संगीत के सिद्धान्त और कला दोनों पतों की जानकारी के कारण नायक की उपाधि मिली थी। उसने ऐमान, गोरा, सनम, जैसे अनेक ईरानी अरबी रागों को प्रचलित किया। सितार के निर्माण का श्रेय भी खुसरो को दिया जाता है, लेकिन इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसी प्रकार तबले के निर्माण का श्रेय भी उसे प्रदान किया जाता है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि तबले का विकास सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध या अठारहवीं शताब्दी में ही हुआ।फिरोज के शासन में संगीत के एकीकरण की प्रक्रिया अनवरत चलती रही। इसी समय शास्त्रीय रचना ‘राग दर्पण’ का फारसी में अनुवाद हुआ। सूफी संतों के आश्रयों के साथ-साथ संगीत सभायें अब अमीरों के महलों में भी होने लगीं। जौनपुर का शासक सुल्तान हुसैन शर्की, संगीत को बहुत संरक्षण देता था। वहाँ के सूफी सन्त पीर बोधन को उस काल का दूसरे नम्बर का संगीतकार माना जाता है। एक और क्षेत्रीय राज्य, जहाँ संगीत का बहुत विकास हुआ, ग्वालियर था। राजा मानसिंह की संगीत में बहुत रुचि थी। उन्हीं के शासन में ‘मान-कौतुहल’ की रचना हुई थी, जिसमें मुस्लिमों द्वारा प्रचलित नयी संगीत पद्धतियाँ भी सम्मिलित की गई थीं। इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि उत्तर भारत और दक्षिण भारत की संगीत-पद्धतियों में अन्तर आना कब शुरू हुआ। किन्तु इसमें सन्देह नहीं कि यह अन्तर ईरानी, अरबी पद्धतियों, रागों और वाद्यों के कारण ही आया। कश्मीर में फारसी संगीत के अतिशय प्रभाव से एक सर्वथा नयी संगीत शैली का जन्म हुआ। जौनपुर-विजय के बाद सिकन्दर लोदी ने भी संगीत को व्यापक स्तर पर संरक्षण प्रदान किया। संगीत को संरक्षण प्रदान करने की परम्परा मुगल काल में भी चलती रही। | |||||||||
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