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मौर्योत्तर काल में शिल्प, व्यापार और नगर

शिल्प

   शकों, कुषाणों और सातवाहनों का (200 ई. पू.-200 ई.) और प्रथम तमिल राज्यों का युग प्राचीन भरत के शिल्प और वाणिज्य के इतिहास में चरम उत्कर्ष का काल था। इस काल में कलाओं और शिल्पों का विलक्षण विकास हुआ। इस काल के ग्रन्थों में हम शिल्पियों के जितने प्रकार पाते हैं उतने पहले के लेखों में नहीं पाते। मौर्यपूर्व काल के दीघनिकाय में लगभग चौबीस प्रकार के व्यवसायों का उल्लेख है तो इसी काल के महावस्तु में राजगीर में रहने वाले 36 प्रकार के व्यवसायों का उल्लेख है और फिर भी सूची अधूरी है। मिलिन्दपंहों या मिलिन्दप्रश्न में तो 75 व्यवसाय गिनाए गए हैं, जिनमें 60 विविध प्रकार के शिल्पों से सम्बद्ध हैं। साहित्यिक स्रोतों में तो शिल्पियों को अधिकतर नगरों से जोड़ा गया है, किन्तु कुछ उत्खननों से प्रकट होता है कि वे गाँवों में भी बसते थे। तेलंगाना स्थित करीमनगर के एक गाँव में बढ़ई, लोहार, सुनार, कुम्हार आदि अलग-अलग टोलों में रहते थे तथा कृषि-मजदूर तथा अन्य मजदूर एक दूसरे छोर पर बसते थे।
   आठ शिल्पी सोना, चाँदी, सीसा, टिन, ताँबा, पीतल, लोहा और रत्न के काम करते थे। पीतल, जस्ते, ऐंटीमनी और लाल आर्सेनिक के कई प्रभेदों का उल्लेख है। इससे खान और धातु के कौशल में भारी प्रगति और विशेषीकरण का पता चलता है। लोहा बनाने के तकनीकी ज्ञान में भारी प्रगति हुई। अनेक उत्खनन-स्थलों पर कुषाण और सातवाहन कालीन स्तरों में लौहशिल्प की वस्तुएँ अधिकाधिक संख्या में मिली हैं। परन्तु इस विषय में आन्ध्र प्रदेश का तेलंगाना सबसे अधिक समृद्ध प्रतीत होता है। इस क्षेत्र के करीमनगर और नालगोंडा जिलों में हथियारों के अलावा तराजू की डंडी, मूठवाले फावड़े और कुल्हाड़ियाँ, हँसिया, फाल, उस्तरा और करछुल आदि लोहे की वस्तुएँ मिली हैं। छुरी-काँटे सहित भारतीय लोहे और इस्पता का निर्यात अबीसीनियाई बन्दरगाहों को किया जाता था और पश्चिम एशिया में उनकी भारी प्रतिष्ठा थी।
   कपड़ा बनाने, रेशम बुनने और अस्त्रों एवं विलास की वस्तुओं के निर्माण में भी प्रगति हुई। मथुरा शाटक नाम एक विशेष प्रकार के वस्त्र के निर्माण का एक बड़ा केन्द्र हो गई थी। दक्षिण भारत के कई नगरों में रंगरेजी एक उन्नत शिल्प थी। तमिलनाडु में तिरूचिरापाल्ली नगर के उपान्तवर्ती उरैऊर में ईंटों का बना एक रंगाई का हौज मिला है। अरिकमेदु में भी इस तरह के हौज मिले हैं। ये हौज ईसा की पहली-तीसरी सदियों के हैं। इन क्षेत्रों में करघे पर कपड़ा बुनने का व्यवसाय बहुत प्रचलित था। कोल्हू के प्रचलन से तेल के उत्पादन में वृद्धि हुई। इस काल के अभिलेखों से ज्ञात होता है कि बुनकरों, सुनारों, रंगरेजों, धातुशिल्पियों, दन्तशिल्पियों, जौहरियों, मूर्तिकारों, मछुओं, लोहारों, गन्धियों ने बौद्ध भिक्षुओं के लिए गुहाएँ बनवाई तथा उन्हें स्तम्भ, पट्ट, कुंड आदि का दान किया। इन सब से प्रकट होता है कि उनके धन्धों में खूब बढ़त थी।
   विलास की वस्तुओं का उत्पादन करने वाले शिल्पों में हाथीदाँत का काम, शीशे का काम और मणिमाणिक्य बनाने का काम उल्लेखनीय है। शल्क-उद्योग भी उन्नत स्थिति में था। कुषाण परिक्षेत्र में खुदाई के क्रम में बहुत सी शिल्प वस्तुएँ निकली हैं। भारतीय दन्तशिल्प की वस्तुएँ अफगानिस्तान और रोम में भी मिली है। इनका सम्बन्ध दकन में सातवाहन स्थलों के उत्खनन में पाई गई दन्तशिल्प-वस्तुओं से जोड़ा जाता है। रोम की शीशे की वस्तुएँ तक्षशिला और अफगानिस्तान में मिलती हैं, लेकिन भारत ने शीशा ढालने की जानकारी ईसा सन् के आरम्भ में आकर प्राप्त की है और उसे चोटी पर पहुँचाया। इसी तरह मौयोत्तर स्तरों में रत्नतुल्य पत्थरों के मनके या मणियाँ बड़ी संख्या में मिलती है। इन्हीं स्तरों में शंख के बने मनके और कंगन भी पाए गए हैं। सिक्कों की ढलाई एक महत्वपूर्ण शिल्प थी और यह काल सोने, चाँदी, ताँबे, काँसे, सीसे और पोटीन के तरह-तरह के सिक्के बनाने के लिए मशहूर है। शिल्पी लोग नकली रोमन सिक्के भी बना लेते थे। सिक्का ढालने के कई तरह के साँचे उत्तर भारत और दकन दोनों जगह पाए गए हैं। सातवाहन स्तर के एक साँचे से पता लगता है कि इससे छह-छह सिक्के एक ही बार में निकल आते थे। इन नागर हस्तशिल्पों के साथ-साथ पकी मिट्टी की सुन्दर-सुन्दर मूर्तिकाएँ (टेराकोटा) भी बनती थी जो विशाल मात्रा में पाई गई हैं। ये लगभग सभी कुषाण और सातवाहन स्थलों में पाए गए हैं, किन्तु इस प्रसंग में नालगोंडा जिले के येल्लश्वरम का नाम विशेष रूप से लिया जा सकता है जहाँ मूर्तिकाएँ और उनके निर्माण के साँचे सबसे अधिक संख्या में मिले हैं। मूर्तिकाएँ और उनके साँचे हैदराबाद से लगभग 65 किलोमीटर की दूरी पर कोंडापुर में भी पाए गए हैं। मूर्तिकाएँ अधिकतर नगर निवासी उच्च वर्गों के लिए बनती थीं। यह गौर करने की बात है कि गुप्त काल और खासकर गुप्तोत्तर काल में नगरों के पतन के साथ ही मूर्तिकाएँ भी लुप्त-सी हो गईं।
   शिल्पी लोग आपस में संगठित होते थे, जिनके संगठन का नाम श्रेणी था। ईसा की दूसरी सदी में महाराष्ट्र में बौद्ध धर्मावलम्बी गृहस्थ उपासकों ने कुम्हारों, तेलियों और बुनकरों की श्रेणियों के पास धन जमा किया ताकि उससे बौद्ध भिक्षुओं को वस्त्र और अन्य आवश्यक वस्तुएँ दी जाएँ। इसी सदी में प्रतिदिन एक सौ ब्राह्मण भोजन कराने के लिए एक अधिपति ने आटा पीसने वालों की एक श्रेणी के पास अपनी मासिक आय से बचाकर धन जमा किया। विभिन्न ग्रन्थों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस काल के शिल्पियों की कम से कम चौबीस-पच्चीस श्रेणियाँ प्रचलित थीं। अभिलेखों से ज्ञात अधिकतर शिल्पी मथुरा क्षेत्र में तथा पश्चिमी दकन में जमे थे, जो पश्चिमी समुद्र तट की ओर जाने वाले व्यापार-मार्ग पर पड़ते हैं।
   इस काल की सबसे भारी आर्थिक घटना थी भारत और पूर्वी रोमन साम्राज्य के बीच फूलता-फलता व्यापार। आरम्भ में यह व्यापार अधिकतर स्थल-मार्ग से होता था। ईसापूर्व पहली सदी से शकों, पार्थियनों और कुषाणों के संचार के कारण स्थल-मार्ग से व्यापार करना संकटापन्न हो गया। यद्यपि ईरान के पार्थियन लोग भारत से लोहा और इस्पात का निर्यात करते थे, लेकिन वे ईरान के और भी पश्चिमी इलाकों के साथ भारत के व्यापार में बाधा डालते थे। परन्तु ईसा की पहली सदी से व्यापार मुख्यतः समुद्री मार्ग से होने लगा। लगता है कि ईसा सन् के आरम्भ के आसपास मानसून के रहस्य का पता लग गया, फलस्वरूप अब नाविक अरब सागर के पूर्वी तटों से उसके पश्चिमी तटों तक का सफर काफी कम समय में कर सकते थे। वे भारत के विभिन्न बन्दरगाहों पर आसानी से पहुँच सकते थे, जैसे पश्चिमी समुद्र तट पर भड़ौच और सोपारा, तथा पूर्वी तट पर अरिकमेदु और तामलिप्ति। इन सभी बन्दरगाहों में भड़ौच सबसे महत्वपूर्ण और उन्नतिशील था। वहाँ सातवाहन राज्य के उत्पादन तो पहुँचते ही थे, शक और कुषाण लोग पश्चिमतोत्तर सीमा प्रान्त से पश्चिमी समुद्र तट तक दो मार्गों से जाते थे। दोनों मार्ग तक्षशिला में मिलते थे और मध्य एशिया से गुजरने वाले रेशम मार्ग से भी जुड़े थे। पहला मार्ग उत्तर से सीधे दक्षिण की ओर जाता था, तक्षशिला को निम्न सिन्धु घाटी से जोड़ता था और वहाँ से भड़ौच चला गया था। दूसरा मार्ग, जो उत्तरापथ नाम से विदित है, अधिक चालू था। यह तक्षशिला से चलकर आधुनिक पंजाब से होते हुए यमुना के पश्चिम तट पहुँचता और यमुना का अनुसरण करते हुए दक्षिण की ओर मथुरा पहुँचता था। फिर मथुरा से मालवा के उज्जैन पहुँचकर वहाँ से पश्चिमी समुद्र तट पर भड़ौच जाता था। उज्जैन में आकर एक और मार्ग उससे मिलता था, जो इलाहाबाद के समीप कौशाम्बी से निकला था।

विदेश व्यापार

   भारत और रोम के बीच व्यापार तो भारी मात्रा में चला, लेकिन इस व्यापार में साधारण लोगों के रोजमर्रे के काम की चीजें शामिल नहीं थीं। बाजार में विलास की वस्तुएँ खूब चलती थीं, जिन्हें कभी-कभी अभिजातवर्गीय आवश्यकता की वस्तुएँ भी कहते हैं। रोम वालों ने सबसे पहले देश के सुदूर दक्षिणी हिस्से से व्यापार आरम्भ किया, इसीलिए उनके सबसे पहले के सिक्के तमिल राज्यों में मिले हैं, जो सातवाहन के राज्यक्षेत्र के बाहर है। रोम वाले मुख्यतः मसालों का आयात करते थे जिनके लिए दक्षिण भारत मशहूर था। वे मध्य और दक्षिण भारत से मलमल, मोती, रत्न और माणिक्य का आयात करते थे। लोहे की वस्तुएँ, खास कर बर्तन, रोमन साम्राज्य में भेजी जाने वाली महत्वपूर्ण वस्तुएँ थीं। मोती, हाथीदाँत, रत्न और पशु विलास की वस्तुएँ मानी जाती थीं, किन्तु पौधे और उसके सामान लोगों की धार्मिक, अंतिम संस्कार विषयक, पाक संबंधी और औषधीय आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। पाकशाला के बर्तन भी आयात में शामिल रहे होंगे। छुरी-काँटे का प्रयोग उच्चवर्ग के लोगों में शायद महत्वपूर्ण स्थान रखता होगा।
   भारत से सीधे भेजी जाने वाली वस्तुओं के अलावा कुछ वस्तुएँ चीन और मध्य एशिया से भारत आती और तब यहाँ रोमन साम्राज्य के पूर्वी भागों में भेजी जाती थीं। रेशम चीन से सीधे रोमन साम्राज्य को अफगानिस्तान और ईरान से गुजरने वाले रेशम-मार्ग से भेजा जाता था। लेकिन बाद में जब ईरान और उसके पड़ोस के क्षेत्रों में पार्थियनों का शासन हो गया तब इसमें कठिनाई पैदा हुई। अतः रेशम रास्ता बदलकर उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर भाग से होते हुए पश्चिमी भारत के बन्दरगाहों पर आने लगा। कभी-कभी चीन से रेशम भारत के पूर्वी समुद्र तट होते हुए भी भारत आता था, तब वह यहाँ से पश्चिम को जाता था। इस प्रकार भारत और रोमन साम्राज्य के बीच रेशम का पारगमन व्यापार काफी चला।
   बदले में, रोमन लोग भारत को शराब, शराब के दोहत्थे कलश और मिट्टी के अन्यान्य प्रकार के पात्र भेजते थे। ये वस्तुएं पश्चिम बंगाल के तामलुक, पांडिचेरी के निकट के अरिकमेदु और दक्षिण भारत के कई अन्य स्थानों में खुदाई में मिली हैं। कभी-कभी तो वे वस्तुएँ गुवाहाटी तक पहुँच जातीं। लगता है, सातवाहन अपना सिक्का ढालने में जिस सीसे का इस्तेमाल करते थे वह रोम से लपेटी हुई पट्टियों की शकल में मँगाया जाता था। उत्तर भारत में रोम से आई वस्तुएँ बहुत कम ही मिली हैं, परन्तु इसमें संदेह नहीं कि कुषाणों के समय में इस उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर भाग में ईसा की दूसरी सदी में रोम के साम्राज्य के पूर्वी भाग के साथ व्यापार चलता था। जब 115 ई. में मेसोपोटामिया को जीतकर रोम का प्रान्त बना लिया गया तब इस व्यापार को और सहूलियत मिली। रोम सम्राट ट्राजन ने ने केवल मस्कट पर विजय प्राप्त की, बल्कि फारस की खाड़ी का पता भी लगाया। व्यापार और विजय के फलस्वरूप रोमन वस्तुएँ अफगानिस्तान और पश्चिमोत्तर भारत में पहुंची। काबुल से 72 किलोमीटर उत्तर बेग्राम में इटली, मिश्र और सीरिया में बने शीशे के बड़े-बड़े मर्तबान मिले हैं। वहाँ कटोरे, काँसे का गोड़ा, इस्पात का पैमाना, पश्चिमी बाट, काँसे की छोटी-छोटी यूनानी-रोमन मूर्तियाँ, सुराहियाँ और सिलखड़ी के अन्यान्य पात्र भी मिले हैं। तक्षशिला में, जिसकी पहचान पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर सीमाप्रान्त के आधुनिक सिरकप से की गई है, यूनानी-रोमन कांस्यमूर्तियों के उत्कृष्ट नमूने मिले हैं। हमें चाँदी के गहने, कुछ कांस्य पात्र, एक कलश और रोमन सम्राट तिबेरिअस के कुछ सिक्के भी मिले हैं। परन्तु अरेटाइन मृद्भांड जो दक्षिण भारत में आम तौर पर पाए जाते हैं, वे मध्य भारत या पश्चिमी भारत या अफगानिस्तान में नहीं मिलते। स्पष्ट है कि इन स्थानों में वे लोकप्रिय पश्चिमी वस्तुएँ नहीं पहुँची, जो अधिकतर विन्ध्य के दक्षिण में सातवाहन राज्य में और उससे भी दक्षिण में पाई गई हैं। इस प्रकार सातवाहनों और कुषाणों के राज्यों को रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार से लाभ पहुँचा, फिर भी लगता है कि अधिक लाभ सातवाहनों को हुआ।
   रोम से भारत आई वस्तुओं में सबसे महत्व के हैं, ढेर-सारे रोमन सिक्के, जो प्रायः सोने और चाँदी के हैं। समूचे उपमहाद्वीप में लगभग 150 ऐसे सिक्के प्रकाश में आए हैं और इनमें अधिकतर विन्ध्य के दक्षिण में पाए गए हैं। इससे यह समझ में आ जाता है कि रोमन लेखक प्लिनी ने 77 ई. में लैटिन में लिखे नेचुरल हिस्ट्री नामक अपने विवरण में दुख भरे शब्दों में क्यों कहा है कि भारत के साथ व्यापार करके रोम अपना स्वर्णभंडार लुटाता जा रहा है। इस कथन में अतिरंजन हो सकता है। लेकिन उससे भी पहले 22 ई. में हम यह शिकायत सुनते हैं कि रोम पूरब से गोल मिर्च मँगाने पर अत्यधिक खर्च कर रहा है। पश्चिम के लोगों को भारतीय गोल मिर्च इतनी प्रिय थी कि संस्कृत में गोल मिर्च का नाम ही पड़ गया यवनप्रिय। भारत में बने छुरी-काँटे के इस्तेमाल के खिलाफ भी भारी प्रतिक्रिया हुई, जिन्हें रोम के अमीर ऊँची कीमतों में खरीदते थे। उस समय लोगों को व्यापार-सन्तुलन की अवधारणा भले ही न रही हो, परन्तु भारतीय प्रायद्वीप में पाए गए रोमन सिक्कों और पात्रों की बहुतायत से इसमें सन्देह नहीं रह जाता है कि रोम के साथ व्यापार में भारत का पलड़ा भारी था। रोम की मुद्रा में होने वाली कमी का अनुभव इतना तेज हुआ कि अन्ततोगत्वा रोम को भारत के साथ गोल मिर्च और इस्पात के माल का व्यापार बन्द करने के लिए कदम उठाना पड़ा।
   लगता है कि भारत-रोम व्यापार और जहाजरानी में मुख्य भूमिका रोमनों ने अदा की। यद्यपि रोमन व्यापारी दक्षिण भारत में बस गए, पर इस बात का प्रमाण नहीं मिलता कि भारत के लोग रोमन साम्राज्य में बसे। तमिल भाषा में लिखित ग्राफिटों वाले बर्तनों के कुछ टुकड़ों से प्रतीत होता है कि कुछ तमिल सौदागर रोमन काल में मिश्र में बसते थे।
   भारत के लोग रोम से भारत आए चाँदी और सोने के सिक्को का उपयोग किस काम में करते थे ? रोमन स्वर्णमुद्राएँ स्वभावतः अपनी धातु के लिए मूल्यवान होती थीं, पर साथ ही उनका प्रचलन बड़े-बड़े लेन-देन में भी रहा होगा। उत्तर में हिन्द-यूनानी शासकों ने कुछेक स्वर्णमुद्राएँ जारी कीं। लेकिन कुषाणों ने काफी संख्या में स्वर्णमुद्राएँ चलाई। यह समझना गलत होगा कि सभी कुषाण स्वर्णमुद्राएँ रोमन सोने से ढाली गईं। बहुत पूर्व, पाँचवीं सदी ई. पू. में ही भारत ने ईरानी साम्राज्य को नजराना के तौर पर 320 टैलेंट सोना दिया था। यह सोना सिन्ध की स्वर्ण-खान से निकाला गया होगा। कुषाण सम्भवतः मध्य एशिया से सोना प्राप्त करते थे। उन्हें यह सोना या तो कर्नाटक से मिला होगा या दक्षिण बिहार की ढालभूम स्वर्ण-खानों से, जो बाद में उनके अधिकार में आ गई। रोम से सम्पर्क के फलस्वरूप कुषाणों ने दीनार सदृश स्वर्णमुद्राएँ जारी कीं, जो गुप्तों के शासन काल में खूब प्रचलित हुई। परन्तु स्वर्णमुद्राएँ का प्रयोग रोजमर्रे लेन-देन में नहीं होता होगा, ये लेन-देन सीसे, पोटीन या ताँबे के सिक्कों से चलते थे। आंध्र में सीसा और ताँबा दोनों की खानें पाई गई हैं। आन्ध्र ने दकन में सीसे और पोटीन के सिक्के बड़ी संख्या में जारी किए। प्रायद्वीप के शीर्ष भाग में कुछ आहत मुद्राएँ और आरम्भिक संगम-युग की मुद्राएँ पाई गई हैं। कुषाणों ने उत्तर और पश्चिमोत्तर भारत में ताँबे के सिक्के सबसे अधिक संख्या में जारी किए। ताँबे और काँसे के सिक्के भारी मात्रा में कई देशी राजवंशों ने भी जारी किए, जैसे मध्य भारत में राज करने वाले नागर, पूर्वी राजस्थान पर तथा हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के संलग्न क्षेत्रों पर शासन करने वाले यौधेय, तथा कौशाम्बी, मथुरा, अवन्ति और अहिच्छत्र (उत्तर प्रदेश का बरेली जिला) में राज करने वाले यौधेय। शायद इस काल में मुद्रात्मक अर्थव्यवस्था नगरों और उपनगरों के जन-सामान्य के जीवन में जितनी गहराई तक प्रवेश कर गई वैसा अन्य किसी भी काल में नहीं देखा गया है। यह स्थिति कला और शिल्प के विकास तथा रोमन साम्राज्य के साथ पुरजोर व्यापार के अनुरूप ही है।

शहरी बस्तियाँ

   शिल्प और वाणिज्य में बढ़त और मुद्रा के अधिकाधिक प्रयोग के परिणामस्वरूप इस काल में अनेकानेक नगरों की श्रीवृद्धि हुई। वैशाली, पाटलिपुत्र, वाराणसी, कौशाम्बी, श्रावस्ती, हस्तिनपुर, मथुरा, इन्द्रप्रस्थ (नई दिल्ली का पुराना किला) इन सभी उत्तर भारतीय नगरों के उल्लेख साहित्यिक ग्रन्थों में मिलते हैं और कुछ नगरों का वर्णन चीनी यात्रियों ने भी किया है। अधिकतर नगर ईसा की पहली और दूसरी सदियों में कुषाण काल में फूले-फले, ऐसा उत्खननों के आधार पर कहा जा सकता है, क्योंकि उत्खननों से कुषाण युग की उत्कृष्टतर संरचनाएँ प्रकट हुई हैं। इनसे यह भी प्रकट हुई हैं। इनसे यह भी प्रकट होता है कि बिहार के कई स्थल, जैसे चिराँद, सोनपुर और बक्सर आदि तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई स्थल, खैराडीह और मासोन कुषाण काल में समृद्ध थे। इसी तरह उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद के पास शृंगवेरपुर, सोहगौर, भीटा और कौशाम्बी, तथा मेरठ और मुजफ्फरनगर जिलों में अतरंजीखेरा और कई अन्य स्थल कुषाण काल में उन्नति पर थे। हम शृंगवेरपुर और चिराँद दोनों स्थलों पर बहुत सी कुषाण कालीन ईंट संरचनाएँ पाते हैं। मथुरा में सोंख के उत्खनन में कुषाण अवस्था के सात स्तर दिखाई देते हैं, जबकि गुप्त अवस्था का केवल एक स्तर है। फिर, पंजाब के अन्तर्गत जालन्धर, लुधियाना और रोपड़ में, कई स्थलों पर कुषाण काल की अच्छी संरचनाएँ पाते हैं। हरियाणा में खोदे गये स्थलों का भी यही हाल है। कई जगह तो कुषाण कालीन संरचनाओं से निकली पुरानी ईंटों से गुप्त काल में बनी भोंडे ढंग की संरचनाएँ भी मिली हैं। कुल मिलाकर कुषाण अवस्था के बताएँ गए भौतिक अवशेषों से प्रतीत होता है कि नगरीकरण उत्कर्ष की चोटी पर पहुँच गया था। मालवा और पश्चिमी भारत के शक राज्य के बारे में भी यह बात लागू है। सबसे महत्वपूर्ण नगर उज्जयिनी था, क्योंकि यहाँ दो बड़े मार्ग मिलते थे एक कौशाम्बी से आने वाला और दूसरा मथुरा से। इसका महत्व इसिलए भी था कि यहाँ से अगेट (गोमेद) और कार्नेलियन (इन्द्रगोप) पत्थरों का निर्यात होता था। उत्खननों से ज्ञात होता है कि यहाँ 200 ई. पू. के बाद मणि या मनके बनाने के लिए गोमेद, इन्द्रगोप और सूर्यकान्त (जैस्पर) रत्नों का काम बड़े पैमाने पर होता था। यह सम्भव था, क्योंकि शिप्रा नदी का तहशल के फाँसों से ये पत्थर प्रचुर मात्रा में प्राप्त किए जा सकते थे।
   शक और कुषाण काल के समान ही, सातवाहन राज्य में नगर उन्नति करते थे। सातवाहन काल में पश्चिमी और दक्षिणी भारत में तगर (तेर), पैठान, धान्यकटक, अमरावती, नागार्जुनकोंडा, भड़ौच, सोपारा, अरिकमेदु, कावेरी-पट्टनम ये सभी समृद्ध नगर थे। तेलंगाना में कई सातवाहन बस्तियाँ खुदाई में निकली हैं। इनमें से कुछ तो आन्ध्रों के दीवार-घिरे उन तीस नगरों में से होंगे जिनका उल्लेख प्लिनी ने किया है। उनका उदय आन्ध्र के तटवर्ती शहरों से काफी पहले, परन्तु पश्चिमी महाराष्ट्र के शहरों से कुछ ही समय बाद हुआ होगा। परन्तु महाराष्ट्र, आन्ध्र और तमिलनाडु में नगरों का हृास सामान्यतः ईसा की तीसरी सदी के मध्य से या उसके बाद से शुरू हो जाता है।
   कुषाण और सातवाहन साम्राज्यों में नगरों की उन्नति इसलिए हुई कि रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार बहुत अच्छा चल रहा था। भारत रोमन साम्राज्य के पूर्वी भाग और मध्य एशिया के साथ भी व्यापार करता था। पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नगर इसलिए फूलते-फलते रहे कि कुषाणशक्ति का केन्द्र पश्चिमोत्तर भारत था। भारत में अधिकतर कुषाण नगर मथुरा से तक्षशिला जाने वाले पश्चिमोत्तर मार्ग या उत्तरापथ पर पड़ते थे। कुषाण साम्राज्य में मार्गों पर सुरक्षा का प्रबन्ध था। ईसा की तीसरी सदी में उसका अन्त होने से इन नगरों को गहरा धक्का लगा। शायद यही बात दकन में भी हुई। तीसरी सदी से जब रोम साम्राज्य ने भारत के साथ व्यापार पर प्रतिबन्ध लगा दिया, नगर अपने शिल्पियों और वणिकों का भरण-पोषण करने में असमर्थ हो गए। दकन में हुई खुदाइयों से भी सातवाहन अवस्था के बाद से नगर बस्तियों का हृास होना लक्षित होता है।