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समकालीन कला
राजतंत्र, अर्थव्यवस्था और समाज में और विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में जो त्वरित परिवर्तन आए हैं और उन्नति हुई हैं यह हमारे युग के इतिहास की विशेषता रही है। ऐसे ही समानांतर प्रवाह विविध कलाओं के क्षेत्र में भी पाए जाते हैं। मानव इतिहास के किसी भी युग में कला के क्षेत्र में ‘‘अन्वेषणों और उत्तेजक विचारों की बहुलता’’ इतनी नहीं पाई जाती है जितनी 19वीं सदी के अंतिम चरण के बाद के समय में देखी जाती है। नई-नई शैलियाँ, रूपविधान और अभिव्यक्तियों के अविरत प्रयोगों ने एक ऐसी कला को जन्म दिया जो इसके पहले की सभी कलाओं से बिल्कुल ही भिन्न है। इस प्रक्रम में भूतकाल के सभी मापकों को त्याग दिया गया है। फिर भी, प्रत्येक युग की कला अपने-अपने समय की भावनाओं, आशाओं और मूल्यों को प्रतिबिम्बित करती है। आधुनिक कला के भिन्न-भिन्न आंदोलन यूरोप में आरंभ हुए। पूँजीवाद और औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप यूरोप की कायापलट हो गई थी। यूरोप तेजी से बदलता जा रहा था। बाद में इसका उत्तर अमरीका की कला पर भी प्रभाव पड़ा। दुनिया के अन्य देशों में, विशेष रूप से जहाँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से साम्राज्यवादी शासन था, कला में वहाँ के हर समाज की विशिष्ट परिस्थिति प्रतिबिम्बित होती थी।
कुछ देशों में कला में, जहाँ कि राष्ट्रीय जागृति तथा राष्ट्रीय विशिष्टता की अभिव्यक्ति हुई, परंपरागत कलास्वरूपों को पुनर्जीवित किया गया। उन्हें पुनः नवीन शक्ति प्रदान की गई और उनमें नई विषय वस्तु लाई गई। इन देशों के कलाकारों ने अभिव्यक्ति की कई पद्धतियाँ भी अपनाईं। इस प्रकार पश्चिम की आधुनिक कला समेत उन्होंने विभिन्न स्रोतों से प्रेरणा पाई। इन देशों की नवीन कला वहाँ की भूतकाल की कला से मूलतः भिन्न होकर रह गई। आधुनिक यूरोपीय कलापूर्वयायी कला सृजन पद्धतियों तथा कला विषयक मूल्यों का सम्पूर्ण अस्वीकार, आधुनिक यूरोपीय कला का निरपराद और प्रत्यक्ष देखा जा सके, ऐसा लक्षण है। उसने भूतकालीन अफ्रीकी कला की परम्पराओं का आधार लिया जैसे घनवादी (Cub-ist) कलाकारों ने किया तब यह कला भिन्न बन गई थी। प्रभाववादी (Impressionist) कलाकारों के बाद पॉल गोगाँ जैसे कलाकारों ने प्राचीन मिस्र या प्राचीन पोलिनीशिया की कला परम्पराओं से प्रेरणा पाई तब भी यह कला भिन्न बन गई थी।आधुनिक कला के आंदोलन यूरोप में क्यों शुरू हुए इसके कुछ कारण हैं। 19वीं शताब्दी के अंत तक यूरोप में त्वरित औद्योगीकरण का कलाकारों और कवियों-यूरोपीय समाजों के सर्वाधिक संवेदनशील वर्ग-पर गहरा प्रभाव पड़ा। बिजली, टेलीग्राफी, फोटोग्राफी, अखबार और इनके बाद रेडियो और सिनेमा तथा रेलवे, मोटरकार और हवाई जहाज जैसे त्वरित परिवहन के साधनों का भी लोक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। प्रौद्योगिकी का, विशेष रूप से प्रथम विश्व युद्ध के पहले तेज विकास और युद्ध के दौरान मृतकों, घायलों और बेघर लोगों की बड़ी तादात से यूरोपीय समाज, उनकी मान्यताओं, उनकी संवेदनाओं को और इसीलिए उनकी कलात्मक अभिव्यक्तियों में पूर्ण रूप से परिवर्तन आ गया। कई शताब्दियों तक वहाँ के कलाकारों का शोषण होता रहा, वे बेनाम रहे और अपने जीवन निर्वाह के लिए उनको राजाओं तथा सामंतों और धर्म गुरूओं और धर्माचार्यों के आश्रित रहना पड़ा। करीब-करीब पुनरूत्थान के युग से कलाकार अपनी वैयक्तिकता का प्रदर्शन करने की और अभिमान के साथ अपना नाम जाहिर करने की स्थिति में आ गए थे। आधुनिक कला के कलाकारों को स्वतंत्रता की एक नवीन लहर पर लाकर रख दिया। उसने कलाकारों को ‘कलासिसिज्म’ से मुक्त कर दिया। जिसमें यूनान की क्लासिकी कला की सृजन पद्धतियों के नियंत्रणों और विषयों को तथा इसके बाद भी सभी शैलियों को मूल्यवान समझा जाता था। ‘‘वैयक्तिकला’’ शब्द का अर्थ ही होता है वैयक्तिक अनुभूति, वैयक्तिक दर्शन और वास्तव में समाज के संबंध में वैयक्तिक प्रतिक्रिया एक जरूरत है जो आधुनिक कला के सभी आंदोलनों में समान रूप से पाई जाती है। कलाकारों ने इस दासता से मुक्ति पाई थी। इसकी जानकारी 1863 में मशहूर ‘‘सलें दे रिफ्यूसिस’’ (salon des Refuses) के अस्वीकृत चित्रों की प्रदर्शनी में मिली। हुआ यह था कि बहुत बड़ी संख्या में राजकीय फ्रेंच अकादमी ने यह बताकर अस्वीकृत घोषित किया था कि उनके द्वारा ‘‘शिष्टता और सुरूचि के विरूद्ध आक्रमण था’’ और इसलिए वे चित्र प्रदर्शित करने योग्य नहीं थे। ऐसी दुर्नम्य शैक्षिक परम्पराओं और सृजन पद्धतियों के विरूद्ध जोरदार आवाज उठी। परन्तु अकादमी ने उन अस्वीकृत चित्रों की एक अलग प्रदर्शनी का आयोजन किया। इनमें प्रभाववादी आंदोलन (impressionist movement) के कुछ संस्थापकों - सेजाँ, पिसारो, मोने और अमरीकी चित्रकार व्हिसलर-के चित्र शामिल थे। प्रभाववादी कलाकला में आधुनिकतावाद का आंदोलन प्रभाववादी शैली से हुआ ऐसा कहा जा सकता है। इसका आरम्भ निश्चित रूप से 1872 में बताया जाता है जब पैरिस के चित्रकार क्लाइड मोने ने ‘‘इम्प्रेशन - सनराईज’’ शीर्षक से एक चित्र प्रदर्शित किया था। यह चित्र तैल रंगों से बनाया गया था। जिन्हें प्राथमिक रेखांकन लिए बिना और रंग पट्टिका पर मिलाए बिना ट्यूब में से सीधे ही कैनवस पर फैलाया गया था। परंपरावादी चित्रकारों द्वारा इस चित्र में उषा काल का असर दिखाया गया था। अब तक देखे गए चित्रों से यह चित्र भिन्न था। कहा जाता है कि एक सम्भ्रांत पत्रकार लुईस लेरॉय ने घृणा से उसे प्रभाववादी (impressionist) चित्र बताया था। इस प्रकार एक नए आंदोलन के लिए इस नये शब्द के प्रयोग का आरम्भ हुआ।दो साल बाद प्रभाववादी चित्रों की प्रथम प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। मोने और उनके मित्र अगस्ते रेनोयर, अल्रेड सिस्ले, कैमिल पिसारो, पॉल सेजाँ, एडगर डीगा, यूजीन बाउदाँ और इस आंदोलन की दो महिला चित्रकारों में से एक बर्थे मॉरिसात और अन्य चित्रकारों ने इसमें अपने चित्र प्रदर्शित किए। यह मित्रों का निर्बन्ध संगठन था। 20वीं शताब्दी के कलाकारों की तरह उसने कोई घोषणापत्र जारी नहीं किया था। इसके बाद ठीक 1886 तक दूसरी आठ प्रदर्शनियों का आयोजन किया गया था। इन सब चित्रकारों में एक सामान्य बात संगठन की थी - प्रकृति प्रेम और विभिन्न वस्तुओं पर प्रकाश के प्रभाव के सम्बन्ध में अनुसंधान। उनके चित्र अधिकतर भूमि और समुद्र के प्राकृतिक दृश्यों के चित्र हुआ करते थे। उनमें से अधिकतर चित्रकार अपने चित्रफलक घर से बाहर ले जाकर खुले में चित्र बनाते थे। वस्तुओं पर प्रकाश के सतत बदलते रहते प्रकाश के प्रभाव को अपने चित्रों में लाने के लिए वे अपनी तूलिका कुशलतापूर्वक चलाते थे। अंतः प्रेरणा से उन्होंने रंगों के भौतिक गुणों का ज्ञान पा लिया था। उन्होंने वस्तुओं की बहिर्रेखाओं को त्याग दिया। इन सब बातों में कुछ नया था और उस समय की अधिकतर ऐतिहासिक और मिथक के विषयों, व्यक्त चित्रों, स्पष्ट रेख, सुयोग्य परिप्रेक्ष्य वाले मकानों के साथ शहरी चित्रांकनों पर निर्भर प्रचलित शैली से मूलतः भिन्न थे। प्रभाववादी कलाकारों की चित्र शैली और प्रकाश के विषय में उनका संशोधन इनके पूर्वगामी अंग्रेज चित्रकारों, टर्नर और कॉन्सटेबल, की कृतियों में पूर्वाभास मिला था। प्रभाववाद ने जो सिद्ध किया वह थी आस-पास की दृष्टि को देखने की नवीन दृष्टि, जहाँ प्रकाश और रंगों को चित्रकला का प्रमुख विषय मान लिया गया था। यह नया प्रत्यक्ष ज्ञान पूर्वगामी शताब्दियों से भिन्न था क्योंकि उसमें सतत् परिवर्तन एवं यथार्थ की प्रकृति पर जोर दिया जाता था। प्रभाववादी ने नव-प्रभाववादी (neo-impressionist) को जन्म दिया जिसमें रंग और प्रकाश के प्रयोग का एक और सुनिश्चित महत्व प्राप्त हुआ। उसमें सजीवता नहीं थी और नया चिंतन भी नहीं था। प्रभाववाद के बाद की कला ने परिस्थिति को सँभाल लिया और नया प्रोत्साहन दिया। नव-प्रभाववादी कलाकारों में जार्ज सुआर्ट श्रेष्ठ कलाकार थे। वे बिन्दुचित्रण (pointillist) की शैली के चित्रकार थे। रंगों के बिन्दुओं से कैनवस पर वे आकृतियों के पच्चीकारी जैसे चित्र बनाते थे। सेजाँ स्वयं प्रभाववाद के बाद की कला शैली की ओर जाने लगा था बाद में उनके द्वारा बनाए गए फूलों और फूलदानों के चित्र (still-life stud-ies) में घनत्व का आभास मिलने लगा। सेजाँ को प्रकृति में चौकोर, वर्तुल, शंकु आदि आकृतियाँ नजर आने लगीं जो प्रकृति की सभी वस्तुओं में प्राथमिक रूप से पाई जाती हैं। बहुत बाद में घनवादी (cubist) कलाकार सेजाँ के इस निरीक्षण से प्रभावित हुए। आधुनिक कलाकारों का लक्ष्यबिन्दु प्रकाश और रंगों के संयोजन से हटकर चौखटे में सीमित ठोस आयतनों पर स्थिर हुआ। उत्तर-प्रभाववादी कलाप्रभाववाद के बाद की शैली का सामान्यतः विंसेन्ट वान गॉघ और पॉल गोगाँ के चित्रों का वर्णन करने के लिए उल्लेख किया जाता है। ये दोनों कलाकार मित्र थे और दोनों रंगीन तबियत के थे। उग्र भावनाओं से भरी जिन्दगी की मुद्रा वे अपने शानदार रंगों में बनाए गए चित्रों में छोड़ गए हैं। गोगाँ का जन्म 1848 में पैरिस में हुआ था, परन्तु अपना बचपन उन्होंने पेरू में बिताया था। बीस साल की वय के बाद कुछ समय तक वे शेयर-दलाल रहे। ‘सन्डे पेन्टर’ के रूप में उन्होंने आरम्भ किया और प्रारम्भिक प्रभाववादी कलाकारों में रूची ली और कभी-कभी उनके साथ अपने चित्र भी प्रदर्शित किए। अपने समय के दम्भी मध्यम वर्गीय जीवन और उसके मूल्यों से वे घृणा करने लगे। वे वान गॉघ के अभिन्न मित्र बन गए तथा बाद में वह ताहिटी चले गए। वहाँ पोलिनीशियन लोगों के विषय बनाकर उन्होंने अपने अत्यन्त प्रभावशाली चित्र बनाए जिनमें विस्तृत सपाट फलक पर चटकीले रंगों के माध्यम से अविकृत प्राकृतिक पार्श्व भू में मोहक नारियों को चित्रित किया। चित्र के विषयों के साथ उनका भावनात्मक उलझाव, उनके आवेश, उनकी असाधारण ओजस्विता और ‘क्षयोन्मुख’ यूरोप के प्रति उनकी घृणा ने उनके चित्रों को चित्रात्मकता का अनन्य गुण प्रदान किया।वान गॉघ का जीवन गोगाँ के जीवन से बिल्कुल ही विपरीत था। वान गॉघ एक पादरी के पुत्र थे और अपने जीवन के आरंभ के वर्षों से वे एक बेचैन व्यक्ति थे और एक जगह से दूसरी जगह, एक काम से दूसरे काम में घसिटते रहे। उनका मन बालक जैसा सहज-सरल था। अपने भाइयों के प्रति उनका प्रगाढ़ प्रेम था। थियो एक कला-विक्रेता था। वान गॉघ नियमित रूप से अपने भाई को लम्बे-लम्बे पत्र लिखा करते थे। अपने भाई के द्वारा विंसेन्ट को प्रभाववादी कलाकारों की कृतियों से परिचय भी हुआ। कुछ कलाकारों से उनका परिचय भी हुआ और कुछ कलाकार उनके मित्र भी बन गए। बेल्जियम के खान-मजदूरों के बीच वे उनके पादरी भी बने। वान गॉघ ने चित्र बनाने की शुरूआत जिन्दगी में कुछ देर से ही की। उनके चित्रों में विविधता थी - प्राकृतिक दृश्य, मकानों के भीतर के दृश्य, फूलों के चित्र, व्यक्ति चित्र आदि। परन्तु सभी चित्रों में चटकीले रंग, तूलिका का सशक्त स्पर्श और रंगों की वजनी सतहें पाए जाते हैं। अपने सभी चित्रों में उन्होंने अपने हृदय के भावों को उड़ेल दिया, विशेष रूप से उन दिनों में जब उसे मिरगी के दौरे पड़ते थे। वान गॉघ के जीवन का अन्त करूण था। उन्होंने पिस्तौल से आत्महत्या कर ली थी। अपने जीवनकाल में उनका एक भी चित्र नहीं बिका और अब कला के संग्रहकर्ता करोड़ों डॉलर देकर उनके चित्र ख़रीदते है। हेनरी रूसो, जो दानियर (सीमा शुल्क अधिकारी) रूसो के से ज्यादा मशहूर हैं, उस समय के एक महत्वपूर्ण कलाकार हैं। एक रेजिमेन्टल बैन्ड्समैन के रूप में उन्होंने अपना जीवन आरम्भ किया। फ्रैन्को-प्रुशियन युद्ध में उन्होंने हिस्सा लिया था। रंगों के विषय में उनकी सहज सूझ थी। उनकी संरचनाएँ सम्भ्रान्त कर देती हैं। हेनरी मारी रेमों द तुलाउज-लॉत्रक अपने नृत्यगृहों के पोस्टरों के लिए अधिक मशहूर थे। बचपन में ही उनके जीवन में एक करूण घटना घटी थी जिससे उनके दोनों पैर टूट गए थे। परिणामस्वरूप उनका कद छोटा (नाटा) ही रह गया था। आंतरिक गतिकता को लेकर उन्होंने अपनी परिस्थिति पर विजय पाई और नृत्यगृहों, कैफे और पैरिस शहर की रात्रि लीला के मशहूर चित्र बनाए। उत्तर- प्रभाववादी (post-impreessionist) कला प्रभाव से उनकी शैली का उद्भव हुआ था, लेकिन उनके रंग विसरित होते थे। जीवन के आखिरी वर्षों में वे अत्यधिक शराब पीने लग गए थे। तीस साल की वय में ही उनकी मृत्यु हो गई थी। यहाँ प्रभाववादी कलाकारों और उनके अनुगामियों के संबंध में एक रोचक बात का उल्लेख करना चाहिए। उनमें से कई कलाकारों, विशेष रूप से मोने, गोगाँ, विन्सेन्ट वान गॉघ और तुलाउज-लॉत्रक पर 18वीं-19वीं शताब्दियों के जापानी काष्ठ चित्रों का प्रभाव पड़ा होकुसाई हीरोशीगे और उटामारो जैसे जापानी कलाकारों और उनके समकालीनों की कृतियों के प्रिन्ट्स के वे उत्सुक संग्रहकर्ता थे। गोगाँ, वान गॉघ और तुलाउज-लॉत्रक की जीवन गाथाओं पर फिल्में बनाकर उनको लोकप्रिय बना दिया गया। सोमरसेट मॉहम के उपन्यास पर आधारित दि मून ऐन्ड सिक्स पेन्स फिल्म गोगाँ के जीवन से प्रेरित हुई है। लस्ट फॉर लाइफ़ फिल्म इर्विन स्टोन के उपन्यास पर आधारित है जिसमें वान गॉघ के जीवन का चित्रण किया गया है और तुजाउज लॉत्रक पर बनी फिल्म मोलाँ रूज भी एक उपन्यास पर आधारित है। आधुनिक कला के किसी भी इतिहास में ऑगस्ते रोदाँ एक अनन्य शिल्पकार के रूप में उभर आते हैं जिन्होंने अपने समय की मनोवृत्तियों को अभिव्यक्त किया। वे लगभग पुनरूत्थान के युग के कलाकार जैसे थे जो अपने जीवन की परिस्थितियों से ऊपर उठे थे। एक स्थपित और मकानों की सजावट के निष्णात के रूप में उनका जीवन आरम्भ हुआ था। उन पर माइकलेन्जेलो का बहुत प्रभाव पड़ा जिनकी कृतियों का उन्होंने संग्रहालयों में निरीक्षण किया था। पुनरूथान के युग की विस्मयकारी मूर्तिकला के प्रभाव में आकर वे एक प्रयोगवादी और आधुनिकतावादी मूर्तिकार बने। उनके पास विचारों और संकल्पनाओं की समृद्धि थी और उनमें उत्कृष्ट प्रतिमान बनाने की क्षमता थी जिनमें से उन्होंने प्रभावशाली शिल्पकृतियाँ बनाईं। ऑनोर द बाल्जक (महान फ्रेंच लेखक बाल्जक को श्रद्धांजलि), दि किस (चुम्बन), दि थिंकर (चिंतक) और बर्गर्स ऑफ कालाइस (कालाई के बर्गर) जैसी उनकी शिल्पकृतियाँ दुनिया भर में मशहूर हैं। अभिव्यंजनावादअभिव्यंजनावादी कला, जिसके लिए गोगाँ और वान गॉघ ने भूमिका बाँध दी थी, अंततः पूर्वगामी शताब्दियों की प्रभाववादी और प्रकृतिवादी (Im-pressionist and naturalist) कला के विरोध में एक प्रबल आंदोलन बनकर रह गई। प्रथम विश्व युद्ध के पहले और उसके दौरान अभिव्यंजनावादी आंदोलन का क्षेत्र जर्मनी और स्कैन्डिनेविया में रहा और वहीं वह पनपा। विक्षुब्ध भावनाओं को व्यक्त करने के उद्देश्य से वस्तुओं और मानव-आकृतियों की बहिर्रेखाओं को विदू्रप कर दिया गया, रंगों को भावनाओं से अनुप्राणित किया गया। नार्वेजियन कलाकार एडवर्ड मुंच ने विक्षिप्त भीतरी मानस को अपने चित्रों और अश्म मुद्रणों (Lithographs) में व्यक्त किया। उन कलाकृतियों में विभीषिका, पीड़ा और मनोव्यथा का आभास मिलता है।इस आंदोलन से जुड़े हुए अन्य कलाकार ‘‘द ब्रुके’’ (Die Brucke) और ‘‘द बलू राइटर ग्रुप’’ (Der Balaue Reiter) नाम की दो संस्थाओं के सदस्य थे। इन कलाकारों में मैक्स बेकमैन, जैम्स एन्सोर, एडवर्ड मुंच, नोल्दे, ऑस्कर कोकोत्स्का, जार्जस रोआल्ट और चेम साउतिन शामिल थे। मैक्स बेकमैन जर्मन अभिव्यंजनावादी कलाकार थे, जिनके चित्रों में युद्ध की विभीषिका और जुल्म का चित्रण है और उनमें फासिस्ट आंतक का पूर्वाभास भी मिलता है। बेल्जियन चित्रकार एन्सोर ने मृत्यु-सड़ाँध को चित्रित किया। एडवर्ड मुंच एक सशक्त अभिव्यंजनावादी कलाकर थे। जर्मनी के अभिव्यंजनावादी कलाकार नोल्दे ने अपने समय की अशांति को व्यक्त करने के उद्देश्य से आदिम कला के सार्थक तत्वों में से बहुत कुछ अपनाया। ऑस्ट्रियन कलाकार कोकोत्स्का ने अपने अत्यन्त भावनापूर्ण चित्रों में चटकीले रंगों का प्रयोग किया। रोआल्ट गिरजाघरों की रंगीन काँच की खिड़कियों के चित्रों और आम्ललेखन (etchings) के लिए मशहूर थे। उन्होंने अपनी चित्रकला को बाइबिल से संबंधित विषयों पर केन्द्रित किया। परंतु बाद में भ्रष्टता और क्रूरता के विरोध में उन्होंने सामाजिक विषयों पर ध्यान दिया। रूसी कलाकार साउतिन ने कत्लखानों के अनेक चित्र बनाए। एक तरह से अभिव्यंजनावादी कलाकारों ने 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक से लेकर प्रथम विश्व युद्ध और यूरोप में फासिज्म के उदय तथा द्वितीय विश्व युद्ध तक की लम्बी समयावधि को अपनी कला में प्रतिबिंबित किया। ये कलाकार सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अशांति, नैराश्य, युद्ध, जुल्म और आतंक के समय के प्रतिनिधि थे। हेनरी मातीस भी एक अभिव्यंजनावादी कलाकार थे। जिनका ‘वाइल्ड बीस्ट्स’ (Fauves) के साथ संबंध था। इस गुट को अखबारों में यह नाम इसलिए दिया गया था कि उन कलाकारों ने सैद्धंतिक प्रकृतिवाद (academic naturalism) की सभी परम्पराओं को पूर्ण रूप से अस्वीकार कर दिया था और चटकीले विषम रंगों में विकृत और सपाट मानव-आकृति के चित्र बनाए। इस गुट के कलाकारों ने आकृतियों का सरलीकरण किया और उनको प्राकृतिक अंशों में प्रस्तुत किया। मातीस पर एशिया और अफ्रीका की कलाओं का गहरा प्रभाव था। उसने पुस्तकों के लिए भी चित्र बनाए थे और गिरजाघरों को सुशोभित किया था। अभिव्यंजनावादी कलाकारों में सबसे महान कलाकार कैथे कालवित्ज थीं जो एक सरल स्वभाव की विनीत किन्तु महारूप महिला थीं। उनके चित्रांकन, काष्ठ चित्र, आम्ल लेखन और अश्मलेख गरीब, शोषित और युद्ध के शिकार बने हुए लोगों के बारे में थे। घनवादी कलाघनवाद 20वें दशक के आरम्भ के वर्षों में कला के क्षेत्र में हुए आंदोलनों में एक है। जिसका बाद के कई आंदोलनों पर प्रभाव पड़ा। इसका आरम्भ सेजाँ से हुआ जो प्रभाववादी चित्रकारों द्वारा प्रकाश के बदलते हुए असर को पकड़ने के उद्देश्य से किए गए वस्तुओं की बाहरी सतहों से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने वस्तुओं की मूलभूत रचनाओं का, उनकी गहराई और बदलते हुए स्तरों का निरीक्षण किया। द्वि-विमीय कैनवस पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से देखी गई वस्तुओं के त्रि-विमीय स्वरूप को दर्शाने की सम्भावना के बारे में सोचने का दायित्व पाब्लो पिकासो, जार्जस, ब्राक और जूआँ ग्रिस के ऊपर था।पिकासो स्पैनिश थे। वे एक कला शिक्षक के प्रतिभा सम्पन्न पुत्र थे। अपने जीवन के आरम्भ के वर्षां में ही वे पैरिस में जाकर बस गए। ‘‘दुनिया के उस महान कला-नगर’’ में वे सर्वोत्कृष्ट सर्जक और शतक के सबसे बड़े चित्रकार बन गए। उनकी बौद्धिक तेजस्विता ने सभी-माध्यमों में और सृजन पद्धतियों में व्यावसायिक क्षमता से उन्होंने आधुनिक कला के आंदोलन में बड़ा योगदान दिया। 1973 में उनकी मृत्यु हुई तब वे अपने पीछे अपनी कलाकृतियों की बहुत बड़ी विरासत छोड़ गये थे, जिसमें ‘ग्वेर्निका’ (स्पेन का इसी नाम का एक शहर) चित्र शामिल है। स्पैनिश आंतर विग्रह के दौरान नाजी और फॉसिस्ट सैनिकों के ढाए जुल्मों के विषय पर एक बहुत बड़ा चित्र है। उन सैनिकों ने उस शहर को बम ताराज कर दिया था। इस चित्र में चार औरतें, एक मृत बालक, एक मृत सैनिक की भुजाएँ और सिर, एक घोड़ा और एक बैल को अत्यन्त हिंसक और विकृत रूप में काले, भूरे और सफेद रंगों के प्रभावशाली प्रयोग द्वारा चित्रित किया गया है। जार्जस ब्राक पैरिस के मशहूर कला संस्थान इकोल द बो-आर्ट्स (Ecole des Beaux-Arts) की उपज थे। उनके और पिकासो के बीच दोस्ती हो गई, परन्तु बाद में उनके मार्ग अलग हो गए। कुछ समय के बाद एक दूसरा स्पैनिश कलाकार जूआँ ग्रिस उनके साथ शामिल हो गया था। पिकासो ने अनेक स्रोतों से प्रेरणा पाई। स्पेन की गॉथिक शिल्पकला, वेलासक्वेज, गोया आदि कलाकारों के चित्र और उस समय तक जो अनजानी रह गई थी ऐसी अफ्रीकन शिल्पकला का सौन्दर्य पिकासो ने अपने ढंग से उन विविध कलात्मक सिद्धियों का सम्मिश्रण करके अपना ऐतिहासिक चित्र ‘ऐविग्नॉन की स्त्रियाँ’ (The Women of Avignon) बनाया जिसमें उसने नग्न स्त्रियों को चित्रित किया। मानव आकृतियाँ आरम्भिक घनवादी चित्रण था। इसके द्वारा घनवादी कला के आंदोलन का आरम्भ हुआ। दो विश्व युद्धों के बीच का समयप्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों के बीच का समय यूरोपीय कला में विक्षुब्धता का समय था। प्रथम विश्व युद्ध की हिंसा और क्रूरताओं से कलाकारों की संवेदना पर आघात हुआ और जो कुछ साधन उन्हें उपलब्ध थे उनके द्वार चित्रों और लेखाचित्रों (graphics) में उनकी प्रतिक्रिया, यूरोपीय शासक वर्गों के प्रति उनके शेष और घृणा को अभिव्यक्ति मिली। कोई पच्चीस वर्षां में कला के क्षेत्र में अनेक आंदोलन हुए और अनेक शैलियों में सृजन शक्ति का आविष्कार हुआ। इनमें से कुछ के नाम गिनाए जा सकते हैं - स्वचालनवाद (automatism), संरचनावाद (constructionism), डाडावाद (dadaism), भविष्यवाद (futurism), अतियथार्थवाद (Surrealism) और शुद्ध भौमितिक आकृतियों पर निर्भर अर्मूतवाद (supermatism)।यूरोप के कलाकारों ने छोटे-छोटे गुट बनाए और कला से संबंधित विषयों पर चर्चाएँ कीं। कभी-कभी उन्होंने घोषणा पत्र भी जारी किए। कई बार उन्होंने समूह में प्रदर्शनियों का आयोजन किया। उनका प्रमुख उद्देश्य तो बुर्जुआ और विशिष्ट वर्गों को आघात देने का था। उनमें से अधिकतर कलाकार तो मुश्किल से अपनी कला द्वारा जीवन निर्वाह कर सकते थे, परन्तु उनमें अहंकार था, घमंड था और साथ ही कला के आश्रयदाताओं-चाहे वह व्यक्ति हो या संस्था के प्रति घृणा थी। पैरिस में और अन्यत्र कलाकार शैलियों और सृजन पद्धतियों में प्रयोग करने लगे और तरह-तरह के माध्यम अपनाने लगे। बाहरी सतहों का ही नहीं परन्तु मन के भीतर की स्मृति का, अवचेतन मन का और स्वप्नों का भी वे चित्रण करने लगे। सिग्मंड फ्रॉयड की मनोवैज्ञानिक पुस्तकों का, विशेष रूप से फ्रॉयड द्वारा किए गए स्वप्नों के विश्लेषण का बहुत से कलाकारों पर गहरा प्रभाव पड़ा। डाडावादडाडावाद शायद सबसे अधिक आघात देने वाला कला-विरोधी (anti-art) आंदोलन था। स्विटजरलैंड के झूरिक शहर में कुछ निर्भ्रान्त और असन्तुष्ट कलाकारों और कवियों द्वारा 1915 में यह आंदोलन चलाया गया था। ‘डाडा’ शब्द से शायद काठ-घोड़ा अभिप्रेत था। भिन्न-भिन्न भाषाओं में शायद बहुत सी अन्य चीजों के प्रति भी इसमें निर्देश था। लेकिन एक आधुनिकतावादी आंदोलन के संदर्भ में यह एक बिल्कुल ही अर्थहीन शब्द था। इस आंदोलन को आरम्भ करने वाले त्रिस्तान झारा ने प्रथम विश्व युद्ध के संदर्भ में कला के क्षेत्र में भी आंदोलन की व्यर्थता दर्शाने के लिए यह शब्द पसन्द किया था। उसने अपने समय के पूर्व की कला से संबंधित सभी सिद्धान्तां और उद्देश्यों को अस्वीकार किया और उनकी खिल्ली उड़ाई। वह एक भड़काने वाला और आघात देने वाला शब्द था। डाडावाद को अनेक शहरों के कलाकारों का समर्थन मिला। झारा डाडावाद के उग्र प्रचारक थे। उन्होंने डाडा पत्रिका में घोषणा पत्र छापे। यह आंदोलन इतना प्रबल था कि लगभग 50 वर्षां के बाद दृष्टिभ्रम पैदा करने वाले चित्रों को बनाने वाले ऑप कलाकारों ने दावा किया कि वे डाडावाद के आंदोलन के वंशज हैं।अमूर्त कला1920 के दशक की अमूर्त कला का कई शताब्दियों पहले और किसी ने नहीं, अफलातून ने पूर्वानुमान किया था। उस ग्रीक चिंतक ने बताया था कि सौन्दर्य केवल जीवित रूपों में ही नहीं पाया जाता है। सौन्दर्य तो ‘‘सीधी रेखाओं में, घुमावदार या वक्र रेखाओं में, सतहों या खरादों में, फुट्टा या सेट-स्क्वेयर से बनाए गए घन आकारों में भी पाया जाता है।’’ यह नहीं कि अमूर्त कला और ऑप कला के आराधक वास्तव में इन्हीं शब्दों से प्रेरित हुए थे। परन्तु उन्होंने यह तो सिद्ध कर ही दिया कि ये शब्द तर्कसंगत थे। अमूर्त कला इस मान्यता पर निर्भर है कि कलामय मूल्य हर प्रकार के रूपों में और रंगों में निहित है और यह आवश्यक नहीं है कि इसे वस्तुओं में प्रत्यक्ष देखा जाए। कैन्डिन्स्की, आर्प, मीरो, लेगेर, पॉल क्ली जैसे चित्रकार और ब्रान्चूसी, पेवनेर और गैबो जैसे शिल्पकारों ने कला की अद्भुत और अग्रयायी कृतियों का सृजन किया और आज भी उनकी अमूर्त कृतियों का अंतर्निहित ‘सौन्दर्य’ लुप्त नहीं हुआ है।अतियाथर्थवादफ्रांस के साम्यवादी कवि और प्रथम विश्व युद्ध के बाद के इस आंदोलन के सैद्धान्तिक प्रणेता आन्द्रे ब्रेतो यह चाहते थे कि कलाकार ‘‘बुद्धि और हर प्रकार के सौन्दर्यलक्ष्मी और नैतिक चिंताओं से’’ मुक्त हों। सिग्मंड फ्रायड अनेक मनोविश्लेषण के सिद्धान्तों को लेकर उनके लिए एक बड़ा प्रेरणा स्रोत थे। अतियथार्थवादी कलाकारों, कवियों और फिल्म निर्माताओं ने स्वप्न सृष्टि, अवचेतन मन के विचार और इच्छाओं को महत्व दिया। अतियथार्थवादी कला का एक प्रकार वह था जिसमें साइकिल के पहिए और पंछी के पिंजड़े जैसी कहीं से भी मिल जाती चीजों के प्रयोग द्वारा कलाकृतियों का निर्माण किया जाता था। अनापेक्षित संदर्भां में ऐसी चीजों के प्रयोग का असर आघात देने वाला था। अतियथार्थवादी कलाकारों के एक दूसरे गुट ने अपनी कलाकृतियों में सामान्य चीजों को प्रयोग किया जिन्हें विकृत रूप देकर उनसे ऊटपटाँग कोलाज और चित्रात्मक संयोजनों का निर्माण किया। उदाहरण के तौर पर एक स्पैनिश कलाकार साल्वाडोर डाली ने अपने चित्र ‘यादों का सिलसिला’ (perseverance of memory) में ‘पिघलती घड़ियाँ’ चित्रित कीं। ज्यार्जियो द चिरिको ने निर्जन इमारतों के चित्र बनाकर अकेलेपन की अनुभूति चित्रित करने की कोशिश की।साल्वाडोर डाली ने अपने चित्रों से बहुत पैसा कमाया। हान्स रिचटेर और लुईस बूनएल ने सनसनीखेज फिल्में बनाईं। मैक्सअर्न्स्ट, जोन मीरो और हान्स आर्प भी अग्रिम अतियथार्थवादी कलाकार थे। बोल्शेविक क्रांति के बाद सोवियत रूस में ‘समाजवादी यथार्थवाद’ की कला को ही सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त थी। इसका अर्थ यह है कि कठोर परिश्रम करने वाले मजदूरों और किसानों को ही कला के विषय के लिए सर्वथा योग्य माना जाता था। राजकुल तथा धनवान और विशिष्ट वर्गों को उपहासपूर्ण ढंग में ही चित्रित किया जा सकता था। अग्रयायी आधुनिकतावादी कलाकारों में से मेलेविच, रोडशेन्को, पेवनेर और उनके भाई नाऊम गैबो जैसे कलाकार क्रांति के पूर्व के रूस में हो रहे त्वरित राजनैतिक परिवर्तनों को नजर में रखते हुए औद्योगीकरण में बहुत आगे बढ़ चुके समाज की महत्वाकांक्षाओं को व्यक्त करना चाहते थे। उन्होंने संरचनावाद (constructivism) और भौमितिक अमूर्त कला (suprematism) जैसे अल्पकालीन आंदोलन चलाए जिन्हें सोवियत रूस के समाजवादी वास्तव की नई मान्यता में स्वीकृत नहीं किया गया। कला के विषय में इस नई ‘विचारधारा’ को लेकर कैन्डिन्स्की और अन्य आधुनिकतावादी रूसी कलाकार अपना देश छोड़कर चले गए। यूरोप के आरम्भ के अभिव्यंजनावादी कलाकारों के लिए कैन्डिन्स्की एक पिता के प्रतीक बन गए। सोवियत रूस की ‘‘समाजवादी वास्तव’’ की विचारधारा ने मैक्सिको के दिएगो रिवेरा, उसके मित्र जोज ओरोज्को और आल्फ्रेडो सिक्वेरोस जैसे मशहूर कलाकारों को अत्यंत प्रभावित किया। इन तीनों कलाकारो ने कला की तात्विक शिक्षा पैरिस में पाई। इन्होंने सार्वजनिक इमारतों की दीवारों पर सैकड़ों चौरस यार्ड जितने बड़े भित्ति चित्र और चित्रांकन किए जिसके लिए उनको राजकीय सहायता दी गई थी। उन्होंने मायाओं और एजटेकों के प्राचीन इतिहास को, उनके देश पर स्पेन की विजय को, साम्राज्यवाद के ढाए हुए जुल्मों और अत्याचारों को तथा अपने देश की जनता के मुक्ति संग्राम को अपनी कला-सृजनों में मूर्त किया। अग्रिम अंग्रेज कलाकार20वें शतक की कला को प्रभावित करने वाले आंदोलनों के इस सर्वेक्षण में कुछ ऐसे महत्वपूर्ण कलाकारों को नहीं भुलाया जा सकता है जो किसी भी विचारधारा या आंदोलन से जुड़े हुए नहीं थे।इस संदर्भ में कुछ अंग्रेज कलाकारों का उल्लेख करना चाहिए। ऑगस्टस जॉन व्यक्ति चित्र बनाने वाले मशहूर कलाकार थे, फिर भी वे उत्तर-प्रभाववादी (post-Impressionist) कलाकारों से प्रभावित थे। ग्राहम सुदरलैंड एक अभिव्यंजनावादी कलाकार थे और वह व्यक्ति चित्र बनाते थे। अभिव्यक्ति की उनकी एक निराली शैली और सृजन पद्धति थी और फ्रांसिस बेकन अपने चित्रों में मानव आकृतियों को विघटन की कष्टमय प्रक्रिया में से गुजरते हुए दिखाकर संत्रास का असर उभारते थे। डेविड हॉक्नी नवीन प्रक्रियाओं का प्रचार करने वाले कलाकार थे। सामाजिक व्यंग्य और आघात देने वाले सहज प्रतीकात्मक चित्रण इस महत्वपूर्ण समकालिक कलाकार की कला के लक्षण हैं। सर जेकब इप्स्टाइन एक उत्कृष्ट शिल्पकार थे और उनकी विशालकाय कलाकृतियाँ हमेशा चर्चित रहीं। बेन निकोलसन जो मूर्तिकार थे और चित्रकार भी, रूख बदलकर अमूर्त कला की ओर चले गए और उन्होंने सुचारू अमूर्त कलाकृतियों का निर्माण किया। विख्यात महिला मूर्तिकार वार्बरा हेपवर्ध ने अत्यधिक तनावपूर्ण यादगार आकृतियों का निर्माण किया और आखिरी नाम है हेनरी मूर का जिसने ‘परिवार’ समूह की शिल्प कृतियाँ बनाईं, अवतल मानव आकृतियाँ तथा लेटी हुई नारियों की आकृतियाँ बनाईं। इनमें से अधिकतर कृतियाँ अति विशाल कद की हैं। हेनरी मूर को इस शतक का रोदाँ माना गया है। अमरीकी कलाआधुनिक कला के संदर्भ में अमरीका शायद सबसे नूतन राष्ट्र है। यूरोप के आधुनिक कला के आंदोलनों को न्यूयार्क तथा अन्य शहरों तक पहुँचने में लम्बा समय लग गया। इस विभाग में 19वें शतक के उत्तरार्द्ध में हुए आधुनिक कला के अगुवाओं का सम्मानपूर्वक स्मरण करना चाहिए। इनमें एक जेम्स ऐबट मैकनील व्हिसलर थे जो पैरिस में कला की शिक्षा लेने के बाद लंदन में बस गए। दूसरे कलाकार जॉन सिंगर सार्जेन्ट थे। वे भी पैरिस गए और लंदन में बस गए थे। उन्होंने पैरिस की हवा साँस में ली थी जहाँ कलाकार को अपने देश की अपेक्षा अधिक स्वतन्त्रता प्राप्त थी। उन्होंने सुन्दर चित्रों का सृजन किया था। प्रभाववादी कलाकारों के मूल लक्षण उनमें भी प्रचुर मात्रा में थे।ऑडोबोन को पक्षियों से प्रेम था और उन्होंने बड़ी सतर्कता के साथ पक्षियों के चित्र बनाए। अपने पीछे वे वैज्ञानिक निरिक्षण और निष्ठापूर्ण प्रकृतिवाद की विरासत छोड़ गए। टॉमस ईकिन्स, जार्ज बिंगहैम और विन्स्लो होमर अमरीका के इतिहास और लोकजीवन का आलेखन करने वाले कलाकार थे। 20वीं शताब्दी के अमरीका ने 1913 में आधुनिक कला स्वामियों के आर्मरी प्रदर्शनी (Armory Show) में पहली बार यूरोपियन कला का अनुभव किया। इसने अमरीकन कलाकारों को एक ओर कर 19वीं शताब्दी के कला विषयक सिद्धान्तों और सृजन पद्धतियों के शेष प्रभावों में से बाहर निकाल दिया। 20वें शतक के प्रथम तीन दशकों में अमरीकन कला की हालत वहाँ के वरिष्ठ फोटोग्राफर आल्फ्रेड-स्टीगलित्ज से प्रभावित थी। उनकी ‘‘गैलरी 291’’ आधुनिक कला के आंदोलन का प्रमुख केंद्र था। उन्होंने आधुनिकतावादी कलाकारों के चित्रों की तस्वीरें खींचीं और मातीस की कृतियों से अमरीका को परिचित कराया। जॉन मारिन, मॉरिस प्रेडरगास्ट, मार्सडेन हार्टले, राबर्ट हेनरी, टॉमस बेन्टन और स्टुआर्ट डेविस जैसे सक्षम कलाकार थे जो ‘‘अमरीकी दृश्यों’’ के चित्रकार थे। ये तो कुछ ही नाम हैं। उन कलाकारों में न्यूयार्क जैसे महानगरों के जीवन के विषाद और एकलता को चित्रित करने वाले एडवर्ड होपर और गरीब और हत भाग्य लोगों को करूणा से देखने वाले सर्वश्रेष्ठ कलाकार वेन शाह्न हैं। महिला चित्रकार जॉर्जिया आ’ कीफ में प्रकृति और मनुष्य जाति के प्रति कोमल भाव था। ग्रांट बुड एक अनोखे कलाकार थे। जिन्होंने दूसरों को अपने जीवन में इतना भागीदार बनाया था और अपने देश और लोगों को विषय बनाकर ‘‘आदिम शैली’’ के चित्र बनाए थे। ऐन्डू व्येथ एक विलक्षण वास्तववादी कलाकार थे और घास की पत्ती-पत्ती को उन्होंने वफादारीपूर्वक चित्रित किया था। उनके बाहरी प्राकृतिक दृश्यों और मकानों के भीतरी हिस्सों के चित्र संयोजन, रंगों के कुशल प्रयोग और भावात्मक विषय वस्तु के कारण स्मरणीय हैं। दूसरा विश्व युद्ध और उसके बाददूसरा विश्व युद्ध मनुष्य जाति के इतिहास में महत्वपूर्ण परिवर्तनों का समय था। सभी युद्धों में मृत्यु और विनाश अनिवार्य हैं। परन्तु इस बार ये जिस अत्यांतिकता के बिन्दु पर पहुँचे थे, वह अभूतपूर्व था।6 अगस्त, 1945 के दिन जब हिरोशिमा पर अणुबम का विस्फोट किया गया तब विनाश का तांडव चरम सीमा पर पहुँच गया था। 75-80,000 लोगों की तत्काल मृत्यु हो गई थी और बाद में दूसरे हजारों लोगों की विकिरण के प्रभाव से कष्टमय मृत्यु हुई। करीब-करीब सारे शहर का विनाश हो गया। दो दिन के बाद नागासाकी में इसी का पुनरावर्तन हुआ और जापान के आत्मसर्मपण के साथ दूसरा विश्व युद्ध समाप्त हो गया। यूरोप में युद्ध कुछ महीने पहले समाप्त हो गया था। जब मित्र राष्ट्रों के सैनिकों ने नाजी जर्मनी का जो शेष रह गया था, वहाँ कब्जा कर लिया। जुगुप्सा और भय के साथ उन्होंने नजरबन्दी शिविर देखे और रेल के डिब्बे भी पाए जहाँ यहूदियों, साम्यवादियों और नाजी सत्ताधीशों द्वारा अनापत्तिजनक माने गए अन्य लोगों को नष्ट कर दिया गया था, वहाँ नाजियों द्वारा किए गए अकल्प्य अत्याचारों के प्रमाण भी पाए गए। मृत्यु, यंत्रणाओं और नैराश्य के जिस माहौल में कलाकार जी रहे थे और कला-सृजन कर रहे थे इसे समझने के लिए मनुष्य के साथ मनुष्य द्वारा किए गए नृशंसा भरे व्यवहार का यह संक्षिप्त विवरण आवश्यक है और दूसरे विश्व युद्ध के बाद उन्होंने जो कला-सृजन किया उसमें मानव मूल्यों में संस्कृति के मानदंडो में उनके खोए हुए विश्वास की गहरी मुद्रा अंकित थी। यहाँ यह कहना भी प्रासंगिक होगा कि जब ‘‘यूरोप में संस्कृति के दीपकों को बुझाया जाने लगा’’ तो चित्रकार, मूर्तिकार और लेखक छिन्न-भिन्न हो गए। उनमें से कई अमरीका चले गए और अमरीकन कलाकारों ने उनके साथ विचार विनिमय किया। युद्ध के दौरान पैरिस के आत्मसमर्पण के बाद न्यूयॉर्क शहर दुनिया में कला की नवीन राजधानी बन गया। अमूर्त अभिव्यंजनावाददो विश्व युद्धों के बीच के समय के पैरिस के कलाकारों की अमूर्त कला और अभिव्यंजनावाद में अमरीकन कलाकारों को एक नवीन दृश्य माध्यम की सम्भावनाएँ नजर आईं जिसके द्वारा युद्धोत्तर समय की यंत्रणाओं और विक्षुब्ध हालत को व्यक्त किया जा सकता था। यह माध्यम था अमूर्त अभिव्यंजनावाद।यहाँ एक बात पर ध्यान देना चाहिए कि पॉल क्ली, वासिली कैन्डिन्स्कि, पीयत मॉन्ड्रियाँ और अन्य कई कलाकार एक ऐसे बिन्दु पर पहुँच गए थे जहाँ पहचानने योग्य रूप-विधान द्वारा जटिल मानवीय परिस्थिति और युद्धोत्तर समय के वैज्ञानिकों की विश्व-दृष्टि को व्यक्त नहीं किया जा सकता था। रंगों द्वारा और जिन्हें अचेतन मानस द्वारा निर्धारित माना जाना था, ऐसी आकृतियों से उत्तेजित होकर उन्होंने अमूर्त कला-कृतियों का सृजन किया। लेगर और मॉन्ड्रियाँ ने फुट्टा और सेट-स्क्वेयर की सहायता से रंग-बिरंगी ज्यामितिक आकृतियाँ बनाईं। उनके रंग जटिल मनोभावों से सराबोर थे। अब अमरीकन कलाकार अत्यांतिकता की सीमा पर पहुँच गए। उन्होंने चित्रफलक, रंग पट्टिका और तूलिकाओं के रूखसत दे दी। इन उपकरणों द्वारा कैनवस पर बनाए जाने वाले चित्र कालांकित और पुराने हो चुके थे। उन्होंने कैनवस को फर्श पर फैलाकर उस पर रंगों को टपकने दिया। रंगों को टपकाकर सूखने देने की यह सृजन-प्रक्रिया को इस तरह चालाकी से अपनाया जाता है कि इससे रंगों के अनियंत्रित संपुट बन जाते हैं जिन्हें अचेतन मानस की ‘क्रिया’ से निर्मित चित्र माने जाते हैं। जैक्सन पोलाक और विलेम द कूनिंग अमरीका के दो ‘‘क्रियात्मक कलाकार’’ (Action painter) थे। दोनों संवेदनशील कलाकार थे जिन्होंने आधुनिक कला के सभी सिद्धान्तों और सृजन पद्धतियों को पूरी तरह से समझ लिया था और आत्मसात् कर लिया था। परन्तु ऐसा लगता है कि युद्धोत्तर दुनिया की कला में सौन्दर्य के परम्परागत मूल्यों और नियंत्रित कार्यकौशल का कोई अर्थ नहीं रह गया था। क्रियात्मक चित्रों (Action paintings) का तत्कालीन कलाकारों द्वारा स्वागत किया गया और उनकी बहुत प्रशंसा की गई। यह अधिक चकित कर देने वाली तो इसलिए थी कि तीन दशक पूर्व 1913 में जब आर्मरी प्रर्दशनी के रूप में न्यूयॉर्क में पहली बार यूरोपीय कलाकृतियाँ प्रस्तुत की गईं तो अखबारों ने और जनमत ने उस प्रदर्शनी को बेतुका और ‘निरी धृष्टता’ बताया था। एक अखबार ने तो यहाँ तक कहा था कि यह प्रदर्शनी ‘पागलपन को फलदायी बना रही थी।’ न्यूयार्क टाइम्स ने उस प्रदर्शनी को ‘रोगात्मक’ बताकर उसकी अवहेलना की और ‘घनवादी’ और ‘भविष्यवादी’ कलाकारों पर ‘राजनैतिक अराजकतावादियों के बांधव’ होने का आक्षेप किया। एक समय में जो अमरीकी जनता और विशिष्ट वर्ग के लिए अस्वीकार्य था, वही अब फैशन बन गया है। जैक्सन पोलाक और विलेम द कूनिंग ने कला के विषय में, यानी आंदोलनों, शैलियों और सृजन-प्रक्रिया के विषय में अमरीका का आधिपत्य जमाना शुरू किया। ये सब दुनिया भर में फैले हुए बेतुकेपन की हद तक पहुँच गए। निकी द सेंट-फाले एक ऐसे कलाकार थे जो रंगों से भरी प्लास्टिक की थैलियों को फर्श पर फैलाए हुए कैनवस पर लटकाकर उन थैलियों को शॉट-गन से उड़ा देते थे। तब रंग गिराने से कैनवस पर जो आकस्मिक आकृतियाँ बन जाती थीं, उन्हें कलाकृति बताया जाता था। पॉप कलापॉप कला या पॉपुलर कला पॉप संगीत के समानांतर कला थी जिसमें हमारे समय की कला के क्षेत्र में अमरीका का महत्वपूर्ण योगदान है। न्यूयार्क के गगेन्हाईम संग्रहालय के संग्रहपाल लॉरेंस एलोय ने यह नाम प्रचलित किया और देखते-देखते ही इस कला-स्वरूप ने विश्वव्यापी आंदोलन का रूप ले लिया। 1960 के दशक में पॉप कला के प्रमुख प्रतिनिधि रॉबर्ट-रॉशेन्बर्ग को वैनिस द्विवार्षिक प्रदर्शनी में प्रथम पुरस्कार दिया गया, इसके साथ इस कला-प्रकार को मान्यता प्राप्त हो गई और स्वीकृति मिल गई।पॉप कलाकार जन संचार के माध्यमों द्वारा प्रचलित किए गए प्रतीकों और रूपकों का प्रयोग करते रहे हैं - जैसे कि अमरीकन राष्ट्रध्वज, लाइफ मैगजीन का मुखपृष्ठ, मारिलीन मनरों और एलिजाबेथ टेलर जैसी सिने-तारिकाओं, कैम्पबेल सूप के डिब्बे और ब्रिलो के कार्टन जैसे उपभोक्ताओं में लोकप्रिय चीजें, वर्णमाला के अक्षर, सड़कों के नामपट्ट, मरे हुए पक्षी, हैम्बर्गर आदि। रोजाना जीवन की ऐसी तुच्छ चीजें पॉप कलाकारों के लिए सृजन की विषय बन गईं। पॉप कला के पुरस्कर्ता रॉय लिचेंस्टाइन ने इसका बड़े ही चित्रमय ढंग से वर्णन किया है - ‘‘पॉप कला प्रयोगशीलता विरोधी, चिंतनात्मकता-विरोधी, अर्थछटा-विरोधी, आयताकार से दूर भागने की विरोधी है। वह गति और प्रकाश की विरोधी है, रंग और गुणवत्ता की विरोधी है, जैन-दर्शन की विरोधी है और पूर्वगामी आंदोलनों के उन सभी प्रतिभाशाली विचारों की विरोधी है।’’ कॉमिक्स चित्र-पट्टियों को सौ गुना बड़ा करके उन पर चित्र बनाकर सुन्दर फ्रेमों में मढ़कर प्रदर्शित करना लेचेंस्टाइन की विशेषता रही है। परिचित कॉमिक्स की चित्र पट्टियाँ उनके चित्रों के विषय बन गईं। रॉबर्ट रोशेन्बर्ग और जैस्पर ज्हॉन्स इस आंदोलन के मुख्य प्रणेता थे। ‘‘मिश्र संयोजन’’ (combines) के नाम से जानी गई शैली रोशेन्बर्ग की विशेषता है। उन्होंने अखबारों की कतरनें, चीथड़े, रस्सियाँ, धागे, सपाट बना दिए गए एल्युमीनियम के डिब्बे, मरे हुए पक्षी आदि का प्रयोग किया और अनियमित ढंग से अपने कैनवसों पर लगा दिए। इसमें उन्होंने आकस्मिकता की महत्वपूर्ण भूमिका के लिए गुंजाइश रखी। फोटोग्राफों के भिन्न-भिन्न रंगों में सिल्क-स्क्रीन के माध्यम से बनाए गए प्रतिरूप भी कला के नाम से चल गए। जैस्पर जहॉन्स अपने दो कीलों पर टिकी हुई बैटरी या बिना बल्ब की टूटी हुई टॉर्च लाइट द्वारा बनी मूर्ति कला के लिए मशहूर हो गए। इसके बाद वे बीयर के टीनों का प्रयोग करते रहे हैं। फेंक दी गईं रोजाना काम की चीजों को उनकी कलाकृतियों में नई जिन्दगी मिल गई और उन्हें एक विशिष्ट ‘‘कला संदर्भ’’ दिया गया और प्रतिष्ठित आर्ट गैलरियों में इन कलाकृतियों को प्रदर्शित किया जाता है। पॉप कला के क्षेत्र में एक दूसरा बड़ा नाम ऐन्डी वाहोल का है। कैम्पबेल सूप के छः फुट लम्बे टीनों और कोका-कोला की महाकाय बोतलों के सिल्क-स्क्रीन द्वारा प्रतिरूप बनाना उनकी विशेषता है। उन्होंने अपनी कला के बारे में सफाई देते हुए कहा है - ‘‘मैं ऐसे चित्र इसलिए बना रहा हूँ कि मैं एक मशीन चाहता हूँ और मुझे ऐसा लगता है कि मैं मशीन की तरह करता रहूँ वही मैं करना चाहता हूँ।’’ ऑप या दृष्टिपटल की कलाअमरीकन पॉप आर्ट के विरोध में यूरोपियन प्रतिक्रिया के रूप में ऑप कला आई। इसे दृष्टिपटल की कला का नाम भी दिया गया है। यह कला शैली पूर्ण रूप से दृश्य संघात पर निर्भर है। ऑप कला ‘‘ऑप्टिकल कला’’ से आया हुआ नाम है जिसमें रेखाएँ, धारियाँ, बिन्दु, वर्तुल, त्रिकोण, चौरस और अन्य भौमितिक आकृतियाँ दर्शकों के दृष्टिपटल पर प्रभाव डालती हैं। यह कला काफी हद तक संयोजक और उनके परस्पर प्रभाव पर निर्भर है। ऑप शैली की ‘‘आँखों में झुनझुनी लाने वाली, आँखों में कसक पैदा करने वाली और आँखों को झटका देने वाली महान कलाकृतियाँ मूलतः परिप्रेक्ष्य के विकृतीकरण पर निर्भर हैं जिसके द्वारा ऐसी छटाएँ और छोटी-छोटी लहरें दीखने लगती हैं जो वास्तव में उन कृतियों में होती ही नहीं हैं।’’ऑप कला ने मूलतः गतिहीन माध्यम द्वारा गति का भ्रम पैदा किया। अगर कोई दर्शक उन चित्रों को एकटक देखता रहे तो उनमें उसे छोटी लहरें और तरंगें दिखाई देती हैं जिनका वास्तव में अस्तित्व नहीं होता है। ऑप शैली के चित्र वैज्ञानिक ढंग से निर्धारित किए जाते हैं और अधिकतर वे बहुत बड़े पैमाने पर बनाए जाते हैं। ऑप कला का इतना ही स्वागत किया जाता है और उसे वही महत्व दिया जाता है जो 15वें शतक में परिप्रेक्ष्य के शोध को दिया गया था। घनवाद के बाद उसे कला के क्षेत्र में सबसे बड़ा बदम माना जाता है। मानचित्र के फुट्टे, कम्पास और दूसरे यांत्रिक उपकरणों की सहायता से इन चित्रों का निर्माण किया जाता है। अभिव्यंजनावादी चित्रकारों की अमूर्त की भावुकता को ऑप कलाकारों ने तिरस्कार से देखा। क्रियात्मक चित्रों (Action paintings) में आकस्मिकता को दिए गए महत्व का उन्होंने उपहास किया। ऑप कलाकारों की अकृत्रिमता और अश्लीलता की भी पॉप कलाकारों ने हँसी उड़ाई। ऑप कलाकार आग्रहपूर्वक यह मानते हैं कि वे सेजाँ, सूआर्ट और मॉन्ड्रियाँ के सीधे वंशज हैं। उनका कहना है कि उनकी कला शैली और रंगों के संयोजनों के विषय में सेजाँ की सूआर्ट के बिन्दु चित्रण (paintillism) की और मॉन्ड्रियाँ के ज्यामितिक संयोजन आदि की प्रेरणा रही है। गत्यात्मक कलागत्यात्मक कला चित्रों और मूर्तिकला के परिणामों को विस्तृत कर देती है। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार ‘कनेटिक’ का अर्थ होता है ‘‘गति का’’ और गतिज गत्यात्मक कला का सर्व सारांश है।गत्यात्मक शैली के कलाकारों की यह मान्यता रही है कि आज की कला के द्वारा अगर इस युग की भावनाओं को प्रतिबिम्बित करना है तो परंपरागत चित्रों और शिल्प कृतियों की स्थैतिक कला में गति लाना आवश्यक है। गत्यात्मक कलाकारों की राय है कि अंतरिक्ष यात्रा के इस युग में स्थैतिक चित्रों और शिल्पकृतियों को रूखसत देनी चाहिए और ऐसा करने वाले वे प्रथम भी नहीं हैं। कोई 40 साल पहले लेज्लो मोहोली-नेगी, फ्रांसिस पिचाबिया, नोमगैबो, मार्सेल दूशाम्प और मॉन रे ने इस सवाल को लेकर बहस चलाई और ‘‘असंगत मशीन चक्रीय गोलार्धों और अन्य उपकरणों जैसे कि बने-बनाए उपकरणों के साथ प्रयोग किए। अमरीकी मूर्तिकार अलैक्जेन्डर काल्डर इन कलाकारों में सबसे मशहूर हो गए। ‘‘गत्यात्मक शिल्पों’’ द्वारा शिल्पकला के क्षेत्र में क्रांति आ गई। उसकी धातु की बनी कृतियाँ हवा में लटकाई जाने पर हिलती और घूमती थीं। मूर्तिकला के क्षेत्र में यह एक क्रांतिकारी संकल्पना थी। छत से लटक रही, हवा के साथ हिलने वाली और आवाज भी निकालने वाली शिल्पकृति - यह एक क्रांतिकारी कल्पना है। काल्डर ने महीन तारों और धातु की वजन में हल्की और विचित्र आकारों की पट्टियों का प्रयोग किया। मूर्तिकला को अवकाश में गति प्रदान की गई। फ्रेंक मलीना ने बिजली की लाइट के साथ चित्र (electro-paintings) बनाएँ है। मलीना के चित्र का मूल संयोजन साधारण तरीके से पारदर्शक स्टेटर पर अंकित किया जाता है जिसे एक फ्रेंम में लगाकर दीवार पर लटकाया जाता है। स्टेटर के पीछे अनेक चित्रित घूर्णक होते हैं जो बिजली की शक्ति से हिलते रहते हैं। इस प्रकार स्टेटर पर दर्शक को रंगों की विविध आकृतियाँ दिखाई देती हैं। फ्रेंच कलाकार निकोलस शोफर ने ऐसी गत्यात्मक शिल्पकृतियाँ बनाई हैं। इनमें धातु के वक्र और कोणिक टुकड़ों को एक रंगीन घूमती हुई चर्खी और बिजली की बत्ती के साथ उसमें और आड़े लगा दिए जाते हैं। इस गत्यात्मक मूर्तिकला द्वारा बड़े पारदर्शक पर्दे पर दिलचस्प आकृतियाँ प्रतिबिम्बित होती हैं। संगीतमय चित्रजर्मन कलाकार गुन्तर मॉस के ‘देखे और सुने जाने वाले चित्रों’’ का भी उल्लेख करना चाहिए। यूरोप, मिस्र और भारत की यात्रा के बाद उन्होंने ‘‘श्रव्य-दृश्य’’ चित्रों की खोज की। उनकी कलाकृतियों में संगीत केवल साथ ही नहीं देता है। आकृतियों और रंगों को ध्वनियों में परिवर्तित किया जाता है। चित्रों की मूल ज्यामितिक आकृतियों को ‘‘डायापॉजिटिव’’ प्रक्रिया द्वारा ध्वनियों में रूपान्तरित किया जाता है, त्रिकोण की दूसरी तरह से तथा आयत की और तरह से।नियोन कलानियोन मूर्ति-चित्र की कला भी इस सर्वेक्षण की सीमा में आ जाते हैं। न्यूयार्क के टाइम्स-स्क्वेयर में नियोन लाइट द्वारा दिए जाते इश्तिहारों से मुग्ध होकर यूरोप के कलाकारों ने चकाचौंध कर देने वाली चलित शिल्पकृतियों का सृजन करना आरम्भ किया। फ्रांसीसी मूर्तिकार मॉर्तियल राइसे रेडियो के पूर्जे और टूथब्रुशों का प्रयोग करके शिल्प बनाते थे, पर अब उन्होंने कल्पनापूर्ण नियोन लाइट के सहारे शिल्प कृतियाँ बनाना शुरू किया। वे आग्रहपूर्वक कहते हैं कि उनकी कृतियाँ रास्तों के नामपट्ट नहीं, बल्कि कला के नमूने हैं। उदाहरणार्थ उनकी एक कृति ‘फूल का गमला’ (Flower Pot) है जो अंशतः शिल्प और अंशतः चित्र है। इसमें पहले प्रकाश धीरे-धीरे गमले पर, फिर डंडियों पर और अंत में फूलों पर फैलता जाता है।कुछ टिप्पणियाँयहाँ तक आकर दूसरे विश्व युद्ध के बाद कला के क्षेत्र में जो गतिविधियाँ हुईं। इनका संक्षेप में सर्वेक्षण करना आवश्यक है। आधुनिकतावादी आंदोलन 19वीं शताब्दी के सौन्दर्यपरक मूल्यों के उग्र अस्वीकार के रूप में आया। यह कला-विरोधी (Anti-Art) आंदोलन सामानांतर गतिविधियों के रूप में उपन्यास विरोधी, साहित्य-विरोधी और बेतुका नाटक के आंदोलन के रूप में भी हुआ।उपरोक्त गतिविधियों का देखते हुए यह स्पष्ट है कि सौन्दर्यपरक विचारां और कला की प्रक्रियाओं के परिवर्तन विज्ञान और प्रौद्योगिकी का प्रमुख प्रभाव रहा है। नए अस्थाई उपकरणों का सम सामयिक कला में अधिकाधिक प्रयोग किया जाता है, जिसमें प्लास्टिक, प्लेक्जीग्लास से लेकर बेकार चीजों की कतरने और टुकड़े आ जाते हैं। जैसे कलाकार का निर्व्यक्तीकरण हो गया है वैसे ही कला में भी अमानवीय तत्व आ गए हैं। मानवीय परिस्थिति, समय और स्थल की विशिष्टता बिल्कुल ही अदृश्य हो गए हैं। रंगों और अमूर्त आकृतियों ने कलाकारों को इस तरह मोहित कर दिया है कि अपने चित्रों को और शिल्पकृतियों को वे ‘‘शीर्षकहीन’’ बताते हैं। लगता है कि कलाकारों के पास कला को चाहने वालों तक संप्रेशित करने के लिए कुछ भी शेष नहीं रह गया है। कुछ आशा प्रेरक लक्षणहम 21वीं शताब्दी के प्रांगण पर खड़े हैं और भावी गतिविधियों का पूर्वानुमान कर रहे हैं, तब हम पीछे मुड़कर कुछ महत्वपूर्ण प्रवाहों को देख लें यह उचित होगा।संचार के मुद्रित और इलैक्ट्रॉनिक दोनों माध्यमों में जो असाधारण प्रगति के साथ-साथ आज के कलाकारों ने काफी प्रगति कर ली है जिसका पिछली शताब्दी के कलाकार तो सपना भी नहीं देख सकते थे। अखबार, रेडियो और टेलीविजन के द्वारा कलाकारों को लोगों के सामने आने के अच्छे अवसर मिल रहे हैं। इस शताब्दी के आरम्भ के दिनों में कलाकारों को आर्ट गैलरी में हो रही प्रदर्शनियों और वह भी अल्पकालिक पर ही निर्भर रहना पड़ता था। बहुत हुआ तो दो-पाँच सौ लोग उन प्रदर्शनियों में जा सकते थे। इन दिनों करोड़ों लोग टेलीविजन पर कलाकृतियों को देख सकते हैं और कलाकारों के साथ होते साक्षात्कारों द्वारा उनको सुन सकते हैं। पुस्तकों और चित्रों के पुनर्मुद्रण और शिल्पकृतियों की प्रतिकृतियों द्वारा कलाकार और उनके सृजन हमारे ड्राइंग रूम में आ सकते हैं। वीडियो टेप द्वारा भिन्न-भिन्न संग्रहालयों और आर्ट गैलरी के कला-संग्रह, कला के सृजन के समूचे काल और कलाकारों की उपन्यासों के रूप में लिखी गई जीवनियाँ भी हमारे सामने आ जाती हैं। वृत्तचित्रों और फीचर फिल्मों द्वारा कलाकार और उनके कला-सृजन बड़ी संख्या में वीडियो देखने वाले लोगों के करीब आ गए हैं। ऑस्ट्रियन कवि, सौन्दर्यशास्त्र के मीमांसक अर्न्स्ट फिशर जो कुछ समय के लिए अपने देश में शिक्षा मंत्री के पद पर थे, उन्हांने अपनी पुस्तक दि नेसेसिटी ऑफ आर्ट के अंत में लिखा है - ‘‘मनुष्य जिसने अपने कार्य द्वारा मनुष्यत्व प्राप्त किया, जो पशु सृष्टि से बाहर आकर प्राकृतिक एवं कृत्रिम में रूपान्तर करने लगा और इसी को लेकर वह एक जादूगर बन गया। सामाजिक यथार्थ के सृष्टा के रूप में मनुष्य हमेशा महान जादूगर ही रहेगा, वह स्वर्ग में अग्नि को पृथ्वी पर लाने वाला प्रोमीथियस रहेगा, हमेशा वह संगीत से भावविभोर कर देने वाला ऑर्फियस ही रहेगा। जब तक मानवता नहीं मरती तब तक कला नहीं मरेगी।’’ भारत में आधुनिक कलाअब तक आधुनिक कला का जो विवरण दिया गया है उसका सम्बंध विशेष रूप से पाश्चात्य दुनिया से है, जहाँ उसका प्रथम उद्भव हुआ था। दुनिया में अन्यत्र भी कला के क्षेत्र में अनेक परिवर्तन आए और वहाँ जिस प्रकार की कला उद्गम हुआ वह परम्परागत कला और कला की प्रक्रियाओं से अत्यंत भिन्न थी। वह समकालीन कला थी क्योंकि उसे इन देशों की भूतकालीन कला से अलग करके देखा जा सकता है, परन्तु यहाँ कला की गतिविधियाँ पूर्णतया पश्चिम के अनुसार ही नहीं हुईं। इन देशों में कला का विकास बिल्कुल ही भिन्न परिस्थिति में हुआ जो यूरोप के संस्थानवाद के कारण निर्मित हुई थी। 18वीं शताब्दी के बाद भारत के राजा एक-एक करके अंग्रेजों के साम्राज्यवादी शासन में आ गए तो भारतीय कला की हालत निराशाजनक हो गई और उसके पनपने की कोई गुंजाइस नहीं रह गई।चित्रकला, मूर्तिकला और स्थापत्य कला से सम्बंधित भारतीय कला की परम्परा गुफाओं में, महलों में, मस्जिदों में तथा मन्दिरों के खंडहरों में और उजड़े हुए नगरों में छिपी रह गई थी। कलाकारों और दस्तकारों को राजाओं की ओर से जो आश्रय मिल रहा था वह बंद हो गया, क्योंकि कलाकृतियों को खरीदने वाले राजसी वंश ही बहुत ही कम रह गए थे और अंग्रेज शासकों की ओर से भी भारतीय कलाकारों को आश्रय नहीं मिल पा रहा था। पंजाब के पहाड़ी इलाकों में और राजस्थान में इधर-उधर कुछ राजवंशी परिवार थे। कलाकार मुगल और राजस्थानी शैली में काम करते रहे लेकिन उन कलाकारों की संख्या दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही थी। विदेशी शासन में भारत में परिवर्तन आ रहा था। कलकत्ता, बम्बई और मद्रास कला के महत्वपूर्ण शहरी केन्द्र बन गए और अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार के साथ एक नए ढंग की शहरी सभ्यता का विकास होने लगा। विदेशियों के आर्थिक और राजनैतिक आधिपत्य के परिणामस्वरूप भारत की सभ्यता पर भी उनका आधिपत्य स्थापित हो गया। 1857 के तुरन्त बाद बम्बई, कलकत्ता और मद्रास में कला की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना की गई। ब्रिटिश रॉयल अकादमी के मॉडल के अनुसार इन संस्थाओें की अध्यापन पद्धति और पाठ्यक्रम निश्चित किये गये थे। भारतीय विद्यार्थी कैनवस पर तैलरंग, कागज पर जलरंग जैसे नए उपकरणों का प्रयोग करने लगे और स्टूडियो में प्राप्त मॉडल के आधार पर रेखांकन करने और चित्र बनाने जैसी कला की प्रक्रियाओं से परिचित होने लगे। इन संस्थाओं में भारत के परम्परागत कला विषयक सिद्धांतों के अनुसार वस्तुओं और जीवित मॉडलों की यथावत् नकल उतारना कभी भी निर्दिष्ट नहीं था। बजाय इसके, उनके मूल तत्वों से चित्रित समानकों के रूप में प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण समझा गया। चीन और जापान में भी कला के विषय में ऐसे ही सिद्धांत प्रचलित थे। कुछ पीढियों तक भारतीय कलाकारों ने कला के यूरोपीय उपकरणों तथा सृजन-पद्धतियों के प्रयोग में और चित्रांकन की पद्धति में निपुणता प्राप्त की। परन्तु इसके साथ ही भारत के अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त शहरी मध्यम वर्गीय लोगों के विचारों में अधिक दूरगामी परिवर्तन आने लगे। ब्रिटिश शासन के अनिष्ट स्वरूप के प्रति वे अधिकाधिक जागृत होने लगे। 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक तक भारत एक राष्ट्र के रूप में उभर आया और उसने विदेशी शासन की आलोचना की, उन शासन का विरोध किया और उसके विरूद्ध संघर्ष किया। राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित होकर विद्वानों, कवियों और कलाकारों ने भारत की सांस्कृतिक विरासत को पहचाना। साहित्य और दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में विलियम जोन्स मैक्स म्यूलर जैसे यूरोप के विद्वानों ने भारत की विरासत को प्रकाश में लाने के जो प्रयास किए उनसे भारतीयों का राष्ट्रीय गर्व पुष्ट हुआ और उन्हें अपनी राष्ट्रीय पहचान ढूँढ़ने की प्रेरणा मिली। इस दरमियान भारत में जो कला-सृजन हुआ उसमें प्रारम्भिक प्रेरणा राष्ट्रवाद और देशभक्ति की थी। भारत की भूतकालीक कला की विरासत की खोज करने की और शिक्षा संस्थाओं में जो सिखाया जाता था। उससे भिन्न ‘भारतीय कला’ का सृजन करने की इच्छा उनमें जाग उठी थी। पुरातत्व के क्षेत्र में जो महत्वपूर्ण खोजें हुईं उनसे भी भारत की पहचान ढूँढ़ने के प्रयासों में और भी सहायता मिली। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के अवशेषों की खोज ने भारत के सांस्कृतिक इतिहास की प्राचीनता में दो हजार साल बढ़ा दिए। 19वीं शताब्दी में अजन्ता के भित्ति चित्र और एलोरा के गुफा मन्दिरों की मूर्तिकला का पता चलने पर इस शताब्दी के कई भारतीय आंदोलनों को बढ़ावा मिला। नंदलाल बोस और अन्य युवा कलाकार इन गुफा मन्दिरों में पहुँच गए और वहाँ के भित्ति चित्रों का बारीकी से निरीक्षण किया। इससे उन्हें ईसा पूर्व के प्रथम शतक पहले की चित्रकला की भारतीय परम्परा का ज्ञान मिला और उन्होंने उसका महत्व पहचाना। इस शतक की कला के आंदोलन के विषय में यह कहा जा सकता है कि उसे प्रारम्भिक प्रेरणा नए उभर रहे राष्ट्रवाद से, विदेशी कला के विरोध में सही मायने में राष्ट्रीय कला का सृजन की इच्छा से मिली। ठीक उसी समय त्रावनकोर के राजवंशी के परिवार के राजा रविवर्मा आए जो एक अनोखे चित्रकार थे। उन्होंने मद्रास में चित्रकला का अध्ययन किया था और व्यक्ति चित्र बनाना उनकी विशेषता थी। उनको अनेक पारितोषिक भी प्राप्त हुए थे। वे भारतीय मन्दिरों की शिल्पकला से भी परिचित थे। रॉयल अकादमी के प्रकृतिवाद को उन्होंने पौराणिक कथाओं और दन्त कथाओं से जोड़ दिया। रवि वर्मा ने भारतीय महाकाव्यों और अन्य संस्कृत साहित्य में वर्णित प्रशंगों के आधार पर चित्र बनाए। अपनी असाधारण सर्जक-प्रतिभा को काम में लाकर उन्होंने भारत के अतीत की सजीव प्रतिभा का सृजन किया। बांग्ला शैली (Bengal School) की कला के आंदोलन में कविवर रविद्रनाथ टैगोर के भतीजे अवनीन्द्रनाथ टैगोर और गगनेन्द्रनाथ टैगोर का प्रमुख योगदान था। ई. वी. हैवेल और आंनद केन्टिश कुमारस्वामी ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक में हैवेल कलकत्ता के आर्ट स्कूल में प्रिंसिपल बनकर आए थे। अवनीन्द्रनाथ भी उसी कॉलेज में पढ़ाते थे। हैवेल ने भारत की क्लासिकी कला और मध्यकालीन मुगल शैली के लघु चित्रों की समृद्ध विरासत की ओर अवनीन्द्रनाथ का ध्यान आकर्षित किया। अवनीन्द्रनाथ ने कला विषयक प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन किया उन्होंने इस विषय पर लिखा और अपने आस-पास के विद्यार्थीयों के समूहों के सामने इनके बारे में बातें भी कीं। कुमार स्वामी की पुस्तकों से और उनके साथ की गई लम्बी चर्चाओं से भी उन्होंने बहुत कुछ पाया। कुमार स्वामी श्रीलंका में पैदा हुए थे। वे वहाँ के एक बहुत बड़े तमिल अमीर और राजनैतिक नेता के पुत्र थे। हालाँकि कुमारस्वामी ने भूस्तर विधा की शिक्षा ली थी, उन्होंने अपनी सफल जीविका छोड़ दी और श्रीलंका की उस समय की कला और दस्तकारी अध्ययन शुरू किया। कई सालों तक वे भारत में रहे और भारतीय कला के इतिहास और विकास के विषयों पर अनेक आधारभूत ग्रंथ लिखे। इन लोगों ने अपने मित्रों और प्रशंसकों के साथ मिलकर जिस कला शैली का प्रचार किया उसे बांग्ला शैली का नाम दिया गया। उनके चित्रों के विषय अधिकतर भारत की पौराणिक कथाओं, पुराणों और क्लासिकी साहित्य के संबन्धित होते थे। भारतीय चित्र कला नियमों और परम्परा के आधार पर उन्होंने जलरंगों में और अधिकतर तो सीमित रंगों में छोटे-छोटे चित्र बनाए। अवनीन्द्रनाथ जापान के जलरंगों में किए गए वाश-पेन्टिंग्ज से प्रभावित हुए थे। इस शैली के चित्रों में नाजुक रंग-संगति और उजाले-अंधेरे के रहस्यमय भाव जगाने वाले क्षेत्र पाए जाते हैं। बांग्ला शैली की कला की सर्जकता शांतिनिकेतन में मोटे तौर पर पल्लवित हुई जहाँ रविन्द्रनाथ ने कला-भवन की स्थापना की थी। नंदलाल बोस, विनोद बिहारी मुकर्जी और रामकिंकर बैज-इन तीन कलाकारों का शांतिनिकेतन में बड़ा प्रभाव था। नंदलाल बोस, अत्यन्त प्रतिभाशाली चित्रकार थे और उनका झुकाव राष्ट्रवादी था। उन्होंने लोक-कला से भी प्रेरणा पाई। हरिपुरा कांग्रेस के अधिवेशन के लिए उन्होंने बड़े-बड़े पोस्टर बनाए थे। उनके पीछे लोक-कला की ही प्रेरणा थी। विनोद बिहारी मुकर्जी भी एक महत्वपूर्ण चित्रकार थे। वे प्राच्य कला की परम्परा से अत्यन्त प्रभावित थे। रामकिंकर भी एक महान कलाकार थे, उनमें असीम सहज प्रेरणा थी और भरपूर शक्ति थी। उनकी शिल्प कृतियों का स्रोत भारत की धरती में था। बांग्ला शैली और मुख्यतः बांग्ला और उड़ीसा की लोक-कला की शैली और 19वीं शताब्दी के कलकत्ता के कालीघाट चित्रों से प्रभावित होकर यामिनी राय आए। उन्होंने कम से कम रेखाओं द्वारा सपाट सतह पर चटकीले रंगों के चित्रों का सृजन किया। लोक-कला की परम्परा से प्राप्त की गई रेखाओं और रंगों में सरल किन्तु सशक्त हलचल के द्वारा उन्होंने जो चित्र बनाया वे भारत की आधुनिक कला के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान पा चुके हैं। इस शतक के पूर्वार्द्ध में भारत की कला पर कला-संस्थाओं, कलाकारों के संघों और चित्र प्रदर्शनियों पर ब्रिटिश कला का भारी वर्चस्व था। कई बार प्रदर्शनियों का उद्घाटन गवर्नरों के द्वारा होता था। ब्रिटिश अफसरों के व्यक्ति चित्र बनाने का काम देकर वे कलाकारों को आश्रय देते थे। भारतीय दृश्यों-परिवेशों के चित्र वे खरीद लेते थे। आजादी के पूर्व के समय में इस उपमहाद्वीप में दो महत्वपूर्ण कलाकार हुए जिन्होंने पश्चिम की कला को, ‘‘आधुनिक’’ भावना और आधुनिक अभिव्यक्ति को पूरी तरह समझ लिया था। उनमें से एक थीं अमृता शेर-गिल और दूसरे थे जार्ज कीट। अमृता शेर-गिल के पिता पंजाब के एक धनवान और संस्कारी सिख थे और माता एक हंगेरियन कलाकार थीं। अमृता ने कला की शिक्षा पैरिस और बुडापेस्ट में पाई थी। वे विलक्षण प्रतिभा से सम्पन्न थीं और यह एक करूणता है कि 30वें जन्मदिन के पहले ही उनकी मृत्यु हो गई। उन्होंने आरम्भ प्रभावशाली शैली से किया और बाद में गोगाँ की अभिव्यंजनात्मक के बाद की कला (Post-Expressionism) की शैली अपना ली। उनकी रंग पट्टिका चटकीले रंगों से समृद्ध थी। उन्होंने कुछ व्यक्ति चित्र बनाए, परन्तु उनसे अधिक तो उन्होंने पंजाब के किसानों के चित्र बनाए जिसमें अधिकतर चित्र स्त्रियों के थे। अमृता दक्षिण भारत में रहीं और वहाँ अनेक चित्र बनाए। नई दिल्ली के आधुनिक कला के राष्ट्रीय संग्रहालय में संग्रहीत अमृता के तैलचित्रों का एक बहुत बड़ा संग्रह है। इन चित्रों में विषयों का वैविध्य है, रंगों की समृद्धि है। उनमें मानव आकृतियाँ गोगाँ की आकृतियों की तरह निराली हैं और कृषकाय हैं। परन्तु ये मानव आकृतियाँ पूरी तरह भारतीय हैं। दूसरे कलाकार जार्ज कीट थे। हालाँकि वे स्वयं भारतीय कला के आंदोलन से संलग्न नहीं थे, उन्होंने अनेक कलाकारों को प्रभावित किया। वे डच-सिंहल वंश के श्री लंका वासी थे। उन्होंने भारत के प्राचीन क्लासिकी ग्रन्थों का गइराई से अध्ययन किया था और वे एक उत्कृष्ट चित्रकार थे। वे ‘43 आंदोलन’ के प्रणेताओं में से एक थे जो श्री लंका की आधुनिक कला का आंदोलन था। भारत का जो कुछ था वह कीट को आंतरिक बुद्धि और सहज रूप से ही समझ में आ जाता था। उनका रंग-संयोजन सशक्त था और शैली उनके अपने ढंग से घनवादी थी, जिसमें गतिमान रेखाएँ विभिन्न रंगो को समन्वित रूप से बाँध लेती थीं। रवीन्द्रनाथ टेगौर अपने साठ वर्षां को पार करने के बाद, बल्कि सत्तर वर्ष के करीब पहुँचने पर एक प्रमुख कलाकार के रूप में उभर आए। कुछ रोचक परिस्थिति में उन्हें अपनी चित्रात्मक अभिव्यक्ति का एहसास हुआ। जब भी एक पन्ने पर वे कविता या गद्यांश लिखते थे तो लिखने में कुछ गलतियाँ सुधारनी हों या कुछ काटना हो तो उस हिस्से को वे काला कर देते थे। उन काले हिस्सों को उन्होंने रेखाओं से जोड़ना शुरू किया और यह करते-करते आकृतियाँ और डिजाइन बनते गए। जल रंग, क्रेयॉन और मिश्र माध्यमों से बनाए गए अनेक चित्रों को लेकर रवीन्द्रनाथ एक महत्वपूर्ण चित्रकार बन गए। उनके चित्रों में वैयक्तिकता की प्रबल छाप है और उनके मनोभाव उन चित्रों में अंकित हो गए हैं। बांग्ला शैली का उन पर कोई प्रभाव नहीं था। उनकी शैली नितांत अपनी ही थी। 1930 के दशक के अंत तक कलाकारों द्वारा एक आंदोलन के रूप में भारतीयता की खोज क्षीण हो चुकी थी। नई आर्थिक और राजनैतिक शक्तियाँ भारत में सामाजिक परिवर्तन लाने लगी थीं और दुनिया धीर-धीरे दूसरे विश्वयुद्ध की ओर बढ़ रही थी। भारत का स्वातंत्र्य-संग्राम अधिक उग्र बन रहा था। नई पीढ़ी के कलाकारों के विचार में भूतकाल के चित्रों और बांग्ला शैली के हल्के, पसरते जल-रंगों में बनाए गए चित्र (wash) समकालिक यथार्थ को प्रतिबिम्बित नहीं कर रहे थे। युद्ध के दौरान पुस्तकों और चित्रों के मुद्रणों के जरिए भारतीय कलाकार यूरोप के आधुनिक कला के आंदोलनों से परिचित होने लगे। प्रभावादी, घनवादी और अभिव्यंजनावादी कलाकारों की उपलब्धियों से नई पीढ़ी के कलाकार अत्यंत प्रभावित हुए। विश्व युद्ध के दौरान 1943 में कलकत्ता के चित्रकारों ने यूरोप की आधुनिकतावादी दृश्य अभिव्यक्ति और सृजन शैली को भारतीय संवेदनाओं और देश की तत्कालीन मानवीय परिस्थिति के संदर्भ में प्रतिपादित किया। परितोष सेन, नीरद मजूमदार, बी.सी. सान्याल और प्रदोष दास गुप्त इस गुट के प्रमुख कलाकार थे। 1948 में बम्बई में फ्रांसिस न्यूटन सूजा की सूक्ष्मदृष्टि और पहल से प्रगतिशील कलाकार संघ (Progressive Artists Group) की स्थापना हुई। यह भी एक महत्वपूर्ण घटना थी। अपने राष्ट्रवादी उत्साह और वामपंथी झुकाव के कारण सूजा को बम्बई के सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट से निष्कासित कर दिया गया था। वे एक विद्रोही चित्रकार थे जिन्होंने पुराने मानकों और परम्पराओं का प्रबल विरोध किया था। उनके चित्र अभिव्यंजनावादी रंग-संयोजन और शैली में बनाए गए थे और उनमें मनुष्य की तत्कालीन स्थिति पूर्ण रूप से छाई हुई थी। सूजा ने के. एच. आरा के साथ लिखा जिसने मोटरकार के क्लीनर के रूप में अपना जीवन आरम्भ किया था और बाद में वह धीरे-धीरे कलाकारों के आधुनिकतावादी आंदोलन में शामिल हो गये थे। फलों, नारी-आकृतियों और प्राकृतिक दृश्यों के ‘आदिम’ शैली में बनाए गए उनके चित्रों में रंगों की मोहकता और जीवंतता पाई जाती है। इनके अलावा एस. ए. रजा भी थे जो स्व-प्रयत्न से चित्रकार बने थे। जलरंगों में बनाए गए वर्षा में सराबोर बम्बई के उनके चित्र प्रभावशाली थे। इसी समय के अन्य महत्वपूर्ण कलाकारों में के. के. हेब्बर, शावक्स चावड़ा, एस. के. वाकरे आदि है। एच. ए. गाड़े पहले कला-शिक्षक थे और बाद में चित्रकार बन गए और एम. एफ. हुसेन जिसने नाम-पट्टियों के पेन्टर के रूप में आरम्भ किया अब मशहूर चित्रकार हैं। इसके बाद बड़ौदा विश्वविद्यालय के आर्ट कॉलेज में कला की शिक्षा पाकर बड़ी संख्या में युवा कलाकार सामने आए जिनमें कॉलेज के प्रधानाचार्य एन. एस. बेन्द्रे स्वयं एक प्रसिद्ध चित्रकार थे और जिन्होंने हर कलाकार की निजी सृजन शक्ति का पहचाना और बढ़ावा दिया। बेन्द्रे के हर विद्यार्थी ने सृजन की अपनी दिशा ढूँढ़ ली, परन्तु आधुनिकता की सुस्पष्ट छाप उन सभी कलाकारों की कला में पाई जाती है। शांति दवे, जी. आर. संतोष, ज्योति भट्ट गुलाम मोहम्मद शेख आदि इन कलाकारों में हैं। देवी प्रसाद राय चौधरी और के. जी. एस. पनिक्कड़ के समय में मद्रास स्कूल ऑफ आर्ट स्वतन्त्रता के बाद के वर्षों में कला-सृजन का एक प्रमुख केन्द्र बन गया। उन दोनों ने कलाकारों की एक समग्र पीढ़ी को प्रभावित किया। इनके अलावा चित्रकारों में के. जी. सुब्रकनियन, तैयब मेहता, सतीश गुजराल, क्रिशन खन्ना, रामकुमार, के. एस. कुलकर्णी, अकबर पद्मसी, जे. स्वामीनाथन्, ए. रामचन्द्रन और जहाँगीर सबावाला तथा मूर्तिकारों में अमरनाथ सहगल, दवियर वाला, पीलू पोचखाने वाला आदि मशहूर हो गए हैं। भारत की समकालीन कला के आधुनिकतावादी प्रवाहों को कला-मीमांसकों और कला-समीक्षकों की ओर से मान्यता और प्रोत्साहन मिलते रहे हैं। व्यक्तिगत तथा संस्थागत रूप से इन कलाकारों की कृतियाँ खरीदी जाती हैं। राजकीय संस्थाओं में समकालीन आधुनिक कलाकृतियों का सबसे बड़ा संग्रह है और ललित कला अकादमी की ओर से भी कलाकारों को प्रोत्साहन मिल रहा है। कला, साहित्य, संगीत और नृत्य के विकास की दृष्टि से जवाहरलाल नेहरू के प्रयास द्वारा तीन राष्ट्रीय अकादमियों की स्थापना की गई जिनमें ललित कला अकादमी एक है। प्रतिवर्ष राष्ट्रीय प्रदर्शनियों के अलावा ललित कला अकादमी की ओर से त्रिवार्षिक प्रदर्शिनियों का भी आयोजन होता है। जिनमें विकसित देशों के तथा विकासशील देशों के कलाकारों को आपस में मिलकर अपने विचारों को व्यक्त करने का अवसर मिल जाता है। ललित कला अकादमी ने समकालीन कलाकारों के बारे में कुछ प्रबन्धों का भी प्रकाशन किया है। इस संस्था की ओर से त्रैमासिक ‘‘ललित कला कन्टेम्पोरेरी’’ का भी प्रकाशन होता है। इसके अलावा कलाकारों को फैलोशिप और प्रवास के लिए अनुदान भी दिए जाते हैं। देश के बड़े शहरों में निजी तौर पर चलाई जाने वाली आर्ट गैलरियाँ भी हैं। संक्षेप में, आज के कलाकारों की स्थिति इस शतक के आरम्भ में अपने पुरोगामी कलाकरों की अपेक्षा काफी अच्छी है। | |||||||||
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