| |||||||||
|
पूंजीवाद, उपनिवेशवाद एवं समाजवाद
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसे अपनी विविध प्रकार की असंख्य आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए विभिन्न तरह की वस्तुओं और सेवाओं की जरूरत होती है। सामाजिक-सांस्कृतिक विकास के साथ मनुष्य की आवश्यकताओं में भी परिवर्तन हुआ है और उनको संतुष्ट करने के लिए अपेक्षित वस्तुओं और सेवाओं की किस्म भी बदली है। जिन्दा रहने के लिए उसे भोजन, वस्त्र, मकान और दवाओं जैसी अन्य चीजों की जरूरत पड़ती है। जंगली जानवरों और दुश्मनों से अपनी रक्षा के लिए उसे हथियार चाहिए और अपनी सांस्कृतिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उसे पुस्तकें, लेखन सामग्रियाँ, वाद्य उपकरण आदि चाहिए।
मनुष्य की कुछ आवश्यकताएँ व्यक्तिगत होती हैं तो अन्य सामूहिक। उदाहरण के लिए, भोजन, कपड़ो, दवाओं आदि की जरूरत व्यक्तिगत आवश्यकताओं को संतुष्ट करने के लिए होती है जबकि फौज, पुलिस, स्कूल, सिनेमा और संगीत के लिए कमरे, सभा स्थल, पार्क आदि सामूहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जरूरी होते हैं। दूसरी दृष्टि से देखें तो हम पाएँगे कि कुछ आवश्यकताएँ भौतिक होती हैं तो अन्य गैर भौतिक। भौतिक आवश्यकताओं को पूरा किए बिना आदमी जिन्दा नहीं रह सकता। उसे अपनी भूख मिटाने और शरीर के पोषण के लिए भोजन, तन ढकने के लिए कपड़े और रोगों से छुटकारा पाने तथा चोटों के इलाज के लिए दवाएँ चाहिए। इन आवश्यकताओं की पूर्ति हर समाज और हर युग या काल में करनी पड़ती है। किन्तु यह अलग बात है कि इन आवश्यकताओं को पूरा करने के साधन और तरीके हर समाज और काल में एक जैसे नहीं रहे हैं। इसी प्रकार गैर भौतिक आवश्यकताओं के स्वरूप और उन्हें पूरा करने के तरीके तथा साधन सभी समाजों और सभी कालों में एक जैसे नहीं रहे हैं। उदाहरण के लिए, परिवहन आवश्यकता की पूर्ति सामाजिक विकास की अलग-अलग आवश्यकताओं में अलग-अलग प्रकार से हुई है। इसी प्रकार मनोरंजन के साधन अलग-अलग समाज में अलग-अलग रहे हैं। बड़ी आसानी से नृत्य के रूपों तथा वाद्य यंत्रों में अंतर देखे जा सकते हैं। अगर हम अपने इर्द-गिर्द नजर दौड़ाएँ तो पाएँगे कि मनोरंजन के रूप ग्रामीण क्षेत्रों और शहरों में एकसमान नहीं हैं। वे आदिवासी और गैर आदिवासी समाज में भी एक से नहीं हैं। यहाँ तक कि संसार के सभी हिस्सों में भोजन तैयार करने का तरीका भी एक जैसा नहीं है। मनुष्य अपनी कई आवश्यकताएँ बिना कोई खास प्रयास किए सीधे प्रकृति से वस्तुएँ लेकर पूरा करता है। दूसरे शब्दों में, उसे अपनी आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए रूपान्तरित करने या उपयुक्त बनाने के लिए इन पर श्रम नहीं व्यय करना पड़ता है। इस प्रकार की वस्तुओं के उदाहरणों में साँस लेने के लिए हवा, सूर्य की किरणें, नदियों और झारनों का पानी आदि शामिल हैं। मनुष्य द्वारा अपेक्षित वस्तुओं और सेवाओं की कुल संख्या की तुलना में ऐसी वस्तुओं और सेवाओं की संख्या काफी सीमित है। इसीलिए हम अपनी चर्चा में ऐसी वस्तुओं की अवहेलना कर सकते हैं। मनुष्य द्वारा अपेक्षित अधिकार वस्तुओं का उपभोग उसी रूप में नहीं होता जिस रूप में वे प्रकृति में पाई जाती हैं। उन्हें मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थ बनाने के लिए मनुष्य को श्रम व्यय करना होता है या प्रयास करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, मनुष्य को लिखने-पढ़ने के लिए एक मेज चाहिए जो सीधे प्रकृति से नहीं प्राप्त की जा सकती। वह प्रकृति से लकड़ी प्राप्त कर उस पर श्रम व्यय करता है जिससे लकड़ी लिखने-पढ़ने की मेज में रूपान्तरित हो जाती है और उसकी आवश्यकता पूरी होती है। रूपान्तरण की यही प्रक्रिया उत्पादन है। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत मनुष्य, या यों कहें समाज और प्रकिति की पारस्परिक क्रिया शामिल होती है। समाज का रूप कोई भी क्यों न हो, मनुष्य और समाज की पारस्परिक क्रिया में तीन चीजें शामिल होती हैं। वे हैं - श्रम, श्रम के पदार्थ और श्रम के साधन। श्रम एक सार्थक मानवीय क्रिया है जिसका लक्ष्य प्राकृतिक पदार्थों को इस प्रकार रूपान्तरित करना है कि वह मनुष्य की किसी न किसी आवश्यकता को पूरा कर सके। इस प्रक्रिया के दौरान मानव प्राणी ज्ञान और कौशल प्राप्त करते और रूपान्तरण की प्रक्रिया में सुधार लाते हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि श्रम करना सिर्फ मानव प्राणियों का गुण है क्योंकि जानवर वस्तुओं का उपभोग उसी रूप में करते हैं जिस रूप में वे उन्हें प्रकृति में पाते हैं। जानवरों में प्राकृतिक पदार्थों को रूपान्तरित करने या अधिक अनुकूल बनाने की क्षमता नहीं होती। जिन चीजों पर मनुष्य अपना श्रम लगाता है उन्हें श्रम और पदार्थ कहा जाता है। इन्हें सीधे प्रकृति से प्राप्त किया जा सकता है जैसे लकड़ी, खनिज पदार्थ, मिट्टी, मछली आदि या ये विगत श्रम-प्रक्रिया के परिणाम हो सकते हैं जैसे धागे, सीमेंट, किताबों की छपाई के लिए कागज आदि। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास के परिणामस्वरूप श्रम के उपरोक्त पदार्थों का दायरा काफी अधिक हो गया है। न सिर्फ संश्लिष्ट धागों, इस्पात, काँसे, प्लास्टिक आदि जैसे मनुष्य निर्मित पदार्थ बड़ी संख्या में सामने आए हैं बल्कि पहले से ही ज्ञात श्रम के पदार्थों के नए इस्तेमाल भी ढूँढ़े गए हैं। श्रम के साधनों में वे सब चीजें आती हैं जिनका उपयोग मनुष्य श्रम के पदार्थों को अनुकूल बनाने या रूपान्तरित करने में करते हैं जिससे वे मानवीय आवश्यकताओं को संतुष्ट करने में सक्षम हो सकें। इनमें आधारभूत ढाँचे से जुड़ी सुविधाएँ जैसे नहर, सड़क, रेलवे, आदि शामिल होती हैं। जिनका इस्तेमाल श्रम-प्रक्रिया में अप्रत्यक्ष रूप से होता है तथा इनके अतिरिक्त इनमें औजार उपकरण, मशीनें आदि होती हैं जो श्रम द्वारा प्रत्यक्ष रूप में प्रयोग की जाती हैं। केवल मनुष्य ही श्रम के साधनों या औजारों को बना और काम में ला सकता है। इतना ही नहीं, श्रम के साधनों का स्तर समाज के विकास की अवस्था का एक प्रमुख सूचक होता है। आइए, एक ठोस उदाहरण लें। गेहूँ के दानों को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि वे किसी आदिम समाज द्वारा पैदा किए गए हैं या एक अत्यन्त उन्नत समाज द्वारा, किन्तु उनके उत्पादन में इस्तेमाल किए गए औजारों और उपकरणों के बारे में जानकर कोई निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। कहना न होगा कि ट्रेक्टर का इस्तेमाल गेहूँ के उत्पादन के लिए किसी आदिम समाज में नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार कपड़े का उत्पादन जटिल मशीनों द्वारा सिर्फ उन्नत समाजों में ही हो सकता है। इस दृष्टि से प्रौद्योगिकी का विकास काफी महत्व रखता है। मानव इतिहास पर दृष्टि डालें तो श्रम के साधनों या औजारों के क्षेत्र में हुई प्रगति को देखकर बड़ा अचरज होगा। मनुष्य पाषाण युग, फावड़े और धनुष-बाण के जमाने से काफी लम्बा फासला तय कर जटिल मशीनों और दूरस्थ नियंत्रण के यंत्रों के वर्तमान समय तक आ पहुँचा है। आधारभूत ढाँचे की सुविधाओं के क्षेत्र में मनुष्य कुओं और तालाबों से विशालकाय नदी घाटी परियोजनाओं, ऊर्जा के जैविक स्रोतों से परमाणु ऊर्जा तथा बैलगाड़ियों से आवाज की रफ्तार से भी तेज चलने वाले हवाई जहाजों तक आ पहुँचा है। श्रम के पदार्थां और श्रम के साधनों को एक साथ उत्पादन के साधनों के नाम से जाना जाता है। उत्पादन के साधन और श्रम (यानी वे सभी लोग जो इन साधनों का प्रयोग अपने सभी अनुभवों, ज्ञान और कौशल के साथ करते हैं) समाज की उत्पादक शक्तियाँ होते हैं। मानव प्राणी मुख्य उत्पादक शक्तियाँ हैं क्योंकि वे ही श्रम के औजारों को बनाते और उन्हें उन्नत करते हैं तथा उनसे श्रम के पदार्थों को रूपान्तरित करते हैं। जैसा कि हम ऊपर कह चुके हैं, वे श्रम के पदार्थां का दायरा सदा बढ़ाते रहते हैं। उत्पादक शक्तियों के विकास का स्तर प्रकृति के ऊपर मनुष्य के नियंत्रण की सीमा का एक महत्वपूर्ण सूचक होता है। मनुष्य वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन एक दूसरे से अलग-अलग नहीं बल्कि परस्पर सहयोग से करते हैं। दूसरे शब्दों में, उत्पादन हमेशा सामाजिक उत्पादन होता है। उदाहरण के लिए हम कपड़े के उत्पादन को ले सकते हैं। इसे कपास उगाने, कपड़ा मिलों की मशीनें और रंग बनाने वालों से लेकर कपड़े के कारखानों के मजदूरों तक विभिन्न कार्यों में लगे लोगों के सहयोग के बिना सम्पन्न नहीं किया जा सकता। आदिम जमाने में भी कोई व्यक्ति अन्य लोगों के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोग के बिना उत्पादन का काम नहीं कर सकता था। इस सिलसिले में प्रसिद्ध लेखक डेनियल डिफो द्वारा निर्मित पात्र रॉबिन्सन क्रूसो का उदाहरण दिया जा सकता है। अपना जहाज नष्ट होने के बाद क्रूसो एक बिल्कुल निर्जन टापू में पहुँचता है। वहाँ अकेले होने के कारण उसे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सभी अपेक्षित वस्तुओं का उत्पादन करना पड़ता है। स्पष्ट है कि वहाँ सहयोग और उत्पादन के सामाजिक होने की कोई गुंजाइश नहीं है। मगर रॉबिन्सन क्रूसो जैसे लोग वास्तविक जगत में विरले ही मिलते हैं। यदि कहीं पर वे होते हैं तो इसे अपवाद ही कहा जा सकता है। अगर हम थोड़ी देर के लिए मान लें कि रॉबिन्सन क्रूसो का उदाहरण वास्तविक है तो यह नहीं भूलना चाहिए कि उसने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा समाज में बिताया है और उत्पादन के कौशल को आत्मसात् कर चुका है। साथ ही वह चिंतन की क्षमता भी विकसित कर चुका है। जैसा कि हम कह चुके हैं, वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन के लिए बड़ी संख्या में लोगों के सहयोग की जरूरत होती है। समाज-विकास की प्रत्येक उत्तरोत्तर अवस्था में यह सहयोग विस्तृत और अधिकाधिक जटिल होता जाता हैं। अभी किसी विकसित समाज में कोई मजदूर खुद कोई भी वस्तु अपने आप नहीं उत्पन्न करता। वह उत्पादन की प्रक्रिया में एक छोटी, परन्तु महत्वपूर्ण एवं अपरिहार्य, भूमिका ही अदा करता है। यदि हम उत्पादन प्रक्रिया की कल्पना एक जंजीर के रूप में करें तो कोई भी मजदूर उसकी केवल एक कड़ी होता है, परन्तु अगर एक भी कड़ी टूट जाए तो सारी जंजीर बिखर जाएगी। उत्पादन की प्रक्रिया में प्रत्येक मजदूर का स्थान एक निश्चित विधि द्वारा निर्धारित होता है जो श्रम-विभाजन के नाम से सर्वविदित है। सभी मजदूर परस्पर निर्भर और एक दूसरे के साथ सम्बद्ध हो जाते हैं। उत्पादन की प्रक्रिया में उसमें भाग लेने वाले लोग एक दूसरे के साथ कमोबेश निश्चित सम्बन्धों में बँधते हैं। इन्हें उत्पादन के सम्बन्ध कहते हैं। इनका निर्धारण उत्पादन के साधनों की दृष्टि से सम्बद्ध व्यक्तियों की स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाता है। यह देखना होता है कि वे उत्पादन के साधनों के स्वामी हैं या नहीं। यदि वे उत्पादन के साधनों के स्वामी हैं तो वे अन्तिम उत्पादों के स्वामी होंगे तथा उत्पादन से सम्बद्ध निर्णय लेने में सक्षम होंगे। दूसरे शब्दों में, वे ही फैसला करेंगे कि किन वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन हो, उत्पादन में किस प्रकार की प्रौद्योगिकी प्रयोग में लाई जाए और उत्पादन किनके लिए हो। इस प्रकार वे ही उत्पादन के साधनों के इस्तेमाल को निर्धारित करेंगे। यदि वे उत्पादन के साधनों के स्वामी नहीं हैं तो उनको इस प्रकार के कोई अधिकार नहीं होंगे। अन्ततः उत्पादन के सम्बन्धों का निर्धारण उत्पादक शक्तियों के विकास की सीमा और स्वरूप के द्वारा होता है। दूसरे शब्दों में, वे उत्पादक शक्तियों के विकास के स्तर और अवस्था पर निर्भर होते हैं। इन दोनों में उत्पादक शक्तियाँ अधिक गतिशील होतीं हैं और वे हमेशा विकसित होती रहती हैं और उत्पादन के सम्बन्धों को अपने आपको सदा विकसित हो रही उत्पादक शक्तियों के अनुकूल बनाना पड़ता है। किन्तु इसका यह मतलब नहीं है कि उत्पादन के सम्बन्ध पूरी तरह निष्क्रिय होते हैं। इसके विपरीत वे उत्पादक शक्तियों के विकास को तेज या मन्द कर प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू की गई भूमि व्यवस्थाओं ने हमारे देश में कृषि के क्षेत्र में उत्पादक शक्तियों के तेज विकास में बाधा डाली और काफी हद तक दूसरे क्षेत्रों में भी उत्पादक शक्तियों के विकास को रोका। समाज विकास की किसी भी अवस्था में उत्पादक शक्तियाँ और उनके अनुरूप उत्पादन के सम्बन्ध एक सुनिश्चित उत्पादन की प्रणाली की रचना करते हैं। दूसरे शब्दों में उत्पादन की प्रणाली उत्पादक शक्तियों और उनके अनुरूप उत्पादन के सम्बन्धों की एकता का परिणाम होती है। वे एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। उत्पादन की प्रक्रिया में वे विकसित और रूपान्तरित होते हैं। जैसा कि कहा जा चुका है, उत्पादक शक्तियाँ अधिक गतिशील होतीं हैं। उत्पादन के सम्बन्ध जो प्रारम्भ में उत्पादक शक्तियों के अनुकूल होते हैं, कुछ समय बाद उत्पादक शक्तियों से पिछड़ जाते हैं। पहले तो वे एक सीमा तक उत्पादक शक्तियों के विकास को प्रोत्साहित करते हैं परन्तु बाद में उसमें अवरोध बन जाते हैं। जब यह विरोधाभास काफी उग्र हो जाता है तब उत्पादन के सम्बन्धों को घुटने टेकने पड़ते हैं और अपने आपको बदलना होता है जिससे वे उत्पादक शक्तियों के विकास के स्तर और जरूरतों के अनुरूप हो सकें। कभी-कभी यह विरोधाभास हिंसक परिवर्तनों या क्रांति के द्वारा हल किया जाता है। ऐसा तभी होता है जब विरोधाभास काफी उग्र हो जाते हैं और सुधार उन्हें समाप्त या कम करने में असमर्थ सिद्ध होते हैं। ज्यों ही उत्पादन के तत्कालीन सम्बन्धों को परिवर्तित किया जाता है और उनके स्थान पर ऐसे नए सम्बन्धों को स्थापित किया जाता है जो उत्पादक शक्तियों के आगे के विकास के लिए सहायक होते हैं, त्यों ही उत्पादक शक्तियों का, कम से कम कुछ समय तक के लिए ही सही, बाधारहित तेज विकास सुनिश्चित हो जाता है। प्रत्येक समाज में, उत्पादक शक्तियों के विकास के तत्कालीन स्तर के अनुरूप, उत्पादन के सम्बन्धों का कुल योग समाज के आधार का निर्माण करता है। समाज विकास के प्रत्येक चरण में आधार के अनुरूप एक ऊपरी ढाँचा होता है। ऊपरी ढाँचे में राजनीतिक व्यवस्था, न्यायपद्धति, साहित्य, कला, शिक्षा प्रणाली और विभिन्न प्रकार की सांस्थानिक व्यवस्थाएँ, विचारधाराएँ, धार्मिक धारणाएँ आदि होती हैं। ऊपरी ढाँचे के स्वरूप का निर्धारण, अंततः आधार द्वारा होता है परन्तु वह आधार पर भी प्रभाव डालता है। इस प्रकार दोनों के बीच सम्बन्ध न तो एकरैखिक और न ही एक-दिशात्मक होते हैं। ऊपरी ढाँचे का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अंग होता है - राज्य और उसके तंत्र। जैसा कि कहा जा चुका है ऊपरी ढाँचा भी समाज के आधार को प्रभावित करता है। सम्पत्ति सम्बन्ध, कानूनी व्यवस्थाएँ, राजनीति संस्थान नैतिक मूल्य, धार्मिक धारणाएँ और दृष्टिकोण आदि उत्पादक शक्तियों के विकास और उत्पादन सम्बन्धों के स्वरूप को प्रभावित करते हैं। आधार के बदलते ही ऊपरी ढाँचे में पूर्णरूपेण परिवर्तन नहीं होता। ऊपरी ढाँचे के केवल कुछ अंग ही परिवर्तित होते हैं और बाकी कुछ अरसे तक बने रहते हैं। ऊपरी ढाँचे को पूरी तरह परिवर्तित करने और नवस्थापित आधार के अनुरूप लाने में समय लगता है। पुराने ऊपरी ढाँचे के अवशेष एक लम्बे समय तक बने रहते हैं। उदाहरण के लिए हम अब भी विकसित यूरोपीय समाजों में सामन्ती मूल्यों और दृष्टिकोणों के अवशेष पाते हैं। भारत में यत्र-तत्र विद्यमान अस्पृश्यता किसी विगत ढाँचे का ही अवशेष है। उत्पादन प्रणाली और उसके अनुरूप ऊपरी ढाँचा एक साथ मिलकर सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की रचना करते हैं। इतिहासकार किसी समुदाय, देश या संपूर्ण विश्व के इतिहास का विभाजन विभिन्न कालों में करते समय हर काल की उस सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को लेते हैं जो उसकी विशिष्टता थी और उसे अन्य काल से अलग करती थी। आदिम समाज (या, जैसा कि कुछ लोग कहते हैं, ‘आदिम साम्यवाद’) का प्राचीनतम काल ऐसा था कि उसमें समाज वर्गों में विभाजित नहीं था और उत्पादन के साधन अपरिष्कृत थे। उत्पादन के साधनों के उन्नत होने के साथ ‘सभ्यता’ विकसित हुई और उसके एक अभिन्न अंग के रूप में सामाजिक वर्गों का उदय हुआ। कतिपय समाजों की चारित्रिक विशेषता दासता थी परन्तु कई अन्य समाजों में दासता नहीं थी परन्तु लोगों द्वारा उत्पन्न वस्तुओं का एक हिस्सा अन्य लोगों या राज्य द्वारा हथिया लिया जाता था। कुछ देशों में दासता और प्राचीन सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का स्थान सामन्तवाद नामक एक सामाजिक आर्थिक व्यवस्था ने ले लिया। यह उस समय हुआ जिसे इतिसहासकार मध्यकाल कहते हैं। ध्यान रखने की बात है कि हर जगह एक सी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था नहीं थी। मध्यकाल के दौरान एशिया और अफ्रीका के अधिकतर देशों में जो सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था थी उसकी चारित्रिक विशेषताओं को लेकर इतिहासकारों के बीच अनेक विवाद हैं। कुछ देशों में सामन्तवाद का स्थान पूँजीवाद ने लिया जिसके तत्व सामन्तवाद के दौरान ही उत्पन्न हो चुके थे। ये तत्व सामन्तवाद के पतन के बाद अधिकाधिक प्रबल होते गए। पूँजीवाद-प्रारम्भिक चरणपूँजीवाद के दौरान गैर कृषिगत वस्तुओं के उत्पादन की कारखाना-व्यवस्था प्रमुख सांगठनिक रूप बन गई। अपने विकास के क्रम में पूँजीवाद दो चरणों-एकाधिकारी पूर्ण या प्रतिस्पर्धात्मक पूँजीवाद और एकाधिकारी पूँजीवाद-से गुजरा है। इन दोनों चरणों की समान चारित्रिक विशेषताएँ हैं - उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व, बाजार में बेचने के लिए उत्पादन और भाड़े के श्रम का इस्तेमाल।पहले चरण के दौरान मुक्त प्रतिद्वंदिता या प्रतिस्पर्धा का दबदबा होता है और उत्पादन के साधनों पर मुख्यतया व्यक्तियों का स्वामित्व होता है। उत्पादन का पैमाना अपेक्षाकृत छोटा होता है और कोई भी अकेला उद्यमी उत्पाद की बाजार कीमत या कच्चे मालों की कीमतों के निर्धारण पर कोई प्रभाव नहीं डाल पाता। दूसरा चरण वर्तमान शताब्दी के साथ ही आरम्भ हुआ। इसमें एकाधिकारियों और बड़े पूँजीपतियों के निगमों का दबदबा होता है। जिन देशों में वे सक्रिय हैं उनकी अर्थव्यवस्था और राज्यतंत्र में उनकी प्रमुख भूमिका होती है। वे कीमत-निर्धारण और उत्पादन के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित करते हैं। राज्य द्वारा एकाधिकारियों को सहायता देने के लिए राज्य का हस्तक्षेप बढ़ता जाता है। ‘पूँजीवाद’ शब्द का सही अर्थ क्या है ? सरल शब्दों में, ‘पूँजीवाद’ की व्याख्या यों की जा सकती है - यह उस सामाजिक आर्थिक व्यवस्था का नाम है जिसके अन्तर्गत भूमि, कारखानों, औजारों, आदि पर थोड़े से लोगों का स्वामित्व होता है जबकि बहुसंख्यक जनता के पास कोई सम्पत्ति नहीं होती या बहुत थोड़ी सम्पत्ति होती है और उसे भाड़े के मजदूर के रूप में काम करने को मजबूर होना पड़ता है। कारखाने के मालिक मजदूरों को सिर्फ इतनी ही मजदूरी देते हैं कि उनका और उनके परिवार का किसी तरह भरण-पोषण हो सके। दूसरी ओर मजदूरी देने के बाद मजदूरों द्वारा उत्पन्न जो कुछ मूल्य बचता है उसे कारखानेदार मुनाफे के रूप में अपनी जेब में डाल लेते हैं। इस व्याख्या से पूँजीवाद के उदय के लिए तीन शर्तें जरूरी जान पड़ती हैं। वे हैं - (1) समाज की बहुसंख्यक जनता के पास अपने उत्पादन के साधन नहीं होने चाहिए। (2) उत्पादन के साधनों और इस प्रकार जीवन-निर्वाह के साधनों से वंचित इन लोगों के सामने अपनी जीविका कमाने के लिए अपनी श्रम-शक्ति (श्रम करने की क्षमता) को बेचने या अपने को भाड़े पर लगाने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं रह जाता। (3) उत्पादन के साधन और मुद्रा की भारी रकम समाज के थोड़े से लोगों के हाथों में संकेन्द्रित हो जाती है। ये शर्तें सामन्तवाद के आखिरी चरण में प्रकट होने लगी थीं। इन शर्तों के उदय की प्रक्रिया को ‘आदिम संचय’ के अन्तर्गत रखा जाता है। एडम स्मिथ ने इसे ‘पूर्ववर्ती संचय’ कहा है। एक उत्पादन प्रणाली के रूप में पूँजीवाद का उदय सोलहवीं शताब्दी में हुआ यद्यपि उसके कुछ प्रारम्भिक चिन्ह भूमध्यसागर के कतिपय नगरों में चौदहवीं और पन्द्रहवीं शताब्दियों के दौरान भी दृष्टिगोचर हो गए थे। पूँजीवादी उत्पादन-प्रणाली की तीन विशिष्ट चारित्रिक विशेषताएँ थीं - (क) उत्पादन के अपने उपभोग के बजाय बाजार में बेचने के लिए सारा उत्पादन होता था। (ख) उत्पादन की स्थितियाँ ऐसी थीं कि कच्चे माल, कारखाने, मशीनें, भूमि, परिवहन के साधन आदि जैसे उत्पादन के साधन और मुद्रा की एक भारी राशि थोड़े से लोगों के हाथों में संकेन्द्रित हो गई थी। इसका अर्थ है कि उत्पादन सम्बन्धी निर्णयों को लेने के अधिकार सिर्फ उन्हीं के हाथों में आ गए। दूसरे शब्दों में केवल वे ही फैसला कर सकते थे कि किन वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन हो, उत्पादन की प्रौद्योगिकी कैसी हो। उत्पादन बाजार में बेचने के लिए था इसलिए बाजार की परिस्थितियाँ उत्पादन सम्बन्धी निर्णयों की मुख्य निर्धारक बन गईं। एकमात्र उद्देश्य अधिकतम मुनाफा कमाना हो गया। (ग) बहुसंख्यक जनता उत्पादन और जीवन निर्वाह के साधनों से वंचित हो गई। अगर ये लोग चाहते थे कि वे और उनके परिवार शारीरिक तौर पर जिन्दा रहें तो उनके सामने एक ही विकल्प रह गया था कि वे अपनी श्रमशक्ति को बेचकर जीवन निर्वाह के साधन खरीदें। ये लोग मजदूर या सर्वहारा के नाम से जाने गए। इनके समूह को मजदूर वर्ग कहा गया। यहाँ याद रखना चाहिए कि सभी साधन विहीन लोगों को इस कोटि में नहीं रखा जा सकता, केवल उन्हीं को रखा जाना चाहिए जो उत्पादन की प्रक्रिया में रहना चाहते हैं और अपनी जीविका अपनी श्रमशक्ति बेचकर कमाना चाहते हैं। स्पष्ट है कि साधन विहीन वे लोग जो डकैती, जेब काटने, भिक्षाटन आदि में लगे हैं, उन्हें अलग रखा जाता है। मानव जाति के इतिहास में पूँजीवाद ने भारी भूमिका अदा की है। उसने सभ्यता और संस्कृति को आगे बढ़ाया है। अस्तित्व के भौतिक आधार को आमूल परिवर्तित कर उसने मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में क्रान्ति ला दी है। आइए, आर्थिक प्रगति में पूँजीवाद के कुछ विशिष्ट योगदानों की चर्चा करें। पूँजीवाद ने सामन्तवाद को नष्ट कर दिया और उत्पादक शक्तियों के आगे के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। उसने कृषि पर सामन्ती प्रभुओं और औद्योगिक उत्पादन पर गिल्डों (शिल्पीसंघों) के दबदबे को समाप्त कर दिया। उसने उद्यम और व्यवसाय के चुनाव की स्वतंत्रता तथा श्रम एवं उत्पादन के अन्य साधनों की गतिशीलता में अड़ंगा डालने वाले कारकों को नष्ट कर दिया। पूँजीवाद और सामन्तवाद के अन्तर्गत दृष्टिकोण में क्या अन्तर था, यह एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। पूँजीपति काम को महत्व देता था जबकि सामन्ती प्रभु अवकाश को सार्वोपरि समझता था। जानबूझकर अपने वैभव का प्रदर्शन सामन्तशाही की एक खास विशेषता थी जबकि पूँजीपति का झुकाव इस ओर शायद ही कभी होता था। सामन्ती लोग अपने और अपने खानदान की इज्जत को महत्व देते थे जबकि पूँजीपति व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर जोर देने लगा। जहाँ तक मुनाफे की भावना के सर्वापरि प्रभाव का प्रश्न है, यहाँ यह कहा जा सकता है कि पूँजीवाद के अन्तर्गत मनुष्य का लालच व्यवस्थित और विवेकपूर्ण होता है। वह बचत और इस प्रकार पूँजी संचय में सहायक होता है। पूँजीवाद के अन्तर्गत पर व्यक्ति स्वार्थी होता है और आर्थिक क्रिया के प्रति उसका दृष्टिकोण विवेकपूर्ण होता है। अतीत से चिपके रहने के बदले वह अभिनव परिवर्तनों के लिए तत्पर रहता है। यथासम्भव अधिकतम मुनाफा प्राप्त करने की इच्छा पूँजीपतियों को नई प्रौद्योगिकी, नई मशीनों, उपकरणों, संयंत्रों, उत्पादन की नई प्रक्रियाओं, नए प्रकार के कच्चे मालों, आदि के आविष्कार और उत्पादन के संगठन को नई विधियों एवं सिद्धातों के अन्वेषण तथा विकास के लिए प्रेरित करती है। स्पष्ट है कि यह इच्छा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास को बढ़ावा देती है और आविष्कारों एवं अभिनव परिवर्तनों की ओर ले जाती है। परिणामस्वरूप पूँजीवाद के अन्तर्गत उत्पादक शक्तियाँ विकसित होती हैं और समाज आगे बढ़ता है तथा समृद्ध होता है। कुछ पूँजीपति जो नई और बेहतर मशीनें, उपकरण, प्रौद्योगिकी आदि प्राप्त करने और अपनाने में सक्षम होते हैं वे श्रम-उत्पादकता बढ़ाने तथा उत्पादन लागत घटाने और अतिरिक्त मुनाफा कमाने की स्थिति में आ जाते हैं। पूँजीवाद के अन्तर्गत उत्पादक शक्तियों के तेज विकास के लिए मुख्यतया प्रतिद्वंदिता जिम्मेदार होती है। चूँकि कोई एक पूँजीपति प्रति इकाई बाजार कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता इसलिए मुनाफा बढ़ाने का एक मात्र रास्ता है नए संयंत्रों, मशीनों, औजारों आदि को अपनाना और उत्पादन की नई विधियों और प्रौद्योगिकी तथा प्रबंध के नए तौर तरीकों को प्रयोग में लाना। इस प्रकार प्रत्येक पूँजीपति विज्ञान, प्रौद्योगिकी और प्रबन्ध के क्षेत्र में सक्रिय रहता है जिससे ऐसे नए अन्वेषण कर सके कि उत्पादन लागत घटे। जो पूँजीपति दूसरों के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल पाता, वह निश्चय ही उत्पादन के मैदान से बाहर हो जाता है। पूँजीवाद के प्रारम्भिक चरण में आर्थिक मामलों में राज्य का हस्तक्षेप यथासम्भव न्यूनतम होता है। उसका उत्पादन सम्बन्धी निर्णयों और उत्पादों की बिक्री में कोई दखल नहीं होता। ऐसी व्यवस्था में कोई भी उत्पादक या उपभोक्ता उत्पादन की मात्रा, कीमत और प्रौद्योगिकी को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं होता। इसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता होती है - पूर्ण व्यक्तिगत आजादी। माना जाता है कि श्रमिक अपनी उन्मुक्त सूझबूझ से अपना व्यवसाय और अपने काम के स्थान का चुनाव करेंगे। इसी प्रकार उत्पादन के साधनों के स्वामी भी अपनी इच्छानुसार उनका इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। उत्पादन के साधनों और सभी प्रकार के मालों की खरीद-बिक्री पर सरकारी अथवा परम्परागत किसी प्रकार के प्रतिबंध नहीं होते। सरकार सभी प्रकार के बाजारों को विनियमित अथवा प्रभावित करने की कोशिश से अलग रहती है। इस आदर्श पूँजीवादी व्यवस्था को मुक्त उद्यम की व्यवस्था कहते हैं। अस्थिरता और संकट पूँजीवादी व्यवस्था के अभिन्न अंग हैं। ऐसा इसलिए है कि वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन की मात्रा वास्तविकता में शायद ही अपनी माँग की मात्रा के बराबर होती है। वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन अलग-अलग उद्यमों में होता है जिनका स्वामित्व और नियंत्रण भिन्न-भिन्न हाथों में होता है। हर उद्यम अपने आप उत्पादन सम्बंधी निर्णय लेता और उसका अन्य उद्यमों के साथ कोई तालमेल नहीं होता और न ही उसे यह मालूम होता है कि अन्य उद्यम क्या करने जा रहे हैं। गुणात्मक और परिमाणात्मक दोनों दृष्टियों से माँग की मात्रा उद्यमी को अज्ञात रहती है। इसलिए कभी अपेक्षाकृत अधिक और कभी कम उत्पादन होता है। इसके अतिरिक्त भी अस्थिरता के कारण हैं। जो भी हो, अस्थिरता और संकट मेहनतकश लोगों के कच्चे मालों के उत्पादकों और छोटे उद्यमियों पर असंख्य विपदाएँ ढाते हैं। अनेक उद्यमी दिवालिया हो जाते हैं। भारी मात्रा में प्राकृतिक एवं जनशक्ति संसाधन बर्बाद हो जाते हैं। एकाधिकारी पूँजीवादपिछली शताब्दी के उत्तरार्ध के दौरान पूँजीवाद में कतिपय गुणात्मक परिवर्तन हुए। परिणामस्वरूप मुक्त उद्यम का स्थान एकाधिकारी उद्यम ने ले लिया। इसका अर्थ था - उत्पादन और वितरण के क्षेत्र में एकाधिकारियों का आधिपत्य। एकाधिकार या इजारेदारी पूँजीपतियों के बीच एक ऐसी व्यवस्था का परिणाम था जिससे थोड़े से पूँजीपति मालों के उत्पादन और बिक्री को नियंत्रित और विनियमित करने लगे। इस व्यवस्था का स्वरूप सम्बद्ध देश की मूर्त परिस्थितियों पर निर्भर होता है। इसके महत्वपूर्ण स्वरूप होते हैं - (1) भद्र लोगों के बीच समझौता, (2) पूल, (3) कार्टेल, (4) सिंडीकेट, (5) ट्रस्ट, (6) कन्सर्न या होल्डिंग कम्पनी और (7) मर्जर (विलयन)।उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध, खासकर अन्तिम तीन दशकों के दौरान कतिपय अत्यन्त महत्वपूर्ण तकनीकी परिवर्तन हुए। अनेक लोगों ने इन परिवर्तनों और इनके महत्व को द्वितीय औद्योगिक क्रान्ति का नाम दिया है। जिन आविष्कारों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की उनमें थे - डाइनेगो (1867), अन्तर्दहन (इंटर्नल कॅम्बस्सन) इंजन (1877), भाप टर्बाइन (1883-85) आदि। पैट्रोल, बिजली और आगे चलकर बीसवीं सदी में परमाणु शक्ति ऊर्जा के मुख्य स्रोत बन गईं। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक से आगे अन्तर्दहन इंजन और बिजली की मोटर ने भाप के इंजन का स्थान लेना आरम्भ कर दिया। उत्पादन और परिवहन के क्षेत्रों में एक भारी परिवर्तन हो गया। बिजली की ट्रॉम गाड़ी (1879), मोटर गाड़ी (1885), डीजल इंजन (1891) और हवाई जहाज ने दूरी और यात्रा के समय को कम कर दिया। वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिक परिवर्तनों के परिणामस्वरूप भारी उद्योगों का बोलबाला हो गया। इतना ही नहीं, नए प्रकार के उद्योगों का उदय हुआ। बेस्सिमर प्रक्रिया, खुली धमनभट्टी, सिमेंस-मार्टिन रिजनरेटरों तथा मिश्र धातुओं के साथ मिलाकर इस्पात को सख्त बनाने की प्रक्रियाओं के इस्तेमाल ने इस्पात-निर्माण को काफी आगे बढ़ाया। इस्पात का इस्तेमाल बढ़ा और वह एक बुनियादी औद्योगिक धातु बन गया। बॉक्साइट के विद्युत उपघटन (इलैक्ट्रोलाइसिस) के फलस्वरूप एल्युमिनियम की उत्पादन लागत तेजी से घटी और उसका उद्योगों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने लगा। कोयले के उपोत्पादनों (बाइप्रोडक्ट्स) के इस्तेमाल के बारे में जानकारी हासिल करने के बाद रंगों को कृत्रिम रूप से बनाया जाने लगा। साथ ही संश्लिष्ट (सिंथेटिक) कपड़ा उद्योग का भी जन्म हुआ। इस तरह रसायन उद्योग की प्रमुखता बढ़ी। सूती कपड़ा उद्योग की महत्ता घटी। इंग्लैंड में औद्योगिक दृष्टि से मैनचेस्टर (सूती कपड़ा उद्योग का प्रमुख केन्द्र) का स्थान बर्मिंघम (इस्पात उद्योग का केन्द्र) ने ले लिया। धीरे-धीरे औद्योगिक जगत में ब्रिटेन के स्थान पर संयुक्त राज्य अमरीका सर्वप्रमुख हो गया क्योंकि उसके पास अन्य अनुकूल परिस्थितियों के अलावा तेल का विशाल भण्डार था। द्वितीय औद्योगिक क्रान्ति एकाधिकार के उदय में सहायक बनी और ऐसा उसने उत्पादन और पूँजी के संकेन्द्रण और पूँजी के केन्द्रीयकरण की प्रक्रिया को तेज करके किया। यह प्रक्रिया पहले से ही विद्यमान थी क्योंकि मुक्त प्रतिद्वंदिता के युग में भी बार-बार आने वाले आर्थिक संकट छोटे और कमजोर उद्यमों को दिवालिया बना देते थे। उद्यमों की संख्या घटती गई और उत्पादन कम से कम उद्यमों में संकेन्द्रित होता गया। पूँजी के बढ़ते हुए संकेन्द्रण और उत्पादन के बढ़ते हुए पैमाने का कारण थोड़े से उद्यम बाजार में मालों की पूर्ति को प्रभावित कर कीमतों पर अपने लाभ की दृष्टि से असर डालने लगे। मुनाफा बढ़ने से पूँजी संचय बढ़ा ? संयुक्त पूँजी रूप ने पूँजी के संकेन्द्रण को बढ़ावा दिया। संकेन्द्रण के साथ-साथ पूँजी के केन्द्रीयकरण की प्रक्रिया भी चलती रही। केन्द्रीयकरण दो प्रकार से हुआ - समझौते के फलस्वरूप (जैसे कोर्टेल, ट्रस्ट, कंसर्न आदि बनाकर) अथवा प्रतिद्वंदिता और आर्थिक संकटों के कारण तबाह हुए उद्यमों की पूँजी को हड़प कर। इस प्रक्रिया में उत्पादन सम्बन्धी निर्णय लेने की शक्ति चन्द हाथों में ही संकेन्द्रित हो गई। पूँजी के केन्द्रीयकरण और कुछ हद तक, संकेन्द्रण के कई परिणाम हुए। प्रथम, उत्पादन और कारोबार का पैमाना बढ़ता गया और आन्तरिक एवं बाह्य मितव्ययिताएँ प्राप्त की गईं। द्वितीय, तकनीकी परिवर्तनों को प्रोत्साहन मिला। एकाधिकारी संगठन आरम्भ से ही प्रतिद्वंदिता समाप्त करने के लिए सक्रिय रहे। ऐसा उन्होंने प्रतिद्वंदियों को आत्मसात् या तबाह करके किया। ऐसे कई उदाहरण हैं जो दिखलाते हैं कि अनेक बार प्रतिद्वंद्वियों को एकाधिकारी संगठन में शामिल होने के फायदे बताकर उन्हें उनमें लाया गया। एकाधिकारी पूँजीवाद के युग में बैंकों की भूमिका में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। वे अब बिचौलिए मात्र नहीं रह गये जिनका काम लोगों की बचत की रकमों को जमा कर उद्यमियों, व्यापारियों, आदि को देना हो। बैंकिंग व्यवसाय के विकास के क्रम में थोड़े से बैंक आकार में अपेक्षाकृत बड़े हो गये और उनके पास भारी मात्रा में मौद्रिक पूँजी जमा हो गई। उन्होंने उत्पादन में लगे उद्यमों के शेयर खरीदने आरम्भ कर दिये और इस तरह वे उनका नियंत्रण करने लगे। बैंकों की भूमिका में यह परिवर्तन उनके हाथों में मौद्रिक पूँजी के बढ़ते हुए संकेन्द्रण और बैंक ऋण के प्रसार का परिणाम था। जिन कम्पनियों के साथ उनका लेनदेन था उनके चालू खातों और तुलन - पत्रों को देखकर वे उनके कारोबार की असलियत जान गए और वे उनके विभिन्न निर्णयों को प्रभावित और नियंत्रित करने लगे। कालक्रम में बैंकिंग व्यवसाय थोड़े से बैंकों के हाथों में संकेन्द्रित हो गया और नये बैंकों का प्रवेश लगभग असम्भव हो गया। हर आर्थिक संकट के दौरान अनेक बैंकों का दिवाला निकल गया। उदाहरण के लिए महामन्दी (1929-33) के दौरान संयुक्त राज्य अमरीका के दो हजार से भी अधिक बैंक धराशायी हो गए इतना ही नहीं, समय-समय पर छोटे बैंकों को बड़े बैंकों में मिल जाने के लिए मजबूर किया गया। दिवालियापन और विलयन ने, इस प्रकार, बैंकों की कुल संख्या घटा दी और बचे हुए बैंकों के कारोबार को बढ़ा दिया। स्पष्ट है कि बैंकिंग व्यवसाय में एकाधिकारवादी प्रवृत्ति मजबूत हुई। थोड़े से बैंकों के हाथों में ही जमा राशियाँ संकेन्द्रित होने तथा ऋण के वैकल्पिक स्रोतों के अभाव के कारण उन उद्यमों के निर्णयों और कारोबार पर प्रभाव डालने की उनकी क्षमता बढ़ गई जो उनसे कर्ज लेते थे। उन्हें हमेशा यह ध्यान रहता था कि ऐसे उद्यमों की स्थिति न बिगड़े जिनमें उनका काफी धन लगा हो। बैंक कम्पनियों को शेयर, डिबेंचर अन्य प्रतिभूतियाँ आदि जारी करने में सहायता देने लगे। अधिकतर वित्तीय लेन-देन उन्हीं के जरिए होने लगे। वे कम्पनियों के संवर्द्धक बन गये और उन्होंने स्वयं उनके शेयर खरीदे तथा विभिन्न प्रकार की प्रतिभूतियों के आधार पर ऋण दिए। इस प्रक्रिया में बैंक के प्रतिनिधि निदेशक मण्डल में घुस गए और सम्बद्ध कम्पनियों की नीतियों और निर्णयों को प्रभावित करने लगे। इसकी विपरीत प्रवृत्ति भी देखी गई जब औद्योगिक एकाधिकारियों ने बड़े बैंकों के शेयरों को बड़ी संख्या में खरीदने या अपने निजी बैंक स्थापित करने शुरू कर दिए जिससे उन्हें अधिकाधिक मात्रा में वित्तीय संसाधन मिल सकें। परिणामस्वरूप, बैंक पूँजी के औद्योगिक पूँजी के साथ सम्मिलन से एक नए प्रकार की पूँजी-वित्तीय पूँजी-का जन्म हुआ। एकाधिकारी पूँजी की संवृद्धि और वित्तीय पूँजी के उदय के फलस्वरूप बड़े बैंकरों और उद्योगपतियों का एक छोटा सा समूह देश की अर्थव्यवस्था का नियंत्रण करने लगा। यह छोटा सा समूह जो अर्थव्यवस्था में निर्णयकारी भूमिका अदा करता है, वित्तीय अल्पतंत्र के नाम से जाना गया। अमरीकी अर्थशास्त्रियों, बर्ले और मिंस, ने 1932 में प्रकाशित अपनी पुस्तक दि माडर्न कारपोरेशन एण्ड प्राइवेट प्रापर्टी में दावा किया कि वित्तीय अल्पतंत्र इतना शक्तिशाली है कि वह किसी भी विकसित पूँजीवादी देश में आधुनिक राज्य का सामना कर सकता है। वित्तीय अल्पतंत्र न सिर्फ अर्थव्यवस्था बल्कि राष्ट्र के सम्पूर्ण सामाजिक, राजनीतिक जीवन को प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, आठ वित्तीय समूह संयुक्त राज्य अमरीका के सामाजिक, आर्थिक जीवन पर दबदबा बनाए हुए हैं। ये समूह हैं - मॉर्गन, रॉकफेल्लर, दुपोंत, मेल्लन, बैंक ऑफ अमरीका, शिकागो बैंक, क्लीवलैण्ड बैंक और फर्स्ट नेशनल सिटी बैंक। यह जाहिर हो गया है कि अमरीका में सिर्फ एक प्रतिशत सम्पत्तिवानों का राष्ट्र की 59 प्रतिशत सम्पत्ति पर नियंत्रण है। उनमें भी केवल 250-300 परिवारों का ही बोलबाला है। वित्तीय अल्पतंत्र और उसकी शक्ति को कुछ अर्थशास्त्रियों ने विशिष्ट व्यावसायिक वर्ग की संज्ञा दी है जिसमें संभवतः पाँच से दस हजार व्यक्तियों का कार्मिक दल, उच्च पदाधिकारी, निदेशक मण्डलों के सदस्य, बड़ी कानूनी और लेखा फर्मों के हिस्सेदार, महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थानों के मुख्य अधिकारी शामिल हैं। ऊपर जो कुछ कहा गया है वह उन्हीं देशों के लिए सही है जहाँ पूँजीवादी व्यवस्था विकसित हुई। दुनिया के अधिकतर देश उसके प्रभाव क्षेत्र में भिन्न-भिन्न तरह से लाए गए। पूँजी का निर्यात और अन्तर्राष्ट्रीय होड़एकाधिकारी चरण के दौरान पूँजीवाद एक विश्वव्यापी व्यवस्था बन गया। विश्व के सभी देश उसके प्रभाव-क्षेत्र में आ गए। देशों के परस्पर सम्बन्धों में एक नया आयाम जुड़ गया। वह था - एक देश से दूसरे को पूँजी-निर्यात। एकाधिकारी पूँजीवाद के उदय के पहले अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों ने देशों के बीच वस्तुओं के विदेश व्यापार का रूप ले रखा था। जब पूँजीवाद ने एकाधिकारी चरण में प्रवेश किया तब अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की मात्रा बढ़ी परन्तु इस युग की मुख्य विशेषता बनी - पूँजी का निर्यात।पूँजी का निर्यात विकसित पूँजीवादी देशों में भारी परिमाण में पूँजी संचय और स्वयं वहाँ पर उसके निवेश में आने वाली कठिनाइयों का परिणाम होता है। विकसित पूँजीवादी देशों में अधिशेष पूँजी की समस्या काफी विकट हो गई। मुनाफे की ऊँची दरों और उपनिवेशों से सम्पदा के भारी मात्रा में लाने के कारण उनके पास पूँजी की विशाल राशि जमा हो गई। यदि यह सारी पूँजी उनमें लगाई जाती तो औसत मुनाफे की प्रवृत्ति गिरने की होती। मजदूरों की संख्या वहाँ कमोबेश निश्चित थी। इसलिए यह स्वाभाविक था कि अन्य, विशेषकर कम विकसित देशों में पूँजी निवेश की सम्भावनाएँ ढूँढ़ी जाएँ जिससे वर्तमान स्थिति से बचा जाए। कम विकसित देशों में, आमतौर से पूँजी का अभाव था जबकि श्रम, भूमि और कच्चे माल सस्ते थे। वहाँ श्रम की रक्षा और उसके काम की दिशाओं को विनियमित करने के लिए चुस्त-दुरूस्त कानूनों का अभाव था। श्रम या तो असंगठित था अथवा श्रम संगठन काफी कमजोर थे। इन सब परिस्थितियों से मुनाफे की दर बढ़ाने में मदद मिली। पूँजी-निर्यात ने प्रत्यक्ष निवेश से लेकर ऋण पूँजी तक विविध रूप लिए। कई बार पूँजी के मालिकों ने नई कम्पनियाँ बनाई थीं कतिपय विद्यमान कम्पनियों की शाखाएँ खोलीं अथवा मेहमाननवाज देशों की सरकार या निजी कम्पनियों के साथ मिलकर काम किया। फिर कई बार उन्होंने सरकारों को कर्ज दिए। पूँजी-निर्यात के परिणामस्वरूप दाता देशों से मालों का निर्यात भी बढ़ा जिससे विपणन और मूल्य-वसूली की कठिनाइयाँ कम हो गईं। ऋणों का पुनर्भुगतान और ब्याज का भुगतान आमतौर से ऋणी देशों से प्राथमिक वस्तुओं के निर्यात के रूप में हुआ। जहाँ भी एकाधिकारियों का उदय हुआ, उन्होंने वहाँ सबसे पहले घरेलू बाजार पर अपना पूरा दबदबा स्थापित करने की कोशिश की। उन्होंने घरेलू बाजार को अपने बीच इस प्रकार बाँट लिया जिससे प्रतिद्वंदिता समाप्त हो जाए और यथा सम्भव अधिकतम मुनाफा प्राप्त करने के लिए कीमतों को बढ़ा दिया जाय। चूँकि घरेलू बाजार शायद ही कभी उनके बढ़ते हुए उत्पादन की खपत के लिए पर्याप्त होता था, इसलिए उन्होंने अन्य देशों के बाजारों पर कब्जा जमाने की कोशिश की। यदि विदेशी बाजारों में ऊँचे आयात शुल्कों और अन्य प्रतिबन्धों के कारण घुस पाना कठिन साबित हुआ तो उन्होंने पूँजी-निर्यात का सहारा लिया। विदेशों में कारखाने लगाए गए जिससे वहीं वस्तुओं को बनाया और बेचा जाए। स्थानीय प्रतिद्वंदियों को समाप्त करने के लिए ‘बाजार को वस्तुओं से पाटने’ (डंपिंग) जैसे उपायों का सहारा लिया गया। कई बार उन्होंने कीमतें घटाकर उत्पादन घाटा अन्य देशों में होने वाले मुनाफों से पूरा किया परन्तु उन्होंने इस तरह स्थानीय प्रतिद्वंदियों को समाप्त कर दिया। प्रत्येक पूँजी-निर्यातक देश की सरकार ने अपने एकाधिकारियों के हितों की रक्षा करने और उन्हें प्रोत्साहित करने की कोशिश की। फलस्वरूप एकाधिकारियों के विभिन्न समूहों और उनकी सरकारों के बीच झगड़े, तनाव और युद्ध हुए। यदि उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ से होने वाले युद्धों के कारणों और पृष्ठभूमि को देखें तो यह बात स्पष्ट हो जाएगी। जैसा कि सर्वविदित है, पिछली सदी के दौरान ब्रिटेन ‘संसार का कारखाना’ बन गया था। उसने भाप की शक्ति से संचालित कारखानों में बड़े पैमाने पर वस्तुओं का उत्पादन करना आरम्भ किया क्योंकि उसका घरेलू बाजार उनकी खपत करने में सक्षम नहीं था। इसलिए उसने विदेशी घरेलू बाजारों में घुसना चाहा। उसने रेल मार्ग के निर्माण के लिए विदेशों को पूँजी का निर्यात किया जिससे वह अपने मालों को तेजी से वितरित कर सके और साथ ही अपने कारखानों और जनसंख्या के लिए कच्चे माल, खनिज पदार्थ और खाद्यान्न प्राप्त कर सके। उन्नीसवीं सदी के अन्त में कई अन्य देशों में भी औद्योगिक क्रान्ति हुई और वे शीघ्र ही विश्व बाजार में ब्रिटेन के प्रतिद्वंदी बन गए। ब्रिटिश निर्यात को धक्का लगा और ब्रिटिश उद्योगपतियों को विपणन सम्बन्धी कठिनाइयां का सामना करना पड़ा। इन परिस्थितियों में उपनिवेशों को पूँजी निर्यात किया जाने लगा जिससे परिवहन की लागतों, मजदूरी और कच्चे मालों के ऊपर खर्च को घटाकर उत्पादन-लागत कम की जा सके। ब्रिटेन ने 1880 तक एक अरब डालर, 1905 तक दो अरब डालर और प्रथम विश्व युद्ध तक चार अरब डॉलर पूँजी निर्यात की। 1913 तक कुल 25 से 33 प्रतिशत ब्रिटिश निजी पूँजी देश से बाहर निवेश की गई थी। चालू निवल विदेशी निवेश चालू निवल घरेलू निवेश से अधिक था। यही प्रक्रिया और प्रवृत्ति अन्य औद्योगिक देशों में भी देखी जा सकती थी। 1914 तक फ्रांस, जर्मनी और संयुक्त राज्य अमरीका ने विदेशों में क्रमशः ढाई अरब डालर, पौने दो अरब डालर और 40 करोड़ डालर का निवेश कर रखा था। परस्पर संघर्ष और झगड़े से बचने के लिए एकाधिकारियों ने अपने बीच संसार को बाँट लेने के लिए समझौते करने की कोशिशें कीं। उन्होंने विपणन क्षेत्रों, कच्चे मालों के स्रोतों और पूँजी-निर्यात के दायरों के सीमांकन और आवंटन की कोशिशें कीं। किन्तु ये समझौते स्थायी नहीं बन सके। एकाधिकारियों से असम विकास और बाहरी बाजारों तथा अधिशेष पूँजी के निवेश एवं कच्चे मालों के लिए क्षेत्रों की बढ़ती हुई आवश्यकताओं ने पुरानी व्यवस्थाओं को बेकार कर दिया। अपनी सरकारों के समर्थन से एकाधिकारियों ने एक दूसरे के इलाकों को हथियाने की कोशिश की। परिणाम हुआ युद्ध और स्थानीय झगड़े। बीसवीं सदी के आरंभ तक प्रमुख यूरोपीय शक्तियों के बीच विश्व का क्षेत्रीय विभाजन पूरा हो चुका था और कहीं भी कोई खाली जगह नहीं थी। ऐसी स्थिति में कोई भी प्रमुख पूँजीवादी शक्ति अपनी क्षेत्रीय सम्पत्ति को तभी बढ़ा सकती थी जब वह दूसरों से कुछ छीने। इसका अर्थ यह होता कि दुनिया के मानचित्र को फिर से खींचना पड़ता और निश्चित रूप से उन क्षेत्रों पर कब्जा जमाये हुए देश कड़ा प्रतिरोध करते। प्रथम और द्वितीय दोनों विश्व युद्ध इसी कारण हुए। प्रथम विश्व युद्ध समाप्त होने और दुनिया का नक्शा फिर से बनाए जाने के बाद जर्मनी, जापान और इटली के एकाधिकारियों ने अपनी सरकार पर दबाव डालना शुरू किया कि वे उनके विस्तार के लिए नए क्षेत्र उपलब्ध कराए। यह तभी संभव होता जब ब्रिटेन, अमरीका, फ्रांस आदि से उनके कुछ इलाके ले लिए जाते और सोवियत संघ को उपनिवेश बना दिया जाता। ब्रिटेन, फ्रांस और संयुक्त राज्य अमरीका ने पहले हिटलर और मुसोलिनी के प्रति तुष्टीकरण की नीति अपनाई और चैकोस्लोवाकिया तथा कुछ अन्य पूर्वी यूरोपीय देशों की बलि चढ़ा दी, परन्तु उनकी कोशिशें बेकार गईं और द्वितीय विश्व युद्ध आरम्भ हो गया। नव उपनिवेशवादप्रथम विश्व युद्ध के पहले पूँजीवाद के संकट ने विश्व व्यवस्था के रूप में उसके अस्तित्व को कभी धक्का नहीं पहुँचाया। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक उसने एकमात्र विश्व व्यवस्था के रूप में अपना आधिपत्य कायम कर लिया था। संसार के लगभग सारे हिस्से उसके दायरे में आ गए थे।किन्तु, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उसके पतन की प्रक्रिया आरम्भ हो गई और उसका प्रभाव क्षेत्र सिकुड़ने लगा। 1917 में एक प्रमुख देश रूस उससे बाहर चला गया और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उपनिवेशवाद के विघटन की प्रक्रिया शुरू हो गई। सबसे पहले भारतीय उपमहाद्वीप उपनिवेशवाद के दायरे से निकल गया और 1960 के दशक के अन्त तक उपनिवेशवाद के विघटन की यह प्रक्रिया लगभग पूरी हो गई। भूतपूर्व औपनिवेशिक शक्तियों ने नव स्वतंत्र देशों के प्रति अपनी आर्थिक रणनीति और कार्य नीति नए सिरे से इस प्रकार बनाई कि उनके साथ अपने पुराने आर्थिक सम्बन्ध बरकरार रख सकें। यह पुनर्सूत्रबद्ध रणनीति नव उपनिवेशवाद के नाम से जानी गई। यद्यपि यह शब्द केवल द्वितीय विश्व युद्ध के बाद प्रचलित हुआ, उससे जुड़ा तथ्य काफी समय से मालूम था। नव उपनिवेशवाद किसी भी देश की राजनीतिक स्वतंत्रता और उसकी आर्थिक निर्भरता का गठबंधन करता है। पुरानी शैली के उपनिवेशवाद के अन्तर्गत मूल्यवान कच्चे मालों और खनिज पदार्थां, बाजार और अधिशेष पूँजी के निवेश के लिए क्षेत्र की तलाश करने वाले साम्राज्यवादी राष्ट्र को अपने द्वारा हथियाए गए देश पर अपना झंडा फहराना पड़ता था। औपनिवेशिक शक्ति को उपयुक्त संस्थानों और सरकारी तंत्र तथा मूल निवासियों को नियंत्रण में रखने के लिए पुलिस और फौज की सहायता से अपना शासन स्थापित करना पड़ता था। समय बीतने और विश्व की स्थिति बदलने के साथ ही इस प्रकार की व्यवस्था पुरानी पड़ गई और बहुत खर्चीली बन गई। दो विश्व युद्धों ने उपनिवेश रखने वाली बड़ी साम्राज्यवादी शक्तियों को कमजोर कर दिया। अमरीकी वित्तीय पूँजी द्वारा संसार के अन्य हिस्सों में अवरोधां को समाप्त करने के लिए दबाव डाला जाने लगा जिससे वह निर्बाध रूप से अपना कार्य क्षेत्र बढ़ा सके। रूसी क्रान्ति और बाद में, सोवियत गुट के उदय ने विश्व शक्ति संतुलन में ऐसे परिवर्तन का संकेत दिया जिससे अपनी आजादी के लिए संघर्षरत उपनिवेशों के जनगण का पलड़ा मजबूत कर दिया। सबसे अधिक, पराधीन राष्ट्रां के मुक्ति संघर्ष की बढ़ती हुई ताकत ने औपनिवेशिक शक्तियों के लिए अपना शासन जारी रखना असम्भव बना दिया। उन्हें यह मानने पर मजबूर होना पड़ा कि विकासशील देशों में उनके हित औपचारिक पहनावे वाले गवर्नरों और महँगे औपनिवेशिक प्रशासनिक तंत्र के बिना भी साधे जा सकते हैं। यह रेखांकित किया गया कि बीसवीं सदी के पूँजीवाद को अपने लक्ष्य को साधने के लिए उपनिवेशवाद की अब आवश्यकता नहीं रह गई है। राजनीतिक और सैनिक, दोनों दृष्टियों से उपनिवेशवाद को बनाए रखना बड़ा महँगा हो गया और अनावश्यक भी। इसके बाद उन्होंने अन्य, स्पष्ट रूप से, कम अप्रिय और कम खर्चीले तरीके ढूँढ़ निकाले जिससे आर्थिक दबदबा बनाए रखा जा सके। उनके सामने संयुक्त राज्य अमरीका का उदाहरण था जो लैटिन अमरीका पर अपना दबदबा प्रत्यक्ष राजनीतिक उपस्थिति के द्वारा नहीं, बल्कि अमरीकी निजी पूँजी के द्वारा बनाये हुए था। पुरानी शैली के उपनिवेशवाद के पतन और उसका स्थान नव उपनिवेशवाद द्वारा ले लिए जाने के साथ-साथ राष्ट्रपारीय निगमों या बहुराष्ट्रीय निगमों का उदय हुआ जिनके हित नव स्वतंत्र देशों के साथ उनकी सरकारों के सम्बन्धों के निर्धारण में एक मुख्य मुद्दा बन गए। उपनिवेशवाद की तरह ही नव उपनिवेशवाद विकसित पूँजीवादी देशों के तैयार मालों के लिए बाजार देता है, उनको उपेक्षित कच्चे मालों, खनिज पदार्थों और अन्य प्राथमिक उत्पादों को उपलब्ध कराता है तथा नव स्वतंत्र देशों के दरवाजे अधिशेष पूँजी के निवेश के लिए खोलता है। इस प्रकार की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए जटिल परन्तु चतुराई भरी कार्रवाई की जरूरत होती है। इसके अन्तर्गत विकासशील देशों में ऊपर बैठे विशिष्ट वर्ग के लोगों के दृष्टिकोणों को प्रभावित करना भी शामिल होता है। जहाँ भी काई विकासशील देश अथवा उसकी सरकार ने अड़ियल रूख अपनाया वहाँ बाहर से आर्थिक और सैनिक दबाव बढ़ाए गए और यहाँ तक कि सैनिक विद्रोह कराया गया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राज्य अमरीका सबसे ताकतवर सैनिक और आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा। अमरीकी राष्ट्रपारीय निगमों ने संसार के नव स्वतंत्र राष्ट्रों में अपना कारोबार फैलाना आरम्भ किया। अमरीका द्वारा विदेश नीति के जरिए उनके फैलाव को समर्थन दिया गया और उनके हितों की रक्षा की गई। उनके उत्पादों की माँगों को बढ़ाने और उनके लिए कच्चे माल तथा खनिज पदार्थ प्राप्त करने के लिए ऋण और सहायताएँ दी गई। उनके हितों की रक्षा के उद्देश्य से सैनिक अड्डे बनाये गए। अमरीकी सैनिक सहायता का उद्देश्य वहाँ बने हथियारों के लिए माँग को बढ़ाना था। विभिन्न माध्यमों द्वारा राष्ट्रपारीय निगमों का प्रवेश आसान बनाया गया। बहुराष्ट्रीय निगमपहले ही कहा जा चुका है कि एकाधिकारी पूँजीवाद के उदय के साथ ही उत्पादन थोड़ी सी विशालकाय फर्मों में संकेन्द्रित हो गया। अभी छोटी फर्में तो हैं परन्तु वे वास्तव में इन बड़ी फर्मों की सहायक या अधीनस्थ बन गईं हैं। बहुराष्ट्रीय निगमों के उदय का अर्थ उनके हाथों में केवल पूँजी और उत्पादन का संकेन्द्रण ही नहीं बल्कि उनके दृष्टिकोण और संचालन में भी गुणात्मक परिवर्तन था। विश्व के विभिन्न भागों में फैले उनके अनेक प्रकार के क्रियाकलापों में तालमेल बैठाने के लिए स्थापित उनका प्रशासकीय ढाँचा अधिक जटिल हो गया।बड़े व्यावसायिक संगठन अपने आप में कोई नई बात नहीं हैं। अठारहवीं शताब्दी के दौरान भी अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में वे विद्यमान थे। ईस्ट इण्डिया कम्पनी का नाम इस सिलसिले में आसानी से स्मरण हो आता है जिसका भारतीय उपमहाद्वीप के साथ ब्रिटिश व्यापार पर एकाधिकार था। ऐसी अन्य कम्पनियाँ थीं-हडसन्स बे कम्पनी, रॉयल अफ्रीकन कम्पनी, आदि। स्टीफन हाइमर के शब्दों में, ‘‘मगर न तो ये फर्में और न ही उत्पादन के क्षेत्र में सक्रिय बड़े खनन और बागान उद्यम बहुराष्ट्रीय निगम के अग्रदूत थे, वे डाइनोसौर (पुराकालीन जन्तु) की तरह छोटे दिमाग मगर भारी भरकम शरीर वाली नई दुनिया के रसीले पेड़ पौधों पर जिन्दा रहते थे..........।’’ ‘‘सौदागरों, बागान मालिकों और खनकों ने औद्योगिक क्रान्ति की नींव डाली परन्तु विनिर्माण के क्षेत्र में लगे छोटे पैमाने के पूँजीवादी उद्यम जो पहले सामन्ती आर्थिक ढाँचे के दायरे में काम करते थे मगर धीरे-धीरे बाहर आये और अन्ततः प्रमुखता प्राप्त कर ली, प्रेरक शक्ति बने। आधुनिक निगम के अग्रदूत नवोदित पूँजीपति वर्ग द्वारा संगठित इन छोटे कारखानों में ही ढूँढ़े जा सकते हैं।’’ कालक्रम में इन्हीं छोटी बिखरी हुई फर्मों से बड़ी फर्मों का उदय हुआ। बाजार के आकार के विस्तार से मालों की माँग बढ़ी और फिर उत्पादन का पैमाना बढ़ा तथा धीरे-धीरे बड़ी फर्मों ने अनेक अन्य क्षेत्रों में अपने क्रियाकलाप को फैलाया। इन गतिविधियों ने प्रबन्ध और प्रशासन की समस्या खड़ी कर दी। प्रशासन के कार्यों को वित्त, कार्मिक मामलों, क्रय, विपणन और इंजीनियरी से लेकर श्रम प्रबन्ध, विनिर्माण, सरकार के साथ सम्बन्धों आदि तक को विभिन्न सम्भागों या विभागों में बाँटा गया। प्रतिद्वंदिता में बने रहने और संवृद्धि की अत्यन्त जरूरी आवश्यकताओं के कारण शोध एवं विकास विभाग का महत्व बढ़ गया। देश के अन्दर और बाहर स्थित विभिन्न शाखाओं के विविध प्रत्यक्ष क्रियाकलापों में तालमेल बैठाने के लिए एक केन्द्रीय कार्यालय की स्थापना हुई। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के विभाग ने 1973 में बहुराष्ट्रीय निगम शब्द की व्याख्या इस प्रकार की, ‘‘बहुराष्ट्रीय’’ शब्द इस बात का सूचक है कि निगम या उद्यम के क्रियाकलापों में एक से अधिक राष्ट्र शामिल हैं। कुल क्रियाकलापों में विदेशी हिस्से की कोटि या महत्व के सम्बन्ध में कतिपय न्यूनतम विशेष कसौटियाँ लागू की जाती हैं। विचाराधीन क्रियाकलाप विदेशी शाखाओं और सम्बद्ध संगठनों की परिसम्पत्तियों, बिक्री उत्पादन, रोजगार अथवा मुनाफों के विषय में हो सकता है। बहुराष्ट्रीय निगमों में सबसे ताकतवर वे हैं जिनका उद्गम संयुक्त राज्य अमरीका में हुआ है। बड़ी अमरीकी एकाधिकारी फर्मों का बहुराष्ट्रीयकरण इस शताब्दी के आरम्भ के आसपास शुरू हुआ जब बड़े पैमाने पर पूँजी का निर्यात किया जाने लगा। 1920 के दशक के दौरान उसे बढ़ावा मिला। 1930 के दशक के दौरान पूँजी-निर्यात धीमा पड़ गया परन्तु द्वितीय विश्व युद्ध के बाद फिर जोर-शोर से उसे जारी रखा गया। 1950 और 1960 के दशकों के दौरान अमरीकी फर्मों के विदेशी निवेश 10 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़े। संवृद्धि की चक्रवृद्धि दर पर वे दशक से कम समय में ही दोगुना हो गए। 1970 के बाद इस संवृद्धि की दर बढ़ी और अगली सदी के आरम्भ होते ही अमरीका के निजी विदेशी निवेश का पैमाना बहुत बड़ा हो जाएगा। बहुराष्ट्रीय निगमों की आर्थिक शक्ति आश्चर्यजनक रूप से बढ़ी है। आइए एक उदाहरण देखें। 1970 के दशक के आरम्भिक वर्षों में जनरल मोटर्स की एकल बिक्री का परिमाण अफ्रीका के विकासशील देशों (अल्जीरिया, मिस्र, लीबिया और मारक्को को छोड़कर) के सकल राष्ट्रीय उत्पाद के बराबर था। रॉयल डचशेल की सकल बिक्री का परिमाण भारत और पाकिस्तान को छोड़कर अफ्रीका या एशिया के किसी भी विकासशील देश के सफल राष्ट्रीय उत्पाद से अधिक था। किसी भी बहुराष्ट्रीय निगम का मुख्यालय वह केन्द्र है जहाँ सभी प्रमुख नीति सम्बन्धी निर्णय लिए जाते हैं और महामस्तिष्क (सुपर ब्रेन) असंख्य शाखाओं के क्रियाकलापों में तालमेल बैठाता हुआ काम करता है। मुख्यालय निवेश के स्तर, पूँजीगत और मध्यवर्ती वस्तुओं के स्रोत तथा कीमतों, उत्पादन की मात्रा और उसके वितरण, कीमत-निर्धारण के फार्मूले और अधिशेष के वितरण के बारे में फैसला करता है। ये सब निर्णय मुनाफे को अधिकतम बनाने और अपने मूल देश के हितों को ध्यान में रखकर किया जाता है। आम तौर से बाहरी क्षेत्रों से प्राप्त किया गया अधिशेष मूल देश या किसी नए बाहरी क्षेत्र को भेजा जाता है। मौरिस ओड्ले ने अपनी पुस्तक मल्टीनेशनल बैंक्स एण्ड अंडरडेवलपमेंट में दिखलाया है कि बहुराष्ट्रीय बैंकों को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और एक दूसरे को मजबूत बनाते हैं। जहाँ कहीं भी बहुराष्ट्रीय बैंकों का वित्तीय व्यवस्था पर दबदबा होता है वहाँ वे स्थानीय जनसंख्या की बचतों को इकट्ठा कर अधिकतर बहुराष्ट्रीय निगमों को ऋण के रूप में देते हैं। जहाँ उन्हें बहुराष्ट्रीय निगमों को ऋण देने की इजाजत नहीं होती और उन्हें सिर्फ या मुख्य रूप से देशी उद्यमों को ही ऋण देना होता है वहाँ वे इस प्रकार काम करते हैं कि देशी उद्यम ऐसी परियोजनाओं की ओर अग्रसर हों जिनके लिए सामानों का भारी मात्रा में आयात करना पड़े जिससे बहुराष्ट्रीय निगमों को फायदा पहुँचे। यह स्पष्ट है कि बहुराष्ट्रीय निगम वर्तमान विश्व पूँजीवादी व्यवस्था की एक विशिष्ट विशेषता है। वे सम्पूर्ण पूँजीवादी विश्व के एक तिहाई से भी अधिक सकल राष्ट्रीय उत्पाद 50 प्रतिशत से अधिक विदेश व्यापार और प्रौद्योगिकी जानकारी के 80 प्रतिशत विनिमय पर नियंत्रण रखते हैं। 1970 के दशक से नव स्वतंत्र देशों को बहुराष्ट्रीय पूँजी का निर्यात राजकीय पूँजी की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रहा है। 1971 तक विकासशील विश्व में बहुराष्ट्रीय निगमों की सम्बद्ध कम्पनियों की संख्या 50,000 से अधिक थी। विकासशील देशों को बहुराष्ट्रीय निगमों का कोई सुखद अनुभव नहीं रहा है क्योंकि निगम वहाँ सिर्फ अपने हितों को साधने के लिए काम करते हैं। ये हित मेहमाननवाज देशों के हितों से अलग होते हैं। वे विकासशील देशों में बुनियादी और भारी उद्योगों की कभी स्थापना नहीं करते और न ही राष्ट्रीयकरण के खतरे को देखते हुए उत्पादन की पूरी श्रंखला लगाते हैं। वे विकासशील देशों में आमतौर से शोध एवं विकास सम्बन्धी कार्य नहीं करते और वे अपने मेहमाननवाज देशों को अधिकतर स्थितियों में ऐसी आयातित प्रौद्योगिकी पर निर्भर रखते हैं जो घिसी-पिटी है या त्याग दी गई है। पूँजीवादी विश्व का लगभग 97 प्रतिशत शोध तथा डिजाइन सम्बन्धी कार्य औद्योगिक राज्यों द्वारा होता है जहाँ उस पर बहुराष्ट्रीय निगमों का एकाधिकार होता है। आने वाले सालों में बहुराष्ट्रीय निगमों के क्रियाकलापों को दो कारणों से भारी प्रोत्साहन मिलने वाला है। पहला, रियायती ऋणों और सरकारी विका-सहायता में भारी गिरावट से विकासशील देशों में प्रत्यक्ष विदेशी निजी निवेश आवश्यक हो गए हैं। दूसरा, निवेशकर्ताओं को जोखिमों से बचाने के लिए बहुपक्षीय निवेश गारंटी एजेंसी (मल्टीलेटरल इंवेस्टमेंट गारंटी एजेंसी) की स्थापना। विकासशील देश बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए एक आचार संहिता बनाए जाने की माँग करते आ रहे हैं जिससे उन्हें मेहमाननवाज देशों की सार्वभौमिकता और हितों का ध्यान रखने के लिए बाध्य किया जाए। राज्य की भूमिकापहले भी हम पूँजीवादी व्यवस्था में राज्य की आर्थिक भूमिका का थोड़ा बहुत जिक्र कर चुके हैं। अठारहवीं शताब्दी के दौरान एडम स्मिथ ने कहा था कि राज्य को अर्थव्यवस्था में कम से कम हस्तक्षेप करना चाहिए। उनके अनुसार राज्य अपने आपको मूल रूप से केवल तीन कार्यों तक ही सीमित रखे। वे तीन कार्य थे - (1) बाहरी शत्रुओें से देश का बचाव, (2) देश के अन्दर शांति और व्यवस्था बनाए रखना और जो उसे भंग करने की कोशिश करे, उसे रोकने और दण्ड देने के लिए पुलिस तथा न्यायालयों की स्थापना करना और (3) सड़कों, शैक्षणिक संस्थाओं, अस्पतालों, आदि जैसी सामुदायिक सेवाओं का प्रावधान करना। ये कार्य कोई भी एक व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह सम्पादित नहीं कर सकता और साथ ही उनके बिना अर्थव्यवस्था भी सुचारू रूप से काम नहीं कर सकती। इन कार्यों को करने के लिए राज्य को करों तथा अन्य तरीकों से धन जमा करने की इजाजत होनी चाहिए। राज्य को किसी भी हालत में इस सीमा से आगे नहीं जाना चाहिए। उसे अर्थव्यवस्था को बाजार की शक्तियों द्वारा विनियमित होने के लिए छोड़ देना चाहिए। उसे एक मध्यस्थ के रूप में देखना चाहिए कि विभिन्न आर्थिक करार और समझौते लागू हों। इस प्रकार राज्य की भूमिका की कल्पना खेल के अम्पायर के रूप में की गई। वह उन नियमों की व्याख्या करता और लागू करता है जिनके आधार पर आर्थिक खेल होता है और अर्थव्यवस्था संचालित होती है। दूसरे शब्दों में, राज्य से यह अपेक्षा की गई कि वह देखे कि बाजार की शक्तियों के काम करने के रास्ते में कठिनाइयाँ और बाधाएँ न आएँ।अर्थव्यवस्था के संगठन और संचालन का काम राजनीतिक सत्ता के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखकर बाजार उसकी उत्पीड़क शक्तियों को प्रबल होने नहीं देगा। आर्थिक शक्ति उस पर नियंत्रण रखेगी और उसे एक निश्चित सीमा के आगे नहीं जाने देगी। किन्तु ऐसा कहना सचमुच ठीक नहीं है कि राज्य ने अपने आपको एडम स्मिथ द्वारा बताए तीन कार्यों तक ही सीमित रखा। उदाहरण के लिए ब्रिटेन में राज्य ने 1760 और 1850 के बीच औद्योगिक पूँजीवाद के विकास में सहायता देने के लिए कई कदम उठाए। उसने उसके विकास के मार्ग में बाधा डालने वाले अनेक मध्यकालीन कानूनों को रद्द कर दिया। उसने श्रम और पूँजी की गतिशीलता के मार्ग में आने वाली कानूनी बाधाओं को समाप्त कर दिया। उदाहरण के लिए एक ऐसा कानून था जिसके अनुसार अपना कोई कारोबार स्वतंत्र रूप से चालू करने के लिए सात वर्षों तक अप्रेंटिस के तौर पर काम करने का सबूत होना चाहिए। पूँजी की गतिशीलता और इस्तेंमाल के मार्ग में सूद सम्बन्धी वह कानून बाधक था जिसके अन्तर्गत ब्याज की अधिकतम दर 5 प्रतिशत तक ही हो सकती थी। अनेक अन्य उदाहरण यह दिखाने के लिए दिए जा सकते हैं कि राज्य ने पूँजीवाद को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय भूमिका अदा की। एडम स्मिथ के कथन के विपरीत ब्रिटिश सरकार ने औद्योगिक संबंधों को विनियमित करने के लिए हस्तक्षेप किया। जपान का उदाहरण भी लिया जा सकता है। राज्य ने वहाँ आर्थिक रूपान्तरण में एक बड़ी सक्रिय भूमिका अदा की। उसने तोकुगावा काल के उन नियमों और विनियमों का उन्मूलन कर दिया जो पूँजीवाद के विकास में बाधक थे। उसने तत्कालीन सामन्ती, कानूनी, राजनीतिक और प्रशासनिक ढाँचे को समाप्त कर दिया। उसने पाश्चात्य शिक्षा, आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रसार की कोशिश की तथा परिवहन और संचार एवं वित्तीय मामलों में ऐसे परिवर्तन लाने की कोशिश की जिससे औद्योगिक पूँजीवाद के विकास को बढ़ावा मिले। उसने जापानी बाजार को घरेलू उत्पादन के लिए सुरक्षित रखा और उसने विदेशी पूँजीपतियों को वहाँ पर औद्योगिक इकाइयाँ लगाने की अनुमति नहीं दी। देशी पूँजीपति वर्ग के कमजोर होने के कारण स्वयं राज्य ने औद्योगिक इकाइयाँ स्थापित कीं और वे जब परिपक्व हो गईं तब उन्हें मामूली कीमतों पर जापानी पूँजीपतियों को बेच दिया गया। एकाधिकारी पूँजीवाद के उदय के बाद राज्य की आर्थिक भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो गई। यह देखा गया कि बाजार की शक्तियाँ अर्थ-व्यवस्था को संचालित करने में अक्षम हो गई हैं और यदि स्थिति को अनियंत्रित छोड़ दिया गया तो अर्थव्यवस्था में गम्भीर अस्थिरता हो सकती है। एकाधिकारियों के हाथों में उत्पादन के संकेन्द्रण का अर्थ था प्रतिद्वंदिता द्वारा अर्थव्यवस्था के अपने आप विनियमन की व्यवस्था का अन्त। यही कारण था कि इस शताब्दी के आरम्भ से विकसित पूँजीवादी देशों की अर्थव्यवस्थों में राज्य अधिकाधिक हस्तक्षेप करने लगा। विभिन्न सामाजिक वर्गां के बीच आय के वितरण को विनियमित करने के लिए उसे बाध्य होना पड़ा। राज्य ने अपने ऊपर अत्युत्पादन या स्थापित क्षमता के उपयोग में नहीं आने और श्रम की बेरोजगारी की समस्या के हल के लिए प्रभावकारी माँग की मात्रा बढ़ाने की जिम्मेदारी ले ली। उसे निर्यात बढ़ाने और अपने विनिर्माताओं के हितों की रक्षा के लिए विदेश व्यापार के क्षेत्र में हस्तक्षेप करना पड़ा। आवश्यकता महसूस होने पर उसने उद्यमों का राष्ट्रीयकरण किया और वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन आरम्भ किया। इस प्रकार पूँजीवाद के एकाधिकारी दौर में शक्ति और युद्ध दोनों कालों में, राज्य ने अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप किया। नात्सी जर्मनी में उसने कार्टेलों को बढ़ावा दिया और मजदूरी में वृद्धि को रोका। रूजवेल्ट प्रशासन के दौरान उसने न्यूडील कार्यक्रम की शुरूआत की और उसका कार्यान्वयन किया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन, फ्रांस और कई अन्य यूरोपीय देशों में उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया गया। राजकीय व्यय में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है जो बाजार एवं निवेश और उत्पादन सम्बन्धी निर्णयों को प्रभावित करता है। इस व्यय का एक बड़ा भाग सैन्यीकरण के ऊपर है। राज्य की बढ़ती हुई आर्थिक भूमिका ने एकाधिकारी पूँजीवाद में एक नया आयाम जोड़ा है। विकसित पूँजीवादी राज्यतंत्र का अधिकाधिक इस्तेमाल अर्थव्यवस्था को संकटों से बचाने के लिए होता है। राज्य नियोजन के कुछ तत्वों को लागू करने और एकाधिकारियों का मार्गदर्शन करने की कोशिश करता रहा है जिससे उन्हें संकटों के चंगुल में फँसने से बचाया जा सके। राज्य और एकाधिकारियों के एक साथ आने को राजकीय एकाधिकारी पूँजीवाद का नाम दिया गया है। सरकारी बजट एकाधिकारियों का मुनाफा कमाने के लिए अवसर प्रदान करता है। वह सैन्यीकरण के लिए धन की व्यवस्था करता है जिससे हथियार बनाने वालों के उत्पादों के लिए माँग पैदा होती है। जब किसी विकसित पूँजीवादी देश की सरकार किसी अन्य देश को सैनिक सहायता देती है अथवा आक्रामक युद्ध शुरू करती है तो इससे हथियार बनाने वालों के लिए आर्डर मिलते हैं। इसके अतिरिक्त उत्पादक आधारभूत ढाँचे में सार्वजनिक निवेश एकाधिकारी उद्यमों के मुनाफाप्रद ढंग से काम करने के लिए स्थितियाँ पैदा करता है। शिक्षा, प्रशिक्षण, मूलभूत और प्रायोगिक विज्ञानों तथा शोध पर सार्वजनिक व्यय, एकाधिकारियों को अपेक्षित मानवीय पूँजी प्राप्त करने में सहायक होता है। राजकीय एकाधिकारी पूँजीवाद के विकास के परिणामस्वरूप एकाधिकारी पूँजी और राज्य के विभिन्न स्तरों के बीच घनिष्ट व्यक्तिगत संबंध कायम हो गए हैं। यह दो तरह से हुआ है - (1) सरकारी अधिकारी एकाधिकारी कम्पनियों तथा वित्तीय संस्थाओं के निदेशक मण्डलों के सदस्य बन जाते हैं और (2) एकाधिकारी पूँजी से सम्बद्ध लोग सरकार में ऊँचे पदों पर आ जाते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार संयुक्त राज्य अमरीका के मंत्रिमण्डल में 1889 से लेकर 1949 तक व्यावसायिक जगत का हिस्सा 60 प्रतिशत था। 1953-1961 और उसके बाद भी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। यही चीज ब्रिटेन के लिए भी सही है। 1886 से लेकर 1950 तक लगभग एक तिहाई मंत्री व्यवसायी वर्ग के थे। तीन प्रधान मंत्री-बोनार लॉ, बाल्डविन और चैम्बरलेन - सीधे तौर पर एकाधिकारी घरानों से जुड़े हुए थे। संक्षेप में राजकीय एकाधिकारी पूँजीवाद की निम्नलिखित मुख्य विशेषताएँ हैं - (1) उत्पादन के साधनों और सामाजिक सम्पदा के एक निश्चित भाग पर राज्य का अधिकार और इस प्रकार राज्य का एक महत्वपूर्ण उद्यमी के रूप में उदय, (2) राज्य द्वारा अर्थव्यवस्था का अंशतः प्रत्यक्ष और अंशतः अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण और विनियमन, जिसके लिए राज्य प्रोग्रामिंग, राजकीय बजट, ऋण और वित्तीय व्यवस्था और कीमत-नीतियों का सहारा लेता है, (3) पूँजी और श्रम के परस्पर सम्बन्धों का विनियमन, (4) राज्य द्वारा वस्तुओं और सेवाओं, विशेषकर सैनिक सामानों की खरीददारी, (5) देश के बाहर एकाधिकारी पूँजी के हितों की रक्षा और उसके वहाँ फलने-फूलने के लिए प्रोत्साहन, (6) विभिन्न देशों की एकाधिकारी पूँजी के बीच गठजोड़ तथा समझौतों को प्रोत्साहन और (7) एकाधिकारी पूँजी और राज्य के विभिन्न अंगों के बीच व्यक्तिगत सम्मिलन। विकासशील देशों में राज्य की भूमिकाअधिकतर विकासशील देशों में अपनी राजनीतिक आजादी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद प्राप्त की है। वे अपनी अर्थव्यवस्थाओं का इस प्रकार पुनर्निर्माण करने में लगे हैं जिससे उन्हें आर्थिक आजादी हासिल हो और वे अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता को सुरक्षित तथा आम जनता के लिए सार्थक बना सकें।आजादी के समय ये देश विकास के अलग-अलग स्तरों पर थे, परन्तु वे लगभग सारे के सारे सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए थे। आधुनिक विनिर्माण उद्योग और आधारभूत ढाँचे सम्बन्धी सुविधाएँ बहुत कम थीं या बिल्कुल ही नहीं थीं। इनमें से अधिकतर देशों में अर्थव्यवस्था पर निष्कर्षण उद्योगों और एक पिछड़ी हुई कृषि का दबदबा था। पूँजीवाद पूर्व व्यवस्थाओं के अवशेष आधुनिकीकरण के रास्ते में भारी रूकावट थे। यहाँ तक कि जहाँ 1970 के दशक के मध्य में विकासशील देश जहाँ 70 प्रतिशत विश्व की जनसंख्या रहती थी, केवल 13-14 प्रतिशत विश्व औद्योगिक उत्पादन ही उत्पन्न करते थे। विकसित पूँजीवादी देशों और विकासशील देशों के बीच प्रति व्यक्ति आय के स्तरों में काफी बड़ा फर्क था जो लगातार बढ़ता जा रहा था। प्रौद्योगिक दृष्टि से विकासशील देश अत्यन्त पिछड़े हुए थे। उनके पास तकनीकी दृष्टि से योग्य लोगों की कमी थी और शिक्षा का स्तर काफी नीचा था। स्वास्थ्य सेवाएँ अपर्याप्त थीं। महामारियाँ और रोग उन्हें तबाह करते थे और मृत्यु दर काफी ऊँची थी। उनके सामने दो ही रास्ते थे। वे दूसरों पर निर्भरता का रास्ता (नव उपनिवेशवाद) अपना सकते थे या एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए कोशिश कर सकते थे। दूसरा विकल्प अपनाने पर उन्हें निश्चित रूप से पूँजी-संचय, संकुचित घरेलू बाजार और प्रशिक्षित एवं तकनीकी दृष्टि से योग्य व्यक्तियों के अभाव से जुड़ी कठिनाइयों और समस्याओं का सामना करना पड़ता। इस प्रकार उन्हें अपने औपनिवेशिक अतीत से एक अन्यायपूर्ण बाह्य आर्थिक माहौल मिला था। इन समस्याओं और कठिनाइयों को राज्य के सक्रिय योगदान के बिना हल नहीं किया जा सकता था क्योंकि पूँजीपति वर्ग या तो था ही नहीं या बहुत कमजोर था। पिछड़ेपन पर पार पाने और स्वतंत्र विकास को बढ़ावा देने के लिए राज्य का हस्तक्षेप अपरिहार्य माना गया। विकासशील देशों में राज्य ने उत्पादन के पुराने घिसे-पिटे सम्बन्धों और अन्य पुरातन व्यवस्थाओं को समाप्त करने के लिए सुधार लागू किए हैं। उसने भूमि सुधारों को अपनाया है। उसमें एक आधुनिक सार्वजनिक क्षेत्र का विकास किया है और वित्तीय संस्थाओं को मजबूत बनाया तथा उनका विस्तार किया है। वह जनता की बचतों को जुटाता, विदेशी ऋणां की व्यवस्था करता तथा निजी क्षेत्र के लिए विदेशी सहयोग का जुगाड़ करता है। वह प्रशिक्षित जनशक्ति और उत्पादन के अन्य कारकों के अभाव की समस्या को हल करता है तथा नवस्थापित उद्योगों की विपणन सम्बन्धी जरूरतों को पूरा करता है। वह अर्थव्यवस्था के विकास के लिए योजनाएँ बनाता हैं। वह आधारभूत ढाँचा सम्बन्धी सुविधाएँ देता है और अर्थव्यवस्था एवं घरेलू बाजार को विदेशी पूँजीपतियों से सुरक्षित रखता है। वह वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक सम्बन्धों में परिवर्तन तथा एक नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की स्थापना और वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों का पुनर्गठन कर उन्हें विकासशील देशों की आवश्यकताओं के अनुकूल बनाने के आन्दोलन की अगली कतार में है। वह निःशस्त्रीकरण की वकालत करता है जिससे उसके परिणामस्वरूप प्राप्त धनराशि को विकास के कामों में लगाया जा सके। वह विकसित देशों द्वारा खड़े किए गए संरक्षणात्मक अवरोधों को तोड़ने और विकासशील देशों को पर्याप्त मात्रा में रियायती सहायता देने पर जोर देता है। राज्य की सक्रिय भूमिका के कारण ही अनेक विकासशील देश काफी हद तक विरासत में मिले पिछड़ेपन पर पार पाने तथा अर्थव्यवस्था को आधुनिकीकरण के पथ पर आगे ले जाने में समर्थ हुए हैं। ऊपर जो कुछ कहा गया है उसका यह मतलब नही है कि विकासशील देशों में राज्य ने परम्परागत विनियामक कार्यों पर पर्याप्त जोर नहीं दिया है। वह मजदूरी और काम की स्थितियों का विनियमन करता है। वह कीमत नियंत्रण और राशनिंग लागू करता है जिससे उपभोग की आवश्यक वस्तुओं का उचित ढंग से वितरण हो और कीमतों की स्थिरता बनाई रखी जा सके। वह ध्यान रखता है कि निवेश योग्य संसाधनों को इस प्रकार आवंटित किया जाए कि वे उसके द्वारा निर्धारित प्राथमिकताओं के अनुरूप हों। वह उत्पादन और उपभोग के ढाँचे को विनियमित करता, आधारभूत ढाँचे की सुविधाएँ देता और विदेशी आर्थिक सम्बन्धों को विनियमित करता है। विकासशील देशों में राज्य को आगे आकर उपर्युक्त कई कार्यों को करना पड़ता है क्योंकि बाजार की शक्तियाँ उन्हें करने में असमर्थ होती हैं। उद्यम सम्बन्धी साहसिकता काफी कमजोर होती है और उद्यमियों में दूरदर्शिता नहीं होती। राज्य का लक्ष्य कीमतों की स्थिरता और सामाजिक न्याय सहित आर्थिक संवृद्धि लानी होती है। समाजवादी व्यवस्था‘समाजवाद’ शब्द सर्वप्रथम 1809 में ही प्रयोग में आया। 1827 में वह पहली बार लंदन को-आपरेटिव सोसायटी की पत्रिका में मुद्रित हुआ। किन्तु उसका व्यवहारिक रूप केवल 1917 की अक्टूबर क्रान्ति के बाद ही देखने में आया है।फिर भी अपने भ्रूण रूप में समाजवादी विचार सदियों से वर्तमान रहे हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि ये विचार उतने ही पुराने हैं जितना सामाजिक शोषण और उत्पीड़न के विरूद्ध संघर्ष। यह धारणा मध्य युगों में भी रही है कि किसी भी न्यायोचित समाज में सभी वस्तुओं पर सामूहिक स्वामित्व होगा। औद्योगिक क्रान्ति के आरम्भ होने के बाद पूँजीवाद ज्यों-ज्यों अपनी गहरी जड़ें जमाता गया त्यों-त्यों उसकी अन्तर्निहित बुराइयाँ कुछ सूक्ष्म दृष्टि वाले लोगों द्वारा महसूस की जाने लगीं। फलस्वरूप उन्नीसवीं शताब्दी का आरम्भ होते ही ब्रिटेन और फ्रांस में पुस्तकों और पत्रिकाओं ने पूँजीवाद का एक विकल्प प्रस्तुत करने की कोशिश की। अन्याय, शोषण और उत्पीड़न से मुक्त समाज के स्वप्न को साकार बनाने के प्रयास किए गए। उसके बाद रॉबर्ट ओवेन, सेंट साइमन और चार्ल्स फूरिये नामक तीन महान् चिन्तक आए जिन्होंने पूँजीवाद के स्थान पर अपनी कल्पना का समाजवाद लाने की कोशिश की। उन्होंने निजी सम्पत्ति की जगह सामाजिक सम्पत्ति स्थापित करना और बाजार की शक्तियों के कार्य क्षेत्र को कम करने के लिए नियोजन लागू करना चाहा। उनके सपने के समाज में मजदूरों को अपने श्रम के फल प्राप्त होते और शोषकों एवं परजीवियों के लिए कोई जगह नहीं होती। कार्ल मार्क्स और उनके सहयोगी फ्रेडरिक एंगेल्स ने समाजवाद को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। समाजवाद की उनकी अवधारणा मनोभावों पर नहीं, बल्कि मानव समाज के इतिहास के आद्योपान्त वैज्ञानिक अध्ययन पर आधारित थी। उन्होंने समाजवादी व्यवस्था का कोई विस्तृत खाका पेश नहीं किया और न ही उन्होंने यह बतलाया कि यह व्यवस्था व्यवहार में कैसे काम करेगी। उन्होंने अपना ध्यान मुख्यतया वर्तमान व्यवस्था - पूँजीवाद, उसके उद्भव और कार्य प्रणाली पर ही संकेन्द्रित किया। उन्होंने उन शक्तियों पर प्रकाश डाला जो समाज व्यवस्था में परिवर्तन लाएँगी। उन्होंने सिद्ध किया कि समाजवाद की स्थापना अवश्यम्भावी है और वह मानव समाज के ऐतिहासिक विकास की अगली अवस्था होगी। उनके अनुसार यह पूँजीवादी व्यवस्था के विकास का अवश्यम्भावी और निश्चित परिणाम होगा। समाजवाद की स्थापना के बाद उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व समाप्त हो जाएगा और उसका स्थान सामाजिक स्वामित्व ले लेगा। वर्गों और वर्ग-विरोध वाले पुराने पूँजीवादी समाज का स्थान एक ऐसा संघ लेता है जिसमें ‘प्रत्येक व्यक्ति का स्वतंत्र विकास सभी के स्वतंत्र विकास की शर्त होता है।’ उन्होंने कहा कि अन्तिम लक्ष्य कम्युनिस्ट समाज की स्थापना है जिसका पहला चरण समाजवाद होगा। जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है, समाजवाद के अन्तर्गत उत्पादक शक्तियाँ काफी बढ़ती हैं और उत्पादन के बढ़ते हुए संकेन्द्रण, सामाजिक श्रम विभाजन के बढ़ते हुए दायरे, बढ़े हुए विशेषीकरण तथा उत्पादकों के बीच सहयोग के फलस्वरूप उत्पादक शक्तियाँ काफी विकसित हो जाती हैं तथा आर्थिक कार्यों के विभिन्न दायरे और अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्र और शाखाएँ एक दूसरे पर निर्भर हो जाती हैं। इस प्रकार उत्पादन एक अत्यन्त सामाजिक चरित्र ग्रहण कर लेता है और उत्पादक शक्तियाँ विकास के ऐसे स्तर पर पहुँच जाती हैं जो इतिहास में अभूतपूर्व हैं। ये दोनों विशेषताएँ अभिग्रहण की प्रणाली में परिवर्तन की माँग करती हैं और उत्पादन के पूँजीवादी सम्बन्ध उत्पादक शक्तियों के भावी सुचारू विकास की गारन्टी करने में सक्षम नहीं होते। साथ ही, मजदूर वर्ग का आकार भी बढ़ता है और यह वर्ग बेहतर ढंग से संगठित और समेकित हो जाता है। मजदूरों के बीच एकजुटता की भावना पनपती है। वे अपने साथ मेहनतकश किसानों, खेतिहर मजदूरों आदि जैसे समाज के अन्य श्रमजीवी और उत्पीड़ित श्रेणियों तथा बुद्धिजीवियों के एक हिस्से को अपने साथ लाते और उनके साथ गठजोड़ करते हैं। समाजवादी क्रान्ति का लक्ष्य एक वर्गविहीन समाज की स्थापना है जहाँ किसी प्रकार उत्पीड़न न हो। इस समाज में जहाँ, माना जाता है कि व्यक्तियों के हित आपस में नहीं टकराएँगे, बल्कि, वस्तुतः उनका तादात्म्य होगा, प्रतिद्वंदिता के लिए कोई स्थान नहीं होगा। कोई वर्ग नहीं होंगे। जैसे ही निजी स्वार्थ और प्रत्येक व्यक्ति द्वारा स्वयं अपने आपको समृद्ध बनाने का लक्ष्य उत्पादन और वितरण के क्षेत्र से लुप्त हो जायेगा, कोई व्यापार चक्र नहीं चलेगा। उत्पादन की मात्रा को लेकर कोई अनिश्चितता नहीं रहेगी। यह समाज उत्पादन का विनियमन आवश्यकताओं के अनुसार करेगा और वितरण का आधार होगा ‘प्रत्येक से उसकी क्षमता के अनुसार कार्य और प्रत्येक को उसकी आवश्यकताओं के अनुसार भुगतान’। यह तभी सम्भव होगा जब हर चीज की विपुलता हो। वस्तुतः कम्युनिस्ट समाज एक ऐसा संघ होगा जिसमें प्रत्येक का मुक्त विकास सबके मुक्त विकास की शर्त बन जाएगा। उत्पीड़न की एक संस्था में राज्य धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा। यह समाज समाजवादी क्रान्ति के बाद रातों-रात स्थापित नहीं होगा, बल्कि समय का एक लम्बा अन्तराल रहेगा। अन्तिम लक्ष्य पर पहुँचने के पहले कई अवस्थाओं से होकर गुजरना पड़ेगा। समाजवादी क्रान्ति का पहला काम होगा - भूतपूर्व शोषक वर्गों के आर्थिक आधार को तोड़कर उनके प्रतिरोध को समाप्त करना। बड़े उद्यमों और विदेशी व्यापार का राष्ट्रीयकरण और दूरगामी कृषि भूमि सम्बन्धी सुधारों को लाकर बड़े पूँजीपतियों, विदेशी एकाधिकारियों और बड़े भूस्वामियों को शक्तिहीन बना दिया जाता है तथा अर्थव्यवस्था की नियंत्रणकारी ऊँचाइयों पर कब्जा कर लिया जाता है। इससे राज्य देश के समाजवादी निर्माण के आयोजन और वित्तपोषण में सक्षम हो जाता है। सोवियत संघ में समाजवादी व्यवस्थापहली समाजवादी क्रान्ति, रूस में 7 नवम्बर 1917 को हुई। क्रान्ति के बाद रूस में हुई कतिपय गतिविधियों का जिक्र किया जा चुका है।सात नवम्बर 1917 से 10 जुलाई 1918 तक के आठ महीनों के दौरान क्रान्तिकारी सरकार ने नए प्रकार के राज्य के निर्माण के लिए अनेक कदम उठाए। पहला संविधान 10 जुलाई 1918 को पारित किया गया। आर्थिक दृष्टि से समाजवादी अर्थव्यवस्था की ओर तुरन्त संक्रमण कार्यसूची में शामिल नहीं था। प्राप्त की गई सत्ता को मजबूत बनाने के लिए कतिपय महत्वपूर्ण आर्थिक स्थानों पर कब्जा करना ही तात्कालिक कार्य था। सरकार ने राष्ट्रीयकरण द्वारा अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण स्थानों पर कब्जा जमा लिया। स्टेट बैंक, सारे व्यावसायिक बैंकों, प्रमुख उद्योगों और अनाज के व्यापार का राष्ट्रीयकरण कर लिया गया। मई 1918 के बाद विदेशी आक्रमण और आन्तरिक तोड़फोड़ के कारण नीति में आमूल परिवर्तन हुआ। नवजात क्रान्ति की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बन गई। सरकार आम राष्ट्रीयकरण की आज्ञप्ति (डिक्री ऑफ जनरल नेशनलाइजेशन) जारी करने के लिए मजबूर हो गई। खनन, धातुकर्म, कपड़ा, शीशा, चमड़ा और सीमेंट उद्योग के सभी बड़े उद्यमों का राष्ट्रीयकरण कर लिया गया। नई सरकार ने पिछली सरकार द्वारा लिए गए सभी बकाया ऋणों को रद्द कर दिया। ग्रामीण क्षेत्र में क्रान्ति के दूसरे ही दिन भूमि सम्बन्धी आज्ञप्ति जारी की गई। उसने सभी प्रकार के भूस्वामित्व समाप्त कर दिए और सभी भूसम्पत्तियों को अपने हाथों में ले लिया। क्रान्ति के समय निजी क्षेत्र के कुल निवेश में विदेशियों का हिस्सा 33 प्रतिशत था। राष्ट्रीयकरण सम्बन्धी आज्ञप्तियों ने इस स्थिति को समाप्त कर दिया। नए राज्य को 1918-20 के दौरान अपने अस्तित्व के प्रति गृह युद्ध और विदेशी हस्तक्षेप के कारण भयंकर खतरों का सामना करना पड़ा। क्रान्ति को बचाने के लिए नीतियों का एक समूह अपनाया गया जो ‘युद्ध साम्यवाद’ (वार कम्युनिज्म) के नाम से जाना गया है। यह दो प्रमुख तत्वों से बना था। वे थे - केन्द्रीय नियंत्रण और प्रबन्ध सहित आर्थिक सत्ता और शक्ति का संकेन्द्रण और राशनिंग एवं बुनियादी वस्तुओं और सेवाओं की निःशुल्क अथवा नाममात्र कीमतों पर आपूर्ति सहित वितरण के व्यावसायिक एवं मौद्रिक रूपों को छोड़ना, वस्तुओं के रूप में भुगतान और बाजार में बेचने के बदले स्वयं के उपभोग के लिए उत्पादन। गृह युद्ध और विदेशी हस्तक्षेप के बाद एक नई नीति-समूह नई आर्थिक नीति (नेप) को अपनाया गया। इसका उद्देश्य रूष्ट कृषक वर्ग को नजदीक लाना था। वस्तु के रूप में कर का जिस स्तर पर निर्धारण किया गया वह पिछले साल की अनाज वसूली के स्तर से नीचे था। इस प्रकार किसानों को अधिशेष उत्पादन रखने और उसे बाजार में बेचने की अनुमति दे दी गई। 1924 में वस्तु के रूप में कर के स्थान पर मौद्रिक कर लागू किया गया और निजी व्यापार की इजाजत दे दी गई। इसके साथ ही सहकारी समितियाँ बनाई जाने लगीं जिससे किसानों को उनमें लाया जा सके। यह महसूस किया गया कि खाद्यान्नों में कच्चे मालों और अन्य कृषिजन्य उत्पादों की पैदावार बढ़ायें क्योंकि औद्योगीकरण करना और उसे बनाए रखना सम्भव नहीं है। इसके लिए किसानों को अपने पक्ष में करना और सहकारी समितियों में लाना होगा। राज्य ने अर्थव्यवस्था की नियंत्रक ऊँचाइयों को अपने हाथों में रखा परन्तु छोटे और मझोले उद्योग में पूँजीवाद को फिर से कायम करने की इजाजत दे दी। हाँ, उनकी गतिविधियों को राज्य ने प्रतिबन्धित और नियंत्रित कर दिया। राष्ट्रीयकृत उद्योग में कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए मजदूरों को भौतिक प्रोत्साहन दिया गया और पूँजीवाद के साथ जुड़ी कतिपय प्रबन्ध सम्बन्धी तकनीकों को काम में लाया गया। नई आर्थिक नीति के दौरान औद्योगिक क्षेत्र में राजकीय प्रबन्ध और निजी पहल को संयुक्त करने के लिए कोशिश की गई। राज्य ने अपनी स्थिति सुरक्षित बनाने की कोशिश में उत्पादन के महत्वपूर्ण साधनों पर सार्वजनिक नियंत्रण कायम किया और बैंकिंग एवं विदेशी व्यापार सहित अर्थव्यवस्था की नियंत्रक ऊँचाइयों पर कब्जा कर लिया जिससे वह शेष अर्थव्यवस्था को अपने प्रभाव क्षेत्र में ला सके। राजकीय औद्योगिक क्षेत्र से अपनी कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए कहा गया जिससे वह निजी क्षेत्र के साथ प्रतिद्वंदिता कर सके। राजकीय उद्यमों और निजी क्षेत्र के बीच कई समानताएँ देखी गई। वे थीं - वित्तीय स्वायत्तता, प्रबन्ध की स्वतंत्रता, आर्थिक इकाइयों के बीच सीधा सम्बन्ध और मुनाफे को अधिकतम बनाना। ‘युद्ध साम्यवाद’ के दौरान निजी क्षेत्र के सभी उद्यमों को राजकीय देखरेख के अन्तर्गत लाया गया और राष्ट्रीयकृत बैंकों से उनके द्वारा लिए गए ऋणों को अनुदानों के रूप में परिवर्तित कर रद्द कर दिया गया। नई आर्थिक नीति के दौरान इस आज्ञप्ति को रद्द कर दिया गया तथा राजकीय उद्यमों में बजट की सहायता बन्द कर दी गई। उन्हें कहा गया कि वे अपनी चल पूँजी सम्बन्धी जरूरतों को पूरा करने के लिए बैंकों से ऋण माँगें। अभी यह देखा जा सकता है कि मिखाइल गोर्बाचोव चाहते हैं कि सोवियत अर्थव्यवस्था नई आर्थिक नीति की इन व्यवस्थाओं की ओर लौटे, जिन्हें स्तालिन ने समाप्त कर दिया था। नई आर्थिक नीति ने सोवियत अर्थव्यवस्था को काफी स्थिरता प्रदान की। उद्योग का समाजवादी रूपान्तरण पूरा कर लिया गया। परन्तु कृषि का समाजीकरण पूरा नहीं हो सका और मजदूर - किसान गठजोड़ पूरी तरह सुदृढ़ नहीं बनाया जा सका। इस समस्या के समाधान पर ही समाजवादी अर्थव्यवस्था और समाज का भाग्य टिका था। कृषक समुदाय और कृषि के प्रति दृष्टिकोण के साथ संचय का प्रश्न और औद्योगीकरण की रणनीति तथा कार्यनीति के अतिरिक्त औद्योगीकरण की गति जुड़ी थी। लेनिन ने सोचा था कि नई आर्थिक नीति समाजवाद की ओर जाने का मार्ग प्रशस्त करेगी, परन्तु वे समाजवाद की ओर संक्रमण की रूपरेखा विस्तार से नहीं रख पाए क्योंकि वे 1922 में शारीरिक दृष्टि से अक्षम हो गए और जनवरी 1924 में चल बसे। रूस के सामने एक विलक्षण स्थिति थी। वह दुनिया का पहला देश था जिसने एक समाजवादी अर्थव्यवस्था के निर्माण का साहस किया था। न तो उसके सामने दूसरों का अनुभव था और न ही कोई रूपरेखा जिससे वह लाभ उठा सके। औद्योगिक दृष्टि से देश अर्धविकसित था और कृषि पिछड़ी हुई, या यों कहें आदिमकालीन थी। सरकार ने पूँजीपति और भूस्वामी वर्गों को समाप्त कर दिया था। उसने बड़े पैमाने के उद्योग का समाजीकरण कर लिया था। जैसा कि अलेक नोव के अनुसार - ‘‘1925-26 तक पार्टी को राजनीतिक अर्थशास्त्र के एक बहुत बड़े प्रश्न का सामना करना पड़ा। वह था कि कैसे ऊपर से जानबूझ कर की गई कार्रवाई द्वारा सम्पूर्ण सामाजिक आर्थिक स्थिति को रूपान्तरित किया जाए। यदि यह काम नियोजन द्वारा होना है तो नियोजन किस प्रकार होना चाहिए और उसे लागू करने का तंत्र क्या होना चाहिए। बचतों और पूँजी के संचय में भारी वृद्धि आवश्यक होगी। किसे त्याग करना होगा और इन बलिदानों का बोझ कितना भारी होगा ?’’ एक अन्य प्रश्न राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़ा था। यद्यपि विदेशी हस्तक्षेप और अन्दरूनी दुश्मनों को पराजित कर दिया गया था फिर भी उनकी ओर से खतरा अन्तिम तौर पर समाप्त नहीं हो पाया था। इस सन्दर्भ में जरूरी था कि देश एक आधुनिक, औद्योगिक अर्थव्यवस्था का निर्माण करे जिससे उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत हो। इस विचार ने औद्योगीकरण की गति और दिशा को प्रभावित किया। संवृद्धि की ऊँची प्रस्तावित दर के लिए भारी परिमाण में बचतों और बलिदानों की आवश्यकता थी। राष्ट्रीय सुरक्षा पर अधिक जोर दिए जाने का मतलब था सैनिक ताकत और आर्थिक स्वतंत्रता को प्राथमिकता देना। स्पष्टतया इसके फलस्वरूप उपभोक्त वस्तुओं के बदले भारी उद्योग, इस्पात, कोयला, मशीनरी, आदि पर जोर दिया गया। कृषि क्षेत्र के मत्थे बचतें की गईं और पूँजी संचय हुआ। दिसम्बर 1925 में निर्णय लिया गया कि सोवियत संघ को मशीन आयात करने वाले देश से मशीन उत्पन्न करने वाला देश बना दिया जाए। दिसम्बर 1927 में नई आर्थिक नीति को समाप्त करने और नियोजित आर्थिक विकास का रास्ता अपनाने का निर्णय लिया गया। आमतौर से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था तथा विशेषकर उद्योग की उन शाखाओं पर अधिकतम ध्यान दिया जाना था जो प्रतिरक्षा और आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करेंगी। यह महसूस किया गया कि औद्योगीकरण की रणनीति तब तक सफल नहीं होगी जब तक कृषि भूमि सम्बन्धी ढाँचा नहीं बदलेगा। इसलिए सामूहिक कृषि की नीति अपनाई गई और 1937 तक सामूहिक फार्मों के अन्तर्गत 93 प्रतिशत जोती जाने वाली भूमी आ गई। यदि राजकीय फार्मों को भी इनके साथ ले लें तो लगभग सारी कृषि का समाजीकरण हो गया था। 1937 तक समाजीकृत क्षेत्र सर्वव्यापक हो गया। उसका हिस्सा बढ़कर राष्ट्रीय आय में 99.1 प्रतिशत, सकल औद्योगिक उत्पाद में 99.8 प्रतिशत और सकल कृषि उत्पाद में 98.5 प्रतिशत हो गया। खुदरा व्यापार का पूरी तरह समाजीकरण कर लिया गया। हाल के वर्षों में बलात् सामूहिकीकरण और उसके साथ जुड़ी मानवीय यातनाओं और कष्टों की तीखी आलोचना हुई है। समाजवादी देशों में उत्पादन के साधनों का सामाजिक स्वामित्व आर्थिक व्यवस्था की नींव होता है। राज्य विशेष संस्थानों के जरिए अर्थव्यवस्था का संचालन करता है। समाजवादी अर्थव्यवस्था स्वभाव से ही नियोजित होती है। नियोजन आर्थिक कार्यों को निश्चित दिशा की ओर उन्मुख करने का एक तरीका है। जनवादी केन्द्रीयता और पार्टी भावना को समाजवादी अर्थव्यवस्था में आर्थिक प्रशासन की आधारशिला माना जाता है। सिद्धान्त रूप में जनवादी केन्द्रीयता ने जनतंत्र को केन्द्रीयता के साथ जोड़ने का प्रयास किया। जनतंत्र से अपेक्षा थी कि वह स्थानीय पहल और भागीदारी तथा प्रस्तावों एवं कार्यान्वयन की त्रुटियों की आलोचना के अधिकार की गारंटी करेगा जबकि केन्द्रीयता का अर्थ या एक ही केन्द्र से नेतृत्व, अल्पमत को बहुमत के अधीन करना और सख्त अनुशासन। पार्टी भावना को राजनीतिक और आर्थिक प्रबन्ध की एकता की गारंटी माना गया। समाजवादी देशों में कम्युनिस्ट पार्टी ने अग्रणी भूमिका अदा की। वह अर्थव्यवस्था की दिशा का निर्धारण करती, पंचवर्षीय योजनाओं को मंजूरी देती और सुधार कार्यक्रम लागू करती थी। वह आर्थिक कार्यों का निदेशन करती और विभिन्न आर्थिक संस्थाओं के कार्य-सम्पादन पर नजर रखती थी। हाल में इन दोनों सिद्धान्तों और कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका की आलोचना होने लगी है। यह स्पष्ट रूप से दिखलाया गया है कि इन सिद्धान्तों ने व्यवहार में अच्छी तरह काम नहीं किया है। राज्य द्वारा अत्यधिक हस्तक्षेप से लाभ कम मगर नुकसान अधिक हुआ है। कहा जाता है कि जनवादी केन्द्रीयता के नाम पर नौकरशाही और पार्टी भावना के नाम पर पार्टीतंत्र सारी शक्तियों का इस्तेमाल करती रही हैं। मिखाइल गोर्बाचोव द्वारा 1985 में नेतृत्व ग्रहण करने के साथ ही नया अध्याय आरम्भ हुआ है। सोवियत जीवन के सभी पहलुओं की समग्र जाँच परख होने लगी है। उन्होंने एक नई आर्थिक रणनीति रखी। वह तीन महत्वपूर्ण अवधारणाओं पर टिकी थी। ये थीं - उस्कोरेनी (त्वरण), पेरिस्त्रोइका (पुनर्गठन) और ग्लासनोस्त (खुलापन)। नई रणनीति के ये तीनों आधार स्तम्भ एक दूसरे के साथ सांघटनिक रूप से जुडे़ हुए हैं। उनमें से सबसे मूलभूत आर्थिक विकास का त्वरण (उस्कोरेनी) है। अनुमान लगाया गया है कि सोवियत अर्थव्यवस्था 13वीं और 14वीं योजनाओं (1991-2000) के दौरान 5 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से विकसित होगी। दूसरे शब्दों में, ‘त्वरण’ संवृद्धि की दर को 1981-85 के शून्य प्रतिशत प्रतिवर्ष से बढ़ाकर वर्तमान शताब्दी के आखिरी दशक के दौरान 5 प्रतिशत प्रति वर्ष कर देगा। ‘त्वरण’ शब्द का एक गुणात्मक पहलू भी है। दूसरे शब्दों में उसका सामाजिक आर्थिक पक्ष भी है। उसका अर्थ हैं अर्थव्यवस्था की संवृद्धि गुणात्मक दृष्टि से एक नई अवस्था की ओर संक्रमण। इसके लिए अर्थव्यवस्था में आमूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है। सरल शब्दों में, सोवियत अर्थव्यवस्था के वर्तमान ढाँचे को, जो पिछड़ा और अपरिवर्तनशील है तथा जिस पर खनन एवं कृषि हावी है और जहाँ सेवाओं का क्षेत्र अर्धविकसित है, आमूल रूप से बदलना होगा। तत्काल सोवियत अर्थव्यवस्था घटिया वस्तुओं, भारी अकुशलता तथा प्रतिद्वंदिता के अभाव से ग्रस्त है। अप्रचलित वस्तुओं का उत्पादन काफी बड़े परिमाण में होता है। लोगों के सामने प्रस्तुत की जाने वाली वस्तुओं एवं सेवाओं और उनके द्वारा माँग की जाने वाली वस्तुओं एवं सेवाओं में काफी बेमेल है। इसलिए ‘त्वरण’ अर्थव्यवस्था के ढाँचे को इस प्रकार परिवर्तित करेगा कि वह लोगों की आवश्यकताओं की संतुष्टि को अपना लक्ष्य बनाकर अधिक प्रगतिशील, कुशल और समाजोन्मुख हो। सोवियत संघ गहबीकरण के जरिए उत्पादन बढ़ाएगा। इसका अर्थ है कि अधिक संसाधनों के इस्तेमाल की अपेक्षा कार्यकुशलता में वृद्धि कर उत्पादन बढ़ाया जाएगा। लोगों की आशाओं के अनुकूल वस्तुओं की गुणवत्ता में सुधार लाया जाएगा। स्पष्टतया, नवीनतम प्रौद्योगिकी एवं प्रबंध की विधियों को प्रयोग में लाया जाएगा। दूसरे उत्पादन का ढाँचा ऐसा बनाया जाएगा कि लोगों की आवश्यकताओं की संतुष्टि को प्राथमिकता मिले। दूसरे शब्दों में, उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन को प्राथमिकता मिलेगी। ‘त्वरण’ पेरिस्त्रोइका (पुनर्गठन) की पूर्वमान्यता पर आधारित है। पेरिस्त्रोइका की अवधारणा इसलिए प्रस्तुत की गई है कि सतही परिवर्तनों और सुधारों से काम नहीं चलेगा बल्कि आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है। गोर्बाचोव के ही शब्दों में, ‘प्रमुख प्राथमिकताएँ हैं........... अर्थव्यवस्था का गहन संरचनात्मक पुनर्गठन, उसके भौतिक आधार का पुनर्निर्माण, नई प्रौद्योगिकी, निवेश सम्बन्धी नीति में परिवर्तन और प्रबन्ध के ऊँचे स्तर। इन सबको एक साथ रखने पर एक ही बात पर पहुँचते हैं - वैज्ञानिक और प्रौद्योगिक प्रगति का त्वरण’। पेरिस्त्रोइका एक व्यापक अवधारणा है। उसका लक्ष्य समाज की नैतिक एवं मानसिक स्थिति को बदलना और उत्पादन में मानवीयं दिलचस्पी के स्तर में सुधार लाना तथा सामाजिक आर्थिक रूपान्तरण में लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना है। इससे ग्लासनोस्त (खुलापन) आवश्यक हो जाता है। अभिव्यक्ति एवं बेझिझक बहस की स्वतंत्रता स्थापित की जा रही है। गोर्बाचोव ने स्वीकार किया है कि ‘जब तक हम मानवीय तत्व को सक्रिय नहीं करते यानी लोगों, कार्य समूहों, सार्वजनिक संस्थाओं और विभिन्न सामाजिक समूहों के विविध हितों को ध्यान में नहीं लेते, जब तक हम उन पर विश्वास नहीं करते और उन्हें सक्रिय निर्माण प्रयासों में शामिल नहीं करते तब तक हमारे लिए कोई भी निर्धारित कार्य पूरा करना या देश में स्थिति को बदलना असम्भव होगा’। केन्द्रीय नियोजन प्राधिकरण राष्ट्रीय आर्थिक विकास की केवल बुनियादी प्राथमिकताओं और उद्देश्यों, संरचनात्मक एवं निवेश सम्बन्धी नीति की प्रवृत्तियों, वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिक प्रगति और वैज्ञानिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक सम्भावनाओं और प्रतिरक्षा की क्षमता को परिभाषित करेगा। वह एक 15 वर्षीय परिप्रेक्ष्य योजना बनाएगा। वह अर्थव्यवस्था और उद्यमों के दिन-प्रति-दिन के क्रियाकलाप में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा। कृषि क्षेत्र में जड़ता को तोड़ने के लिए मुख्य कदम हैं। पूरे पैमाने पर आर्थिक आत्म लेखा और स्वभुगतान, ठेके की प्रणाली और पट्टे पर भूमि देने की व्यवस्था, सहकारिता, कृषि सम्बन्धी फर्म, व्यक्तिगत एवं छोटे जोतों पर खेती का विस्तार, पारिवारिक फार्मां की शुरूआत आदि। चीन में समाजवादी व्यवस्थाचीन दूसरा प्रमुख देश था जहाँ समाजवादी क्रान्ति हुई। दुनिया की इस सबसे बड़ी आबादी वाले देश में समाजवादी क्रान्ति 1949 में हुई। सोवियत संघ की तुलना में चीन इस समय कई दृष्टियों से बेहतर स्थिति में था। उदाहरण के लिए वह सोवियत संघ के अनुभवों से लाभ उठा सकता था जबकि सोवियत संघ को 1917 में किसी का भी अनुभव प्राप्त नहीं था। इतना ही नहीं, सोवियत संघ ने चीन को भारी मात्रा में आर्थिक और तकनीकी सहायता प्रदान की। चीन को आर्थिक नाकेबन्दी और राजनयिक एकाकीपन का सामना नहीं करना पड़ा। लेनिन के विपरीत उसके सर्वोच्च नेता माओ बहुत लम्बे समय तक देश का मार्गदर्शन करते रहे। इसके अतिरिक्त चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ग्रामीण समस्याओं से पूरी तरह परिचित थी और किसानों के बीच उसका सुदृढ़ आधार था।1949 में राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के बाद ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों में उत्पादन के सम्बन्धों को मुख्यतया क्रमशः भूमि सुधारों और सामूहिकीकरण तथा राष्ट्रीयकरण एवं नियंत्रण के जरिए बदलने की कोशिश की गई। सोवियत संघ की तरह चीन में भी बुनियादी और भारी उद्योगों के विकास पर जोर दिया क्योंकि वे न सिर्फ औद्योगीकरण और आधुनिक आधारभूत ढाँचा सम्बन्धी सुविधाओं के निर्माण के लिए बल्कि कृषि विकास और प्रतिरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण थे। चीन समाजवादी रूपान्तरण के पथ पर 1957 तक लगातार चलता रहा जब उसने पहली पंचवर्षीय योजना पूरी कर ली। लगभग इसी समय सोवियत संघ से उसके मतभेद शुरू हैं जिनके कारण अन्ततः उसका सोवियत संघ से मैत्री सम्बन्ध टूट गया। इसका उस पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा। उसने आगे की ओर बड़ी छलाँग (ग्रेट लीप फारवार्ड) (1958-59) के नाम से जानी जाने वाली वास्तविकता से परे नीतियों को अपनाया। उसने कम्यूनों की स्थापना की तथा लोगों को उसमें शामिल होने के लिए बाध्य किया। नई रणनीति की विफलता कृषि उत्पादन में गिरावट और पिछवाड़े इस्पात भट्टी बनाने के नाम पर मूल्यवान संसाधनों की बर्बादी में प्रकट हुई। 1960-62 के दौरान देश में गम्भीर आर्थिक संकट आया। आगे की ओर ‘बड़ी छलाँग’ की विफलता के बाद महान् सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के नाम पर मनमाने ढंग से निर्दोष व्यक्तियों की झूठे इल्जामों में धरपकड़ शुरू हुई। इसका उद्देश्य यह दिखाना था कि माओ-विरोधी गुट ही विफलता के लिए जिम्मेदार था। परिणामस्वरूप देश में पूरी तरह अव्यवस्था फैल गई और अर्थव्यवस्था अस्तव्यस्त हो गई। विघटन की यह हालत तीसरी पंचवर्षीय योजना (1966-70) और चौथी पंचवर्षीय योजना (1971-1975) के दौरान जारी रही। औद्योगिक और कृषि उत्पादन के संयुक्त सकल मूल्य की वार्षिक संवृद्धि दर गिरकर 7.8 प्रतिशत हो गई। उद्योग की संवृद्धि दर घटकर 9.1 प्रतिशत प्रति वर्ष और कृषि की संवृद्धि दर गिरकर 4 प्रतिशत प्रति वर्ष हो गई। राष्ट्रीय आय की संवृद्धि दर केवल 5.6 प्रतिशत हो गई। 1975 में देंग शियाओपिंग द्वारा नेतृत्व संभालने के बाद स्थिति में बदलाव आया। सांस्कृतिक क्रान्ति समाप्त कर दी गई और उसके प्रवर्तकों को शक्तिहीन कर दिया गया। पाँचवीं योजना ने गलतियों और भटकावों को सुधारने की प्रक्रिया आरम्भ की और समाजवादी आधुनिकीकरण का कार्य पूरा करना ही लोगों के ध्यान का केन्द्र बिन्दु बन गया। चीन में एक बार फिर उत्पादक शक्तियों के विकास पर जोर दिया जाने लगा है और यह महसूस किया गया है कि केवल उत्पादन के सम्बन्धों में परिवर्तन होने से उत्पादक शक्तियों का स्वतः विकास नहीं होने लगेगा। प्रबन्ध की व्यवस्था में सुधार लाया जा रहा है और प्रबंध की अत्यन्त केन्द्रीयकृत प्रशासनिक और आदेशात्मक व्यवस्था को बदलने की कोशिश हो रही है। उत्पादन को सामाजिक आवश्यकताओं के अधिक अनुरूप बनाने के लिए नियोजन के सूचकों को भी बदला जा रहा है। सोवियत संघ के साथ सम्बन्ध सामान्य बनाने के लिए प्रयास किए गए हैं। अर्थव्यवस्था के दरवाजे पश्चिमी पूँजी और प्रौद्योगिकी के लिए खोले जा रहे हैं। अर्थव्यवस्था में निजी पहल की इजाजत दी जा रही है। औद्योगीकरण का प्रभावऊपर जो कुछ भी कहा गया है उससे स्पष्ट है कि पूँजीवाद और समाजवाद, दोनां अर्थव्यवस्था के औद्योगीकरण के साथ जुड़े हुए हैं। 18वीं सदी के मध्य से औद्योगीकरण दुनिया के सभी समाजों का प्रिय लक्ष्य रहा है। जिन देशों ने समाजवाद अपनाया या जो समाजवाद का रास्ता अपनाने की कोशिश कर रहे हैं, वे सब तेजी से औद्योगीकरण करना चाहते हैं परन्तु वे उन बुराइयों से दूर रहना चाहते हैं जो पूँजीवाद के अंतर्गत देखने में आईं।औद्योगीकरण ने दुनिया के लगभग सभी देशों की सामाजिक आर्थिक हालत बदल दी है। आइए, पहले हम उन देशों को देखें जिन्होंने अपना औद्योगीकरण कर लिया हैं। जिस देश में भी औद्योगीकरण हुआ है वहाँ राष्ट्रीय उत्पाद की संवृद्धि की दर की दीर्घकालीन प्रवृत्ति बढ़ने की रही है और वह सदा जनसंख्या की वृद्धि की दर से काफी ऊँची रही है जिसके परिणामस्वरूप प्रति व्यक्ति वास्तविक आय में लम्बे समय तक लगातार काफी वृद्धि हुई है। जनसंख्या पर औद्योगीकरण का कई प्रकार प्रभाव पड़ा है। औद्योगीकरण की प्रक्रिया आरम्भ होते ही उसका असर जनसंख्या की वृद्धि की दर पर पड़ता है। वह त्वरित हो जाती है। यदि आंकड़ों पर नजर डालें तो स्पष्ट हो जाएगा कि हाल की शताब्दियों में जनसंख्या की वृद्धि की दर यूरोपीय आबादी वाले क्षेत्रों में ऊँची रही है जहाँ दुनिया के अन्य हिस्सों की तुलना में औद्योगीकरण का प्रभाव काफी अधिक पड़ा। साइमन कुजनेट्स के अनुसार ‘यूरोपीय मूल के लोगों की संख्या 1750 में 15 करोड़ थी जो 1950 में 80 करोड़ हो गई, इस प्रकार उसमें 433 प्रतिशत वृद्धि हुई, जबकि दुनिया की बाकी जनसंख्या 58 करोड़ से बढ़कर 160 हो गई यानी उसमें 200 प्रतिशत से कम वृद्धि हुई।’ प्रारम्भ में जनसंख्या की वृद्धि की दर का त्वरण मुख्य रूप से मृत्यु दरों में कमी और जन्म दरों के लगभग अपरिवर्तित रहने के कारण होता है। मृत्यु दरों में कमी होने से सभी आयु वर्गों को फायदा होता है। परन्तु छोटी आयु वर्गां को बड़ी आयु वर्गों की अपेक्षा अधिक लाभ पहुँचता है। ऐसा संक्रमक तथा श्वास एवं पाचन शक्ति से जुड़े रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति होने और चिकित्सा विज्ञान की काफी तरक्की के कारण हुआ। अकालों का आना समाप्त कर दिया गया। औद्योगीकरण की काफी प्रगति होने के बाद मृत्यु दरों में भारी कमी आई और औसत उम्र में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई और फिर जन्म दरें भी घटने लगीं। जन्म दरों में कमी शादी के चौखटे में लोगों द्वारा स्वेच्छा से निर्णय के परिणामस्वरूप हुई। दूसरे शब्दों में, जन्म दरों में कमी परिवार नियोजन के प्रसार के कारण हुई। प्रजनन क्षमता और जन्म दर तथा आय के स्तर, स्त्रियों के लिए रोजगार के अवसरों और शिक्षा के बीच प्रतिलोम सम्बन्ध होता है। औद्योगिक काल के पहले दोनों, जन्म और मृत्यु दरें ऊँची (प्रति हजार 30 से 50) थीं और जनसंख्या-वृद्धि की दर काफी कम थी। औद्योगीकरण की प्रक्रिया आरम्भ होने पर जनसंख्या वृद्धि की दर मुख्य रूप से मृत्यु दरों में कमी आने से ही काफी बढ़ी। जब जन्म दरों में कमी आने लगी तो जनसंख्या की वृद्धि की दर घटने लगी। कई देशों में जहाँ औद्योगीकरण एक बड़े ऊँचे स्तर पहुँच गया है, वृद्धि की प्राकृतिक दर काफी नीचे स्तर पर आ गई है। अठारहवीं शताब्दी के मध्य से लेकर बीसवीं शताब्दी के मध्य तक अन्तर्राष्ट्रीय प्रव्रजन उत्तरी अमरीका, ब्राजील, अर्जेटाइना और आस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड में औद्योगीकरण के कारण उत्पन्न अवसरों द्वारा प्रभावित हुए। वहाँ जाने वाले लोग अधिकांशतः यूरोपीय देशों के कौशल सम्पन्न लोग थे। जनसंख्या की वृद्धि ने औद्योगीकरण की प्रक्रिया में कई प्रकार योगदान दिया। पहला, चूँकि मृत्यु दरों में कमी का सबसे अधिक फायदा निम्न आयु वर्गों को मिला, इसलिए श्रमिकों की संख्या में इतनी वृद्धि हुई कि मजदूरों की बढ़ती हुई माँग को पूरा किया जा सका। मृत्यु दरों और बाद में, जन्म दरों में कमी ने बड़ी संख्या में बच्चों के भरणपोषण की आवश्यकता को समाप्त कर दिया। इस प्रकार संसाधनों की बर्बादी रोकी गई और लाभदायक रोजगार के लिए बड़ी संख्या में स्त्री-श्रमिक शक्ति उपलब्ध होने की संभावना बढ़ गई। दूसरा, बढ़ती हुई जनसंख्या और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के कारण बाजार और वस्तुओं एवं सेवाओं की माँग की मात्रा बढ़ी। औद्योगीकरण ने जनसंख्या की गतिशीलता बढ़ा दी और लोग अधिक आर्थिक अवसर वाले क्षेत्रों की ओर गए। परिवहन और संचार की सुविधाओं ने इस प्रक्रिया को तेज किया। इस प्रक्रिया में संयुक्त परिवार या अनेक पीढ़ियों वाले परिवार का स्थान एक या दो पीढ़ियों वाले परिवार ने ले लिया। अन्य किसी स्थान पर आर्थिक अवसरों के उपलब्ध होते ही युवा पीढ़ी अपने माँ-बाप के परिवार से अलग चली गई। यह माना जाता है कि महामारियों और संक्रामक रोगों पर नियंत्रण बढ़ने और सन्तति-निग्रह सम्बन्धी जानबूझकर लिए गए निर्णयों की भूमिका में वृद्धि के कारण लोगों के दृष्टिकोण और जीवन-मूल्यों में परिवर्तन आ गया। उनमें आत्मविश्वास बढ़ा और वे कम भाग्यवादी रह गए। बेहतर प्रौद्योगिकी और प्रति व्यक्ति पूँजी के अधिक मात्रा में उपलब्ध होने और आधुनिक शिक्षा एवं तकनीकी प्रशिक्षण के प्रसार के कारण मजदूरों की कार्यकुशलता बढ़ी और आगे चलकर राष्ट्रीय उत्पाद बढ़ा। औद्योगीकरण की प्रगति के कारण काम के घंटे कम हुए जबकि श्रम-उत्पादकता बढ़ती ही गई। औद्योगीकरण ने उत्पादन के संगठन में आमूल परिवर्तन कर दिया। उत्पादन की बड़े पैमाने की कारखाना व्यवस्था को बनाए रखने के लिए भारी परिमाण में पूँजी की आवश्यकता पड़ी जिसे पूरा करने में एकल स्वामित्व फर्म और साझेदारी वाली फर्में सक्षम नहीं थीं। अतः सीमित देनदारियों वाली संयुक्त पूँजी कम्पनियों की व्यवस्था को अपनाया गया। कालक्रम में स्वामित्व और प्रबन्ध के बीच की खाई बढ़ती गई। आधुनिक कारखाना-व्यवस्था ने मजदूरों के घरों और मकानों में उत्पादन करने की व्यवस्था समाप्त कर दी। बड़ी संख्या में मजदूरों की उन जगहों पर लाया गया जहाँ कारखाने लगे थे। चुस्त-दुरूस्त अनुशासन सहित काम के सुनिश्चित मानदण्ड और रूप अपनाए गए। मजदूरों और मालिक के बीच चला आ रहा घनिष्ट व्यक्तिगत सम्बन्ध लुप्त हो गया। कारखाना-व्यवस्था के विकास के फलस्वरूप शहरीकरण हुआ। परिवहन और संचार की सुविधाएँ बढ़ीं और श्रमिक संघ पनपे। अपनी समान माँगों के लिए संघर्ष में एकजुटता ने क्षेत्र धर्म, राष्ट्रीयता और जाति के विभेदों से परे उनके बीच एकता कायम कर दी। 19वीं शताब्दी के मध्य में शक्तिशाली समाजवादी आन्दोलनों ने जन्म लिया जिनका उद्देश्य पूँजीवाद की जगह समाजवाद को स्थापित करना था जिससे औद्योगीकरण की प्रक्रिया को बुराइयों से मुक्त कर प्रोत्साहित किया जा सके। औद्योगीकरण ने कृषि और उससे सम्बद्ध कार्यों से काफी परिमाण में श्रमजीवी जनसंख्या और संसाधनों को तेजी से हटाकर उद्योग और सेवाओं के क्षेत्रों में लगाया। इसी तरह कुल राष्ट्रीय उत्पाद में कृषि और सम्बद्ध कार्यों का सापेक्ष भाग घटा यद्यपि उनका कुल निरपेक्ष योगदान बढ़ा। कृषि और उससे सम्बद्ध कार्यों का सापेक्ष हिस्सा कुल श्रमिक शक्ति में घटा और अधिकाधिक श्रम औद्योगिक एवं सेवाओं के क्षेत्र में लगा। तत्काल अनेक विकसित देशों में कृषि एवं उससे सम्बद्ध कार्यों में 10 प्रतिशत से भी कम श्रमिक शक्ति लगी है। किन्तु इसका यह मतलब नहीं है कि कृषि और उससे जुड़े कार्यो में उत्पादन की कुल निरपेक्ष मात्रा घटी है। इसके विपरीत वह काफी बढ़ी है। यह औद्योगीकरण के फलस्वरूप प्राप्त उत्पादन के बेहतर कारकों का परिणाम है। कालक्रम में औद्योगीक एवं सेवाओं के क्षेत्रों में संरचनात्मक परिवर्तन हुए हैं। औद्योगिक क्षेत्र में सूती कपड़ा जैसे कृषिजन्य कच्चे मालों पर आधारित उद्योगों का महत्व घटा और लोहा एवं इस्पात और फिर रसायन उद्योगों का महत्व बढ़ा है। अभी इलैक्ट्रॉनिक उद्योग शीर्ष स्थान पर है। सेवाओं के क्षेत्र में वाणिज्य, वित्त और मनोरंजन के हिस्से बढ़े हैं। इसके साथ ही सेवाओं के उत्पादन और श्रम को रोजगार देने की दृष्टि से सरकार का महत्व काफी बढ़ गया है। यह रेखांकित किया जा चुका है कि औद्योगिक संरचना में परिवर्तन मुख्य रूप से प्रौद्योगिक परिवर्तनों के परिणाम हैं। कालक्रम में नए उत्पादों और नई प्रक्रियाओं का सृजन हुआ है और उनके आधार पर नए उद्योग पनपे हैं। इसका अर्थ है उत्पादन और उसके कारकों के औद्योगिक वितरण में परिवर्तन। यह भी रेखांकित किया गया है कि औद्योगिक संरचना में परिवर्तनों की गति प्रौद्योगिक परिवर्तन की दर पर निर्भर है। औद्योगीकरण ने अर्थव्यवस्था में स्त्रियों की भूमिका में भी बदलाव ला दिया है। बड़ी संख्या में बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाने पर श्रमिक शक्ति में उनका अनुपात बढ़ता जा रहा है। संयुक्त राज्य अमरीका में इस शताब्दी के पहले साठ वर्षों के दौरान कुल श्रमिक शक्ति में स्त्रियों की संख्या 23 प्रतिशत से बढ़कर 34 प्रतिशत हो गई। इससे उनकी सामाजिक स्थिति सुधरी है। औद्योगिक देश के उपयोग के ढाँचे में स्पष्ट परिवर्तन हुए हैं। कुल उपभोग व्यय में प्राथमिक उत्पादों के सापेक्ष भाग घटे और औद्योगिक उत्पादों विशेषकर टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं एवं सेवाओं के भाग बढ़े हैं। इतना ही नहीं, जहाँ तक औद्योगिक वस्तुओं का प्रश्न है नए उत्पाद और पुराने उत्पादों की बेहतर किस्में उपलब्ध होती जा रही हैं जो पुराने उत्पादों को बाहर ढकेल रही हैं। उदाहरण के लिए पुश बटन और कॉर्डलेश टेलीफोनों ने पुराने प्रकार के टेलीफोनों, बैटरी पर चलने वाली डिजिटल घड़ियों ने पुराने किस्म की घड़ियों और दूर से नियंत्रण के यंत्र से युक्त रंगीन टेलीविजन ने पुराने श्वेत-श्याम टेलीविजन का स्थान ले लिया है। औद्योगीकरण ने विश्व को दो भागों - औद्योगिक और गैर औद्योगिक में बाँट दिया। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में दोनों को एक दूसरे का पूरक समझा गया। औद्योगिक देश औद्योगिक उत्पाद प्रदान करते थे जबकि दूसरे कच्चे माल और खनिज पदार्थ एवं बाजार देते थे। परिवहन और संचार के क्षेत्रों में क्रान्ति और चिकित्सा विज्ञान में प्रगति के कारण विकासशील या औद्योगिक रूप से कम विकसित देशों की समस्याएँ उग्र हो गई हैं। जन्म दरों में बिना कोई खास परिवर्तन हुए उनके यहाँ मृत्यु दरों में काफी गिरावट आई है। फलस्वरूप उनकी जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा, परिवहन और अन्य सामाजिक सेवाओं पर दबाव पड़ रहा है। बेरोजगारी की समस्या ने उग्र रूप धारण कर लिया है। उनके पास उत्पादक कार्यों को बढ़ाने के लिए पर्याप्त पूँजी और तकनीकी ज्ञान नहीं है। औद्योगिक देशों के साथ उनकी जनसंख्या के बढ़ते हुए सम्पर्क के कारण ‘प्रदर्शन प्रभाव’ देखने में आया है। उनकी सम्भावित बचतें पूँजी संचय का रूप नहीं ले पातीं क्योंकि वे काफी हद तक उपभोक्ता वस्तुओं को प्राप्त करने और औद्योगिक राष्ट्रों की जीवन शैलियों की नकल करने पर खर्च हो जाती हैं। दुनिया के इन दो हिस्सों की औसत आयों के बीच विषमताएँ बढ़ी हैं और इससे तनाव पैदा हुए हैं। साथ ही गैर औद्योगिक भागों के जनगण में अपना राष्ट्रीयकरण करने की लालसा रही है और वे इस कार्य को यथाशीघ्र सम्पन्न कर लेना चाहते हैं। औद्योगिक देशों से गैर औद्योगिक देशों में विचारों का प्रसार तेजी से हुआ है। आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और शिक्षा भी गैर औद्योगिक देशों ने अपनाई है और इसका जनसंख्या के कुछ भागों पर गहरा असर पड़ता है। | |||||||||
| |||||||||