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औरंगजेब तथा क्षेत्रीय विद्रोह
उत्तराधिकार की समस्याशाहजहाँ के शासनकाल के अन्तिम वर्ष, उसके लड़कों के बीच उत्तराधिकार के संघर्ष के बादलों से आच्छन्न रहे। तैमूरियों में उत्तराधिकार की कोई निश्चित परम्परा नहीं थी। कुछ मुसलमान राजनीतिक विचारकों ने सम्राट के अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति के अधिकार की मान्यता दी थी लेकिन सल्तनत काल में भारत में इसे लागू नहीं किया गया। साम्राज्य को अपने उत्तराधिकारियों के बीच बाँट देने की तैमूरियों की प्रथा भी बहुत सफल नहीं रही और भारतवर्ष में भी इसे कभी लागू नहीं किया गया।उत्तराधिकार के मामले में हिन्दू परम्परा भी बहुत स्पष्ट नहीं थी। अकबर के समसामयिक कवि तुलसीदास के अनुसार किसी भी शासक को अपने किसी भी पुत्र को टीका लगाने का अधिकार था। लेकिन स्वयं राजपूतों में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जिसमें राजा के चुनाव को अन्य भाईयों ने मंजूर नहीं किया। इसी प्रकार सांगा को गद्दी पर बैठने से पहले अपने भाईयों के साथ घमासान लड़ाई करनी पड़ी। 1657 ई. के अन्त में शाहजहाँ दिल्ली में गम्भीर रूप से बीमार पड़ गया तथा कुछ समय के लिए तो लोगों को उसके जीवन की आशा ही नहीं रही थी। लेकिन धीरे-धीरे दारा की देख-रेख में उसने अपनी शक्ति पुनः प्राप्त कर ली। इस बीच अफवाहों का बाजार गरम हो गया। यहाँ तक कहा गया कि शाहजहाँ वास्तव में मर गया है लेकिन दारा ने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए इस तथ्य पर परदा डाल रखा हैं। कुछ समय बाद शाहजहाँ धीरे-धीरे आगरा की ओर चल पड़ा। इस बीच बंगाल में शुजा, गुजरात में मुराद तथा दकन में औरंगजेब पर या तो इन अफवाहों पर विश्वास करने के लिए दबाव डाला गया या फिर उन्होंने अपने हक में इन पर विश्वास करने का बहाना बनाया और अब अवश्यम्भावी उत्तराधिकार संघर्ष के लिए तैयारियाँ शुरू कर दीं। अपने अन्तिम समय को नजदीक देख तथा इस भय से कि उसके पुत्रों के बीच का संघर्ष साम्राज्य के लिए घातक होगा, शाहजहाँ ने दारा को अपना उत्तराधिकारी (वलीअहद) नियुक्त करने का निश्चय किया। उसने दारा के मनसब को चालीस हजार जात से बढ़ाकर साठ हजार जात तक कर दिया तथा उसके बैठने की जगह अपने सिंहासन के बगल में नियुक्त की। इसके अलावा उसने सभी मनसबदारों से दारा को अगले सम्राट के रूप में स्वीकार करने के आदेश दिये। लेकिन उत्तराधिकारी की समस्या को शान्ति से सुलझाने की शाहजहाँ की आशाएँ पूरी नहीं हुई। उसके इन कार्यों से उसके बाकी तीन बेटों को विश्वास हो गया कि वह दारा का पक्ष ले रहा है। इस तरह सिंहासन के लिए अपना दावा करने का उनका निश्चय और पक्का हो गया। हमें उन घटनाओं में विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं जिसके फलस्वरूप औरंगजेब को अन्त में सफलता प्राप्त हुई। औरंगजेब की सफलता के कई कारण थे। दारा की पराजय के दो प्रमुख कारण थे - एक पारस्परिक विरोधी परामर्श तथा दूसरे अपने शत्रु की शक्ति का सही अन्दाज नहीं लगा पाना। अपने पुत्रों की युद्ध की तैयारियों और राजधानी पर उनके हमले के निश्चय की बात सुनकर शाहजहाँ ने शुजा को दबाने के लिए पूर्व में दारा के लड़के सुलेमान शिकोह के नेतृत्व में एक सेना भेजी और उसकी सहायता के लिए मिर्जा राजा जय सिंह को भी साथ भेजा। एक और सेना जोधपुर के शासक राजा जसवन्तसिंह के नेतृत्व में मालवा की ओर बढ़ी। मालवा पहुँचने पर जसवन्त ने देखा कि वहाँ औरंगजेब और मुराद दोनों की मिली हुई सेनाएँ उसका सामना करने को तैयार थीं। दोनों राजकुमार युद्ध के लिए तैयार थे और उन्होंने जसवन्त से अनुरोध किया कि वह इस संघर्ष में भाग न लें। जसवन्त वापस लौट सकता था, लेकिन इसे अपने सम्मान के खिलाफ समझ उसने युद्ध का निश्चय किया था। यह परिस्थितियाँ उसके पक्ष में नहीं थीं। युद्ध छेड़ कर जसवन्त ने गलती की। घरमट में (15 अप्रैल 1658) औरंगजेब की विजय से उसका सम्मान बढ़ गया तथा दारा और उसके समर्थकों में निराशा फैल गई। इस बीच दारा ने एक और बड़ी गलती कर डाली। उसे अपनी शक्ति पर अधिक विश्वास था और उसने पूर्वी अभियान के लिए अपने चुने हुए सैनिकों को भेज दिया था। इससे उसकी राजधानी आगरा करीब-करीब खाली हो गई। सुलेमान शिकोह के नेतृत्व में भेजी गई इस सेना ने अच्छा परिणाम दिखाया। उसने बनारस के निकट (फरवरी 1658) शुजा को हतप्रभ कर उसे पराजित कर दिया। इसके बाद सेना ने शुजा का पीछा बिहार तक किया जैसे आगरा की समस्या बिल्कुल ही सुलझ गई हो। घरमट की पराजय के बाद सेना की इस टुकड़ी को आगरा बुलाने के लिए शीघ्रता से आवश्यक सन्देश भेजे गए। 7 मई 1658 को जल्दी में किए गए एक समझौते के बाद सुलेमान पूर्वी बिहार में मुंगेर से वापस आगरा के लिए चल पड़ा लेकिन औरंगजेब से युद्ध के लिए उसका आगरा ठीक समय पर पहुँचना सम्भव नहीं था। घरमट के बाद दारा ने सहयोगियों को इकट्ठा करने के लिए बड़े प्रयास किए। उसने जसवन्तसिंह को बार-बार चिट्ठियाँ भेजी लेकिन जसवन्तसिंह अब जोधपुर चला गया था। उदयपुर के राणा से भी सहायता का अनुरोध किया गया। इस बीच जसवन्तसिंह अजमेर में पुष्कर के निकट आ गया था। वहाँ उसने दारा द्वारा दिए गए पैसों से एक बड़ी सेना खड़ी की और उदयपुर के राणा की प्रतीक्षा करने लगा। लेकिन तब तक औरंगजेब ने राणा को 1654 में शाहजहाँ और दारा चित्तौड़ की दुबारा किलेबन्दी के सवाल पर हुए झगड़े के बाद छीने गए परगनों को वापस लौटाने का वादा कर, अपने पक्ष में मिला लिया था। उसने 7000 का मनसब प्रदान करने का भी वादा किया गया। औरगजेब ने राणा को धार्मिक स्वतन्त्रता का आश्वासन दिया और यह भी कहा कि उसे राणा सांगा वाली हैसियत मिल जाएगी। इस प्रकार दारा महत्वपूर्ण राजपूत राजाओं को भी अपनी ओर शामिल करने में असफल रहा। सामूगढ़ की लड़ाई (29 मई 1658) वास्तव में सेनाध्याक्षों के कौशल की लड़ाई थी क्योंकि दोनों तरफ की सेनाएँ संख्या की दृष्टि से बराबर सी थीं। (दोनों ओर पचास से साठ हजार सैनिक थे।) इस मैदान में पर दारा औरंगजेब की जरा भी बराबरी नहीं कर सकता था। यद्यपि उसकी तरफ बारहा के सैयद और हाड़ राजपूत थे, लेकिन फिर भी जल्दी में इकट्ठी की गई सेना की कमजोरी छुपी नहीं रह सकती थी। दूसरी ओर औरंगजेब के सैनिक अनुभवी थे और उनका नेतृत्व भी योग्य हाथों में था। औरंगजेब ने हमेशा ऐसा विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि वह आगरा केवल अपने बीमार पिता को देखने और उन्हें धर्म-विरोधी दारा के चंगुल से छुड़ाने के लिए आना चाहता है। लेकिन औरंगजेब और दारा के बीच की लड़ाई धार्मिक कट्टरता और धार्मिक सहिष्णुता के बीच नहीं थी। दोनों विरोधियों के पक्ष में मुसलमान और हिन्दू सरदार करीब-करीब बराबर संख्या में थे। प्रमुख राजपूत राजाओं के दृष्टिकोण को हम पहले ही देख चुके हैं। इस युद्ध में भी, जैसा कि पहले के हर युद्ध में हुआ था, मनसबदारों ने अपने स्वार्थों के अनुसार एक या दूसरे भाई का समर्थन किया। दारा की पराजय और उसके भाग जाने के बाद आगरा के किले को घेर लिया गया जहाँ शाहजहाँ मौजूद था। किले को जा रहे पानी की सप्लाई काट कर औरंगजेब ने शाहजहाँ को हथियार डालने पर मजबूर कर दिया। शाहजहाँ को अब कड़े पहरे में, किले के अन्तःपुर में नजरबन्द कर दिया गया, यद्यपि उसके साथ बर्ताव बुरा नहीं हुआ। यहाँ शाहजहाँ 8 साल की लम्बी अवधि तक रहा और उसकी देखरेख के लिए उसकी प्रिय बेटी जहाँआरा थी, जिसने अपनी इच्छा से किले के अन्दर रहना स्वीकार किया। शाहजहां की मृत्यु के बाद वह फिर जनजीवन में आई और औरंगजेब ने बड़े सम्मान के साथ उसे साम्राज्य की प्रथम महिला के रूप में उसका पद वापस लौटा दिया। साथ ही औरंगजेब ने जहाँआरा की वार्षिक राशि 12 लाख रूपयों से बढ़ाकर 17 लाख रूपये कर दी। मुराद और औरंगजेब के बीच समझौते की शर्तों के अनुसार राज्य को इन दोनों के बीच बाँटा जाना था लेकिन औरंगजेब की नीयत साम्राज्य के बंटवारे की नहीं थी। उसने धोखा देकर मुराद को बन्दी बना लिया और ग्वालियर जेल में भेज दिया। दो साल बाद वहाँ उसकी हत्या कर दी गई। सामूगढ़ की लड़ाई में पराजित होने के बाद दारा भाग कर लाहौर चला गया और उसने आसपास क्षेत्रों में शासन स्थापित करने की योजना बनाई लेकिन इसी समय औरंगजेब एक शक्तिशाली सेना के साथ पड़ोस में आ पहुँचा और दारा की हिम्मत जवाब दे गई। वह बिना लड़ाई किए लाहौर से भाग कर सिन्ध पहुँच गया और इस प्रकार उसने स्वयं ही अपनी तकदीर का फैसला कर लिया। यद्यपि यह गृहयुद्ध दो वर्षों तक और चलता रहा, इसके परिणाम के बारे में कोई सन्देह नहीं रह गया। मारवाड़ के शासक जसवन्तसिंह के निमंत्रण पर दारा का सिन्ध से गुजरात और उसके बाद अजमेर आना तथा जसवन्त के विश्वासघात की घटनाएँ काफी परिचित हैं। अजमेर के निकट देवराई की लड़ाई (मार्च 1659) औरंगजेब के विरुद्ध दारा की आखिरी बड़ी लड़ाई थी। दारा भाग कर ईरान जा सकता था लेकिन उसने अफगानिस्तान में एक बार फिर अपने भाग्य को आजमाने का निश्चय किया। लेकिन रास्ते में ही बोलान दर्रे में एक विश्वासघाती अफगान सरदार ने उसे बन्दी बना कर उसके शत्रुओं के हाथों में सांप दिया। न्यायाधीशों के एक दल ने फैसला दिया कि दारा को धार्मिक कानून और धार्मिक विश्वास के हित में तथा सार्वजनिक शान्ति को भंग करने के अपराध में जीवित नहीं रखा जा सकता। औरंगजेब ने जिस प्रकार से अपनी राजनीतिक इच्छाओं के लिए धर्म का इस्तेमाल किया, इसका यह विशेष उदाहरण है। दारा की हत्या के दो साल बाद गढ़वाल के शासक ने जिसके पास दारा के लड़के सुलेमान शिकोह ने शरण ली थी, हमले के भय से उसे औरंगजेब को सौंप दिया। सुलेमान की भी वही गति हुई जो उसके पिता की हुई थी। इसके पहले औरंगजेब ने इलाहबाद के निकट खजवा (दिसम्बर 1658) में शुजा को पराजित किया था। इसके बाद उसके विरुद्ध चलाए गए अभियान का नेतृत्व मीर जुमला के हाथों में सौंप दिया गया जिसने शुजा का पीछा तब तक किया जब तक वह भारत से अराकान नहीं भाग गया (अप्रैल 1660)। इसके शीघ्र बाद विद्रोह भड़काने के अपराध में वह अपने परिवार के सदस्यों के साथ अराकानियों के हाथों मौत के घाट उतारा गया। साम्राज्य के लिए दो साल से चल रहे गृह युद्ध ने यह सिद्ध कर दिया कि सिंहासन के लिए संघर्षरत दल न तो शासक द्वारा किए गए उत्तराधिकारी के चुनाव और न ही साम्राज्य के बँटवारे को स्वीकार करेंगे। सत्ता हथियाने का एकमात्र उपाय अब सैनिक शक्ति ही हो गया था और गृह युद्ध और अधिक भयंकर होते चले गए थे। सिंहासन पर जमने के बाद औरंगजेब ने कुछ हद तक भाइयों के बीच अन्त तक लड़ने के परिणामों को नरम करने की चेष्टा की। जहाँआरा बेगम के कहने पर दारा के लड़के सिपिहर शिकोह को 1673 में जेल से रिहा कर दिया गया, उसे एक मनसब प्रदान किया गया और उसे औरंगजेब की एक लड़की विवाह में दी गई। मुराद के बेटे इज्जत बख्श को भी रिहा कर दिया गया उसे भी मनसब प्रदान हुआ और औरंगजेब की एक लड़की की शादी उससे कर दी गई। इसके पहले 1669 में दारा की लड़की जानी बेगम जिसे जहाँआरा ने अपनी बेटी की तरह पाला था, का विवाह औरंगजेब के तीसरे लड़के मुहम्मद आजम के साथ कर दिया गया। इसके अलावा भी औरंगजेब के परिवार तथा उसके द्वारा पराजित उसके भाईयों के लड़कों और पोते-पोतियों के बीच भी कई वैवाहिक संबंध हुए। इस प्रकार तीसरी पुश्त में औरंगजेब तथा उसके द्वारा पराजित भाईयों के परिवार एक हो गए। औरंगजेब का शासन - उसकी धार्मिक नीतिऔरंगजेब ने करीब पचास वर्षों तक राज किया। उसके शासनकाल में मुगल साम्राज्य के विस्तार का चर्मोत्कर्ष हुआ। जब यह साम्राज्य अपने शिखर पर था, इसका विस्तार उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में जिंजी तथा पश्चिम में हिन्दुकुश से लेकर पूर्व में चटगाँव तक था। औरंगजेब बड़ा परिश्रमी शासक था और उसके प्रशासन के कार्य में वह न स्वयं को और न ही अपने अधीनस्थ अधिकारियों को बख्शता था। उसके पत्रों से पता चलता है कि वह प्रशासन के सभी पहलुओं पर बारीकी से ध्यान देता था। वह अनुशासन प्रिय था और इस मामले में अपने लड़कों को भी नहीं छोड़ता था। 1686 में उसने अपने लड़के मुअज्जम को गोलकुण्डा के शासक के साथ मिलकर षड़यंत्र रचने के अपराध में 12 वर्षों तक बन्दी बना कर रखा। उसके अन्य लड़कों को भी कई अवसरों पर उसके क्रोध का शिकार होना पड़ा। औरंगजे़ब का इतना सशक्त नियंत्रण था कि उसके जीवन के अन्तिम दिनों में भी जब मुअज्जम काबुल का प्रशासक था, अपने पिता से जब भी पत्र पाता, काँप उठता था। अपने पूर्वजों के विपरीत औरंगजेब को दिखावे का कोई शौक नहीं था। अपने व्यक्तिगत जीवन में भी वह अत्यन्त साधारण था। वह अपनी कट्टरता तथा ईश्वर से डरने वाले सच्चे मुसलमान के रूप में जाना जाता है। कालान्तर में उसे ‘‘जिन्दा पीर’’ या सन्त के रूप में भी जाना जाने लगा।शासक के रूप में औरंगजेब की उपलब्धियों के बारे में इतिहासकारों के बीच बड़ा मतभेद है। कुछ के अनुसार औरंगजेब ने अकबर की धार्मिक सहिष्णुता की नीति को बिल्कुल परिवर्तित कर दिया था जिससे साम्राज्य के प्रति हिन्दुओं की निष्ठा कम हो गई थी। उनके अनुसार इसके परिणामस्वरूप कई विद्रोह हुए जिनसे साम्राज्य की शक्ति क्षीण हो गई। औरग़जेब बहुत शंकालु प्रकृति का था और इससे भी उसकी योजनाएँ बड़ी लम्बी होती थी और अन्त में अधिकतर असफल ही रहती थीं। कुछ अन्य इतिहासकारों का मत है कि औरंगजेब की निन्दा उचित नहीं है। उनके अनुसार औरंगजेब से पहले के शासकों की कमजोर नीतियों के परिणामस्वरूप हिन्दू साम्राज्य के प्रति निष्ठा खो बैठे थे और औरंगजेब के पास इन्हें नियंत्रण में लाने के लिए कठोर उपायों तथा मुसलमानों के समर्थन को प्राप्त करने के अलावा और कोई चारा नहीं था क्योंकि अन्त में साम्राज्य का अस्तित्व मुसलमानों के ही समर्थन पर टिका था। लेकिन औरंगजेब के बारे में लेखन और आलोचना की हाल में एक नई धारा आरम्भ हो गई है। औरंगजेब की राजनीतिक और धार्मिक नीतियों के तत्कालीन सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति के सन्दर्भ में पुनर्मूल्याँकन के प्रयास किए गए हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि औरंगजेब अपने धार्मिक विश्वासों में कट्टरपंथी था। वह दार्शनिक तर्क-वितर्क अथवा आध्यात्म में जरा भी रुचि नहीं रखता था। यद्यपि उसने अपने लड़कों को सूफी मत अपनाने से नहीं रोका और वह स्वयं भी सूफियों के समक्ष उनकी दुआ लेने के लिए उपस्थित होता था। इस्लामी कानून की हनफी विचारधारा, जो भारत में बहुत दिनों से चली आ रही थी, के प्रति दृढ़ रहने पर भी औरंगजेब धर्म निरपेक्ष कानूनों जवाबित, को जारी करने में नहीं हिचकिचाया। उसके आदेशों को जवाबित-ए-आलमगीरी में संगृहीत किया गया है। सिद्धान्ततः जवाबित शरिया के पूरक थे लेकिन वास्तविकता यह थी कि भारत की विशेष परिस्थितियों को देखकर जवाबित शरिया के परिवर्तित रूप थे क्योंकि शरिया में भारत की परिस्थितियों के अनुरूप कानून नहीं बनाए गए थे। हमें यह याद रखना चाहिए कि औरंगजेब कट्टर मुसलमान होने के अलावा एक शासक भी था। वह इस वास्तविकता को भूल नहीं सकता था कि उसके साम्राज्य की अधिकांश आबादी हिन्दुओं की है और ये अपने धर्म और विश्वास के प्रति पक्के हैं। ऐसी कोई भी नीति जिसके परिणामस्वरूप हिन्दू तथा शक्तिशाली हिन्दू राजा और जमींदार विरोध में हो जाएँ उसका असफल होना अवश्यंभावी था। औरंगजेब की धार्मिक नीति का विश्लेषण करते समय हमें पहले सैनिक और सामाजिक नियमों को ध्यान में रखना चाहिए। अपने शासन के आरम्भ में औरंगजेब ने अपने सिक्कों पर कलमा खुदवाना बन्द कर दिया ताकि ये सिक्के एक हाथ से दूसरे हाथ में जाकर गन्दे न हो जाएँ या फिर पैरों तले नहीं रौंदे जाएँ। उसने नौरोज के त्यौहार पर पाबन्दी लगा दी क्योंकि इसे जुरथुष्ट सम्प्रदाय का त्यौहार माना जाता था, जिसे ईरान के सफवी शासकों ने समर्थन दिया था। सभी प्रान्तों में मुहतसिबों की नियुक्ति की गई जिनका काम था कि वे इस बात की देखभाल करें कि लोग शरिया के नियमों के अनुरूप रहते हैं या नहीं। इस प्रकार इन अधिकारियों का कार्य यह देखना था कि सार्वजनिक स्थानों पर शराब तथा भाँग जैसे नशीले पदार्थों का सेवन न हो। उन पर वैश्यालयों तथा जुएँ के अड्डों आदि तथा नापतौल पर नियंत्रण रखने का भी भार था। दूसरे शब्दों में उनकी जिम्मेदारी यह थी कि वे इस बात को देखें कि जहाँ तक संभव हो लोग शरिया तथा जवाबित के नियमों का खुले रूप से उल्लंघन न करें। मुहतसिबों की नियुक्ति के समय औरंगजेब ने इस बात पर जोर दिया कि नागरिकों का नैतिक कल्याण राज्य की जिम्मेदारी है। लेकिन इन अधिकारियों से कहा गया कि वे नागरिकों के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप न करें। बाद में अपने शासन के 11वें वर्ष में (1669) औरंगजेब ने कई एक ऐसे कदम उठाए जिन्हें कट्टर माना जाता है। लेकिन जो वास्तव में आर्थिक और सामाजिक थे और जिनका उद्देश्य अन्धविश्वासों को समाप्त करना था। औरंगजेब ने दरबार में संगीत पर पाबन्दी लगा दी तथा सरकारी संगीतज्ञों को अवकाश दे दिया गया। इसके बावजूद बजाने वाले यंत्रों का वादन तथा नौबत जारी रहा। हरम तथा मनसबदारों की स्त्रियों के बीच भी गाना बजाना जारी रहा। यह एक महत्वपूर्ण बात है जिसका पहले भी उल्लेख किया गया है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत पर फारसी में सबसे अधिक पुस्तकें औरंगजेब के ही शासन काल में लिखी गईं और औरंगजेब स्वयं वीणा बजाने में दक्ष था। इस प्रकार औरंगजेब का कुछ संगीतज्ञों को यह कहना कि उन्हें संगीत के जनाजे को जमीन के अन्दर इतना गहरा दफन करना चाहिए ताकि उसकी प्रतिध्वनि भी नहीं उठ सके, केवल गुस्से में कही बात मानी जा सकती है। औरंगजेब ने झरोखा दर्शन की प्रथा को भी बन्द कर दिया क्योंकि उसके अनुसार यह मात्र अन्धविश्वास तथा इस्लाम के विरुद्ध था। इसी प्रकार उसने सम्राट को उसके जन्म दिन पर सोने, चाँदी तथा अन्य वस्तुओं से तौलने की प्रथा भी बन्द कर दी। यह प्रथा अकबर के जमाने में आरंभ हुई थी और इसका बहुत प्रसार हो गया था। इससे छोटे मनसबदारों पर बड़ा बोझ पड़ता था। इसके बावजूद सामाजिक विचारधारा का भी महत्व कम नहीं था। औरंगजेब को हार मान कर अपने लड़कों के लिए, जब वे बीमारी से ठीक हुए, इस प्रथा को स्वीकार करना ही पड़ा। उसने ज्योतिषियों पर भी पाबन्दी लगा दी लेकिन स्वयं राजघराने के सदस्य तथा अन्य लोग व्यापक तौर पर इस आदेश का उल्लंघन करते रहे। इस प्रकार के कई और आदेश, जिनमें कुछ नैतिक थे, आडम्बरों को समाप्त करने के लिए जारी किए गए। राजदरबार को सस्ते तथा साधारण ढंग से सजाया गया तथा मुंशियों को चाँदी के स्थान पर मिट्टी के दबात दिए गए। रेशम के कपड़ों को पसंद नहीं किया गया तथा दीवान-ए-आम में सोने की रेलिंग के स्थान पर लाजवर्द (लापिज लजूली) की रेलिगें लगाई गईं जिन पर सोने का काम किया हुआ था। आर्थिक पहलू को ध्यान में रख कर इतिहास लिखने वाले सरकारी विभाग को भी बन्द कर दिया गया। मुसलमानों के बीच व्यापार को बढ़ाने के लिए जो पूरी तरह से सरकार के समर्थन पर निर्भर करते थे, औरंगजेब ने पहले मुसलमान व्यापारियों को कर मुक्त कर दिया लेकिन शीघ्र ही उसे ऐसा लगा कि मुसलमान व्यापारी इसका नाजायज फायदा उठा रहे हैं तथा राज्य को धोखा देने के लिए हिन्दू व्यापारियों की वस्तुओं को भी अपना बता रहे है। बाद में औरंगजेब ने मुसलमान व्यापारियों पर फिर से कर लगा दिए पर फिर भी इनकी दर औरों के मुकाबले में आधी थी। इसी प्रकार उसने पेशकार तथा करोड़ियों (छोटे कर अधिकारी) के पदां को मुसलमानों के लिए सुरक्षित करने का प्रयास किया लेकिन शीघ्र ही उसे मनसबदारों के विरोध तथा योग्य मुसलमानों के अभाव के कारण इस आदेश को वापस लेना पड़ा। अब हम औरंगजेब के दूसरे कार्यों की ओर ध्यान दें जिनके कारण उसे पक्षपाती और दूसरे धर्मों के अनुयाईयों के प्रति असहिष्णु कहा जाता है। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण मन्दिरों के प्रति उसका दृष्टिकोण तथा जजिया को लागू करना है। औरंगजेब ने अपने शासन के प्रारंभ में ही हिन्दू मन्दिरों, यहूदियों के पूजा घरों और गिरजाघरों के प्रति शरिया में उल्लिखित नीति में अपना समर्थन व्यक्त कर दिया था। शरिया के अनुसार पुराने मन्दिरों को नहीं ढाया जाना चाहिए। पर नए मंदिरों का निर्माण भी नहीं होना चाहिए। इसके अलावा क्योंकि इमारतें चिरस्थायी नहीं हो सकतीं, इसलिए पुराने धार्मिक संस्थानों की मरम्मत भी करवाई जा सकती थी। औरंगजेब की यह नीति बनारस तथा वृन्दावन आदि स्थानों के ब्राह्मणों को जारी किए गए फरमानों में देखी जा सकती है। मन्दिरों से संबंधी औरंगजेब की नीति कोई नयी नीति नहीं थी। उसने केवल उस नीति की पुष्टि की जो सल्तनत काल में थी और शाहजहाँ ने अपने शासन के आरंभिक काल में अपनाई थी। असल में इस नीति के अन्तर्गत ‘‘प्राचीन मन्दिरों की व्याख्या स्थानीय अधिकारियों पर छोड़ दी गई थी लेकिन इस मामले में सम्राट के व्यक्तिगत विचारों और (भावनाओं से) अधिकारियों का प्रभावित होना स्वाभविक था। उदाहरणार्थ जब उदार प्रकृति का दारा शाहजहाँ का प्रिय बना हुआ था, बहुत कम मन्दिरों को तोड़ा गया। औरंगजेब जब गुजरात का प्रशासक था, उसने कई मन्दिरों को ध्वस्त करने का हुक्म दिया लेकिन अधिकतर मामलों में इसका अर्थ केवल प्रतिमाओं को तोड़ना और मन्दिरों को बंद करना होता था। जब औरंगजेब सम्राट बना, उसने देखा कि मंन्दिरों में प्रतिमाओं को पुनः प्रतिस्थापित कर दिया गया है और उसमें पूजा भी शुरू हो गई हैं। औरंगजेब ने 1665 में इन मन्दिरां को नष्ट करने का फिर हुक्म दिया। इनमें से सोमनाथ का प्रसिद्ध मन्दिर भी था जिसको तोड़ने के बारे में उसने अपने शासन के आरम्भ में ही आदेश जारी किया था। औरंगजेब ने अपने शासन के आरंभ में नए मन्दिरों के निर्माण पर प्रतिबन्ध लगाने का जो हुक्म दिया था, उसके फलस्वरूप ऐसा नहीं लगता कि बड़े पैमाने पर मंदिरों को तोड़ा गया हो। इसके अलावा जाट, मराठों तथा अन्य लोगों के राजनीतिक विरोध के कारण औरंगजेब ने एक नई नीति अपनायी। अब स्थानीय तत्वों से विरोध होने पर वह चेतावनी और दण्ड के रूप में प्राचीन मन्दिर को भी नष्ट करना वैध समझता था। उसके अलावा वह मंदिरों को विरोधी विचारों अर्थात् वह विचार जिन्हें कट्टर तत्व स्वीकार नहीं करते थे, के प्रसार का केन्द्र समझता था। अतः 1669 में उसे जब यह पता चला कि ठट्ठा, मुल्तान और विशेषकर बनारस के मन्दिरों में हिन्दुओं के अलावा मुसलमान भी ब्राह्मणों से सीखने के लिए दूर-दूर से आते हैं तो उसने इन मन्दिरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की। उसने सभी प्रान्तों के प्रशासकों को इस प्रक्रिया को रोकने का हुक्म दिया और कहा कि जिन मन्दिरों में ऐसा होता है उन्हें ध्वस्त कर दिया जाए। इन आदेशों के कारण बनारस में विश्वनाथ मन्दिर तथा वीरसिंह देव द्वारा जहाँगीर के काल में मथुरा में निर्मित केशव राय जैसे प्रमुख मन्दिरों का विध्वंस कर दिया गया और उनकी जगह मस्जिदों का निर्माण किया गया। इन मन्दिरों को तोड़ने के पीछे राजनीतिक उद्देश्य भी थे। म-आसिर-ए-आलमगीरी के लेखक मुस्तइद खाँ ने मथुरा के केशव राय मन्दिर के ध्वस्त किए जाने के बारे में लिखा है - ‘‘सम्राट के विश्वास की शक्ति तथा ईश्वर के प्रति उसकी अगाध भक्ति को देखकर गर्वीले राजा सभी विमूढ़ और मूर्तिवत् हो गए।’’ इसी सन्दर्भ में उड़ीसा में पिछले दस बारह वर्षों में निर्मित मन्दिरों को भी ध्वस्त कर दिया गया। लेकिन यह सोचना गलत होगा कि मन्दिरों को तोड़ने के लिए कोई आम आदेश जारी किए गए थे। लेकिन युद्ध के दौरान स्थिति बदल जाती थी। उदाहरण के लिए 1679-80 में जब औरंगजेब मारवाड़ के राठौर और उदयपुर के राजा के साथ संघर्षरत था, उदयपुर तथा जोधपुर और उसके परगनों के अनेक मन्दिरों को ध्वस्त कर दिया गया। मन्दिरों से संबंधित अपनी नीति में औरंगजेब भले ही शरिया के नियमों के बाहर न गया हो, इसमें सन्देह नहीं कि इस मामले में उसके रुख से उसके पूर्वजों की सहिष्णुता की नीति को धक्का पहुँचा। इससे यह धारणा फैल गई कि किसी बहाने मन्दिरों को तोड़ना सम्राट न केवल माफ कर देगा बल्कि इस कार्य की सराहना करेगा यद्यपि हमें इस बात के भी उदाहरण मिलते हैं जब औरंगजेब ने हिन्दू मन्दिरों और मठों को अनुदान दिया तथापि कुल मिलाकर हिन्दू मन्दिरों के संबंध में अपनाई गई नीति से हिन्दुओं में व्यापक असन्तोष स्वाभाविक था। ऐसा लगता है कि 1679 के बाद मन्दिरों को तोड़ने के प्रति औरंगजेब का उत्साह कम हो गया और 1681 से लेकर 1707 तक जब उसकी मृत्यु हुई, हमें दक्षिण में मन्दिरों को ध्वस्त किए जाने की चर्चा नहीं मिलती। लेकिन इसी बीच असन्तोष के एक नए कारण, जजिया को आरम्भ कर दिया गया। जजिया कर और अरब तुर्की शासकों द्वारा उसे भारत में लगाए जाने के बारे में हम पहले पढ़ चुके हैं। शरिया के अनुसार किसी भी मुस्लिम राज्य में गैर-मुसलमानों द्वारा जजिया कर चुकाना आवश्यक (वाजिब) है। अकबर ने इस कर को कई कारणों से, जिनके बारे में हम पढ़ चुके हैं, समाप्त कर दिया था। यद्यपि कई कट्टर धार्मिक नेता इसे पुनः लागू करने पर जोर दे रहे थे ताकि यह साफ नजर आए कि मुसलमानों की स्थिति ऊँची है और उस के साथ-साथ उनका स्वयं का भी प्रभाव बना रहे। कहा जाता है, कि सम्राट बनने के बाद औरंगजेब ने जजिया को फिर लागू करने के बारे में कई बार सोचा पर राजनीतिक विरोध के डर से उसने ऐसा नहीं किया। अंत में अपने शासन के बाइस वर्षों के बाद 1679 में उसने जजिया को लागू किया। उसके इस कदम के उद्देश्यों को लेकर इतिहासकारों में काफी मतभेद है। हम पहले यह देखें कि जजिया क्या नहीं था ? यह हिन्दुओं को इस्लाम धर्म अपनाने के लिए आर्थिक दबाव नहीं था क्योंकि इस कर का बोझ बड़ा हल्का था - स्त्रियाँ, बच्चे, अपंग और निम्न आय के व्यक्ति तथा सरकारी कर्मचारी इस कर से मुक्त थे। न ही इस कर के कारण हिन्दुओं के किसी प्रमुख वर्ग ने इस्लाम को अपनाया। यह कर किसी कठिन आर्थिक स्थिति का मुकाबला करने के लिए भी नहीं लगाया गया था। यद्यपि बताया जाता है कि जजिया से काफी आमदनी थी, औरंगजेब ने कई अन्य करों को जो शरिया के अनुसार मान्य नहीं थे और इसलिए गैरकानूनी थे, हटा दिया था जिसके फलस्वरूप राज्य की आमदनी दूसरी ओर कम हो गई थी। वास्तव में जजिया के लगाए जाने के राजनीतिक और सैद्धान्तिक, दोनों तरह के कारण थे। इसका उद्देश्य मराठों और राजपूतों, जो युद्ध पर तुले थे, के विरुद्ध मुसलमानों को संगठित करना था। इसके अलावा दकन के मुसलमान राज्य और विशेषकर गोलकुण्डा भी इन गैर मुसलमानों का साथ दे रहे थे। दूसरे, जजिया सच्चे और धर्मभीरु मुसलमानों द्वारा उगाहा जाता था और इसी उद्देश्य से उनकी नियुक्ति भी होती थी तथा जो पैसा जमा होता था, वह सारा उलेमा को जाता था। इस प्रकार यह धर्मनेताओं अथवा उलेमा को, जिनमें से अधिकतर बेरोजगार थे, दी जाने वाली बड़ी रिश्वत थी। इसके बावजूद जजिया के नुकसान अधिक थे। इसको लेकर हिन्दुओं में बड़ा रोष था क्योंकि वे इसे भेदभाव का प्रतीक मानते थे। इसके उगाहने के तरीकों में भी कुछ खास बातें थी, कर देने वालों को स्वयं व्यक्तिगत रूप से कर देना पड़ता था और कई बार मुसलमान धर्मनेताओं के हाथों उनका अपमान किया जाता था क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रो में जजिया भूमि-लगान के साथ वसूल किया जाता था, इसलिए ये उपाय केवल शहर के धनी लोगों के लिए लागू था। सुनने में आता है कि कई बार शहर के व्यापारियों ने जजिया के खिलाफ हड़ताल भी कर दी थी। कई अवसरों पर अमीन, अर्थात् जजिया उगाहने वालों को मार भी दिया गया। लेकिन उनके बावजूद औरंगजेब अविचलित रहा। उसने किसानों को इस कर से माफ करने से इन्कार कर दिया यद्यपि कई बार प्राकृतिक दुर्योगों के कारण भूमि लगान में नरमी बरती जाती थी। बाद में उसने 1705 में दकन में युद्ध के दौरान जिसका कोई अन्त नहीं नजर आता था, जजिया पर रोक लगा दी। कुछ आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि औरंगजेब अपने इन कार्यों द्वारा दार-उल-हरब, वह धरती जहाँ इस्लामी इबादत, करने की अनुमति न हो, को दार-उल-इस्लाम अर्थात् मुसलमान देश में परिवर्तित कर देना चाहता था। यद्यपि औरंगजेब इस्लाम को प्रोत्साहन देना वैध समझता था, हमें बड़े पैमाने पर हिन्दुओं को धर्म परिवर्तन के लिए जोर देने के प्रमाण नहीं मिलते। न ही हिन्दू सरदारों के साथ भेदभाव बरता जाता था। हाल के एक अध्ययन से पता चलता है कि औरंगजेब के शासन के उत्तरार्द्ध में उच्चवर्गीय हिन्दू मनसबदारों की संख्या बढ़ी और मराठों समेत यह कुल उच्च वर्ग के मनसबदारों का एक-तिहाई हिस्सा हो गई जबकि शाहजहाँ के शासनकाल में उच्चवर्ग में हिन्दू केवल एक चौथाई थे। एक अवसर पर एक ऐसे प्रार्थना-पत्र पर जिसमें किसी पद पर धार्मिक आधार पर नियुक्ति की माँग की गई थी, औरंगजे़ब ने लिखा - ‘‘सांसारिक मामलों में धर्म का क्या स्थान ? और धर्म के मामलों में धर्मांधता का क्या स्थान। तुम्हारा धर्म तुम्हारे लिए है और मेरा मेरे लिए। जैसा कि सुझाया गया है, अगर मैं भी इसी नियम को मान लूँ तो सभी (हिन्दू) राजाओं और उनके अनुयाइयों को खत्म कर देना मेरा कर्तव्य हो जाएगा।’’ इस प्रकार हम देखते हैं कि औरंगजेब ने राज्य के स्वरूप में परिवर्तन लाने की चेष्टा नहीं की लेकिन इसमें इस्लाम के तत्वों पर जोर अवश्य दिया। यह नहीं कहा जा सकता कि औरंगजेब का धार्मिक विश्वास उसकी राजनीतिक नीतियों का आधार था। यद्यपि वह कट्टर मुसलमान था और इस्लाम के कानूनों की मान्यता क़ायम रखना चाहता था, शासक के रूप में औरंगजेब की दिलचस्पी अपने साम्राज्य के विस्तार और उसी मजबूती में ही थी। इसी कारण जहाँ तक संभव हो सकता था वह हिन्दूओं के समर्थन को नहीं खोना चाहता था। इसके बावजूद कई अवसरों पर उसके धार्मिक विश्वासों और सार्वजनिक नीतियों में टकराव हुआ जिससे औरंगजेब के सामने कठिन समस्याएँ आ खड़ी हुई। इसके कारण कई बार उसे पारस्परिक विरोधी नीतियों को अपनाना पड़ा जिनसे अंत में साम्राज्य को हानि उठानी पड़ी। राजनीतिक स्थिति-उत्तर भारतउत्तराधिकारी के लिए हुए युद्ध के दौरान कई स्थानीय जमींदारों और राजाओं ने लगान रोक लिया था तथा मुगल क्षेत्रों और राजशाही सड़कों के अलावा अपने पड़ोसी क्षेत्रों में लूटमार आरंभ कर दिया था। सिंहासन पर विधिवत् आसीन होने के बाद औरंगजे़ब ने कड़े शासन का सूत्रपात किया। उत्तर पूर्वी तथा दकन जैसे कुछ क्षेत्रों में साम्राज्य की सीमा का विस्तार किया गया लेकिन आमतौर पर औरंगजे़ब ने विस्तारवादी नीति से आरंभ नहीं किया। सम्राट बनने के तुरंत बाद उसका प्रथम कार्य सम्राट के सम्मान और उसके अधिकार को स्थापित करना था। इसके अंतर्गत उन क्षेत्रों पर भी पुनः अधिकार करना था जो उत्तराधिकारी के लिए हुए युद्ध के दौरान छिन गए थे, पर जिन पर अभी भी मुगलों को लगता था कि उनका कानूनी अधिकार है। आरंभ में औरंगजेब दूसरे प्रदेशों को जीतने की अपेक्षा विजित प्रदेशों पर अपने अधिकार को अधिक दृढ़ करने के पक्ष में था। उसने बीकानेर में अपनी सेना भेजी ताकि वहाँ मुगल सम्राट की मान्यता हो लेकिन बीकानेर को साम्राज्य में मिलाने का कोई प्रयास नहीं किया लेकिन दूसरी ओर बिहार में पलामू के शासक, जिस पर विश्वासघात का अरोप लगाया गया था, उसे गद्दी से उतार दिया गया और उसके अधिकतर क्षेत्रों को साम्राज्य में मिला लिया गया। बागी बुन्देला सरदार चंपतराय पहले औरंगजेब का मित्र था पर बाद में उसने विद्रोह कर दिया और लूटमार करने लगा। उसका भी पीछा कर उसे पकड़ लिया गया पर बुन्देलों के क्षेत्र को साम्राज्य में नहीं मिलाया गया।उत्तरी पूर्वी तथा पूर्वी भारतहम पहले के एक अध्याय में असम घाटी में अहोमों के अभ्युदय तथा एक ओर कमता (कामरूप) के शासकों तथा दूसरी ओर बंगाल के अफगान शासकों के साथ उनके संघर्ष की चर्चा कर चुके हैं। 15वीं शताब्दी के अंत तक कमता राज्य समाप्त प्रायः हो चुका था तथा उसका स्थान कूच (कूच बिहार) ने ले लिया था। कूच शासकों ने उत्तरी बंगाल तथा पश्चिमी असम में अपना प्रभाव कायम कर लिया था और उन्होंने अहोमों के विरुद्ध संघर्ष की नीति जारी रखी। लेकिन 17वीं शताब्दी के प्रारंभ में आंतरिक मतभेदों के कारण इनके साम्राज्य का विभाजन हो गया और कूच शासक के चाहने पर मुगलों ने असम में प्रवेश किया। मुगलों ने पहले से ही विभाजित राज्य को पराजित किया और 1612 ई. में कूच सेना की सहायता से बार नदी तक पश्चिमी असम घाटी पर कब्जा कर लिया। कूच शासक अब मुगलों का एक सामन्त मात्र रह गया। इस प्रकार मुगल अहोमों के संपर्क में आए जो बार नदी के उस पार पूर्वी असम पर शासन करते थे। अहोमों ने पराजित वंश के एक राजकुमार को शरण भी दी थी। एक लंबे युद्ध के बाद मुगलों और अहोमों में 1638 में एक सन्धि हुई जिसके अनुसार बार नदी को दोनों राज्यों की सीमा माना गया। इस प्रकार गोहाटी मुगलों के अधीन हो गई।औरंगजेब के शासनकाल में भी मुगलों और अहोमों के बीच एक लम्बा युद्ध छिड़ा। लड़ाई की शुरुआत उस समय हुई जब आहोमों ने गोहाटी तथा आसपास के क्षेत्रों से मुगलों को निकाल कर सारे असम पर अपना प्रभाव जमाने की चेष्टा की। औरंगजेब ने मीर जुमला को बंगाल का प्रशासक नियुक्त किया था और वह कूच बिहार तथा सारे असम को मुगल साम्राज्य में मिलाकर अपनी प्रतिष्ठा और प्रभाव बढ़ाना चाहता था। उसने सबसे पहले कूच बिहार पर, जो अब तक मुगलों की शक्ति की चुनौती देता आया था, आक्रमण कर सारे राज्य को मुगल साम्राज्य में मिला लिया। इसके बाद उसने अहोमों के राज्य पर चढ़ाई की। एक शक्तिशाली नावों के बेड़े की मदद से मीर जुमला ने अहोमों की राजधानी, गढ़गाँव पर हमला कर दिया और उसे 6 महीनों तक अपने कब्जे में रखा। इसके बाद वह अहोम राज्य में घुसता चला गया और अन्त में बाध्य हो कर अहोम शासक को 1663 में एक अपमानजनक सन्धि करनी पड़ी। अहोम राजा को अपनी लड़की को मुगल हरम में भेजना पड़ा, युद्ध के लिये एक भारी जुर्माना देना पड़ा तथा प्रति वर्ष बीस हाथियों को कर के रूप में देना स्वीकार करना पड़ा। अब मुगल साम्राज्य की सीमा बार नदी से बढ़कर भराली नदी तक फैल गई। अपनी इस शानदार विजय के शीघ्र ही बाद मीर जुमला का देहांत हो गया। असम में मुगलों की विस्तार की नीति के लाभ के बारे में सन्देह ही रहा, क्योंकि यह क्षेत्र सम्पदा-सम्पन्न नहीं था और पहाड़ों में रहने वाले नागाओं जैसे लड़ाकू कबीलों का बराबर भय बना रहता था। अब यह भी स्पष्ट हो गया कि अहोमों की शक्ति पूर्णतया समाप्त नहीं हुई थी और सन्धि को लागू करना मुगलों की शक्ति के बाहर था। 1667 में अहोमों ने पुनः संघर्ष जारी कर दिया। उन्होंने न केवल मुगलों को समर्पित क्षेत्रों को वापिस ले लिया बल्कि गोहाटी पर भी कब्जा कर लिया। कूच बिहार से मुगलों को पहले ही निकाला जा चुका था। इस प्रकार मीर जुमला ने जो कुछ भी हासिल किया था वह सब मुगलों के हाथों से जाता रहा। इसके बाद अहोमों के साथ एक लंबा संघर्ष आरंभ हुआ। जो 15 वर्षों तक चला। एक लंबी अवधि तक मुगल सेना का नेतृत्व आमेर के शासक राजा रामसिंह के हाथों में था लेकिन इस युद्ध के लिए उसके साधन बड़े सीमित थे। अंत में मुगलों को गोहाटी से हाथ धोना पड़ा और उनकी सीमा इसके पश्चिम तक सीमित रह गई। असम की घटनाओं से दूर-दराज के क्षेत्रों में मुगलों के प्रभाव की सीमाएँ स्पष्ट हो गई। इसके साथ-साथ अहोमों की कुशलता और दृढ़ता भी उभर कर सामने आई। अहोम मैदान में युद्ध करने की बजाय छापामार हमले करते थे। अन्य क्षेत्रों में भी मुगलों के अन्य विरोधियों ने इसी युद्ध-नीति को अपना कर विजय प्राप्त की। जो भी हो, मुगल आक्रमण के धक्के और उसके बाद के लम्बे संघर्ष से अहोम राज्य की शक्ति क्षीण हो गई और उसका विघटन हो गया। पूर्व में अन्य स्थानों में मुगलों को अधिक सफलता मिली। शिवाजी से पराजित होने के बाद शाइस्ताखाँ को मीर जुमला के स्थान पर बंगाल का प्रशासक नियुक्त किया गया था। यहाँ वह कुशल प्रशासक तथा सफल सेनाध्यक्ष सिद्ध हुआ। उसने मीर जुमला की विस्तारवादी नीति में परिवर्तन किया। सबसे पहले उसने कूच बिहार के शासक के साथ सन्धि की। इसके बाद उसने दक्षिण बंगाल की ओर ध्यान दिया जहाँ माघ (अराकानी) समुद्री डाकुओं ने अपने मुख्यालय चटगाँव से लेकर ढाका तक के क्षेत्र को त्रस्त कर रखा था। ढाका तक का सारा क्षेत्र उजाड़ हो गया था तथा व्यापार तथा उद्योग को भी काफी नुकसान पहुँचा था। शाइस्ताखाँ ने अराकानी डाकुओं का मुकाबला करने के लिए एक बेड़ा तैयार किया और चटगाँव पर हमला करने के लिए सोनदीप पर कब्जा कर लिया। उसके बाद धन तथा और चीजों का लालच देखकर उसने फिरंगियों को अपने पक्ष में कर लिया। चटगाँव के पास अराकानी नौसेना को ध्वंस कर शाइस्ताखाँ ने उनके कई जहाजों को अपने कब्जें में कर लिया। इसके बाद उसने चटगाँव पर हमला कर 1666 के आरम्भ में उस पर अपना अधिकार कर लिया। इसके साथ ही अराकानी नौसेना पूर्णतया नष्ट हो गई और समुद्र के रास्ते खुल कर व्यापार होने लगा। इस काल में बंगाल के विदेशी व्यापार में वृद्धि और पूर्वी बंगाल में कृषि के विस्तार में इस घटना का कम महत्व नहीं था। उड़ीसा में पठानों का विद्रोह दबा दिया गया और बालासोर भी व्यापार के लिए खुल गया। क्षेत्रीय स्वतन्त्रता के लिए सार्वजनिक विद्रोहजाट, आफगान और सिक्खसाम्राज्य के अंतर्गत औरंगजेब को कई कठिन राजनीतिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। इनमें से दकन में मराठों, उत्तर भारत में जाट और राजपूतों तथा उत्तर-पश्चिम में अफगान और सिक्खों के विद्रोह प्रमुख थे। इनमें से कुछ समस्याएँ नई नहीं थी और औरंगजे़ब के पूर्वजों को भी उनका सामना करना पड़ा था। लेकिन फिर भी औरंगजेब के शासनकाल में उनका स्वरूप कुछ और था। राजपूतों के मामले में मूल समस्या उत्तराधिकार की समस्या को लेकर थी। मराठों के मामले में समस्या स्थानीय स्वतन्त्रता की थी। जाटों के विद्रोह के पीछे किसानों और भूमि से संबंधित सवाल थे। एकमात्र संघर्ष, जिसमें धार्मिक तत्व वर्तमान थे, वह सिक्खों का था। जाट और सिक्खों के संघर्ष का चर्मोत्कर्ष उनका स्वाधीन राज्य बनाने के प्रयास थे। अफगानों का विद्रोह वैसे तो कबीलाई विद्रोह था लेकिन यहाँ भी एक पृथक अफगान राज्य के गठन की भावना काम कर रही थी। इस प्रकार क्षेत्रीय स्वाधीनता की भावना के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक तत्व इन विद्रोहों का स्वरूप निर्धारित करते रहे।कभी-कभी यह कहा जाता है कि अफगान विद्रोह को छोड़कर ये सभी विद्रोह औरंगजेब की संकीर्ण धार्मिक नीतियों के विरुद्ध हिन्दुओं की प्रतिक्रिया थी। ऐसे देश में, जहाँ की अधिकांश आबादी हिन्दुओं की थी, ऐसा कोई भी विद्रोह, जो मोटे तौर पर मुसलमान केन्द्रीय सरकार के खिलाफ था, को इस्लाम को चुनौती कहा जा सकता था। इसी प्रकार इन विद्रोहों के नेता भी अधिक लोगों को अपने पक्ष में करने के लिए धार्मिक नारे लगाते थे। इसलिए इन संघर्षों के सही स्वरूप का विश्लेषण करने के लिए हमें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। जाट तथा सतनामीमुगल सरकार के खिलाफ सबसे पहले विद्रोह यमुना नदी के दोनों किनारों पर आगरा-दिल्ली क्षेत्र में बसे जाटों ने किया। ये अधिकतर किसान काश्तकार थे। इनमें से कुछ ही जमींदार थे। अपने भाईचारे और न्याय की मजबूत भावनाओं के बल पर जाटों ने कई बार सरकार का विरोध किया था और अपने क्षेत्र की कठिन धरातल का लाभ उठाया था। इसी प्रकार भूमि लगान के मसले को लेकर जाटों ने जहाँगीर और शाहजहाँ के शासनकाल में भी विद्रोह किये थे। क्योंकि इसी जाट क्षेत्र से ढाका और पश्चिमी समुद्री बन्दरगाहों तक जाने वाली राजशाही सड़के गुजरती थीं, मुगल सरकार ने इन विद्रोहों को बड़ी गम्भीरता से लिया था और इनके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की थी।1669 ई. में मथुरा क्षेत्र के जाटों ने एक स्थानीय जमींदार गोकला के नेतृत्व में बगावत का झंडा खड़ा किया। विद्रोह की आग इस क्षेत्र के किसानों में तेजी से फैलती गई और अंत में औरंगजेब ने स्वयं दिल्ली से जाकर उसे दबाने का निश्चय किया। यद्यपि विद्रोही जाटों की संख्या बढ़कर बीस हजार हो गई थीं, औरंगजेब की सुसंगठित सेना के आगे उनकी एक न चली। एक भयंकर युद्ध में जाट बुरी तरह पराजित हुए और उनका नेता गोकला बंदी बनाकर मार दिया गया। इस पराजय के बावजूद जाटों का विद्रोह पूरी तरह नहीं दबाया जा सका और असन्तोष बना ही रहा। इसी बीच 1672 में किसानों और मुगल सरकार के बीच मथुरा के निकट नारनोल में एक और युद्ध हुआ। इस बार विद्रोह ‘सतनामी’ नामक एक धार्मिक संगठन ने किया था। सतनामी अधिकतर किसान दस्तकार तथा नीची जाति के लोग थे जिन्हें एक समसामयिक लेखक ने ‘‘सुनार, बढ़ई, भंगी और अन्य नीच लोग’’ कहा है लेकिन वे न तो जात-पाँत और न ही हिन्दू-मुसलमान के भेद मानते थे और अपने आचार-विचार में भी वे कट्टर थे। इनके विद्रोह की शुरुआत एक स्थानीय सरकारी अधिकारी से झगड़े से आरम्भ हुई पर बाद में इसी ने बड़े विद्रोह का रूप धारण कर लिया। एक बार फिर सम्राट को स्वयं जाकर विद्रोह को दबाना पड़ा। यह बात ध्यान देने योग्य है कि इस संघर्ष में स्थानीय हिन्दू जमींदारों ने, जिनमें से अधिकतर राजपूत थे, मुगलों का साथ दिया। 1685 में राजाराम के नेतृत्व में जाटों ने दूसरी बार विद्रोह का झंडा खड़ा किया। इस बार जाट अधिक सुसंगठित थे और उन्होंने छापेमार हमलों के साथ-साथ लूट-मार की नीति अपनाई। औरंगजेब ने कछवाहा शासक राजा विशनसिंह से विद्रोह को कुचल डालने का अनुरोध किया। बिशनसिंह को मथुरा का फौजदार नियुक्त किया गया और यह सारा क्षेत्र जमींदारी के रूप में उसे दे दिया गया। यहाँ भूमि के अधिकतर मालिक जाट थे जो स्वयं खेती करते थे जबकि लगान इकट्ठा करने वाले बिचौलिए जमीदार अधिकतर राजपूत थे। इससे जाटों और राजपूतों के बीच जमींदारी अधिकारों का मामला और पेचीदा हो गया। जाटों ने बड़ी बहादुरी से मुकाबला किया लेकिन 1691 तक राजाराम और उसके उत्तराधिकारी चूड़ामन को हार माननी ही पड़ी। इसके बावजूद जाट किसानों के बीच विद्रोह की आग सुलगती रही और उनकी लूट-पाट से दिल्ली-आगरा सड़क यात्रियों के लिए असुरक्षित बनी रही। बाद में, अठारहवीं शताब्दी में मुगलों के बीच आपसी संघर्ष और केन्द्रीय सरकार की कमजोरी का लाभ उठाकर चूड़ामन इस क्षेत्र में एक पृथक जाट राज्य कायम करने और राजपूत जमींदारों की शक्ति को समाप्त कर देने में सफल हो गया। इस प्रकार इस संघर्ष का, जो किसानों के विद्रोह के रूप में आरंभ हुआ था, स्वरूप बिल्कुल बदल गया और इसकी परिणति एक ऐसे राज्य की स्थापना में हुई जिसमें शासक वर्ग के लोग जाट थे। अफगानऔरंगजेब को अफगानों से भी संघर्ष करना पड़ा। पंजाब और काबुल के बीच पहाड़ी क्षेत्रों में बसे वीर अफगान कबीलों से संघर्ष कोई नई बात नहीं थी। इनके विरुद्ध अकबर को भी संघर्ष करना पड़ा था और इन्हीं संघर्षों में उसके मित्र और विश्वासपात्र राजा बीरबल की जान गई थीं। इन अफगान कबीलों के साथ शाहजहाँ को भी संघर्ष करना पड़ा था। ये संघर्ष कुछ अर्थों में आर्थिक और कुछ अर्थों में राजनीतिक और धार्मिक थे। इन बीहड़ पहाड़ी क्षेत्रों में आजीविका के साधनों की कमी के कारण अफगानों के लिए कारवाँ को लूटने या फिर मुगल फौज में भर्ती होने के अलावा और चारा भी नहीं था। अपने स्वतंत्र्य प्रेम से इनके मुगल सेना में बने रहने में कठिनाई होती थी। मुगल इनको अधिकतर इनके वेतन के अलावा अन्य सहायता देकर इन्हें खुश रखते थे। लेकिन किसी महत्वाकांक्षी नेता के उभरने से इस सन्धि के टूटने का खतरा बराबर बना रहता था।औरंगजेब के शासनकाल में हम पठानों के बीच विद्रोह की एक नई लहर देखते है। 1667 में युसुफजई कबीले के सरदार भागु ने एक प्राचीन शाही खानदान का वंशज होने का दावा करने वाले एक व्यक्ति मुहम्मदशाह को राजा और स्वयं को उसके वजीर के रूप में घोषणा की। ऐसा लगता है कि जाटों की तरह अफगानों में भी अपने एक पृथक राज्य की आकांक्षा जोर पकड़ रही थी। इस संघर्ष को रोशनाई नामक एक धार्मिक आन्दोलन ने, जो एक विशेष पीर के प्रति भक्ति और नैतिक जीवन पर जोर देता था, एक बौद्धिक और नैतिक पृष्ठभूमि प्रदान की। भागु द्वारा शुरू किया गया आन्दोलन धीरे-धीरे जोर पकड़ता गया यहाँ तक कि उसके अनुयाईयों ने हजारा, अटक तथा पेशावर में लूटमार आरंभ कर दी और खैबर में यातायात ठप्प पड़ गया। इस विद्रोह को दबाने और खैंबर के मार्ग को सुरक्षित बनाने के काम औरंगजेब ने अपने प्रमुख बख्शी अमीरखाँ को सौंपा और उसकी मदद के लिए राजपूत सिपाहियों के एक दल को गठित किया। कई भयंकर लड़ाइयों के बाद अफगानों के विद्रोह को दबा दिया गया और वहाँ की देखरेख के लिए 1671 में मारवाड़ के शासक जसवन्तसिंह को जमरूद का थानेदार नियुक्त किया गया। 1672 में एक बार फिर अफगान विद्रोह पर उतर आए। इस बार उनका नेता आफरीदी सरदार अकमलखाँ था जिसने स्वयं को राजा घोषित कर दिया और अपने नाम पर खुतबा पढ़वाया और सिक्का चलाया। उसने मुगलों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की और सभी अफगानों को अपने दल में मिल जाने के लिए आह्वान किया। एक समसामयिक लेखक के अनुसार उसके अनुयायी चीटियों और टिड्डियों से भी अधिक थे। उन्होंने खैबर दर्रे के मार्ग को बंद कर दिया। रास्ते को साफ करने अमीरखाँ बहुत दूर तक आगे बढ़ गया और एक तंग घाटी में उसे करारी हार का सामना करना पड़ा। अमीरखाँ भाग कर अपनी जान बचाने में सफल हो गया पर उसके दस हजार सिपाही युद्ध में काम आए और अफगानों ने दो करोड़ की सम्पत्ति लूट ली। इस पराजय के बाद अन्य कबीलें भी विद्रोहियों के दल में मिल गए। इनमें खुशहालखाँ खट्टक भी था जो औरंगजेब के हाथों कुछ समय के लिए कैद किया गया था और अब उसका कट्टर दुश्मन बन गया था। 1674 में एक और मुगल मनसबदार शुजाअतखाँ को खैबर में भारी हानि उठानी पड़ी वह जसवन्तसिंह द्वारा भेजे गए राठौड़ वीरों के एक दल की सहायता से ही बच सका। अंत में 1674 के मध्य में औरंगजेब स्वयं पेशावर गया और उसी क्षेत्र में 1675 के अंत तक रहा। धीरे-धीरे बल प्रयोग और कूटनीति से अफगानों की एकता को तोड़ा गया और इस क्षेत्र में शान्ति स्थापित हुई। अफगानों के विद्रोह से स्पष्ट हो जाता है कि मुगल शासन के विरुद्ध विद्रोह तथा प्रान्तीय स्वतन्त्रता की भावना हिन्दुओं तक ही सीमित नहीं थी। अफगानों के विद्रोह से उत्पन्न कठिन परिस्थिति के कारण शिवाजी पर मुगलों का दबाव कम हो गया और इसके कारण 1676 तक, जब शिवाजी स्वयं सिंहासन पर बैठ चुका था और गोलकुण्डा तथा बीजापुर से सन्धि कर चुके थे, दकन में मुगलों की विस्तार की नीति असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य हो गई थी। सिक्खऔरंगजेब के विरुद्ध सैनिक बगावत करने वालों में सिक्ख सबसे अन्तिम थे। जैसा कि हम देख चुके हैं कि सिक्ख गुरुओं के साथ जहाँगीर और शाहजहाँ के शासनकाल में भी संघर्ष हुआ था। लेकिन इन संघर्षों के कारण धार्मिक न होकर राजनीतिक और व्यक्तिगत थे। गुरुओं ने शान-शौकत से रहना आरंभ कर दिया था और अपनी सेना भी खड़ी कर ली थी। इसके अलावा उन्होंने ‘‘सच्चा पादशाह’’ की पदवी ग्रहण कर ली थी। इसके बावजूद औरंगजेब और सिक्ख गुरुओं में 1675 तक कोई संघर्ष नहीं हुआ। इस वर्ष गुरु तेगबहादुर को उनके पाँच अनुयाइयों के साथ पकड़ लिया गया और दिल्ली जाकर मार डाला गया। इस घटना के कारण स्पष्ट नहीं हैं। कुछ फारसी वृतान्तों के अनुसार गुरु तेगबहादुर ने एक पठान हाफिज आदम के साथ मिलकर पंजाब में अशान्ति फैला दी थी। सिक्ख परम्परा के अनुसार गुरु तेगबहादुर के कुछ अपने परिवार वालों ने उनके उत्तराधिकार को चुनौती दी और बहुत से लोगों ने इनका साथ दिया। इनके अनुसार गुरु तेगबहादुर के कत्ल का कारण उनका ही षड़यन्त्र था। यह भी कहा जाता है कि औरंगजेब गुरु तेगबहादुर से इसलिए नाराज था क्योंकि उन्होंने कुछ मुसलमानों को सिक्ख बना लिया था और कश्मीर में प्रान्तीय प्रशासक द्वारा धार्मिक अत्याचार का विरोध किया था। इन सब आरोपों में से सत्य का अनुमान लगाना बड़ा कठिन है। सिक्ख धर्म जाट किसानों तथा नीची जाति के दस्तकारों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गया था, जो इसके सीधे सादे और धर्म निरपेक्षता के सिद्धान्तों से प्रभावित थे। हो सकता है कि गुरु तेगबहादुर ने इन वर्गों की आर्थिक दयनीयता के विरोध में आवाज उठाई हो। कश्मीर के पुराने प्रशासक सैफखाँ को पुलों के निर्माणकर्ता के रूप में याद किया जाता है। वह उदार प्रकृति का तथा बड़े मानवीय दृष्टिकोण का व्यक्ति था और अपने प्रशासनिक कार्यों में सलाह के लिए उसने एक हिन्दू की नियुक्ति की थी। नए प्रशासक द्वारा धर्म के नाम पर बड़े पैमाने पर अत्याचार की कहानियों में अतिशयोक्ति लगती है विशेषकर इसलिए कि 15वीं शताब्दी से ही कश्मीर की आबादी अधिकतर मुसलमानों की ही थी।कारण जो भी हो, औरंगजेब के कार्यों को किसी प्रकार भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। उसका दृष्टिकोण बड़ा ही संकीर्ण रहा। गुरु तेगबहादुर के कत्ल से सिक्ख फिर पंजाब के पहाड़ों में लौटने पर बाध्य हो गए। इस कारण सिक्ख, आन्दोलन धीरे-धीरे सैनिक रूप अपनाता गया। इस दिशा में गुरु गोविन्द सिंह का योगदान महत्वपूर्ण था। उन्होंने संगठन खड़ा करने में बड़ी योग्यता दिखाई और 1699 में खालसा का गठन किया। इसके पहले गुरु गोविन्द सिंह ने पंजाब के पहाड़ों की तराई में मखोवल अथवा आनन्दपुर में अपना मुख्यालय स्थापित किया। पहले तो स्थानीय हिन्दू राजाओं ने आपसी झगड़ों में गुरु गोविन्द सिंह की मदद से लाभ उठाना चाहा पर शीघ्र ही गुरु गोविन्द सिंह स्वयं शक्तिशाली हो गए और उनके तथा पहाड़ी प्रदेशों के राजाओं के बीच कई लड़ाइयाँ हुईं पर अंत में विजय गुरु की हुई। इन लड़ाइयों में खालसा के संगठन से गुरू के हाथ बहुत मजबूत हो गए थे। गुरु और इन राजाओं के बीच झगड़ा 1704 में ही बढ़ा जब कई राजाओं ने मिलकर अनन्तपुर में गुरु गोविन्द सिंह पर हमला कर दिया। राजाओं को फिर मुँह की खानी पड़ी और उन्होंने गुरु के विरुद्ध मुगल सरकार से मदद माँगी। इसके बाद में युद्ध हुआ वह धार्मिक युद्ध नहीं था। इसका एक कारण तो पहाड़ी क्षेत्र में राजाओं तथा सिक्खों के बीच आपसी प्रतिद्विन्दता थी और इसके अलावा सिक्ख आन्दोलन का अपना स्वरूप भी था। औरंगजेब गुरु की बढ़ती शक्ति से चितिंत था और उसने पहले ही मुगल फौजदार को गुरु को चेतावनी देने को कहा था। अब उसने लाहौर के प्रशासक तथा सरहिन्द के फौजदार वजीरखाँ को गुरु गोविन्द सिंह के खिलाफ पहाड़ी राजाओं की मदद करने के लिए कहा। मुगल फौजों ने अनन्तपुर पर हमला किया लेकिन सिक्ख बड़ी बहादुरी से लड़े और उनके सारे हमलों को नाकाम कर दिया। इसके बाद मुगलों तथा उनके मित्रों ने सिक्खों के किले पर घेरा डाला दिया। जब किले के अन्दर भुखमरी की हालात हो गयी तब वजीरखाँ द्वारा सुरक्षा का आश्वासन देने पर गुरु गोविन्द सिंह को किले के दरवाजे खोलने पड़े। वजीरखाँ के आश्वासन के बावजूद जब सिक्खों की सेना बाढ़ भरी नदी को पार कर रही थी, तब वजीरखाँ के सैनिकों ने अचानक उस पर हमला कर दिया। इस हमले में गुरु के दोनों पुत्र बंदी बना लिए गए और जब उन्होंने इस्लाम को स्वीकार करने में इन्कार कर दिया तब सरहिन्द में उनका कत्ल कर दिया गया। गुरु के बाकी दोनों बेटे भी एक और लड़ाई में काम आए। इसके बाद गुरु गोविन्द सिंह तलवंडी चले गए जहाँ उन्हें और परेशान नहीं किया गया। इस बात में सन्देह है कि वजीरखाँ ने औरंगजेब के कहने पर गुरु के बेटों का कत्ल किया था। ऐसा लगता है कि औरंगजेब गुरु को पूरी तरह नष्ट करने का इच्छुक नहीं था और उसने लाहौर के प्रशासक से गुरु से सन्धि कर लेने के लिए भी कहा था। जब गुरु गोविन्द सिंह ने दकन में औरंगजेब को लिख कर घटनाओं की सूचना दी तब औरंगजेब ने उन्हें मिलने के लिए आमन्त्रित किया। 1706 के अन्त में गुरु औरंगजेब से मिलने के लिए दकन के लिए चले भी पर वे रास्ते में ही थे कि औरंगजेब की मृत्यु हो गयी। कुछ इतिहासकारों का मत है कि गुरु गोविन्द सिंह को आशा थी कि वह औरंगजे़ब को आनंदपुर लौटाने के लिए मनाने में सफल हो जाएँगे। यद्यपि गुरु गोविन्द सिंह मुगल शक्ति का बहुत अधिक समय तक सामना नहीं कर सके और न ही एक पृथक सिक्ख राज्य की स्थापना कर सके, तथापि उन्होंने एक परम्परा की स्थापना की और एक ऐसे शस्त्र का निर्माण किया जिससे मुगलों से बाद में बदला लिया जा सके। इससे यह भी सिद्ध हो गया कि किस प्रकार कुछ विशेष परिस्थितियों में एक धार्मिक आन्दोलन को राजनीतिक आन्दोलन में बदला जा सकता है और उसका क्षेत्रीय स्वतन्त्रता के लिए उपयोग किया जा सकता है। राजपूतों के साथ सम्बन्ध - मारवाड़ तथा मेवाड़ के साथ संघर्षहम देख चुके हैं कि किस प्रकार 1613 में जहाँगीर ने मेवाड़ के साथ एक लम्बे संघर्ष को सुलझा लिया था। जहाँगीर ने प्रमुख राजपूत राजाओं को अपने पक्ष में रखने और उसके साथ वैवाहिक सम्बन्ध करने की अकबर की नीति को जारी रखा। शाहजहाँ ने भी राजपूतों के साथ मैत्री बनाए रखी। उसके शासनकाल में राजपूतों ने दकन, मध्य एशिया में बल्ख तथा कन्धार जैसे दूर-दराज क्षेत्रों में बड़ी बहादुरी से लड़ाइयों में हिस्सा लिया। इसके बावजूद किसी भी राजपूत राजा को किसी प्रान्त का प्रशासक नहीं नियुक्त किया गया और न ही प्रमुख राजपूत राजाओं के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए गए यद्यपि शाहजहाँ स्वयं एक राठौर राजकुमारी का पुत्र था। ऐसा लगता है कि राजपूतों के साथ अच्छे मैत्री सम्बन्ध स्थापित होने के बाद वैवाहिक सम्बन्धों को स्थापित करना अब और आवश्यक नहीं समझा गया। लेकिन शाहजहाँ ने जोधपुर तथा आमेर के दो राजपूत राजघरानों को उच्च सम्मान दिया। मारवाड़ के शासक राजा जसवन्त सिंह पर शाहजहाँ की विशेष कृपा थी। औरंगजेब तख्त पर बैठने के समय जसवन्त सिंह और सिंह दोनों के पास 7000 जात और 7000 सवार के मनसब थे।औरंगजेब भी राजपूतों के साथ मैत्री को बहुत महत्व देता था। उसने मेवाड़ के महाराणा के समर्थन को प्राप्त करने की चेष्टा की और उसका मनसब 5000 से बढ़ाकर 6000 कर दिया। यद्यपि राजा जसवन्त सिंह धर्मट में औरंगजेब का साथ छोड़ शुजा के पक्ष में चला गया था और उसने औरंगजेब के ही खिलाफ युद्ध में भाग लिया तथा दारा को अपने राज्य में आने का निमन्त्रण भी दिया था, इसके बावजूद औरंगजेब ने उसे क्षमा कर उसका मनसब लौटा दिया और उसे गुजरात का प्रशासक तक नियुक्त किया। जयसिंह 1667 में अपनी मृत्यु तक औरंगजेब का मित्र और विश्वासपात्र बना रहा। जसवन्तसिंह, जिसे उत्तर-पश्चिम में अफगानों की गतिविधियों की देखरेख के लिए नियुक्त किया गया था, की मृत्यु 1678 के अन्त में हो गयी। महाराजा का कोई लड़का नहीं था, इसलिए गद्दी के उत्तराधिकार की समस्या तत्काल उठ खड़ी हुई। मुगलों की एक पुरानी परम्परा के अनुसार उस राज्य पर, जिसमें उत्तराधिकार की समस्या हो, कानून और व्यवस्था की स्थापना के लिए मुगल प्रशासन (खालिसा) का अधिकार हो जाता था और बाद में उसे चुने हुए उत्तराधिकारी को सौंप दिया जाता था। इस प्रकार 1650 में जब जैसलमेर में उत्तराधिकार के बारे में विवाद छिड़ा, शाहजहाँ ने उसे खालिसा के अन्तर्गत ले लिया और बाद में जसवन्तसिंह के नेतृत्व में एक सेना भेजकर स्वयं द्वारा मनोनीत उम्मदीवार को गद्दी पर बैठाया। मारवाड़ को खालिसा के अन्तर्गत लाने का एक और भी कारण था। अधिकतर मुगल मनसबदारों की तरह राजा जसवन्तसिंह पर भी राज्य का बहुत बड़ा कर्ज था जो उसे वापस देना था। इसके अलावा कई राजपूत जसवन्तसिंह से नाराज थे और कईयों के क्षेत्र सम्राट ने जसवन्तसिंह को जागीर के रूप में प्रदान किए थे वे सभी जोधपुर की खाली गद्दी का लाभ उठा कर गड़बड़ी फैलाना चाहते थे। औरंगजेब को राठौरों के विरोध की आशंका थी और इसलिए उसने जसवन्तसिंह के परिवार तथा समर्थकों की देखरेख के लिए मारवाड़ के दो परगनों को दे दिया था और यह देखने के लिए कि उसकी आज्ञा का पालन हो, उसने अजमेर में एक बड़ी शक्तिशाली सेना भी भेजी। जसवन्तसिंह की पटरानी रानी हाड़़ी जोधपुर को राठौरों का ‘वतन’ मानती थी और इस कारण उसे मुगलों को नहीं सौंपना चाहती थी। पर मुगल सेना के आगे उसे हार मानती पड़ी। इसके बाद जसवन्तसिंह के खजाने की खोज शुरू हुई और सारे मारवाड़ में मुगल अधिकारियों को नियुक्त कर दिया गया और उन्हें आज्ञा दी गयी कि वे ‘‘नये’’ मन्दिरों को या तो गिरा दें या फिर उन्हें बन्द कर दें। इस प्रकार मुगलों ने विजेता की भाँति मारवाड़ के साथ दुश्मन का व्यवहार किया और जिसे शायद किसी प्रकार उचित नहीं ठहराया जा सकता। इसके बावजूद यह भी कहना पड़ेगा कि औरंगजेब मारवाड़ पर अपना अधिकार बनाए रखना नहीं चाहता था, यद्यपि कुछ इतिहासकार जोधपुर के सामरिक महत्व तथा दिल्ली और गुजरात के बन्दरगाहों से उसके समीप्य के कारण ऐसी धारणा रखते हैं। जसवन्तसिंह की मृत्यु के बाद लाहौर में उसकी दो रानियों के दो पुत्र हुए। गद्दी पर उनके अधिकार को आगे रखा गया, लेकिन उनके दिल्ली पहुँचने से पहले ही औरंगजेब ने जोधपुर की ‘टीका’ का अधिकार 36 लाख रूपये के एवज में जसवन्तसिंह के बड़े भाई अमरसिंह के पोते इन्द्रसिंह को देने का निश्चय कर लिया। शायद औरंगजेब इस बात से प्रभावित हुआ था कि शाहजहाँ ने अमरसिंह के छोटे भाई जसवन्तसिंह को ‘टीका’ का अधिकार देकर अमरसिंह के अधिकारों की अनदेखी कर उसके साथ अन्याय किया था। यह भी हो सकता है कि औरंगजेब मारवाड़ में किसी नाबालिग का प्रशासन नहीं चाहता था। कुछ आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार औरंगजेब जोधपुर का प्रशासन जसवन्तसिंह के पुत्र अजीतसिंह के हाथों सौंपने को तैयार था बशर्तें कि अजीतसिंह इस्लाम अपना ले, लेकिन समसामयिक सूत्रों में इस बात का कोई हवाला नहीं मिलाता। उस समय की राजस्थानी कृति हुकूमत-री-बही के अनुसार अजीतसिंह जब आगरा के राजदरबार में आया तब औरंगजेब उसे एक मनसब देने को तैयार हो गया और यह भी कहा कि मारवाड़ के दो परगनों, सोजत और जैतारण, उसकी जागीर बने रहेंगे। इस प्रकार औरंगजेब मारवाड़ के परिवार की दो शाखाओं के बीच विभाजन करने की सोच रहा था। औरंगजेब का यह सुझाव राज्य के हित में होता लेकिन दुर्गादास के नेतृत्व में राठौर सरदारों ने इसे ठुकरा दिया। सरदारों द्वारा अपने सुझाव की अस्वीकृति से नाराज होकर औरंगजेब ने राजकुमारों तथा उनकी माताओं को नूरगढ़ के किले में कैद करने की आज्ञा दी। इससे राजपूत सरदारों के बीच चिन्ता फैल गई और वे अजीतसिंह के साथ आगरा के किले से भागने में सफल हो गए। बाद में उन्होंने अजीतसिंह को जोधपुर के सिंहासन पर बैठाया और राज्य में बड़ी खुशियाँ मनाई गईं। उचित होता कि औरंगजेब इस बात को स्वीकार कर लेता कि इन्द्रसिंह को राठौरों का समर्थन प्राप्त नहीं है। उसने इन्द्रसिंह को उसकी अयोग्ता के लिए हटा तो दिया लेकिन अजीतसिंह को अवैधानिक शासक बता कर उसके प्रति बड़ा कड़ा रुख अपना लिया। उसने अपने साम्राज्य के सभी हिस्सों से सैनिकों को बुलाकर एक बड़ी सेना का गठन किया और अजमेर पर चढ़ाई करने के लिए निकल पड़ा। राठौर औरंगजेब की इस सेना का मुकाबला नहीं कर सके और जोधपुर पर मुगलों का कब्जा हो गया। दुर्गादास अजीतसिंह के साथ भागकर मेवाड़ पहुँचा जहाँ राणा ने उन्हें किसी गुप्त स्थान में भेज दिया। इस समय मेवाड़ ने अजीतसिंह का साथ दिया। राणा राजसिंह पहले औरंगजेब का समर्थक था लेकिन धीरे-धीरे वह उससे दूर होता गया था। रानी हाड़ी के दावे के समर्थन में उसने अपने एक प्रमुख विश्वासपात्र के नेतृत्व में 5000 सैनिकों की एक सेना जोधपुर भेजी। वह नहीं चाहता था कि उत्तराधिकार जैसे मामलों में राजपूतों की आंतरिक समस्याओं में मुगलों का किसी प्रकार का हस्तक्षेप हो। इसके अलावा वह इस बात से भी नाराज था कि मुगलों ने उसके राज्य से डुंगरपुर और बासंवाड़ा जैसे दक्षिण और पश्चिम में पड़ने वाले राज्यों को मेवाड़ से अलग करना चाहा था और उनके राजाओं को स्वतन्त्र राजाओं का रूप देना चाहा था जबकि इन राज्यों के शासक मेवाड़ को कर देते थे। लेकिन तात्कालिक कारण यही था कि राणा राजसिंह मारवाड़ पर मुगल अधिकार तथा औरंगजेब द्वारा अजीत सिंह के दावे को ठुकराये जाने से नाराज था। पहला हमला औरंगजेब ने किया। 1679 के नवम्बर में उसने मेवाड़ पर चढ़ाई कर दी। मुगलां का एक शक्तिशाली दल उदयपुर पहुँच गया और उसने राणा के खेमे पर भी चढ़ाई कर दी जबकि राणा पहाड़ियों में जाकर छुप गया था। राणा ने वहाँ से मुगलों के विरुद्ध अपना संघर्ष जारी रखा लेकिन संघर्ष में जल्दी ही गतिरोध पैदा हो गया। मुगल न तो पहाड़ियों में जा सकते थे और न राजपूतों के छापामार हमलों का मुकाबला कर सकते थे। इसी बीच औरंगजेब के सबसे बड़े पुत्र राजकुमार अकबर ने स्थिति का फायदा उठाकर अपने पिता के विरुद्ध अभियान छेड़ दिया। राठौर सरदार दुर्गादास के साथ मिलकर उसने अजमेर पर (जनवरी, 1681 में) हमला कर दिया। औरंगजेब इस समय निस्सहाय सा था क्योंकि उसके सभी योग्य सैनिक कहीं और लड़ रहे थे। इसके बावजूद राजकुमार अकबर ने अपने अभियान में देर कर दी और औरंगजेब झूठी चिट्ठियाँ भेज कर उसके सरदारों के बीच फूट डालने में सफल हो गया। अकबर को महाराष्ट्र की ओर भागना पड़ा और औरंगजेब ने चैन की साँस ली। मेवाड़ का अभियान औरंगजेब के लिए अब इतना महत्वपूर्ण नहीं रह गया। उसने राणा राजसिंह के पुत्र राणा जगतसिंह, जो राजसिंह का उत्तराधिकारी था, के साथ सन्धि कर ली। नए राणा को जजिया के बदले अपने कुछ परगनों को देना पड़ा और निष्ठा तथा इस वचन के बदले में कि वह अजीतसिंह का साथ नहीं देगा, उसे 5000 का मनसब प्रदान किया गया। अजीतसिंह के मामले में औरंगजेब ने इस बात का आश्वासन दिया कि जब वह वयस्क हो जायेगा तो मनसब तथा राज्य वापस दे दिया जायेगा। इस सन्धि तथा अजीतसिंह को दिये गये वचन से राजपूत संतुष्ट नहीं हुए। मुगलों ने मारवाड़ पर अपना नियन्त्रण बनाए रखा और 1698 तक छिटपुट युद्ध होते रहे। अंत में अजीतसिंह को मारवाड़ का शासक मान लिया गया। इसके बावजूद मुगलों ने जोधपुर पर अपना नियन्त्रण ढीला नहीं किया। मुगलों को अपने परगने देने के कारण मेवाड़ का राणा भी असंतुष्ट बना रहा और जब तक 1707 में औरंगजेब की मृत्यु नहीं हो गई, इस स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। मारवाड़ तथा मेवाड़ की औरंगजेब की नीति बराबर गलतियों की रही और इससे मुगलों को किसी प्रकार का लाभ नहीं पहुँचा। इसके अलावा इस क्षेत्र में मुगलों की असफलता से उनके सैनिक सम्मान को भी धक्का पहुँचा। यह सही है कि 1681 के बाद मारवाड़ के युद्धों में मुगलों की तरफ से छोटी-छोटी सेनाएँ ही लड़ीं और इनका कोई विशेष सामरिक महत्व भी नहीं था। यह भी सही है कि हाड़ा तथा कछवाहा जैसे कई राजपूत सरदार मुगलों की सेवा में बने रहे लेकिन औरंगजेब की मारवाड़ नीति का अनुमान केवल इससे नहीं लगाया जाना चाहिए। मारवाड़ तथा मेवाड़ से संघर्ष के कारण एक बहुत महत्वपूर्ण समय में मुगलों के राजपूतों के साथ सम्बन्ध कमजोर पड़ गये। सबसे बड़ी बात यह हुई कि इससे अपने पुराने और विश्वसनीय मित्रों के प्रति मुगलों के समर्थन में सन्देह उत्पन्न हो गया। यद्यपि इस नीति से औरंगजेब की कट्टरता और उसकी जिद का पता चलता है तथापि, जैसा कि आरोप लगाया जाता है, ऐसा नहीं लगता कि औरंगजेब हिन्दुओं का नाश देखना चाहता था क्योंकि 1697 के बाद बड़ी संख्या में मराठों को मनसब दिये गये। यद्यपि उत्तर पूर्व में जाटों, अफगानों तथा राजपूतों के साथ औरंगजेब के निरन्तर संघर्ष के कारण साम्राज्य की शक्ति क्षीण हुई तथापि असली संघर्ष का क्षेत्र कहीं और अर्थात् दकन में था। | |||||||||
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