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भारत में आर्यों का आगमन और ऋग्वेद काल
मूल निवास-स्थान और पहचानआर्य लोग भारत-यूरोपीय परिवार की भाषाएँ बोलते थे, जो अपने परिवर्तित रूपों में आज भी समूचे यूरोप और ईरान में तथा भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकतकर भागों में बोली जाती हैं। जान पड़ता है कि आर्यों का मूल निवास आल्प्स पर्वत के पूर्वी क्षेत्र में, जो यूरेशिया कहलाता है, कहीं पर था। आज कुत्ता, घोड़ा आदि कुछ पशुओं के नाम और भूर्ज, देवदारू, मैपिल आदि कुछ वृक्षों के नाम सभी भारत-यूरोपीय भाषाओं में समान पाए जाते हैं। ये समान शब्द यूरेशिया के पौधों और पशुओं के वाचक है। इनसे यह भी प्रकट होता है कि आर्यजन नदियों और वनों से परिचित थे। यह विचित्र बात है कि पर्वत के वाचक समान शब्द कुछ ही आर्य भाषाओं में हैं, हालाँकि आर्यों ने अनेकों पर्वतों को पार किया है। उनका आरम्भिक जीवन मुख्यतः पशुचारण का था, कृषि उनका गौण धंधा था। आर्य लोग स्थिर निवासी नहीं थे, इसलिए अपने पीछे कोई ठोस भौतिक अवशेष नहीं छोड गए। उन्होंने कई प्रकार के पशुओं का इस्तेमाल किया, लेकिन उनके जीवन में घोड़े का सबसे अधिक महत्व था। इसकी तेज रफ्तार के कारण उन्हें और उनके सहयोगी जनें को लगभग 2000 ई. पू. के बाद पश्चिमी एशिया में चढ़ाई करने में सफलता मिली।भारत आगमन के क्रम में आर्य लोग ईरान पहुँचे, जहाँ भारत-ईरानी लोग बहुत पहले से रहते थे। हमें भारत में आर्यों की जानकारी ऋग्वेद से मिलती है। ऋग्वेद भारत-यूरोपीय भाषाओं का सबसे पुराना निदर्श है। इसमें अग्नि, इन्द्र, मित्र, वरूण आदि देवताओं की स्तुतियाँ संगृहीत हैं जिनकी रचना विभिन्न गोत्रों के ऋषियों या मन्त्रद्रष्टाओं ने की है। इसमें दस मंडल या भाग हैं, जिनमें मंडल 2 से 7 तक प्राचीनतम अंश हैं। प्रथम और दशम मंडल सबसे बाद में जोड़े गए मालूम होते हैं। ऋग्वेद की अनेक बातें अवेस्ता से मिलती हैं। अवेस्ता ईरानी भाषा का प्राचीनतम ग्रन्थ है। दोनों ग्रन्थों में बहुत से देवताओं के और सामाजिक वर्गों के भी नाम समान हैं। इराक में मिले लगभग 1600 ई. पू. के कस्सी अभिलेखों में तथा ईसा-पूर्व चौदहवीं सदी के मितन्नी अभिलेखों में जो कुछ आर्य नामों का उल्लेख मिलता है उनसे संकेत मिलता है कि ईरान से आर्यां की एक शाखा पश्चिम की ओर चली गई थी। भारत में आर्यों का आगमन 1500 ई. पू. से कुछ पहले हुआ। उनके आगमन का कोई स्पष्ट और ठोस पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिलता है। शायद वे छेदवाली कुल्हाड़ियों, काँसे की कटारों और खड्गों का प्रयोग करते थे। ये हथियार पश्चिमोत्तर भारत में मिले हैं। आरिम्भक आर्यों का निवास पूर्वी अफगानिस्तान और पंजाब में तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती भूभागों में था। ऋग्वेद में अफगानिस्तान की कुभा आदि कुछ नदियों का तथा सिन्धु और उसकी पाँच सहायक नदियों का नामोल्लेख है। सिन्धु आर्यों की सबसे प्रमुख नदी है जिसका उन्होंने बार-बार उल्लेख किया है। उनके द्वारा उल्लिखित दूसरी नदी है सरस्वती, जो अब राजस्थान के रेगिस्तान में तिरोहित हो गई है। इसकी जगह अब घग्घर नदी बहती है। सम्भवतः आर्य लोग ताँबा राजस्थान की खेत्री खानों से प्राप्त करते थे। भारत में आर्य लोग जहाँ प्रथमतः बसे वह सारा देश सप्तसिन्धु (सात नदियों का देश) नाम से प्रसिद्ध है । भारत में आर्य लोग कई खेपों मे आए। सबसे पहले की खेप में जो आए वे हैं ऋग्वैदिक आर्य, जो इस उपमहाद्वीप में 1500 ई. पू. के आसपास दिखाई देते हैं। उन्हें दास, दस्यु आदि के नाम के स्थानीय जनों से संघर्ष हुआ। चूँकि दास जनों का उल्लेख प्राचीन ईरानी साहित्य में भी मिलता है, इसलिए प्रतीत होता है कि वे पूववर्ती आर्यों की ही एक शाखा थे। ऋग्वेद में कहा गया है कि भरत वंश के एक राजा दिवोदास ने शम्बर को हराया। यहाँ दास शब्द दिवोदास के नाम में लगा है। ऋग्वेद में जो दस्यु कहे गए हैं वे सम्भवतः इस देश के मूलवासी थे और आर्यों के जिस राजा ने उन्हें पराजित किया वह त्रसदस्यु कहलाया। वह राजा दासों के प्रति कोमल था, पर दस्युओं का परम शत्रु था। ऋग्वेद में दस्युहत्या का शब्द का बार-बार उल्लेख मिलता है। दस्यु लोग शायद लिंगपूजक थे और दूध के लिए पशुपालन नहीं करते थे। जातीय संघर्षहम यह तो नहीं जानते कि आर्यों के शत्रुओं के हथियार कैसे थे, पर यह ज्ञात होता है कि इन्द्र ने आर्यों के शत्रुओं को बार-बार पराजित किया। ऋग्वेद में इन्द्र को पुरंदर कहा गया है जिसका अर्थ है दुर्गों को तोड़ने वाला। लेकिन आर्य-पूर्व जनों के इन दुर्गों का हमें कोई पता नहीं है। हो सकता है, इनमें कुछ दुर्ग उत्तरकालीन हड़प्पा बस्तियाँ रहे हों। आर्य लोग हर जगह जीतते गए क्योंकि उनके पास अश्वचलित रथ थे और उन्होंने ही पश्चिम एशिया और भारत में पहले-पहल इन रथों को प्रचलित किया है। आर्य-सैनिकों के पास शायद कवच (वर्मन्) उत्कृष्ट अस्त्र भी थे।आर्यों को दो तरह के संघर्षों का सामना करना पडा - एक ओर उनकी आर्य-पूर्व जनों से लड़ाई हुई तो दूसरी ओर अपने ही लोगों के बीच। आन्तरिक जातीय संघर्षों से आर्य-समुदाय दीर्घ काल तक जर्जर रहे। परम्परानुसार तो यह कहा जाता है कि आर्यों के पाँच कबीले अर्थात् जन थे, जिनका समुदाय पंचजन कहलाता था, लेकिन और भी जन रहे होंगे। ये जन आपस में लड़ते थे और कभी-कभी इसके लिए आर्येत्तर जनों का भी सहारा लेते थे। भरत और त्रित्सु दोनों आर्यों के शासक वंश थे और पुरोहित वसिष्ठ इन दोनों वंशों के समर्थक थे। बाद में चलकर इस देश का नाम इसी भरत कुल के आधार पर भारतवर्ष पड़ा। इस कुल या कबीले का उल्लेख सबसे पहले ऋग्वेद में मिलता है। भरत राजवंश का दस राजाओं के साथ विरोध था जिनमें पाँच आर्य-जनों के प्रधान थे और शेष आर्येत्तर जनों के। भरत और दस राजाओं के बीच जो लड़ाई हुई वह दाशराज युद्ध (दस राजाओं के साथ लड़ाई) के रूप में विदित हैं। यह युद्ध परूष्णी नदी के तट पर हुआ, जिसकी पहचान आज की रावी नदी से की जाती है। इसमें सुदास की जीत हुई और इस प्रकार भरतों की प्रभुता कायम हुई। पराजित जनों में सबसे महान पुरू थे। कालान्तर में भरतों और पुरूओं के बीच मैत्री हो गई और दोनो ने मिलकर एक नया शासक कुल बनाया जो कुरू के नाम से प्रसिद्ध हुआ। फिर कुरू जनों ने पंचालों के साथ मिल कर उच्च गंगा मैदान में अपना संयुक्त राज्य स्थापित किया। यहाँ कुरू-पंचालों ने उत्तर वैदिक काल में बड़ा महत्व प्राप्त किया। भौतिक जीवनऋग्वैदिक आर्यो के भौतिक जीवन के बारे में कुछ आभास मिलता है। भारत में उनकी सफलता के कारण थे घोड़े, रथ और सम्भवतः काँसे के कुछ बेहतर हथियार भी, जिनके बारे में हमें पुरातात्विक प्रमाण नाममात्र के मिले हैं। जब वे इस उपमहाद्वीप के पश्चिम भाग में बसे तब उन्हें राजस्थान की खेत्री खानों से ताँबा मिलता रहा होगा। ऋग्वैदिक लोगों को खेती की बेहतर जानकारी थी। ऋग्वेद के प्राचीनतम भाग में फाल का उल्लेख मिलता है, हालाँकि कुछ विद्वान इसे प्रक्षिप्त पाठ मानते हैं। शायद वह फाल लकड़ी का रहा होगा। उन्हें बोवाई, कटाई और दावनी का ज्ञान था। विभिन्न ऋतुओं के बारे में भी उन्हें जानकारी थी। जहाँ वैदिक जन बसे थे उन प्रदेशों के आर्य-पूर्व जनों को भी खेती का अच्छा ज्ञान था।इस सबके बावजूद, ऋग्वेद में गाय की इतनी चर्चा है कि ऋग्वैदिक आर्यों को मुख्य रूप से पशुचारक कहा जा सकता है। उनकी अधिकांश लड़ाईयाँ गाय को लेकर हुई हैं। ऋग्वेद में युद्ध का पर्याय गविष्टि (गाय का अन्वेषण) है। गाय लगता है कि सबसे उत्तम धन मानी जाती थी। जहाँ कहीं पुरोहितों को दी जाने वाली दक्षिणा की बात आई हैं उसमें आम तौर से गायें और दासियाँ होतीं और भूमि कभी न होती। ऋग्वैदिक लोग गाय चराने, खेती करने और बसने के लिए जमीन पर कब्जा करते होंगे, परन्तु भूमि निजी सम्पत्ति नहीं होती थी। ऋग्वेद में बढ़ई, रथकर, बुनकर, चर्मकार, कुम्हार आदि शिल्पियों के उल्लेख मिलते हैं। इससे पता चलता है कि आर्य लोगों में इन सभी शिल्पों का प्रचलन था। ताँबे या काँसे के अर्थ में ‘अयस‘ शब्द के प्रयोग से प्रकट होता है कि उन्हें धातुकर्म की जानकारी थी। परन्तु व्यापार के अस्तित्व का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता है। आर्यजन या वैदिक जन समुद्र या महासागर जानते थे कि नहीं यह संदिग्ध है, क्योंकि ऋग्वेद में उल्लिखित समुद्र शब्द मुख्यतः जलराशि का वाचक है। किसी भी स्थिति में, आर्य लोग शहरों में नहीं रहते थे, सम्भवतः वे किसी-न-किसी तरह का गढ़ बनाकर मिट्टी के घरों वाले गाँवों में रहते थे और पुरातत्ववेत्ताओं को अभी तक ऐसी गढ़ वाली बस्तियों को पता नहीं लगा है। हाल में हरियाणा में भगवानपुरा नामक स्थल की और पंजाब में तीन स्थलों की खुदाई हुई है और इन सभी जगह उत्तरकालीन हड़प्पा मृदभांडों के साथ चित्रित धूसर मृद्भांड पाए गए हैं। भगवानपुरा में प्राप्त वस्तुओं की तिथि 1600 ई. पू. से 1000 ई. पू तक रखी गई है और यही मोटे तौर पर ऋग्वेद का काल भी है। इन चार स्थलों का भौगोलिक क्षेत्र भी वही है जो ऋग्वेद के पर्याप्त अंश में मिलता है। यद्यपि इन सभी स्थलों में चित्रित धूसर मृदभांड मिले हैं, फिर भी लोहे की वस्तु और अनाज का पता नहीं है। इसलिए हम ऋग्वैदिक अवस्था के समान काल में चित्रित धूसर मृद्भांड संस्कृति के अन्तर्गत एक लौह-पूर्व अवस्था की कल्पना कर सकते हैं। यह एक रोचक बात है कि भगवानपुरा में तेरह कमरों वाला एक मिट्टी का घर प्रकाश में आया है। यह या तो किसी बहुत बड़े परिवार का निवासगृह होगा या कबीला-सरदार का आवास। इन सभी स्थलों पर पशु की हड्डियाँ भारी तादाद में मिली हैं। कबायली राज्यव्यवस्थाऋग्वैदिक काल में आर्यों का प्रशासन-तन्त्र कबीले के प्रधान के हाथों चलता था, क्योंकि वही युद्ध का सफल नेतृत्व करता था।वह राजन् (अर्थात राजा) कहलाता था। प्रतीत होता है कि ऋग्वैदिक काल में राजा का पद आनुवंशिक हो चुका था। फिर भी प्रधान या राजा के हाथ में असीमित अधिकार नहीं रहता था, क्योंकि उसे कबायली संघटनों से सलाह लेनी पड़ती थी। हमें इस बात का भी आभास मिला है कि कबीले की आम सभा, जो समिति कहलाती थी, अपने राजा को चुनती थी। राजा को अपने जनों का गोप्ता (रक्षक) कहा जाता था। वह कबीले के मवेशी की रक्षा करता था, युद्ध में लड़ता था और उसकी ओर से देवताओं की प्रार्थना करता था। ऋग्वेद में कबीलों या कुलों के आधार पर बने बहुत से संघटनों के उल्लेख मिलते हैं, जैसे सभा, समिति, विदथ, गण। ये संघटन विचारात्मक, सैनिक और धिर्मक कार्य देखते थे। ऋग्वैदिक काल में महिलाएँ भी सभा और विदथ में भाग लेती थीं। परन्तु सभा और समिति ये दोनों संघटन इतने महत्वपूर्ण थे कि प्रधान या राजा भी समर्थन के लिए इनका मुँह जोहते रहते थे। दैनन्दिन प्रशासन में कुछ अधिकारी राजा की सहायता करते थे। सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी पुरोहित होता था। ऋग्वेद-काल में वसिष्ठ और विश्वामित्र दो महान् पुरोहित हुए थे। पुरोहित राजा को कर्तव्य का उपदेश देते थे, उनका गुणगान करते थे, और उसके प्रतिफल में गायों और दासियों के रूप में प्रचुर दान-दक्षिणा पाते थे। पुरोहित के बाद शायद सेन्गनी का स्थान था जो भाला, कुठार, तलवार आदि शस्त्र चलाना जानता था। हमें ऐसे किसी अधिकारी का पता नहीं चलता जो कर-संग्रह का काम करता हो। संभवतः प्रजा स्वयं राजा को उसका अंश स्वेच्छया दे देती थी, जिसका नाम बलि (अर्थात् चढ़ावा) था। युद्ध में प्राप्त भेंट और लूट की वस्तुएँ वैदिक सभा में बाँट दी जाती थीं। ऋग्वेद में किसी तरह के न्यायाधिकारी का उल्लेख नहीं है। लेकिन वह कोई आदर्श समाज नहीं था कि जहाँ इसकी जरूरत न रही हो। चोरी और सेंधमारी होती थी, और गायों की चोरी तो विशेष रूप से होती थी। ऐसी समाज विरोधी हरकतों को रोकने के लिए गुप्चर रखे जाते थे। अधिकारियों के पदनामों से उनके प्रशासनिक भूभाग का संकेत नहीं मिलता है। फिर भी लगता है कि कुछ अधिकारी क्षेत्रों से जुड़े थे। चरागाहों और आबाद गाँवों पर उनके विशेष अधिकार थे। चरागाह का अधिकारी व्राजपति कहलाता था। वही परिवारों के प्रधानों को, जो कुलप कहलाते थे, अथवा लड़ाकू दलों के प्रधानों को, जो ग्रामणी कहलाते थे, साथ करके युद्ध में ले जाता था। आरम्भ में ग्रामणी एक छोटी-सी कबायली लड़ाकू टोली का मुखिया होता था। पर बाद में जब ऐसी टोली स्थिरवासी हो गई तब ग्रामणी सारे गाँव का मुखिया हो गया और कालान्तर में वही व्राजपति बन गया। राजा कोई नियमित या स्थायी सेना नहीं रखता था, लेनिक युद्ध के समय एक नागरिक सेना (मिलिशिया) संगठित कर लेता था जिसका सैनिक कार्य संचालक व्रात, गण, ग्राम और सर्ध नाम से विदित विभिन्न कबायली टोलियाँ करती थीं। कुल मिलाकर यह कबायली ढंग का शासन था जिसमें सैनिक तत्व प्रबल होता था। नागरिक शासन या प्रादेशिक प्रशासन का अस्तित्व नहीं था क्योंकि लोग निरंतर स्थान बदलते और फैलते जाते थे। कबीला और परिवारसामाजिक संगठन का आधार गौत्र या जन्ममूलक सम्बन्ध था। जैसा कि कई ऋग्वैदिक राजाओं के नामों से ज्ञात होता है, व्यक्ति की पहचान उसके कुल या गौत्र से होती थी। लोगों की सबसे अधिक आस्था अपने-अपने कबीले के प्रति रहती थी, जिसे जन कहा जाता था। एक पुरानी ऋचा में दो जनों की संयुक्त युद्ध क्षमता इक्कीस बताई गई है। इससे लक्षित होता है कि किसी जन में सदस्यों की संख्या कुल मिलाकर 100 से अधिक नहीं रहती होगी। ऋग्वेद में जन शब्द का उल्लेख लगभग 275 बार हुआ है, पर जनपद (अर्थात् राज्यक्षेत्र) शब्द एक बार भी नहीं आया है। लोग कबीले के अंग थे, क्योंकि उन दिनों राज्यक्षेत्र या राज्य स्थापित नहीं हुआ था।ऋग्वेद में दूसरा महत्वपूर्ण शब्द जो कबीले के अर्थ में मिलता है वह है विश्। इसका अनुवाद गौत्र या क्लैन में भी किया जा सकता है। ऋग्वेद में इसका उल्लेख 170 बार हुआ है। सम्भवतः विश् को लड़ाई के उद्देश्य से ग्राम नामक छोटी कबायली टोलियों में बाँटा गया था। जब ये ग्राम आपस में टकरा जाते थे तो संग्राम या युद्ध हो जाता था। वैश्य नामक बहुसंख्यक वर्ण का उदय इसी विश् या कबायली जनसमूह से हुआ है। ऋग्वेद में परिवार वाचक कुल शब्द का प्रयोग विरल है। इसमें केवल माता, पिता, पुत्र, दास आदि ही नही आते थे, बल्कि और भी लेग आते थे। प्रतीत होता है कि आरम्भिक वैदिक अवस्था में परिवार के अर्थ में गृह शब्द था, जो ऋग्वेद में बार-बार आया है। प्राचीनतम भारत यूरोपीय भाषाओं में पोते, नाती, भानजे, भतीजे आदि सब के लिए एक ही शब्द था। इसका अर्थ हुआ कि पृथक कुटुम्बों की स्थापना की दिशा में पारिवारिक सम्बन्धों का विभेदीकरण बहुत अधिक नहीं हुआ था और कुटुम्ब एक बड़ी सम्मिलित इकाई था। रोमन समाज की तरह यह एक पितृतन्त्रात्मक परिवार था जिसमें पिता मुखिया होता था। जान पड़ता है कि एक परिवार की अनेक पीढियाँ एक घर में साथ-साथ रहती थीं। निरन्तर युद्ध में लगे पितृतन्त्रात्मक समाज में लोग हमेशा वीर पुत्रों की प्राप्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते रहते थे। ऋग्वेद में बेटी के लिए कामना कहीं व्यक्त नहीं की गई है, जब कि प्रजा (सन्तान) और पशु की कामना सुक्तों में बार-बार आयी है। स्त्रियाँ सभा समितियों में भाग ले सकती थीं। वे पतियों के साथ यज्ञों में आहुतियाँ दे सकती थीं। सूक्तों की रचना करने वाली पाँच महिलाएँ ज्ञात हैं। बाद के ग्रन्थों में तो ऐसी 20 स्त्रियों के उल्लेख मिलते हैं। निःसन्देह, सूक्तों की रचना मौखिक होती थी और उस काल का कोई लेख नहीं मिलता है। विवाह संस्था कायम हो चुकी थी, यद्यपि कुछ आदिम प्रथाओं के अवशेष का भी आभास मिलता है। जुडवाँ भाई-बहन यम और यमी की कहानी हमें मालूम है। यमी ने यम से विवाह का प्रस्ताव रखा, यम ने अस्वीकार कर दिया। बहुपति-प्रथा के भी कुछ संकेत मिले हैं। उदाहरणार्थ, मरूत्तों ने रेदसी को मिलकर भोगा और सूर्य की पुत्री सूर्या दोनों भाई अश्विन के साथ रहती थीं। लेकिन ऐसे उदाहरण बहुत नहीं हैं। शायद ये मातृतन्त्रात्मक स्थिति के द्योतक अवशेष है और हम माता के नाम पर पुत्रों का नामकरण भी पाते हैं, जैसे मामतेय। ऋग्वेद में नियोग-प्रथा और विधवा-विवाह के प्रचलन का भी आभास मिलता है। बाल-विवाह का कोई उदाहरण नहीं है। जान पड़ता है कि ऋग्वैदिक काल में सोलह-सत्रह वर्ष की आयु मे विवाह होता था। सामाजिक वर्गीकरणऋग्वेद में हमें 1500-1000 ई. पू. आस-पास के पश्चिमोत्तर भारत के लोगों के शारीरिक रूप-रंग की चेतना का कुछ आभास मिलता है। वर्ण शब्द का प्रयोग रंग के अर्थ में होता था और प्रतीत होता है कि आर्य लोग गौर वर्ण के थे और मूलवासी लोग काले रंग के। हो सकता है, सामाजिक वर्ग-विन्यास में रंग से परिचायक चिन्ह का काम लिया गया हो, लेकिन रंगभेददर्शी पश्चिमी लेखकों ने रंग की धारणा को बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया है। वास्तव में समाज में वर्गों के सृजन का सबसे बढ़ा कारण हुआ कि आर्यों की मूल वासियों पर विजय। आर्यों द्वारा जीते गए दास और दस्यु जनों के लोग दास और शूद्र हो गए। जीती गई वस्तुओं में कबीले के सरदारों और पुरोहितों को अधिक हिस्सा मिलता था और स्वभावतः वे सामान्य लोगों को वंचित करते हुए अधिकाधिक सम्पन्न होते गए, इससे कबीले में सामाजिक असमानता का सृजन हुआ। धीरे-धीरे कबायली समाज तीन वर्गों में बँट गया - योद्धा, पुरोहित और सामान्य लोग (प्रजा)। इसी तरह का विभाजन ईरान में भी हुआ था। चौथा वर्ग, जो शूद्र कहलाता था, ऋग्वेद काल के अन्त में दिखाई पड़ता है क्योंकि इसका सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद के दशम मंडल में है, जो सबसे बाद में जोड़ा गया है।पुरोहितों को दक्षिणा में दास दिए जाने की बात बार-बार आई है। मुख्य रूप से दासियाँ दी जाती थीं जिनसे घरेलू काम कराया जाता था। यह साफ जाहिर होता है कि ऋग्वेद काल में दास प्रत्यक्षतः खेती के काम में या अन्य उत्पादनात्मक कार्य में नहीं लगाए जाते थे। ऋग्वेद के युग में ही व्यवसाय के आधार पर समाज का वर्गीकरण आरम्भ हुआ। किन्तु उन दिनों यह वर्ग-विभाजन बहुत कड़ा नहीं हुआ था। ऋ़ग्वेद में किसी परिवार का एक सदस्य कहता है - ‘‘मैं कवि हूँ, मेरे पिता वैद्य हैं और मेरी माता चक्की चलाने वाली है, भिन्न-भिन्न व्यवसायों से जीविकापोर्जन करते हुए हम एक साथ रहते हैं।’’ गायें, रथ, घोड़े, दास-दासियाँ आदि दान में दिए जाते थे। युद्ध में हाथ लगी सम्पत्ति का असमान वितरण होने के कारण समाज में असमानता आई और इससे सामान्य कबायली लोगों को वंचित करते हुए राजाओं और पुरोहितों को आगे बढ़ने में सहायता मिली। लेकिन चूँकि मुख्य आर्थिक आधार पशुचारण था इसीलिए प्रजा से नियमपूर्वक कर (राजस्व) वसूलने की गुंजाइश बहुत कम थी। हमें भूमि दान का उल्लेख नहीं मिलता है, और अन्नदान का भी विरल वर्णन ही मिलता है, और हम दास-दासियाँ पाते हैं, लेकिन मजदूर (अर्थात् मजदूरी पर खटने वाले श्रमिक) नहीं देखते हैं। समाज में कबायली तत्व प्रबल थे, तथा कर संग्रह और भूमि-सम्पदा के पूंजीकरण पर आश्रित सामाजिक वर्गीकरण नहीं हुआ था। समाज अब भी कबायली और बहुत कुछ समतानिष्ठ था। ऋग्वैदिक देवताहर समुदाय को अपने धर्म का आलोक अपने ही परिवेश में मिलता है। वर्षा का होना, सूर्य और चन्द्र का उदय, नदी-पर्वत आदि का अस्तित्व ये सब बातें आर्यों के लिए पहेली जैसी थीं। अतः उन लोगों ने इन प्राकृतिक शक्तियों को अपने मन में दैहिक रूप देकर इन्हें प्राणियों के रूप में देखा और इनमें मानव और पशु के गुण आरोपित किए। ऐसे बहुत से देवताओं के दर्शन हमें ऋग्वेद में होते हैं, जिसमें इन देवताओं की स्तुति में विभिन्न ऋषियों के रचे सूक्त (गीत) भरे हुए हैं। ऋग्वेद में सबसे अधिक प्रतापी देवता इन्द्र हैं, जिन्हें पुरन्दर अर्थात् किले को तोड़ने वाला कहा गया है। इन्द्र आर्यों के युद्ध नेता के रूप में चित्रित है, जिसने असुरों से लड़ने में आर्य सैनिकों का नेतृत्व किया और उन्हें विजय दिलाई। इन्द्र पर 250 सूक्त हैं। वह बादल का देवता माना गया है जो वर्षा देता है। अग्नि का दूसरा स्थान है। उस पर 200 सूक्त हैं। आदिम अवस्था के लोगों में अग्नि की भूमिका बडे़ महत्व की रही, क्योंकि इससे वे जंगलों को जलाना, खाना पकाना आदि काम लेते थे। अग्नि की उपासना न केवल भारत में, अपितु ईरान में भी जागृत रही है। वैदिक काल में अग्नि ने देवताओं और मानवों के बीच मध्यस्थ का काम किया है। समझा जाता था कि अग्नि में डाली जाने वाली आहुतियाँ धुआँ बनकर आकाश में जाती हैं और अन्ततः देवताओं को मिल जाती हैं। तीसरा स्थान वरूण का है जो जल या समुद्र का देवता माना गया है। उसे ऋत अर्थात् प्राकृतिक सन्तुलन का रक्षक कहा गया है और समझा जाता था कि जगत मे जो भी घटना होती है वह उसी की इच्छा का परिणाम है सेम वनस्पतियों का अधिपति माना गया है और एक मादक रस का नाम उसी के नाम पर पडा है। ऋग्वेद के बहुत से सूक्तों में एक प्रकार के पौधे से, जिसकी पहचान अभी तक न हो पाई है, सोमरस बनाने की विधि बताई गई है। मरूत् आँधी के देवता हैं। इस प्रकार हमें इसमें ऐसे बहुत सारे देवताओं के दर्शन होते हैं जो किसी न किसी रूप में प्रकृति की विभिन्न शक्तियों के प्रतिरूप हैं और साथ ही मानवोचित व्यवहार भी करते हैं।देवताओं में कुछ देवियाँ भी हैं, जैसे अदिति और ऊषा, जो प्रभात समय के प्रतिरूप हैं। किन्तु ऋग्वेद काल में देवियों की प्रमुखता नहीं थी। उस काल के पितृतन्त्रत्रात्मक समाज में देवों का बोलबाला देवियों से कहीं अधिक था। देवताओं की उपासना की मुख्य रीति थी स्तुतिपाठ करना और यज्ञ-बलि (चढ़ावा) अर्पित करना। ऋग्वैदिक काल में स्तुतिपाठ पर अधिक जोर था। स्तुतिपाठ सामूहिक भी होता था और अलग-अलग भी। सामान्यतः हर कबीले या गोत्र का अपना अलग देवता होता था। लगता है कि स्तुतिपाठ कबीले या गोत्र भर के लोग समवेत स्वर में करते थे। यज्ञाहुतियों में भी यही बात होती थी। इन्द्र और अग्नि समस्त जन द्वारा दी गई बलि ग्रहण करने के लिए आहूत होते थे। बलि या यज्ञाहुति में शाक, जौ आदि वस्तुएँ दी जाती थीं। परन्तु ऋग्वैदिक काल में ये वस्तुएँ चढ़ाते समय कोई आनुष्ठानिक या याज्ञिक मन्त्र नहीं पढ़े जाते थे। उन दिनों शब्द में किसी जादुई असर का होना उतना नहीं माना जाता था जितना उत्तर वैदिक कालों में माना जाने लगा। ऋग्वैदिक काल के लोग देवाराधना क्यों करते थे ? वे लोग आध्यात्मिक उत्थान या जन्म-मृत्यु के कष्टों से मुक्ति के लिए ऐसा नहीं करते थे। वे अपने देवताओं से सन्तति, पशु, अन्न, धान्य, आरोग्य आदि पाने की कामना से उनकी उपासना करते थे। | |||||||||
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