सत्यमेव जयते gideonhistory.com
दिल्ली सल्तनत कालीन प्रशासनिक, आर्थिक और सामाजिक स्थिति
   उत्तर भारत में तुर्कों द्वारा स्थापित शासन बारहवीं शताब्दी के अंत में धीरे-धीरे एक शक्तिशाली और अति केन्द्रीकृत राज्य के रूप में विकसित हुआ। दक्षिण में मदुरई तक का संपूर्ण देश कुछ समय के लिये इसके नियंत्रण में रहा। पन्द्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में दिल्ली सल्तनत का विघटन हो गया और देश के कई भागों में स्वतन्त्र राज्यों की स्थापना हो गयी। फिर भी सल्तनत की शासन व्यवस्था का अनेक राज्यों पर गहरा प्रभाव पड़ा और इसमें सोलहवीं शताब्दी में विकसित होने वाली मुगल शासन व्यवस्था को भी प्रभावित किया।

सुल्तान

   यद्यपि तुर्क सुल्तानों ने स्वयं को बगदाद के अब्बासी खलीफा का स्वामिभक्त उत्तराधिकारी घोषित किया और खुतबे में भी उनके नाम को शामिल किया, तथापि खलीफा को वैधानिक शासक नहीं माना जाता था। खलीफा पद का महत्व केवल नैतिक एवं धार्मिक था। खलीफा के पद को सर्वोच्च मान्यता प्रदान कर, दिल्ली के सुल्तान केवल यह प्रदर्शित करना चाहते थे कि वे भी इस्लामी दुनिया के एक अंग हैं।
   सल्तनत में सुल्तान का पद सर्वाधिक महत्वपूर्ण था। उसमें राजनीतिक, कानूनी और सैनिक सभी अधिकार निहित थे। उस पर राज्य की सुरक्षा का उत्तरादायित्व था। इस उत्तरदायित्व की पूर्ति के लिये वह न्यायाधीशों की नियुक्ति करता था। सल्तनत के अधिकारियों की मनमानी के विरुद्ध सीधे उससे ही फरियाद की जा सकती थी। न्याय देना प्रत्येक शासक का अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य माना जाता था। पहले ही इस बात का जिक्र कर चुके हैं कि बलबन ने न्याय के लिये अपने रिश्तेदारों को भी नहीं बख़्शा था। मुहम्मद तुगलक ने इस सिद्धान्त को धार्मिक वर्गों (उलेमा) पर भी लागू किया। उसके पूर्व उलेमा कठोर दंड से मुक्त थे।
   मुसलमान शासकों में उत्तराधिकार का यह स्पष्ट नियम नहीं बन सका। इस्लामी सिद्धान्तों में शासक के चुनाव की व्यवस्था है, लेकिन व्यवहार में शासक किसी पुत्र को गद्दी का उत्तराधिकारी मान लिया जाता था। ज्येष्ठाधिकार के सिद्धान्त को न तो कभी मुसलमानों ने माना और न हिन्दुओं ने स्वीकार किया। कुछ शासकों ने अपने पुत्र में से एक को उत्तराधिकारी घोषित करने का प्रयास किया। लेकिन यह आवश्यक नहीं था कि घोषित उत्तराधिकारी ज्येष्ठ पुत्र ही हो। इल्तुतमिश ने तो अपने पुत्रों की जगह पुत्री को ही उत्तराधिकारी घोषित किया। लेकिन यह प्रभावशाली अमीरों पर निर्भर करता था कि ऐसे उत्तराधिकारी को स्वीकार करें अथवा नहीं। सामान्यतः या मुस्लिम विचारों में वैधानिकता को समर्थन दिया जाता रहा, किन्तु किसी भी सफल सेनानायक द्वारा सिंहासन पर अधिकार से बचाव का कोई उपाय नहीं था और दिल्ली सल्तनत में ऐसा कई बार हुआ। इस प्रकार सैन्य शक्ति ही सिंहासन प्राप्त करने का एक मुख्य तरीका था। फिर भी जनमत की उपेक्षा नहीं की जा सकती थी। जनमत के भय से खलजी, बलबन के उत्तराधिकारी को पदच्युत कर एक लम्बी अवधि तक दिल्ली में प्रवेश करने का साहस न कर सके और शासन के लिये उन्होंने सीरी नामक एक नया नगर बसाया।

केन्द्रीय प्रशासन

सुल्तान की सहायता के लिये कई मंत्री होते थे। उनकी नियुक्ति स्वयं सुल्तान करता था और उनका कार्यकाल शासक की इच्छा पर निर्भर करता था। इनकी संख्या, अधिकार और कर्तव्य समय-समय पर परिवर्तित होते रहते थे। तेरहवीं शताब्दी के अंत तक प्रशासनिक व्यवस्था का विकास हो गया था। वजीर प्रशासन का मुख्य व्यक्ति होता था। चौदहवीं शताब्दी में वजीर को राजस्व विशेषज्ञ माना जाने लगा था। वह आय-व्यय के एक बड़े विभाग का प्रधान भी होता था। मुहम्मद तुगलक राजस्व विभाग की व्यवस्था पर बहुत ध्यान देता था। उसके वजीर ख्वाजाजहाँ को दूर तक सम्मान प्राप्त था। मुहम्मद तुगलक जब कभी विद्रोहियों से निपटने के लिये जाता तो वह राजधानी का कार्यभार संभालता था। आय और व्यय की देख-रेख क्रमशः महालेखाकार और महालेखा परीक्षक करते थे। दोनों विभाग वजीर के अधीन थे। कभी-कभी विभिन्न अधिकारियों के बीच झगड़ा होने से विभाग के सुचारु रूप से कार्य सम्पादन में बाधा पहुँचती थी। तो भी मुहम्मद तुगलक के राजस्व विभाग का कार्य सुचारु ढंग से चलता रहा। खानेजहाँ धर्म परिवर्तन से पहले तेलंगाना का एक ब्राह्मण था। फीरोज तुगलक ने उसे वजीर बनाया था और वह राजस्व विभाग का सर्वोच्च अधिकारी था। अठारह वर्षों की उसकी लम्बी कार्य अवधि अधिकारियों, वजीर पद की गरिमा और प्रभाव को प्रकट करती है। अधिकारियों व इक्ता को वंशानुगत बनाने की फीरोज की नीति के अनुसार खानेजहाँ का पुत्र खानेजहाँ द्वितीय उसका उत्तराधिकारी बना। फीरोज के मरणोपरान्त खानेजहाँ द्वितीय द्वारा शासक निर्माता बनने का प्रयास की विफलता से वजीर पद की प्रतिष्ठा मिट गयी। मुगलों के काल में वजीर पद का महत्व पुनः स्थापित हो सका।
   वजीर के बाद राज्य का सबसे महत्वपूर्ण विभाग दीवाने अर्ज अथवा सैन्य विभाग था। इस विभाग का सर्वोच्च अधिकार आरिजे मालिक कहलाता था। आरिज सेना का प्रधान सेनापति नहीं होता था क्योंकि सुल्तान स्वयं सभी सशस्त्र सेनाओं का नेतृत्व करता था। उस काल में किसी अन्य व्यक्ति के हाथ में सेना का भार सौपकर कोई भी शासक अपने पद पर नहीं बना रह सकता था। आरिज विभाग का विशिष्ट कार्य सेना की भंर्ती, उसे अस्त्र-शस्त्र से लैस करना और वेतन वितरित करना होता था। बलबन ने भारत में सर्वप्रथम आरिज विभाग की स्थापना की थी। उसने और उसके बाद अलाउद्दीन ने इस विभाग की कार्यप्रणाली पर विशेष ध्यान दिया। अलाउद्दीन ने सेना की नियमित हाज़िरी पर बहुत बल दिया। उसने ही घोड़ों को दागने की प्रथा चलायी ताकि सैनिक घटिया किस्म के घोड़े हाजिरी के समय न ला सकें। प्रत्येक सैनिक कार्य का विवरण भी रखा जाता था। सेना देश के विभिन्न भागों में नि‍युक्त की जाती थी। एक शक्तिशाली सेना की टुकड़ी शासक के पास राजधानी में रहती थी। बलबन आखेट अभियान के बहाने अपनी सेना को लम्बी दूरी तक कवायद कराकर दुरुस्त रखता था। दिल्ली के शासकों में अलाउद्दीन ख़लजी के पास सबसे विशाल स्थायी सेना थी। बरनी ने सेना की संख्या 300,000 बतायी है। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि यह संख्या अतिशयोक्तिपूर्ण है। अलाउद्दीन ही पहला सुल्तान था जो सेना को नकद वेतन देता था। इसके पुर्व तुर्की सैनिकों को वेतन भुगतान के लिये दोआब में गाँव दिये जाते थे। सैनिक इन गाँवों पर अपना वंशानुगत अधिकार मान लेते थे और बहुत बूढ़े और निर्बल होने पर भी अपना पद छोड़ने को तैयार नहीं होते थे। बलबन ने पुनः इन गाँवों को अपने अधिकार में लाने का प्रयास किया। किन्तु सैनिकों द्वारा विरोध और पुराने मित्र दिल्ली के कोतवाल के निवेदन करने पर उसने अपने आदेश में संशोधन कर दिया। किन्तु अलाउद्दीन ने इस प्रथा को अपने ही आदेश से रद्द कर दिया। वह प्रत्येक सैनिक को 238 टंके और दो घोड़े रखने वाले सैनिक को 78 टंके अधिक देता था। दकन विजय के साथ-साथ मंगोलों के आक्रमणों को रोक रखने में सफलता पाने का प्रमुख कारण अलाउद्दीन की सेना की क्षमता ही थी।
   तुर्क लोग एक बड़ी संख्या में हाथी रखते थे, जिन्हें युद्ध के लिये प्रशिक्षित किया जाता था। सेना के साथ सुरंग बनाने और खंदक खोदने वाले भी होते थे, जो सड़क की सफाई करने और मार्ग की बाधाओं को दूर करने का काम करते थे। घुड़सवार सेना में तुर्कों और अफगानों की प्रधानता थी, ये सम्मान की दृष्टि से देखे जाते थे। गजनवियों के काल में हिन्दुओं को घुड़सवार और पैदल दोनों प्रकार की सेनाओं में रखा जाता था। बाद में पैदल सेना में अधिक रखा जाने लगा था।
   राज्य के दो अन्य प्रमुख विभाग थे - एक था दीवाने रियासत और दूसरा दीवाने इंशा। पहला विभाग धार्मिक मामलों, पवित्र स्थानों तथा योग्य विद्वानों और धर्मपरायण लोगों को वजीफा देता था। इसका अध्यक्ष प्रमुख ‘‘सदर‘‘ होता था, जो साधारणतः प्रधान काजी होता था। यह मुख्य काजी भी होता था। मुख्य काजी, न्याय विभाग का अध्यक्ष होता था। साम्राज्य के विभिन्न भागों में काजियों की नियुक्ति की जाती थी। विशेषकर उन भागों में जहाँ मुसलमानों की जनसंख्या अधिक होती थी। काजी मुस्लिम धार्मिक कानून (शरीअत) पर आधारित नागरिक कानून की देखभाल करता था। वैयक्तिक विधि हिन्दूओं पर लागू किया जाता था, जिसके आधार पर गाँवों में पंचायतों तथा नगरों में विभिन्न जातियों के मुखिया निर्णय करते थे। दण्ड-विधान सुल्तान द्वारा बनाये गये नियमों पर आधारित थे।
   दीवाने इंशा नामक विभाग राज्य के पत्राचार से संबंध रखता था। सुल्तान तथा अन्य प्रभुता सम्पन्न शासकों के और अधीनस्थ कर्मचारियों के बीच समस्त औपचारिक तथा गोपनीय पत्राचार की जिम्मेदारी इस विभाग की थी।
   इसके अतिरिक्त कुछ अन्य विभाग भी थे। साम्राज्य के विभिन्न भागों में चल रही गतिविधियों की पूर्ण जानकारी के लिये शासकों ने चतुर दूतों की नियुक्ति की थी। ये दूत ‘बरीद’’ कहलाते थे। कुलीन व्यक्ति जो शासक का सबसे ज्यादा विश्वासपात्र होता था, केवल वहीं मुख्य ‘‘बरीद’’ के पद पर नियुक्त किया जाता था। राजपरिवार की देखरेख के लिये एक अन्य महत्वपूर्ण विभाग था। यह सुल्तान के वैयक्तिक सुख-सुविधा और राजपरिवार में बड़ी संख्या में स्त्रियों की आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रबंध करता था। यह एक बड़ी संख्या में स्थापित कारखानों की भी देखभाल करता था। जहाँ से राजा और राजपरिवार के लिये सामान आता था। कभी-कभी उन सामानों का निर्माण शाही देखरेख में होता था। फीरोज तुगलक ने गुलामों के लिये एक अलग विभाग खोल रखा था। इनमें से बहुत से गुलाम शाही कारखानों में काम करते थे। इन सभी क्रियाकलापों की देखभाल करने वाला पदाधिकारी ‘वकीलेदर’ कहलाता था। दरबार की मान-मर्यादा बनाए रखने और औपचारिक स्वागत-समारोहों के अवसर पर दरबारियों को उनके पद के अनुसार स्थान उपलब्ध कराने का कार्य भी उसी का होता था। फीरोज ने अलग से लोक-निर्माण विभाग की स्थापना की थी। यह विभाग नहरों तथा सार्वजनिक भवनों का निर्माण करता था।

स्थानीय प्रशासन

   तुर्कों ने जीते हुये प्रदेश को कुछ क्षेत्रों में विभाजित कर दिया। ये क्षेत्र इक्ता कहलाये। इन क्षेत्रों का उन्होंने अपने अग्रगण्य तुर्की सरदारों के बीच विभाजन कर दिया। इन प्रदेशों के अधिकारी मुक्ति या वाली कहलाए। ये क्षेत्र कालान्तर में प्रान्त या सूबा बन गये। प्रारम्भ में मु़क्ति स्वतन्त्र होते थे। उनसे अपने क्षेत्रों में कानून और व्यवस्था बनाए रखने की आशा की जाती थी। वे सरकारी बकाया भू-राजस्व की वसूली करते थे। उस संग्रहित धन से सैनिकों का वेतन दिया जाता था और शेष धनराशि को वे अपने पास जमा रखते थे। जैसे-जैसे केन्द्र सरकार मज़बूत होती गयी और उसका अनुभव बढ़ता गया वैसे-वैसे मुक्तियों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ता गया। वास्तविक आय को जानने के प्रयत्न किए गए और सैनिकों तथा मुक्ति को नकद वेतन निर्धारित करने का प्रयास किया गया। मुक्ति आवश्यक खर्च के बाद जो कुछ धन बचता था, सरकार को लौटा देता था। प्रत्येक दो वर्षों पर खर्च का कड़ाई से लेखा-परीक्षक किया जाता था। दोषी पाये गये मुक्तियों को यंत्रणा दी जाती और कैद की सजा होती थी। अपने शासन के अंतिम काल में फीरोज तुगलक ने सजा में ढील दी थी।
   सूबों को भी विभाजित किया जाता था। सूबों के नीचे शिक और शिकों की नीचे परगने होते थे। इन इकाइयों के प्रशासन के विषय में विशेष जानकारी नहीं है। कहा जाता है कि सौ या चौरासी गाँवों के समूहों की एक इकाई होती थी। यह अवश्य ही परगना का आधार रहा होगा। परगने का प्रधान ‘आमिल’ था। गाँव में सब से अधिक प्रभावशाली लोग खुत और मुकद्दम होते थे। गाँव का एक पटवारी होता था। गाँवों के शासन के संबंध में पर्याप्त जानकारी का अभाव है। गाँव का भू-राजस्व बकाया रहने पर ही इसके प्रशासन में संभवतः हस्तक्षेप किया जाता था।
   प्रारम्भ में स्थानीय प्रशासन के कार्यों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया था। भू-राजस्व की वसूली अधिकांशतः वही लोग करते रहे जो परम्परा से करते आये थे। तुर्कों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में शीघ्र ही अपना अधिकार स्थापित करने के कारणों में यही तथ्य प्रमुख था। इस सम्बन्ध में जिन परिवर्तनों का हमने वर्णन किया है, वे चौदहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में अलाउद्दीन ख़लजी के काल में आरम्भ हुए। इससे संघर्ष हुए और कृषकों में असंतोष फैला।

आर्थिक तथा सामाजिक जीवन

   दिल्ली सल्तनत के लोगों के आर्थिक जीवन के संबंध में हमें बहुत कम जानकारी मिलती है। समकालीन इतिहासकार साधरण लोगों के जीवन की अपेक्षा राजदरबार की घटनाओं में विशेष रुचि रखते थे। फिर भी उन्होंने जहाँ-तहाँ वस्तुओं के भावों का उल्लेख किया है। उत्तरी अफ्रीका स्थित तंजियर का निवासी इब्नेबतूता ने चौदहवीं शताब्दी में भारत का भ्रमण किया था। यह मुहम्मद तु़गलक के दरबार में आठ वर्षो तक रहा। उसने भारत की विस्तृत यात्रा की। उसने भारतीय उत्पादन जैसे फल-फूल, जड़ी-बूटियाँ आदि, सड़कों की अवस्था और जन-जीवन का विशद उल्लेख किया है। गुजरात और बंगाल के विषय में भी जानकारी मिलती है। इन यात्रियों के अनाजों, फलों और फूलों से संबंधित विवरणों से हम परिचित हैं। इब्नेबतूता का कथन हे कि भूमि इतनी उपजाऊ थी कि प्रतिवर्ष दो फसलें पैदा की जा सकती थीं और साल में तीन बार धान रोपा जाता था। तिल, गन्ना और कपास भी पैदा की जाती थी। उनसे तेल पेरने, गुड़ बनाने और बुनाई आदि कई ग्रामीण उद्योगों के लिये सामग्री होती थी।

काश्तकार तथा ग्रामीण भद्रजन

   पहले ही जैसे सल्तनत काल में ही भारत के काश्तकारों की जनसंख्या बहुत अधिक थी। पहले की भाँति काश्तकार घोर परिश्रम करते और बड़ी मुश्किल से जीवन यापन कर पाते थे। देश के विभिन्न भागों में बार-बार अकाल पड़ते थे और युद्ध होते थे जिससे किसानों की परेशानी बढ़ जाती थी।
   फिर भी सभी काश्तकार जीवन-निर्वाह स्तर पर नहीं रहते थे। गाँव का मुखिया (मुकद्दम) और छोटे जमींदार (खुत) एक उच्च स्तरीय जीवन का आनंद उठाते थे। अपनी भूमि के अतिरिक्त उनके पास कर मुक्त या रियायती दर पर कर वाली भूमि भी होती थी। यदाकदा अपनी शक्ति का दुरूपयोग करते और सीधे सादे किसानों को अपना भू-राजस्व भी देने के लिये विवश करते थे। ये लोग इतने समृद्ध थे कि मूल्यवान अरबी और ईरानी घोड़ों पर सवारी करते, अच्छे वस्त्र धारण करते और उच्च वर्ग के सदस्यों की भाँति व्यवहार करते थे। जैसे कि हम देख चुके हैं कि अलाउद्दीन ख़लजी ने उनके विरूद्ध कड़े, कठोर कदम उठाये और उनकी बहुत सी सुविधाओं में कटौती कर दी। फिर भी उनका जीवन स्तर सीधे-साधे काश्तकारों से कहीं ऊँचा था। ऐसा प्रतीत होता है कि अलाउद्दीन के मरणोपरान्त उन्होंने अपने पुराने तौर-तरीके अपना लिये थे।
   समाज का दूसरा समृद्ध वर्ग हिन्दू रईसों या स्वाधीन राजाओं का था जिन के पास उनकी पुरानी रियासतें थीं। हिन्दू रईसों के बलबन के दरबार में जाने के सम्बन्ध में बहुत से संदर्भ प्राप्त होते हैं। किन्तु इस संबंध में कोई संदेह नहीं है कि हिन्दू रईस उस क्षेत्र में भी प्रभावशाली बने रहे, जो दिल्ली सुल्तानों के सीधे अधिकार में थे।

व्यापार उद्योग और व्यापारी

   दिल्ली सल्तनत की स्थापना से आवागमन के साधनों की वृद्धि हुई। मुद्रा व्यवस्था जो चाँदी के टंके और ताँबे के दिहम पर आधारित थी, मजबूत हुई। इस प्रकार देश के व्यापार में निश्चित रूप से वृद्धि हुई। इसके कारण नगरों की संख्या में भारी वृद्धि हुई व नगरों में रहने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि हुई। इब्नेबतूता दिल्ली को पूर्वी इस्लाम दुनिया का सबसे बड़ा शहर बताता है। वह कहता है कि दौलताबाद (देवगिरि) आकार-प्रकार में दिल्ली के बराबर था और यह उत्तर और दक्षिण के व्यापारिक विकास का सूचक था। उत्तर-पश्चिम में स्थित लाहौर और मुल्तान, पूर्व में कड़ा और लखनौती तथा पश्चिम में अन्हिलवाड़ा (पाटन) और कैम्वे (खंभात) उस समय के प्रसिद्ध शहरों में थे। उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखकर ही इतिहासकार ने कहा है कि ‘‘सल्तनत शहरी अर्थव्यवस्था का विकसित रूप प्रस्तुत करती है।’’ इस प्रकार की अर्थ-व्यवस्था बड़े पैमाने पर होने वाले व्यापार के लिए निश्चित रूप से अनिवार्य थी। बंगाल और गुजरात के नगर बढ़िया किस्म के वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध थे। दूसरे नगरों में भी बढ़िया किस्म के वस्त्र तैयार किए जाते थे। गुजरात का कैम्वे सूती वस्त्रों और सोना तथा चाँदी के काम के लिए प्रसिद्ध था। बंगाल का सोनार गाँव कच्चे रेशम और महीन सूती वस्त्र (जो बाद में मलमल कहलाया) के लिए प्रसिद्ध था। वहाँ अनेक दस्तकारी के काम में भी होते थे, जैसे चमड़े, धातु का काम, गलीचा बनाना आदि। तुर्कों ने कुछ नये दश्तकारी के काम आरम्भ किए, जिसमें कागज का निर्माण शामिल था। कागज निर्माण कार्य चीन ने दूसरी शताब्दी में आरंभ किया था। जिसकी जानकारी अरब वासियों को पाँचवीं शताब्दी में हुई थी और यह चौदहवीं शताब्दी में ही यूरोप पहुँचा।
   चरखा और धुनकी जैसे दो आविष्कारों से वस्त्रोत्पादन में भी विकास हुआ। धुनकी से रूई शीघ्र और अच्छी तरह साफ की जा सकती थी। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात भारतीय दस्तकारों का हस्त कौशल था। पहले से ही भारतीय वस्त्रों की लाल सागर और फारस की खाड़ी के देशों में बड़ी खपत थी। इस काल में चीन में भी अच्छे किस्म के भारतीय वस्त्रों का प्रचलन हुआ। जहाँ उसको रेशमी वस्त्र से भी ज्यादा महत्व दिया जाने लगा। भारत उत्तम श्रेणी के वस्त्रों (अतलस आदि) शीशे के सामान और घोड़े भी पश्चिम एशिया से आयात करता था। चीन से यह कच्चे रेशम और चीनी मिट्टी के बर्तन मँगाता था।
   भारत का स्थल और जलमार्ग से होने वाला विदेशी व्यापार, वस्तुतः एक अन्तर्राष्ट्रीय उद्योग था। यद्यपि हिन्दू महासागरीय व्यापार में अरबवासी अग्रणी थे, वे भारतीय व्यापरियों को व्यापार से कदापि नहीं निकाल सके जिनमें तमिल और गुजराती हिन्दू-मुसलमान दोनों शामिल थे। मुस्लिम वोहरा सौदागरों का इस व्यापार में हाथ था। तटीय व्यापार एवं तटवर्ती बन्दरगाहों, उत्तरी भारत का मध्यवर्ती व्यापार मारवाड़ी व गुजराती व्यापरियों के हाथों में था। इनमें से अधिकांश जैन धर्म के अनुयायी थे। मध्य ओर पश्चिम एशिया का स्थलीय व्यापार क्रमशः मुल्तानियों और खुराशानियों के हाथों में था जो क्रमशः हिन्दू, अफगान, ईरानी आदि थे। इनमें से बहुत से सौदागर दिल्ली में बस गये थे। गुजराती और मारवाड़ी सौदागर अत्यधिक धनवान थे। उनमें से कुछ, विशेषकर जैनियों, ने मन्दिर निर्माण में एक बड़ी धन-राशि खर्च की थी। बंगाल एक बड़ा शहर था जिसमें अनेक धनाढ्य सौदागर रहते थे। उनके भव्य भवन गारे, चूने तथा बढ़िया पत्थरों के बने होते थे व उनकी छतों में टाइल लगे होते थे। उनके भवन फलवाटिकाओं से घिरे होते थे जिनमें अनेक सरोवर भी थे। ये धनाढ्य सौदागर और कुशल शिल्पी विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। उन्हें अच्छे भोजन करने और वस्त्र पहनने की आदत थी। हिन्दू और मुसलमान सौदागरों के अंगरक्षक सोने और चाँदी की जड़ाऊ तलवार लिए होते थे। दिल्ली में हिन्दू सौदागर बहुमूल्य साज सामानों से सुसज्जित घोड़ों पर सवारी करते थे। वे आलीशान भवनों में निवास करते तथा अपने त्यौहारों को बड़े धूमधाम से मनाते थे। बरनी कहता है कि मुल्तानी सौदागर इतने धनी थे कि उनके घरों में सोने और चाँदी का बाहुल्य रहता था। आमीर वर्ग (मलिक) उतना ही अपव्ययी था। हर समय में दावतों समारोहों का आयोजन करना चाहते थे। इसके लिये उन्हें मुल्तानियों के घर रूपये लेने के लिये जाना पड़ता था।
   उन दिनों चारों ओर डाकुओं और अनेक बटमार जनजातियों के कारण यात्रा करना खतरे से खाली नहीं था फिर भी राजपथों को साफ-सुथरा रखा जाता था। यात्रियों की सुविधाओं तथा सुरक्षा के लिए रास्ते में बहुत-सी सराएँ थीं। पेशावर से सोनार गाँव जाने वाले राजमार्ग के अतिरिक्त मुहम्मद तुगलक ने दौलताबाद तक, एक और सड़क बनवायी थी। देश के एक भाग से दूसरे भाग तक डाक शीघ्र लाने ले जाने की व्यवस्था थी। डाक का काम घोड़ों द्वारा व अधिक जल्दी होने पर धावकों द्वारा होता था जो आमतौर पर प्रत्येक मील की दूरी पर इसी उद्देश्य से बने मीनार पर नियुक्त होता था। धावक दौड़ते समय एक घंटी बजाता था ताकि दूसरा धावक उसे सुनकर उसका बोझ संभालने के लिए तैयार हो जाये। कहा जाता है कि इन डाक प्रबन्धों द्वारा सुल्तान के लिए खुरासान से ताजे फल प्राप्त किये जाते थे। मुहम्मद तुगलक जब दौलताबाद में था, जो दिल्ली से चालीस दिनों के सफर की दूरी पर स्थित था तो इन्हीं डाक-प्रबन्धों द्वारा उसके पीने के लिए गंगाजल नियमित रूप से प्राप्त किया जाता था।

सामाजिक जीवन और जीवन-स्तर

   मुल्तान और प्रमुख मलिकों के जीवन-यापन का स्तर तत्कालीन विश्व के उच्चतम जीवन स्तर अर्थात् पश्चिम और मध्य एशिया की इस्लामी दुनिया के शासक वर्ग के जीवन स्तर के समकक्ष था। उस समय जबकि यूरोप अभी भी अपने पिछड़ेपन को दूर भगाने के लिये प्रयत्नशील था, इस्लामी दुनिया के शासक-वर्ग की समृद्धि चकाचौंध करने वाली थी और प्रत्येक देश का शासक वर्ग इसका अनुकरण करने का प्रयत्न करता था। हिन्दू नरेशों की भाँति प्रायः सभी भारतीय सुल्तानों ने अपना महल बनवाया था। बलबन के राजदरबार की शानोशौकत इस प्रकार थी कि वह आगंतुकों को प्रभावित और संवेदनशील हृदय में श्रद्धायुक्त भय उत्पन्न करने में सक्षम थी। अलाउद्दीन खलजी और उसके उत्तराधिकारियों ने भी इसी परम्परा का अनुसरण किया। इब्नेबतूता द्वारा मुहम्मद तुगलक के महल का वर्णन किया गया है। कोई भी व्यक्ति जो सुल्तान से मिलना चाहता था उसे तीन अत्यन्त सुरक्षित ऊँचे दरवाजों से होकर हजारों स्तम्भों वाले दरबार में प्रवेश करना होता था। यह एक विशाल हाल था जो पालिशदार लकड़ी के स्तम्भों पर स्थित था और सभी तरह की कीमती वस्तुओं से अलंकृत और सुसज्जित था। यह वही स्थान था जहाँ सुल्तान का आम-दरबार लगता था।
   मुहम्मद तुगलक अपने प्रत्येक मलिक के सम्मान में दो पोशाक दिया करता था। एक जाड़े में और दूसरा गर्मी में। अनुमानतः वह इस प्रकार का 200,000 पहनावा प्रतिवर्ष उपहार में दिया करता था। इन पहनावों में साधारणतः आयात किए हुए वस्त्रों जैसे मलमल, बूटेदार कपड़े या ऊनी कपड़े होते थे जिन पर जरी, मखमल और बहुमूल्य पदार्थों का काम किया होता था। इन पर अवश्य ही बहुत बड़ी धन-राशि व्यय की जाती होगी। सुल्तान की वर्षगांठ, नौ रोज (फारसी साल का पहला दिन), राज्यारोहण की सालगिरह जैसे उत्सवों के अवसरों पर बहुत बड़ी संख्या में अमीरों तथा अन्य लोगों को उपहार दिये जाते थे।
   शाही कारखाने जिनका उल्लेख पहले किया जा चुका है, सुल्तानों की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। वे रेशम, सोना और चाँदी के तार आदि की बनी कीमती वस्तुओं को तैयार करते थे। यहाँ पर उत्तम और दुर्लभ सामान इक्ट्ठा होता था। भंडारों के अधीक्षकों को फीरोज तुगलक की ओर से यह आदेश था कि जहाँ कहीं भी और किसी भी कीमत पर बढ़िया तैयार की हुई वस्तुएँ मिलें, तो कारखानों के लिए खरीद लें। कहा जाता है कि एक समय सुल्तान के लिए एक जोड़ा जूता सत्तर हजार टके में खरीदा गया था। राजघराने के उपयोग की अधिकांश वस्तुएँ सोना और चाँदी की कढ़ाई की हुई और रत्नों की बनी होती थीं। भंडार हरम की वस्तुओं का भी प्रबन्ध करता था। लगभग प्रत्येक सुल्तान का एक हरम होता था। हरम में रानियाँ और अनेक देशों की स्त्रियाँ होती थीं। उनकी देखभाल और सुरक्षा के लिये हरम में एक बड़ी संख्या में नौकर-नौकरानियाँ और गुलाम रखे जाते थे। सुल्तान के सभी महिला रिश्तेदारों माता सहित चाची, मौसी आदि भी हरम में रहती थीं। प्रत्येक के रहने के लिए अलग-अलग आवास की व्यवस्था की जाती थी।
   मलिकों ने सुल्तानों के ठाट-बाट और रहन-सहन की नकल करने का प्रयास किया। वे महलों में निवास करते, मँहगी वस्तुओं के बने परिधान प्रयोग में लाते और एक बड़ी संख्या में नौकरों, गुलामों और परिचरों में घिरे रहते थे। वे शानदार दावतों और उत्सवों के आयोजन करने में एक दूसरे से होड़ करते थे। फिर भी कुछ अमीरों ने कलाकारों और विद्वानों को भी संरक्षण प्रदान किया।
   अलाउद्दीन ने मलिकों को दबाकर रखा था, लेकिन उसके उत्तराधिकारियों के काल में पुनः वे ठाट-बाट से रहने लगे। तुगलकों के काल में मलिकों के वर्ग की बन आयी। तेजी से साम्राज्य विस्तार होने के कारण मुहम्मद तुगलक के काल में अमीरों को अधिक वेतन और भत्ते दिये जाते थे। कहा जाता है कि मुहम्मद तुगलक के वजीर की आय इराक प्रान्त की आमदनी के बराबर थी। अन्य अग्रणी मंत्री 20,000 से 40,000 टंके प्रतिवर्ष पाते थे। प्रधान सदर 60,000 टंके प्रतिवर्ष पाता था। उसके बहुत से पुत्र और दामाद थे, जिन्हें अलग से भत्ता मिलता था।
   तुग़लक शासकों के काल में कुछ मलिकों ने बड़ी-बड़ी सम्पत्तियाँ अपने वारिसों के लिए छोड़ी थी। फीरोज का आरिजे ममालिक बशीर तेरह करोड़ की सम्पत्ति छोड़कर मरा था। इस आधार पर कि बशीर मूलतः उसका गुलाम था, फीरोज ने उसकी अधिकांश सम्पत्ति जब्त कर ली और शेष उसके पुत्रों में वितरित कर दी। इसे कुछ अंश तक अपवाद भी कहा जा सकता है। किसी भी मृतक अमीर की सम्पत्ति प्रायः सुरक्षित होती थी और उसके पुत्रों को हस्तांतरित करने की स्वीकृति दे दी जाती थी। यह वही वर्ग था, जो भूमि खरीदकर उन पर बगीचा, फलवाटिका, बाजार आदि बनवाता था। सुल्तान और उसके अमीर भारतीय फलों के गुण को विकसित करने में बहुत रुचि लेते थे। खरबूजों और अंगूरों के गुणों में विशेष रूप से उन्नति हुई थी।
   इस प्रकार एक नये भूमि सम्पन्न वर्ग के विकास की शुरुआत हुई। लेकिन पन्द्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में दिल्ली सल्तनत के विघटन से इस प्रवृत्ति में रुकावट आ गई।

नगर जीवन, गुलाम, कारीगर आदि

   हम नगर और नगर जीवन के पुनरूत्थान का उल्लेख पहले कर चुके हैं। तुर्की शासक वर्ग प्रधानतः नगरों में वास करता था व उन्हें नगर जीवन से रुचि थी। बहुत से नगर, रक्षक सेना को भोजन, सामान और सेनाएँ प्रदान करने के लिए सैनिक छावनियों के चारों ओर विकसित हुए। कालान्तर में उनमें से बहुत सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में उभरे।
   मध्यकालीन नगरों की आबादी मिश्रित होती थी, जिनमें अमीरों की संख्या अल्प, सरकारी विभागों के संचालन के लिये लिपिक वर्ग, दुकानदार, कारीगर, भिखारी आदि की संख्या अधिक होती थी। यह स्पष्ट है कि जो लिखना-पढ़ना जानते थे, उन्हें लिपिक और निम्न दर्जे के अधिकारी के पदों पर बहाल किया जाता था। उस समय अध्यापक का कार्य मुख्य रूप से मुसलमान धर्म-शास्त्रियों (उलेमा) के हाथों में था। अतः उलेमा और निम्न दर्जे के कर्मचारियों के चिंतन और आचरण का ढंग एक ही तरह का था। अधिकांश इतिहासकार इसी वर्ग से आगे आये थे और उनकी रचनाएँ उस वर्ग के विचारों तथा प्रतिकूल प्रभावों को प्रतिबिंबित करती हैं। भिखारी सामान्यतः बड़ी संख्या में साधारण नागरिकों की तरह शस्त्र धारण करते थे और कभी-कभी कानून और व्यवस्था के लिए समस्या खड़ी कर देते थे।
   नगर का दूसरा बड़ा वर्ग गुलामों और घरेलू नौकरों से बना था। गुलाम प्रथा बहुत लम्बे समय तक फारस, पश्चिम एशिया और यूरोप में कायम रही। हिन्दू शास्त्रों में कई प्रकार के गुलामों की स्थिति का उल्लेख है। उनमें परिवार में जन्में, खरीदे गये, उपार्जित (अन्य स्रोतों से प्राप्त) तथा उत्तराधिकार में प्राप्त गुलामों का वर्णन है। दास प्रथा को अरबों ने और बाद में तुर्कों ने भी अपनाया था। अधिकतर युद्ध बंदियों को गुलाम बनाने का रिवाज था। महाभारत में भी युद्ध बंदी को गुलाम बनाने का प्रमाण मिलता है। तुर्कों ने भारत के अंदर और बाहर के युद्धों में इस प्रथा का व्यवहार बड़े पैमाने पर किया। पश्चिम एशिया और भारत में भी गुलामों के क्रय-विक्रय के लिये बाजार विद्यमान थे। तुर्की, काकेशिया, यूनान और भारत के गुलाम उपयोगी समझे जाते थे। अतः बाजार में उनकी माँग अधिक थी। साधारणतः गुलाम घरेलू कार्यों, साथ रहने या विशेष गुणों के कारण खरीदे जाते थे। गुणवान गुलामों या रूपवान लड़के और रूपवती लड़कियों की कीमत कभी-कभी अधिक होती थी। गुणवान गुलामों को महत्वपूर्ण समझा जाता था। और उनमें से कुछ ऊँचे पदों पर पहुँच हुए थे। कुतुबुद्दीन ऐबक के गुलाम इसके उदाहरण हैं। फीरोज तुगलक भी गुलामों के गुण की पहचान करने वाला था। उसने 180,000 गुलामों को एकत्र किया था। कभी-कभी ऐसे गुलामों के साथ कठोर व्यवहार किया जाता था। यह कहा जा सकता है कि गुलामों की स्थिति घरेलू नौकरों से बहुत अच्छी थी, क्योंकि गुलामों के भोजन और आवास की व्यवस्था करना मालिक का उत्तरदायित्व था। दूसरी ओर एक स्वतन्त्र व्यक्ति भूख से मृत्यु की गोद में सो सकता था। गुलामों को शादी की अनुमति थी। वे कुछ निजी संपत्ति के स्वामी हो सकते थे। फिर भी यह सर्वमान्य था कि गुलाम प्रथा अमानवोचित है। स्त्री अथवा पुरूष गुलामों को सुविधा देना हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच एक प्रशंसनीय कार्य समझा जाता था।
   सल्तनत काल में नगर-निवासियों के लिये खाद्य-पदार्थ सामान्यतः सस्ते थे। अलाउद्दीन ख़लजी के समय के तीन खाद्य पदार्थों के मूल्य का उल्लेख हो चुका है उसके काल में गेहूँ 7)½ जौ 4 और चावल 5 जीतल प्रतिमन (लगभग 15 किलोग्राम) की दर से बिकते थे। मुहम्मद तुगलक के काल में तेजी से मूल्यवृद्धि हुई लेकिन फीरोज के काल में लगभग अलाउद्दीन कालीन मूल्यों के स्तर तक आ गये थे। यह संभव है कि उसके काल में कृषि विस्तार के कारण ऐसा हुआ है।
   नगर निवासियों के जीवन-निर्वाह के खर्च का अनुमान लगाना कठिन है। एक आधुनिक इतिहासकार का अनुमान है कि फीरोज के शासनकाल में एक पुरुष, उसकी पत्नी, एक नौकर, एक अथवा दो बच्चे वाला एक परिवार प्रतिमाह 5 टंके खर्चकर जीवित रह सकता था।
   इस प्रकार निम्न स्तर के सरकारी पदाधिकारी या एक सैनिक को जीवन-यापन करना आसान था। लेकिन शिल्पकारों और श्रमिकों पर यह उसी प्रकार लागू नहीं हो सकता था। अकबर के शासन काल में भी अकुशल श्रमिक को 2½ से 3 रूपये या इससे भी कम महीने में मिलते थे। आय के अनुपात में निवास करने वाले शिल्पकारों तथा श्रमिकों का जीवन-निर्वाह कठिन रहा होगा।
   इस प्रकार मध्यकालीन समाज विषमताओं का समाज था। यह विषमता हिन्दू समाज की अपेक्षा मुस्लिम समाज में अधिक प्रतिबिंबित होती थी। इसका कारण यह था कि हिन्दू समाज ग्रामीण था जहाँ विषमताएँ कम दिखाई देती थीं। यह उल्लेख किया गया है कि मुस्लिम सामंत वर्ग बड़े ठाट-बाट का जीवन व्यतीत करता था। कुछ धनी हिन्दू और मुसलमान सौदागर भी ठाट-बाट से रहते थे। ग्रामीण क्षेत्रों और नगरों के लोग भारी संख्या में सरल जीवन व्यतीत करते थे और प्रायः उन्हें अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ता था। अनेक प्रकार के उत्सव, मैले आदि कुछ सीमा तक उनको जीवन की नीरसता से मुक्ति दिलाते थे।

जाति, सामाजिक रीति-रीवाज

   इस काल में हिन्दू स्मृतिकारों ने ब्राह्मणों को समाज में ऊँचा स्थान देना जारी रखा, यद्यपि इन्होंने इस वर्ग के अयोग्य सदस्यों की कड़े शब्दों में निंदा की। दार्शनिकों का एक वर्ग इस बात का समर्थन करता है कि ब्राह्मण केवल विपत्ति के समय ही नहीं वरन् सामान्य परिस्थितियों में भी कृषि कार्य कर सकते हैं। उनका मत था कि कलियुग में यज्ञादि कार्य जीविका के पर्याप्त साधन नहीं है।
   स्मृति ग्रन्थ अब भी इस बात पर जोर देते रहे कि अपराधियों को दंडित करना और अच्छे को आँखों की पुतली समझना क्षत्रियों का धर्म है और प्रजा की रक्षा के लिये शस्त्र धारण करना केवल उन्हीं से संबंध रखता है। शूद्रों के कर्तव्यों और व्यवसायों और उनकी असमर्थताओं की न्यूनाधिक रूप से पुनरावृत्‍ति हुई। जबकि शूद्रों का परम कर्तव्य था दूसरी जातियों की सेवा करना, उन्हें माँस और मदिरा व्यवसाय को छोड़कर सभी व्यवसायों को अपनाने की छूट थी। शूद्रों के लिये वेदों के अध्ययन एवं सस्वर पाठ के निषेद्य की पुनरावृत्ति की गई। लेकिन पुराणों के सस्वर-पाठ को श्रवण करने पर कोई बंधन न था। कुछ लेखकों ने यहाँ तक कह डाला कि शूद्रों का भोजन करना, उनके साथ एक ही मकान में निवास करना, एक ही चरपाई पर बैठना और विद्वान शूद्र से धार्मिक शिक्षा ग्रहण करने से भी बचना चाहिए। इसे एक ज्यादती का ही विचार समझना चाहिए। लेकिन चान्डालों और जातिबहिष्कृत लोगों के साथ मिलने-जुलने पर भी कठोर प्रतिबंध था।
   हिन्दू समाज की स्त्रियों में बहुत कम सुधार हुआ था। लड़कियों का बाल-विवाह और नारी की पति-सेवा तथा पतिभक्ति जैसे प्राचीन सामाजिक नियम चलते रहे। परित्याग और रोगी होने जैसे विशेष परिस्थितियों में विवाह-विच्छेद की अनुमति थी। किन्तु सभी ग्रंथकार इससे सहमत नहीं हैं। कलियुगी निषिद्ध रिवाजों में विधवा-विवाह भी सम्मिलित था। लेकिन यह स्पष्ट रूप से तीन उच्च वर्गों में ही लागू होता था। सती प्रथा के संबंध में कुछ ग्रंथकार इसका जोरदार समर्थन करते हैं जबकि दूसरे इनका समर्थन कुछ विशेष परिस्थितियों के अंतर्गत करते हैं। कुछ यात्रियों ने देश के विभिन्न भागों में इस प्रकार के प्रचलित होने का उल्लेख किया। इब्नेबतूता ने नगाड़ों की भारी ध्वनि के बीच एक रत्री द्वारा सती होने के वीभत्स दृश्य का वर्णन किया है। उसके कथानानुसार सती होने के लिये सुल्तान से अनुमति लेनी पड़ती थी।
   संपत्ति के संबंध में भाष्यकारों ने विधवा की संपत्ति के अधिकार को उस स्थिति में समर्थन प्रदान किया है कि जब की वह पुत्रहीन हो या संपित्‍त संयुक्त परिवार की न हो यानी अविभाजित हो। इस प्रकार विधवा केवल संपित्‍त की संरक्षिका ही नहीं थी वरन् उसे विक्रय का भी पूर्ण अधिकार प्राप्त था। अतः यह स्पष्ट है कि हिन्दू विधि में स्त्री के संपत्ति संबंध अधिकार में सुधार हुए।
   इस काल में स्त्री को पृथक रखने और बाहरी व्यक्तियों के सामने घूँघट काढ़ने जैसी प्रथा उच्च वर्ग की स्त्रियों में बहुत प्रचलित थी। स्त्रियों को कुदृष्टि से बचाने की प्रथा हिन्दुओं में नहीं, वरन् प्राचीन ईरान और यूनान में भी प्रचलित थी। अरबों और तुर्कों ने इस प्रथा को अपनाया और वे इसे अपने साथ भारत लाए। उनकी देखा-देखी यह प्रथा भारत में भी विशेष रूप से उत्तर भारत में फैल गयी। परदा प्रथा के फैलने का कारण यह है कि हिन्दुओं में मुसलमान आक्रमणकारियों द्वारा उनकी स्त्रियों को अपहृत किया जाने का भय था। आक्रमण के युग में स्त्री को युद्ध के पुरूस्कार के रूप में देखा जाता था। संभवतः परदा-प्रथा के प्रचलन के महत्वपूर्ण कारण सामाजिक थे। कालान्तर में यह समाज के उच्च वर्ग का प्रतीक बन गया और जो इज्जतदार कहलाना चाहते थे, उन्होंने इस प्रथा का अनुकरण करने का प्रयास किया। बाद में इसके लिये स्त्रियों पर विपरीत प्रभाव पड़ा और वे पुरुषों पर और अधिक अवलम्बित हो गई।
   तुर्कों के काल में मुस्लिम समाज, नस्ल और जातिगत वर्गों में विभाजित रहा। पहले ही हम इनकी गहरी आर्थिक विषमताओं को देख चुके हैं। तुर्कों, ईरानियों, अफगानों और भारतीय मुसलमानों में एक दूसरे के साथ वैवाहिक संबंध बिरले ही हो पाता है। वस्तुतः हिन्दुओं के अतिरिक्त इन वर्गों में भी एक प्रकार से जाति-प्रथा विकसित हुई। हिन्दू समाज के निम्न वर्गों के जो व्यक्ति धर्म-परिवर्तन कर लेते थे, उनके साथ भी भेदभाव बरता गया।
   इस काल में हिन्दू और उच्च श्रेणी के मुसलमान के बीच भी सामाजिक मेल-मिलाप अधिक नहीं था। इसके दो प्रमुख कारण थे। पहला था मुसलमानों में श्रेष्ठता की भावना और दूसरा था पारस्परिक विवाहों का धार्मिक निषेध और एक साथ बैठकर भोजन न करना। हिन्दू जातियाँ मुसलमानों के साथ सदा वही प्रतिबंध लगाती थीं जो शूद्रों पर लागू होता था। लेकिन यह ध्यान में रखना चाहिए कि जातीय प्रतिबंधों के कारण मुसलमानों, सवर्ण हिन्दुओं और शूद्रों के बीच सामाजिक सम्पर्क बंद नहीं हुआ। अनेक अवसरों पर हिन्दू सैनिक मुसलमानों की सेनाओं में भर्ती किये गये। अधिकांश अमीरों के यहाँ हिन्दू व्यक्तिगत प्रबंधक के रूप में काम करते थे। स्थानीय शासनतंत्र प्रायः हिन्दुओं के हाथों में ही बना रहा। अतः एक दूसरे के सम्पर्क में आने के अनेक अवसर हाथ लगते थे। अतः यह सोचना कि दोनों समुदायों के लोग अपने तक ही सीमित रहते थे और उनका एक-दूसरे के साथ कोई संपर्क नहीं था, न तो सत्य है और ना ही व्यवहारिक। हमारे समक्ष इस कथन की सत्यता का कोई प्रमाण नहीं है। स्वार्थों के टकराव के अतिरिक्त सामाजिक और सांस्कृतिक विचारों, रीतियों और विश्वासों की विभिन्नता के कारण तनाव हुआ और परस्परिक सूझ-बूझ और सांस्कृतिक मेल-मिलाप की प्रक्रिया मंद पड़ गई। आगे के अध्याय में हम इन बातों पर विचार करेंगे।

राज्य का स्वरूप

   भारतीय तुर्की राज्य सैनिक और सामंती था। सर्वप्रथम तुर्की सामंतों ने सरकारी उच्च पदों पर एकाधिकार जमाया तथा ताजिकों, अफगानों और अन्य गैर-तुर्की लोगों को ऊँचे पदों से वंचित रखना चाहा। तुगलक शासकों के काल में सरदारों ने व्यापक आधार बना लिया। किसी सरदार घराने में जन्म लेना ऊँचे पद के लिये एक विशेष योग्यता थी। अतः हिन्दुओं के साथ-साथ अधिकांश मुसलमान भी उच्च पद प्राप्त करने से वंचित रह गये। निस्संदेह नगरों में निवास करने वाले मुसलमानों को सेना में भरती होने और सरकारी नौकरी पाने के अधिक अच्छे अवसर मिलते थे। लेकिन हिन्दू व्यापार पर छाए हुए थे और ग्रामीण सामंतशाही कायम रखे हुए थे और साथ ही साथ अवर प्रशासनिक पदों पर भी छाये हुए थे। इनके सहयोग के बिना सरकारी काम प्रायः नहीं हो सकता था। इस प्रकार ग्रामीण हिन्दू सामंतशाही और शहरी-प्रशासकों के बीच एक प्रकार से अनुक्त शक्ति की साझेदारी दिल्ली सल्तनत के लिए सबसे बड़े महत्व की बात थी। निस्संदेह इन विविध वर्गों के बीच निरंतर संघर्ष होता रहा था। यद्यपि अकसर इन्हें धार्मिक रंग दे दिया जाता था, लेकिन इनके बीच संघर्ष के आधारभूत कारण स्पष्ट थे। जैसे शक्ति और भूमि के लिये संघर्ष। साधारणतः उन दिनों भूमि का विक्रय नहीं होता था अतः अतिरिक्त उपज के बँटवारे के लिये भी संघर्ष होते थे। इन उद्देश्यों को लेकर मुसलमान भी आपस में लड़ते-झगड़ते थे।
   औपचारिक रूप से राज्य इस्लामी था। इसका अर्थ है कि सुल्तान मुस्लिम कानून के खुलेआम उल्लंघन की इजाजत नहीं दे सकता था। वह मुस्लिम उलेमा को राज्य के ऊँचे पदों पर नियुक्त करता था और उनमें से अनेक को राजस्व-मुक्त भूमि प्रदान करता था। सुल्तानों ने मुस्लिम धार्मिक नेताओं (उलेमा) को राज्य की नीति निर्धारण की अनुमति नहीं दी थी। कहा जाता है कि इल्तुतमिश के राज्य काल में मुस्लिम उलेमा का एक दल सुल्तान के पास पहुँचा और उससे कहा कि मुस्लिम कानून को सख्ती से लागू किया जाये और हिन्दुओं को इस्लाम स्वीकार करने या मृत्यु में से एक को चुनने के लिए कहा जाये। सुल्तान के बदले में उसके वजीर ने उत्तर दिया कि यह अव्यवहारिक और गैर राजनीतिक बात है, क्योंकि मुसलमानों की संख्या इतनी कम है कि जैसे भोजन में नमक।
   सुल्तान को मुस्लिम कानून को पूरा करने के लिए अपनी नियमावली बनानी पड़ी थी। अलाउद्दीन ख़लजी ने एक समय शहर के प्रमुख काजी से कहा था कि मुझे नहीं मालूम की इस्लाम के अनुसार क्या कानूनी है और क्या गैर-कानूनी। मैंने सल्तनत की आवश्कताओं को ध्यान में रखते हुए कानून बनाया है। इसीलिए इतिहासकार बरनी भारतीय तुर्की सल्तनत को वास्तविक इस्लामी मानने के लिए तैयार नहीं है, लेकिन उसे व्यवहारिक और लौकिक मान्यता (जहाँदारी) वाला बताया।
   जहाँ तक हिन्दू प्रजा की बात है, सिंध पर अरबों के आक्रमण के समय से ही उन्हें जिम्मा या रक्षित लोगों की श्रेणी में रखा गया अर्थात् जिन्होंने मुस्लिम नियमों का पालन करना और जजिया कर देना स्वीकार किया। वस्तुतः जजिया सैनिक सेवा के बदले में लगाया गया कर था और इसकी वसूली अशांकित पैमाने के अनुसार आय के आधार पर की जाती थी। स्त्रियों, बच्चों और दरिदों तथा जिनकी बहुत ही कम आय हो उन्हें इस कर से मुक्त कर दिया जाता था। ब्राह्मणों को भी कर से मुक्त रखा गया, यद्यपि मुस्लिम कानून में इसका कोई प्रावधान नहीं था। सर्वप्रथम जजिया भू-राजस्व के साथ वसूल किया जाता था। भू-राजस्व से जजिया के अंश का अंतर स्पष्ट करना कठिन था क्योंकि सभी कृषक हिन्दू थे। बाद में फीरोज ने जब अनेक अवैधानिक करों को समाप्त किया, जजिया एक अलग कर बना दिया। उसने इसे ब्राह्मणों पर भी लगा दिया। कभी-कभी धर्मशास्त्री जिन्हें जजिया वसूल करने की जिम्मेदारी थी, इसका प्रयोग हिन्दुओं को अपमानित करने या परेशान करने के लिये करते थे। फिर भी जजिया लगाने का उद्देश्य हिन्दुओं का धर्म-परिवर्तन कराना था।
   परन्तु जजिया अपने आप में हिन्दुओं को इस्लाम कबूल करने को मजबूर करने का उपकरण नहीं हो सकता था। आम तौर पर यह कहा जा सकता है कि मध्यकालीन राज्य समानता पर नहीं, बल्कि विशेषाधिकारों पर आधारित था। तुर्कों के पूर्व राजपूत और किसी हद तक ब्राह्मण विशेषाधिकारों का उपभोग करने वाले वर्ग थे। उनका स्थान अब तुर्कों ने ले लिया था। बाद में तुर्कों के अलावा ईरानी, अफगान और भारतीय मुसलमानों का एक छोटा सा समूह, ये सब विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों में शामिल हो गए। मुसलमान धर्माधिकारी या उलेमा भी इन वर्गों के सदस्य थे। हिंदुओं का जो विशाल वर्ग पहले इस तरह के विशेषाधिकारों का उपभोग नहीं कर रहा था, उसकी रोजमर्रा की जिंदगी में इस परिवर्तन से कोई बदलाव नहीं आया, बल्कि वह अपनी पहले वाली शक्ल में ही कायम रही। इस प्रकार यद्यपि राज्य इस्लामी होने का दावा करता था तथापि वास्तव में वह सैन्यवादी और कुलीनतांत्रिक था। सल्तनत के अधीन धार्मिक स्वतंत्रता इसी संदर्भ में हम इस बात का भी जायजा ले सकते हैं कि दिल्ली सल्तनत के अधीन गैर-मुसलमानों को कितनी धार्मिक स्वतंत्रता दी गई थी। विजय के आरंभिक दौर में कई नगरों को तहस-नहस कर दिया गया था। मंदिर आक्रमणकारियों के खास लक्ष्य होते थे जिसका कुछ कारण तो यह था कि वे अपने लोगों की निगाह में अपने हमलों का औचित्य साबित करना चाहते थे और कुछ मंदिरों की अकूत संपित्‍त पर अधिकार करना होता था। इस काल में कई हिंदू मंदिरों को मस्जिदों में बदल दिया गया। इसका सबसे उल्लेखनीय उदाहरण कुतुबमीनार के निकट कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद है जो पहले विष्णु मंदिर था। इसे मस्जिद का रूप देने के लिए गर्भगृह को, जिसमें देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित थी, गिरा दिया गया और उसके सामने मेहराबों का एक आवरण खड़ा कर दिया गया तथा इन मेहराबों पर कुरान की आयतें उत्कीर्ण कर दी गईं। अहाते को घेरने के लिए कई मंदिरों से लाए गए स्तंभों का इस्तेमाल किया गया। बाकी अहाते को कमोबेश ज्यों का त्यों छोड़ दिया गया। कई और जगहों में भी, जैसे अजमेर में, ऐसा ही किया गया। लेकिन जब इस देश में तुर्कों ने अपने पैर जमा लिए तो शीघ्र ही उन्होंने अलग से मस्जिदें बनवाना शुरू कर दिया।
   मंदिरों तथा हिंदुओं, जैनों आदि के पूजा स्थलों के प्रति नीति इस्लामी कानून (शरीअत) पर आधारित थी जो ‘‘इस्लाम के बरखिलाफ’’ नए पूजा स्थलों के निर्माण का निषेध करता था। लेकिन शरीअत में पुराने मंदिरों की मरम्मत की छूट थी ‘‘क्योंकि इमारतें हमेशा के लिए कायम नहीं रह सकतीं।’’ इसका मतलब यह भी था कि गाँवों में मंदिर बनवाने पर कोई रोक नहीं थी क्योंकि अब तक वहाँ मुसलमानों की आबादी कायम नहीं हो पाई थी। इसी प्रकार घरों के एकांत में मंदिर बनवाए जा सकते थे। परंतु युद्ध काल में इस उदार नीति का पालन नहीं किया जाता था। युद्ध के समय में तो इस्लाम के शत्रुओं के खिलाफ, चाहे वे मनुष्य हों या देवी-देवता, लड़ना और उनका विनाश करना था। मगर शांतिकाल में तुर्कों के प्रदेशों में तथा जिन क्षेत्रों में राजाओं ने तुर्कों की अधीनता स्वीकार कर ली थी उन क्षेत्रों में हिंदू अपने धर्म का आचरण और उत्सव आडंबर खुल्लमखुल्ला करते थे। बर्नी के अनुसार जलालुद्दीन खिलजी ने देखा कि राजधानी और सूबाई केंद्रों में भी खुलेआम मूर्तिपूजा की जाती थी और हिंदू धर्मग्रंथों के पाठों का प्रचार किया जाता था। उसने कहा ‘‘हिंदू लोग मूर्तियाँ का यमुना में विसर्जन करने के लिए नाचते-गाते, ढोल बजाते हुए, जुलूसों में शाही महल की दीवारों के पास से गुजरते हैं और मैं चुपचाप देखता रह जाता हूँ।’’
   कट्टरपंथी उलेमाओं के एक वर्ग के दबावों के बावजूद न्यूनाधिक सहिष्णुता की यह नीति सल्तनत काल में कायम रही यद्यपि समय-समय पर इसमें बाधा भी पड़ी। कभी-कभी युद्ध बंदियों को मुसलमान बना लिया जाता था या इस्लाम कबूल कर लेने पर अपराधियों को माफ कर दिया जाता था। फिरोज ने इस्लाम के रसूल के लिए अपशब्दों का प्रयोग करने के अपराध पर एक ब्राह्मण को प्राणदंड दे दिया था। दूसरी ओर मुसलमानों को हिंदू बनाने के भी कुछ उदाहरण मिलते हैं। महानफ वैष्णव सुधारक चैतन्य ने बहुत से मुसलमानों को हिंदू बना लिया था अलबत्‍ता उलेमा लोग इस्लाम के त्याग को मृत्युदंड के योग्य अपराध मानते थे।
   कुल मिलाकर लोगों को मुसलमान बनाने का काम तलवार के जोर पर नहीं किया जाता था। यदि ऐसा किया जाता तो सबसे पहले दिल्ली और उसके आसपास की हिंदू आबादी को मुसलमान बनाया गया होता। मुसलमान शासकों को यह एहसास था कि हिंदू धर्म इतना प्रबल है कि उसे तलवार के जोर पर मिटाया नहीं जा सकता। दिल्ली के प्रसिद्ध सूफी संत निजामुद्दीन औलिया ने एक बार कहा था - ‘‘कुछ हिंदू जानते हैं कि इस्लाम एक सच्चा धर्म है, लेकिन वे इस्लाम को कबूल नहीं करते।’’ बर्नी भी कहता है कि हिंदुओं के खिलाफ बल प्रयोग का उन पर असर नहीं होता।
   इस्लाम में धर्मांतरण का कारण राजनीतिक या आर्थिक लाभ का लोभ या अपनी सामाजिक स्थिति में सुधार की संभावना थी। कभी-कभी जब कोई महत्वपूर्ण शासक या जनजातीय नेता मुसलमान बन जाता था तब उसकी प्रजा भी वैसा ही करती थी। सूफी संतों ने भी धर्मांतरण में कुछ भूमिका निभाई, यद्यपि आम तौर पर उनका इससे कोई सरोकार नहीं होता था और अपनी संगत में हिंदुओं एवं मुसलमानों दोनों का ही वे स्वागत करते थे। अलबत्‍ता कुछ सूफी संतों के संत स्वभाव के कारण इस्लाम के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हुआ। लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं मिलता कि निचली जातियों के लोगों के खिलाफ हिंदू समाज में जो दुर्व्यवहार किया जाता था उसके कारण अथवा सूफी संतों के प्रभाव की वजह से हिंदुओं ने बड़ी संख्या में इस्लाम को कबूल कर लिया। इस प्रकार धर्मांतरण के कारण व्यक्तिगत, राजनीतिक और कुछ मामलों में (जैसे पंजाब, पूर्वी बंगाल आदि के संबंध में) क्षेत्रीय थे। कुछ क्षेत्रों जैसे कि पश्चिमी पंजाब और पूर्वी बंगाल में अनेक जनजातियों जिनके अपने देवी-देवता थे, ने नियमित कृषि को अपनाया और कुछ समय के बाद मुसलमान बन गए।
   पश्चिम एशिया पर मंगोलों के आक्रमण के बाद मुसलमान परिवारों के बहुत से लोग भाग कर भारत पहुँचे। अफगान लोग भी भारत में लगातार आकर बसते रहे। उनमें से काफी सारे लोग तुर्क सेना में भर्ती हो गए या व्यापार में लग गए। लोदी शासन के अधीन पंद्रहवीं सदी में और भी अफगान भारत आए। इस सबके बावजूद भारत में मुसलमानों की संख्या अपेक्षाकृत कम ही रही। हिंदू-मुस्लिम संबंधों के स्वरूप तथा दोनों की सांस्कृतिक प्रवृत्ति‍याँ, जिन पर हम आगे के एक अध्याय में विचार करेंगे, परिस्थितियों के तकाजों से तय हुईं।